विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

पाठकीय विधा एवं हितनाथ झा

आशीष अनचिन्हार · 2024-11-01 · अंक 405

२७.आशीष अनचिन्हार- पाठकीय विधा एवं हितनाथ झा
आशीष अनचिन्हार-संपर्क-8876162759
पाठकीय विधा एवं हितनाथ झा
पाठकीय, समीक्षा, आलोचना एवं समालोचना ई चारू एकै गोत्र केर संतान थिक मुदा प्रकृति भिन्न-भिन्न। एहि चारूमे पाठकीय नामक रचनामे पाठकक नितांत निजी भाव लिखल जाइत छै। कोनो पाठककेँ कोनो रचना नीक लगलै वा कि खराप तकरा ओ अपन व्यक्तिगत मापदंडपर कसि कऽ लेखक एवं बाँकी पाठक लग राखि दै छथि। आ से भेल पाठकीय नामक विधा। पाठकीय नामक एहि विधाकेँ एहि बातसँ मतलब नै छै जे जाहि रचनाक बारेमे ओ चर्च केलकै ओहि लेल शास्त्र की कहै छै, साहित्यिक दृष्टिकोणसँ कतेक सफल छै, ओकर सकारात्मक वा नकारात्मक प्रभाव समाज लेल की छै से सभ पाठकीयमे नहि भेटत, कारण ई नितांत निजी भावपर आधारित रहै छै।
मैथिलीमे किछुए रचनाकेँ समीक्षा, आलोचना, समालोचना कहल जा सकैए। अधिकांश मात्र पाठकीय रहैत अछि। भने ओकर शीर्षक समीक्षा, आलोचना, समालोचना किएक ने हो। मैथिली गजले जकाँ अहू ठाम गोलमाल छै। जेना मैथिलीक मुख्यधारामे गीत, कविता नवगीत आदिक शीर्षक गजल राखि ओकरा गजल मानि लेल जाइत छै तहिना पाठकीय केर शीर्षक समीक्षा, आलोचना, समालोचना राखि बहुत रास लेखक अपनाकेँ समीक्षक, आलोचक एवं समालोचक मानि लै छथि। जेना कि पाठकीय मात्र निजी विचार होइत छै तँइ बहुत रास पठाकीयमे खरापो रचनाकेँ नीक अथवा नीको रचनाकेँ खराप कहि देल जाइत छै।
पछिला किछु बर्खसँ किछु लोक सभ चर्चाक दौरान कहलाह जे हितनाथ जी सभ लेखकक सभ रचनाकेँ नीके कहैत छथिन ई कोना संभव छै जे सभ रचना नीके हेतै? आदि-आदि..। फेर धेआनसँ जखन हम हितनाथ जी द्बारा लिखल कथित समीक्षा सभ पढ़लहुँ तऽ सभसँ पहिने नजरि पड़ल जे हितनाथजी अपने ओकरा फेसबुकपर "पाठकीय" कहैत छथिन। एकर ई मतलब भेलै जे हितनाथ झा जी जकरा पाठकीय कहि रहल छथिन ताहि रचना सभकेँ पाठक समीक्षा, आलोचना, समालोचना बूझि रहल छथिन। तऽ ई दिक्कत पाठकक छनि हितनाथ जीक नहि। बहुत संभव जे हितनाथ जी जकरा पाठकीय कहने छथि से समीक्षा, आलोचना कि समालोचना हो। मुदा एहनो स्थितिमे पाठक पहिने ओकरा पाठकीय हिसाबें पढ़थि आ तकरा बाद ओकर महत्वकेँ देखाबथि जे भने एकरा पाठकीय कहल गेल हो मुदा ई समीक्षा, आलोचना कि समालोचना अछि। मैथिली गजलक आलोचना लेल हम अपने इएह नियम रखैत छी। मानि लिअ कोनो शाइर अपन रचनाकेँ गजल शीर्षक देलखिन तऽ ओकरा हम गजले मानि कऽ पढ़ैत छियै आ पढ़लाक बाद देखैत छियै जे ओहिमे गजलक नियम छै कि नै आ तकर बाद ईहो देखैत छियै जे नियम रहलाक बादो ओहिमे गजलक गुण छै कि नै। तकर बाद हम ओकर निर्धारण गजल, आजाद गजल कि गीत-कविताक रूपमे करैत छियै। एहि ठाम साफे-साफ हितनाथजी अपन रचनाकेँ पाठकीय कहि रहल छथिन तखन ओ सभ लेखकक सभ रचनाकेँ यदि नीके कहि रहल छथिन तऽ ओहिमे आपत्ति की? हमरा बुझने ई पाठकक दिक्कत छनि जे ओ हरेक तुकबंदीकेँ गजल आ हरेक टिप्पणीकेँ समीक्षा, आलोचना, समालोचना मानि लेबापर बिर्त छथि। मैथिलीक पाठककेँ अपन स्तर बढ़ाबऽ पड़तनि आ ताहि लेल पुरान आ नव साहित्यकेँ पढ़ऽ पड़तनि।
मुदा की हरेक समय पाठके गलत होइत छथि? एकर उत्तर हँ आ नै दूनू भऽ सकैए। मुदा हितनाथजीक प्रसंगे देखी तऽ किछु दिक्कत हितनाथजीक दिससँ सेहो भेल छनि। जेना-
हितनाथ जी फेसबुकपर जखन कोनो पोथी लेल लिखैत छथि तऽ स्पष्ट रूपेँ पाठकीय लिखल रहैत छै से हम हुनक पुरनो पोस्ट सभमे देखि रहल छी मुदा जखन ओ पाठकीय केर संग्रह "लेख-रेख" नामसँ प्रकाशित करै छथि तखन ओकरा पोथी-प्रसंग केर नाम दैत छथि आ भूमिकामे "पाठकीय" शब्दक कोनो चर्चे नहि करैत छथि। हमरा जनैत पहिल भ्रम अही ठामसँ शुरू भेलै आ तकर पूर्णाहुति ओही "लेख-रेख" पोथीमे डा. ललितेश मिश्र (आब स्वर्गीय) केर भूमिका (साहित्य सर्जनक लेखा-जोखा) सँ भऽ जाइत अछि जाहिमे ललितेशजी एहि पाठकीय सभकेँ समालोचना कहि दैत छथिन। सेहो बिना कोनो स्पष्टीकरण, बिना कोनो तर्क, बिना कोनो कारण देने। हम पहिनेहो कहलहुँ जे कोनो पाठकीय अपन गुणसँ प्रमोशन पाबि समीक्षा, आलोचना, समालोचना कहा सकैत अछि अथवा कोनो समीक्षा, आलोचना, समालोचना अपन अवगुणक कारणे पाठकीय केर दर्जामे आबि सकैत अछि मुदा ताहिपर चर्चा तऽ हो, ओकर विवरण आन पाठक लगमे एबाक चाही। हमरा जनैत ललितेशजी एहिठाम चुकि गेलाह। आ हितनाथजी सेहो चुकि गेलाह अछि। तँइ पाठक ई चर्चा करैत भेटि जाइत छथि जे हितनाथजी सभ लेखककेँ नीक आ सभ रचनोकेँ नीक किएक कहि दैत छथिन।
ओना हमर स्पष्ट मानब अछि जे कोनो पोथीकेँ जनता लग लऽ जेबाक सभसँ नीक साधन पाठकीय छै, समीक्षा, आलोचना, समालोचना नहि। तँइ 'पाठकीय' नामक एहि विधाकेँ एखनेसँ उचित परामर्शक जरूरति छै। हितनाथजी एहिमे अग्रणी भऽ सकै छथि संगहि एहि विधाकेँ शीर्षपर पहुँचा सकै छथि मुदा शर्त अतबे जे हितनाथजी कथित समीक्षक, आलोचक वा कि समालोचक हेबाक चक्करमे नहि पड़थि। ईहो उम्मेद जे जहिया हितनाथजी अपन पाठकीय केर दोसर पोथी प्रकाशित करताह ताहिमे पाठकीय आ समीक्षा, आलोचना, समलोचना आदि बिकछाएल रहत। ई आलेख मात्र हितनाथजीक पाठकीय लेल नहि जे कियो पाठकीय लिखैत छथि हुनको लेल अछि।
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Suggested citation: आशीष अनचिन्हार. “पाठकीय विधा एवं हितनाथ झा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 405, 2024-11-01. https://www.videha.co.in/research/2024/405/पाठकीय-विधा-एवं-हितनाथ-झा.htm

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