विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मिथिला मैथिलीक हितैषी हितनाथ झाजी

लक्ष्मण झा सागर · 2024-11-01 · अंक 405

२३.लक्ष्मण झा सागर- मिथिला मैथिलीक हितैषी हितनाथ झाजी
लक्ष्मण झा 'सागर, संपर्क-9903879117
मिथिला मैथिलीक हितैषी हितनाथ झाजी
हितनाथ जीकें हम मिथिले मिहिरक अमलसँ जनैत छियनि। हिनकर कथा पिहानी पढ़ल करी मिहिरमे। हमरा हिनक रचना आकृष्ट करैत रहए। हिनक विषयक चयन आ शब्द संसार बड़ नीक लागए। ने कोनो भेंट ने कोनो संवाद तकर बादो हम दुनू मित्रवत् रही। गाम कोइलख छनि ततबे टा परिचय रहय। तहिया ततबे टा परिचयसँ काज चलि जाइत रहै। हुनको हमर गामक नाम बुझल रहनि। हमरे पट्टीमे हमरे एक बहिनक वियाहमे कोइलखसँ बरियाती आयल छल। ओहि बरियातीमे एक गोटे हमर नामक लोकके तकैत रहथि। हमर समांग कियो हमरा ओहि बरियाती लग पेश कय देलनि। ओ हमरा हाथक लिखल एकटा चिट्ठी देलनि। प्रेषक रहथि हितनाथ झा हितेश गाम कोइलख। हम देखल जे हितनाथ जी मिहिरमे प्रकाशित हमर कोनो कथाक खूब प्रशंसा केने रहथि (से पत्र हमर आबय वला पोथीमे संकलित अछि)। हम तऽ अवाक। मोनमे ततेक ने खुशी भेल जे हम सेहो ओही बरियातीक हाथें हुनका पत्रोतर पठा देल। आब दुनू गोटेक बीच परिचय कने आकार लेबय लागल छल।
हम मधुबनीक कौलेजमे नाम लिखाय लेने रही। हितनाथ जी पटनाक कोनो कौलेजमे पढ़य चल गेल रहथि। मिहिरमे दुनू गोटेक नेना भुटकाक चौपाडिमे किछु ने किछु छपिते रहय। हम तऽ मात्र अपन पढ़ाइमे लागल रही। मुदा, हितनाथ जी पढ़ाइक अलावे पटनाक साहित्यिक सांस्कृतिक संस्था सभमे सक्रिय रहय लगलाह। आ से खूब काजो सभ केलनि। पोथी पत्रिकाक सम्पादन प्रकाशन सन भरिगर काज सब हाथमे लेथि आ तकरा पूर्ण मनोयोगसँ संपादित करैत रहथि। मैथिली आन्दोलनमे सेहो हिनक सहभागिता रहनि। गपक क्रममे जीवकान्तजीसँ पता चलल जे हितनाथ जी तऽ श्री भीमनाथ झाजीक भाय छथि। तावत भीमनाथ झाजी भीमबाबू बनि गेल रहथि पटनामे। हितनाथ जीकें भीमबाबू संसर्गमे मैथिलीक बड़का बड़का साहित्यकार सभसँ भेंट होइत रहलनि। सम्पर्क आ सान्निध्य बढ़ैत रहलनि। मैथिलीक प्रति स्नेह आ समर्पण बढ़ैत गेलनि। भीमबाबूक अनुज हितनाथ जी अपन दुलारक नाम भगवानजीसँ प्रसिद्धि पाबि लेने रहथि।
मधुबनीक बाद हम कलकत्ता चल एलहुँ। कलकत्तासँ असम चल गेल रही आ असमसँ फेर 1997मे कोलकाता आपस आबि गेल रही। हितनाथ जी कतय गेलाह आ की करैत छथि से सब किछु हमरा जानकारीमे नै रहल। आ ने हम जानकारी लेबाक प्रयासे कैल। हमरा दुनूक बीच सम्पर्क भंग भऽ गेल छल। आ से भंग रहल तीन दशकसँ उपरे। एकबेर हम अपन कोनो आलेखमे लिखने रही कोनो स्मारिकामे जे फल्लाँ फल्लाँ लेखक सभ जे पहिने सृजनशील छलाह से सब आब जड़ताक स्थितिमे आबि गेल छथि। एहि लिस्टमे हितनाथ झा हितेश जीक नाम सेहो छलनि। से आलेख हितनाथ जी सेहो पढ़लनि। हुनक भीतरक रचनाकारके कछमच्छी छुटय लगलनि। संयोग एहेन बनल जे दरभंगा गेल रही त शिष्टाचार भेंट लेल लक्ष्मीसागरक आवास पर डा. भीमनाथ झाजीसँ भेंट कैल। गप्पक क्रममे हुनकासँ हितनाथ जीक बारेमे पता कैल। तऽ ओ सविस्तार बात कहलनि जे भगवान जी (मने हितनाथ जी) हजारीबागमे रहैत छथि। बैंकमे बड़का पद पर पदस्थापित छथि। मोन अतिशय प्रसन्न भेल। हुनकेसँ हितनाथ जीक मोबाइल नंबर लेल। आ कोलकाता आबि हम हुनका फोन कैल। पुछलियनि जे अहाँ हितनाथ झा हितेशजी बजैत छी? ओ हमरा नै चिन्हलनि। कोना चिन्हतथि? कहियो गप भेल रहैत तखन ने। हम अपन परिचय देलियनि तऽ बड़ प्रसन्न भेलाह आ कहलनि जे हम अपन उपनाम हितेश तऽ बिसरि गेल रही। अहाँ मोन रखने छी से हमरा लेल बड़का बात। आर गप सप भेल किछु पारिवारिक आ बेसी साहित्यिक। हम कहलियनि जे लिखब पढ़ब कियैक छोड़ि देलियैक तऽ कहलनि बैंकक नोकरी बड़ मजबूरी अछि। समय नै भेटैत अछि। अवकाश ग्रहण करब तहन फेर शुरू करब। हमरा नीक लागल हुनक स्वीकारोक्ति।
से ठीके जहिना कहने रहथि तहिना लिखब शुरू केलनि हितनाथ जी (हितनाथ झा नामसँ) आ से रेलगाडीक इंजन जकाँ पहिने धुक-धुक तखन झक-झक आ तकर बाद त राजधानी एक्सप्रेस जकाँ बिना कोनो आवाजके दौड़य लगलाह हितनाथजी अपन लेखन पथ पर। अवकाशक बाद हिनका लग दू टा मात्र काज रहि गेलनि। पढ़ब आ लिखब। खूब पढ़य लगलाह आ तहिना लिखय लगलाह। आब ई जे पढ़ैत छथि से कोनो आजी-गूजी वस्तु नै पढैत छथि। साहित्य अकादेमीक समारोह सभमे आलेख पाठ करबाक लेल बजौल जाइत छथि। ई अपन आलेख लिखय लेल विभिन्न पत्र पत्रिका आ संदर्भ पोथी सभ पढ़ि कऽ अपन आलेख लिखैत छथि। बेस लिखैत छथि। लोक सभ प्रशंसा करैत छनि। ई पहिल साहित्यक एहन लोक छथि जे अपन गाम कोइलखक गाथा लिखलनि। से बड़ चर्चित भेलनि। अपन पिता स्व. तारानाथ झाक हस्तलिखित ताहि जमानाक पत्रिकाक ताक हेर केलनि। तकरा सोशल मीडियामे पोस्ट दर पोस्ट करैत रहैत छथि। लोककेँ चकबिदोर लागि जाइत छैक। फेसबुक आ ह्वाट्सएप ग्रुपमे खूब सक्रिय रहैत छथि। नव-नव रचनाकार लोकनिकें प्रोत्साहित करबाक लेल हुनकर पोथी सभ पढैत छथि। समीक्षा लिखैत छथि। समालोचना करैत छथि आ से पूर्ण ईमानदारी आ मेहनतिसँ करैत छथि। साहित्यक जगतमे ख्याति भऽ गेलनि। ततेक समीक्षाक सामग्री भऽ गेलनि जे 'लेख रेख' नामक पोथीक प्रकाशन भऽ गेलनि। तकर साहित्यक जगतमे खूब स्वागत कैल गेलनि।
ततबे नै, नेना भुटकाक लेल से उपयोगी बाल रचना सभ लिखैत रहैत छथि। से बेसीकाल आ बेर-बेर लिखैत रहैत छथि। फेसबुक पर ई हमरासँ प्रतियोगिता करैत रहैत छथि। आ से हमहीं हारि मानि लैत छियनि। ई हारि मानय वला लोक नै छथि। से जँ रहितथि त मैथिली इतिहासक रेखांकन (2003) सन कृति आ त्रिवेणी (2020) सन हजारीबागसँ निकलय बला पत्रिकाक सम्पादनमे क्रमश: संयुक्त आ एसगर एहेन वैशिष्ट्य प्रकाशन नै संभव भऽ सकितै। हिनक आरो आर पोथी सभक प्रकाशनक योजना छनि। हिनकासँ पहिल भेंट अछि राँचीक कोनो साहित्य अकादमीक कार्यक्रममे। गोर नार आ ठाढ़ नाक वला हिनक व्यक्तित्व हमरा बेस प्रभावित केने रहय। दोसर भेंट अछि मुजफ्फरपुरमे सेहो साहित्य अकादमीक सेमिनारमे। बहुत सज्जन आ धीर गंभीर लोक छथि हितनाथजी। सहमिल्लू तऽ सहजहिं स्वभावमे छनि। मैथिली भाषा साहित्यकें हिनका सन लोकक विशेष खगता छैक। मैथिलीक प्रति हिनक स्नेह खूब अगाध छनि। हम हिनक सुदीर्घ आ यशस्वी जीवनक कामना करैत छियनि आ विदेह परिवारक प्रति आभार व्यक्त करैत छी जे हिनका पर विशेषांक निकालि रहल अछि।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।

Suggested citation: लक्ष्मण झा सागर. “मिथिला मैथिलीक हितैषी हितनाथ झाजी.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 405, 2024-11-01. https://www.videha.co.in/research/2024/405/मिथिला-मैथिलीक-हितैषी-हितनाथ-झाजी.htm

मूल विदेह अंक / Original issue