४.कल्पना झा- मैथिली साहित्यक परम्परा आ विकास सँ परिचित करबैत अछि मैथिली इतिहासक रेखांकन
कल्पना झा
मैथिली साहित्यक परम्परा आ विकास सँ परिचित करबैत अछि : मैथिली इतिहासक रेखांकन
"रिटायरमेंट केर बाद किछु लोक मैथिलीमे कथा-कविता लिखऽ लागै छथि जे कि मात्र पुरस्कार ओ मंचक लेल होइत छै। एकर विपरीत हितनाथ झा रिटायरमेंटक बाद अपन लेखन लेल ग्राम इतिहास एवं पाठकीय लिखब चुनलाह जे कि एकटा अनिवार्य काज छै साहित्य लेल।" ई कहब छनि आशीष अनचिन्हार जीक। आ इएह बात (मंच-माइक-मालाक फेरामे नहि पड़ब) आदरणीय हितनाथ सर केँ विशिष्ट बनबैत छनि। निष्काम कर्म मे लीन बुझाइत छथि। ना काहू से दोस्ती (मतलब अतिशय बला, जे घातक होइत अछि) ना काहू से बैर....इएह छथि हितनाथ सर। चाहे हिनका फेसबुक पोस्ट केर माध्यम सँ जानबाक चेष्टा करी वा प्रत्यक्ष भेंटघाँट करी, हिनकर एहने प्रकृति दृष्टिगोचर होएत। सभक संग मित्रवत, सभक लेल सौम्य।
जखन विदेह टीम द्वारा हितनाथ झा जी पर विशेषांक प्रकाशित करबाक घोषणा कएल गेल, तँ हितनाथ जीक एखन धरिक साहित्यिक यात्रा (प्रकाशित पोथी) पर नजरि खिरौलहुँ। संयोगवश हमरा लग हिनकर सभटा पोथी पहिनहि सँ उपलब्ध छलए। आ सद्यः प्रकाशित "राजापोता बलगर" एखनहि प्राप्त भेलए। हजारीबाग हिनकर निवास स्थान छनि आ हमर पिताजी सेहो हजारीबाग मे बसि गेल छथि। तँ एकटा विशेष आत्मीयता अनायासे बुझाइत अछि हितनाथ सर सँ। आ एही आत्मीयताक परिणाम, जे भेंटघाँटक क्रम मे पोथी भेटि जाइत अछि। हितनाथ झा जीक पहिल पोथी, जे डॉ. चन्द्रेश्वर कर्ण जीक संग हिनकर सम्पादकत्व मे प्रकाशित भेल, से अछि "मैथिली इतिहासक रेखांकन" बर्ख 2003 मे प्रकाशित भेल छलए ई पोथी। तदुपरान्त दोसर पोथीक विषय चुनलनि, अपन गाम कोइलखक प्रसंग किछु जनतब संचित करब, जे ग्रामगाथा "कोइलख" क रूप मे पाठकक हाथ मे एलनि 2017 मे। ई पोथी सर्वाधिक लोकप्रिय भेलनि, हितनाथ झा जीक। ततेक जे लगले दोसर संस्करण सेहो प्रकाशित भेलनि एहि पोथीक। तेसर पोथी छनि, त्रिवेणी आ चारिम लेख-रेख (पोथी-प्रसंग), पाचम पोथी एकटा अनुवाद पोथी छनि, कविता:शम्भु बादलक आ छठम पोथी छनि बालकविता संग्रह राजापोता बलगर। यद्यपि संख्यात्मक रूपेँ हिनकर रचना-संसार वृहत नहि छनि मुदा गुणात्मक रूपेँ देखल जाए तँ वृहत्तर छनि हिनकर रचना संसार। एक सँ बढ़ि क' एक पोथी सभ। सभ भिन्न भिन्न विषय वस्तुक पोथी सभ।
हिनकर पहिल पोथी "मैथिली इतिहासक रेखांकन" विशेष महत्वपूर्ण पोथी छनि। कोयलाक खान सँ चुनि चुनि क' हीरा निकालि अनलनि अछि जेना, तेहने सन बुझू। पोथी मे संलग्न सभटा आलेख ऐतिहासिक दस्तावेज सन अछि। पोथीक पहिल लेख "मैथिली साहित्यक भूमिका" लिखबालेल प्रो. जयदेव मिश्र जी एतेक रास तथ्य कोना कलेक्ट कएने होएताह, हम तँ ताहि सोच मे पड़ि गेलहुँ। कतेक मेहनति सँ ई शोधपरक लेख हमरा सभक सोझाँ परसल गेल अछि, से पढ़ैत काल स्पष्ट बुझा जाएत। विस्तृत विवरण अछि, मैथिली साहित्यक आरम्भ कोना आ कहिया भेल, तकर। मैथिली साहित्यक मध्ययुग, आधुनिक युग, क्रमिक एकर गतिविस्तार कोना भेलैक आ प्रत्येक युगक साहित्यिक विकासक संग सामाजिक कोन प्रचेष्टा कोन रुपेँ संश्लिष्ट छल, से सभटा तथ्य भेटत।
वास्तव मे साहित्य सेहो इतिहासे तँ अछि; विशेष रूप सँ कथा साहित्य। कारण नाम-गाम छोड़ि, सभटा सत्ये तँ लिखल जाइत अछि लेखक द्वारा। जाहि काल, परिस्थिति आ वातावरणक कथानक पर कथा बूनल जाइत अछि ताहि सँ पाठक स्वतः जुड़ि जाइत अछि आ ओहि समयक सामाजिक परिस्थिति सँ, संगहि कोनो पात्रक जाति/वर्ग विशेष सँ नीक जकाँ परिचित भ' जाइत अछि। अप्रत्यक्ष रुपेँ वा कही रोचक ढंग सँ सामाजिक इतिहास बुझबाक हुअए तँ ताहिलेल कथा-साहित्य जाहि मे उपन्यास सेहो संलग्न अछि, पढ़बाक चाही। उदाहरण स्वरूप उषाकिरण खान जीक 'हसीना मंजिल' उपन्यासेक गप्प करी तँ ई पोथी देश-विभाजनक समय केर स्थिति-परिस्थिति सँ परिचित करिते अछि, प्रभावित एकटा चुड़ीहारिन (लहेरी समाजक) क परिवारक खिस्सा सँ, ओहि जाति-विशेषक रहन-सहन, सोच-विचार, सभटा बुझबा मे सहायक होइत अछि, पाठकक लेल। सामाजिक परिस्थितिक संग लोकक मानसिकता मे समयक संग आबि रहल परिवर्तनक झलक सेहो भेटैत छै साहित्य मे। तैँ साहित्य केँ समाजक दर्पण कहल जाइत अछि। "सामाजिक जीव मनुष्यक हृदयक घात-प्रतिघात, आशा-आकांक्षा, शोक-विह्वलताक जेहन मार्मिक चित्रण तत्कालीन साहित्य मे उपलब्ध होइछ, तेहन अन्यत्र नहि।" ई कहब छनि प्रो. जयदेव मिश्र जीक। लेखक एकटा संस्कृतक श्लोकक चर्चा करैत छथि -
"गाव: पश्यन्ति घ्राणेन वेदै: पश्यन्ति पंडिता:।
चारै: पश्यन्ति राजान: चक्षुर्भ्यामितरो जना:।।"
आ ओ कहैत छथि जे एकटा साहित्यकार देखैत अछि हृदय सँ। कोनो स्थिति-परिस्थिति केँ अपन हृदयक आँखि सँ देखि ओकरा लौकिक सरल भाषा मे रूप-रस-गंधक शब्दावली मे गाँथि सामान्य लोकक सोझाँ परसैत छथि एकटा साहित्यकार। काव्य मे वा साहित्यक अन्यान्य विधा मे। अस्तु, साहित्य- सृजन मे भाषा एवं भाव दुनू समान रूप सँ महत्वपूर्ण छैक। प्रो. जयदेव मिश्र जी अपन आलेख "मैथिली साहित्यक भूमिका" मे स्वीकार कएलनि अछि, जे अन्य भाषाक साहित्य जकाँ मैथिलिओ साहित्यक आरम्भ लोक-साहित्य सँ भेल। मुदा लेखक "डाक-घाघ" प्रभृतिक रचना केँ लोक साहित्यक प्राचीनतम उदाहरण मानबालेल तैयार नहि छथि। हुनकर कहब छनि, वस्तुतः ई केओ नहि कहि सकैत अछि, जे उपलब्ध लोक साहित्यक रचयिता के छलाह, कहिआ रचना कएलनि। निम्नलिखित लोक-रचना पर विचार करबाक बात कएलनि अछि लेखक --
"चन्ना मामा आ आ
रस कुसिआर ला।
केरा के भार ला
फोका मखान ला ।।"
एहन रचना सभ कहिआ हमरा लोकनिक माए-बहिनिक कंठ मे आबि निवास कएलक तकर लेखा-जोखा इतिहासो नहि राखि सकल। एकर रचयिता के छलाह, तकरो अटकर लगाएब असंभव। अतएव एहि प्रकारक रचना केँ अनादि एवं अपौरुषेय कहबा मे कोनो दुविधा नहि। एकटा गीतक पाँतिक चर्चा कएलनि अछि लेखक --
पिआ परदेश गेल
पोखरि खुनाए गेल
रोपि गेल नेमुआ अनार...
एहि प्रकारक विशुद्ध लोक-रचना मैथिली मे पूर्ण रूपेँ संरक्षित नहि अछि। जे लोक-रचना उपलब्ध अछि, निस्संदेह ओकर कलेवर प्रचूर मात्रा मे बदलल छैक। छठम-सातम शताब्दी मे पूर्वांचल, यथा मिथिला, बंगाल, आसाम आ उड़ीसा प्रभृति प्रान्त मे प्रायः एक्कहि भाषा बाजल जाइत छल। इएह कारण थिक जे चर्यापद मे मैथिली, बंगला, उड़िया प्रभृति अपन भाषाक रूपसादृश्य देखि दावा उपस्थापित कएल जाइत अछि, जे ई रचना मूलतः हमरे भाषा मे अछि। यथार्थ ई अछि जे चर्यापदक भाषा सन्धिकालीन भाषा अछि। जाहि मे उपर्युक्त प्रत्येक भाषा-भाषी अपन प्रतिबिम्ब देखि सकैत अछि। आंचलिक भाषा साहित्यक विकासक्रम मिथिला मे किछु भिन्न प्रकारक रहल, एहि तरक चर्चा भेटल "मैथिली इतिहासक रेखांकन" शीर्षक आलेख मे। बंगाल, आसाम सन पड़ोसी प्रान्त सँ आगत छात्र लोकनि जखन शिक्षा ग्रहण क' अपना गाम फिरथि, तखन दिमाग मे ल' जाइथ शास्त्रीय ज्ञान-विज्ञान किन्तु जिह्वा पर ल' जाइथ मैथिली कवि लोकनिक गीत। यद्यपि मध्ययुग मे मिथिला, बंगाल, आसाम, उड़ीसाक मध्य यातायातक अनेक उपाय छल मुदा ओ उपाय सभ आसान नहि छल। महानन्दा एवं कौशिकी नदी पार क' पैदल वा बैलगाड़ीक सहारा लेब आवश्यक छल, एहन चर्चा भेटल उक्त आलेख मे।
आगाँ कहि रहल छथि लेखक, जे मध्ययुगीन मिथिला मे दैवयोग सँ शतशः निबन्ध ग्रन्थ निर्मित भेल। एहि निबन्ध ग्रन्थ सभक उद्देश्य छल जन्म सँ मरण पर्यन्त लोक जीवनक यावतो व्यापारक सम्बन्ध मे श्रुति-स्मृतिक आधार पर विधि-निषेधक व्यवस्था करब। जेना फसिल केर चारूकात लोक काँट कूसक बेढ़ लगबैत अछि, किछु तेहने सन। विधर्मी द्वारा नित्य नवीन आक्रमणक वातावरण मे समाजक हेतु निबन्धनक कवच अत्यावश्यक छलैक। प्रो. जयदेव मिश्र जी साहित्यक अध्ययन ओहि युगक सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिमण्डल केँ नीक जकाँ स्मरण राखैत कएलनि अछि। लेखक कहि रहल छथि, डाक-घाघक वचनावली सँ ज्योतिरीश्वर धरि अबैत-अबैत हमरा लोकनि दोसर दुनियाँ मे प्रवेश कए जाइत छी। मध्ययुग मे आबि प्राचीन युगक स्वच्छन्दताक बदला मे अनेक प्रकारक नियमबद्धता देखबा मे आओत।विषय- वस्तुक चयन मे, रचना शैली मे, जतए प्राचीन कालक कवि स्वतंत्र छलाह, ओतहि मध्ययुगक कवि लोकनि बन्धन नियमक अधीन भए गेलाह। विचारणीय अछि जे ज्योतिरीश्वरक वर्ण रत्नाकर यथार्थत: काव्य-ग्रन्थ नहि, काव्य रचनाक हेतु सहायक ग्रन्थ थीक।
ज्योतिरीश्वर सँ लए मनबोध धरि प्रायः रचना प्रणाली एक रंगक छल। ओना मध्ययुगक साहित्याकाश मे निस्सन्देह विद्यापति सभ सँ देदीप्यमान नक्षत्र छथि, से स्वीकार करैत जयदेव जी कहलनि अछि, जाहि प्रकारेँ विद्यापति मध्ययुग केँ प्रतिनिधित्व कए सकैत छथि, ताहि प्रकारेँ अन्य कोनो व्यक्ति नहि कए सकैत छथि। हिनका विषय मे सभ सँ महत्वपूर्ण वस्तु थीक हिनक काव्यक स्वतः सौन्दर्य। विद्यापतिक बाद प्रादुर्भाव भेल श्री चैतन्यदेवक। यदि मिथिलाक भावधारा श्री चैतन्यदेव केँ प्रभावित कएलक तँ निस्सन्देह श्री चैतन्यदेवक भावधारा मैथिल कवि गोविन्द दास केँ प्रभाविते नहि अनुप्राणित कएलक। मनबोधक समय केँ जयदेव जी मध्ययुगक अन्तिम सीमा मानि रहल छथि। एकर कारण, जे हिनक भाषा प्रायः वएह थीक जे हमरा लोकनि आइओ बाजैत छी। जँ विषय-वस्तुक दृष्टिएँ आ वर्णनात्मक रचनाशैलीक दृष्टिएँ विचार कएल जाए तँ रत्नपाणि, भानुनाथ, हर्षनाथ धरि केँ मध्युगीन रचयिता मानए पड़त। ओना एखनहु एहन कतेक कवि रचयिता छथि जे छथि तँ वर्तमान समय मे किन्तु हुनक मनोदशा, हुनकर रचना शैली पूर्णतः मध्ययुगीन छनि। एहन वर्तमान कवि मध्ययुगक प्रसार बुझल जा सकैत छथि। गद्य साहित्यक प्रणययन आधुनिक युगक एक आवश्यक अंग थीक। सरल स्वच्छ गद्य हाथ मे अएबाक बाद कविताक भाषा सेहो बदलल। कथा साहित्यक निर्माण तँ सहजहि होमए लागल। जहिना गद्य अथवा कथा साहित्यक क्षेत्र मे तहिना काव्यक क्षेत्र मे आधुनिक युगक अपन अवदान छैक। ई अवदान थीक प्रधानतः भावनात्मकताक रूप मे। मैथिलीक क्षेत्र मे आधुनिकताक प्रकाश विलम्ब सँ आएल, कारण मध्ययुगीन प्रवृत्ति मिथिला मे आवश्यकता सँ अधिक दिन धरि व्याप्त रहल। फलत: मिथिलाक रहन- सहन, भोजन-वसन, संस्कृति-साहित्य सभ किछु बहुत दिन धरि मध्ययुगीने रहल। मिथिला मे आधुनिकताक प्रथम दीप ग्रियर्सन साहेब ल' क' अएलाह। हिनक मैथिली केस्टोमेथी, वैष्णव भजनावली, बिहारी भाषाक व्याकरणक प्रकाशन सँ मैथिली भाषा एक प्रकारक आभिजात्य केँ प्राप्त कएलक। संगहि मैथिल लोकनि बुझलनि जे "रजनी-सजनी" कहि जाहि मातृ भाषाक रचनाक अवहेलना करैत आएल छी, तकरा मे किछु तथ्य अवश्य छैक, अन्यथा सात समुद्र पार सँ आएल ग्रियर्सन साहेब अपार परिश्रम कए एहि रचना सभक उद्धार किएक करितथि ?
मैथिलीक आधुनिक एवं अत्याधुनिक युगक प्रतिफलनक निदर्शन कविताक अतिरिक्त हमरा लोकनि कथा-साहित्य, विशेषत: लघुकथा साहित्य मे पाबि सकैत छी। लघुकथा साहित्य वर्तमान युगक लोक केँ प्रभावित करबा मे बेस सफल होएत। कारण वर्तमान समय मे लोकक लग समयक अभाव छैक। मैथिली नाटकक मादे जयदेव जीक कहब छनि, जे मैथिली नाटक अद्यावधि पौराणिक अथवा सामाजिक विषय-वस्तु सँ उपर नहि उठि सकल अछि। आशा अछि मैथिलीक साहित्यकार लोकनि एहि त्रुटिक परिमार्जनक दिस ध्यान देताह। प्रो. जयदेव मिश्र जीक कहब छनि जे मैथिली साहित्यक वर्तमान धारा विद्यापति पर्वक अनुष्ठान सँ प्रचूर बल पओलक अछि। कोनो साहित्य केँ जाबत जनमतक, जनमानसक समर्थन, स्नेह नहि प्राप्त हेतैक, ताबत ओकर सर्वांगीण विकास संभव नहि छैक। उदाहरण स्वरूप मैथिलीक कवि रवीन्द्र जी अपन लेखन आ गायनक बलेँ स्वयं सेहो अपार ख्याति प्राप्त कएलनि आ मैथिली भाषा केँ सेहो जगजिआर कएलनि, से मात्र विद्यापति पर्वक अनुष्ठानक बदौलति। देश भरि मे एहन कोनो स्थान नहि होएत, जतए जागरूक मैथिल लोकनि रहैत होथि आ विद्यापति पर्वक अनुष्ठान नहि होइत हुअए। ओना ध्यान राखब आवश्यक, जे एहि तरहक बात लेखक द्वारा सन् 2003 सँ पूर्वक स्थिति देखैत कहल/लिखल गेल अछि। आब विद्यापति पर्व - अनुष्ठानक रंग-रूप भिन्न प्रतीत भ' रहल अछि। आब आयोजनकर्ता सभक बीच ओ सामंजस्य नहि रहल, मातृभाषाक लेल ओ अनुराग प्रायः विलुप्त होइत जा रहल अछि। खैर...जे-से।
आब गप्प करब पोथीमे संकलित दोसर लेख केर, जे प्रो. आनन्द मिश्र जीक लिखल छनि। शीर्षक अछि "मैथिली गद्यक विकास" जकर शुरुआत कएलनि अछि लेखक, भारतीय आर्य भाषाक विकास-क्रम सँ। आगाँ आर्यभाषा पर स्थानीय भाषा सबहक प्रभावक बात सेहो करैत छथि लेखक। संस्कृतक विशाल शब्द भंडार मे आर्येतर भाषाक शब्दावलीक मात्रा यथेष्ट अछि। कालानुसार भाषाक स्वरूप "लोक-भाषा"आ "ग्रन्थ-भाषा"क रूप मे सर्वमान्य भेल। ग्रन्थ भाषा विद्वान लोकनि द्वारा अपन ज्ञान-विज्ञानक वाहिनी बनाओल गेल, आ क्रमिक परिष्कृत होइत "संस्कृत" नाम सँ अभिहित भेल। 800 ई. सँ 1200 ई. धरि मैथिलीक उद्भव युग मानल जाइछ, एहन प्रो. आनन्द मिश्र जी उल्लेख केलनि अछि उक्त आलेख मे। मौखिक परम्परा आ लेखन परम्पराक योगदान सँ कोनो भाषाक विकास होइत रहल अछि। मौखिक परम्परा मैथिलीक विकासक्रम पर बहुत प्रभाव छोड़लक। अपना मिथिला मे व्रत-कथा, दन्त-कथा, लोकगाथा, लोककथा बाँचबाक परम्परा रहल अछि। मौखिक परम्पराक पश्चात् लेखन परम्पराक चलती भेल। लेखन परम्पराक सभ सँ पुरान रचना ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णरत्नाकर केँ मानल जाइत अछि। ज्योतिरीश्वरक समय चौदहम शताब्दीक प्रारम्भिक दशक कहल जाइछ।
मध्यकाल मे मैथिली गद्य रचनाक प्रधान क्षेत्र रहल नाटक। बेसी नाटक सभ नेपाल तथा असम मे लिखल गेल। प्राचीन एवं मध्यकालीन मैथिली गद्य संरचना पर संस्कृतक भरपूर प्रभाव देखा पड़ैछ। गद्य मे काव्यात्मकता बेसी रहला सँ सर्वजन - बोधगम्यताक अभाव सेहो रहलैक। मैथिलीक आधुनिक काल, उन्नैसम शताब्दीक उत्तरार्द्ध सँ प्रारम्भ मानल गेल अछि लेखक द्वारा। एहि काल मे गद्य लेखनक गति तीव्र भेल। गद्य मे तथ्य एवं स्वरूप, दुनू क्षेत्र मे विविधताक समावेश देखबा मे आएल। आधुनिक कालक चतुर्मुखी विकासक परिचायक छलए विभिन्न पत्र-पत्रिकाक चलन। उपन्यास, कथा, नाटक, निबंध, यात्रा संस्मरण सभ लिखि मातृभाषानुरागी लोकनि मैथिली गद्य-भंडार केँ भरबाक प्रयास मे अग्रसर भेलाह। एहि सँ मैथिली गद्य प्रगति पथ पर द्रुतगतिएँ बढ़ैत देखा रहल अछि। एहि तरहेँ मैथिली गद्यक विकास-क्रमक विवरण छनि प्रो. आनन्द मिश्र जीक आलेख मे।
"राजनीतिक दृष्टिकोण सँ मिथिला भू-भागक अस्तित्व नगण्यप्राय अछि, मुदा आइयो एतुक्का अपन स्वतंत्र सांस्कृतिक आ सामाजिक विशिष्टता छैक। आ तकर मूल प्राचीनकाल मे प्रतिष्ठित मिथिलाक दीर्घकालीन सांस्कृतिक परम्परा अछि। मैथिली काव्यक सन्दर्भ मे परम्परा शब्द सँ जाहि क्रमबद्ध साहित्यिक विकासक बोध होइत अछि, से थिक वस्तुतः विद्यापतिक परम्परा। मुदा विद्यापति अपनहि जाहि परम्पराक चरमोत्कर्ष छलाह, से छल वैदिक लौकिक संस्कृतिक पारस्परिक सम्मिलन आ आ संघर्ष सँ बनल समन्वित सांस्कृतिक परम्परा।" ई बात कहलनि अछि प्रो. रत्नेश्वर झा जीक, अपन आलेख "मैथिली काव्य - विकासक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि"मे। प्रो. रत्नेश्वर जी अपन आलेख मे मिथिलाक वैदिक आ लौकिक परम्पराक गप्प करैत, मिथिलाक आदि साहित्यक प्रस्फुटन लोक-कविताक गप्प करैत छथि।विद्यापति सँ पूर्व लोककाव्यक निर्माता सिद्धाचार्य, डाक-घाघक संग बहुसंख्य अनाम रचनाकारक योगदान पर्यन्त केर चर्चा कएलकनि अछि। लेखकक कहब छनि, "जे हो..मैथिली काव्यक चरमोत्कर्ष छलाह विद्यापति ( 1360 सँ 1448 ई.)" आ ई बात सर्वस्वीकार्य अछिए। पोथीक पहिल आलेख मे प्रो. जयदेव मिश्र जी सेहो कहलनि अछि "मध्ययुगक साहित्याकाश मे निस्सन्देह विद्यापति सभ सँ देदीप्यमान नक्षत्र छथि" वास्तव मे संस्कृतक विद्वान रहितहुँ विद्यापति 'देसिल बयनाक' शरणागत भए अपन पदावलीक माध्यम सँ अपना संग मैथिली काव्यो के अमर कए देलनि।
आगाँ लेखक कहलनि अछि "आचार्य रमानाथ झा मैथिली काव्य विकासक दुइएटा युग मानलनि अछि -- विद्यापति युग आ चन्दा झा युग। चन्दा झा ( 1831 सँ 1907 धरि)क युग आरम्भ होयबा सँ पूर्व धरि कोनो ने कोनो रूप मे विद्यापतिएक परम्परा चलैत रहल। हुनकर बाद मैथिलीक सर्वाधिक प्रतिभाशाली कवि भेलाह महाकवि गोविन्द दास। उमापति उपाध्याय, रामदास, रमापति, लाल कवि, लोचन आदि विद्यापतिक परम्पराक किछु प्रसिद्ध कवि भेलाह, मुदा क्रमिक रूपेँ काव्यक माध्यम सँ लोकसिद्धिक अभीष्ट छूटए लागल आ आब पण्डित समाजक मनोरंजनार्थ रीतिकाव्य लिखल जाए लागल" जाहि सँ स्पष्ट होइत अछि जे कालक्रमेण कोना काव्यधारा अपन दिशा बदलैत रहल अछि। आधुनिक मैथिली काव्य आ साहित्यक विकासक प्रस्थान बिन्दु चन्दा झा मानल जाइत छथि। मुदा हुनक जन्म सँ पचास वर्ष पूर्व मनबोध रीति काव्य परम्पराक विरुद्ध ( रीतिकाव्य, जकर आइ धरि 'रजनी-सजनी काव्य' कहि उपहास कएल जाइत अछि) कृष्णजन्म लीखि प्रबन्ध काव्य लेखनक परम्पराक आरम्भ केलनि आ वस्तुतः मनबोध जाहि काव्य व्याप्तिक भूमिका तैयार कएलनि, ताहि आधार पर चन्दा झा मैथिली भाषाक रामायण महाकाव्य लिखलनि। एहन उल्लेख रत्नेश्वर जीक आलेख मे भेटल। चन्दा झा मैथिली काव्य मे आनो रूपेँ आधुनिक युगक प्रवर्तक भेलाह। मुक्तक काव्यक हुनकर परम्परा केँ आगू आगू बढ़ौनिहार प्रमुख कवि भेलाह यदुवर, मधुर, सीताराम झा, भुवन, यात्री, विनीत, मधुप, किरण, मोहन, सुमन, मणिपद्म, अणु, व्यास, अमर, मार्कण्डेय, गोपेश, निरकुंश, किसुन, आदि। वस्तुतः चन्दा झा सँ जे युग आरम्भ भेल तकरा प्रयोगधर्मी युग कहल जा सकैत अछि आ प्रत्येक नव कवि कोनो ने कोनो प्रयोगक संग अपन कविता ल' उपस्थित होइत रहलाह। प्रो. रत्नेश्वर मिश्र जी द्वारा देल मैथिली काव्य - विकासक ऐतिहासिक पृष्ठभूमिक ई संक्षिप्त विवरण अध्ययनकर्ता आ अध्यापनकर्ताक लेल विशेष उपयोगी सिद्ध होएत। वस्तुतः ई संपूर्ण पोथीए अध्ययन-अध्यापन कएनिहारेक लेल अछि।
"मैथिली पत्रिकाक तीस वर्ष, तीस बिन्दु" कट-टु-कट गप्प अछि मैथिली पत्रिकाक संदर्भ मे। सन् 1971 सँ 2000 धरिक मध्य पत्रिका प्रकाशनक क्रम मे जे पापड़ बेलए पड़ल हेतनि प्रकाशक- संपादक सभ केँ, ताहि पर अपन अनुभवी नजरि खिरौलनि अछि लेखक प्रो. भीमनाथ झा जी। आ नीर-क्षीर विवरण द' देलनि अछि पाठकक सोझाँ। एहि नीर-क्षीर विवरण सँ वस्तुस्थितिक जनतब हेतनि पाठक - लेखक- संपादक सभ वर्गक लोक केँ। संगहि किछु सिखिओ सकैत छथि, आगाँ एहि क्षेत्र मे उतरनिहार लोकसभ। किछु प्रिपेयरेशनक संग उतरताह, से संभव। कहबाक माने सर्वजन हिताय लेख बुझाएल हमरा। प्रो. भीमनाथ झा जीक एहि गप्प सँ सहमति रखताह समस्त मैथिलजन--"ई जनितो जे पत्रिका नहि चलत, अर्थ दण्ड सँ कुहरि उठब, लेख जुटएबामे एड़ी-चोटीक पसेना एक करए पड़त.....तथापि हमरा लोकनि हाथ पर हाथ ध' बैसि कहाँ रहैत छी ? बुझितो जे एहि नदी मे अथाह पानि छैक....तैयो धराधरि नदी मे कुदिते जा रहल छी हमरालोकनि। एहि ललक केँ की कहबैक ? बतहपनिए ने ? यैह बतहपनी तँ पत्रिका केँ जिया क' रखने अछि। यैह बतहपनी रखने अछि मैथिली केँ जिया क' सेहो।"
"मैथिली मे कथाक आरम्भ संस्कृतक आख्यान-उपाख्यानक अनुवाद सँ होइत अछि। अथवा एना कही जे संस्कृतक विशाल भंडार सँ नीतिपरक ओ उपदेशात्मक आख्यान आदिक अनुवाद- सह - अनुकरण करैत पंडित लोकनि मैथिली कथाक भूमि तैयार कएलनि।" ई बात कहि रहल छथि डॉ. विभूति आनन्द जी, अपन "एकैसम शताब्दीमे प्रवेश करैत मैथिली कथा" शीर्षक लेख मे। बहुत नीक, फड़िछाएल विवरण मैथिली कथा संबंधी। समय समय पर कोन कोन तरहक कथा-काल रहल, तरह तरह केर कथाक प्रस्थान आ अवसानक चर्चा। कखनो कथा-लेखन मे आएल तेजी, माने बिहाड़ि सन स्थिति, तँ कखनो गति सामान्य वा सामान्यो सँ मन्द। डॉ. विभूति आनन्द जी कहैत छथि जे लगभग 1920 ई. धरि बहुत किछु स्पष्ट भ' चुकल छल। आख्यान आख्यायिकाक स्थान मौलिक चिंतन ल' लेने छल। यथार्थ बाज' लागल छल। भाषा आ शिल्प पनगी छोड़' लागल रहए। ताधरि एकटा नब चिंतन, कथा आ उपन्यासक चिंतन आरम्भ भ' गेल छलए। 1921 मे अनूप मिश्र एकरा दू फाँक क' फराक कएलनि। आ एकर बादे मैथिली कथा- रूप आ उपन्यास-रूप मे अपन अपन फराक अस्तित्व मे आएल।
"मैथिली नाटकक स्वरूप ओ स्थिति"क विवरण देबाक उपक्रम ततेक रमणगर तरीका सँ कएल गेल अछि, डॉ. अरविन्द कुमार सिंह झा जी द्वारा जे रुचिकर सेहो लगतनि पाठक केँ। 'काव्येषु नाटकं रम्यम्' आ 'नाट्यं वेदं तु पंचमम्' क उल्लेख सँ आलेख केर शुभारंभ कएलनि अछि लेखक। आगाँ जनतब देलनि अछि, जे भारतीय नाट्य शास्त्रानुसार नाटक मूल रूप सँ दू कोटि मे विभक्त अछि -- रूपक ओ उपरूपक। रूपकक दस भेद अछि, जाहि मे नाटक प्रमुख अछि। एकटा छोट सन आलेख मे सभटा तथ्य समाहित अछि। मैथिली नाटकक श्रीगणेश चौदहम शताब्दी मे भेल, जकर प्रारम्भिक स्वरूप, संस्कृत मे संवाद आ मैथिली गीत मिश्रित नाटकक रूप मे भेल। एहि तरहक पहिल नाटक 'धूर्त्तसमागम' प्रहसन थिक, जे दू अंक मे विभक्त अछि। बहुत बात सँ अनभिज्ञ छलहुँ हम। ई पोथी पढ़बाक क्रम मे जनतब भेल जे मैथिली नाटकक विकास मिथिलाक अतिरिक्त नेपाल, आसाम ओ बंगाल मे सेहो भेल। कहल जाइछ जे मैथिली नाटकक माध्यमेँ ज्योतिरीश्वर जाहि मैथिली नाट्य साहित्यक नेंओ देलनि, तकर सर्वाधिक विकास नेपाल मे भेल। नेपाल मे मैथिली नाटकक जे शृंखला स्थापित भेल, तकर श्रेय मल्ल वंश केँ देल जाएत। मल्ल राजा लोकनि द्वारा मैथिली नाटकक हेतु जे सत्प्रयास कएल गेल; तकर साम्राज्य भातगाँव, काठमांडू, बनेपा आ ललितपुर मे भेल। चारू केन्द्र मिलाए लगभग एक सए मैथिली नाटक लिखल गेल। सोलहम शताब्दी आबैत आबैत आसाम मे सेहो मैथिली नाटकक विकास भेल, जकरा 'अंकीया नाट' कहल गेल।उद्देश्य छल, वैष्णव धर्मक प्रचार प्रसार। जकर प्रवर्त्तक शंकर देव रहथि। नाटकक एकटा प्रवृत्ति आन भाषा-साहित्यक उत्कृष्ट नाटक सभक मैथिली अनुवाद करब सेहो थिक। एहि मे संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला ओ फ्रेंच साहित्यक उत्कृष्ट नाटक सँ मैथिली नाट्य साहित्यक शृंगार करबाक प्रयास भेल। एकटा नब प्रयास भेल मैथिली-साहित्यक अन्य विधा (उपन्यास, कथा, काव्य)क कृति केँ नाट्य रूपान्तरण करब। जे मंचनक दृष्टिएँ बड़ सफल भेल।
26 जनवरी 1948 मे आकाशवाणी पटनाक आ 2 फरवरी 1976 मे आकाशवाणी दरभंगाक स्थापना सँ मैथिली रेडियो नाटकक शुरुआत भेल। एकर अतिरिक्त मैथिली नाट्य साहित्य केँ द्रुतगतिएँ आगाँ बढ़एबाक श्रेय मैथिली नाट्य रंगमंच केँ सेहो छैक। कलकत्ता आ पटना एहि क्षेत्र मे अग्रणी रहल अछि। पटनाक 'चेतना समिति' आ 'अरिपन' सन संस्था नाट्य विधा केँ समृद्ध करबा मे सहयोगी रहल आ समाजक सर्वांगीण विकासक मार्ग प्रशस्त करैत रहल अछि। एहि आलेखक माध्यम सँ लेखक नाटककार लोकनि केँ नीक सुझाव सेहो द' रहल छथिन। लेखकक कहब छनि, जे नाटककार केँ रंगमंच आ उपलब्ध साधन केँ ध्यान राखैत नाटक लिखबाक चाही। शहर मे जे सुविधा छैक, तकनीकी साधनक उपलब्धता छैक, से ग्रामीण मंच केँ नहि छैक। तैँ शहरी मंच केँ ध्यान राखि लिखल नाटक ग्रामीण मंच पर सफल नहि भ' सकैत अछि। नाटककार लोकनि लेल एकटा आरो सलाह अछि उक्त आलेख मे, जे नाटकक प्रकाशन सँ पूर्व ओकर मंचन करब आवश्यक। कारण मंचनक क्रम मे त्रुटि पर बेसी ध्यान जाइत छै, तँ स्वाभाविके जे परिमार्जनक अवसर सहजहि भेटि सकतनि नाटककार सभ केँ। बंगालक नाटककार गिरीशचन्द्र घोषक लिखल अस्सी टा सँ बेसी नाटकक लेल हुनकर प्रेरणा रहलनि हुनकर स्वस्थापित रंगमंच 'नेशनल थिएटर' (पछाति ग्रेट नेशनल थिएटर) वास्तव मे रंगमंच नाटककारक जनक वा प्रवर्त्तक होइछ।
डॉ. अशोक कुमार मेहता जी "मैथिली उपन्यासक विकासक्रम"क प्रसंग लिखैत, आरम्भ सँ बर्ख 2002 धरिक उपन्यास लेखन पर दृष्टिपात कएलनि अछि आ से हिनकर खूब गहींरगर, फड़िछाएल दृष्टिपात बुझाएल हमरा। ई लेख पढ़ैत सभटा स्पष्ट भ' जेतनि पाठककेँ। मैथिली उपन्यास लेखन कोना आरंभिक कालक संकट सँ जुझैत, विगत शताब्दीक दोसर दशक मे जनार्दन झा 'जनसीदन'क उपन्यास "निर्दयी सासु"क संग "शशिकला"क सहारे निर्मित भेल आ समयक संग लोकप्रियताक सीढ़ी चढ़ैत पूर्णत: विकसित भेल, विस्तृत भेल, से सभ किछु फड़िछाएल बुझना जेतनि पाठक केँ। आ एहि तरहेँ मैथिली उपन्यास लेखनक एकटा गौरवशाली सुदीर्घ परम्पराक स्थापना भेल। तदुपरान्त विगत शताब्दीक छठम, सातम आ आठम दशक मे उपन्यास लेखनक परंपरा उत्कृष्टताक शिखर धरि पहुँचल। मुदा शताब्दीक अन्त होइत-होइत कोना संक्रमणक चपेट मे आबि मृतप्राय होइत चलि गेल, से सभ कालकेँ वर्गीकृत करैत बहुत नीक लेख लिखलनि अछि अशोक सर। नीक एहिलेल कहलहुँ, जे लेख कत्तहु उबाऊ नहि लगतनि पाठककेँ। अनावश्यक तत्व एकटा नहि। माने कखनोकाल लेखकेँ सुदीर्घ करबालेल एहि तरहक चूक भ' जाइत छनि लेखकक द्वारा। से नहि देखा पड़ल। आरंभिक काल, निर्माण काल, विकास काल, विस्तार काल आ संक्रमण काल, एहि तरहेँ वर्गीकृत करैत मैथिली उपन्यासक विकासक्रमक उल्लेख कएलनि अछि डॉ. आशोक कुमार मेहता जी। वर्गीकृत सभ कालक महत्वपूर्ण उपन्यासक चर्चा, संगहि संबंधित उपन्यासकारक चर्चा करैत तथ्यात्मक लेख लिखलनि अछि। जाहि सँ सभ वर्गक पाठक लाभान्वित होएताह।
डॉ. दमन कुमार झा जीक लिखल लेख "मैथिली बालसाहित्य : एक अवलोकन"मे बालसाहित्य ओ बाल साहित्य लिखनिहार साहित्यकार संबंधित तथ्य तँ जे अछि, से अछिए। एकटा नब जनतब भेटल जे अरुन्धती देवीक लिखल "मिथिलाक विदुषी महिला" मैथिलीक पहिल जीवनी पुस्तक थिक, जे 1936 ई. मे प्रकाशित भेल अछि। नारी शिक्षा मे सभदिन पछुआएल मिथिला मे 1936 ई. मे महिले द्वारा महिलागणक परिचय युक्त पोथी छपब सामान्य बात नहि छल। ई गौरव जीवनीए साहित्य केँ छैक जे एकर पहिल ग्रन्थक लेखक महिला भेलीह। ई बात बुझि आह्लादित भेलहुँ। बहुत नीक बात कहलनि अछि दमन जी, जाहि सँ हमर अक्षरशः सहमति अछि। जे साहित्यक मुख्य उद्देश्य थिक समाज केँ असत्पथ सँ रोकब तथा सत्पथ पर बढ़बाक प्रेरणा देब। एकर सभ सँ बेसी प्रयोजन नेने केँ छैक, कारण ओकर मस्तिष्क कोरा कागत रहैछ, ओहि पर जैह लिखि देबैक सैह अमिट भ' जेतैक। दोसर गप्प, बाल साहित्यक बीज मुख्य रूप सँ लोकगीत आ लोककथा मे ताकल जा सकैत अछि। मिथिला मे नेनाक लेल अनेक प्रकारक लोककथाक प्रचलन रहल अछि। जेना बगिया बला प्रचलित खिस्सा हमरा मोन पड़ैए। तहिना लोकगीत सभ सेहो नेनाक लेल पारिवारिक आ सामाजिक महत्वक अछि। बहुत रास नेनागीत शैक्षणिक महत्वक सेहो अछि। बालसाहित्यक रचना लेल बाल मनोविज्ञान बूझब आवश्यक छनि रचनाकार लेल। बाल मनोविज्ञान सँ परिचये मात्र नहि, पूर्ण जनतब आवश्यक तत्व छनि बाल साहित्यकार लेल। उपलब्ध बाल साहित्यक चर्चा करैत ई जनतब देलनि अछि लेखक, जे एखन अधिकांश बाल साहित्य पद्ये रूप मे देखबालेल भेटत। मैथिली बालकथा मे अधिकांश अनूदिते भेटत। मौलिक बाल कथा संग्रहक संख्या अत्यल्पे अछि एखनहुँ। तहिना बाल उपन्यास, बाल एकांकी संग्रहक संख्या सेहो संतोषजनक नहि कहल जा सकैए। बाल जीवनी हुअए कि निबंध, संस्मरण, मैथिली बाल साहित्य मे सभ विधाक रचना संख्यात्मक दृष्टिएँ कम तँ अछि। मुदा एहनो नहि जे नगण्ये अछि। समय समय पर बाल पत्रिका सेहो प्रकाशित होइत रहल अछि। बाल पत्रिका मे किछु महत्वपूर्ण पत्रिकाक चर्चा कएलनि अछि दमन जी। जेना शिशु नामक पत्रिका, बटुक बाल पत्रिका, जे सभ सँ दीर्घजीवी पत्रिका भेल। धीयापूता नामक बाल पत्रिका आ नेना-भुटका नामक पत्रिकाक संग बाल-मिथिला, फोल्डर बाल पत्रिकाक चर्चा देखलहुँ दमन जीक लेख मे। कहबाक माने बाल साहित्यक अभाव नहि देखा पड़ैत अछि। आवश्यकता छै उपलब्ध बाल साहित्य केँ देखबाक, गुनबाक, समीक्षक लोकनि केँ एहि दिस ध्यान देबाक।
"मैथिली लोक साहित्य" आलेखक शुभारम्भ प्रेमचन्द्र पंकज जी 'लोक' आ 'वेद' परिपाटीक फड़िछौट करैत कएलनि अछि। आगाँ लोक साहित्यक वर्गीकरण करैत सुस्पष्ट विवरण प्रस्तुत कएलनि अछि। मैथिली लोक साहित्य केँ एहि तरहेँ वर्गीकृत कएल गेल अछि लेखक द्वारा - लोकगाथा, लोककथा, लोकनाट्य, लोकगीत, पिहानी, कहबी आ वचन। लोक साहित्यक सर्वमान्य परिभाषा देब कठिन एवं दु:साध्य कहलनि अछि लेखक। सामान्य जीवनक मुक्ताकाश ओ धरतीक बीच गहन जीवनानुभूति सँ परिपूर्ण गीत, ऐतिहासिक सांस्कृतिक गाथा, पारम्परिक कथा, अनुभव सिद्ध कहबी, बुद्धि मापक बुझौअलि, रहस्यमय मंत्रादि सँ जे लोक सरस्वती अवतरित होइछ, तकरे प्रभावलीक नाम थिक लोक संस्कृति, जकर जाग्रत रूप लोक साहित्यक रूप मे देखाइत अछि, ई कहब छनि प्रेमचन्द्र पंकज जीक। मूल रूप सँ लोक साहित्य, चाहे ओ लोकगाथा हुअए कि लोककथा वा लोकगीत, किंवा कहबी, पिहानी, वचन, सभटा मौखिके परम्परा रूप मे एक युग सँ दोसर युग धरि अपन अस्तित्व बनओने रहल अछि। मिथिलाक लोकसाहित्यक अन्तर्गत मुख्य रूप सँ प्रेम, शौर्य, त्याग, धर्म ओ नीति विषयक वर्णन भेटत। पावनि-तिहार, पूजा- व्रत, देवी- देवता, परी-दानव आदिक अस्तित्व लोककथाक सुदीर्घ परम्पराक कारणेँ बाँचल अछि। समय समय पर किछु गणमान्य द्वारा एहि लोककथा सभक संकलन कएल गेल, जे सांस्कृतिक अध्ययन हेतु एकटा ठोस काज कहल जाएत। अपन मिथिला, लोक साहित्यक मामला मे समृद्ध मानल जाएत। चाहे ओ लोकगीतक बात हुअए कि लोककथाक, लोकगाथा किंवा लोकनाट्य। पिहानी, कहबी तँ सहजहि मिथिलाक पहिचाने अछि। बात बात मे लोक कहबीक प्रयोग करैत रहैए। वचन क बात करी तँ डाक, घाघ, भड्डरी आदिक वचन प्रसिद्ध अछि। आवश्यकता अछि लोक साहित्यक वैज्ञानिक अध्ययन हेतु मौखिक एवं भौतिक सामग्री सभक संकलन कएल जेबाक। एहिलेल योजनाबद्ध प्रयासक बेगरता अछि।
मिथिलाक विविध लोककलाक जनतब दैत एकटा महत्वपूर्ण आलेख अछि ज्योत्सना चन्द्रम् जीक "मिथिलाक लोककला" जाहि मे लोक चित्रकला तँ प्रमुख अछिए, संगहि मूर्तिकला, जनौ कला, बांतर ( एक जाति विशेष) द्वारा बाँसक कमची काटि-छेबि, ओहि सँ ढाकी, पथिया, ढक आदिक निर्माण करबाक कलाक चर्चा सेहो कएलनि अछि। कुम्हारक रंग-बिरंगक बासन आ मूर्ति गढ़ब, लहेरी वर्ग द्वारा बनाओल लहठी मिथिलाक लोककलाक अन्तर्गत आबैत अछि। लोहार वर्गक कला, मिथिलाक वस्त्रकला ( खादीवस्त्र) सभक चर्चा कएल गेल अछि। संगहि एहि लोककला सभक महत्व आ वर्तमान समय मे एहि लोककला सभक समाज मे की-केहन स्थिति-माँग-पूर्ति-संभावना अछि, से सभटा पहलू पर ज्योत्सना चन्द्रम् जी अपन विचार देलनि अछि।
अपन मातृभाषा मैथिली के उपेक्षित होएबाक आन्तरिक पीड़ा देखा पड़तनि पाठक केँ, पंचानन मिश्र जीक लिखल एकहक शब्द मे। झारखण्ड ओ मिथिलाक एवं संस्कृतिक अन्त: सम्बन्ध पर बहुआयामी दृष्टिकोण देखाएल लेखकक। हिनकर आलेख "अबुअ दिशुममे ठौर तकैत मैथिलजन" मे। ठीके कहलनि अछि लेखक, "कहुखन लगैछ ग्लोबलाइजेशनक सर्वाधिक प्रभाव मैथिले पर पड़ल अछि।" मैथिले द्वारा मैथिलीक उपेक्षा, अपन निजत्व बिसरैत जेबाक उपक्रम सँ आहत छथि लेखक। "एहि बिसरबाक व्याधि सँ स्वस्थ करबालेल झारखण्ड मे गहे गहे मैथिली संस्था ठाढ़ जरूर अछि मुदा ओ सभ निर्लिप्त ओ नि:स्पृह भावेँ पएर रोपने अछि" ई कहब छनि पंचानन मिश्र जीक। झारखण्ड मे भोजपुरी आ मगहीक समान मैथिलीक उपस्थिति रहितहु, जागरूकता, चेतना ओ संलिप्तताक अभाव मे हम सभ पछुआएल जा रहल छी, से चिंताक विषय। आ एकर कारण एतबे अछि जे मैथिलीक प्रति हीनता, ग्लानि ओ असंपृक्तताक भाव व्यावहारिक स्तर पर दिनानुदिन बढ़ैत जा रहल अछि। मैथिली भाषा व्यवहार, प्रयोग ओ दिनचर्याक कलेवर सँ तीव्र गतिएँ दूरस्थ भेल जा रहल अछि। किछु आँकड़ा सभ सेहो देल गेल अछि लेखक द्वारा, माने तथ्यपरक, शोधपरक आलेख छनि। जे विद्यार्थी सभलेल उपयोगी सिद्ध हेतनि। झारखण्डक सम्पूर्ण जनसंख्याक अठारह प्रतिशत मिथिला मूल ओ मैथिलभाषी छथि, 1991 क जनगणनाक अनुसार। 1905 मे जॉर्ज ग्रियर्सनक भाषायी सर्वेक्षण मे एखनुक गोड्डा, देवघर ओ साहेबगंज जिला केँ मैथिली भाषी क्षेत्र मानल गेल छल। विरोधाभास एहन जे सर्वाधिक मैथिलीभाषी क्षेत्र मे अवस्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालयक अधीन एक्कहु टा महाविद्यालय मे मैथिली विभाग कार्यरत नहि अछि। आइ प्रयोजन अछि मैथिल जागरण ओ मैथिली संस्था सभक क्रियाशीलताक। तखनहि स्थिति सुधरि सकैत अछि।
पोथीमे संलग्न सभटा आलेख स्तरीय अछि, जनतब युक्त लेख सभ, मुदा छपाइ आ कागतक क्वालिटीक मामला मे बड्ड कमजोर! इएह बात मात्र खटकल पोथी पढ़ैत काल। "मैथिली इतिहासक रेखांकन" पोथीक कन्टेन्ट जेहन जबरदस्त अछि, जँ एहि पोथीक प्रकाशन पर किछु अतिरिक्त पाइ लगाओल जाइत, तँ सोन मे सुगंध बला बात भ' जाइत। टाइपिंग मिस्टेक बहुत ठाम अभरल, जे भोजन करैत काल मुह मे पड़ल आँकर सन अनकट्ठल लागि सकैत छनि पाठक केँ। ओना जेहन स्तरीय लेख सभक संकलन अछि ई पोथी, तकरा देखैत मात्र एकटा कमजोर पक्ष, पोथी केँ कमजोर सिद्ध नहि क' सकत। ज्ञानपिपासु ज्ञानार्जन लेल पढ़िए लेताह आ प्रेम सँ पढ़ताह। पोथीक उपयोगिता विद्यार्थी वर्ग लेल तँ सहजहि बड्ड बेसी छन्हिहेँ; सामान्य पाठकक लेल सेहो उपयोगी सिद्ध हेतनि। जे केओ मैथिली साहित्यक परम्परा आ विकास सँ परिचित नहि छथि ओ संक्षेप मे परिचित भ' सकैत छथि, ई पोथी पढ़ि।
एहन स्तरीय पोथी, पाठकक सोझाँ परसबालेल संपादकद्वय श्री चन्द्रेश्वर कर्ण आ श्री हितनाथ झा जीकेँ साधुवाद!!
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