विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

शम्भु बादलक कविता जिनगीक रोशनी

डा. कीर्तिनाथ झा · 2024-11-01 · अंक 405

१८.डा. कीर्तिनाथ झा-शम्भु बादलक कविता जिनगीक रोशनी
डा. कीर्तिनाथ झा-संपर्क-9443655640
शम्भु बादलक कविता: जिनगीक रोशनी
पछिला मास श्री हितनाथ जी हिन्दी भाषाक सुपरिचित कवि शम्भु बादलक एक कविताक मैथिली अनुवाद 'फेसबुक' पर देलखिन। हम ओहि कवितासँ दू गोट शब्द बीछि, ओकर आगू प्रश्न चिह्न (?) लगा , ओकरा सबकें ओही 'पोस्ट'पर 'कमेन्ट' जकाँ 'पोस्ट' कए देलियैक। फल ई भेल जे शम्भु बादलक जाहि हिन्दी कविता सबहक मैथिली अनुवाद ओ केने रहथि तकर संपूर्ण फ़ाइल दोसर दिन भोरे हमरा लग पहुँचि गेल. हम पढ़ब आरंभ कयल; बीछल बेराओल कविताक संख्या बहुत नहि रहैक। मुदा , कविता सब कथ्यमे तेहन प्रखर आ भावमे तेहन प्रभावकारी रहैक जे हम एके श्वासमे पोथीक आद्योपान्त पाठ एक तेज दौड़- जकाँ जखन समाप्त कए लेल, तखन बुझबामे आयल जे हितनाथ जी शम्भु बादलक एहि कविता सबकें अनुवाद करबाक विचार किएक केलनि।
वस्तुतः, अनुवादक हेतु केओ कोनो ग्रन्थ किएक चुनैछ? ओकर पाछू कोन प्रेरणा वा कारण होइछ? हमरा जनैत, पहिल कारण थिक, पाठककें सम्पूर्ण रूपें साहित्यक नीक लागब, पसिन्न पड़ब, स्पर्श करब. बेसी फड़िछाकए जं कही तं , कविताक भाषा , लालित्य , भाव आ अर्थक सरलता, पसिन्न पड़बाक ओ अनेक कारण सब थिक जकर समुच्चयसँ कविता पाठककें स्वतः मोहि लैछ, मुदा एहि सब साहित्यिक अवयव सबकें जं बिसरिओ जाइ तं हमरा हेतु अनुवाद करबाक पाछाँक मूल प्रेरणा थिक पाठकक ओ मनोरथ जे 'केहन दीव (दिव्य) होइतैक जे ई कविता (सब) अपनो भाषामे होइतैक !" हमरा जनैत अनुवादक हेतु ई मनोरथ अनुवादक प्रथम प्रेरक तत्व थिक। अनुवादक हेतु अपन क्षमताकें तौलबाक विचार तकर बाद अबैत छैक आ अंततः जखन अनुवादककें विश्वास होइत छनि जे हम एहि काजक हेतु सक्षम छी, तखन ओ अनुवादमे हाथ लगबैत छथि। 'कुरल' केर अनुवादक विचार आ अनुवादमे हाथ लगयवाक निर्णयक बीच हमरा करीब पन्द्रह वर्ष लागि गेल छल !
श्री हितनाथ जी द्वारा संकलित आ अनूदित शम्भु बादलक कविता पढ़लासँ समाजपर लागल प्रत्येक घाओक गंभीरता आ सामाजिक विसंगतिपर कविक प्रहारक अनायास अनुभव होइछ। कविताक सोझ अर्थ आ निहित अर्थमे सेहो कोनो आवरण नहि छैक। प्रायः तें ई कविता सब हितनाथजीकें स्पर्श केलकनि आ ओ एहि काजमे हाथ लगओलनि।
कवि आ साहित्यकार रूपमे हितनाथजी मैथिली साहित्यमे ओतबे सुपरिचित छथि जतबा अजुका समाजमे 'फेसबुक'। ई गद्य-पद्य-समालोचना-आलेखमे मांजल छथि। शम्भु बादलक कविताक अनुवाद हिनक पहिल अनुवाद थिक। अनुवादहुमे ई कतेक सिद्धहस्त छथि, से कविताक एहि संकलनसँ स्वयं प्रतीत होइछ।
पोथी छोट छैक , तैं एहि भूमिकामे विषयवस्तुक संकेत दए आ विवेचना कए पाठकक उत्सुकता थोड़ करब उचित नहि। तथापि , एतबा कहब अत्युक्ति नहि हएत जे संकलित कविता सबहक विषय प्रासंगिक आ समसामयिक छैक। अस्तु , पोथी उठाउ , आ पढ़ि जाउ।
(फेसबुकसँ साभार)
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Suggested citation: डा. कीर्तिनाथ झा. “शम्भु बादलक कविता जिनगीक रोशनी.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 405, 2024-11-01. https://www.videha.co.in/research/2024/405/शम्भु-बादलक-कविता-जिनगीक-रोशनी.htm

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