२२.आभा झा-समृद्धि दिशि बढ़ैत बाल-साहित्यमे राजापोता बलगरक मजगूत हस्तक्षेप
डॉ. आभा झा
समृद्धि दिशि बढ़ैत बाल-साहित्यमे ‘राजापोता बलगरक मजगूत हस्तक्षेप
प्रायः मनुक्ख अपना जीवनमे दू बेर बाल्यकाल जिबै अछि, एकबेर जखन स्वयं नेना रहैत अछि, तखन आ दोसर बेर गंभीरसॅं गंभीर लोककेँ पुनः ई अवसर तखन भेटैत छै जखन ओ अपन नाती-पोताक संग अपन समयक बहुलांश बितबैत अछि, खिस्सा-पिहानी सुनबैत अछि, कान्ह पर लए टहलबैत अछि, गीत- कवित्त सुनबैत अछि। अपन संतानक संग ई सहज सुख नहि भेटि सकै छै, जकर कारण रहैत छै जीविकोपार्जनक आपा-धापी, बच्चाक खगता पुरैबाक बेगरता, घर-गृहस्थीक नाना तरहक दायित्व निमाहक तनाव। मुदा सेवानिवृत्तिक बाद जॅं भगवान् फेरसॅं ई मौका दै छथिन त’ प्रौढ़ मनमे बच्चाक उत्सुकता बुझबाक, ओकर मनोभूमि धरि जैबाक आ ओकर अनन्त जिज्ञासाकेँ शमित करबाक सहज इच्छा करौट लेमय लगैत छैक आ जीवन आनन्दमय भए जाइत छैक। जॅं सौभाग्यवश ईश्वर प्रदत्त कारयित्री प्रतिभा हो, तखन त’ आवश्यकताक अनुरूप कविता-कथादि बनैत चलि जाइ छै। फुरसति आ इच्छा भेल त’ पोथी रूपमे आबि आनो बच्चा लेल उपयोगी बनि कालनिरपेक्ष महत्त्व पबै छै, आ जे से नहि त’ मौखिके रूप धरि सीमित रहि जाइत छैक।
ई जरूरी नहि जे उपरोक्त परिस्थितिए टामे नेन्नाक वयसक अनुरूप कविता- खिस्सा लिखाइत छै। साहित्यकारक हृदयमे समाजक प्रति एकटा दायित्व- बोध सेहो होइत छैक। मैथिलीक संदर्भमे जॅं गप कएल जाय त’ एखन धरि मैथिली प्री प्राइमरी, प्राइमरी, मिडिल वा हाइ स्कूलमे नहि पढ़ाओल जाइत अछि। तेँ कि हम सभ सरकारकेँ गरियबैत हाथ पर हाथ धय बैसल रही? किन्नहु नहि! तखन की? अपन साध्य भरि प्रयास करी। जहिना बच्चाक शारीरिक विकास लेल प्रयत्नशील रहैत छी, तहिना बाल-मनक सम्पोषण सेहो मातृभाषाक माध्यमसॅं करी, ओकर रुचि- प्रवृत्तिक अनुरूप कविता गीत,खिस्सा आदि सुनाबी, कनेक छेटगर होइते ओकरा रंगीन कविता- खिस्सा आदिक पोथी उपलब्ध कराबी, जाहिसॅं ओकरा पढ़बाक हिस्सक लागि सकै, ओकर भाषिक एवं संज्ञानात्मक कौशलक विकास संभव भए सकय, ओकरा भीतर सृजनशीलताक बीआक आधान भए सकय।
आदरणीय हितनाथ झा गंभीर चिन्तक ओ आलोचक छथि, वृत्तिसॅं सेहो बैंक अधिकारी रहलाह अछि, ओत्तहु गम्भीर दायित्व! मुदा एहि सभक अछैतो मातृभूमि ओ मातृभाषाक प्रति प्रेमक वशीभूत सदैव मिथिला-मैथिली लेल किछु ने किछु करैत रहलाह अछि। तेँ ओ ग्राम गाथा, आलोचना, अनुवाद आदि विधामे लगातार लेखन कए रहल छथि। एहि तीनू पोथीमे हिनक अध्ययनशीलता आ तार्किकता बेश मुखर अछि। मुदा हालहिमे मैत्रेयी प्रकाशनसॅं प्रकाशित ‘राजापोता बलगर’ मे हिनक सहज-सरल कवि रूप देखबामे आएल। एहि संग्रहमे छियालीस टा छोट-छोट बाल कविता छै, जाहिमे किछु प्राथमिक वर्गक बच्चा लेल त’ किछु किशोरवयक बच्चा लेल उपयोगी छैक। बाल कविताक संदर्भमे एतबा त’ निश्चित कहल जा सकैछ जे ओ तखने सहज आ मनलग्गू बनि पबै छै, जखन लेखक स्वयं बच्चाक मनोभूमिमे हो। बाल सुलभ चेष्टा, खेल- कूद, जिज्ञासा आ कल्पनाशीलता आदिसॅं तादात्म्य स्थापित कएने हो। बाल- साहित्यक जान होइत छैक रोचकता, चित्रमयता आ गेयता। बाल-मनोविज्ञानक अनुरूप रचल एहि रोचक पोथीकेँ पढ़ि अहाँके ई अनुभव होयत जे बच्चा कविता सभकेँ रुचिपूर्वक पढ़बे टा करतै, कारण ओकरा ओकर रुचिक अनुरूप तुकान्त रचना एक्कहि ठाम भेटि गेलै। एहिमे गाम छै, आम- लीचीक बगैचा छै, सुरसरबालीक झिल्ली-कचरी छै,झिझिरकोना छै, जे हमरो-अहाँकेँ अपन शैशवमे ल’ जाइत अछि।
हॅं ‘गाँती’ सन कविता आइ काल्हुक बच्चाकेँ अवश्य बुझबामे कठिन हेतै, कारण आइ गरीबसॅं गरीब बच्चा गाँती नहि बान्हि फाटलो- चीटल बरु, स्वेटरे-जैकेट पहिरैत अछि। ‘मकान-घर’, ‘छुपल ओहिमे खेला’ आ ‘भाग्यक रेखा’ ई तीन टा कविता हमरा अपन लक्ष्यार्थक कारण बच्चा सभक स्तरसॅं कनेक ऊपर बुझना गेल। मुदा ओही ठाम ‘बौआ दाइ’ कविता बहुत आकर्षित कएलक जतय गामघरक खेल- कूद,पढ़ाइ-लिखाइ लिखिया-पढ़िया आदिक संग चन्द्रयानक सफलताक उल्लेख आ ओतय रहि सकबाक संकल्पना अत्यधिक रुचिकर शैलीमे अभिव्यक्त भेल छैक। ’भोरे भोर’, ’राजा पोता बलगर’, ’दादी पूजा-पाठ सिखौतौ’, ’उड़न’ परी, ‘साइकिल सवारी’, ‘मधुर’,आदि छोट बच्चा लेल बेशी उपयोगी छै त’ ‘मिथिला हो सर्वोत्तम धाम’, ‘वृक्षारोपण’, ’क्षणिका’, दोहा आदि एहन कविता अछि जे किशोर वय बच्चा लेल जॅं पाठ्य-पुस्तक बनय त’ ओहिमे समाविष्ट होयबाक योग्य छै। ‘हिन्दुस्तानक प्राण तिरंगा', शीर्षक कवितासॅं एकटा छोट उदाहरण देखल जा सकैछ-
टपकय जा धरि अइ धरतीपर चन्द्रमाक शीतलता
सगरो पसरय सूर्य-किरणसँ सक्रियता-उज्ज्वलता
सन्तति भारत माँक गर्वसँ कहय-'हमर मन गंगा'
ताधरि हिन्दुस्तानक घर-घर फहरय विजय तिरंगा ।
अहिना कविताक माध्यमसॅं समानार्थी शब्दक ज्ञान लेल ई कवितांश उपयोगी छैक -
पंकज-पुष्कर-पुण्डरीक ओ पारिजात-पाथोज
जलज-वनज-उत्पल-कुवलय आ पंकरूह-अंबोज।
शतदल-उत्पल-कंज-पद्म पुनि नलिन और अम्भोज,
सरसिज-सरसीरुह-सरोरुह ओ वारिज सहित सरोज ।।
तुकान्त कविता सुनैमे त’ नीक लगिते छै, असानीसॅं याद सेहो भए जाइत छै आ बरखो- बरख स्मृतिमे रहैत छैक। ’बालोSहं जगदानन्द’ कि ‘सा ते भवतु सुप्रीता’ आदि सन अनेक मैथिली-हिन्दी- संस्कृतक कविता एखनहुँ याद अछि एहि द्वारे जे ई बचपनमे सुनल छल आ गेयताक कारण आकृष्ट कएने छल। बेशी कवितांशक उद्धरण दय हम पाठकक उत्सुकता कम नहि करें चाहै छी, तेँ एतय एतबहि। हॅं एतबा अवश्य कहए चाहब कि ई पोथी बच्चा सभक हाथमे अवश्य दी, मैथिली बालकविताक सौंदर्य,सहजता आ अप्रत्यक्ष रीति सॅं व्यक्तित्व-निर्माणक योग्यतासॅं परिचित कराबी। बाल-साहित्यकेँ समृद्धि दिशि ल’ जाइत एहि नव पोथी लेल कविकेँ बहुत बहुत बधाई आ अभिनन्दन।
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