विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

हितनाथ झा समर्पित पाठक केर साकांक्ष प्रतिनिधि

डॉ. कैलाश कुमार मिश्र · 2024-11-01 · अंक 405

२६.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र-हितनाथ झा समर्पित पाठक केर साकांक्ष प्रतिनिधि
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र- संपर्क-8076208498
हितनाथ झा: समर्पित पाठक केर साकांक्ष प्रतिनिधि
हितनाथ झा पर लिखब केर अर्थ भेल साहित्य सँ ऊपर उठैत मानवीय संवेदना संग लिखी। हितनाथ बाबू नीक गाम, परिवार आ संस्कार केर लोक छथि। विनम्र छथि, मृदुभाषी थिकाह। हिनकर भेट मात्र सँ अहाँक यात्रा आ दिन सफल रहत तकर गारंटी द' सकैत छी। हितनाथ जी मैथिली साहित्य आ रचनाकें हमरा जनैत एक समर्पित पाठक छथि। ई गुण दुर्लभ गुण भेल आजुक समयमे जखन लोक हेंज बना रचना लिख आ ओकरा प्रकाशित करबा मे अपसियात छथि। किनको लग आनक रचना पढ़बाक समय नहि छनि। विश्वविद्यालय केर अधिकांश शिक्षक आ शोधकर्मी सेहो अपना आपके सिलेबस तक संकुचित केने छथि। हितनाथ जी मुदा की नव आ की पुरान, सब रचनाकें गुरुकुल परम्परा केर वेदपाठी जकाँ धोखइत रहैथ छथि। हितनाथ बाबू केवल पढ़ैत नहि छथि, ओहि पोथी अथवा रचना पर अपन पाठकीय मंतव्य सामाजिक संजाल, ऑफलाइन-ऑनलाइन पत्रिका, समाचारपत्र केर मादे दैत रहैत छथि। सभा, संगोष्ठी, कवि समारोह आदिमे हिनक सहभागिता देखार होइत रहैत अछि। अही क्रममे हितनाथ जीक पाठक साहित्यकार भ' उठैत अछि। पौत्र संग समय बितेला केर क्रम मे ई बाल कविता केर निर्माण करैत छथि।
अपन गाम कोइलख, ओकर लोक, परम्परा केर इंच-इंच जानकारी रखैथ छथि, हरेक तथ्यक प्रमाण तकैत छथि, प्रामाणिक भेला उत्तर ओहि बात के अपन लेखनी केर मादे सामाजिक संजाल केर पटल पर रखैत छथि, लोकक उत्तर, प्रत्युत्तर पर साकांक्ष रहैत तथ्य केर विस्तार आ अधिक लोक सम्मत बना एकत्रित करैत रहैत छथि। जखन संकलन सब तरहेँ पूर्ण भ' जाइत छनि तखन पोथी प्रकाशित करैत छथि। हिनक भाषा अति सामान्य, सहज आ सामान्य जनक भाषा छनि। जखन ई अपन गाम कोइलख पर खेपे खेप ओकर संतान आ गौरव पर लिखैत छलाह ताहि क्षण हम हिनका संपर्कमे आयल रही। तहिया सँ हमरा लोकनि केर सम्पर्क चलैत समय केर डेग संग ठोस भ' रहल अछि। सामाजिक संजाल पर ओना आरो लोक अपना गाम आ क्षेत्र केर लोक, गौरव आ परम्परा पर लिखैत छथि मुदा ओहि लेखनमे अत्यधिक शुद्धतावादी सोच, वर्ग विशेष पर विशेष ध्यान, व्यक्तिकें यथार्थ सँ बहुत बढ़ा-चढ़ा क' हुनक अनेरे गुणगान रहैत छनि। स्थिति ई भ' उठैत अछि जे हमरा सन पाठक कखनो काल सत्य बातमे सेहो व्यर्थक आडम्बर देखय लगैत अछि। हमरा कहबामे कोनो संकोच नहि अछि जे हितनाथ जी अहि तरहक आडम्बर सँ अपना के दूर रखने छथि। ताहिं हिनक ग्राम्य वर्णन सत्यक प्रामाणिक दस्तावेज छनि जाहिमे साहित्य सेहो किछु अंशमे व्याप्त छैक। हितनाथ जी केर गाम पर जे पोथी छनि ताहि पर हम एतय पूर्ण विराम दैत छी कारण हिनक पोथी पर हमर विस्तृत समीक्षा छपि चुकल अछि।
जेना लिख चुकल छी, हितनाथ जी एक समर्पित पाठक छथि। गंभीर पाठक नहि कहबनि , कारण ओ एक अलग व्याख्या केर विषय भ' सकैत अछि। मैथिली रचना लेल समर्पित पाठक सेहो आँगुर पर गानल छथि। मुदा हमरा कखनो काल लगैत अछि जे हितनाथ बाबू भावावेशी आ समावेशी पाठक छथि। ई बात अगर सत्य छैक तँ हिनका लेल भले जे हो, साहित्य लेल नीक बात नहि भेल! समर्पित पाठक के अपना आपमे हंस जकाँ व्यक्तित्व विकसित करक चाही। हंस व्यक्तित्व केर अर्थ भेल क्षीर-नीर-समभाव। हंस जेना पानिमे सँ दूध आ पानि छानि कय एक-एक ठोप अलग क’दैत छैक तहिना समर्पित पाठकके अपन ज्ञान, सोचक क्षमता केर विस्तार करैत ओ रचना जे ओ पढ़ि रहल अछि तकर गुण अवगुण दुनू बातक विस्तार सँ विवरण पॉइंट-टू-पॉइंट सन्दर्भ संग देबाक चाही। हितनाथ जी अपन शिक्षा, नियमित पठन, आ परिवेश केर आधार पर ई गुण विकसित क' सकैत छथि। हिनक अहि गुण केर लाभ ओना तँ सब साहित्यकार के भेटतन्हि मुदा सर्वाधिक लाभ नवोदित साहित्यकारके हेतनि। कारण ओ भविष्य केर लेखनमे अपन गलती, विवेचना, विन्यास, नव प्रयोग, विषय आदिमे सुधार क' सकैत छथि। कोनो रचना अथवा पोथीके नीक अथवा अधलाह कह सँ पूर्व ओकर सन्दर्भ, ओहि तरहक अन्य रचना संग तुलना, पाठक केर आकांक्षा, परिवर्तन केर प्रवाह आदि बिंदु पर चिंतन करब अनिवार्य। हमरा पुनः लगैत अछि जे हितनाथ जी के ई गुण अपनामे आत्मसात करक चाही। जखन ई बात करैत छी तँ हमरा अज्ञेय केर एक लघु कविता जे ओ पाठक हेतु गढ़ने छथि से स्मरण आबि रहल अछि। कविता केर शीर्षक छैक “पाठक के प्रति कवि” आब कविता देखल जाए:
“मेरे मत होओ
पर अपने को स्थगित करो
जैसा कि मैं अपने सुख-दुःख का नहीं हुआ
दर्द अपना मैंने ख़रीदा नहीं
न आनन्द बेचा;
अपने को स्थगित किया
मैं ने, अनुभव को दिया
साक्षी हो, धरोहर हो, प्रतिभू हो
जिया”।
अज्ञेय केर कविता स्वतः प्रमाणित छैक। कवि पाठक के सम्बोधित करैत कहैत छथि: जहिना एक कवि अपन सुख, दुःख, आनन्द सँ ऊपर उठैत सब कष्ट सहैत कविता गढ़ैत अछि , स्व के त्याग करैत अछि तहिना एक समर्पित पाठकके ओकर मर्म तटस्थ भ' क' बुझक चाही आ ताहि अनुसार अपन लेखनीके आगा बढ़ेबाक चाही। एखन धरि हितनाथ जी केर आलोचना, जकरा आब
ई पाठकीय प्रतिक्रिया लिखैत छथि, मे साहित्यकार केर उत्साहवर्धन, लेखन केर उन्नत पक्ष, लेखनमे प्रयोग, पोथी केर अन्य बातक जानकारी रहैत छनि मुदा ओकर आन पक्ष पर जेना हिनक कलम मौन भ' जाइत छनि। हिनक मौन भेनाइ दोसर निष्पक्ष समीक्षक, गंभीर पाठक अथवा समर्पित पाठक हेतु पैघ समस्या ठाढ़ करैत छनि। से केना? एना जे कोनो बातक प्रबल पक्ष पर जँ ई बहुत लिख दैत छथिन्ह आ दोसर जखन ओकर कमजोर पक्ष दिश संकेत करैत छैक तँ साहित्यकार चिंतन आ निर्णय केर उभयवृततामे रहैत अछि ! ओकरा ई निर्णय करयमे दिक्कत होइत छैक जे ककर बात प्रमाणिक मानय ! ककरा अपन भविष्यक लेखन हेतु मार्गदर्शक बुझय ! समस्या मैथिलीमे गंभीर छैक। अतय बहुत लोक आदान -प्रदान केर समीक्षा अथवा पाठकीय प्रतिक्रिया लिखैत छथि - “अहाँ हमरा रचना पर अनेरे वाह -वाह लिखू, हम अहाँक रचना पर लिखब”। अनेक व्यक्ति आ संस्था ओहेन रचना आ रचनाकारके अनेक कारण सँ पुरस्कृत से करैत छथि। अहिना स्थितिमे तटस्थ पाठक की करत ! आ हमरा जहाँ तक जानकारी अछि ताहि हिसाबे हितनाथ जी सब तरहक गुटबाजी सँ दूर छथि। अगर से छथि तँ हिनका अपना आपमे क्षीर-नीर-समभाव केर गुण आनय पड़तन्हि।
आब हितनाथ जी केर लेखनी केर दोसर भाग दिस चली। हिनक लेखनीमे बात बहुत सतही स्तर पर अबैत छनि। सामान्य लेखन लेल तँ ई ठीक छैक मुदा साहित्यकार अगर अपनाके एक दू सैय बरख धरि जीवंत राखय चाहैत छथि तँ हुनका अपन लेखनीमे दर्शन, विज्ञान, कल्पना, सौंदर्य, भविषयक सोच, साहित्यक बिम्ब आदि पर गंभीर होमय पड़तन्हि। लेखनी केर दिशा लघु सँ पैघ करय पड़तन्हि। मैथिलीके अलावे अन्य भाषा केर साहित्य सबमे की प्रयोग चलि रहल छैक, साहित्य केर कुन भागमे गंभीर लेखन केर दरकार छैक तकर अनुसन्धान करय पड़तन्हि। पहिने लीखि चुकल छी जे हिनका लग समय छन्हि, धैर्य छन्हि, खोजी प्रवृत्ति केर लोक छथि, साहित्य सँ सम्बंधित पोथी आदि केर सामग्री प्रचुर मात्रामे उपलब्ध छन्हि, आ सबसँ पैघ बात हिनक लेखनी प्रबल छनि। अगर से भ' गेल तँ हमरा लोकनि मैथिली साहित्यमे एक विलक्षण साहित्यकार हितनाथ झाके रूपमे देखि सकैत छी। एकर मतलब इहो नहि जे आजुक हितनाथ झा कोनो दृष्टिये कमजोर छथि। हिनक लेखनी आइयो नीक छनि मुदा विशिष्ट नहि छनि। हिनका नीक सँ विशिष्ट केर यात्रा लेल अग्रसर होबाक चाही।
एक बात आर कहब (अथवा लिखब) रहि गेल। यद्यपि हम हिनक अनेक आलेख आ एक पोथी पढ़ने छी। हिनक बाल पोथी हड़बड़ीमे पढ़ने छी ताहिं हमर विवेचन हम हिनका जतबे पढ़ने छी ततबे पर भेल अछि। इहो संभव छैक जे हमर कहल बहुत बात सब ई अपन आन रचनामे समाहित केने होथि जे हम नहि पढ़ने छी। जँ एहन बात छैक तँ हम आदरणीय हितनाथ झा सँ क्षमाप्रार्थी छी।
अंततः हमरा इहो कहयमे कोनो संकोच नहि अछि , बल्कि गर्वक अनभूति भँ रहल अछि जे हितनाथ झा एक समर्पित पाठक छथि, साकांक्ष लोक छथि, आ बहुत सम्मानित व्यक्तित्व छथि। भगवान भास्कर सँ हमर प्रार्थना जे ई सतायु होथि आ मैथिली साहित्यके अपन लेखनी सँ समृद्ध बनबैत रहथि।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।

Suggested citation: डॉ. कैलाश कुमार मिश्र. “हितनाथ झा समर्पित पाठक केर साकांक्ष प्रतिनिधि.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 405, 2024-11-01. https://www.videha.co.in/research/2024/405/हितनाथ-झा-समर्पित-पाठक-केर-साकांक्ष-प्रतिनिधि.htm

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