"मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान" एहि विषय पर लिखब कतए सँ शुरू कएल जाए, मोन उलबुकाएल सन भऽ रहल अछि। ई विषय देखितहि नानाजी सँ जुड़ल सुनल/देखल बहुतो बात हमरा दिमाग मे घूमए लागल। जनमितहि चूल्हि मे घोसिया देबाक टोना कएल गेल छलनि, ताहि खिस्सा सँ शुरू करी किंवा बाल्यावस्था मे आर्थिक विपन्नता सँ जूझैत उपेन्द्र नाथ पर समाजक किछु उदारमना गणमान्यक विशेष कृपादृष्टिक प्रसंग सँ। आ कि मेधावी छात्र उपेन्द्र नाथ केर कुशाग्र बुद्धि सँ प्रभावित भऽ एक गोट ब्रिटिश ऑफिसर 'ह्विप साहेब' द्वारा बिनु कोनो आवेदन पत्रक सीधे सरकारी विभाग मे नियुक्त कऽ लेबाक प्रकरण सँ। हुनकर आचार-विचार, धर्म-कर्मक चर्चा करी किंवा हुनकर समाज सेवाक भाव पर गप्प कएल जाए। कर्मकाण्डक अनुसरण करितहु आधुनिकताक पक्षधर होएब, माने हुनकर प्रोग्रेसिव सोच केर बात कएल जाए किंवा गीत-संगीत सँ हुनकर लगाओ केर बात करी। हुनकर फोटोग्राफी स्किल केर बात करी कि हुनकर अनुशासित दिनचर्याक बात करी.....हरि अनन्त..हरि कथा अनन्ता....बला पड़ि अछि।
आबक लोक लेल ई एकटा नब बात होएत प्रायः। उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जी गाम मे "चुल्हाइ" नाम सँ जानल जाइत छलाह। आ एहि "चुल्हाइ" नामकरणक पाछाँ कारण अछि एकटा टोना। उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' सँ पहिने परनाना स्व.विश्वनाथ झा आ परनानी स्व. आनन्दी देवीक पाँच-छओ टा संतान जन्मक उपरान्त मृत्यु प्राप्त करैत गेलनि। तखन उपेन्द्र नाथक जन्म काल एकटा टोना कएल गेल। ई टोना बच्चाक दीर्घायु होएबाक गारंटी मानल जाइत छलए, तैँ लोकक सलाह पर ई टोना कएल गेल छलनि। जनमितहि, माटिक चुल्हि मे नेना उपेन्द्र नाथ केँ घोसीया देल गेलनि। आ एही प्रक्रिया केँ क्रियान्वयनक फलस्वरूप पहिल नाम "चुल्हाइ" पड़लनि। ई "चुल्हाइ" नामक बालक आगाँ जा कऽ एहन यशस्वी हेताह, तकर अनुमान एक रत्ती नहि छल हेतनि स्व.विश्वनाथ झा आ स्व.आनन्दी देवी केँ।
विद्वता मात्र लेल नहि, अपितु अपन सच्चरित्रताक कारणेँ बहुत लोकक हृदय मे जगह बनओलनि उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जी।जन्म भले ही वर्तमान युग, कलयुग मे भेल छलनि हुनकर। मुदा कलयुग मे जीबैत सतयुग, त्रेतायुग आ द्वापरयुग, सभ युगक झलक देखबालेल भेटत, जखन हुनकर जीवन यात्राक आँकलन करब तँ। हमर एहि बात सँ पूर्णरूपेण सहमति रखताह, हुनकर सान्निध्य मे समय बितओनहार परिजन सभ।
ओना तँ "युग” शब्द सँ एकटा निर्धारित काल-खण्डक बोध होइत छैक। मुदा हम एहिठाम ओहि युगक विशेषता सँ ओहि काल-खण्डक गणना कऽ रहल छी। सभ युगक अपन विशेषता रहल अछि। सभ युग मे सामाजिक ताना-बाना भिन्न रहल छलैक। सभ केँ बूझल होएत, जे सतययुगक समाज पाप सँ शत प्रतिशत मुक्त छलए। एहन सुनैत आएल छी हमसभ। सतयुग केँ सुवर्ण युग मानल जाइत अछि। श्रेष्ठ युग मानल जाइत अछि। सतयुग मे देवता आ दानव अलग-अलग लोक मे रहैत छलाह। पापी सँ दूर रहने प्रायः लोक पाप सँ सेहो बाँचल रहैत छलए।
तँ से, पाप आ पापी दुनू सँ बचबाक प्रवृत्ति नानाजीक भीतर जन्मजात छलनि। हमरा नानीगाम मे कहियो पिआजु लहसुनक प्रयोग नहि होइत छलए हुनका जीवनकाल धरि। समुद्र यात्रा निषेध मानल गेल अछि, अपना सभक शास्त्र पुराण मे। समुद्र पार कऽ विदेशी भूमि पर जाएब पाप वा अनिष्टकारी कहल गेल अछि। से तकरा फॉलो करैत ओ प्रयागराज संगम तट पर विधि विधानक संँ प्रायश्चित कएलनि, विदेश भ्रमण सँ घुरलाक उपरान्त।
त्रेतायुग रामक युग। जाहि युग मे धर्म ओ संस्कृतिक प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता छलैक लोकक भीतर। ओना देवता आ दानव एक्कहि लोक मे रहए लागल छलए, त्रेतायुग मे। दानव द्वारा देवता लोकनि केँ उछन्नर देबाक असंख्य घटनाक्रम उल्लिखित अछि रामचरितमानस आ वाल्मीकि रामायण मे। खैर...जे-से। विषयान्तर होएबा सँ बचैत मूल बात पर आबी। चर्चा कऽ रहल छी उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' माने पूज्य नानाजीक चरित्र पर सभ युगक छाप केर। त्रेतायुगक अवतारी पुरुष रामक चरित्र सँ तँ अत्यधिक साम्यता देखाइत अछि हमरा, हुनकर चरित्र मे। उपेन्द्र नाथ झा आ महेन्द्र नाथ झा, राम लक्ष्मण सन दू भाए, दुनूक मध्य आजीवन मधुर संबंध रहब एकटा उदाहरण अछि हरिपुर 'बख्शी टोल'क लोकलेल। हरिपुरे टा नहि, सऽर कुटुम्बक संग इलाकाक अन्यान्य परिचित सभलेल सेहो। हमर नानीगामक घर-घरारी कहियो बाँटल नहि गेल हुनका दुनू भाएक मध्य। आजीवन एक परिवार बनि कऽ रहैत गेलाह। कहबाक माने हुनका दुनूक जीवनकाल धरि त्रेतायुग कायम रहल। हुनका दुनूक स्वर्गीय भेलाक उपरान्त भले ही ओहि घर मे घोर कलयुगक झलक देखाए लागल।
द्वापरयुग श्री कृष्णक युग। महाभारतक युग। वेदव्यासक युग।
महाभारतक रचयिता वेदव्यास जीक नाम सँ 'व्यास' उपनाम पर्यन्त पड़ि गेल छलनि। आ से अनायासे पड़ि गेल छलनि। माने कोनो प्लानिंग केँ तहत नहि। सोचि-विचारि कऽ नहि। ई उपनाम बला प्रकरण रोचक अछि। असल मे, बालक उपेन्द्र नाथ स्कूल मे यदा-कदा अवसर-अनवसर रामायण-महाभारतक कथा शिक्षक आ छात्र सभ केँ सुनाओल करथिन । जेना पराशर, द्रोपदी, धर्मराज युधिष्ठिर, भीष्म पितामह, घटोत्कच आदिक प्रसंग - से सुनि हुनका रामेश्वर पांडेय नामक एक गोट शिक्षक 'व्यास' कहए लगलथिन । हुनका देखा-देखी सभ विद्यार्थी-शिक्षक सेहो 'व्यास' कहब शुरु कऽ देलथिन। बाद मे इएह नाम प्रचलित भऽ गेलनि। एहि तरहेँ उपेन्द्र नाथ स्कूलिए जीवन सँ 'व्यास' बनि गेल छलाह। आ से मात्र उपनामे नहि , वैचारिकता मे सेहो।
एकरा एना बूझल जाए; जेना वेदव्यास महाभारतक रचयिता मात्र नहि , अपितु ओहि युद्ध, ओहि घटनाक साक्षी रहलाह। अपन आश्रमे सँ हस्तिनापुरक समस्त गतिविधिक सूचना हुनका धरि पहुँचैत रहैत छलनि। आ वेदव्यास जी ओहि घटना पर अपन परामर्श दैत रहैत छलाह। जखन-जखन अंतर्द्वंद्व आ संकट केर स्थिति आबैत छलए माता सत्यवती हुनका सँ विचार-विमर्श करबालेल आश्रम पहुँचि जाइत छलीह। कहियोकाल हुनका हस्तिनापुरक राजभवन मे सेहो आमंत्रित कएल जाइत छलनि। तहिना उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास'क पोस्टिंग कत्तहु रहलनि, गामक हाल समाचार हुनका धरि सभदिन पहुँचैत रहैत छलनि। भले ही ओ मोबाइलक नहि चिट्ठी आ तारक समय छलए। आ गामक समाचार सँ मतलब मात्र अपनहि परिवार सँ नहि। भरि गामक लोकक सुख - दु:ख सुनब आ तखन समस्याक निदान लेल उपाए करब हुनकर जिम्मेदारी छलनि। ई बात प्रायः बहुत लोक केँ बूझल हेतनि, जे 'व्यास' जीक योगदान मात्र मैथिली साहित्ये टा मे उल्लेखनीय/ स्मरणीय नहि रहलनि। समाज लेल सेहो बहुत किछु कएलनि।
P H E D मे चीफ इंजीनियर धरि पहुँचैत यथासाध्य गाम लेल समाज लेल सहयोग करैत रहलाह। जेना - भरि गाम मे डेग डेग पर चापाकल गड़बा देब। घर घर मे P H E D के कर्मचारी भेटि जाएत हमरा नानीगाम हरिपुर 'बख्शी टोल' मे। बहुत लोक केँ रोजगार दिअओलनि। कतेक घरक लोक केँ खेबाक उपाए नहि छलैक , तकर सभहक स्थिति सुधरलैक। एहन लोक लेल देवता छलाह उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जी। अद्भुत व्यक्तित्व छलनि हुनकर। एहन लोक विरले भेटताह। सामाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक, चारित्रिक, सभ स्तर पर खरा सोना। समाज मे ओहन छवि हरसट्ठे सभहक नहि बनि जाइत छैक।
हमरा समय मे हिन्दीक पाठ्य-पुस्तक मे एक टा अध्याय छलए, "गुणों की खान-आँवला" प्रायः सातवीँ कक्षाक पाठ्य-पुस्तक मे। से हमरा कोनो बहुमुखी प्रतिभाक धनी व्यक्तिक चर्चा करैत ई चैप्टर निश्चित रूप सँ मोन पड़ि जाइत अछि। उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' सेहो एक टा एहने गुणक खान छलाह। आश्चर्य! एक व्यक्तिक भीतर एतेक गुण कोना भऽ सकैत अछि.... अविश्वसनीय सन लागैत छैक। मुदा सत्य छैक। हमरा तँ बहुत किछु आँखिक देखल सेहो अछि, आ किछु सूनल सेहो अछि। एक दिस विज्ञान पढ़ि, इंजीनियरिंग केनाइ आ दोसर दिस साहित्य सँ एतेक लगाव। जखन 1969 मे हुनका साहित्य अकादमी पुरस्कार सँ सम्मानित कएल गेलनि, तखन न्यूज पेपरक फ्रंट पेज पर बॉक्स बना कऽ छापल गेल छलए "Believe it or not, a technocrat is getting the highest literary award in literature from the Sahitya Akademi."
आश्चर्यक गप्प ई जे अपन कर्म-क्षेत्र मे सेहो सभ दिन, सभ ठाम यशस्वी रहलाह। कुशाग्र बुद्धि तँ बाल्यकालहि सँ छलाह। जाही क्षेत्र मे, जाहि काजक भार उठओलनि, सफल रहलाह। सफले टा नहि अद्वितीय कहबाक चाही। इंजीनियरिंग सँ जुड़ल गतिविधि मे सेहो एहन निष्णात जे रिटायरमेंटक बादो विभागक लोक सभ संपर्क करैत रहैत छलनि, किछु परामर्श लेल। किछु दैवी शक्ति छलनि जेना।
साहित्यिक क्षेत्र मे तहिना अपन विशिष्ट योगदानक संग विशिष्ट स्थान बनओलनि। बता दी जे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास'जी मैथिलीक प्रथमहि रचनाकार छथि जे मूल (दू पत्र) तथा अनुवाद (विप्रदास) उपन्यास साहित्यक लेल साहित्य अकादेमीक पुरस्कार प्राप्त कएने रहथि।
दू पत्र - मूल पुस्तक पर 1969 मे
आ विप्रदास - अनुवाद पुरस्कार 1990 मे भेटल छनि।
हुनकर रचना संसार पर एक नजरि देल जाए --
1.कुमार (उपन्यास) 1946 मे प्रकाशित
2. संन्यासी (खंड-काव्य)
3. महाभारत आदि पर्व
4.विडम्बना (गल्प-संग्रह) 1952 मे प्रकाशित
5. प्रतीक (कविता-संग्रह)
6.भजना-भजले (कथा-संग्रह) 1989 मे प्रकाशित
7.दू पत्र (लघु उपन्यास) 1968 मे प्रकाशित
8.श्रीमद्भगवत गीता (मैथिली पद्यानुवाद)
9.रुबाइयात-ए-ओमर खैयाम (मैथिली पद्यानुवाद)
10.बाभनक बेटी (उपन्यास, बाङ्लाक अनुवाद)
11.विप्रदास (उपन्यास, बाङ्लाक अनुवाद)
12.पतन (काव्य) 1976 मे प्रकाशित
13.अक्षर परिचय (नेना सभहिक लेल)
14.स्तोत्राञ्जलि (पद्यानुवाद) जाहिमे
सौन्दर्य लहरी
श्रीमद्भागवत पुराण
15.विदेश भ्रमण (यात्रा वृत्तांत) 1978 मे प्रकाशित
16. दो पत्र (मैथिली उपन्यास दू पत्रक
हिन्दी अनुवाद) साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित
17.Two letters (दू पत्र केर अंग्रेजी अनुवाद श्री सत्येन्द्र कुमार झा द्वारा) 2023 मे प्रकाशित
(किछु रचनाक प्रकाशन वर्ष छूटल अछि)
अप्रकाशित रचना मे महाभारतक किछु पर्व,
ऋग्वेद आ शुक्ल यजुर्वेदक भाष्य, जाहि मे व्याकरण, व्युत्पत्ति, अर्थ, विवेचना सभ किछु सन्निहित रहैत अछि।
रामानन्द झा'रमण' जीक लिखल एकटा लेख मे पढ़ने छलहुँ "लेखकक साहित्यिक उत्कर्षक मानदण्ड मात्रा नहि, रचना मे अन्तर्निहित गुणवत्ता मानल जएबाक चाही। ढाकीक ढाकी लिखलोपर जँ कोनो जीवन-मूल्य स्वीकृत नहि भए सकल अथवा रचनाकारक पाँती मे पृथक व्यक्तित्व नहि झलकैत रहए तँ भरिगर गत्ताक अछैतो जीवन कालहि मे ओ रचनाकार अप्रासंगिक घोषित भए जाइत अछि।" से हिनकर लेखनी मे हिनक पृथक व्यक्तित्व झलकैत रहल छनि। आ तैँ अमर छथि।
लेखनीक चर्चा कऽ रहल छी, तँ नाना जीक एक टा बहुचर्चित कथा "रूसल जमाए"केर चर्चा करब आवश्यक बुझना जाइए। ई एकटा माइलस्टोन कथा रहल। एहि कथाक चर्चा रहरहाँ होइत रहैत अछि, कोनो तरहक साहित्यिक गोष्ठी सभ मे। एहि कथाक संदर्भ मे एकटा रोचक बात सुनल अछि। बहुत लोक केँ भ्रम छलनि जे ई हुनकर अपन खिस्सा छनि। जखन कि ई कथा जाहि समय मे लिखने छलाह (१९४५) ताहि समय ओ कुमारे छलाह।
संक्षेप मे कही तँ पूज्य नानाजीक जीवन-यात्राक मुख्य पड़ाओ एना रहलनि - बाल्यावस्था मे आर्थिक विपन्नता सँ दू-चारि होइत रहलाह। किशोरावस्था सँ युवावस्था धरि स्कूल-कॉलेज मे मेधावी छात्र रूप मे आ कर्म-क्षेत्र मे अपन कार्य कुशलता सँ एकटा विशिष्ट स्थान बनओलनि। प्रौढ़ावस्था धरि आबैत उदारमना समाजसेवी आ धर्म-कर्म मे लीन भद्र पुरुषक छवि एहन बनलनि जे वृद्धावस्था धरि कायम रहलनि। नानाजीक ई 'नीक लोक' बला छवि हुनकर लेखन पर सेहो हावी रहलनि। साहित्य सेवा स्कूलिए जीवन सँ प्रारम्भ भेलनि, से हुनकर जीवनक अन्तिम पड़ाव धरि अनवरत चलैत रहलनि। किछु रचना सभ अप्रकाशित सेहो रहि गेलनि। जकरा प्रकाशित कराएब हुनकर संतति सभक काज छनि।