विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-३

कल्पना झा · 2025-02-01 · अंक 411 · पृष्ठ 4–13

मैथिली साहित्य मे व्यास जीक पदार्पणक बाट खोलैत 'ओ' विदाइ गीत
राजमाता साहिबा सँ नियमित प्रतिमास पाँच रु.क छात्रवृत्ति प्राप्त होमए लगलनि आ आगाँक शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करबा दिशि अग्रसर होइत रहलाह उपेन्द्र नाथ। अपन गाम सँ राजनगर अएलाह। मिडिल सँ आगाँ राजनगर आबि ओत्तहि केर हाइस्कूलक होस्टल मे रहि पढ़लनि उपेन्द्र नाथ जी। स्कूलक संस्थापक धीरेन्द्रनाथ लाहा आ स्कूलक अन्य शिक्षकक सहयोग एवं आशीर्वाद सदति भेटैत रहलनि।
मुदा अपन विपन्नता ... आर्थिक अभाव ... कखनो काल कऽ व्यग्र कऽ दैत छलनि बालक उपेन्द्र केँ, जे 'आब आगाँ हम कोना पढ़ब ? हमर संस्कृतक किताब, हमर भूगोलक नक्शा, हमर गणितक पोथी-हमर नैया पार कोना लागत ? आब की हेतैक ?' धीरेन्द्रनाथ लाहा पीठ ठोकथिन - और पढ़ो ! और पढ़ो !! मुदा आगाँ पढ़ब कोना से चिन्ता रहि-रहि कऽ परेशान करनि।
जखन चारू दिस अन्हारे अन्हार पसरल नजरि आबए लागैत छैक, तखन जँ केओ भगवानक पठाओल दूत जकाँ आबि जाइत छैक आ आगाँक बाट प्रशस्त होइत जाइत छैक, एहन मे मनुक्खक भीतर कोनो अदृश्य शक्ति, माने देवता-पितर पर अपार श्रद्धाक भाव उमड़ब स्वाभाविक। आ जैँ कि 'व्यास'जी केँ एक बेर नहि, अनेक बेर साक्षात् दैवी कृपाक अनुभव भेल छलनि, तैँ देवता-पितर पर अविचल-अडिग आस्था रहलनि जीवनक अन्तिम साँस धरि। पूजा-पाठ करब, सन्ध्यावन्दन आ प्रातः गंगा-स्नान आदि ओ कहियो नहि छोड़लनि। एक बिचे जखन 'व्यास'जी पटना मे पढ़ैत छलाह तँ कतेको हुनकर आत्मीय मैथिलबन्धु जनउ जरा कऽ चाटि गेल रहथि। हिनका सेहो कहल गेलनि, मुदा 'व्यास'जी टस-सँ-मस नहि भेलाह। कारण हुनकर इंजीनियरिंग कॉलेज धरि पहुँचब, इंजीनियर बनब, सामान्य बात नहि छलए। बड्ड बेसी संघर्षपूर्ण रहलनि 'व्यास' जीक इंजीनियर बनबा धरिक समय। बिनु दैवी कृपाक संभव नहि छलनि ओतए धरि पहुँचब। जतए धरि पहुँचबाक ओ स्वयं सोचियो नहि सकैत छलाह, ततए धरि पहुँचब वास्तव मे दैवीए कृपा भेल ने !
खर्रख जाएब-आएब रहैत छलनि। खर्रख सँ 'व्यास' जीक परिवारक बड्ड दूरस्थ सम्बन्ध रहनि। मुदा खर्रख मे स्व. बलभद्र बाबू आ दयाबाबू सँ हिनका अतिशय स्नेह, सहयोग, सम्बल आ आत्मीयता भेटलनि। ओहि स्नेह, सहयोग, सम्बल, आत्मीयता केँ ओ आजीवन नहि बिसरलाह। हिनका लोकनिक चर्चा कहियोकाल धिया-पूताक सोझाँ करैत रहैत छलाह।
मैट्रिक मे फर्स्ट डिवीजन भेला उत्तर स्वयं बलभद्र बाबू 'व्यास' जीक गार्जियन भऽ गेल रहथिन। मैट्रिकक रिजल्ट होइतहि बलभद्र बाबू घोषणा कएलनि - 'आब एहि बच्चाक देख-रेख हम स्वयं करब !' हुनकहि आदेश सँ 'व्यास' जी इंजीनियरिंग कालेज मे एडमिशन लेलनि। हुनकहि निर्णय छलनि ई। आ बहुत नीक, शत् प्रतिशत उचित निर्णय छलनि, से 'व्यास' जी स्वयं स्वीकार करैत छलाह।
बलभद्र बाबूएक युक्ति सँ 'व्यास' जी केँ आइ.एस-सी. मे पढ़बा काल राजमाता सँ प्रतिमास १५/- छात्रवृत्ति भेटए लगलनि। एहि मे ९ रु. मेसचार्ज, सीटरेन्ट ३ रु. आ पुस्तकादि अन्य खर्च ३ रु. रहैत छलनि। आइ. एस-सी. मे कालेजक फीस माफ छलनि 'व्यास' जीक। पुनः जखन इंजीनियरिंग कालेज मे एडमिशन भेलनि तँ बलभद्र बाबूक असीम कृपा सँ 'व्यास' जी केँ राजमाता सँ २५/- रु. प्रतिमास छात्रवृत्ति भेटए लगलनि। एहि मे कालेजक फीस ८ रु., सीटरेन्ट ४ रु., मेसचार्ज ९ रु., पुस्तकादि अन्य खर्च ४ रु. भेटैत छलनि। एहि तरहेँ इंजीनियरिंग केर पढ़ाइ कएलनि 'व्यास' जी।
आब गप्प करब 'व्यास' जीक साहित्यिक यात्राक। एक तरहेँ ओ जन्मजात कवि छलाह; रस-छन्द अलंकार मे डूबल आत्मा; तेहन सन। जे देखार भेलनि किशोर वय मे आबि। माने किछु-किछु लिखब शुरु कएलनि किशोरावस्था सँ।
पहिले पहिल जे लिखलनि, से छलनि एकटा विदाइ-गीत। जे भरि राति जागि कऽ लिखने छलाह 'व्यास' जी। पंक्ति-पंक्ति अश्रु मे डूबल। एकर पाछाँ प्रसंग ई अछि, जे राजनगर हाइस्कूलक संस्थापक धीरेन्द्रनाथ लाहाक बदली भऽ गेल रहनि। समस्त राजनगर जनपद एहि समाचार सँ मर्माहत भऽ उठल छलए। परिसरक समस्त लोक, सभ शिक्षक-कर्मचारी-विद्यार्थी भावविह्मवल भऽ उठल छलाह। हुनक विदाइ-समारोहक भव्य आयोजन भेल रहैक। ओहि समयक एकटा प्रसिद्ध तर्ज रहैक --
"मसीहा बनके बीमारों को किस पर छोड़ जाते हो...."
एहि तर्ज पर पं. श्री शुकदेव झा विदाइ गान लिखने रहथि, आ तकरा हुनक प्रिय शिष्य कोइलखक भवनाथ (पछाति डाक्टर) गाबि-गाबि रियाज करैत रहथि।
'व्यास' जी स्वयं धीरेन्द्र बाबूक वैदुष्य आ विशाल हृदय सँ बेस प्रभावित छलाह। हिनका मोन मे सेहो इच्छा जगलनि जे हमहूँ एकटा विदाइ-गान प्रस्तुत करी। भिड़ि गेलाह लिखबा मे। भरि रातिक अथक प्रयासक बाद एकटा मार्मिक विदाइ-गान तैयार भेलनि। जकर किछु पंक्ति एहि तरहेँ अछि --
"वीर वीर इन्द्रक करुणासँ
सुख समीर संचार जतए
नन्दन वन सन पुष्पावलिमे
अछि क्रन्दन जंजाल कतए ?"
अस्तु; उक्त विदाइ-गान लिखैत 'व्यास' जीक पदार्पण भेलनि मैथिली साहित्य मे। आ से हुनकर लेखनी निर्बाध चलैत रहलनि...अनवरत..जीवनक अन्तिम साँस धरि...। लेखनीक स्तर ततेक प्रभावशाली रहलनि, जे दु -दू बेर साहित्य अकादमी पुरस्कार दिऔलकनि। पुरस्कारक संग अमरत्व सेहो दिऔलकनि। मैथिली साहित्य मे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' सूर्य सन दैदिप्यमान छथि आ रहताह सभदिन, ई कहबाक बेगरता नहि।
उपरोक्त विदाइ-गान भले ही 'व्यास' जीक लिखल पहिल पद्य रचना छलनि, मुदा कविता हुनकर नस-नस मे छलनि जन्महि सँ। बस ओहि गुण केँ बहरएबाक अवसर भेटबाक देरी छलनि। से पहिल अवसर भेटलनि राजनगर हाइस्कूलक संस्थापक धीरेन्द्रनाथ लाहाक विदाइ-समारोहक आयोजनक लाथेँ।
'व्यास' जीक भीतरक एहि जन्मजात कवि केँ बहरएबा मे हुनकर इतिहास विषय मे कम रुचि, सेहो सहायक रहलनि। इएह दोसर कारण, मूल रूप सँ माध्यम बनलनि एकटा कविक रूप मे उपेन्द्र नाथ केँ ख्याति दिअएबाक। सेहो स्कूलिए जीवन मे। असल मे 'व्यास' जी केँ गणित, हिन्दी, संस्कृत आ भूगोल पर अधिकार जकाँ रहनि। मुदा इतिहास मे बड्ड रुचि नहि लेथि। इतिहास बिसरि जाइथ। बाप के ? बेटा के ? इस्वी कोन ? क्षेत्र कतय ? नीति की ? कूटनीति की ? इतिहासक पोथी देखि क' हुनका आतंक पैसि जाइन। तखन ओ एकटा उपाय कएलनि। इतिहासक घटना सभ केँ छन्दोबद्ध रुप मे लिखब आरम्भ कएलनि।
माने कहल जा सकैत अछि जे इतिहासक कोखिसँ 'व्यास' जीक कविताक जन्म भेल !
एहि तरहेँ धुरझार कविता लिखब शुरु छलनि स्कूलिए जीवन मे 'व्यास' जीक। मूल कविताक संग किछु अंग्रेजी कविताक अनुवाद सेहो स्कूलिए जीवन मे करए लागल छलाह। आ से कोनो एहन - ओहन कविक नहि, Keats आ Shelley सन उच्च कोटिक लिखनाहरक कविता सभक अनुवाद। जनिकर लिखल कविता बुझनाइ सेहो कठिन रहैत छैक बहुत लोक लेल। आश्चर्यजक गप्प जे, जेना कि ताहि दिन प्राइमरी स्कूल मे (पाँचवीं कक्षा धरि) अंग्रेजी नहि पढ़ाएल जाइत छलैक, तहिना 'व्यास' जी जखन छठमा क्लास मे गेलाह; तखन अंग्रेजी पढ़ब शुरु कएलनि। माने A B C D सिखलनि छठमा मे आबि कऽ। आ कोना एक्कहि-दू बरखक बाद अंग्रेजी कविताक मैथिली अनुवाद करब सेहो शुरु कऽ देने छलाह, से अजगुत बात ! किछु दैवी शक्ति छलनि जेना !
कोर्स के पढ़ाइक संग अन्यान्य गतिविधि सँ सेहो सभदिन, सभठाम, माने स्कूल-कॉलेज सभतरि अपन प्रतिभाक विशेष छाप छोड़लनि। इएह कारण छलए, जे 'व्यास' जीक कुशाग्र बुद्धि सँ हुनकर शिक्षक सभ बेस प्रभावित रहैत छलाह।
व्यासजीक साहित्यिक यात्रा पर नजरि खिराएब, तँ ई स्वतः स्पष्ट भऽ जाएत, जे हुनक रचनात्मक जीवन मे निरन्तरता रहलनि। भले ही दू टा कथा-संग्रहक (विडम्बना १९५२ आ भजना-भजले १९८९ मे) प्रकाशन वर्ष मे गैप ३७ वर्षक छनि, मुदा साहित्य-सेवा मे अनवरत लागल रहलाह। कथाक अतिरिक्त उपन्यास, कविता, खण्ड-काव्य, यात्रा-साहित्य, संगहि अनुवाद-साहित्य केँ सेहो पुष्ट करैत रहलाह।
जखन कि व्यासजीक रचनात्मक परिवेशमे कतेको उठा-पटक होइत रहलनि। बहुत तरहक परिवर्तन आएल, समाज मे, देश मे, दुनियाँ मे। सभ सँ पैघ परिवर्तन राजनीतिक क्षेत्र मे आएल, राजनीतिक दासत्व सँ मुक्ति भेल। संविधान सँ लोक केँ मौलिक अधिकार भेटलैक। शिक्षाक प्रचार-प्रसार भेल।
सामाजिक-सांस्कृतिक केन्द्र मे परिवर्तन आएल। युग-युग सँ गामक निर्मल आ स्वच्छ वातावरण मे पोषित मानसिकता बला लोक सभ शहर दिस पड़ाएल। गामक गाम उजड़ैत गेल, शहर पसरैत गेल। मिथिला मे कारखानाक स्थापना भेल। कारखानाक धुआँ सँ, निर्मल वायु-आच्छादित आकाश धूम्रमय होमए लागल। लोकक जीवन-यापन, रहन-सहन मे परिवर्तन आएल। विकृति, छल-प्रपंच आ दाव-पेंच बढ़ल। परन्तु 'व्यास'जीक रचनात्मक दृष्टि, अपन परिवेशक भौतिक-अभौतिक परिवर्तनक प्रति असम्बद्ध रहल, अप्रभावित रहल। स्थान, काल आ पात्र मे यत्किंचित परिवर्तनक अछैतो, 'व्यास' जीक रचनात्मक मूल्य स्थापना आ तकर पल्लवन मे परिवर्तन नहि आएल।
उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जी जे-जतबा साहित्य-सृजन कएलनि, से आदर्शोन्मुख परिलक्षित होएत। मतलब समाज मे एकटा आदर्श स्थापित करबाक प्रयास रहलनि, से स्पष्ट देखा पड़त।
'व्यास' जीक कथाक पात्र, मातृभाषा मैथिलीक प्रति अटूट आस्था राखएबला भेटत, पिआजु-लहसुन नहि खाए, भारतीय संस्कृति का आचार-व्यवहार मे आस्था राखएबला भेटत, पांजिबला लोक‌ सँ बेसी शुद्ध आचरण करैत देखा पड़त। संगहि जाति, धर्म, वर्ण, क्षेत्र आदिक आधार पर मनुष्य-मनुष्यक बीचक विभेद केँ मेटाए, मानवीय गुण केँ प्रतिस्थापित करैत पात्र सभ देखा पड़त। करुणा आ प्रेम, मानवीय गुण छैक, जाति आ धर्मक बान्ह मे नहि बान्हल रहैत छैक, तकरा स्थापित करैत देखा पड़त। तहिना ममता, सद्भावना-धर्म, जातिगत गुण नहि मनुष्यजनित गुण अछि, ई सभ स्पष्ट परिलक्षित होइत अछि 'व्यास' जी रचित कृति सभ मे।
स्कूलिए जीवन मे, जखन 'व्यास' जी शुरुआत कएलनि कविता लिखब, तखनुक एकटा कविता अवलोकनार्थ प्रस्तुत कऽ रहल छी, जे आदरणीय हितनाथ झा जीक सौजन्य सँ प्राप्त भेल अछि --
जहिया उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' राजनगर हाइ स्कूल मे पढ़ैत रहथि, ओही समयक लिखल ई कविता अछि।
मिथिला
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उपेन्द्रनाथ झा "व्यास"
हिमिगिरि उत्तर दिशि मे राजित जनिक उच्चतम श्रृंगे ।
जगदम्बा पति ,पितु सिर बहयित दक्षिण दिशि छथि गङ्गे।।
पूर्व दिशा अतितीव्र गामिनी नदी कौशिकी प्रवहित ।
गंडक पुनि पर्वत सँ निकसित पश्चिम बहयित जनहित ।।1।।
मिथिल नाम महाराज नाम पर अछि तुअ नाम प्रसिद्धे।
जनक आदि अमरोपन मुनिगण बहुत भेला अरु सिद्धे ।।
जनक तनूजा लक्ष्मी आदिक छली देवि अवतारे।
नाम जनिक स्मरण होइत मनु जाइत अछि भवपारे।।2।।
किन्तु पूर्व शुभ युग सब बीतल आब न छथि ओ मिथिला।
कर्म्म- धर्म्म - वंचित निज जनसँ भय गेली अछि शिथिला।।
जतय मदन अरु कालिदास छल शंकर झा सन वीरे ।
ओतय मूर्ख महिषी चरवाही मे अछि पड़ल अधीरे ।।3।।
मैथिल ! आबहुँ उठु एहि जगमे सब क्यो काज करै अछि।
पूर्वोपार्जित यशक ध्यान कयला सँ लाज अबै अछि ।।
दुर्दिन अपन देखि कय , आबहु पढ़ु निज वेद विचारू ।
देशक उन्नति करू सुचित भय , भाषा अपन प्रचारू ।।4।।
एच. ई.स्कूल , राजनगर ।
"ओहि कालक मैथिली कविताक विषय-वस्तु मात्र देश-दशा आ मातृभाषा रहैत छलए। 'व्यास' जी ओहू आयु मे, माने छात्रावस्थो मे, मैथिली काव्यक केन्द्रीय धाराक संग छलाह। उक्त कविताक प्रतिपाद्य विषय यैह थिक। एतावता प्रमाणित होइत अछि जे 'व्यास' जी ओहू आयु मे , छात्रावस्थो मे, मैथिली काव्यक केन्द्रीय धाराक संग छलाह। दोसर बात, 'व्यास' जी अपन जाहि मानसिकताक लेल आइ जानल-मानल जाइत छथि ताहि सँ भिन्न हुनक ओहू दिनक विचार नहि छलनि। तात्पर्य ई जे 'व्यास' जी स्कूलिए जीवन मे 'व्यास' बनि गेल छलाह; आ से केवल उपनामे मे नहि, वैचारिकता मे सेहो।" 'व्यास' जीक लेल मोहन भारद्वाज जीक वक्तव्य !
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2

Suggested citation: कल्पना झा. “मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-३.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 411, pp. 4–13, 2025-02-01. https://www.videha.co.in/research/2025/411/मैथिली-साहित्यमे-उपेन्द्र-नाथ-झा-व्यास-एवं-हुनक-परिवारक-योगदान-३.htm

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