विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

महाकवि चंदा झा बनाम भाषाविद ग्रियर्सन : मिथिला भाषा

आचार्य रामानंद मंडल · 2025-02-15 · अंक 412 · पृष्ठ 26–29


महाकवि चंदा झा बनाम भाषाविद ग्रियर्सन : मिथिला भाषा

महाकवि चंदा झा के जन्म पिंडारुच (दरभंगा) मे १८३१ई मे आ मृत्यु १९०७ई में भेल रहय।हुनकर मुख्य कृति मिथिला भाषा रामायण (१८९२)हय।परंच मिथिला में हुनकर रामायण के बारे मे मिथिला अंजान हय। इंहा के संत महात्मा आ कथावाचक सेहो अंजान लगैत हय। मिथिला मे एकाह नवाह में संत तुलसीदास कृत रामचरितमानस के पाठ होइए हय जे अवधि में हय।
इतिहास बतबैय हय कि महाकवि विद्यापति के बाद महाकवि चंदा झा मैथिली के विकास में योगदान कैलन।परंच मिथिला के विद्वान हिनका उपेक्षा कैलन।
मैथिली के विकास में अंग्रेज पदाधिकारी भाषाविद ग्रियर्सन के महत्वपूर्ण योगदान हय।हुनकर जन्म१८५१आ मृत्यु १९४१मे भेल रहय।वो १८७०मे भारत अयलन।वो भारतीय भाषा सर्वेक्षण (१८५८) कैलन। सर्वेक्षण रिपोर्ट २१भाग मे हय।जैमैं १७९ भाषा आ ५४४ बोली के विस्तार से वर्णन हय।हुनकर मैथिली साहित्य मे मैथिली ग्रामर (१८८०),सेवेन ग्रामर्स आफ दी डायलेक्ट्स आफ दी बिहारी लैंग्वेज (१८३३-१८८७). के विशेष महत्व हय।
इंहा महत्वपूर्ण इ हय कि वर्तमान मैथिली भाषाविद कहैत हतन कि भाषा के ग्रामर होइ छैय परंच बोली के ग्रामर न होइ छैय। ज्ञातव्य होय कि कालब्रुक मिथिला के भाषा के मैथिली नाम देलन आ जार्ज ग्रियर्सन मैथिली के क्षेत्र निर्धारण केलन।
कहल जाइत हय कि महाकवि चंदा झा मैथिली के क्षेत्र आ भाषा -बोली के निर्धारण मे जार्ज गिरियर्सन के भारी सहयोग कैलन।परंच प्रश्न उठय कि जौ मिथिला के भाषा के नाम मैथिली निर्धारित हो गेल रहय त महाकवि चंदा झा अपन कृति रामायण के नाम मिथिला रामायण आ मैथिली रामायण के बदले मिथिला भाषा रामायण काहे रखलन।कि हुनका लगलैन कि मिथिला के भाषा मैथिली कुछ वर्ग के भाषा हय। वास्तव मे मिथिला के भाषा मिथिला भाषा त बहुसंख्यक के भाषा हय। मिथिला भाषा रामायण मिथिला के भाषा( मैथिली , अंगिका, बज्जिका, सुरजापुरी आदि) अर्थात मिथिला भाषा के परिचायक हय।


अशोक वाटिका मे सीता संग वार्ता भाषा बनाम मानुषी भाषा (मैथिली)

बाल्मीकि रामायण के अनुसार -

अहं ह्यतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः।
वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिहं संस्कृताम्।।१७।

एक त हमर शरीर अत्यंत सूक्ष्म हय, दोसर हम वानर छी। विशेषतः वानर होके हम इंहा मानवोचित संस्कृत -भाषा मे बोलबैय।

यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम।
रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति।।१८

परंतु एहन करे मे एकटा बाधा हय, जौं हम द्विज के भांति संस्कृत -वाणी के प्रयोग करबैय त सीता हमरा रावण समझ के भयभीत हो जतैय।

अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत्।
मया सान्त्वयितुं शक्या नान्यथेयमनिन्दिता।
।१९।।

एहन दशा मे अवश्ये हमरा वोइ सार्थक भाषा के प्रयोग करे के चाही जे अयोध्या के आसपास के साधारण जनता बोलैय हय,न त इ सती साध्वी सीता के हम उचित आश्वासन न दे सकब।

हनुमान जी संस्कृत आ अयोध्या के लोक भाषा के लेल मानुष भाषा के प्रयोग कैलै हतन। संस्कृत के लेल विद्वान मनुष के भाषा आ साधारण लोग के लेल मानुष (लोक) भाषा।अइमे मिथिला आ मैथिली भाषा के कोई चर्चा न हय।

-गोरखपुर प्रेस से प्रकाशित बाल्मीकि रामायण के आधार पर।
-आचार्य रामानंद मंडल सीतामढ़ी।

Suggested citation: आचार्य रामानंद मंडल. “महाकवि चंदा झा बनाम भाषाविद ग्रियर्सन : मिथिला भाषा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 412, pp. 26–29, 2025-02-15. https://www.videha.co.in/research/2025/412/महाकवि-चंदा-झा-बनाम-भाषाविद-ग्रियर्सन-मिथिला-भाषा.htm

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