विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-४

कल्पना झा · 2025-02-15 · अंक 412 · पृष्ठ 3–7

तन्त्रनाथ-दग्ध' कवि होएबाक आरोप सँ आरोपित 'व्यास' जी

दरभंगा जाए, बड़ी राजमाताक समक्ष हरिपुर 'बख्शी' टोलक निवासीक रूप मे अपन परिचय दएनिहार एकटा बालक; जनिका ओहि गाम मे केओ चुल्हाइ, केओ नुनू, केओ भचाइ केर नाम सँ चिन्हैत छलनि, से बालक विद्यार्थीए जीवन मे अपन बहुमुखी प्रतिभाक प्रदर्शन करैत, मैथिल समाज मे प्रसिद्धि पाबए लागल छलाह। कुशाग्र बुद्धिक कारणेँ शिक्षाक क्षेत्र मे सभदिन, सभठाम, माने स्कूल सँ कॉलेज धरि, अपन विशेष पहचान बनएबे कएलनि, संगहि साहित्यिक गतिविधि मे सक्रियता सेहो विशेष पहचान दिऔलकनि।

'व्यास' जी १९३४ में प्रथमा, १९३६ मे मध्यमा आदिक डिग्री प्राप्त कएलनि। मिथुन राशिक रहने स्वाभाविक रुपें ज्योतिष-विद्या मे हुनकर विशेष अभिरुचि छलनि। गणित पर अधिकार रहलनि, तेँ ज्योतिष-विषय मे डिग्री प्राप्त करबा मे विशेष असौकर्य नहि भेलनि। तत्पशचात पटना साइन्स कॉलेज मे नाम लिखाओल गेलनि...पछाति इंजीनियकिंरग कालेज मे। सौभाग्यवश पाठ्यक्रमक पढ़ाइक संग हुनका साहित्यिक अभिरुचि केँ संवर्धित करबालेल यथोचित वातावरण भेटलनि बिहारक राजधानी पटना मे। ओत्तहि सुभद्र बाबू रिसर्च करैत रहथि। हुनका सँ सम्पर्क भेलनि। प्रोफेसर हरिमोहन झाक आशीर्वाद प्राप्त कएलनि। १९३८ मे दरभंगा सँ स्व.रमानाथ बाबू द्वारा सम्पादित त्रैमासिक 'साहित्यपत्र' मे धारावाहिक रूप मे प्रकाशित श्रध्देय तन्त्रनाथ बाबूक 'कीचकवध'क छन्द विशेष आकृष्ट कएलकनि 'व्यास' जी केँ, ई गप्प ओ स्वयं स्वीकार करैत छलाह।

तन्त्रनाथ बाबूक कीचक-वध सँ ततेक प्रभावित भेलाह 'व्यास' जी, जे ओहि प्रभावक प्रभावेँ एकटा महाकाव्य लिखि लेने रहथि। मुदा से कत्तहु हेरा गेलनि, जे फेर नहिए भेटलनि कहियो। ओना एहि हेरा जेबाक प्रसंग पर हमरा मोन मे तत्क्षण इएह आबि रहल अछि, "जे होइत छैक से नीकेँ होइत छैक" कारण जँ ओ महाकाव्य प्रकाशित होइतनि तँ आरो बेसी आरोप लगितनि, जे 'व्यास' जी 'तन्त्रनाथ -दग्ध' कवि छथि। जाहि व्यक्तिक व्यक्तित्व सँ हमसभ प्रभावित होइत छी, ओहने गुण अपना भीतर विकसित करबाक प्रयास करब स्वाभाविक अछि। तहिना कोनहुँ कविक रचना सँ प्रभावित होइत हुनकर अनुकरण मे लिखब, सामान्य बात छैक। तँ से किछु गणमान्य केँ 'व्यास' जी, तन्त्रनाथ बाबूक अनुकरण करैत बुझा पड़लथिन। आ एही कारणेँ आरोपित भेलाह, बहुत लोक कहए लगलथिन, 'व्यास' जी 'तन्त्रनाथ -दग्ध' कवि छथि।

जखन कि आगाँ चलि कऽ हिनकर सन्यासी (खण्ड-काव्य) एवं प्रतीक (कविता-संग्रह) मे संकलित अनेकों काव्य-रचना मे तन्त्रनाथ बाबू अथवा आन कोनो कविक एक रत्ती प्रभाव नहि भेटत। 'पतन' अपना ढंगक काव्य-रचना थिकनि.. ककरो कोनो प्रभाव नहि ... पूर्णरूपेण मौलिक। 'व्यास' जीक कहब छलनि जे "प्रत्येक कवि अपन रस्ताक तलाश स्वयं करैत अछि। एहि मे पूर्व सँ अबैत कतेक पन्थ, कतेक भाव सँ प्रभावित होइत रहैत अछि। ब्लैंकभर्स... माइकेल मधुसूदन भारत मे प्रचलित कएलनि, अपन मेघनाद-वध मे। तकर बाद तन्त्रनाथ बाबू कीचक-वध मे। हमर कवि-जीवनक आरम्भिक काल छल, हमरो नीक लागल।" कहबाक माने कवि-जीवनक आरम्भिक दौर मे कोनो विशेष कवि सँ प्रभावित होएबाक बात केँ 'व्यास' जी सामान्य ओ स्वाभाविक क्रिया मानि रहल छथि। एहि मे कोनो हर्ज बला बात नहि, तेहन सन।

दुर्गापूजाक अवसर पर मिथिला मिहिर मे प्रकाशित तन्त्रनाथ बाबूक एक 'सॉनेट' (चतुर्दश-पदी) सेहो 'व्यास' जी केँ बेस प्रभावित कएने छलनि। ओहि छन्दक अनुकरण कए ओ पहिल सॉनेट 'सूर्य' १९३८ ई. मेष-संक्रान्ति दिन लिखलनि। एहि चतुर्दश-पदीक किछु पाँती एहि तरहेँ अछि--

जाहि तेज-पुञ्जक अबइछ किछु अंश

शक्ति भरल ज्योतिक तरङ्ग, एहि प्रांत

जीवन रूप, तथा जाइछ आश्रांत

शेष कतए अज्ञात ! विश्वसर-हंस ।

आदि-शक्ति-भाजन, शुभ दीप्त ललाम

ज्योति पदमे स्वीकृत करिअ प्रणाम।

एहि तरहेँ 'व्यास' जीक लेखनी रफ्तार पकड़ैत गेलनि। लोक 'नोटिस' करए लगलनि। पहिल काव्य-रचना 'विदाइ-गान'क उपरान्त किछु छिटपुट कविता सभ लिखैत रहलाह 'व्यास' जी।किछु अंग्रेजी कविताक अनुवाद सेहो कएलनि। विद्यार्थीए जीवन सँ हुनकर लेखनी निर्बाध चलैत रहलनि।

१९३८ मे 'सॉनेट'क उपरान्त 'व्यास' जी 'ब्लैंक भर्स' सेहो अपनौलनि। कहबाक माने सभ तरहक प्रयोग करैत रहलाह। कोनो एक तरहक 'पैटर्न' मे बान्हल नहि रहलनि 'व्यास' जीक काव्य-रचना। पटना मे, १९३९ मे विद्यापति स्मृति-पर्वक आयोजन धूम-धामक संग सम्पन्न भेल रहैक । काव्य-पाठक हेतु 'व्यास' जी केँ सेहो आमन्त्रित कएल गेल छलनि। ओहि दिन, एक साँस मे एक बैसकी मे १७४ पंक्तिक कविता केँ पूरा पाठ कएलनि 'व्यास' जी। आ मूलतः ओही दिनक 'विद्यापतिक मृत्यु' शीर्षक कविताक-पाठ करबाक फलस्वरूप 'व्यास' जी केँ लोक एकटा मैथिली कविक रूप मे चीन्हए-जानए लगलनि। तकरे बाद सन् १९४१ मे 'व्यास' जी सन्यासी खण्ड-काव्य लिखब प्रारम्भ कएलनि। खेपा-खेपी लिखैत चारि बर्ख मे पूरा भेलनि। मौलिक कथानक सँ युक्त ई खण्ड-काव्य १९४७ मे धारावाहिक रूप मे मिथिला मिहिर मे छपलनि। पछाति पोथी- रूप में सेहो छपलनि, मुदा 'कुमार' उपन्यासक बाद। जखन कि लिखलनि पहिने 'सन्यासी' खण्ड-काव्य मुदा प्रकाशित भेलनि पहिने 'कुमार' उपन्यास। जाहि 'कुमार' उपन्यासक सृजन 'रिएक्सन' मे कएल गेल छलए 'व्यास' जी द्वारा।

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मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1
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Suggested citation: कल्पना झा. “मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-४.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 412, pp. 3–7, 2025-02-15. https://www.videha.co.in/research/2025/412/मैथिली-साहित्यमे-उपेन्द्र-नाथ-झा-व्यास-एवं-हुनक-परिवारक-योगदान-४.htm

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