विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय के प्रदर्शनी (पृष्ठ १८-२९)

प्रणव झा · 2025-04-15 · अंक 416

पद्य
३.१.प्रणव कुमार झा- आशाक आकाश (पृष्ठ ३१-३२)
३.२.जगदानन्द झा 'मनु'-२५ टा हाइकू (पृष्ठ ३३-४१)
३.३.डॉ. जियाउर रहमान जाफरी- दूटा कविता- मृतक/ पुरुषक समस्या (पृष्ठ ४२-४४)

गद्य
२.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-७
२.२.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-५
२.३.प्रणव झा-परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय के प्रदर्शनी
२.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-७
कल्पना झा
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-७
जनक सन सफल गृहस्थ : 'व्यास' जी'

मैथिली अकादमी द्वारा साल 2020 मे मैथिलीक वरेण्य रचनाकार, गीतकार प्रदीपक मृत्युपरान्त "मैथिली पुत्र प्रदीप स्मृति अंक"क घोषणा कएल गेल छलए जे ओही साल दिसम्बर मे प्रकाशित भेल। एहि "मैथिली पुत्र प्रदीप स्मृति अंक" मे हमरहु छोट - सन श्रद्धांजलि लेख प्रकाशित भेल छलए, जे कोनो पत्रिका मे प्रकाशित हमर 'पहिल' लेख अछि। आ तैँ ओ पत्रिका हमरा अति प्रिय अछि। सम्हारि क' राखल अछि घर मे। रहरहाँ कोनो सर-कुटुम्ब पटना अएलाह तँ हुनका पढ़बालेल, देखबालेल देलहुँ, ई सभ बचकाना हरकत करैत रहलहुँ। ओना ओ अंक वास्तव मे संग्रहणीय अछि। मात्र बारह गोट लेख केर संकलन सँ युक्त एहि अंक केँ पढ़ि प्रदीप जीक व्यक्तित्व ओ कृतित्वक सभ आयाम संँ परिचित भ' सकैत छथि पाठकगण।

एहि "मैथिली पुत्र प्रदीप स्मृति अंक" मे सियाराम झा 'सरस' जी बड़ा बढ़ियाँ सँ हुनकर व्यक्तित्वक विविध आयाम केँ चारि भाग मे विभक्त क' पाठकक सोझाँ रखलनि अछि। शिक्षक प्रदीप, पारिवारिक प्रदीप, सामाजिक प्रदीप आ कवि प्रदीप। ई वर्गीकरण करब सुविधाजनक बुझना गेल, पाठकक लेल सेहो आ लेखकक लेल सेहो।

तँ से एही तर्ज पर हम आइ गृहस्थ 'व्यास' जीक चर्चा करबाक नेआर कएल अछि। वस्तुत: गृहस्थ 'व्यास' जीक नहि; जनक सन सफल गृहस्थ 'व्यास' जीक चर्चा करबाक अछि। एखन धरि क्रमवार नेना उपेन्द्र सँ ल' क' युवा उपेन्द्र आ लेखक उपेन्द्रक व्यक्तित्व-निर्माणक प्रकरणे टाक गप्प कएल अछि। उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जीक व्यक्तिगत पारिवारिक जीवनक चर्चा करब रहि गेल। उपरोक्त भूमिका बान्हब आवश्यक नहि छलए प्रायः। खैर, जे-से। आब बान्हि देल तँ बान्हि देल।

'व्यास' जी गृहस्थ-जीवन मे प्रवेश कएलनि 1946 ई. मे उनतीस बरखक अवस्था मे। ताहि दिन जखन बेसी-सँ-बेसी मैट्रिक वा इंटरमीडिएट धरि पढ़ैत-पढ़ैत वरक विवाह भ' जाइत रहैक; ताहि समय मे उनतीस बरखक अवस्था मे विवाह करब अजगुत बला बात लगतनि लोक केँ। भव्य मुख-मण्डलक, देखनुक, प्रतिभाशाली युवा उपेन्द्र नाथक नीक रिजल्ट सेहो रहलनि सभदिन; स्कूल सँ कॉलेज धरि...तखन एतेक विलम्ब किऐक ? एकर पाछाँ एकटा रहस्यमूलक घटना अछि।

असल मे एहि रहस्यक संबंध अछि हस्तरेखा सँ। रमानाथ बाबू सभ भाए हाथ देखबा मे पारंगत छलाह। राँची मे हुनक भाइ बोध नाथ जी सँ 'व्यास' जीक बड़ घनिष्ठता रहनि। ओ तँ एकदम एक्सपर्ट ! शचीनाथ जी सेहो हस्तरेखाक ज्ञाता छलाह। विशेषज्ञे बुझू ! एक दिन हुनकर तरहत्थी पर अपन तरहत्थी राखि देलथिन 'व्यास' जी। कहलथिन, "हमर हाथ देखू !"

जेना होइत छैक, हाथ देखबैत काल; नौकरी, मान-सम्मान, परीक्षाफल, घर-घराड़ी, यश आ तकर बाद लजाइत-सन 'व्यास' जी पुछलथिन - हमर विवाह ? ... शचीनाथ जी हुनकर दहिना हाथक तरहत्थीक रेखा केँ विभिन्न कोण सँ देखए लगलथिन - एक अंगुरीक दूरी केँ भजियौलनि आ तखन गम्भीर मुखाकृति कएने बाजि उठलाह - व्यास ! अहाँकें दूटा विवाह होएत । 'व्यास' जी सन्न रहि गेलाह । हतप्रभ । विस्मित आ स्तब्ध !

कनि कालक बाद शचीनाथजी केँ अभिरोष भरल मुद्रा मे कहलथिन - "एना नहि भ' सकैत छैक... अहाँ फेर सँ गणना देखिऔक ....फेर सँ गणना करिऔक।"

शचीनाथ जी फेर सँ देखलथिन, फेर सँ गणना कएलनि आ तखन पुनः गम्भीर मुखाकृति कएने बजलाह - "व्यास ! अहाँ कें दू टा विवाह तँ निश्चित होएत !"

तखन 'व्यास' जी एहि दू विवाह सँ बचबाक तोड़ ताकबा‌ पर फोकस कएलनि। शचीमाथ जी सँ पुछलथिन, "बढिञा सँ गणनाक उपरान्त कहू जे हमर पहिल विवाह कोन अवस्था मे होएत ?" शचीनाथ जी पुनः तरहत्थीक रेखा केँ विभिन्न कोण सँ देखए लगलाह । एक अंगुरी आ दोसर अंगुरीक दूरीक गणना कएल आ तखन कहलथिन - "तइसम बरखक अवस्था मे व्यास ! अहाँक पहिल वियाह तइसम बरख मे होएत !"

एहि भविष्यवाणीक प्रभाव 'व्यास' जीक‌ मनःस्थिति पर केहन आ कतेक पड़ल हेतनि, से कहबाक बेगरता नहि।

एकदम बेचैन भ' गेलाह। गंगाकात घुमैत-रहलाह.... एकांत मे...। दिमाग शून्य सन लागए लगलनि .... अन्हार भ' गेलाक बाद, बहुत राति बितलाक बाद 'व्यास' जी होस्टल आपस अएलाह । ओही राति निर्णय लेलनि जे "हम तइसम बरखक अवस्थाक बादे विवाह करब ।"

तइसम समाप्त भ' जाएत तखन पहिल विवाहक कोनो अर्थ नहि रहि जाएत, से सोचि ई निर्णय लेलनि। आ से तइसम बितलाक बादहु, चौबीसम पचीसम मे के कहए उनतीसम बरख मे विवाह कएलनि। बेस ! विवाह भेलनि आ एकटा प्रतिष्ठित घरक खूब बुधियारि, सभ लूड़ि-व्यवहार मे दक्ष, बहुत नीक ज्ञान-बुद्धि सँ युक्त जीवनसंगिनीक पदार्पण भेलनि 'व्यास' जीक जीवन मे। 'देर आए दुरुस्त आए' बला बात चरितार्थ होइत सन प्रतीत भेलैक लोक केँ।

'व्यास' जीक धर्मपत्नीक नाम अमरावती देवी छलनि। पुकारू नाम हीरा दाइ। अथरी (बेलसंड) जिला-सीतामढ़ीक पं. टेकनाथ मिश्रक सुपुत्री। पं. टेकनाथ मिश्र डिस्ट्रिक्ट जजक रुप मे अवकाश ग्रहण कएने छलाह। पहिल मैथिल ब्राह्मण जज छलाह ओ ।

कालक्रमेण 'व्यास' जीक गृहस्थीक गाड़ी रफ्तार पकड़ैत गेलनि। गृहस्थाश्रम नमहर होइत गेलनि। गृहस्थी मे नब-नब सदस्यक आगमन होइत गेलनि। उनतीस जून 1960 ई. धरि 'व्यास' जी पाँच गोट पुत्र आ एक गोट पुत्रीक पिता बनि चुकल छलाह।

दोसर दिस उपेन्द्र नाथ जीक अनुज महेन्द्र नाथ सेहो गृहस्थ जीवन मे प्रवेश कएलथिन। दुनू भाएक धिया-पूता एकतुरिए सन। अनुज महेन्द्र तीन गोट पुत्र आ तीन गोट पुत्रीक पिता बनलाह। दुनू भाएक कुल बारह गोट संतान सभ केँ देखि पितामही आनन्दी देवीक करेजा सूप सन होइत रहैत छलनि। अपन तेरह गोट संतान मे सँ मात्र दू टा बालक उपेन्द्र आ महेन्द्र बचलथिन। से एहि दुनू भाएक संतान सभ सँ भरल घर देखि आनन्दी देवीक आनन्दक पारावार नहि रहनि।

कर्मकाण्डक अनुसरण कएनिहार 'व्यास' जी भोर-साँझ सभ धिया पूता केँ अपना संग बैसाए संस्कृतक श्लोकादिक नियमित पाठ करबैत छलाह। स्वयं सभदिन अनुशासित रहए बला पिता अपन संतान सभ केँ अनुशासनक महत्व, अनुशासनक पाठ पढ़ाएब सभ सँ जरूरी बुझलनि। जे बात नैतिक शिक्षाक पोथी मे पढ़ैत छलहुँ हमसभ, से श्री भवन ('व्यास' जीक पटना स्थित आवास) जाइ तँ प्रत्यक्ष देखबालेल भेटए। प्रातःकाल सूति क' उठितहि सभ धिया-पूता अपन माता-पिताक चरणस्पर्श करथि। फूसि नहि कहब, हमसभ एना कहियो नहि कएलहुँ। बस जाहि दिन कोनो परीक्षा रहैत रहए, ताहि दिन चरणस्पर्श करियनि हमसभ भाए-बहिन अपन माता-पिताक।

ओना अत्यधिक अनुशासन मे राखब धिया-पूताक भीतर एकटा विद्रोही भाव सेहो आनैत छैक। कखनोकाल डॉमिनेटिंग नेचर वा हुनकर श्रेष्ठताक भाव सँ घरक लोक त्रस्त सन अनुभव करैत छलाह। धिया-पूता पर शासन करब सेहो एक सीमे धरि उचित छैक ने ! ओना आबक समय तँ एकदम्मे बदलि गेल अछि, मुदा ताहू दिनक हिसाबेँ किछु बात-व्यवहार खटकए बला होइत रहलनि। कोनहुँ मनुष्य सर्वगुणी होएत वा सभ केँ प्रसन्न राखि लेत, से संभवो नहि छैक। ई एकटा कटु सत्य अछि।

गृहस्थ जीवनक आधार छैक धर्म, अर्थ, काम आ मोक्ष। ई बात बूझल तँ सभकेँ रहैत छैक; मुदा बुझने की....जीवन मे उतारैत छथि बड़ थोड़ लोक। से 'व्यास' जी तेहन गृहस्थ मे सँ छथि, जे धर्मक पालन करैत, धर्मक अनुसरण करैत अर्थोपार्जन कएलनि। धिया-पूता केँ नीक शिक्षा-दीक्षा, नीक संस्कार दैत अपन जिम्मेवारीक निर्वहन कुशलतापूर्वक कएलनि। अपने टा नहि, अनुज महेन्द्र नाथ झाक धिया-पूताक पढाइ-लिखाइ सँ ल' क' विवाह-दान धरि सभटा जिम्मेवारी 'व्यास' जी स्वयं निर्वहन कएलनि। अनमन राजा जनक सन। जहिना राजा जनक दू भाए, तहिना 'व्यास' जी सेहो। बहुत समानता देखाइत अछि जेना। न्यायप्रिय आ धार्मिक शासक जनक केर वास्तविक नाम सीरध्वज छलनि। सीरध्वज आ कुशध्वज दुनू भाए मे चारि गोट कन्या सीता, उर्मिला, मांडवी आ श्रुतकीर्ति। चारूक विवाहक कर्तव्य जहिना राजा जनक निभओने छलाह, तहिना 'व्यास' जी सेहो एकटा अपन आ तीन गोट अनुजक धियाक कन्यादान क' अपन जिम्मेवारीक निर्वहन काएलनि। आ से सहर्ष कएलनि।

कन्यादाने टा नहि, पारिवारिक अन्यान्य काज-प्रयोजनक बात-व्यवस्थाक सभटा भार रहलनि 'व्यास' जी पर। धर्मक बाट धएने, शास्त्र-पुराणक पालन करैत, देवता-पितरक प्रति श्रद्धा ओ सम्मान राखैत ब्राह्मण-भोजन, दानादि सभ किछु बड़ श्रद्धापूर्वक करैत छलाह ओ। यज्ञ, हवनादि मे सम्मिलित होएब, दान-पुण्य करब, माने एकटा गृहस्थ केर जतेक कर्तव्य छैक, से ओ कत्तहु रहलाह तँ तकर पालन कएलनि। राँची, सिन्दरी, गया, कइअक ठाम पोस्टिंग रहलनि। सभठाम सभ तरहक बात-व्यवस्था क' लैत छलाह।

पारिवारिक संग सामाजिक जिम्मेवारी सेहो कुशलतापूर्वक निभाबैत अपना संग-संग अपन कुल-खानदान केर मान-प्रतिष्ठा बढ़ौलनि। कत्तहु रहलाह, अपन परिवारक अतिरिक्त पाँच-सात गोटे तँ सभदिन रहिते टा छलनि डेरा पर। केओ पढ़बाले माने विद्यार्थी सभ, केओ डागदर-वैद्यक फेरा मे रहल, केओ कोनो कार्यालयी काज सँ। आ ताहि पर सँ अतिथिक अवरजात। अतिथिक सम्मान आ स्वागत लेल जतबा 'व्यास' जी तत्पर रहैत छलाह ताहि सँ बेसी जीवनसंगिनी अमरावती देवी। पतिक मान-प्रतिष्ठाक ध्यान राखब पत्नीक धर्म छैक, से हुनका खूब नीक जकाँ बूझल छलनि। डिग्री भले ही बड़का-बड़का नहि छलनि, मुदा व्यावहारिक ज्ञान अद्भुत !

सेवा निवृत्तिक उपरान्त धर्म-कर्म, पूजा पाठ आरो बढ़ि गेल छलनि 'व्यास' जीक। मोक्षमार्ग पर चलबाक प्रयास रहल हेतनि प्रायः।ज्ञानक भंडार तँ छलनिहेँ। पौराणिक ग्रन्थ सभ तँ बाल्यकालहि सँ पढ़ैत रहल छलाह। हुनका नीक जकाँ बूझल छलनि जे ज्ञान आ कर्मक माध्यम सँ मोक्ष प्राप्तिक बाट खूजत। योग सेहो एहि प्रक्रियाक एकटा घटक अछि, सेहो बूझल छलनि। तँ से धर्म, कर्म, योग, अभ्यास सभ किछु हुनकर दिनचर्या मे सम्मिलित रहलनि, आजीवन।

'व्यास' जी सात्विक विचारधाराक लोक छलाह, से हुनकर सान्निध्य मे रहनिहार लोकसभ एहि बात सँ अनभिज्ञ नहि हेताह। सात्विक आहार-विहार-आचरण हुनकर व्यक्तित्व केँ एकटा विशिष्ट "औरा" प्रदान करैत छलनि, ई बात कतेको गोटेक मुहेँ सुनल अछि हमरा। आ से ई सात्विक आहारक परम्परा श्री भवन मे कायम रहल सभदिन।

सफल गृहस्थ जीवन जीबैत, पारिवारिक-सामाजिक सभ तरहक दायित्व केर सफलतापूर्वक निर्वहन करैत, मातृभाषाक भंडार केँ समय-समय पर अपन लेखनी सँ सम्पुष्ट करैत रहलाह 'व्यास' जी। ई बहुत पैघ उपलब्धि कहल जाएत, हमरा हिसाब सँ।
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
२.२.परमानन्द लाल कर्ण-तीर्थक्षेत्रक माहात्म्य-५
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।
२.३.प्रणव झा-परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय के प्रदर्शनी
प्रणव कुमार झा
परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय के प्रदर्शनी
वर्तमान युग आ आबय बला युग ऊर्जा, डिजिटल, क्वान्टम, नैनोचिप आदि के उपयोग आ उपभोग से भरल युग अछि। अतः ऐ के लेल नाभिकीय क्षेत्र मे उपभुक्त पदार्थ आ दुर्लभ अर्थ माटेरियल के शोध एवं अन्वेषन एकटा महत्वपूर्ण पहलू छैक। ऐ संदर्भ मे फरवरी के महीना मे हमरा एकटा रुचिगर अनुभव प्राप्त भेल । एकटा सम्मेलन मे जयपुर जेबाक अवसर भेटल, जे अपन ऐतिहासिक धरोहर आओर गुलाबी नगरी के नाम स जानल जाय अछि। जयपुर कन्वेंशन सेंटर में आयोजित एकटा प्रदर्शनी में हमरा परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय (Atomic Minerals Directorate for Exploration and Research - AMD) के कार्य के लग से देखबाक अवसर भेटल। ई प्रदर्शनी नै खाली खनिज आओर ओकर अन्वेषण के तकनीकी दुनिया से लोक के परिचय करा रहल छल, बल्कि इहो याद दिया रहल छल जे विज्ञान आओर मानव जिज्ञासा मिलिकऽ प्रकृति के रहस्य के उजागर करैत अछि आ कोना मनुष अपन सभ प्रकार के आवश्यकता के पूर्ति कोनो ने कोनो रुपे प्रकृति से कऽ रहल अछि। ई यात्रा वृत्तांत ओहि याद के समेटने अछि, जाहि में हम खनिज के सैंपल, ओकर उद्गम स्थल, अन्वेषण विधि आओर संस्था के संगठनात्मक ढांचा के बारे में जानलहुँ, आओर ई सेहो महसूस कएलहुँ जे एहन प्रदर्शनी युवा पीढ़ी में वैज्ञानिक चेतना के जागृत करबाक में प्रभावशाली भऽ सकैत अछि।
बसंत ऋतुक रमनगर बसात आओर सूरजक हल्लुक रौदक बीच ई विशाल आयोजन स्थल लोक के चहल-पहल से भरल छल। आयोजन स्थल पर बहुते रास संस्थान सबहक प्रदर्शनी लागल छल। एक एक कऽ के ओय प्रदर्शनी के देखईत हम एकटा संस्थान के प्रदर्शनी स्थल पर पहुंचलहु जेकर द्वार पर लागल बैनर पर लिखल छल - "परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय: जो ढूँढते हैं - वही पाते हैं"। ई पढ़िते हमर मन में उत्सुकता जागल जे कनी ऐ संस्था आ प्रदर्शनी मे लगाओल सैंपल सबहक विषय मे किछु जानल जाय।
अंदर एकटा व्यवस्थित प्रदर्शनी लागल छल। स्टॉल के कतार में चमकैत खनिज सैंपल, रंग-बिरंग चार्ट, मॉडल आदि के माध्यम से जानकारी देल जा रहल छल। ओतुक्का 2-3 टा युवा वैज्ञानिक के टीम उत्साह के साथ आगंतुक के स्वागत कऽ रहल छल। एकटा युवा वैज्ञानिक मुस्कुराइत हमरा अभिवादन केलाह। हमहू प्रतिउत्तर मे अभिवादन करैत कहलहु जे हम प्रदर्शनी मे लगाओल गेल सैंपल आ संस्थान के काज के विषय मे जिज्ञासा राखै छी। कि ओ हमरा ऐ सभ विषय मे किछु संक्षिप्त जानकारी दऽ सकय छैथ?
ओ हामी भरइत सर्वप्रथम संस्था के बारे में बतौलनि। परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय, जे संक्षेप में AMD(पखनि) कहल जाइत अछि, भारत सरकार के परमाणु ऊर्जा विभाग (Department of Atomic Energy - DAE) के अंतर्गत कार्यरत एकटा प्रमुख संगठन अछि। एकर स्थापना 1948 में भेल छल, जखन एकरा 'रेयर मिनरल्स सर्वे यूनिट' के नाम से जानल जाइत छल। समय के साथ एकर नाम आओर स्वरूप बदलैत गेल, आओर 1998 में एकरा वर्तमान नाम भेटल। एकर मुख्यालय हैदराबाद में अछि, आओर देशभर में एकर सात क्षेत्रीय केंद्र अछि, जै में जयपुर सेहो सम्मिलित अछि।
AMD के मुख्य उद्देश्य परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लेल आवश्यक खनिज, विशेष रूप से यूरेनियम आओर थोरियम, के खोज आओर अन्वेषण करब अछि। वैज्ञानिक जी बतेला जे ई संस्था नै खाली खनिज के खोज करैत अछि, बल्कि ओकर भूगर्भीय अध्ययन, विश्लेषण आओर उपयोगिता के समझबा में सेहो महत्वपूर्ण योगदान दैत अछि। संगठन के ढांचा बहु-आयामी अछि, जै में भूवैज्ञानिक, भू-भौतिकी विशेषज्ञ, रसायनज्ञ, इंजीनियर आओर ड्रिलिंग विशेषज्ञ के टीम शामिल अछि। ई सभ मिलिकऽ देश के विभिन्न हिस्सा में खनिज भंडार के पहचान आओर ओकर दोहन के प्रक्रिया मे लागल अछि अछि।
खनिज सैंपल के संग्रह प्रदर्शनी के आकर्षक हिस्सा छल। कांच के डिब्बा में विभिन्न रंग आओर आकार के खनिज सबहक सैंपल रखल छल ।वैज्ञानिक जी हमरा बतौलनि जे एकरा में से कै टा सैंपल राजस्थान के विभिन्न खदान से निकालल गेल छल, जे ई क्षेत्र के समृद्ध भूगर्भीय विरासत के दर्शबैत अछि। संगे मे एकटा यंत्र सेहो राखल छल जे रेडियोएक्टिविटी के मात्र मे मापय छल। ऐ ठाम बतबैत चली से काँच रेडियोएक्टिविटी के poor conductor होइत छैक ताहि से रेडियो एक्टिव पदार्थ सभ के सुरक्षा के दृष्टि से एहने कुचालक काँच के अंदर रखल जाय छैक। हमरा आग्रह पर ओ कनी काल लेल यूरेनियम खनिज सैंपल के काँच के बाहर केलाह त देखल जे यंत्र के रीडिंग भागय लगल। ओ हमरा एक-एक कऽ के ई सैंपल के विषय मे संक्षिप्त मे बतौलनि।
लेपिडोलाइट: ई हल्का बैंगनी रंग के चमकैत खनिज छल, जे राजस्थान के भीलवाड़ा जिला से लाओल गेल छल।वैज्ञानिक जी बतौलनि जे लेपिडोलाइट में लिथियम के नीक मात्रा होइत अछि, जे आधुनिक बैटरी उद्योग, विशेष रूप से इलेक्ट्रिक वाहन के लेल अत्यंत महत्वपूर्ण अछि। एकर परतदार संरचना आओर चमक एकरा अनोखा बनबैत अछि।
फ्लोराइट: ई उदयपुर के नजदीक के खदान से प्राप्त भेल छल। एकर पारदर्शी आओर चट्टानी रूप आकर्षक छलैक।हमरा बताओल गेल जे फ्लोराइट के उपयोग औद्योगिक प्रयोजन, जेना एल्यूमीनियम उत्पादन आओर डेंटल उत्पाद में, होइत अछि।
पिंचब्लेंड: पिचब्लेंड यूरेनियम केरऽ प्राथमिक अयस्क छेक । ई रेडियोधर्मी खनिज छै आ एकरा यूरेनिनाइट के नाम से सेहो जानल जाय छैक । पिचब्लेंड केरऽ रंग कारी होय छै आ एकरा म॑ यूरेनियम ऑक्साइड पाओल जाय छैक ।
� सेकेंडरी यूरेनियम खनिज: सेकेंडरी यूरेनियम खनिज ओ खनिज छै जे प्राथमिक यूरेनियम खनिज के कटाव या परिवर्तन सं बनैत छै। ई सैंपल झुंझुनू जिला के एकटा खादान से प्राप्त भेल सैंपल छल। वैज्ञानिक जी बतौलनि जे ई यूरेनियम के एकटा रूप अछि जे सतही जल के संपर्क में अबिते परिवर्तनशील रूप में परिवर्तित भऽ जाइत अछि। शोध मे एकर उपयोग छैक। कोनो खादान मे एकर सैंपल भेलटा पर ओय क्षेत्र मे यूरेनियम खनिज भेटबाक संभावना प्रस्फुटित होइत छैक। ई भारतक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम लेल आवश्यक स्रोत सभ में सँ एक अछि।
� थोराइट: थोरियम-समृद्ध ई खनिज माउंट आबू के क्षेत्र से प्राप्त भेल छल। एकर काला आ चमकदार रूप अत्यंत आकर्षक छल। थोरियम भविष्य में परमाणु ऊर्जा उत्पादन में वैकल्पिक स्रोत के रूप में उपयोग कएल जा सकैत अछि। AMD एकरा पर सेहो गहन अनुसंधान कऽ रहल अछि।
� डेविडाइट: ई कारी-भूरा रंगक भारी खनिज छल, जे बांसवाड़ा इलाकासँ आनल गेल छल । एकरा मे यूरेनियम के संग-संग टाइटेनियम सेहो भेटय छैक, जेकरा चलतें ई औद्योगिक आ वैज्ञानिक अनुसंधान लेल उपयोगी होइत छैक ।
� ग्रेफाइट शिस्ट: ई चमकैत कारी रंगक छल आ उदयपुरक खदानसँ निकालल गेल छल । जखन हम ओकरा छुलहुँ तऽ स्पर्श मे चिक्कन छल । ग्रेफाइट कें उपयोग पेंसिल, बैटरी आ चिकनाई उद्योग मे कैल जायत छै। एकर परतदार संरचना देखि हम प्रभावित भेलहुं।
� गार्नेट: ई लाल-भूरा रंगक नमूना अजमेर इलाकाक छल । गार्नेट के उपयोग गहना में सजावट के लेल आ घर्षण सामग्री के रूप में कयल जाइत अछि |
� मोनाजाइट: ई पीयर-भूरा रंगक बालु के रूप में छल, जे राजस्थान के किछु सीमांत क्षेत्र सं लेल गेल छल। ऐ मे थोरियम छै, जे भविष्य केरऽ परमाणु ऊर्जा केरऽ संभावित स्रोत छै ।
� अन्य दुर्लभ रेत: एहि मे जिरकोन आ इलमेनाइट सन खनिज शामिल छल जे राजस्थानक खनिज समृद्ध इलाका स आयल छल। गहना में जिरकोन आ टाइटेनियम डाइऑक्साइड के उत्पादन में इलमेनाइट के प्रयोग होइत अछि |
हम जखन यूरेनियम के प्राथमिक अयस्क से यूरेनियम के उत्पादन के बाद एकर रुपया के स्वरूप मे मूल्य पुछलहु त वैज्ञानिकजी मुस्कियाइत बजलाह जे अहाँ जानिते हेबय जे एखन भारत यूरेनियम के लेल अधिकांशतः आयात पर निर्भर छैक। ई ऊर्जा आ सामरिक रुपे एकटा अति महत्वपूर्ण पदार्थ थीक। ताहि दुआरे पाई से अधिक महत्वपूर्ण अछि उपलब्धता। मानि लेल जाय जे कोनो जियोपोलिटिकल कारण से देश मे यूरेनियम आयात बंद भऽ जाय तखन की होय। ताहि दुआरे हमर संस्थान के प्रमुख लक्ष्य छैक देश के विभिन्न भूगर्भिय भाग मे एकर अन्वेषण।
खनिज केर पहचान प्रक्रिया
आगा वैज्ञानिक जी खनिज सैंपल के परख करबाक वैज्ञानिक तरीका बतौलनि। ओ कहलक जे खनिज केर पहचान केवल ओकर रंग या बनावट से नहि होइत अछि, बल्कि ओकर घनत्व, रेडियोधर्मिता, क्रिस्टल संरचना आ रासायनिक गुण के जाँच सेहो करल जाइत अछि। स्टॉल पर एकटा छोट जिओलॉजिकल किट छल जेकरा में मैग्नेट, लघु रेडिएशन डिटेक्टर, लुइप (लेंस), आ टेस्टिंग केमिकल्स छल। हमरे सामने ओ एकटा छोट सैंपल पर रेडियोधर्मिता मीटर लगेलनि, जे तुरत बीप देलक - ई देखिकऽ हम बहुत रोमांचित भऽ गेलहुँ। वैज्ञानिक जी कहला-ई खनिज रेडियोधर्मी अछि, आ एहि कारण एकर उपयोग आ निष्कासन के समय विशेष सुरक्षा अपनाओल जाइत अछि।
संस्थान के संगठनात्मक ढाँचा
आगा हमरा बताओल गेल जे AMD के मुख्यालय हैदराबाद में अछि, आओर देशभर में एकर सात टा क्षेत्रीय केंद्र कार्यरत अछि- जयपुर, नागपुर, बैंगलोर, शिलॉंग, जमशेदपुर, लखनऊ आ हैदराबाद। प्रत्येक केंद्र अपन-अपन क्षेत्र के भूगर्भीय स्थिति के अनुसार कार्य करैत अछि। संस्था में सैकड़ों वैज्ञानिक, तकनीशियन आ इंजीनियर कार्यरत छैथ। भूगर्भ वैज्ञानिक (Geologists) चट्टान आ खनिज के बनावट के अध्ययन करैत छैथ, भूभौतिकी विशेषज्ञ (Geophysicists) पृथ्वी के अंदर के संरचना के पता लगबैत छैथ, आ रसायनज्ञ खनिज के रासायनिक गुण के विश्लेषण करैत छैथ। ई सब मिलिकय संयुक्त टीम बना कऽ खनिज के खोज, विश्लेषण, आ रिपोर्टिंग करैत छैथ।
ड्रिलिंग आ अन्वेषण के तकनीक
आगा एकटा छोट, पारदर्शी एक्रेलिक मॉडल के माध्यम से ई देखावल जा रहल छल जे कोना गहराई में ड्रिलिंग कऽ कऽ खनिज निकालल जाइत अछि। ड्रिलिंग एकटा अत्यंत कठिन आ खर्चीला प्रक्रिया होइत अछि, लेकिन AMD अत्याधुनिक मशीनरी आ GPS आधारित तकनीक के प्रयोग करैत अछि, जै सँ गहराई तक सटीकता से खनिज के उपस्थिति के पता लगाओल जाइत अछि।
हमरा बताओल गेल जे अन्वेषण के लेल 300 सँ 800 मीटर धरि ड्रिलिंग करय पड़ैत अछि। एकरा लेल योजना, अनुमति, संसाधन आ टीमवर्क के जबरदस्त समन्वय चाही।
यूरेनियम अन्वेषण चरण: चार्ट के माध्यम से समझ
प्रदर्शनी मे एकटा चार्ट सेहो लागल छल (संलग्न फोटो देखू) जै मे यूरेनियम केर खोज के प्रक्रिया के देखायल गेल छल । ओ हमरा बुझेबाक लेल कहलनि जे यूरेनियम के खोज ई सब चरण में होयत छैक:

Suggested citation: प्रणव झा. “परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय के प्रदर्शनी (पृष्ठ १८-२९).” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 416, 2025-04-15. https://www.videha.co.in/research/2025/416/परमाणु-खनिज-अन्वेषण-एवं-अनुसंधान-निदेशालय-के-प्रदर्शनी-पृष्ठ-१८-२९.htm

मूल विदेह अंक / Original issue