मिथिलाक सरल संस्कृति ओ अग्रगामी परम्पराक सुच्चा संवाहक : 'व्यास' जी
रिटायरमेंट काल 'चीफ इंजीनियर' छलाह 'व्यास' जी। माने सरकारी विभाग मे एकटा उच्च पदस्थ अधिकारी। इंजीनियर सँ चीफ इंजीनियर धरि पहुँचैत, सभ दिन सभ तरहक सरकारी सुविधा सँ लैस रहलाह अपन कार्यकाल मे। गाड़ी-घोड़ा सँ ल' क' चौबीस घंटा जी-हजूरी मे लागल स्टाफ पर्यन्त। मुदा एतेक सुविधा-सम्पन्न जीवन रहितो पैर सदिखन धरती पर रहलनि। आ से तेहन जबरदस्त तरीका सँ पैर रोपने रहलाह धरती पर जे दुनियाँ क्षुब्ध रहि जाए हुनकर अपन परम्परा केँ गसिया क' धएने रहबाक 'ऐटिट्यूड' देखि। जतए कत्तहु पोस्टिंग रहलनि; सभ ठाम ओ अपन पारम्परिक खान-पान सँ ल' क' पारम्परिक पहिरन-ओढ़न, पाबनि-तिहार, विध-व्यवहार, गीत-नाद, सभ किछु अपनौने रहलाह। संगहि अपन हीत-मीत केँ सेहो प्रेरित करैत रहलाह; अपन सभ्यता-संस्कृति-परम्परा केँ अक्षुण्ण राखबा लेल। राँची रहथि, कि गया, आ कि मुजफ्फरपुर-पटना, सभ ठाम एकटा छोट की पैघ; जेहन संभव रहलनि तेहन, अप्पन मैथिल समाज बना लेल करथि 'व्यास' जी। पाबनि-तिहार सँ ल' क' अनदिनाँ सेहो; ई मैथिल समाज सभ ठाम हिनकर संग पूरैत रहलनि। चाह-पानक दौर चलैत रहैत छल आ ताहि संग गप्पक दौर सहजहि। चाहे ओ सरकारी क्वार्टर मे रहलाह किंवा अपन पटना स्थित आवास 'श्री भवन' मे। पटनाक रौनक तँ किछु-किछु हमरा अपनहुँ देखल-सुनल अछि। जएह कहियो काल एनाइ-गेनाइ रहल; ताही क्रम मे। 'व्यास' जीक देहावसानक उपरान्त जेना ओहि घरक 'श्री' बिला गेल कतहु....। एकदम सुन्न-मसान ! रोग-क्लेश-दु:खक प्रकोप बढ़ए लागल आस्ते आस्ते। नानी अमरावती देवी 'व्यास' जीक देहावसानक सात बरख उपरान्तहु रहलीह मुदा 'ओ' रौनक नहि रहल कत्तहु ! एक्कहु रत्ती नहि रहल !
अप्पन मिथिलाक संस्कृति, अप्पन परम्परा बड़ विशिष्ट रहल अछि। ओना संसारक सभ समाजक रहन-सहनक अपन-अपन विशेष तौर-तरीका रहिते आएल छैक सभ दिन सँ। आ इएह विशेष तौर-तरीका समाजक लोक केँ एक संग बान्हि क' राखैत रहल अछि। ई परम्परा गतिशील होइत अछि, माने समयक संग बदलैत रहल अछि।
कोनो समाजक सभ्यता-संस्कृति एकटा जटिल प्रणालीए सन बुझू ! कोनो समाजक, हरेक सदस्य एक-दोसराक संग ज्ञान, विश्वास, कला, इत्यादि सभ किछु समान रूपेँ दीर्घकाल सँ साझा करैत रहल होइथ; आ तकरा वर्तमान पीढ़ी फॉलो करैत अगिला पीढ़ी धरि ट्रांसफर करथि, इएह भेल संस्कृतिक महत्व ! एही तरहेँ कोनो समाजक संस्कृति अक्षुण्ण राखल जाइत रहल अछि; समाजक एक-एक इकाइ द्वारा। आ एही तरहेँ समाजेक लोक सभक बनाओल; वंशानुगत आबि रहल अप्पन नियम-कानून, नैतिकता, रीति-रिवाज, आ अन्यान्य सीखल व्यवहार सभ, समाजक हरेक व्यक्ति केँ एक-दोसरा सँ जोड़बाक काज करैत रहल अछि अदौ काल सँ। माने इएह ओ प्रणाली अछि, जे कोनो समाजक लोक केँ एक संग बान्हबाक काज करैत अछि। आ सएह लोक केँ लोक सँ बान्हबाक काज 'व्यास' जी आजीवन करैत रहलाह। व्यावहारिक रूपेँ दिनानुदिनक गतिविधिक माध्यम सँ सेहो आ अपन लेखनीक माध्यम सँ सेहो।
आ परम्पराक गप्प करी तँ लौकिक आ वैदिक, दुनू परम्पराक समान रूप सँ निर्वहन करैत आएल अछि मैथिल समाज। ओना मूलतः लौकिक परम्पराक अनुसरण करैत जीवन जीबैत अछि लोक। लोक द्वारा बनाओल तौर-तरीकाक अनुसरण करबाक परम्परा रहल अछि अपन मिथिला मे। वैदिक परम्परा पूजा-पाठ-यज्ञादिक निर्वहन लेल काज आबैत छैक। आबक अत्याधुनिकताक चपेट मे आएल मैथिल समाज भले ही सभ तौर-तरीकाक 'ऐसी-तैसी' क' रहलाह...खैर...एकर दुष्परिणाम आगाँ देखा पड़तनि आधुनिक लोक सभ केँ। "अपन महीस कुड़हरिए नाथब, ताहि सँ मतलब अनका की" बला पड़ि छनि युवा पीढ़ीक। जे-से । हमरा की ! हम किछु कइए नहि सकैत छी, तँ किएक सोची किछुओ। आब बसात बेरोकटोक सन बहए लागल अछि।
विषयान्तर होएबा सँ बचैत गप्प अपन परम्पराक। कोनो समाजक एकटा अपन प्रचलित स्टाइल होइत छैक; जीवन जीबाक; माने खान-पान, पहिरन-ओढ़न, हंँसब-बाजब, नाचब-गाएब, उत्सव मनाएब, सभ किछु अप्पन तरीकाक। इएह भेल लौकिक परम्परा। इएह परम्परा हमरा सभ केँ अपन पूर्वज सभक जीवनशैली, मान्यता आ हुनकर सिद्धान्त सँ जोड़ि क' राखैत अछि; आजीवन। इएह परम्परा हमर सभक अपन एकटा विशिष्ट पहचान सेहो दैत अछि देस-विदेस मे। संगहि अपन जन्मभूमि सँ एकटा विशेष भावनात्मक जुड़ाव केर अनुभव करैत अछि कोनो क्षेत्र विशेषक बच्चा-बच्चा।
जेना मिथिलाक खान-पानक गप्प करी तँ एकटा अलगे वैशिष्ट्य रहल छैक एकर। अपन मिथिलाक अनेक तरहक भोजन-विन्यास मतलब 'रेसिपी' एहन अछि जे अन्यत्र नहि बनैत होएत। जेना मिथिलाक तिलकोरक तरुआ, पथरचूरक, फूलक तरुआ ! ओलक सन्ना, अरिकोंचक तीमन, रंग-रंगक माछक प्रकार...!
आ भोजनक विन्यासी 'व्यास' जी सन भेटब कठिन। बड़ सौखीन ! एकादशीक व्रत करथि तँ मखानक खीर भेले ताकए। घी मे भूजल अल्लूक चरिफक्का आ ताहि पर सँ काँच केरा उसिनि-सन्ना बनाए घी मे सेकल ओकर छोटे-छोटे सोहारी कि परठा जे बुझी, से बनले ताकए। अनूना दिन क' सेबइक खीर, अनून भुजिया, पछुआ-पू , ई सभटा 'व्यास' जीक फरमाइसी भोज्य पदार्थक व्यवस्था होइते टा छलनि।
एकर अतिरिक्त सुआद ओ शुद्धताक तेहन पारखी जे सभटा मसल्ला टटके पिसाइत छलए तरकारी तीमन लेल, सभदिनाँ। सिलौट-लोढ़ा पर हरदि, धनी, मिरचाइ, जीर-मरीच सभ किछु सभ दिन टटका-टटकी पिसाइत छलए आ तरकारी सभ मे पड़ैत छलए। जखन पिसलाहा पाउडर बला मसल्लाक चलती भ' गेल छलए, तखनो धरि 'श्री भवन'क परम्परा चलैत रहलैक सिलौट-लोढ़ा पर पीसल मसल्ला बला तरकारी बनबाक।
तहिना अदौड़ीए बनए तँ तीन रंगक। अगबे उड़ीद दालि बला। उड़ीद आ मसुरी दालि फेंटि क' आ उड़ीद, मसुरी, बूटक दालि, केराउ, सभ किछु फेंटल बला अदौड़ी सेहो बनबाबथि नानी, ई कहि जे हुनका पसिन छनि। अदौड़ीक अलावा कुम्हरौरी, चरौरी, दनौरी, मुरौरी, बिड़ियाक सौखीन। खेबाक खूब सौखीन छलाह 'व्यास' जी। मुदा अनुशासित रहैत खाएब जानैत छलाह। असमय वा बेहिसाब बला बात नहि।
मिथिलाक पहिरन-ओढ़न सेहो शिरोधार्य रहलनि सभदिन 'व्यास' जी केँ। पहिरन-ओढ़न केर सेहो अपन अलगे विशिष्टता रहल अछि मैथिल समाजक। धोती कुर्ता, पाग-दोपटा भद्र पुरुषक पहिरन रहल अछि अपन मिथिला मे। स्त्रीगणक लेल घोघ-मरौतक परम्परा। सीधा पल्ला लेब। ई सभटा 'श्री भवन' मे 'फॉलो' कएल जाइत रहल 'व्यास' जीक जीवन काल धरि। घर मे तँ जानिए क' ओहि घरक पुतहु सभ केँ माथ उघारि घर सँ बहरएबाक सहास नहि छलनि। राजधानी पटनाक बोरिंग रोड चौराहा सन 'पॉश' इलाका मे एकटा मिनी मिथिला बसल छलए जेना। मुदा जेना कि पहिनहुँ कहि चुकल छी, परम्परा गतिशील होइत अछि, माने समयक संग बदलैत रहल अछि। तँ से फेर समयक संग अपन पोती सभ लेल समयानुकूल ओतेक बदलाव स्वयं केर सोच मे, अनुशासन मे आनैत देखएलाह 'व्यास' जी।
कलाक गप्प करी तँ सभ लूड़ि मे दक्ष जहिना 'व्यास' जीक माए आनन्दी देवी छलथिन; तहिना पत्नी अमरावती देवी। पूजा-पाठ, विवाह-दानक अवसर पर अरिपन देबाक लूड़ि हुअए किंवा पुरहर-पातिल रांगब ढौरब, सीकी-मौनी बूनब, स्वेटर बूनब, सिलाइ करब पर्यन्त, अमोट-अचार बनाएब, सभ किछु केर टेक कायम रखलनि ओहि घरक स्त्रीगण सभ। परम्पराक संवाहक मूल रूप सँ स्त्रीगणे होइतो छथि ओना। मुदा घरक पुरुख जँ इंटरेस्ट देखाबथि सभ पारम्परिक गतिविधि मे तँ स्त्रीगण आरो उत्साहक संग काज करैत छथि; से धरि निश्चित बात !
से तहिना 'व्यास' जी गीत-संगीत मे सेहो बेस रुचि रखनिहार लोक। पारम्परिक गीत-नाद बड़ प्रेम सँ सुनथि। आ ई गुण हम मामा सभ मे सेहो देखने छी। कहियो कोनो काज मे प्राती वा बटगबनी सन कोनो गीतक भास आ गीतक बोल पर चर्चा करैत देखल-सुनल अछि हमरा। मतलब अपन पारम्परिक गीतक महत्व केँ बूझब/अकानब ओहि घरक परम्परा रहल छैक।
एकटा सामान्य सनातन मैथिल जकाँ 'व्यास' जी सेहो पंचदेवोपासक छलाह। शक्तिक उपासक तँ छलथिहे, संगहि महादेव, विष्णु, गणेश आ सूर्यक उपासना सेहो बड़ श्रद्धापूर्वक करैत छलाह। दुर्गा-पूजा मे दुर्गा सप्तशतीक तेरहो अध्याय-पाठ करब, भगवतीक आराधना करब, कुमारि भोजन, हवनादि करब, संगहि चौबीसो एकादशीक व्रत, बारह टा चतुर्दशी, छओ मासक रवि केर अनूना-एकसंझा सभ किछु ठानल छलनि/करैत रहलाह बहुत दिन धरि। चौठचन्द्र पाबनि आ अनन्त चतुर्दशीक अवसर पर खूब उत्साहपूर्वक बृहत पूजाक आयोजन होइत छलए 'श्री भवन' मे। कहबाक माने आजीवन कर्मकाण्डक पक्षधर रहलाह 'व्यास' जी।
घोर कर्मकाण्डी होएब आ संगहि आधुनिकताक पक्षधर होएब, विरोधाभासी बात बुझाइत अछि ओना; मुदा ई यथार्थ अछि 'व्यास' जीक संदर्भ मे। एहने छलाह 'व्यास' जी। हुनकर सोच 'प्रोग्रेसिव' छलनि। माने समय संँ पाछाँ धकेलबाक प्रयास कहियो नहि कएलनि धिया-पूता केँ। स्वेच्छा सँ जकरा जाहि क्षेत्र मे जेबाक छलैक; से जाइत गेलनि। एकटा छोट सन प्रसंग सँ स्पष्ट करब एहि बात केँ हम। नब्बेक दशकक ई गप्प होएत प्राय: जखन दुनू छोटका बालक माने चारिम आ पाँचम नंबर मामा (मोहन जी आ सोहन जी) राति मे कनि अबेर सँ घर अएलाह तँ पिता पुछलथिन , "एतेक राति धरि कहाँ छलहुँ ?"
उतारा भेटलनि, "ओ एकटा अंग्रेजी सिनेमाक बड़ चर्चा सुनि रहल छलियैक...सएह देखए लेल गेल छलहुँहेँ..!"
----"बेस ! घर मे ककरो कहि क' जेबाक चाही छलए ने..?"
बालकद्वय मूड़ी गोँतने ठाढ़ ! आब जोर सँ दबारताह पिता; ताहि आशंकाक संग।
मुदा पिता सँ डाँट-फटकार नहि भेटलनि। उन्टे पूछल गेलनि, "केहन लागल सिनेमा ?"
बालकद्वय द्वारा सिनेमाक 'रिव्यू' संतोषजनक भेटलनि। पिता आदेश देलथिन, "हमरा लेल कल्हुका टिकट ल' लेब। हमरा देखबाक अछि, आखिर एहन की नीक लागल अहाँ लोकनि केँ।"
सएह भेल। अगिला दिन 'व्यास' जी ओ सिनेमा जा क' देखि अएलाह। सिनेमाक नाम विस्मृत भ' रहल अछि एखन हमरा।
कोन बएस मे पुत्रक संग कड़ाइ करब आवश्यक आ कोन बएसक पुत्रक संग मित्रवत व्यवहार करबाक चाही, से हुनका खूब नीक जकाँ बूझल छलनि। 'व्यास' जीक व्यवहार उक्त प्रसंग मे देखि ई स्पष्ट अछि। 'पिता'क रूप मे हुनकर ई व्यवहार अनुकरणीय अछि। आदर्श पुत्र, आदर्श पति आ आदर्श पिताक संग समाजक सोझाँ सेहो सभदिन, सभठाम आदर्शे प्रस्तुत करैत रहलाह 'व्यास' जी।
'व्यास' जी केँ अपन संस्कृति, सनातन धर्म, देवता-पितर, कौलिक परम्परा आदि पर पूर्ण निष्ठा छलनि। हुनकर जीवन पर हुनक नानाक अप्रत्यक्ष प्रभाव रहल छलनि। नाना बड़ पैघ तांत्रिक छलथिन। डोकहर मे तपस्या करैत रहथिन। अन्तर मात्र एतबे छलनि, जे 'व्यास' जीक नाना अपन तपस्या सँ प्राप्त शक्तिक प्रयोग प्रेतक उपद्रव केर शमन करबा मे करैत छलाह आ दोसर दिशि 'व्यास' जी सभ दिन दोसरे तरहक तपस्या मे लागल रहलाह। देवता-पितर केँ गोहराबैत माँ मैथिलीक तपस्या मे लीन। यश-अपयश, निन्दा-प्रशंसा सँ उपर साहित्य-साधना मे निमग्न 'व्यास' जी ! समाज मे आदर्श स्थापित करबाक प्रयास करैत 'व्यास' जी!
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
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