समाज सुधारक नहि समाज उद्धारक : 'व्यास' जी
समय ठीके कतेक बदलि गेलैए ने...आइ मोने-मोन इएह बड़बड़ाइत लिखब शुरु कएलहुँ अछि। दिमाग मे चलि रहल अछि ओ खिस्सा सभ, जे कोना 'व्यास' जी तन-मन-धन सँ 'बख्शी टोलक' लोक लेल तत्पर रहैत छलाह। माने हरिपुर 'बख्शी टोल' मे जनमल एकटा बालक उपेन्द्र नाथक इंजीनियर बनब भरि गामक लोक लेल वरदान सन भ' गेल रहैक। भरि गामक लोक लेल जीबाक उपाए भ' गेलैक जेना। ओहि गाम सँ दुःख दारिद्रक उन्मूलन भ' गेलैक। आब ने ओ ठाम, ने ओ कड़ाह....आब कोनो आइ ए एस ऑफिसरो प्राय: ओतेक परोपकार करबाक ने सोचि सकैए आ ने संभवे छैक। पहिने स्कोप सेहो पूरा छलैक। कम्मो पढ़ल-लिखल लोक केँ अपन विभाग पी एच ई डी मे घुसिया देलथिन। बख्शी टोलक किन्साइते कोनो घर बाँचल होएत, जाहि घर मे पी एच ई डी मे कार्यरत कर्मचारी नहि छल होएत।
ताहि दिन गरीबीओ तहिना छलैक। कतेको घर एहन छलैक जाहि घर मे ने खेत-पथार पर्याप्त छलैक आ ने रोजगारक अन्य कोनो उपाए। ताहि तरहक परिवार लेल 'व्यास' जी साक्षात भगवाने छलथिन। अवतारी पुरुष जकाँ भरि गामक उद्धार करबा लेल जेना धरती पर आएल होइथ।
धार-पोखरि-इनारक भरोसे जीबैत गामक लोक लेल डेग-डेग पर चापाकल गड़बा देलथिन। से मात्र अप्पन गाम हरिपुर 'बख्शी' टोले टा मे नहि। अपन मिथिलाक अन्यान्य गाम, जतए-जहिया जे सर-कुटुम्ब इच्छा व्यक्त कएलथिन "एकटा चापाकल हमरा दरबज्जा पर भ' जइतैक" बस...मुँह सँ खसबाक देरी रहैक....हुनकर इच्छा पूर्ति हेतु 'व्यास' जी तत्पर। भले ही सरकारीए खर्च पर काज होइत छलैक, मुदा प्रयास तँ करइए पड़ैत छलनि।
कतेको लोकक कन्यादान मे आर्थिक सहयोग करब। ककरो बालकक यज्ञोपवीत संस्कार लेल यथासाध्य आर्थिक सहयोग करब, एहि सभ बातक तँ चर्चे की कएल जाए।
मोन पड़ैत अछि नानीगामक घर के बगल केर एक टा आँगनक एक गोट मामाक (पड़ोसी) नाम छलनि खूनी। खूनी नामकरणक पाछाँ कारण छलैक जे ओ बच्चा माएक गर्भ मे छलथि तखनहि हुनक पिताक मृत्यु भ' गेल छलनि। से ओहि बच्चा आ बच्चाक माए केँ ता धरि सहारा देलथिन जा धरि ओ बच्चा पढ़ि-लिखि अपना पैर पर ठाढ़ नहि भ' गेलाह। ओ खूनी माए राँची सँ ल' क' पटना डेरा धरि संगे रहलथिन, बहुत दिन तक।
तहिना एकटा पति द्वारा परित्यक्ता दूरक संबंधी महिला आ हुनकर पुत्र के अठारह साल धरि संग रखलथिन। रखबे टा नहि कएलथिन, माए-बेटा दुनू केँ पढ़ौलथिन आ स्वावलंबी बनौलथिन। ओ महिला जनिकर विवाह मैट्रिक पास करितहि भ' गेल छलनि तनिका पति द्वारा परित्यागक उपरान्त एम ए आ पीएचडी धरि करौलथिन 'व्यास' जी। नि: स्वार्थ भावेँ एहि तरहक सहयोग विरले केओ ककरो करैत होएत।
उदारमना 'व्यास' जी सँ ककरो कोनो तरहक अपेक्षा रहलनि तँ तकरा ओ यथासाध्य पूरा करबे कएलथिन। माने जेना लोक कोनो तीर्थक विषय मे बाजैत अछि ने.... जे मैयाक दरबार सँ केओ खाली हाथ नहि लौटैए, किंवा बाबाक दरबार जाए सभक सभ टा मनोरथ पूरा होइते टा छैक। तहिना 'व्यास' जीक दरबार सँ सेहो कहियो केओ खाली हाथ नहि घूरल होएत। जे जाहि कामनाक संग आएल, चाहे ओ बच्चाक पढ़ाइ केर इच्छा होइन, कि अपन नौकरी-चाकरीक जोगाड़क इच्छा सँ आएल होइथ चाहे आर्थिक सहयोग लेल, निराश नहि कएलथिन ककरो। आ तैँ हुनकर आश्रम, गृहस्थाश्रम नहि कोनो भंडारा सन चलैत रहल सभ दिन। से रिटायरमेंट केर उपरान्तहु धरि ई क्रम चलैत रहल। एखनहुँ मामा-मामी सभक संग एहि संदर्भ मे चर्चा चलैत अछि तँ हुनको सभ केँ आश्चर्य लागैत छनि मोन पाड़ि क'। कोना ओतेक टा आश्रमक खर्च-बर्च चलैत रहलैक से आश्चर्य लागैत छनि सोचि क'। अन्नपूर्णाक प्रसादात् कहियो कथुक अभाव नहि रहलैक, कतबो लोकक आश्रम रहए ताहि सँ की !
एमहर गाम पर अपन अनुज महेन्द्र नाथ झाक सभ धिया-पूताक पढाइ-लिखाइ सँ ल' क' विवाह-दानक जिम्मेदारी उठौलनि। कारण 'व्यास' जीक आज्ञाक पागन करैत अनुज महेन्द्र नाथ एल एल बी कएलाक बावजूदो गामे पर रहलाह। हुनका अपना सेहो भगवती ओगरब-पूजब, खेत-पथार आ गाछी-कलमक देख-रेख करब पहिल कर्तव्य बुझना गेलनि। एहन राम-लक्ष्मण सन प्रेम भाव दू भाएक बीच विरले देखबा मे आबैत छैक। जहिना रामचन्द्र भगवान लेल लक्ष्मण जीक त्याग, समर्पण रहलनि तहिना उपेन्द्र नाथक लेल अनुज महेन्द्र नाथक। जखन कि गाम छोड़ि जँ छोट सन शहर मधुबनीओ आबि प्रैक्टिस शुरू करितथि, महेन्द्र नाथ झा, तँ वकालत करैत नीक पाइ सेहो कमा सकैत छलाह, आ अपन एकटा पहचान सेहो बना सकैत छलाह। अग्रज 'व्यास' जी सन महेन्द्र नाथ सेहो मेधावी छात्र रहल छलाह सभ दिन।
पटनाक संग गाम पर सेहो घर बनवाएब, गाछी-कलम, खेत-पथार बढ़ाएब, अपना भरि सभटा जिम्मेदारी बखूबी निभाबैत अपन जीवन केँ सार्थक ओ सफल बनौलनि 'व्यास' जी। अप्पन घर सँ ल' क' समाज आ गाम धरिक उद्धार कएनिहार एहन व्यक्तित्व केँ अपन शब्द - कुसुमाञ्जलि अर्पित करैत संतोषक अनुभूति क' रहल छी हम।
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1
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