आर्यावर्त अथवा भारतवर्षक ऐतिहसिक तथ्यादि सँ देश केँ कतेको कविर्मनीषी लोकैन कलम साधना संग समर्पित छथि।जाहिमे मिथिला-मैथिलीक मर्मज्ञ कवि राज किशोर मिश्रा'क साहित्य-साधना सेंहो नुकाएल नहि अछि।भारत सरकार'क विद्युत-अभियन्ता पद सँ सेवानिवृत्ति पछाइत ओ विज्ञान'क शिक्षा के साहित्य- विधा सँ सम्पृक्त करबाक धर्म निमाहि रहल छथि।
वस्तुतः१२०पृष्ठक पोथी "आचार्य चाणक्य"मैथिली-
खण्ड-काव्य, सृजन कए सुधी-पाठक बीच परोसि केँ प्रशंसनीय काज कयलनि अछि। जाहि मे अपन पूज्य पितामह स्व० कलाधर मिश्रकेँ समर्पित करैत पोथीक भूमिका अन्तर्गत 'दू आखर'शीर्षक मे प्राच्य-भारतक ई०पू०३७५ केँ आस-पास विष्णुगुप्त केँ जन्म हेबाक जनतब देलनिअछि। संगे लगभग २३००बरख पूर्वेहि केँ हुनक जिनगीक काल-खण्डकेँआँकैत राजनीतिक, कूटनीतिक,सामाजिक एवं व्यावहारिकताक श्रेष्ठतम प्रसंगक सूत्रपात कयलनि अछि।ओ संज्ञानी उपदेशक ऋषि चणक-पुत्र रूपे "चाणक्य" नामे जानल गेलथि। जिनक'अर्थशास्त्र' व 'चाणक्य-नीति'कालजयी-ग्रन्थ रूपे प्रतिष्ठापित भेल। संगहि बौद्ध-ग्रन्थ - 'महावंश', जैन-ग्रन्थ - 'परिशिष्टपर्वन', विशाखदत्तक लिखल 'मुद्राराक्षस नाटक', मेगास्थनीज द्वारा लिखित पोथी 'इण्डिका'आ किछु पुराण सभक ग्रन्थादिक श्रोत लऽ चाणक्य ओ चन्द्रगुप्त मौर्य सँ सम्बन्धित कृति केँ ओ आधार लेबाक चर्चा कएने छथि। जाहि मे ओ प्रबन्ध- काव्य मानि छःसर्गक एहि पोथी विष्णुगुप्त(चाणक्य) केँ बहुआयामी व्यक्तित्व व राष्ट्र-निर्माता,राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री, रणनीतिकार एवं सामाज वैज्ञानिक रूपे चरित्र चित्रण कयलनिअछि।हुनका अद्वितीय विद्वान, कूटनीतिज्ञ ओ कालद्रष्टा सिद्धकए,नाट्य-काव्य जकाँ सृजन कयलनि अछि। पोथीक कम्पोज (टंकन) हेतुएँ सह धर्मिनी पत्नी श्रीमती अनिता मिश्राक सहयोग केँ सेहो ओ मुक्त कंठ सँ कयलनि अछि।
रचयिता कविश्री मिश्रा जी कथावस्तुक परिकल्पना मादे १८(अठारह)गोट पात्रक परिचय पृष्ठ के अलावे १२ पृष्ठीय पहिल सर्ग मे व्यष्टि-विज्ञानक समाहार संग सृष्टि-प्रकृति जन्य अनगिन तात्विक समेकन एवं पुरु- षार्थी वीर'क कीर्तिकेँ,अमरत्व प्रसादक द्योतक मानैत छथि। अकादमिक शिक्षा मे विज्ञान विषयक अध्येता रहबा कारणे रचनाक शब्दावली मे जैव-रसायन एवं भौतिकी शब्दादि सहेजल देखाइत अछि। तदनुकूले धर्म-संस्कृति,लोक-सभ्यता एवं ऐतिहसिक सदाचारी जुग पुरुखक वृत्ति-चित्रण मादे, ओ अखण्ड भारतक सम्प्रभुता तथा राष्ट्रीय एकता निमित्ते विराट व्यक्तित्व केँ अनुरागी बनल छथि।
आर्यावर्तीय पश्चिमोत्तर व पूर्वोत्तर मध्य-भारत क्षेत्रक तथा मगध-साम्राज्यक राजधानी,पाटलिपुत्रक घटना- वृत्तिएँ पोथीक सृजन भेलअछि। कविश्री मिश्राक परि कल्पित यात्रा एवं भारतक अतीत व प्राच्य-प्रवृत्ति केँ किंवदन्ती आओर कतिपय ग्रन्थीय आधार लऽ सरल ओ सरसता केँ चाशनी रूपे कविता केँ तुकबन्दी कए रोचकता सहेजने छथि। ओना तँ काव्यास्वादन मादे कोमलावृत्ति केँ आनन्द प्राप्ति होइत अछि। जौँ, कि एहि सर्गक सारत्व मे प्राचीन भारत अन्तर्गत वैदेशिक आक्रामक गतिविधि वा अपनो देशक निष्ठुर सम्राट'क कोप भाजन होइत, लाचार व भयातुर जन-समूह केँ उपदेशन मादे सम्बल बढ़बैत तक्षशिलाक 'भद्र-पुरुष- चणक' पुत्र 'आचार्य चाणक्य' वा 'विष्णु गुप्त' जीक कुटिल-शौर्य (कूटनीति) केँ प्रधानताक चित्रण अछि । ओना तँ "आर्यावर्ते भरतखण्डे जम्बूद्वीपे" मन्त्रोच्चार मादे देशक प्राचीन सभ्यता - संस्कृति एवं अर्वाचीन काल-क्रमक लोकानुराग समर्पित होइतआबैत अछि। ताहि संग भारत भूखण्ड'क स्वाभिमान, सम्प्रभुता व एकता' निमित्ते सहस्राब्दीक साक्ष्यांकित पद-पंक्ति...
" विश्व-इतिहास-विराट क्षितिज पर
चाणक्य चमकैत अमर्त्य नक्षत्र।
ओ शिक्षक,नीति ओ अर्थशास्त्रक
छथि भऽ गेल मानक प्रमाण-पत्र।। "
तदनुरुपेँ ... एहि सर्गक तक्षशिलाक कानन कुटीर मे आवासित पुरखा (पिता) चणक केँ अनुपस्थित देखि जिज्ञासु-सुत चाणक्य,प्रतिवासी(पड़ोसी)के पूछ-ताछ मे मगध-नरेश घननन्द सँ निर्वासित होयबाक जनतब पावि पाटलिपुत्रक यात्रा-वृतान्त सहेजल अछि।जतय चाणक्य पहुँचि केँ अपन पिताक सुधि लेबा लेल वार्ता क्रमे असन्तुष्ट रहै'छ। संगेहि यवनक आक्रमण वृत्तिएँ यूनानी सम्राट सिकन्दर सेनाक पड़ाव कारणे चिन्तित होइत,चाणक्यक कूटनीतिक अभीप्सा केँ सूत्रपात मे लीन भऽ जाइतअछि।सिकन्दरक सेनापति सैल्युकस, एन्टीगोनस व दूतमेगास्थनीज आदि केँ चरित्र-चित्रण, भारतक ऐय्याशी सम्राट घननन्द'क विद्रोही पर्वतेश्वर, आम्भीक,बन्दी-शकटार,राजकन्या कल्याणी,अलका तथा यूनानीसुन्दरी काॅर्नेलियाक विवरण संग भारतक शासन-दुर्व्यवस्था'क चित्रण कयलनि अछि।
कविश्री मिश्रा जीक काव्यमयी लेखनी मादे ...
" अछि आग्रह मगध सम्राट सँ
पाबथि पोरसक सहयोग ।
नहि तँ यवन आक्रमण कारी
कहू, की छोड़त कोनो दोग ।।"
एहि तरहक आशंकित संवाद सँ आक्रोशित भावे घननन्दक कुवाणीक बानगी ...
" तामसे बाजऽ लगलनि नन्द-चुप रह तोँ अविनीत !
चलिजो हमर दरबार सँ नहि सुनब तोहर हम नीत।।"
अनुरूपेँ,ओ आचार्य चाणक्य केँ अपन प्रतिहारी मादे टीक(चुटिया)धएने दरबार सँ बहार कराबैत अछि। तँ अपमानक प्रतिशोध केँ पालैत चाणक्य (विष्णुगप्त) बाटेहि-बाट क्रोधक अन्तर्ज्वाले उद्विग्न होइतअछि...
" अहंकार नहि टिकलै केकरो
रावण कि मथुरापति कंस ।
सिंहासन लेल पाहुन तोँ छह
जल्दी उजड़त नन्दक वंश।।"
आचार्यक अन्तर्मन मे प्रतिशोधक क्रोधाग्नि सुलगैत रहल। बाटेहि मे बालक्रीड़ा रत राजकीलम् खेलाइत एकटा बटुककेँ भूप बनल कौतुकपूर्ण अवस्थामे देखि चाणक्य केँ संचेतना सुदृढ़ भेलैक। तखनओ बटुक सँ नाम व परिचय लऽ अपन शिष्य बनेबाक इच्छा व्यक्त कएल।ओ अपन पिता सँ आज्ञा प्राप्ति अनुसारे इच्छा पूर्ति केँ वचन देलथि । आचार्य हुनक पालक पिता सँ बटुक ' चन्द्रगुप्त' केँ लऽ अपन शिष्य बनावैत अपन संकल्प सिद्धि मे जुटि गेलथि।
पोथी केँ ३४ पृष्ठीय दोसर सर्ग मे कविक लेखनी तक्षशिलाक आम्भीक आओर राजकुमारी अलका केँ मातृभूमि सिनेहे मगध-नायक पर्वतेश्वर के सहयोगक अपेक्षा सँ यवन सेना सँ मुकाबला योजनाक विवरण कएल गेलअछि। एहि बीचआचार्य चाणक्यक संकल्प निर्देशन मे सभ तरहक प्रशिक्षण 'चन्द्रगुप्त' केँ भेटैत रहल।आचार्यकआदेश पाबि चन्द्रगुप्त दाण्डायनऋषि के आश्रम जाइ छथि।जतय यूनानीगुरु अरस्तूक प्रति छवि आँकैत सिकन्दर, हुनका सँ आशीर्वादक अपेक्षा कएल, तँ ऋषिदाण्डायन निस्वार्थ भावे शौर्य-बुद्धिक सहारे सदयता पालैत विजयक कामनार्थी होयबा केँ उपदेशन कएल। एहि उपदेश केँ शिरोधार्य कऽ यवन सम्राट सिकन्दर युद्धविरामक घोषणाकए वापस गेल। तखन चन्द्रगुप्त उपस्थितभऽ'तक्षशिला-विद्या पीठक- स्नातक'रूपे परिचय दैत,कहलनिजेँ पश्चिमोत्तर सीमा पर यवनक आक्रमण सँ लोक-मन मे विकट संकटक दौर अछि। ई सुनि दाण्डायन चन्द्रगुप्त केँ धीर गम्भीर भावे युद्ध-कला व रणनीतिक कौशल सिखबाक ज्ञान दैत अछि। क्रमशः बन्दी मंत्री शकटार पुत्री सुवासिनी के रंगशाला मे दाव-पेंच, राजमहल'क कतेको षडयंत्र सँ त्रस्त परिवेशक करुणा सहेजल अछि। एहि सर्ग मे चन्द्रगुप्त'क उत्सुकता देखाओल गेल अछि।चन्द्रगुप्त भेष बदलि कऽ सिकन्दर के शिविर-दरबार मे जाइत अछि।जतय हुनका गुप्तचर मानिके पेश कएल जाइत अछि।यवनक सैन्य व्यवस्था देखि ओ छगुन्तामे पड़ैत रहल। सिकन्दर के पूछल प्रश्नक उत्तर दैत स्वाभिमान सँ भरल चन्द्रगुप्त कहल, जेँ हम अपनेक हितक बात कहए अएलहुँ अपने सीमापर सँ सेना हटा लेल जाउ। अपने विश्व-विजयक मनोरथ त्यागिकेँ अपन देश घुरि जाउ। तखन सैल्युकस के प्रतिवादक जवाब दैत चन्द्र गुप्त कहलक जे,की मैसीडोनिया,बेबीलोन आ यूनान जीत कऽ विश्व विजेता कहा सकैत छी ?तखन बन्दी बनेबाक आदेश सूनि ओ पड़ाइत अदृश्य भऽ गेल।
क्रमशः यवन विरुद्ध रणनीतिक रचना करैत आचार्य
सँ पौरवक नायक पोरस कहलनि हम यवन केसेना सँ युद्ध करब। रणनीति के बाबत बरसात मौसमक बीच युद्ध छिड़ल एवं अलका-चन्द्रगुप्तक उत्साहो जागल। वितस्ता ओ झेलम नदी उफनैत रहए,युद्धक्रमेअन्ततः पौरव नायक पोरसकेँ शौर्य सँ आकर्षित भऽ सिकन्दर हुनका संग मित्रताक भाव प्रदर्शित कएल। तदनुकूल कौटिल्यक मगध सम्राटकेँ सिंहासन सँ हटेबाक उद्यम मे घोर मीमांसा भेल। ताहि प्रसंगक निम्न पाँती...
"एकाग्रचित्त भऽ चन्द्रगुप्त छल
सुनि रहल चाणक्यक बात।
अपनेक आज्ञा शिरोधार्य
विद्यार्थी हम छी अहाँक तात् ।।"
पोथी केँ २२पृष्ठीय तेसर सर्ग अन्तर्गत मगध सम्राट घननन्द केँ अपन वैभव-पराभव केँ मूल्यांकन अछि। सिंहरण ओ अलकाक प्रेमालाप वर्णन के अलावे देश द्रोही आम्भीक प्रतिएँ छद्मआक्रोसक विचार विनिमय होइत अछि।तक्षशिलाक महरानी रूपेँ अलका केँ सर्व सम्मति बनेबाक विवरण निमित्ते ...
" चाणक्यक नीति, कूटनीति
कते जड़ि ओकर गँहीर।
आम्भीक नहि छल जोग जते
बूझि पबैत कतऽ धरि सीर।।"
वस्तुतःएहि सर्ग मे चाणक्यक गुप्तचर मादे घननन्दक ऐय्याशी व रंगशाला'क गीत-नाद संग सुरा-सुन्दरी केँ निर्लज्ज-विलास परिणामे प्रजा लोकनिकआक्रोस,व
सत्ता विद्रोह रणनीति मे बन्दी आम्भीक हाथे अनुजा
कन्यादानमादे अलका-सिंहरण परिणयविवरणअछि।
पोथीक १९पृष्ठीय चारिम सर्ग अन्तर्गत मगध सम्राट घननन्द के सत्ताच्युत करबा लेल पाटलिपुत्र मे सैन्य- संगठनक सूत्रपात के चर्चा अछि। मालव, क्षुद्रक मित्र राज्य सभक सैन्यबल ओ सिन्धु-घाटी जनपदक प्रति वासी केर समर्थन-सहयोगेँ, चन्द्रगुप्त-चाणक्यक संग सैन्य बल विदा भेल। मास भरि चलल युद्ध मे विविध प्रकारक ह्रास-त्रासक परिस्थिति अभरल। कौटिल्य मुनिक कूटनीतिक ब्यूह-रचना प्रभावे चन्द्रगुप्त मौर्य केँ नेतृत्व मे युद्ध होयबाक रोचक वर्णन सँ कविक लेखनी समर्थ भेल अछि। युद्धक चितेरा-चाणक्य'क चपल-चातुर्यक रणनीतिएँ अन्ततः नन्द-वंश'क अन्त भऽ गेल। जेकर बानगी रूपेँ प्रस्तुत पाँती...
" कौटिल्यक कूटनीति आ हुनकर
सुदृढ़ आर्यावर्तक दृष्टि।
चन्द्रगुप्तक पुरुषार्थ, पराक्रम
'विजय'क ई सभ कएल सृष्टि ।।"
परिणामस्वरूप घननन्द केँ बन्दी बनाओल गेल। चन्द्र गुप्त मौर्यक राज्याभिषेक'क हवनादि केँ तैयारी भेल।
कविश्री मिश्रा जीक लिखल पद-पाँतीक उत्सुकता...
"मगध साम्राज्य! ओकर दरबार!
मुदा नन्द नहि, चन्द्रगुप्त सम्राट ।
लाओल गेल बन्दी घन नन्द केँ
जे वंचित अछि निज राज-पाट।।
चाणक्य पुछलथिन- " मोन छह ?
घिसियौलह हमरा धऽ कऽ टीक ।
एखनो धरि तँ फूजले अछि
ओ, प्रतिज्ञा! ताकह,हमरा सीक।।"
अस्तु मगघ साम्राज्य'क संचालन निमित्ते जन- कल्याणकारी प्रशासन'क जिम्मेदारीआब चन्द्रगुप्तके भेटल,तथा 'मौर्य-वंशक' स्थापना संग मगध-इतिहास मे नव अध्याय के सूत्रपात जारी भेल। मंत्री-परिषद् मे राक्षस केअलावे वररुचि ओ शकटारके शामिल कएल गेलैक।पाटलिपुत्र मे सुखद-मुक्तिक सिहकैत बसात व राक्षस-सुवासिनी बियाहक वर्णन कएल गेल अछि।
ग्रन्थ केँ १३ पृष्ठीय पाँचम सर्ग अन्तर्गत मगधक उत्कर्ष बीच महीपाल चन्द्रगुप्तक अधीन स्वर्णगिरि सँ पञ्चनद धरि, सौराष्ट्र सँ बंग, उत्तरापथ के मालव एवं क्षुद्रक धरि शान्ति-समृद्धिक साम्राज्य रहबाक चित्रण अछि। सिकन्दर केँ मुइला बाद सेल्युकस अधीन बेबी लोनक महीप थिर नहि रहलैक। तखन ओ जम्बूद्वीप (भारत)जितबाक मंशा लऽ बैक्ट्रिया विजय बाद पुनः सन्धि-शर्त केँ बिसरैत आर्यावर्तक पच्छिम सीमा पर आधिपत्य निमित्तेअगुआएल।सूचना पावि आक्रोशित आचार्य चाणक्य व सम्राट चन्द्रगुप्त संग यूनानी गिद्ध दृष्टि के धूमिल करबा लेल सिन्धु तीर चलबाक सलाह दैत अछि। जतय फेरसँ युद्धक प्रक्रिया भेल आ ओहि युद्ध मे आम्भीक वीरगति भेटलैक।घमासान संग्रामक परिणाम मे यवन हारि गेल।
अशक्य वयसे वन-यात्री भेलाह। काल प्रहारक प्रभाव सँ आर्यावर्तक महाननेता महाप्रयाण कए एहि भूलोक सँ सुरधाम दिश विदा भऽ गेलाह।
अन्ततःआठ पृष्ठीय छठम सर्गक मादे कविक लेखनी चराचर जगतक कौतुकपूर्ण तथ्यादि सँ समापनी भेल अछि। जाहि मे लोकमन केँ स्वभाव मादे सन्तति,परि जन एवं कौटुम्बिक उपदेशक प्रतीकअछि। धिआपूता के कुसंगतिसँ अभीष्ट काजमे बाधा होयबाक संचेतना जगाबैत अछि। विद्याहीन व्यक्ति केर सुन्दरता काज नहि दैत अछि। पुरुषार्थी लेल कोनो काज कठिन नहि होइत अछि। विद्वान लेल ने कतहु परदेस आ ने केओ बैरी होइत अछि। जेना करिकी कोइलीक रूप ओकर मीठ बोल होइत अछि,तहिना मृदुभाषी जन केँ महत्व सभ ठाम बढ़ैत अछि। एकटा लोक संदेशक पाँती...
"मूढ़ जतय नहि पूजल जाय
धन-धान्यक जतय बरिसात।
पति-पत्नी मे जतय कलह नहि
बसथि ओतय लक्ष्मी साक्षात्।।"
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" ज्ञान-ग्रहण लेल अनिच्छुक जे
ओकरा, उपदेश बेकार।
नहि बाँस सुगन्धित चानन-तरु बीच
मलयाचलक पहाड़ ।।"
उपर्युक्त तथ्यादि के संगोरैत कविक पोथी-आवरणक अन्तिम पृष्ठपर परिचयात्मक विवरणअछि। ताहि संग हुनक २१ गोट विवध विधाक मैथिली कृति एवं हिन्दी केँ ११ गोट साहित्यिक कृतिकेँ जनतब देने छथि।नवा रम्भ प्रकाशन मधुबनी/पटना/दिल्लीसँ मुद्रित पोथीक मूल्य ₹२००टाका अंकित अछि।
अस्तु पोथीक रचयिता कविश्री राजकिशोर मिश्रा केँ एहि अनुपम कृति लेल साधुवाद...जय मैथिली..!
-साहित्यश्री प्रीतम कुमार निषाद, मुरहदी-बाबूबरही(मधुबनी), सम्पर्क:- ९५३४५९०८१४.