विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान -३

हितनाथ झा · 2025-07-15 · अंक 422 · पृष्ठ 10–21

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान -3
प्रो.जयदेव मिश्र 'मधुप अमर कीर्ति कवि तोर' स्मृति-ग्रन्थमे कविचूड़ामणि मधुपजीक विषयमे अपन आलेख ' मधुपजीकेँ जेना हम जानल बूझल अछि'मे मधुपजीक संग कोइलखमे बिताओल बाल्यकालक दिनक स्मरण करैत लिखलनि अछि - ' एक बेरि हमरालोकनि कोइलखमे एक टा हस्तलिखित मासिक पत्र चलाएब आरम्भ कएल जकर प्रधान प्रेरक ओ व्यवस्थापक छलाह डा. भीमनाथ झाक पिता पण्डित तारानाथ झा। एकर नाम पड़ल प्रभात। पत्रक उद्देश्य सूचित करैत मधुपजी एक टा पद्यक रचना कएलन्हि। जतबा स्मरण अछि ओ थिक -
'खिलल कमल गुंजित मधुप, रवि-छवि शोणिम भेल।
ठरर दैत की छी पड़ल, उठु प्रभात भय गेल।।'
(सन्दर्भ: मधुप अमर कीर्ति कवि तोर पृष्ठ -75)
राजग्राम वासी अयोध्यानाथ सिंह ठाकुर प्रभात एवं प्रभातक सम्पादक तारानाथ झाक कार्य-शैलीक विषयमे जे मन्तव्य लिखने छलथिन, प्रभातक एक अंकमे प्रकाशित भेल अछि।
' सुन्दरतम लेखावलिसँ
अपनेक प्रभात सुपूर्ण रहै अछि।
चित्र अनेक अनूपमसँ
पाठकगणकाँ मन मुग्ध करै अछि।।
एहि 'प्रभात'क सुन्दर रश्मि
समाजमे अभिनव जोश भरै अछि।
विद्वद्वर सम्पादकजी !
हम देखि 'प्रभात' प्रसन्न भेलहुँ अछि।।
(प्रभात: वर्ष - 2, अंक- 4,अप्रैल 1934 )
आचार्य सुरेन्द्र झा'सुमन'क विद्यारम्भ कोइलखक भद्रकाली संस्कृत विद्यालयसँ भेल छलनि। सुमनजी अपन आत्मकथा 'मन पड़ैत अछि'मे लिखने छथि -' विद्यारम्भे गुरुः श्रेष्ठ:', श्रेष्ठ दिन ठेकनाय, यथादिन जनौ-सुपारी पुस्तकपर चढ़ा लघुकौमदी पढ़ब प्रारम्भ कयल।अध्यापक छलाह प. जय सिंह ठाकुर।' आगाँ लिखैत छथि-' ओहि समय कोइलख संस्कृत विद्वानक केन्द्रग्राम छल।' कोइलखक विद्वान सभक चर्चा करैत लिखने छथि -इन्द्रनाथबाबू-पीताम्बरबाबू-गोनू बाबू -यदूबाबू-काशीनाथबाबू- तारानाथबाबू आदि ओहि समयमे अन्यान्य विद्वान एवं प्रतिष्ठित व्यक्तिमे गणनीय छला।' (सन्दर्भ- मन पड़ैत अछि- सुरेन्द्र झा 'सुमन' पृष्ठ- 40)
मन पड़ैत अछि, जखन हम हाइ स्कूलमे नाम लिखौने रही, ओहि समयमे गामक मुखिया ई.अनिरुद्ध मिश्र( पद्मश्री डा.मोहन मिश्रक पिता) छलाह। स्कॉलरशिप लेल बी.डी.ओ.सँ आय प्रमाण पत्र लेब जरूरी छलैक। बी.डी.ओ. हमरा मुखियाक अनुशंसहिपर प्रमाणपत्र दैत।तेँ हमरा इंजीनियर साहेब ओतs जाय पड़ल। साहसपूर्वक अपन परिचय दैत जखन काज कहलियनि तँ ओ आह्लादपूर्वक हमर पिताजी(तारानाथ झा)क विषयमे अपन संस्मरण सुनौलनि, काशीमे कोना हुनक आतिथ्यमे रहलाह से कहलनि।
(सन्दर्भ: कोइलख : पृष्ठ- 74)।
कविचूड़ामणि मधुपजीक घर कोइलख, हमर घरक सटल पोखरिक पुबरिया महारपर। मधुपजीक बाल्यकाल कोइलखमे बितलनि। बादमे मधुपजी मातृक कोर्थमे बसि गेलाह। मधुपजीक जीक जीवनक प्रसंग भाइजी (प्रो. भीमनाथ झा) 'मधुप: अमर कार्ति कवि तोर'मे जे लिखने छथि,से उद्धृत क' रहल छी ,ओकर बाद मधुपजी जे अपन पद्यात्मक आत्मकथा' प्रेरणापुंज'मे जे बाबूजी(प. तारानाथ झा)क प्रसंग लिखने छथिन से प्रस्तुत करब।
'हमरा प्रति हुनक विशेष आवेसक कारण, हम यैह बुझैत छी, हमर कोइलख घर होयब छल। हमर पिता हुनकासँ किछु जेठ। किछुए दिनका। हमर पिताक जन्म 1903मे, मधुपजीक 1906मे।तेँ, संगतुरिया रहितो हमर पिताकेँ भाइ कहैत। हमर मायकेँ ओ बरोबरि पयर छुबि प्रणाम करैत रहलथिन।'प्रेरणापुंज'मे अपन किशोरावस्थाक वर्णन करैत एकाधिक ठाम हमर पिता(तारानाथ झा)क उल्लेख कयने छथि। अपन संगतुरिया आत्मीय भाइक बालक रहबाक कारणे हम हुनक भातिज, ओ हमर काका। ई भाव ओ आजीवन रखलनि।'
( संदर्भ- मधुप: अमर कीर्ति कवि तोर' पृष्ठ- 470)
प्रेरणापुंजमे मधुपजी अपन बाल्यकाल वर्णनक आरम्भहिमे लिखने छथि-
' स्वर्गन्ता नवे वयमे
सुशिक्षित बन्धुवर विनयी कलाचय-निपुण
तारानाथबाबुक श्रमे चालित
बालवर्गक हेतु के. डी. क्लबक चित्ताह्लादकारक
साधने क्रीडित
कतेको पत्र पुस्तक केर अध्ययन करइत
बिताबी समय सुखदे।
तत' रहइत
एक दिनका गप एखन छी
लिखि रहल-
कन्दुक-क्रीड़क- प्रतिस्पर्द्धाक आयोजन तत' छल
सभ तकर साधन जुटाब'मे रही तल्लीन
व्यस्त तारानाथबाबुक देनउँ आज्ञा
एक क्रीड़क बन्धु
काज से नहि कयल
कुटिल कठपिङ्गल परम ओ,
जाहिसँ भ ' क्रुद्ध
दैत तनिका गालपर ओ एक थापर
बाजि उठला -
'नीचसँ एही प्रकारेँ ल' सकैत छी काज।'
ताहि उक्तिक सत्यताक प्रमाण
देल ओ मतिमान
शीघ्र क' सम्पादिते से काज।
देखि से हमरा मुँहे प्रस्फुटित भेले एक दोहा
सूनि से
भ' चकित बजला भाइ साहेब:
'हमर काशीकान्तबाबू आशुकवि हैताह शीघ्रे।'
जकर ई थिक रूप -
बिना ताड़ने नीच की, कौखन काज करैछ?
लखु लति, लतिऔने बिना, गेन न ऊड़ि सकैछ।।
(सन्दर्भ: प्रेरणापुंज: मधुप पृष्ठ - 13-14)
मधुपजीकेँ अपन पिताक आज्ञाक पालन करैत कोइलख गाम छोड़य पड़लनि, मुदा कोइलखक लोकक विषयमे ओहिना स्नेह रहलनि। एक प्रसंग एतय उद्धृत क' रहल छी - जखन भाइजी( भीमनाथ झा ) दरभंगाक सी.एम. कॉलेजमे पढ़ैत रहथि तँ एक पत्र कोइलखसँ मधुपजीकेँ पद्यमे लिखने रहथिन। ओहि पत्रकेँ पढ़ि मधुपजी हुनक परिचय पयबाक लेल चिन्तित रहथि - ' कोनो दिन / कोइलखसँ समागत/ एक टा पढ़ि पत्र / मूक रोमांचित व्यथितचित / अपर व्यक्ति ने बुझय तेँ / अवरुद्धलोचननीर / कतेक छन धरि द्रवित हिय /
सह्य करइत पीड़ / कोन कोमल हृदय लिखि ई कयल एखन अधीर ?/ जे छात्र रहितउँ/ अर्थ-सौष्ठव भाव-समलंकृत /
करुण-पद-सृजन-प्रतिभा-धीर। (संदर्भ : प्रेरणापुंज पृष्ठ- 187)
पत्र लिखनहारक परिचय पयबाक लेल चिन्तित छलाहे कि मधुपजीक दोसर पुत्र श्री मणिकांत मिश्र हिनक परिचय दैत कहलथिन- ' काका ! / अही व्यक्तिक रचित / अपने केर प्रशंसात्मक / ललित लेखो सुनौने हम रही / जे मिथिला महाविद्यालयक / पत्रिकामे प्रकाशित छल भेल,/
तहू दिन परिचय बिना रहि चिन्तिते।
(सन्दर्भ: प्रेरणापुंज : मधुप पृष्ठ- 187)
जखन परिचय बुझलखिन ,तखन जे हुनक कलमसँ उद्गार निकललनि -
' ई भीमबाबू थिका भातिज, / परम प्रिय स्वर्गीय / तारानाथबाबुक पुत्र / पैतृक सकल सद्गुणसँ विभूषित /
पूर्ण - दीप्ति-भविष्य। ' सन्दर्भ : प्रेरणापुंज: मधुप -पृष्ठ - 188)
ओहि पत्रक जे मधुपजी उत्तर देलथिन ओहिमे पिता तारानाथ झाक सेहो चर्च केने छथिन,ओकर एक अंश -
'वत्सलता-नव-लता-कुसुम-कोरक ! कोइलख-कोरक कमनीय
नूतन जातक, प्रतिभा जलजातक सौरभेँ लसित रमणीय
सरल स्वभाव, सुयोग्य पिताक सुयोग्य भविष्णु तनय चिरजीवि
श्रील भीमबाबू ! शुभ आशिष तुअ पत्रक पद्यक मधु पीबि।।
प्रमुदित चित स्वर्गीय बन्धुवर / ताराबाबुक विरहक आधि
बिसरि जकाँ अनुभव न करी सांसारिक संकटजन्यो व्याधि।
(सन्दर्भ : प्रेरणापुंज मधुप, पृष्ठ-,190)
परिवारक सुखक घड़ीमे आ दुखक घड़ीमे सेहो पारिवारिक सदस्यक जकाँ अनेक पत्र भाइजीक नाम प्रेषित छनि जे 'मधुपक पत्र : भीमनाथ झाक नाम'सँ प्रकाशित अछि, जाहिमे तारानाथ झाक प्रसंग अनेक पत्रमे अनेक प्रसंगक चर्च छनि।
एतय मात्र दू पत्रक अंश जे 26.10.1980क लिखल अछि, जखन भाइजी(भीमनाथ झा)केँ भारत सरकारक संस्कृति मंत्रालयसँ जुनियर रिसर्च फेलोशिप भेटल छलनि आ दोसर 10.12.1982क पत्र जखन हमर माझिल भाइ (मित्रनाथ झा)क निधन(13.11.1982)क सूचना भेटलनि, उद्धृत क' रहल छी -
पहिल पत्र-
' पूर्ण भेल प्रतीति/ प्रतिभा केर सभ तरि मान/ दिवंगत प्रिय बन्धु / तारानाथ बाबुक आइ आत्मा/ नन्दनक उपवनहुँमे रहि /
ई अमन्दानन्द लहि/ तुअ चिरंजीवित्वक मँगैत हेताह /
तारासँ मधुर वरदान,/ आ, अदृष्टिक वश विपन्ना / अहीं लोकनिक पालनक भारें विखिन्ना / अहाँ सभक परोक्षमे कनइत / समुत्साहक त्रिपथगा / श्रीमती भौजीक कोखि जुड़ैल /
के नहि मान/ पूर्ण अछि विश्वास/ प्राप्त फेलोशिप/ अहाँ तै रूपसँ ई शोधकार्य देखैब/ जाहिसँ मैथिलिक सब तरि हैत कीर्तिक गान /
(सन्दर्भ ; मधुपक पत्र : भीमनाथ झाक नाम , पृष्ठ- 44-45)
दोसर पत्र -
' बन्धुवर तरबाबुक/ अल्पे वयमे निधनो भेने / जे आदरणीयाँ
भौजी / सहितो अति निर्जु सकल सन्ततिकेँ /
लालन- पालन शिक्षा - दीक्षा करा / हृदयपर पाथर रखने /
दुखी न हो सन्तान - ताहि ले '/ नोर न नयनक निःसृत कयलनि, /
जरा- जर्जरा ताहि नियति से डाड� लगौलक / मूर्छायन्ता /
तनिक नोरायल मूँह देखब हम कोना/ देब वा कोन प्रकारेँ बोल-भरोसो / स्वयं विशीर्ण हृदय भs गेने/ किन्तु साध्य की ? /
भालक लिपिपर नहि ककरो अधिकार/
(सन्दर्भ : मधुपक पत्र भीमनाथ झाक नाम, पृष्ठ-51)
एकर अतिरिक्त प्रभातक प्रसंग अनेको पत्र सम्पादकक नाम आयल छलनि, जकर चर्च प्रभात पत्रिकाक विषयमे लिखबाक समय उद्धृत करब, किन्तु एक पत्र जे मंगरपट्टीक प. मदनानन्द झाक प्रभातमे प्रकाशित अछि- 'क्वैलखक युवकगणक प्रति' ओहि पत्रक एक अंश-
सम्पादक गुणवान हितैषी,
बुद्धिमान श्री तारानाथ।
खाली युवक संघ के हित ओ,
सतत खपाबथि माथ।।
(सन्दर्भ: प्रभात वर्ष-1,अंक-अप्रैल 1934)

Suggested citation: हितनाथ झा. “मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान -३.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 422, pp. 10–21, 2025-07-15. https://www.videha.co.in/research/2025/422/मैथिली-साहित्यमे-तारानाथ-झा-एवं-हुनक-परिवारक-योगदान--३.htm

मूल विदेह अंक / Original issue