युवक संघ, उमापति पुस्तकालय आ हस्तलिखित मासिक 'प्रभात'
युवक संघ आ उमापति पुस्तकालय बीसम शताब्दीक पूर्वार्धमे कोइलखक सांस्कृतिक-साहित्यिक -सामाजिक आ चिकित्सकीय समृद्धिक प्रतीक रूपमे बहुत वर्ष धरि जीवन्त रहल। युवक संघक स्थापना 14 अक्टूबर 1932 केँ भेलैक। एकर पहिल सभापति भेलाह प.उमानाथ झा(इंजीनियर साहेब) तथा मंत्री प. सुशील कुमार झा(पुबारि टोलक प.काशीनाथ झाक जेठ पुत्र)। एकर मुख्य उद्देश्य छलैक - समाजकेँ गतिशील बनायब तथा व्यापक सोच दिस अग्रसर करब, गामक साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधिमे आनो गामकेँ जोड़ब, उमापति पुस्तकालयक गठन (करीब चारि वर्षसँ कोइलखदेवी नामक पुस्तकालय कोइलखमे श्रीयुत हेडमास्टरक अनुकम्पासँ स्थानीय चन्द्रानंद फ्री मिडिल स्कूलमे राखल अछि। स्कूलक कार्यवाही होयबाक कारण पुस्तकालयक कार्य संचालनमे पूर्ण बाधा होइत छैक। एहन स्थितिमे एक सुन्दर घर पुस्तकालयक निर्माण करैक निमित्त कटिबद्ध भ' गेल अछि।) तथा हस्तलिखित मासिक पत्रिका 'प्रभात'क प्रकाशन करब।
'प्रभात' युवक संघ द्वारा संचालित आ प्रकाशित होइत छल। एकर पहिल अंक जनवरी 1933 मे बहरायल आ अन्तिम उपलब्ध अंक थिक दिसम्बर 1934क। ताहिमे पत्रिका बन्द होयबाक घोषणा नहि छैक। तेँ सम्भव थिक जे आगुओ बहरायल हो। एकर सम्पादक छलाह प. तारानाथ झा । प्रभात बहुभाषिक सचित्र पत्रिका छल। मुख्यांश मैथिलीमे रहैत छल आ संस्कृत, हिन्दी तथा अंग्रेजीक रचना सेहो रहैत छल। उपलब्ध 18 अंकमे कुल मिलाकs 46 कविता,13 कथा, 84 निबन्ध तथा सम्पादकीय, पत्र, चुटुक्का आदि 72 अछि।समाचार सेहो देल जाइत छलैक। पृष्ठ संख्या निश्चित नहि छलैक, न्यूनतम 55 आ अधिकतम 87 पृष्ठ भेटैत अछि। हस्तलिखित पत्रिकाक सम्बन्धमे निष्कर्षतः डा.कांचीनाथ झा 'किरण' क कहब छनि- ' एहि पत्र सभक अंक यदि एकत्रित कयल जाइत तँ विषय-वस्तुक दृष्टिएँ मिथिला मोद आदिक अपेक्षा अधिक उपयोगी सिद्ध होइत। कतेको युवक साहित्यकारक हृदयमे अहुरिया कटैत भाषा-सांस्कृतिक प्रेमक पता समाजकेँ लगैत। (सन्दर्भ: कोइलख, पृष्ठ-141)' प्रभातक प्रकाशन युवक संघ द्वारा निर्धारित नीतिक अनुसार होइत छल। प्रभातक नियमावली प्रत्येक अंकक पहिल पृष्ठपर रहैत छल -: नियमावली:-
01.प्रभात प्रत्येक अंग्रेजी मासक पहिली तारीख कs प्रकाशित होयत।
02.प्रभातमे धार्मिक,सामाजिक,ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, आयुवेर्दिक लेखक अतिरिक्त अन्यान्य भाषाक अनेक ग्रन्थक अनुवाद रहत।
03. लेखक लेख प्रत्येक भाषामे दय सकै छथि।(यदि मैथिलीमे लेख देथि तँ सर्वोत्तम)
04. मासक 25 तारीखक अभ्यन्तर लेख अयला पर, आगामी पहिली तारीखमे प्रकाशित कयल जायत। 25 तारीखक बादः लेख अयलापर यदि समावेश नहि भs सकत तs आगामी मासक बाद प्रकाशित कयल जायत।
05. लेखककेँ लेख लिखबाक हेतु कागज युवक संघक तरफसँ देल जयतन्हि, अतः जिनका लेख लिखबाक होइन्ह, सम्पादक 'प्रभात'क ओहिठामसँ कागज मंगबा लेथि।
06. लेखक,लेख अपनहुँ कागज मे लिखि प्रेषित कय सकै छथि। यदि प्रभातक कागजसँ लेखकक कागजमे भेद रहतैक तs प्रभातक कागजमे नकल कय प्रकाशित कयल जायत।
07. यावत पुस्तकालयक घरक अभाव छैक ताबत प्रत्येक परिचित व्यक्ति केवल छ घण्टाक हेतु सम्पादकक ओहिठाम रजिस्टर मे हस्ताक्षर कय प्रभात अपना ओहिठाम पढ़बाक हेतु लs जा सकै छथि।
08. जिनका डाक द्वारा लेख प्रेषित करबाक होइन्ह, सम्पादक 'प्रभात' कोइलख, डाकघर-रामपट्टी, जिला- दरभंगाक पतासँ प्रेषित करथि।वैरंग पत्र नहि लेल जयतन्हि।
09. एहि विषयमे विशेष पुछबाक जिनका प्रयोजन होइन्ह, सम्पादककेँ पूछि लेथि।
प्रभातमे प्रकाशित प्रत्येक अंकक उक्त नियमावलीक प्रसंग मैथिलीक प्रसिद्ध आलोचक मोहन भारद्वाजक कथन एहि प्रकारक अछि :-' उक्त नियमावली सैद्धान्तिक आ व्यावहारिक दुनू दृष्टिएँ महत्वपूर्ण अछि। किन्तु, महत्व कोनो नीति आ नियमक नहि होइत छैक। महत्वपूर्ण होइत अछि ओकर अनुपालन। प्रभात प्रत्येक मासक पहिल तारीखकेँ प्रकाशित भs जाइत छल।रचनाकार तथा पाठकसँ सम्बद्ध नियममे व्यतिक्रम नहि हो ताहि लेल सम्पादक सतर्क रहैत छलाह, जे सम्पादकीय टिप्पणी सभसँ स्पष्ट अछि। सम्पादकक एहि श्रम आ तत्परताक पाछाँ हुनक भाषा-संस्कृति-प्रेमक दृढ़ता काज कs रहल छल। मुद्रणक युगमे हस्तलिखित पत्रिका चलयबाक एक मात्र कारण छल अर्थाभाव। छपयबाक बात तँ दूर रहओ, पाठकीय सुविधाक हेतु एकर दू-तीन प्रति लिखयबाक विचारो हुनका मान्य नहि छलनि। प्रभातक एक प्रति प्रस्तुत करबामे युवक-संघकेँ 10-11 टाका खर्च पड़ैत छलैक, तेँ एकर एकसँ अधिक प्रति निकालब सम्भव नहि छल। उल्लेखनीय थिक जे युवक-संघक अथवा प्रभातक सम्पादकक ई सीमा सिद्धान्तक कारणे बेसी छल। कोइलख आ ओकर परिसरमे एहन लोक रहथि जे एहि प्रकारक कार्यक आर्थिक भार वहन कs सकैत छलाह। मुदा, संस्था आ सम्पादक व्यक्तिगत उपकारक विरोधी रहथि। विचारक इएह दृढ़ता प्रभातकेँ मैथिली पत्र-पत्रिकाक इतिहासमे महत्वपूर्ण बनबैत अछि। ई बात कतोक स्तरपर दृष्टिगत होइत अछि।पत्रिकाक नामकरणेकेँ लेल जाय। प्रभातसँ पहिने मैथिलीक सात टा मुद्रित पत्रिका बहरा चुकल छल- मैथिल हित साधन, मिथिला मोद, मिथिला मिहिर, मैथिल-प्रभा, प्रभाकर, श्री मैथिली तथा मिथिला। एहि सभ पत्रिकाक नामकरण मिथिला-मैथिलीक संग भेल अछि। प्रभात पहिल पत्रिका थिक जकर नामकरण एहि मानसिकतासँ हटिकेँ कयल गेल। एहिसँ दृष्टिकोणक व्यापकता परिलक्षित होइत अछि। मिथिला आ मैथिली प्रभातोक प्रतिपाद्य विषय छलैक, मुदा ओ ओहि सीमा-रेखासँ बाहरो देखबाक इच्छुक छल। मिथिला-मैथिलीक स्थिति आ समस्यासँ सम्बद्ध रहितहुँ ओकरा व्यापक परिवेशमे देखबाक एकरा आग्रह छलैक। दृष्टिकोणक व्यापकता आ विचारक प्रगतिमुखता दोसरो स्तरपर प्रकट होइत अछि। कुशेश्वर कुमर आ भोलालाल दासक संयुक्त सम्पादनमे प्रकाशित मिथिला (1929 ई.)अपन प्रगतिशीलताक लेल प्रसिद्ध अछि, किन्तु प्रभात ओहिसँ आगाँक पत्रिका थिक।मिथिलाक प्रतिज्ञा-वाक्यक अनुसार कुमर पुरातन-नीति-निरत छलाह आ दास छलाह नवीन समाजी। 'दुनू दुनूकेँ राखथि सभ दिन राजी'- इएह पत्रिकाक अभीष्ट छल। प्राचीन मान्यता आ पाश्चात्य शिक्षासँ उत्पन्न नवीन विचारधाराक संगम -स्थल रूपमे एकर प्रशंसा भने कयल जाय, मुदा एतेक धरि स्पष्ट अछि जे पत्रिकाक दृष्टि समन्वयवादी छल। प्रभात एहन दुविधाग्रस्त मनोवृत्तिक नहि छल।' (सन्दर्भ :- एकल पाठ : मोहन भारद्वाज।)
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
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मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-3