२.१.मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-१३
कल्पना झा
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13'
व्यास' जीक असंभावित विदेश-यात्रा
"पुरुषस्य भाग्यम् दैवो न जानाति...." 'व्यास' जी यात्रा-वृत्तान्त लिखैत "विदेश-यात्रा" पोथीक शुरुआत संस्कृतक एही श्लोकांश सँ कएलनि अछि। से ठीके ! एकटा दरिद्र ब्राह्मणक बच्चा, जकरा बाल्यावस्था मे दुनू साँझ सुसिद्ध अन्न भेटब पर्यन्त निश्चित नहि छलैक आ ने पढ़बा-लिखबाक कोनो सुनिश्चित योजना। सर-समाजक सहयोग सँ जेना-तेना विद्यार्जन कएनिहार बालक, कहियो विदेश-यात्रा पर जा सकत, से किएक आ कोना सोचितथि केओ; गौँआ-घरुआ आ कि बालकक माएओ-बाप। कोन आधार पर एहि तरहक आस लगबैत केओ। मुदा ओहि बालक पर सरस्वतीक तेहेन असीम कृपा छलनि जे बहुत किछु असंभावित होइत गेलनि जीवन मे। ताहि दिन मिथिलाक गोटैके विद्यार्थी फर्स्ट डिवीजन सँ पास करैत छलए, से कएलनि। तदुपरान्त इंजीनियरिंग कॉलेज मे पढ़ब, सभदिन नीक अंक सँ उत्तीर्ण होइत रहब, संगहि थर्ड इयर मे पढ़ैत काल, ओहि अल्प बएस मे बिनु कोनो नेआर-भास कएनहि मातृभाषा मैथिलीक भंडार केँ अपन एकटा अनमोल रचना "सन्यासी" (काव्य) सँ समृद्ध करब आ फाइनल इयर मे पढ़िते काल, ट्रेनिंगे के दौरान एक गोट अंग्रेज ऑफिसर 'ह्विप साहेब'क एहि तरहेँ प्रभावित भ' जाएब, मेधावी छात्र उपेन्द्र नाथक कुशाग्र बुद्धि सँ; जे बिनु कोनो आवेदन पत्रक सीधे सरकारी विभाग मे नियुक्त क' लेब, ई सभ किछु असंभाविते तँ भेलनि 'व्यास' जीक जीवन मे !
अपन भाग्यरेख कखनोकाल अपनहु अचम्भित करैत होएतनि 'व्यास' जी केँ। से स्पष्ट होइत अछि हुनकर अपनहि कहल बात सँ, जे ओ "विदेश-भ्रमण" पोथीक पहिले पन्ना पर लिखने छथि। हुनकहि शब्द मे देखल जाए -- "यात्राक विषय मे सभ किछु ठीक भ' गेल छल। विदा होएबा सँ चारि दिन पहिने माए केँ कहलिऐक -- जहिआ हमर जन्म भेल, के कहैत... ककरा मोन मे कनेको सम्भावना भेल होएतैक जे हम अमेरिका जाएब। 40-42 वर्ष पहिने गामक लोक जे ट्रेनो पर कम्मे काल चढ़ल छलाह, जिनका भूगोल विषयक नामे टा सुनबा मे आएल छलनि; अमेरिका देश कि महादेश कहि कए पृथ्वी पर कोनो भू-भाग छैक सेहो ओहि पार -- से मानए लेल केओ तैआर नहि। एखनो, पृथ्वीक दोसर भाग मे - जे हमरा लोकनिक पएरक नीचाँ अछि - लोक रहि सकैछ, बहुतो गोटा केँ बोधगम्य नहि होइत छनि। खेदक विषय अवश्य, दू-अढ़ाए हजार वर्ष पहिने एहि देशक लोक सुदूर समुद्र मे जाए व्यापार ओ धर्म-प्रचार कएलनि - आ जखन समस्त संसार एतेक तीव्र गति सँ आगाँ बढ़ल, तखन हमसभ एतेक पछुआएल रही ! परतन्त्रता लोक केँ एहिना बहुतो अंश मे पंगु बना दैत छैक।"
'व्यास'जीक जीवन-यात्राक अवलोकन करैत-लिखैत, हमरा तँ जानिए क', हमर अनुमान अछि जे आब तँ हमर लिखल पढ़निहार केँ सेहो पढ़ैत काल निश्चिते बेर-बेर मोन मे अओतनि "भावी प्रबल होइछ" आ "जकर जेहेन प्रारब्ध"....। ई हुनकर प्रारब्धे छलनि जे बाल्यावस्था मे दरिद्रताक मारि सँ त्रस्त बालक उपेन्द्र आगाँ जा क' 'व्यास' जी बनि अमर भ' गेलाह। जीवन मे भरपूर नाम, यश, सुख-समृद्धि, सभ किछु प्राप्त कएलन ओ।
'व्यास' जीक विदेश-यात्राक चर्चा करबाक नेआर कएलहुँ तँ स्वाभाविके मामा सभ सँ एहि संदर्भ मे गप्प क' सामग्री कलेक्ट करबाक प्रयास कएल हम। तँ से गप्पक क्रम मे पता लागल जे 'व्यास' जी "विदेश-भ्रमण" नामक एहि पोथी मे अपन सम्पूर्ण विदेश-यात्राक संस्मरण नहि समेटि सकल छथि। हुनकर इच्छा छलनि एकर दोसर भाग लिखबाक। मुदा से इच्छा अपूर्णे रहि गेलनि।
असल मे विदेश-यात्रा सँ घुरैत काल यूरोपक बहुत देश आ शहरक भ्रमण करबाक सेहो अवसर भेटल छलनि हुनका। आ यूरोप ट्रिप बहुतो लोकक सपना रहैत छैक। यूरोपक
ग्रामीण इलाका हुअए, आ कि ऐतिहासिक स्थल सभ, प्राकृतिक दृश्यक संग सांस्कृतिक-आकर्षण सेहो कारण रहैत छैक, लोकक 'यूरोप-ट्रिप' पर जएबाक पाछाँ। ओहिठाम जाए रेल यात्राक आनन्द लैत मनोरम प्राकृतिक दृश्यक आनन्द उठाएब आबक धिया-पूताक सपना रहैत छैक। जे स्थान सभ 'व्यास' जी बिनु कोनो सपने केँ घूमि अएलाह। आश्चर्यजक बात जे 'व्यास' जीक छओ संतान मे सँ ककरो एखन धरि विदेश-यात्राक अवसर नहि भेटि सकल छनि जीवन मे। हँऽ... नाति-नातिन, पोता-पोती सभ केँ अवसर भेटलनि अछि।
21 सितम्बर 1958 सँ 21 अप्रैल 1959 पूरे सात मासक छलनि 'व्यास' जीक ई विदेश-यात्रा। हुनका ई अवसर लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभागक कार्यपालक अभियन्ता रुप मे कार्य करैत काल भेटल छलनि। छओ मास लेल विशेष प्रशिक्षणक हेतु अमेरिका पठाओल गेल छलनि विभागक सौजन्य सँ। हिनका संग बारह गोटे आरो छलथिन, माने तेरह गोटाक दल छलनि। जाहि मे सँ बारह गोटे केँ सोझे अमेरिका जेबाक छलनि आ एक गोटे केँ लंडन होइत दू-तीन दिनक बाद अमेरिका पहुँचबाक छलनि। नओ गोट डॉक्टर आ चारि गोट इंजीनियरक ई दल छलनि, जाहि मे एकटा इंजीनियर 'व्यास' जी छलाह।
एहि यात्रा केँ लेखक स्वयं 'असंभावित' कहने छथि अपन पोथी "विदेश-यात्रा" मे। कारण हुनकर नाम लिस्ट मे नहि पठाओल गेल छलनि। मुदा एकरा 'भावी'ए कहल जाएत जे दिल्ली स्थित एकटा विशिष्ट पदाधिकारी "हौपकिन्स" साहेबक कहला पर विभागक मुख्य अभियन्ता केँ 'व्यास' जीक नाम पठाबए पड़लनि। "हौपकिन्स" साहेब प्रतिभावान युवा इंजीनियर उपेन्द्र नाथक किछु कार्य गया क्षेत्र मे देखने छलाह, गप्प-शप्प सेहो कएने छलाह ओहि होनहार इंजीनियर सँ। निश्चिते प्रभावित भेल होएताह 'व्यास' जी सँ। आ तैँ हिनकर नाम प्रस्तावित कएने होएताह।
'व्यास' जीक व्यक्तित्वे तेहेन छलनि, जे एक बेर भेंटघाँट-गप्प-शप्प क' लइतनि हुनका सँ, तँ फेर आजीवन हुनका मोन रहबे टा करितनि हुनकर ओ अद्भुत आभायुक्त मुखमंडल, हुनकर आत्मीयतापूर्ण / विद्वतापूर्ण गप्प करबाक कौशल। हुनकर व्यक्तित्व मे किछु तँ एहेन छलनि, सम्मोहन शक्ति सन, जे लोक प्रभावित होएबा सँ बचि नहि सकैत छल। किछु तेहेन सन बात ! कुशाग्र बुद्धि बहुतो लोक रहैत छथि, विद्वानोक कमी नहि एहि संसार मे, अपन मिथिले मे असंख्य विद्वान भरल छथि मुदा अपन बात-व्यववहार सँ सामने बला केँ पहिले भेंट मे अप्पन बना लेबाक गुण कही कि कला, से विरले ककरो भीतर होइत छैक आ से गुण, से कला भरपूर मात्रा मे विद्यमान छलनि 'व्यास' जीक भीतर। आ तैँ प्रायः "हौपकिन्स" साहेबक नजरि मे, मोन मे छलथिन इंजीनियर उपेन्द्र नाथ। आ एहि तरहेँ 'व्यास' जीक नाम ओहि टीम मे जोड़ल गेलनि जे विशेष प्रशिक्षण हेतु विदेश-यात्रा पर जाए बला छलए।
ई गप्प अछि 1958क। ताहि दिन विदेश जाएब बहुत बड़का बात होइत छलैक। आ सेहो विभागक खर्चा पर, विशेष प्रशिक्षण लेल, किछु चयनित लोक मे नाम आएब, वास्तव मे बहुत विशेष बात छलनि। 'व्यास' जीक लेल तँ जानिए क', संगहि परिवारक, गामक आ समाजक लोक लेल सेहो ई गौरवक बात छलनि। ओहि समय मे विदेश-यात्रा, एक तँ कम्मे लोक करैत छलाह आ जेहो कएलनि से ततेक लिखल नहि गेल छलए विदेश-यात्रा पर तेहेन किछु। साहित्यक गप्प क' रहल छी हम। मैथिली साहित्य मे, पोथी रूप मे यात्रा वृत्तान्त ताहि दिन बहुत कम प्रकाशित होइत छलए, जखन 'व्यास' जी विदेश-यात्रा सँ घुरलाह 21 सितम्बर 1959 मे। से विदेशे मे सोचने छलाह 'व्यास' जी, जे देश जाएब तँ पाँच-छओ मास मे "विदेश-भ्रमण" नाम सँ पुस्तक लिखब। मुदा देश आबि ओझरा गेलाह अपन पारिवारिक जिम्मेदारी आ कर्म-क्षेत्रक जिम्मेदारी सभ मे आ छओ मास मे मात्र दू टा लेख लिखल भेलनि। जे "वैदेही"के दू अंक मे प्रकाशित भेल छलनि।
'व्यास' जी विदेश यात्रा पर गेल छलाह सन् 1958 मे आ "विदेश-भ्रमण" पोथी प्रकाशित भेलनि सन् 1978 मे। माने बीस साल लागि गेलनि ओहि इच्छाक क्रियान्वयन मे, जे विदेश-प्रवासे काल सोचने छलाह ओ। ततेक तरहक जिम्मेदारी छलनि, जे साहित्य लेल समय निकालब कठिन रहैत छलनि। तथापि माँ मैथिलीक चरण मे यथासाध्य समय-समय पर निस्सन, सुन्दर-सुन्दर पुष्प चढ़बैत रहलाह 'व्यास' जी, से विशेष बात। इच्छा तँ बहुत किछु छलनि माँ मैथिलीक लेल करबाक, बहुत काज अपूर्ण रहि गेलनि से अफसोचक बात !
हँऽ तँ कहैत जे रही....ताहि दिन यात्रा-वृत्तान्त पोथी रूप मे कम प्रकाशित होइत छलए। कहियो कोनो पत्रिका मे धारावाहिक रूप मे किछु अंक मे प्रकाशित भ' जाइत छलए, सएह टा। उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जीक लिखल किछु यात्रा-वृत्तान्त सेहो "विदेश-भ्रमण" शीर्षक सँ "वैदेही" पत्रिका मे प्रकाशित भेल छलनि। स्व. रमानाथ बाबूक विशेष अनुरोध छलनि जे प्रवासक विषय मे किछु लिखथि 'व्यास' जी। तँ से रमानाथ बाबूक बातक मान राखैत किछु यात्रा-वृत्तान्त लिखि 'व्यास' जी, कृष्णकान्त जी केँ पठा देल करथिन। जे बेरा-बेरी "वैदेही"क किछु अंक मे प्रकाशित होइत रहलनि।
सात मासक एहि प्रवासक वृत्तान्त, पत्रिकाक किछु अंक मे समटल नहि जा सकैत छल, से अनुमान छलनि 'व्यास' जी केँ। जा धरि 'व्यास' जीक पोथी "विदेश-भ्रमण" निर्माणाधीन छलनि ता धरि मैथिली साहित्य मे दू टा विदेश-यात्रा आधारित पोथी अपन उपस्थिति दर्ज करौलक। पहिल डॉ. सुभद्र झाक "प्रवास जीवन" आ दोसर जगदीश चन्द्र झाक "सात समुद्र पार" नामक पोथी। तेसर यात्रा वृत्तान्त पोथी प्रायः व्यास' जीक "विदेश-भ्रमण" अछि। मुदा जेना कि पहिनहु कहल अछि, जे सातो मासक सम्पूर्ण वृत्तान्त समेटि नहि सकल छलाह एहि पोथी मे लेखक। दोसर किस्त मे ओ यूरोपक विभिन्न दर्शनीय स्थल/नगर/देश, फ्रांस, जर्मनी, बर्लिन, रोम, ग्रीस, जेनेवा, इजिप्ट, कैरो आ अफ्रीका मे घूमल/देखल महत्वपूर्ण स्थान सभक चर्चा करितथि, से नेआर छलनि।
"विदेश-भ्रमण" पोथी पढ़ैत एकटा विशेषता ई देखाएल जे एहि पोथी मे लेखक जाहि-जाहि ठाम गेलाह, चाहे ओ यात्राक क्रम मे एकटा पड़ाव रूप मे कोनो स्थान पर थोड़बे काल लेल किएक ने रुकलाह (कोनो एयरपोर्ट पर), ओहि सभ स्थानक भौगोलिक विवरणक संग ओतुक्का इतिहासक चर्चा सेहो कएलनि अछि। कोन बात, कोन बस्तु लेल ओ स्थान विशिष्ट कहबैछ, किएक महत्वपूर्ण अछि ओ स्थान, से सभ बातक चर्चा दूखलहुँ। उदाहरण स्वरुप सीरियाक राजधानी डमास्कस (दमिश्क)क भौगोलिक-ऐतिहासिक विवरण सेहो देखल पोथी मे, जतए दस घंटाक उड़ानक बाद वायुयान मात्र 45 मिनट लेल रुकल छलनि।
तहिना यात्राक क्रम मे देखल/घूमल दर्शनीय स्थल सभक विस्तृत विवरण भेटल पोथी "विदेश-भ्रमण"मे। ओहि दर्शनीय स्थलक निर्माण प्रक्रिया, निर्माण मे कतेक समय लागल, ककरा द्वारा कोन इस्वी मे बनाओल गेल, कतेक लागत लागल, माने ओकर सम्पूर्ण इतिहासक खाका खींचल अछि। एहि बात सँ स्पष्ट होइत अछि जे कतेक मेहनति कएने छथि पोथी लिखबा मे लेखक। माने कतेक समय आ दिमाग खपाओल गेल अछि से स्पष्ट दृष्टिगोचर होएत। ताहिदिन ने इंटरनेट छलए ने गूगल, तखन सभटा जनतब कलेक्ट करब आ ओकरा साहित्यिक रूप दैत पाठकक सोझाँ परसब सहज नहि छल हेतनि 'व्यास''जी लेल।
जाहि तरहेँ विदेश-भ्रमण पोथी मे अमेरिकाक दर्शनीय स्थल मे सँ सभ सँ बेसी प्रसिद्ध आ महत्वपूर्ण "स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी"क विवरण दैत, ओकर मैन्युफैक्चरिंग डिटेल्स देलनि अछि, से हमरा तँ चकित कएलक। लोहक फ्रेम पर तामक चदरा केँ मढ़ल गेल छैक, से सभ किछु एतेक गौर सँ निरेखि क' देखब/बूझब आ फेर तकरा लिखित रूप मे सहेजि क' राखब, प्रशंसनीय अछि।
विदेश-भ्रमणक क्रम मे 'व्यास' जी, जे किछु-कत्तहु नब बात, नब बस्तु देखलनि/सुनलनि, ताहि सभ बात सँ अपन पाठक केँ अवगत करएबाक हुनकर आन्तरिक इच्छा देखा पड़ल कइअक बेर। अहूँ सभ देखू कनि --"आइ बूझल समस्त अमेरिका मे 'डाउन टाउन'क अर्थ - कोनो शहरक मुख्य बाजार क्षेत्र किए ? मैनहैटन द्वीप उत्तर सँ दक्षिण दिशि ढालु - तीनि भाग मे बँटल, 'अप टाउन', 'मिडटाउन', 'डाउन टाउन'..। दक्षिणी भाग 'डाउन टाउन' मे सर्वाधिक वाणिज्य, व्यापार, क्रय-विक्रय केन्द्र; चर्च, सिनेमा, थिएटर अवस्थित। सभ प्रकारे व्यस्त, चहल-पहल भरल...। अधिक संभव न्यूयॉर्कक 'डाउन टाउन'क आधार पर आब ओ शब्द योग-रूढ़ि भए समस्त अमेरिका मे प्रचलित भए गेल अछि।"
'व्यास' जीक एकटा बड़का विशेषता छलनि जे हुनका अनकर अधलाह पक्ष देखबाक अभ्यास कम छलनि। माने विदेश गेलाह, तँ ओहिठामक लोक सँ, समाज सँ की सीखल जा सकैत अछि; की ग्राह्य अछि, ताहि पर फोकस रहैत छलनि। ना कि खिधांस करबा पर। हुनका संगे गेल लोक सभ चर्चा करथिन, एना देखलियै; ओना देखलियै...छौँड़ी-छौँड़ा एना करै छै...। एहेन क्षुद्र बात पर ध्यान देब 'व्यास' जीक स्वभाव नहि रहलनि, वा कहि सकैत छी हुनकर शान के खिलाफ छलनि ई।
हुनकर ध्यान गेलनि जे अमेरिकन सभ कोना यूरोपक विभिन्न देश (जे पूर्व मे आ ओहू समय अपना मे लड़ितो छलाह) सँ आबि एतए एकताक सूत्र मे बन्हि गेलाह, कोना फ्रेन्च, ब्रिटिश, जर्मन, डच, इतालवी, आदि; सभ केओ अमेरिकन भए अंग्रेज साम्राज्यक विरुद्ध लड़लाह। स्वतन्त्र भेलाह आ स्वतंत्रताक बादो सम्बध्दता क्रमहि दृढ़ भेल गेलनि, बढ़ैत गेलनि।
एहि तरहक दृष्टिकोण रखनिहार लोक जखन लेखनी धरैत छथि तँ ओ जे लिखताह से जिम्मेदारीपूर्वक लिखताह। बहुत कम्मे बएस मे 'व्यास' जीक भीतर एहि तरहक परिपक्वता आबि गेल छलनि। ई बात बूझब अत्यन्त आवश्यक अछि जे लेखन-कार्य हँसी-खेल नहि छैक। लेखनी नैतिक आ सामाजिक दायित्व दैत छैक लिखनिहार केँ। ओहि दायित्वक निर्वहन लेल लेखक केँ बहुत श्रम करए पड़ैत छैक। श्रमसाध्य कार्य छैक लेखन। से 'व्यास' जी एहि दायित्वक निर्वहन निष्ठापूर्वक कएलनि। आजीवन। जखन कि आब बेसी लोक सौखे लिखब शुरु क' दैत अछि। लेखक बनबाक लौल जे ने कराबए।
एकटा अजगुत बात भेलनि एहि विदेश-यात्रा मे, महाराज कामेश्वर सिंह सेहो ओही विमान मे सवार छलथिन, जाहि सँ 'व्यास' जी जा रहल छलाह। कामेश्वर सिंह 'व्यास' जी सँ किछु सीनियर छलाह। चूँकि ओ बहुत बेर लम्बा दूरी बला हवाइ यात्रा पहिनहु कएने छलाह, तँ 'व्यास' जी केँ कंफर्टेबल फील करएबाक प्रयास कएलथिन। हवाइ यात्रा संबंधी किछु जनतब सभ सेहो देलथिन। अद्भुत संयोग छलनि ई....! जाहि राजघरानाक राजमाता 'व्यास' जी पर दयाभाव राखैत हुनका पढ़बालेल छात्रवृत्तिक व्यवस्था करबौने छलथिन, ओही राजघरानाक राजकुमारक संग बराबरी मे बैसि क' विदेश-यात्रा क' रहल छलाह 'व्यास' जी। एहने मे कहल जाइत छै....समय समय के बात छै....
आ एहेन समय मे अज्ञानतावश ककरो मोन मे अहंकारो आबि सकैत छलैक, ई सोचि जे आइ हमहूँ अहाँक 'क्लास'क लोक भ' गेल छी। कारण 'व्यास' जी सन ज्ञानी पुरुष सभ थोड़बे होइत अछि। 'व्यास' जीक ज्ञान-विवेकक तँ बाते अलग छलए। ओ आजीवन कृतज्ञ रहलाह हरेक ओहेन लोकक प्रति, जे हुनका कहियो कोनो तरहक सहयोग कएलथिन जीवन मे। आर्थिके सहयोग टा सहयोग नहि होइत छैक ने ! ककरो मानसिक सम्बल देब, ककरो संग शारीरिक रुपेँ ठाढ़ रहब, संग रहब, ककरो उत्साहवर्धन करब, बहुत बड़का सहयोग होइत छैक। धीरेन्द्रनाथ लाहाक पीठ ठोकब आ कहब - "और पढ़ो ! और पढ़ो !!" आजीवन स्मरण रहलनि 'व्यास' जी केँ। तहिना खर्रख मे स्व. बलभद्र बाबू आ दयाबाबू सँ भेटल अपार स्नेह, सहयोग, सम्बल आ आत्मीयता, कहियो नहि बिसरलाह 'व्यास' जी। जखन ओ विद्यार्थी छलाह तखन खर्रख जाइत-आबैत रहैत छलाह। खर्रख सँ हुनकर परिवारक दूरस्थ सम्बन्ध रहनि। तहिना फेर साहित्यिक यात्रा आरम्भ कएलनि तँ अनेक लोक गुरु-तुल्य भेटलथिन।कर्मस्थल पर अनेकों सहयोगी भेटलथिन। एहि विदेश-यात्राक दौरान सेहो कतेको लोकक सहयोग/संग भेटलनि, जकर सभक नाम/चर्चा "विदेश-यात्रा" पोथी मे भेटल। मनुक्खक अतिरिक्त देवता-पितर, मातृभूमि, मातृभाषा मैथिली, सभ किछु लेल हुनका हृदय मे कृतज्ञता भाव छलनि।
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
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