विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-५

हितनाथ झा · 2025-09-01 · अंक 425 · पृष्ठ 15–24

पं.तारानाथ झाक सम्पादकीय दृष्टि

'नवतुरिये आबौ आगाँ' महाकवि वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री'जीक कविता कोन इस्वीक छनि, हमरा नहि बूझल अछि, किन्तु यात्रीजीक जे ई पाँती छनि,तकर शतप्रतिशत अमल कोइलख गाममे युवक संघ(1932)क स्थापनासँ भेल छल से कहि सकैत छी।(युवक संघक स्थापनासँ पाँच वर्ष पूर्वहि 1928मे कोइलखमे पुस्तकालय खुजल छल जे चन्द्रानंद फ्री मिड्ल इंग्लिश स्कूलक भवनमे चलैत छल।)।
कोइलखमे प्रख्यात विद्वान लोकनिक रहितो, भ' सकैछ, हुनका लोकनिक मार्गदर्शनमे नवतुरिये आगाँ आयल आ 'प्रभात' मासिक पत्रिका चलायब आरम्भ कयलक।
प्रभातक पहिल अंक जनवरी 1933मे बहरायल आ अंतिम उपलब्ध अंक अछि दिसम्बर1934 ई.। प्रत्येक महिनामे एक जनवरी क' निकलि जाइत छल, ई बुझना जाइत अछि, कारण जनवरी 1934मे विनाशकारी भूकम्प अयलाक बादो फरबरी 1934क अंक ससमय निकलल ,ई पाठकीय प्रतिक्रियासँ ज्ञात होइत अछि। चौबीस अंकक जानकारी तँ अछि, किन्तु एकर बाद छपलैक कि बन्द भ'गेलैक, एहि तरहक जानकारी नहि अछि। दिसम्बर 1934क अंकमे बन्द होयबाक सूचना सेहो नहि छैक, तेँ निश्चित इहो नहि कहि सकैत छी जे बन्दे भ' गेल हेतैक। संपादक सेहो गाम छोड़ि बनारस गेलाह सेहो बहुत बाद 1947मे करीब। बीचक सेहो छह अंक दीवार चट क' गेलैक,तेँ अठारह अंकक उपलब्धताक आधारपर एहि पत्रिकाक कोनो तरहक धारणा बनायल जा सकैत अछि।
एहि पत्रिकामे नवतुरिये रचनाकारक रचना छपैत छल, इहो एहि पत्रिकाक विशेषता कहल जा सकैछ, जे आइसँ एक्कानबे वर्ष पूर्व कोइलख गामसँ प्रभात पत्रिकाक माध्यमसँ समाजमे नवतुरियाकेँ आगाँ अयबाक आह्वान कयने छल , जे उपलब्ध अंकक अनुसार, प्रकाशित,आलेख,निबन्ध, कथा,कविता आ अन्य प्रकाशित समाचारसँ ज्ञात होइत अछि। तेँ पूर्वमे जे कहल ' नवतुरिये आबौ आगाँ'क शतप्रतिशत कोइलखक तत्कालीन युवकक उत्साह आ कार्यसँ मिथिलाक गाम मध्य कोइलखक महत्त्व सर्वविदित अछि। प्रभातक अग्रलेख आ अन्य साहित्यिक/साहित्येतर रचना/समाचार एकर साक्षी अछि।
प्रसिद्ध आलोचक मोहन भारद्वाज 'प्रभात'क एहि सोचक विषयमे लिखने छथि - " प्रभात तत्कालीन मिथिलाक सामाजिक-साहित्यिक दस्तावेज थिक।उल्लेखनीय अछि जे 1933-34ई.मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे संक्रमण काल छल। 1927 ई.मे 'मिथिला मोद' बन्द भs गेल छल। कुशेश्वर कुमर तथा भोलालाल दासक सम्पादकत्वमे 1929 ई.सँ 'मिथिला' प्रकाशित होमय लागल, मुदा ओहो शीघ्रे बन्द भs गेल। एकमात्र पत्रिका ' मिथिला मिहिर' प्रकाशित भs रहल छल, किन्तु ओहिमे युवातूरक रचनाकारकेँ स्थान भेटब कठिन छलैक। एहने समयमे प्रभातक पदार्पण भेल जे अपन बात लोकधरि पहुँचयबाक युवा मैथिलक व्यग्रताक शमने नहि कयलक, समाज आ साहित्यकेँ विकासक बाट सेहो देखौलक। "
जखन विस्तारसँ प्रभातक रचना आ युवा रचनाकारक विषयमे सम्पादकक दृष्टिक अवलोकन करब, तखन आर स्पष्टतासँ दृष्टिगोचर होयत। एहिठाम हम युवक संघक प्रसंग जे प्रभातमे प्रकाशित अछि, ओहि निबन्धमेसँ दू टा निबन्ध प्रस्तुत क' रहल छी ,जाहिमे एक प्रभातक सम्पादक तारानाथ झाक अछि आ दोसर जयदेव मिश्रक जे ओहि समय कलकत्ता विश्वविद्यालयक छात्र छलाह जे बादमे पटना विश्वविद्यालयक मैथिलीक प्रोफेसर आ शिक्षा निदेशक बिहार सरकार भेलाह । मैथिलीक प्रसिद्ध विद्वान प्रो. मिश्र चेतना समिति,पटनाक सचिव ओ अध्यक्ष पदपर सेहो आसीन भेल छलाह।

युवक संघ
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श्री तारानाथ झा

कोइलख मिथिलामे एक प्राचीन गाम थीक। एहि गाममे अनेक धुरन्धर विद्वान लोकनि भय गेलाह अछि ।ओ लोकनि जनताक उपकारार्थ अनेक संस्था स्थापित कयलन्हि । परन्तु शोकक साथ लिखक पड़ै अछि जे पूर्वक झण्डा सम्प्रति एको टा कायम नहिं अछि । प्रथम कारण क्रमशः लोग स्वार्थी होम लगलाह । स्वार्थी मनुष्य परोपकार कहाँ सँ क ' सकैत अछि । बिना परपोकारी भेने कोनो संस्था चलब असंभव ।
द्वितीय कारण - परस्पर वैमनस्य थीक ।वैमनस्य भेने उपकारक बदला अनुपकारे करब सभक ध्येय रहैत छैक । तेहना स्थितिमे कोनो संस्था कोना चलि सकै अछि ।
तृतीय कारण - आलस्य थीक । की आलसी वुते कोनो कार्य भय सकै छैक ? कदापि नहिं ।
अतः सभ संस्था क्रमहि मेटिया -मेट भय गेल । सभसँ पश्चात मैथिल शिशु कल्याण कारिणी समिति नामक संस्था स्वर्गवासी लक्ष्मीनाथ झाक यत्नसँ भेल छल। जकरो आइ नाम निशान तक नहिं अछि । यैह सभ कोइलखक ह्रासताक एक मात्र कारण अछि ।
जे कोइलख समस्त भारत वर्षमे विख्यात छल तथा समस्त मिथिलाक आदर्श छल , तकर गणना आइ कतहु नहिं होइ अछि । ई परम् खेदक विषय थीक । जखन एहि विषय सभक चर्चा कतहु होमय लगैत छैक तखन हमरा लोकनिक सिर झुकवैक टा पड़ै अछि । कारण जे जे गाम ओहि जवानामे तिलमात्रो गण्य नहिं छल ताहि ताहि गाममे नया नया संस्था स्थापित भय देशक शिरोमणि भय रहल अछि ।
ई बहुत उत्तम बात थीक । एहि हेतु ककरो दुख नहीं करक चाही ।प्रत्युत जहाँ तक भ' सकै ओकर सहायता करक चाही । तथा ओकरे आदर्श मानि कार्य करक चाही । अपना-अपना घरक ,समाजक ,गामक एवं देशक उन्नति तथा अवनति युवकवृन्दक ऊपर निर्भर अछि । यावत तक युवक लोकनि अपना-अपना पैरपर ठाढ़ नहिं होयताह ,तावत तक उन्नति कहाँ ! यैह सभ बात विचारि ,कोइलख निवासी श्री उमानाथ झाक असीम उत्साह तथा उद्योगसँ स्वगाम मध्ये गत अक्टूबर महीनाक १४ मितिक युवक संघ नामक संस्थाक निर्माण भेल । जाहिमे सभ जातिक युवकक स्थान रहलहुँ सन्ता केवल चालीस-एकतालीस युवक नाम लिखलन्हि । जे लोकनि सभ तरहें संस्था के सहायता करबाक वचन देलथिन ।
बहुत खेदक विषय थीक जे एक त एतेक पैघ गाममे अत्यल्प सदस्यक संख्या ,दोसर नामो लिखा ,प्रतिज्ञावद्ध भैयो क' कार्य करबाक हेतु उद्यत नहिं होइ छथि ।कार्य करब तँ दूर रहै , युवक संघक बैठकोमे उपस्थित होयब आपत्तिये बुझै छथि ।
एहि सभ विषयमे कतिपय महोदय वृन्दकेँ अनेक प्रकारक शंका उपस्थित भय जयबाक कारण स्पष्ट रूपे लिखि देब उचित बुझै छी। हम लगातार ५ बैठकमे उपस्थित भेलहुँ अछि ।दस -बारह सदस्य सँ ऊपर कहियो नहिं उपस्थित देखल अछि ।जे सदस्य के प्रथम बैठक में देखल ,प्रायः तिनके 2 अतिररिक्तो बैठकमे देखैत अयलहुँ अछि और यैह सदस्य गण सम्प्रति युवक संघक कार्य कय रहलाह अछि ।
युवक संघक की कर्तव्य छन्हि ,ई प्रायः बहुत व्यक्ति नहिं जनैत हेताह ।अतः सूचित कय देव उचित बुझैत छी ।
प्रथम - ' लोक सेवा '
द्वितीय - ' युवक संगठन '
लोक सेवाक अंतर्गत निम्नलिखित विषय अछि ।
क - आपत्ति कालमे लोकक सहायता
ख -औखद द्वारा दीनक सहायता
ग - पुस्तकालयक प्रबंध
घ- अपढ़ केँ सुपढ़ बनायब
और युवक संगठनक सहायतार्थ समय समय पर
(क) संगीत
(ख) खेल
(ग) निबन्ध प्रतिद्वंद्विता
(घ) वक्तृताक आयोजन कयल जायत।

ई प्रायः सभके विदिते होयत जे करीब ४ वर्षसँ कोइलखदेवी नामक पुस्तकालय कोइलखमे अछि । जे एखन श्रीयुत हेडमास्टरक अनुकम्पा सँ स्थानीय चन्द्रानंद फ्री मिडिल स्कूलमे राखल अछि ।स्कूलक कार्यवाही होयबाक कारण पुस्तकालयक कार्य संचालनमे पूर्ण वाधा होइत छैक । एहन स्थितिमे एक सुन्दर घर पुस्तकालयक निर्माण करैक निमित्त कटिबद्ध भ गेल अछि ।
आइयो काल्हिमे पृथ्वीपर एहन एहन धार्मिक तथा परोपकारी मनुष्य छथि जे असकरो एहन एहन कार्यक हेतु मकान बना सकैत छथि । परञ्च संघ ओकर मत नहिं कयलक ।कारण जे जे कार्य समूहक योगसँ होइ छैक से चिरस्थायी रहैत छैक ,अतः गाम 2 सँ द्रव्य संग्रह कय कार्य क्रमशः भय रहल अछि।एहि कार्यमे शारीरिक परिश्रमक पूर्ण आवश्यकता छैक ।और समूहक योगसँ ई कार्य सुलभ रूपे भ सकै छै ।
जेना संघमे ४0-४१ सदस्यक सम्प्रति नाम लिखल छन्हि ।यदि प्रत्येक सदस्य एहि हेतु अपन अपन चारियो दिनक समय लगावथि त आसानीसँ ई कार्य सम्पन्न भ सकै अछि ।अन्यथा पाँच -सात व्यक्ति अपन अपन समय मासों दिन लागौताह तथापि कार्य सम्पन्न होयब सर्वथा असंभव।एहिमे एको दिन तक कार्य कर वालाक संख्या दस-बारह सँ बेसी नहिं अछि। ई लोकनि करीब ४0 गाम पर्यटन कय चुकलाह अछि । और वरावरि क रहलाह अछि । तकरे फलस्वरूप ईंटा ई सभ पाथल जा रहल अछि ।
आब ई कार्य बन्द होम वला नहिं अछि ।परञ्च वलिहारी थिकैन्ह ओहि पचीस- तीस सदस्य के जे लोकनि एहि दिश कंडेरियो नजरि सँ नहिं तकलन्हि अछि ।एहि विषय पर बेशी लिखब व्यर्थ बुझै छी ।आशा करै छी जे भविष्यसँ अपने सदस्य वृन्द एहि दिश अवश्य ध्यान देबैक । तैखन समस्त गामक तथा देशक उन्नति भय सकैत अछि ।अन्यथा नहिं ।
एहि विषयपर श्रीयुत मन्त्री जी महोदय विस्तृत रूपे अपने लोकनि केँ सूचित कय सकै छथि ।यदि अपने लोकनिकेँ बेशी बुझबाक प्रयोजन हो त मंत्रीजीकेँ प्रार्थना करियैन्ह । सदस्यक हैसियत सँ हमरा जेतवा ज्ञान छल अपने लोकनिकेँ सूचित कयलहुँ अछि ।
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- तारानाथ झा
सम्पादक
प्रभात
(सन्दर्भ : प्रभात : वर्ष-01अंक-04,अप्रैल 1933)

युवक संघसँ अपील
जयदेव मिश्र
(लेखक ओहि समय कलकत्ता विश्वविद्यालयक छात्र रहथि।)

गत जुलाइ मासक " मिथिलाक उन्नति कोना हयत " ई शीर्षकक लेख देखि हमरहु इच्छा भेल जे एहि विषय पर अपन किछु विचार पाठकक सम्मुख उपस्थित करी परन्तु कोनो लेख लिखबाक पूर्व पाठकक रुचि बूझि लेब परमावश्यक ताहूमे एहना अवस्थामे जखन हमरालोकनिक संस्थाक एहन अवस्था अछि जे किछुओ विरोधीलोकक ठाढ़ भय गेलासँ धीयापुताक धूरामाटिक खेल जकाँ एकरहु उसरि जयबामे विलम्ब नहिँ होयतैक । यद्यपि नवयुवक द्वारा स्थापित संस्थाक एहन हीनावस्था युवक पक्षमे बड़े लज्जाक विषय थीक तथापि हमरालोकनिक वर्तमान सामाजिक स्थितिमे एकर प्रतिकार सर्वथा असंभव । युवक-मंडलीक एक साधारण सदस्य रहलहुँ सन्ता अधिक काल गामसँ बाहर रहबाक कारणे संघ-सम्बन्धी कार्यमे हेरफेर करबाक सलाह देव अनुचित थीक परन्तु ई कहब अनुचित नहिँ जे युवक--संघकेँ युवकोचित कार्य्य करबामे युवकीययुक्त साहस एवं त्याग देखयबाक चाही ।
ई कहब अनावश्यक जे हमरालोकनिक समाजक सम्प्रति बड़े दयनीय दशा भय गेल अछि । ई समाज एखन साहित्य विहीन , संगठनविहीन अर्थात ताहि द्वारा प्राणविहीन भय परम् अधोगतिमे पड़ल अछि ।जे समाज एक समयमे सम्पूर्ण भारतवर्षक गौरब छल ,ओकर एहन हीनावस्था संसारक आठम आश्चर्यजनक वस्तु थीक । मिथिलाक साम्प्रतिक हीनावस्थाक सुधारक हेतु सभसँ आवश्यक थीक जे एकरा भाषाक उन्नति हो तकरा विना किछु हयब असंभव। हमरालोकनिक पक्षमे ई केहन लज्जाक विषय थीक जे हमरालोकनि मैथिलक टीकाके उठाय हिन्दीवालाक टीका धारण कय अपनाकेँ गौरवान्वित मानैत छी।बंगाल प्रभृत प्रान्तमे जतय बी0ए0 और एम0ए0 क्लासमे अन्य भाषाकेँ छोड़ि मातृभाषाक माध्यमे सभ विषयक पठन-पाठन विद्यार्थीसभक सुविधार्थ प्रारम्भ कयल गेल अछि ओतहि हमरालोकनिक देशमे उच्च कक्षाक कथा कोन छोटको-छोटको कक्षामे मातृभाषाकेँ छोड़ि हिन्दी भाषाक द्वारा शिक्षा देल जाइत अछि ।एहि विषयमे एतबे कहब पर्य्याप्त जे मैथिलेतर कोनो जाति मातृभाषाक एहि अपमानकेँ कदापि सह्य नहिँ करैत । जाहि भाषाक कुसुम-सुरभिसँ भारत बर्षक अत्युन्नत बंगला साहित्य सुवासित भेल ताहि भाषाक ओकरा जन्मस्थानोमे एतेक अनादर ई मैथिलक हेतु बड़े लज्जाक विषय थीक। मैथिलक हेतु ओ बड़े गौरवक दिन होयत जखन मैथिल सन्तान- ज्योतिरीश्वर, विद्यापति , गोविन्द दास प्रभृति महानुभाव लोकनिक रचनाक आदर करब सीखत । जाहि समयमे हिन्दी तथा बंगलाक भाषाक स्पन्दनों नहिँ भेल छलैक ताहि समयमे मैथिलीमे एहन-2 ग्रन्थरत्नक निर्माण भेल जकरा लय संसारक कोनो साहित्य अपनाकेँ धनीक बुझि सकैछ । एकर उदाहरणस्वरूप वर्णरत्नाकर सदृश ग्रन्थ वर्तमान अछि । लेखकेँ बेशी नहिँ बढ़ाय केवल एक बात कहि एकरा समाप्त करब ।
हमरा कॉलेजक एक प्रोफेसरक मैथिली- प्रेमक विषयमे सुनि इच्छा भेल जे हुनका क्लासमे जाय किछु सुनी । हमरा विषयमे ई बूझि जे ई मैथिल थिकाह ओ मिथिलाक प्राचीन इतिहासक व्याख्या करैत विद्यार्थी लोकनिकेँ कहलथीन्ह जे मिथिलाक उपकारक हेतु बंगाल ओकरा कतय सभ दिन ऋणी रहत । ई बूझि हमरालोकनिकेँ बड़े दुःख होइछ जे बंगला भाषाक आदर्शस्वरूप मिथिलाभाषाक एहन अधोगति भय गेल छैक जे मैथिलो लोकनि आब हिन्दीयेकेँ अपना लेलन्हि अछि । विद्यापतिक भाषाक एहन अधोगति बड़े दुर्भाग्यक विषय थीक ।"
ओ विद्यार्थी लोकनिकेँ एक मीटिंग कय मिथिलाक विषयमे हमरासभकेँ वार्तालाप करयक हेतु कहथिन्ह। विद्यार्थीसभमे ककरा गर्ज छैक जे ओतेक कष्ट उठाबय परन्तु जे बुझनिहार बंगाली अछि ओ मिथिला तथा ओकर भाषाकेँ बड़े आदरक दृष्टिसँ देखैत अछि । मिथिलाक प्राचीन गौरवगाथा सुनि जहिना छाती फूलि उठैछ ,तहिना एकर भाषाक वर्तमान अवस्थाक चर्चा सुनलासँ इच्छा होइछ जे कतहु मूँह नुकाली - फेर ओकरा बाहर नहिँ करी । मैथिलीक प्रति पक्षपात अपनेलोकनिमेसँ कतोक व्यक्तिकेँ नाराज कय देलक अछि । से हमर दुर्भाग्य थीक । मैथिली भाषा कोनो खास व्यक्तिक सम्पत्ति नहिँ -ओ तँ सम्पूर्ण मिथिलाक प्राणस्वरूप थीक तैं यदि ओ चले जायत तँ फेरि बचते की । अपना घर बैसल जतेक मनमौजी पोलाब खाइत रही परन्तु साहित्यविहीन जातिक जे अपमान अन्यत्र होइत छैक से कियो अपमानिते व्यक्ति बुझि सकैत अछि । हम प्रश्न करैत छी जे युवक-संघक हेतु मातृभाषाक उद्गार करबासँ बढ़ि कय की आन कोनो पुण्य कार्य भेटि सकैत अछि ?
इत्यलम ।।
---लेखक :- जयदेव मिश्र
(सन्दर्भ : प्रभात,वर्ष -01, अंक- 10 अक्टूबर 1933)
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-4

Suggested citation: हितनाथ झा. “मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-५.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 425, pp. 15–24, 2025-09-01. https://www.videha.co.in/research/2025/425/मैथिली-साहित्यमे-तारानाथ-झा-एवं-हुनक-परिवारक-योगदान-५.htm

मूल विदेह अंक / Original issue