विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-७

हितनाथ झा · 2025-10-01 · अंक 427 · पृष्ठ 10–25

तारानाथ झाक किछु महत्वपूर्ण आलेख एवं संपादकीय
'प्रभात'मे सामाजिक, राजनीतिक,आर्थिक आदि साहित्येतर गद्य रचना तँ रहिते छल, साहित्यिक रचना सेहो प्रचुर मात्रामे रहैत छल, संगहि विभिन्न प्रकारक समाचार ( सम्पूर्ण मिथिलाक) जाहिमे खेल समाचारक सेहो प्रमुखता रहैत छल। एहि पत्रिकामे बहुत एहन विषय-वस्तु छल, जे पूर्वमे मैथिलीक पत्रिकाक इतिहास छल, ओहिसँ बहुत आगाँक वस्तुसभ पत्रिकामे समावेश अछि, जे सम्पादकक दूरदृष्टि स्पष्ट झलकि सामने आबि जायत। प्रसिद्ध आलोचक मोहन भारद्वाज एहि प्रसंग कहैत छथि ----
"समाचार खण्डक बानगीसँ पता चलैत अछि जे सम्पादकक दृष्टि कतेक व्यापक छलनि। समाचार संकलित करैत काल हुनका सम्मुख मिथिलाक विभिन्न क्षेत्र आ मिथिलाक गतिविधिक विभिन्न क्षेत्र तँ रहिते छलनि, मिथिलाक सभ जाति आ वर्गक लोक सेहो रहैत छलनि। हुनका लेल व्यक्ति नहि, व्यक्ति आ समाजक जीवन-स्थितिकेँ प्रभावित करयवला महत्वपूर्ण होइत छल। एकटा उदाहरण देखल जाय। अगिलग्गी ककरो लेखे बड़ पैघ घटना थिक। हम सभ जनैत छी जे पूर्णियाक श्रीनगर ड्यौढ़ीमे 17 जुलाइ 1933 केँ श्रीनगर ड्यौढ़ीक जरिकेँ छाउर भs जयबाक पूर्ण विवरणक संग महाराजाधिराज, दरभंगाक श्रीनगर ड्यौढ़ीमे 17 जुलाइ 1933 केँ करीब चारि घण्टा रहबाक सूचना दैत छथि तँ दोसर दिस ई समाचार सेहो प्रकाशित करैत छथि जे 27 मइ 1934केँ कोइलखक बटौआ धानुकक घरमे करीब चारि बजे दिनमे आगि लागि गेलैक जे जनसमुदायक तत्परतासँ विकराल रूप धारण करबासँ पूर्वहि शान्त कs देल गेल। एहिना कोइलखक महादेव ठाकुरक घरमे 15 अप्रैल 1934केँ निशाभाग रात्रिमे कोनो दुष्ट द्वारा आगि लगायब आ हुनक सभ घर तथा सैकड़ो मन अनाजक जरि जायब उल्लेखनीय अछि तँ ओही गामक धोबि सभक घरक स्वाहा भs जयबो महत्वपूर्ण अछि। एहि तरहेँ कहि सकैत छी जे प्रभात मैथिलीमे समाचार-विचारक पत्रिकाक नेओं रखलक। साहित्यिक पत्रिकाक ओहि युगमे सामाजिक-राजनीतिक घटनाक प्रति अतिरिक्त अभिमुखता एक टा एहन पृष्ठिभूमिक निर्माण कयलक जकर फलाफल भेल ' दैनिक स्वदेश '(1955 ई.)मे। इएह दृष्टिकोण थिक जाहि कारणे 'प्रभात'मे कविता-कथाक अपेक्षा निबन्धक संख्या बेसी अछि। ''(सन्दर्भ: एकल पाठ -मोहन भारद्वाज)
तारानाथ झाक किछु निबन्ध एतय प्रस्तुत अछि, जे प्रभातक स्वर-भंगिमाक परिचायक होयत आ मोहन भारद्वाजक उपर्युक्त कथ्यक पुष्ट करत।
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मिथिलाक प्राचीन परिस्थिति
प्राचीन कालमे ई मिथिला देश विद्या, बुद्धि, विवेक, विभव, क्रिया, कौशल, कल्याणसँ परिपूर्ण छल, ताहिपरसँ धार्मिक तथा सामाजिक व्यवस्था तेहेन सुदृढ़ छलैक जाहिसँ ई मिथिला देश सब देशसँ अत्यन्त उत्कृष्ट देश कहबैत छल। सामाजिक व्यवस्था एहेन छलैक यदि कोनो तरहक उत्कृष्ट कार्य्य केओ करै छलाह तँ ओकर उल्लेख पञ्जीकारक प्रबन्ध-मालहुमे समाजसँ बहुत शीघ्र करा देल जाइत छलैन्हि, जाहिसँ एको गोटेक उत्कृष्ट कार्य्यसँ समस्त कुलहुक मर्यादा छलैन्हि। तहिना यदि केओ अपकृष्ट कार्य्य करै छलाह तँ ताहिसँ हुनक समस्त वंश के कलंकित होमय पड़ैत छलैन्हि।
जहिना सम्मान करबाक हेतु समाज सबखन उदारतापूर्वक प्रस्तुत रहैत छलथिन्ह , तहिना दंडो करबाक हेतु कठोरे। यदि एको व्यक्तिसँ धर्म-विरुद्ध कार्य्य केना जाइत छलैन्हि, तकर प्रख्यात विद्युत जकाँ बहुत शीघ्रे समस्त देश मध्य भय जाइत छलैन्हि, ताहिसँ लाभ ई होइत छलैक जे कोनो तरहक अनुचित कार्य्य केओ नहि करै छल,परस्त्री,परद्रव्य, परांशहरणक कथा कोन, अत्यावश्यक परलौ सन्ता अन्य व्यक्तिसँ याचना-पुरस्सर विशेष धनादिक संग्रहो करब अपन पारलौकिक क्रिया-कलापक हेतु विघ्न स्वरूपे बुझै छलाह।
एतद्देशवासी विद्वान लोकनि तेहन सन्तोषशाली छलाह जे अहोरात्रिमे एको संध्या शाक तथा कंद-मूलसँ परिवारक पोषण अपन परम कर्तव्य बूझि, राजाक प्रतिग्रहसँ परांगमुख रहैत छलाह। ताहिसँ आत्मशक्ति तथा विद्या दिनानुदिन वर्द्धिष्णुता के प्राप्त करै छलैन्हि।
मिथिलामे पूर्व ब्राह्मण-मण्डलीमे विद्योन्नति छल, तकर तँ उल्लेखो करब हम व्यर्थ बुझै छी। जनश्रुति तँ ई अछि जे अन्य देशी केओ विद्वान मंडन मिश्रसँ शास्त्रार्थ करबाक उद्देश्यसँ मिथिला आबि जाहि ग्राममे मंडन मिश्र रहै छलाह, ताहि ग्राममे प्रवेश कैलन्हि। " मंडन मिश्रक घर कोन थिकैन्हि ? " ई अन्वेषण कयलापर मंडन मिश्रक एक दासी उत्तर देलकैन्हि जे ---
'स्वतः प्रमाणम् परतः प्रमाणम् शूकांगना यत्र विचार्यन्ति।
शिष्योपशिष्यइ रूपगीयमान मवेदि तं मण्डन मिश्रधामः।।
ई कथा प्रायः कोनो मैथिलसँ अविदित नहि होयत। एहेन-एहेन आदर्शक चौपाड़ि मिथिलामे अनेकानेक छल।
पूर्वमे राजाक ध्यान विद्योन्नति दिश पूर्ण रूपेँ रहै छलन्हि। हमरा देशक विद्वान जे किछु अपन मातृभाषा अथवा देवभाषा मध्य अपन कोनो ग्रन्थ लिखै छलाह त राजा हुनका यथोचित पुरस्कार दिया हुनक उत्साहकेँ बढ़बैत छलथिन्ह। (स्रोत : प्रभात, वर्ष-01, अंक- 06, जून-1933)
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मैथिलक अवनति
मिथिला, मैथिल जाति विद्याहीक कारणसँ सदा विख्यात अछि। एहि देशमे ज्ञानक चर्चा त एतेक छल जे ब्राह्मणक कोन कथा, क्षत्रियो लोकनि जनकादि प्रभृत के वर्णन पुराणमे आदर्श ज्ञानीक नामसँ कैल गेल अछि। योगी याज्ञवल्क्य आदि अनेक ऋषिमुनिक जन्मभूमि इएह मिथिला देश थीक। प्राचीन कालक बात के जाय दिअ, एहि कलियुगहुमे मैथिल ब्राह्मणमे मंडन मिश्र, वाचस्पति मिश्र और शंकर मिश्र आदि अनेक धर्मात्मा विद्वान और मदन उपाध्याय सदृश सिद्ध लोकनि एहि संसारक विशेष उपकार कय अपन नाम चिरस्मरणीय कय गेलाह अछि। अन्य देशी विद्वानकेँ परास्त कयनिहार हमरा लोकनिक समयमे खुद्दी झा तथा लुट्टी झा भय गेलाह अछि। एहि तरहक अनेक विद्वान यथा मधुसूदन झा प्रभृति सम्प्रति वर्तमान छथि। जनिक यश एहि देशमे के कहय, विलायतहुमे पसरल अछि। एकर एकमात्र कारण संस्कृत विद्या थीक।
मूर्खो मैथिल आन जातिक पण्डितसँ विशेष संस्कारवान होइ छथि, तेकर कारण हमरा बूझि पड़ै अछि जे मिथिला देशक स्त्रीयोक दूधमे संस्कृत विद्याक बीज छैक। ई सभ गुण रहलोपर आब मैथिल समाजक उन्नतिक रंग नहि देखि पड़ै अछि। दिनानुदिन अवनतिये बूझि पड़ै अछि। एहना समयमे हमरा लोकनि के ई परम आवश्यक कार्य थीक जे सभ गोटे अपन-अपन मत लेख द्वारा 'प्रभात' तथा अन्य पत्रादिमे प्रकाशित करी जे कोन रूपे मैथिल समाजक उन्नति भ' सकै अछि। तदनन्तर सभ गोटे इकट्ठा भै कार्य रूपमे परिणत करबाक यत्न करी। हम जहाँ तक तर्क करै छी जे सर्वप्रथम विद्याहीक उन्नति तथा अवनतिसँ देशक उन्नति ओ अवनति होइ छैक। उदाहरणार्थ --- इंग्लैण्ड, जापान और अमेरिका के देखू --- विद्या उन्नतिक कारण संसारमे सभ देशक शिरोमणि कहल जाइ अछि। अतः एहिमे कोनो सन्देह नहि जे मैथिल समाजक उन्नति केवल विद्याहीक द्वारा भेल छल और ओकरे कमी भै गेलासँ अवनति होमय लागल अछि। जाहि मैथिल समाजमे केवल संस्कृतहीक चर्चा होइ छल ताहि समाज के एकत्रित भेलापर सम्प्रति हँसी-ठट्ठा होमय लगै अछि। तेहना स्थितिमे उन्नति कहाँ सँ भय सकै अछि। हमरा लोकनिकेँ अविद्या तेना क' दवा लेलकै जे अपन हित और अहित किछु नहि बूझि पड़ै अछि।
विद्या अनेक प्रकारक अछि, ताहिमे सम्प्रति दू मुख्य भेद अछि। प्रथम- संस्कृत विद्या और दोसर - राज विद्या अर्थात अँग्रेजी। एहि दुनू विद्या के पढ़बामे बहुत असुविधा भय गेल अछि। पूर्वमे पाँच-पाँच, सात-सात गामक बीचमे समस्त मिथिलामे पाठशाला छल। जाहि पाठशालामे निःशुल्क छात्र विद्याध्ययन करै छला तथा भोजन वस्त्रादि राजा महाराजा इत्यादिक द्वारा भेटै छलैक। एहिसँ लोक उत्साहपूर्वक पढ़ै छल। आब एकर प्रावधान नहि अछि। एहिसँ एहि विद्याक नष्ट हेबाक क्रम बूझि पड़ै अछि। जखन हमरा लोकनि नीक जकाँ जनै छी जे बिना संस्कृत विद्यासँ एको दिन हमरा लोकनिक कार्य्य चलनिहार नहि अछि अर्थात उपनयन,विवाह, श्राद्ध, पूजा-पाठ इत्यादिमे संस्कृत विद्या बिना कार्य्य नहि चलि सकै अछि, तेहना स्थितिमे संस्कृत विद्याक प्रचारमे सभ केओ कियैक ने ध्यान दै जाइत छी। आबहु संस्कृत विद्याक रक्षा करू नहि तँ पछतेनहुँ किछु लाभ नहि होयत।
दोसर अँग्रेजी विद्या पढ़ब आर कठिन अछि। कारण ---मैथिल समाजक आर्थिक स्थिति एहन खराब भय गेल अछि जे भरि पेट अन्नो होयब दुर्ग भय गेलैक अछि। तखन अंग्रेजी विद्याक पठन-पाठनक हेतु अधिक खर्च कोना चलि सकै अछि। अंग्रेजी विद्यामे अधिक द्रव्यक प्रयोजन पड़ै छैक, ई प्रायः सभ गोटे जनितहि होयब। हमरा लोकनि के एक एहन रास्ता निकालक चाही जाहिमे बिना खर्चे अथवा अल्प खर्चे अंग्रेजी विद्याक अध्ययन क' सकय। यदि एकर कोनो उपाय हो तँ प्रभातमे तथा अन्य पत्र-पत्रिकामे लेख द्वारा प्रकाश करै जाउ। जिनकर तर्क सभसँ उत्तम होयतैन्ह तेकर प्रचारमे सभ के तन-मनसँ लागि जयबाक चाही। (सन्दर्भ: प्रभात, वर्ष-01 अंक- 05 मइ 1933)
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सदस्यक चुनाव
भोटक आन्दोलन
डिस्ट्रिक्ट बोर्डक मेम्बरक चुनावक हेतु गत एक महीनासँ आन्दोलन भय रहल छल। थाना-थाना सँ प्रजाक प्रतिनिधि बनबाक हेतु कै व्यक्ति ठाढ़ भेल छलाह। राज्यक तरफ सँ प्रत्येक थानामे प्रतिनिधि ठाढ़ करावल गेल छलाह। हुनका लोकनिकेँ राज्य सभ तरहसँ सहायता कय रहल छलैन्हि। फलस्वरूप प्रायः दरभंगा जिलाक अधिकांश थानामे राज्येक तरफक व्यक्ति भोट द्वारा प्रतिनिधिक चुनाव भेल। मधुबनी थानासँ चारि व्यक्ति ठाढ़ भेल छलाह। जाहिमे राज्यक तरफक दुनू व्यक्ति, बाबू शिव शंकर झा तथा लक्ष्मीनाथ मिश्र प्रतिनिधि चूनल गेलाह। बाबू चतुरानन दास और बाबू अनूप लाल ठाकुर भोट कम होयबाक कारण हारि गेलाह। उपर्युक्त दुनू व्यक्ति के जितबाक दू कारण, प्रथम--- राज्यक सहायता। द्वितीय- मैथिल के मैथिलक प्रति सहानुभूति। अन्य सभ जाति के अपनामे एकता बनल रहल छैक। ताहि कारणसँ ओहि जातिक कमो वोटर रहलोसँ अन्य जातिक कमो वोट आबि गेलासँ अपना जातिक प्रतिनिधि भय जाइ छलैक। प्रतिनिधियो अपना जातिक उन्नतिक हेतु सभ तरहसँ उपाय करै छथीन। परन्तु मैथिल ब्राह्मणमे नहि। जहाँ अपन कार्य्य भय गेल तखन अपना जातिक उपकारक त कथे कोन, जहाँ तक भ' सकै छैन अनुपकारे करबामे सर्वदा तैयार रहै छथि। एहि बेर मैथिल अपन जाति भाइक वचन तथा भावी उपकारक आशा पर अपन-अपन वोट दय प्रतिनिधिक पद पर आरूढ़ कय देलकैन्ह अछि। यदि ओ लोकनि अपन-अपन वचनक पालन करताह त विश्वास राखथु जे भविष्यसँ मैथिल वोटर मैथिल छोड़ि अन्य जातिकेँ कदापि वोट नहि दय सकै अछि।
22 मइ वोटक चुनावक दिन छल। मधुबनी वोटरसँ ठसाठस भरल छल। 09 बजे दिनसँ थानामे भोट देबाक कार्य्य प्रारम्भ भेल तथा 05 बजे सायंकाल तक कार्यवाही होइत रहल। सैकड़ो व्यक्ति चारू गोटाक तरफ सँ अपन-अपन बाकसक रंगक पताका नेने गर्द करैत दृष्टिगोचर होइ छलैक। अन्य सवारीक कथे कोन, हाँजक-हाँज मोटर गाम-गाममे पिपिआइत फिरै छल। जकरा इच्छा होइ छलैक, चढ़ि लै छल। कोनो रोक-टोक नहि छलैक। प्रतिनिधिक ओहिठाम भोजनक प्रबन्धक त कथे कोन। एक-एक व्यक्ति ओहि ठाम हजार-हजार आदमी भोजन कयलक। पूरी, चूड़ा, भात, तीनुक प्रबंध छलैक । व्यक्तिक हिसाबसँ भोजन देल जाइ छलैक। जे जाइ छल से भोजन कय लै छल। श्राद्धो, उपनयनमे जमींदारोक ओत एतेक ब्राह्मण भोजन होयब असम्भवे भ जाइ छैक। धन्य ई वोट, जे एतेक ब्राह्मण भोजन। यदि वोटक कार्यवाही बनले रहल त एखन की भेलै, हैत त दिन-दिन। (सन्दर्भ : प्रभात, वर्ष-1,अंक-6, जून1933ई.)
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मनुष्य गणनाक रिपोर्ट
सन 1931 ई.मे जे मनुष्य-गणना भेल छल तेकर रिपोर्ट आब प्रकाशित भय गेल। सरकारी रिपोर्टक अनुसार पता लगै अछि जे सम्पूर्ण संसारक जनसंख्या 1850000000(एक अरब पचासी करोड़) भेलैक अछि। ताहिमे पंचमांश अर्थात 352837778(पैंतीस करोड़ अट्ठाइस लाख सैंतीस हजार सात सय अठहत्तरि) भारत वर्षक जनसंख्या (वर्मा सहित) छैक। भारतवर्षक जनसंख्यामे खास अंग्रेजी राज्यक जनसंख्या 271526933(सताइस करोड़ पंद्रह लाख छब्बीस हजार न सय तैंतीस) (ताहिमे वर्माक जनसंख्या 14667146( एक करोड़ छियालीस लाख सढ़सठि हजार एक सय छियालीस) और देशी राज्यक जनसंख्या 81310845( आठ करोड़ तेरह लाख दस हजार आठ सय पैंतालिस) छैक।
सन 1921 ई.मे जे मनुष्य गणना भेल छलैक ताहि हिसाबसँ ज्ञात होइ अछि जे गत दस वर्षमे भारतक जनसंख्या तीन करोड़ चालीस लाख अर्थात सैकड़े साढ़े दस बढलैक अछि। एहिसँ साफ-साफ ज्ञात होइ अछि जे फ्रांस या इटलीमे जतेक कुल आबादी छैक, ओतेक भारत वर्षमे केवल दस वर्षमे बढलैक अछि।1921 ई.मे जे मनुष्य गणना भेल छल ताहिमे संसार भरिमे चीनक आबादी सभ देशसँ बेसी भेल छलैक परञ्च 1931 ई.क मनुष्य-गणनासँ पता लगै अछि जे भारतवर्षक जनसंख्या सभ देशसँ अधिक भेलैक अछि। सन 1921ई.मे एहि देशक पढ़ल-लिखल मनुष्यक संख्या 22623651 छल, परञ्च1931ई.मे 28131315 भ गेलै अर्थात जहाँ सैकड़े सात छल, ओत' 8 भ' गेलै।
सम्प्रति 38985427 मनुष्य शहरमे रहै अछि। भारत वर्षमे 39 शहर एहेन अछि जत सर्वदा एक लाख और एक लाखसँ अधिक मनुष्य रहै अछि। गत दस वर्षमे कलकत्ताक आवादी सैकड़े 12, मद्रासमे सैकड़े 23, कराँचीमे सैकड़े 23, दिल्लीमे सैकड़े40, बंगलोर मे सैकड़े 45, नागपुरमे सैकड़े 48, लाहोड़मे सैकड़े 53, अमृतसरमे सैकड़े 65 और सलेममे सैकड़े 96 बढलैक अछि। हिन्दूमे प्राप्त-वयस्क युवतीक संख्या54473438 अछि और युवाक संख्या 51450266 अछि। उपर्युक्त युवतीक संख्यामे 8413773 विधवाक संख्या अछि। पहिला मनुष्य गणनाक अनुसार एहि देशमे विभिन्न धर्मावलम्बीक संख्या निम्नलिखित अछि। हिन्दू --239195140(ताहिमे 122616300 पुरुष और 116578843 स्त्रीक संख्या अछि।) मुसलमान---77677545(जाहिमे 40867320 पुरुष और 36810225 स्त्रीक संख्या अछि।) ईसाई---- 6296763(एहिमे 3227090 पुरुष और 4069673 स्त्रीक संख्या अछि।) ट्राइवल (कबीले)- 8280347 अन्यान्य धर्मावलम्बी- 19079762(एहिमे 9790635 पुरुष और 9289147 स्त्रीक संख्या छैक।) (सन्दर्भ: प्रभात, वर्ष-01,अंक- 11 नवम्बर-1933)
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रामायणमे आशंका
रामायण प्रायः प्रत्येक भाषामे अछि। प्रत्येक भाषाक रचयिता अलग-अलग व्यक्ति छथि। सभसँ प्राचीन ' वाल्मीकि रामायण' कहल जाइ अछि जे महर्षि वाल्मीकि संस्कृतमे श्री रामचन्द्रजीक लीलाक वर्णन कयने छथि। यद्यपि तुलसीदास और चन्दा झा वाल्मीकि रामायण के आधार मानि रचना कयने छथि तथापि कोनो-कोनो स्थलमे वाल्मीकि-रामायणसँ अंतर भय गेल छैक, ई ततेक असंगत नहि, जेना एके व्यक्ति एके ग्रन्थमे स्थल-स्थल पर अन्तर कय देलासँ असंगत अवगत होइछ। यथा महर्षि वाल्मीकि चारि स्थल मे श्री रामचन्द्र जीक वन-गमन-कालक अवस्था चारि प्रकारक देलैन्हि अछि जे गंगाक जहूरी खाँक लेखक वचन प्राप्त कय नीचाँ विवरण करै छी।
प्रथम स्थल- जखन रावण यतिक वेषमे सीताक निकट गेलाह तखन सीता अपन पूर्ण परिचय दैत कहलथिन----" मम भर्ता महातेजा वयसापञ्चविशकः।" (10,वा.रा. अरण्य-कांड स.47) एहिसँ साफ-साफ ज्ञात होइ अछि जे वन जाइक समय श्री रामचन्द्र जीक अवस्था 25 वर्षक छलैन्ह।
द्वितीय स्थल-जखन विश्वामित्र दशरथसँ राम-लक्ष्मणकेँ मंगवाक हेतु गेल रहथि तखन दशरथ कहलथिन ---- " उनषोडशवर्षों मे रामो राजीव लोचनः। "(2 वा.रा.बा.का. सँ.29।
अर्थात रामक अवस्था केवल 15 वर्षक छैन्ह। सीताजी रावणसँ कहलथिन्ह --- " उशित्वा द्वादश समा इक्ष्वाकुण निवेशने।" (4, वा.रा.अरण्य का.स. 47)। अर्थात विवाहक बाद 12 वर्ष तक दशरथक घर रहि तखन हमरा लोकनि वन अयलहुँ। एहि प्रकारसँ श्री रामचन्द्र जीक अवस्था वन-गमनक काल 45+12"=27 वर्षक होइ अछि।
तृतीय स्थल- वन जयबाक काल श्री रामजी अपन माय कौशल्यासँ भेट करबाक हेतु गेलाह तखन कौशल्या कहलथिन -- "सप्तदश च वर्षाणि जातस्य तव राघव।" (45,वा.रा. अयोध्या कांड.सँ.20)। एहि प्रकार श्री रामचन्द्रजी के वन-गमन कालक अवस्था 17 वर्षक ज्ञात होइ अछि।
चतुर्थ स्थल --- जखन रावण मारीचक निकट सहायताक हेतु गेलाह, तखन मारीच श्री रामचन्द्रजीक वर्णन करैत कहलथिन जे - ' द्वादशवर्षेयमक.......राघवः।' ( 6 वा.रा.अरण्य का.सँ. 38) । अर्थात जखन विश्वामित्र मुनि दशरथसँ राम के माँगक हेतु गेल रहथि तखन श्री रामजीक अवस्था केवल 11 वर्ष छलैन्ह। एहिमे बारह बारह जोड़लासँ वन-यात्राक समय श्रीरामचन्द्रक अवस्था 23 वर्षक होइ अछि। एहना स्थितिमे हमरा सन्देह होइ अछि जे कोन अवस्था ठीक थिक और कियैक महर्षि वाल्मीकि एहि विषयपर पूर्ण विवेचना कय नहि दर्शउलैन्हि ? अतः ई विषय अपने विद्वद्जनक निकट उपस्थित कयलहुँ अछि जे आगामी प्रभातक लेखम युक्ति-युक्त वचन दय हमरा मनक सन्देह हटयबाक कृपा करब।
तारानाथ झा (कोइलख)

सम्पादकीय टिप्पणी
'प्रभात'क प्रकाशित 24 अंकमे मात्र 18 अंक उपलब्ध अछि आ जे पहिल अंक उपलब्ध अछि ओ थिक अप्रैल-1933 ई.क।
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कतिपय लेखक दातावृन्द अपन-अपन लेख प्रभातक कागज कागज रहलहु पर नकल कय लेबाक हेतु हमरा प्रेषित कय दैत छथि। तेकर एकमात्र कारण आलस्य ज्ञात होइ अछि।लेख के रचने करबामे अधिक बुद्धिक तथा परिश्रमक प्रयोजन छैक।और एहिमे बेशी समय लगै छैक। जखन रचना भय जाइ छैक, तखन साधारणो व्यक्ति कागज पर साफ कय सकै अछि। एहिमे कोनो विशेष विद्वत्ता नहि।परञ्च हमर विचार अछि जे जहाँ तक भ' सकय प्रभात मे
स्वहस्तलिखित लेखक संख्या अधिक रहक चाही।कारण-एहि प्रकारसँ प्रभात प्रकाशित भेलापर विशेष आदर होयबाक सम्भावना। हम एहि निमित्त ओहि व्यक्ति केँ नहि आग्रह कय सकै छियैन्हि, जिनका प्रभातक कागजपर लिखित लेख पठेबामे अधिक असुविधा तथा खर्च होइन्हि।
प्रभातक कार्यालयमे एक सुन्दर लेख लिखनिहार व्यक्तिक परम् आवश्यक छैक। लेखक केँ 20 तारीख सँ 30 तारीख तक प्रत्येक मास मे समय-समय पर लेख लिखक पड़तैन्ह। अधिकांश लेख अपनहुँ घरपर लिखबाक अधिकार देल जयतैन्ह।एकर संग समय-समय पर इहो सूचित कय देब उचित बुझै छी जे संघक आर्थिक स्थिति अत्यन्त शोचनीय छैक, अतः लेखक महोदय के सम्प्रति किछुओ वेतन देबासँ संघ सर्वथा असमर्थ अछि। एहिमे परोपकार अवश्य छैक । परोपकार करबामे त्यागक प्रयोजन पड़ै छैक। त्याग बिना साहस के नहि भय सकै छैक।तेँ हेतु हमर विज्ञप्ति जे एहि निमित्त साहस करू, अवश्य धर्म तथा यश होयत।स्वहस्तलिखित आवेदन पत्र 20 एप्रिलक अभ्यन्तर अयबाक चाही। (वर्ष-01, अंक-4, अप्रैल-1933 ई.)
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प्रभातमे प्रत्येक भाषाक स्थान देल गेल अछि, अतः तीन चारि भाषा प्रत्येक अंकमे रहै अछि।अनेक लेखकवृन्द एकहि पत्रपर अनेक भाषामे अनेक विषय लिखि प्रेषित कय दैत छथि। प्रथम तँ प्रायः सभ लेखकवृन्द जनितहि होयब जे प्रत्येक भाषा तथा अक्षरक हेतु प्रभातमे क्रमिक रखबाक व्यवस्था छैक।द्वितीय-ई भय सकै अछि जे ओहिमे एक विषय प्रकाश करबाक योग्य रहि सकै अछि और अतिरिक्त नहि। एहिना स्थितिमे लेखक महोदयवृन्द सँ विज्ञप्ति जे प्रभातक एक पत्रपर अनेक भाषामे अनेक विषयपर लिखि खिचड़ी बना नहि प्रेषित करथि, अर्थात अलग-अलग लिखबाक कष्ट करथि।
जिनका प्रभातक कार्यालयमे चिट्ठी लिखबाक होइन्ह , अपन कागजमे चिट्ठी लिखि पठाबथि।पूर्ववत प्रभातक कागजमे चिट्ठी अयलासँ कागज नष्ट भय जयबाक सम्भावना।कारण- अनेक चिट्ठी प्रभातमे प्रकाशनार्थ आयल अछि, जेकरा प्रकाश कयला सँ परस्पर विरोध एवं संस्था केँ हानिये भय सकै छैक, तथा अनेक पत्र प्रकाश करब अनावश्यके बूझि पड़ै अछि एहिना स्थितिमे प्रभातमे नहि प्रकाश कयल जा सकै अछि। यदि कोनो पत्रमे प्रकाश करबाक योग्य रहत त कार्यालयहिमे प्रभातक कागजमे नकल कय प्रकाश कय देल जायत।
युवक संघक सदस्यक वार्षिक चन्दा सँ प्रभातक खर्च चलावल जाइ अछि।यद्यपि संघ एक प्रति प्रभातक खर्च उत्साहपूर्वक दय रहल अछि और आशा कयल जाइ अछि जे बराबरि र0दैत रहथि।परञ्च संघ सम्प्रति अनेक परोपकारार्थ कार्य कय रहल अछि जाहिमे द्रव्यक पूर्ण प्रयोजन होइत रहै छैक। एहिना स्थितिमे प्रभातक ख़र्चक हेतु द्रव्यक कोनो अन्य प्रबन्ध भय गेला सँ संघकें बहुत उपकार होयतैक। अन्य प्रबन्ध उत्साही व्यक्तिक योग बिना कदापि नहि भय सकै छैक। अतः उत्साही व्यक्तिसँ प्रार्थी छी जे प्रभातक अग्रिम अंक सँ ख़र्चक भार अपना ऊपर लय पूर्ण यशक भागी होउ। (वर्ष-01, अंक-05,मइ 1933ई.)
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अपने पाठकवृन्दसँ ई अविदित नहि जे मासमे प्रभात एक प्रति प्रकाशित कयल जाइछ। और मासाभ्यन्तर गामक तथा अन्य गामक पढनिहारक संख्या 500सै सँ कम नहि होइ अछि।आनन्दक विषय थीक जे दिनानुदिन पढनिहारक संख्या बढ़ले जाइ अछि। जाहिसँ सभ पढ़ि सकै ताहि दिश सभक ध्यान रहक चाही। परन्तु खेदक साथ लिखक पड़ै अछि जे एहना स्थितिमे कतिपय पाठक महोदयवृन्द प्रभातक नियम के पैर सँ कुचलबा मे एकोरत्ती संकोच नहि करै छथि अर्थात 6 घंटाक बदला दू-चारियो दिन राखि लेब अनुचित नहि बुझै छथि। आब हम एहि विषयपर बेशी लिखब व्यर्थ बुझै छी और आशा करै छी जे भविष्य सँ पाठक महोदय केँ जहाँ तक शीघ्र भ सकैन्हि पढ़ि क प्रेषित कय देथि।
कैक व्यक्ति प्रभात अपना ओहिठाम पढ़बाक हेतु ल गेलाह अछि,अपने पढ़ि आनो व्यक्ति के पढ़ैक हेतु द देलखीन्ह अछि। एहि प्रकार सँ कइएक व्यक्ति पढ़ि लै छथि। ई उत्तम विषय त अवश्य थीक,यदि अपन-अपन कर्तव्य पर आरूढ़ रहथि। लेकिन से नहि होइ अछि, ओहिमे केओ व्यक्ति प्रभात ल जा क राखि लै छथि, यदि मासो दिन बीति जयतैन्ह त कनेको चिन्ता नहि।एहना स्थितिमे प्रभातक पता लगैबो दुर्ग भ जाइ अछि।पता लगैबो मे बहुत समय लागि जाइ अछि। एहि प्रकारसँ लाभ सँ बेशी हानिये दृष्टिगोचर होइछ।अतः प्रभात ल गेनिहार व्यक्ति सँ हमर प्रार्थना जे अन्य व्यक्ति के प्रभात नहि दय सम्पादक के प्रभात प्रेषित कय देथि। यदि अन्य व्यक्ति के प्रभात देमक होइन्ह त सम्पादकक अनुमति सँ देथि। (वर्ष-01, अंक 06, जून 1933 ई.।
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गत फरबरी मासक प्रभातमे प्रकाशित भय चुकल अछि जे लेखक प्रभातक कागजक दुनू तरफ यदि नहि फूटै त लिखि सकै छथि, परन्तु कतिपय लेखक कागज फुटियो गेला पर दुनू पृष्ठमे लिखि दै छथि। कागज फुटि गेला सँ देखबामे भद्दा तथा बाँचवा मे कष्टतर होइछ। अतः प्रत्येक लेखक महोदयसँ निवेदन जे भविष्य सँ कागजक एके पृष्ठ चिन्हित रेखाक भीतर लिखथि।
लेखक के लेख लिखबाक समय शुद्धाशुद्ध पर विशेष ध्यान राखक चाहियैन्ह। जाहि लेखक के शुद्धाशुद्धक विशेष ज्ञान नहि छैन्हि तिनका अन्य व्यक्ति सँ शुद्ध करा लेब उचित थिकैन्ह । एहिमे कोनो लाघवता नहि छैक। जिनका अन्य व्यक्ति सँ शुद्ध करायब विचारान्तर होइन्हि से सम्पादक के पठा देथि ओ शुद्ध कय ,करा प्रेषित कय देताह।
लेख प्रकाश होयबा मे नियमबद्ध उत्तम रचनाक अतिरिक्त सुन्दर अक्षर तथा शुद्धाशुद्ध पर ध्यान राखल जाइ छैक। एहिमे एको विषयक त्रुटि भेला सँ प्रकाशित होयब असम्भव भ जाइछ। अतः लेखकवृन्दकेँ सूचित करबै छी जे यदि स्वहस्तलिखित अक्षर सुन्दर नहि होन्हि त एहिना स्थितिमे अन्यो लेखक सँ लिखा सकै छथि। (वर्ष-01, अंक-08, अगस्त -1933 ई.)
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आठ मासक टोटल हिसाबसँ अवगत होइछ जे प्रभातमे लेख लिखबाक हेतु प्रभातक कागज जे लेखकवृन्द के देल गेलैन्हि अछि, ताहि सँ करीब तेहाइ कागज नहि वापस आयल अछि। जहाँ तक पता लगै अछि जे कतिपय लेखकवृन्द कागज लय नष्ट करबामे तिलमात्रो संकोच नहि करै छथि, तिनका सँ हमर अनुरोधक संग-संग प्रार्थना जे भविष्य सँ प्रभातक कागज के अन्य विभागमे खर्च नहि करथि।
कतिपय लेखकवृन्द नियमित समयसँ पूर्वहि लेख लिखि लै छथि,परञ्च आलस्यवश नियमित समय सँ पूर्व प्रेषित करबा सँ असमर्थ भय जाइत छथि, जाहि कारण हुनक लेख प्रकाशित होयबामे कै-कै मास विलम्ब भय जाइ छैन्हि। अतः हुनका सँ हमर प्रार्थना जे लेख लिखब समाप्त होइतहिं आलस्य छोड़ि सम्पादक के लेख प्रेषित कय देथि, जाहिसँ समयपर प्रकाशित भय जाइ। (वर्ष-01,अंक-09, सितम्बर)
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झाक एवं हुनक परिवारक योगदान-6

Suggested citation: हितनाथ झा. “मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-७.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 427, pp. 10–25, 2025-10-01. https://www.videha.co.in/research/2025/427/मैथिली-साहित्यमे-तारानाथ-झा-एवं-हुनक-परिवारक-योगदान-७.htm

मूल विदेह अंक / Original issue