विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

नेपथ्य मे रहनिहार मिथिलाक एकटा अदम्य सेवक ओ प्रहरी: पंडित भवनाथ झा

डा. शैलेन्द्र मिश्र · 2025-10-15 · अंक 428

१.१८.डा. शैलेन्द्र मिश्र- नेपथ्य मे रहनिहार मिथिलाक एकटा अदम्य सेवक ओ प्रहरी: पंडित भवनाथ झा
डा. शैलेन्द्र मिश्र
नेपथ्य मे रहनिहार मिथिलाक एकटा अदम्य सेवक ओ प्रहरी: पंडित भवनाथ झा
मंच पर अबै बला कलाकार केँ तऽ सब कियो देखैत अछि, ओकरा लेल थोपड़ी बजबैत अछि, ओकर अभिनयक प्रशंसा करैत अछि— मुदा कमे लोक केँ ई बात बुझल रहैत अछि जे मंचक उज्जर रोशनीक पाछू, नेपथ्य मे कतेको लोक अहिना निःशब्द अपन योगदान दऽ रहल होइत छथि, जिनकर बिना मंचक सफलता संभव नहि भऽ सकैत अछि। नाटक मंचनक सफलता केवल मात्र मंच पर प्रदर्शन करनिहार कलाकार पर निर्भर नहि करैत—ओहि लोक पर सेहो निर्भर रहैत अछि जे परदाक पाछू रहि दिन-रात मेहनति करैत छथि। नाटककार, निर्देशक, परिकल्पक, संगीतकार, तकनीकी सहायक, संपादक, पांडुलिपिक शोधक—एहि सबक श्रम सँ मंचक जादू संभव बनैत अछि। मुदा नेपथ्य मे रहब ने सभहक वशक बात छै आ ने सभ केँ सोहाइत छै। मुदा भवनाथ झा ओहि गोट लोक मे छथि जे नेपथ्य मे रहि मैथिली साहित्य, नाटक आ संस्कृति केँ अपन ज्ञान आ समर्पण सँ पोषित करैत छथि।
किछु वर्ष पूर्व जखन हमरा नेपालक मैथिली क्षेत्र मे रहनिहार प्रसिद्ध भाषाविद् प्रो० रामावतार यादव जी सँ वार्तालाप भेल, तऽ ओ अपन बातचीतक क्रम मे बारम्बार भवनाथ झा जीक नाम लैत कहलनि— “आब तऽ अइ पार-ओइ पार, अर्थात भारत आ नेपाल दुनू ठाम पांडुलिपि विशेषज्ञ बहुत कम रहि गेल छथि। भवनाथ झा सन लोक मैथिली संस्कृतिक अमूल्य धरोहर केँ जीवित रखबाक निरंतर प्रयत्न करैत छथि।” एहि बातसँ ई स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे भवनाथ झा केवल विद्वान नहि, एकटा आंदोलनक प्रतिमूर्ति छथि—ज्ञान, शोध आ संरक्षणक आंदोलन।
मैथिली भाषाक मूल स्रोत—ओ ग्रंथ, जे नेवारी लिपि मे नेपालक राजकीय पुस्तकालय, मठ-मंदिर आ शाही संग्रहालय मे सुरक्षित अछि—तकर पुनर्खोज, पठन, विश्लेषण आ पुनर्प्रकाशन भवनाथ झा जीक जीवनक प्रमुख ध्येय रहल अछि। ओ केवल पांडुलिपिक अध्ययन नहि करैत छथि, बल्कि ओकर पाठ-संशोधन आ विकृति-सुधार सेहो करैत छथि, जाहि सँ ओ ग्रंथ पाठक धरि पठनीय रूप मे पहुँचि सकय। एहि कारण मैथिली साहित्यक आदिकालीन ग्रंथ सभ पुनः जनमानसक बीच जीवित भेल अछि। भवनाथ झा जीक कार्य केवल पांडुलिपि शोध तक सीमित नहि अछि। ओ मैथिली भाषाक शुद्ध उच्चारण, व्याकरण, ध्वन्यात्मक रूप आ मूल भाषिक स्वरूपक रक्षा लेल सतत सक्रिय छथि। ओ मानैत छथि जे “भाषा संस्कृति केर आत्मा अछि”—आ एहि आत्माक रक्षा करब सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य अछि। भवनाथ झा केँ एहि क्षेत्रक ‘मौन प्रहरी’ कहल जाए तऽ उचित होयत, किएक तऽ ओ सदिखन मैथिली आ मिथिला लेल सतर्क आ समर्पित रहैत छथि।
नेपालक मिथिला क्षेत्र—जनकपुर, धनुषा, सिरहा, सप्तरी, विराटनगर आदि—मैथिली संस्कृति सँ ओतप्रोत अछि। भवनाथ झा जीक शोधक क्षेत्र केवल भारत तक सीमित नहि रहल; ओ नेपालक मठ-मंदिर, पांडुलिपि संग्रहालय आ विश्वविद्यालय सभ मे सेहो शोध करैत रहैत छथि। हुनक प्रयास सँ मैथिली भाषाक कतेको दुर्लभ ग्रंथ, जे नेवारी लिपि मे 15वीं–16वीं शताब्दीक कालखंडक अछि, नव रूप मे उपलब्ध भेल अछि। एतेक महान योगदानक के बादो भवनाथ झा जी सदिखन नेपथ्य मे रहबाक पक्षधर छथि। ने ओ प्रसिद्धिक खोज मे छथि, आ ने पुरस्कारक मोह मे। हुनका लेल साक्षात पुरस्कार अछि—मैथिली संस्कृति आ ज्ञान-संपदाक पुनर्जीवन। एहन लोक विरल भेटैत अछि, जे अपन कर्म सँ समाज केँ समृद्ध बनबैत अछि, मुदा अपन नामक प्रचारक लेल मौन रहैत अछि। भवनाथ झा जी नवपीढ़ीक लेल एकटा प्रेरणा-स्रोत छथि। हुनक जीवन सिखबैत अछि— “लोकप्रियता सँ पैघ अछि लोकसेवा, आ प्रसिद्धि सँ पैघ अछि परंपराक संरक्षण।” एहि भावनाक संग ओ अपन जीवनक प्रत्येक क्षण मैथिली संस्कृतिक संवर्द्धन लेल समर्पित केने छथि। ओ कतेको शोध-पत्र आ व्याख्यान विश्वविद्यालय सभ मे प्रस्तुत कए चुकल छथि। नेपाल, जनकपुर, दिल्ली, पटना, दरभंगा आ मधुबनीक विभिन्न सम्मेलन सभ मे हुनक योगदान विशेष रूप सँ सराहल गेल अछि।
मंचक कलाकारक चेहरा भले चमकैत हो, मुदा नेपथ्यक दीपकक रोशनी बिना मंच अपूर्ण रहैत अछि। भवनाथ झा जी ओ दीपक छथि—जे चुपचाप, निःस्वार्थ रूप सँ मिथिला, मैथिली आ संस्कृति केँ उजागर कए रहल छथि। ओ नेपथ्यक लोक छथि, मुदा हुनकर कर्मक आभा सम्पूर्ण साहित्यिक जगत केँ आलोकित कए रहल अछि। मैथिली समाज सदिखन गर्व सँ कहि सकैत अछि— “जँ मंच पर कलाकार मिथिलाक शोभा छथि, तऽ नेपथ्य मे भवनाथ झा जकाँ लोक मिथिलाक आत्मा। ”पंडित भवनाथ झा मिथिला आ मैथिलीक संस्कृतिक क्षेत्रक ओहन सपूत छथि जे बिना कोनो भय आ लोभक अपन बात कहैत छथि। ओ कखनो एहन बातक चिंता नहि करैत छथि जे “लोक की कहत”—सत्य जेना हो, ओहनहि रूपमे रखैत छथि। ओ लोकप्रियताक सस्ता साधन नहि खोजैत, बल्कि अपन आत्मबल आ विद्वत्ता सँ समाजकें दिशा दैत छथि। भवनाथ झा अपन कलम आ शब्दक माध्यम सँ मिथिलाक सुच्चा प्रहरी छथि। हुनकर लेखनी सदिखन सच बजैत अछि—चाहे से मिथिला समाजक बनावट, बनावटिक संस्कृति या तथाकथित “प्रसिद्ध” व्यक्तित्व पर कियैक ने हो। मिथिला मे जे प्रवृत्ति तेजी सँ देखाय दैत अछि—दोसरक रचना या पुरान साहित्य केँ अपन नाम सँ प्रस्तुत करबाक—ताहि बनावट संस्कृतिक विरुद्ध भवनाथ झा लगातार आवाज उठबैत रहैत छथि। ओ एहन व्यक्तित्व छथि जे मिथिलाक आंतरिक विकृति केँ ओघटैत, समाज केँ स्वावलंबनक दिशामे सोचबाक प्रेरणा दैत छथि।
सोशल मीडिया पर हुनकर सक्रियता अतुलनीय अछि। ओ ने मात्र साहित्यिक विमर्श करैत छथि, बल्कि मिथिला समाजक नैतिक चेतना केँ जागृत करबाक माध्यम सेहो बनल छथि। जेठ-पुरुखक परंपरा सँ लऽ कऽ आधुनिक सृजनशील पीढ़ी धरि, ओ सभकें निरंतर चेतबैत रहैत छथि—“संस्कृति केँ बचाबू, जे मूल अछि।” भवनाथ झा केँ विशेष बनबैत अछि हुनकर बहुभाषिक अभिव्यक्ति। ओ मैथिली सँ लऽ कऽ संस्कृत, हिन्दी आ अंग्रेजी धरि समान रूप सँ मिथिलाक गौरव केँ प्रचारित करैत छथि। हुनकर दृष्टि स्पष्ट अछि—मिथिला केवल मैथिली भाषा नहि, बल्कि एकटा बहुआयामी सभ्यता आ ज्ञानकेंद्र अछि। ओकरा लेल मिथिला केवल भूगोल नहि, बल्कि एकटा चेतना अछि—जे भाषा, आस्था, शिक्षा आ संस्कृतिकेँ एकसूत्र मे जोड़ैत अछि। ओ अपन शब्द सँ लगातार एहि चेतनाक पहरेदारी करैत छथि।
ई सत्य अछि जे पंडित भवनाथ झा मिथिला लेल ओ उजियार दीप छथि जे अन्हारक बीचो-बीच सेहो अपन ज्योति सँ मार्ग देखबैत रहैत छथि। आशा अछि जे भगवान हुनका दीर्घायु करथि, जाहि सँ ओ अपन अमूल्य विचार, तर्क आ निष्ठा सँ मिथिलाक भावी पीढ़ीक मार्गदर्शन करैत रहथि। ओहि नेपथ्यक सेवक केँ प्रणाम, जे बिना नामक लोभ मे मिथिलाक गौरव केँ जिन्दा रखने छथि।
-डा. शैलेन्द्र मिश्र (अनुवादक एवं शोधकर्ता, संपर्क-7600744801)
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Suggested citation: डा. शैलेन्द्र मिश्र. “नेपथ्य मे रहनिहार मिथिलाक एकटा अदम्य सेवक ओ प्रहरी: पंडित भवनाथ झा.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 428, 2025-10-15. https://www.videha.co.in/research/2025/428/नेपथ्य-मे-रहनिहार-मिथिलाक-एकटा-अदम्य-सेवक-ओ-प्रहरी-पंडित-भवनाथ-झा.htm

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