१.९.मुन्नाजी-बीहनि कथाक शास्त्रीय पक्षक निर्धारक- श्री भवनाथ झा (पृष्ठ १८३-१८७)
१.१०.रमेश-'घुरि आउ कमला' (पृष्ठ १८८-१९३)
१.११.डॉ.आभा झा-कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे (पृष्ठ १९४-२०१)
१.१२.दीपा मिश्र-उसरन डीह- पाठकीय प्रतिक्रिया (पृष्ठ २०२-२०७)
१.१३.सुनिल कुमार भानू -गहबरक बाटपर संघारामक पाखंड आ समाजक यथार्थ (पृष्ठ २०८-२१२)
१.१४.पण्डित भवनाथ झा-हितनाथ झा (पृष्ठ २१३-२२०)
१.१५.डॉ.धनाकर ठाकुर-संग्रहणीय व्यक्तित्व पं.भवनाथ झा (पृष्ठ २२१-२२२)
१.१६.मुरारी कुमार झा-सरलताक आवरण मे निहित विद्याक विराट रूप (पृष्ठ २२३-२२६)
१.१७.कौशल कुमार- भवनाथ झा सँ साक्षात्कार (पृष्ठ २२७-२३९)
१.१८.डा. शैलेन्द्र मिश्र- नेपथ्य मे रहनिहार मिथिलाक एकटा अदम्य सेवक ओ प्रहरी: पंडित भवनाथ झा (पृष्ठ २४०-२४४)
१.१९.आशीष अनचिन्हार-भारतीय ज्ञान परंपरामे भवनाथ झाजीक महत्व (पृष्ठ २४५-२४९)
०.०.विदेह ४२८ म अंक पर मन्तव्य
(विदेह भवनाथ झा विशेषांक)
प्रणव कुमार झा
विदेहक एकटा गम्भीर आ प्रशंसनीय प्रयास रहल अछि जे ओ मैथिली भाषा-साहित्य आ शोध सभक "डिजिटल घर" बनेबाक दिशा मे अग्रसर अछि। पिछला किछु वर्ष सँ विशेषांकक माध्यम सँ परंपरा आ नव-विचारक बीच संवाद स्थापित करबाक प्रयास असाधारण रूपेँ होइत रहल अछि। पाठकक रूप मे पंडित भावनाथ झा विशेषांकक माध्यम सँ मिथिलाक वर्तमान के एकटा आर विद्वानक जीवन आ कार्य/उपलब्धि आदि के विषय मे परिचय प्राप्त करबाक अवसर भेंटल। भवनाथ झा विशेषांक के मैथिली अकादमिक परंपराक एकटा डिजिटल दस्तावेज केर रूप मे देखल जा सकय अछि, जतऽ पं. भवनाथ झा केँ एकटा विद्वान, शोधकर्मी, सम्पादक, संस्कृतज्ञ आ लोक-समर्थक व्यक्ति रूपेँ सम्मान देबाक संगहि हुनक जीवनक अकादमिक योगदानक मूल्यांकन करैत अछि।
ई विशेषांक मात्र कृतित्व विश्लेषण नहि, बल्कि ज्ञानपरंपरा, लिपिविज्ञान आ पाण्डुलिपि अध्ययनक विमर्श केँ केंन्द्रस्थ करबाक गंभीर प्रयास कहल जा सकय अछि। एहि अंकमे विद्वान लेखकक योगदान, संपादन-प्रक्रिया आ स्थानीय ज्ञान-धरोहरक प्रति समर्पण देखना जाय अछि। यदि अंककेँ स्रोत-प्रकाशनक बिबलियोग्राफी, दृश्य-सामग्री (पाण्डुलिपि आ शिलालेख झलक, छायाप्रति, भेंट-मुलाक़ात के तस्वीर) के संयोजन सँ आओर समृद्ध बनायल जाए तऽ एहि तरहक विशेषांकक प्रभाव आर बेसी पैघ भऽ सकय अछि।
प्रारंभिक लेख सभ भवनाथ झा केर जीवन, शिक्षण, साधना आ अकादमिक दृष्टि पर ठोस प्रकाश दैत अछि। भाषा सरल, तथापि भाव गंभीर। विदेह संपादक मंडलक प्रयास रहल अछि अछि जे विषयक प्रवेश एक तर्कसंगत क्रममे होय। एहिमे संपादकीय संतुलन देखायल।
कल्पना झाक साक्षात्कार भावात्मक दृष्टि सँ अत्यंत मूल्यवान लागल। संवादक शैली सहज अछि, आ साक्षात्कार मे पुछल गेल प्रश्न आ ओकर सहज उत्तर रोचक आ ज्ञानवर्धक रहल। एहि साक्षात्कारमे पंडित भवनाथ झा अपन जीवन-यात्रा, प्रारम्भिक सर्जनात्मक लेखन, पाण्डुलिपि-विज्ञान आ शिलालेख-पठनक व्यवहारिक अनुभव, आ आधुनिक समयमे मैथिली/मिथिला लेल आवश्यक नीतिगत-ढाँचा पर स्पष्ट, सहज आ मार्मिक विचार देलनि। ओ अपन व्यक्तिगत संस्मरण (विद्याकोष, विद्यापति-गोष्ठी, साहित्यिक आरम्भ), पाण्डुलिपिक संपादनक पद्धति, शिलालेखक रक्षाबद्ध तकनीक (इंक-स्टम्पेज आ फोटोग्राफी), आ संस्थागत समस्या सभ (संग्रहक क्षय, संस्थानक मृतप्राय अवस्था आदि) पर विस्तृत प्रकाश देलनि। साक्षात्कार कुल मिला कए शोध-उन्मुख, प्रोत्साहक आ मार्गदर्शक स्वर में अछि।
विजय देव झा के Pandit with MacBook and Manuscripts अंग्रेजी लेख विशेषांकक अंतरराष्ट्रीय पठनीयता केँ विस्तार दैत अछि। पारंपरिक पण्डितक संग आधुनिक तकनीकी संगमक प्रतीक रूपेँ भवनाथ झा केँ प्रस्तुत करबाक दृष्टि प्रेरक अछि। एहि से पहिनेहो नारायण चौधरी विशेषांक मे रणधीर झाक अंग्रेजी लेख विदेह द्वारा छापल जा चुकल अछि। हमरा लेखे कोनो विशेषांक मे ऐ तरहक आलेख global readership लेल सेहो सेतुक निर्माण करैत अछि।
डॉ. कैलाश कुमार मिश्रक आलेख मिथिलाक जीवित मानव धरोहर विशेषांकक केन्द्रीय आकर्षण कहल जा सकय अछि। डॉ. मिश्र द्वारा लिखल ई संस्मरण-आलोचना मिश्रित निबंध भवनाथ झा केँ "पाण्डुलिपि विज्ञानक जीवित धरोहर" रूपेँ प्रतिष्ठित करैत अछि। भाषा प्रवाही, प्रमाणिक आ भावनात्मक रूप सँ ऊर्जस्वित अछि। दासजी भवनाथ झा केर शोध दृष्टि केँ अकादमिक परिप्रेक्ष्य मे रखैत छथि, जबकि मुन्नाजी हुनका "बीहनि कथा"क शास्त्रीय आधार मे देखैत छथि। ई दुनू लेख भावनाथ झा जी केर बहुआयामी ज्ञानक प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि। यद्यपि, आलेखन शैली मे आलोचनात्मक एकरूपता केर कनि अभाव देखायल। मुरारी कुमार झा स्वयम युवा शोधकर्ता छईथ। ऐ तरहक विशेषांक मे शोधकर्ता विद्वान के संग अपन संस्मरण लिखब हुनका सन नव शोधकर्ता के नव ऊर्जा आ प्रेरणादायी भेल हेतय।
विशेषांक मे आन आन लेखक सबहक लेख द्वारा पंडित भावनाथ झाक कविता, कथा आ आलोचनात्मक समीक्षा सभक समावेश भेल अछि। विशेष रूपेँ "गहबरक बाटपर संघारामक पाखंड" में समाज-संस्कृति पर झा जीक दृष्टिकोणक प्रतिच्छाया झलकैत अछि। हितनाथ झा द्वारा प्रस्तुत लेख आत्मीय संस्मरण अछि, जबकि धनाकर ठाकुरक निबंध संग्रहणीय व्यक्तित्व शीर्षक अनुरूप संतुलन राखैत अछि। आशीष अनचिन्हारक अंतिम लेख "भारतीय ज्ञान परंपरामे भवनाथ झा जीक महत्त्व" सम्पूर्ण विशेषांकक बौद्धिक निष्कर्ष रूपेँ ठाढ़ भेल अछि।
-राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली
आशुतोष मिश्र
आदरणीय Bhairab Lal Das कऽ आलेख पढलउ , नीक लागल संगहि हुनकर सलाह जेँ आब सेनापति केर असगर युद्ध नहि कऽ नेतृत्व करथि एहि पर आदरणीय भवनाथजी सँ ध्यान देबाक आग्रह।
-दरभंगा
डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
पंडित भवनाथ झा पुरातत्व, इतिहास, संस्कृत, धर्मशास्त्र, साहित्य, मैथिली लिपि, पांडुलीपि आदि विद्या अथवा विधा केर प्रामाणिक विद्वान छथि। प्रस्तर पर लिखल अथवा उकेरल लिपिकेँ पढ़बाक लूरि हिनका छनि। विदेह द्वारा प्रकाशित पंडित भवनाथ झा विशेषांक हिनक ज्ञान केर एक उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि। एहि विशेषांक के पूरा पढ़ल। हमरा जनैत ई एक अति महत्वपूर्ण काज भेल अछि। यद्यपि ईहो अनुभव भेल जे भवनाथ झा पर किछु आरो विद्वान हुनकर अलग-अलग काज पर चर्चा करितथि तऽ विशेषांक केर महत्त्व आर बढ़ि सकैत छलैक। आब जे भेल से कम मुदा सारगर्भित अछि।
विशेषांक पर गजेन्द्र ठाकुर केर संपादकीय केर अतिरिक्त 17 लोक लिखने छथि। जाहि मे एक हमहूँ छी। सतरह मे एक अंग्रेजी मे श्री विजयदेव झा लिखने छथि आ डॉ. श्री कृष्ण जुगनू हिंदी मे लिखने छथि जकर बहुत सार्थक मैथिली अनुवाद श्री आशीष अनचिन्हार जी केने छथि। अनुवाद केर जतेक प्रशंसा करी से कम। कखनो ई नहि लागल जे अनुवाद पढ़ि रहल छी। पंडित भवनाथ झाक संक्षिप्त परिचय एक सारस्वत काज थिक। आशीष अनचिन्हार बहुत कम शब्द मे हिनक परिचय, काज, काजक महत्ता आदि पर प्रकाश दैत छथि। पंडित भवनाथ झा पर अलग सँ एक आलेख सेहो अनचिंहार जी लिखने छथि।
भैरव लाल दास हिनक पाण्डुलिपि विज्ञान पर योगदान, मिथिलाक्षर आ आन बात सभ पर चर्च करैत हिनका अपन विद्या केर प्रसार करबा लेल नव जनरेशनक शोधार्थी के प्रशिक्षित करबा लेल सुझाव दैत छथि। सुझाव नीक छनि। पंडित भवनाथ झा ई काज कऽ सकैत छथि, करक अवश्य चाही। प्रश्न ई उठैत अछि जे एहि कार्य लेल आर्थिक मदति कत' सँ भेटत? मिथिला अथवा बिहार अथवा भारत केर उद्योगपति कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी केर फण्ड सँ किछु द' सकैत छथि की? फण्ड लेल की कएल जा सकैत अछि? की एक विद्वान केर समूह बनाबी जे एहि पर काज करथि? एहनो भ' सकैत अछि जे हमरा लोकनि एक प्लेटफार्म बना क्राउड फंडिंग केर बात करी? किछु भ' सकैत अछि। से भेल तऽ विशेषांक अपन उदेश्य मे सफल रहत।
पंडित भवनाथ झा केर रचना आ हुनक ज्ञान परंपरा पर श्रीमती कल्पना झा एक विस्तृत साक्षात्कार प्रस्तुत केने छथि। ई जरुरी काज भेल अछि. साक्षात्कार केर प्रश्न अथवा जिज्ञासा सेहो सार्थक बुझना गेल अछि। यद्यपि ई सम्पूर्ण नहि कहल जा सकैत अछि। साक्षात्कार मे विद्वान सामान्यतया ओही प्रश्न अथवा जिज्ञासा केर उत्तर देत छथि (अथवा समाधान करैत छथि) जे जिज्ञासा हुनका समक्ष राखल जैत छनि। साक्षात्कार अनेक बेर साक्षातकर्ता केर बुद्धि, ओहि विषय पर हुनक पकड़, व्यक्तिगत सोच, कोनो वाद अथवा विषय केर प्रति हुनक पूर्वाग्रह आदिक कारणे समस्त व्यक्तित्व केर परिचय देबा मे समर्थ नहि भ' सकैत अछि. तखन एकर की समाधान आ की विकल्प? हमरा जनैत एकर विकल्प ई भ' सकैत अछि जे विद्वान के अपन कार्य आ उपलब्धि पर एक विस्तृत आलेख लिखबा लेल प्रेरित करक चाही। संगहि जाहि संस्थान आदि लेल काज केने छथि, तकर अधिकारिक विद्वान लोकनि सँ किछु बात लिखा लेबाक चाही। हम अनेक ग्रंथ सभक काज, तकर लिपि के पढ़ब, ओकर अनुवाद, टिप्पणी आदि केर बात देखल अछि पंडित भवनाथ झा द्वारा. नीक लागल. अगर सभ ग्रंथ के बारे में संक्षिप्त जानकारी दस सँ पंद्रह वाक्य मे देल रहितैक तऽ सजग पाठक लेल ई रामवाण केर काज कऽ सकैत छल।
मुन्ना जी बीहनि कथा केर आरंभिक समय मे पंडित भवनाथ झा केर योगदान केर चर्च करैत एक बेर पुनः हुनका सँ अहि मे सक्रिय होबाक आह्वान करैत छथि।
पाण्डुलिपि पर काज करब, कोनो ग्रंथ मे अगर कमी छैक, ओकर सभ बात आ टेक्स्ट मूल रूप सँ ज्ञात नहि छैक, ओकरा कोना सहायक ग्रंथ अथवा आन आन ग्रंथ (प्रमाणिक ग्रंथ) जाहि मे ओहि ग्रंथ सं देल उद्धरण सभ ताकि ओकरा कोना प्रमाणित बना सकैत छी तकर लूरि आ कला पंडित भवनाथ झा मे छनि। ई बात स्पष्ट होइत अछि श्री विजयदेव झा केर आलेख (जे आलेख कम आ हुनक पंडित भवनाथ झा संग काज करक व्यक्तिगत अनुभव पर लिखल गेल कथ्य छनि) सँ होइत अछि।
डॉ. धनाकर ठाकुर अपन आलेख सँ निराश करैत छथि। ठाकुर जी मिथिला मैथिली लेल बहुत काज केने छथि। बहुत तरहक शास्त्र लोक, इतिहास, धर्म शास्त्र आदि केर ज्ञान छनि। हमरा लगैत अछि, ठाकुर जी निश्चित रूप सँ पंडित भवनाथ झा केर अवदान सँ परिचित छथि, मुदा कोनो बात हुनक कथन सँ स्पष्ट नहि भेल अछि। हुनका पढ़ैत काल ई अनुभव भेल जेना ट्रेन केर कोनो जनरल बोगी मे खचाखच भरल भीड़ मे हड़बड़ी मे किछु लिख देने होथि!
एक बात कहब तऽ बिसरि गेल रही जे गजेन्द्र ठाकुर अपन संपादकीय मे पंडित भवनाथ झा केर काज केर महत्ता के स्थापित करैत पाठक के हिनका पर उपलब्ध सभ सामग्री के पढबा लेल उत्कंठा उत्पन्न करैत छथि।
हितनाथ झा जी अपन गाम कोइलख के बारे मे लिखबा के क्रम मे हिनक ज्ञान सँ लाभान्वित भेल छथि, बाद मे किछु पुरातात्विक चीज, मूर्ति आदि के समय आदि के प्रमाणिक होबा मे हिनक ज्ञान केर सार्थक वर्णन करैत छथि। ई एक प्रमाण देब भेल जे भवनाथ जी ज्ञाता छथि। ज्ञाता संग सहज छथि. उत्सुक लोक के सही दिशा प्रदान करबैत छथि. हिनक व्यक्तित्व पर एक प्रकार सँ इ रबर केर मोहर मारब भेल. ई प्रयास नीक छैक।
डॉ. श्री कृष्ण जुगनू केर अनुभव जे "अगस्त्य संहिता' केर प्रमाण लेल तीस बरख सँ भटकि रहल छलाह तकर मूल ग्रंथ, ओकर मूल टेक्स्ट आ टेक्स्ट केर स्पष्टीकरण कोना पंडित भवनाथ झा करैत छथि ताहि पर अनमोल छनि। ई हिनका अर्थात पंडित भवनाथ झाक योगदानकेँ मिथिला के कहैत अछि बिहार सँ बाहर राजस्थान मे कीर्तिमान बनबैत छनि।
डॉ. विनयानंद झा केर काज महत्वपूर्ण छनि कारण ओ पंडित भवनाथ झा केर पाण्डुलिपि सँ सम्पादित पोथी केर एक तरह सँ किछु केर annotated विवरण आ अनेक केर एक सँ तीन वाक्य मे जानकारी प्रस्तुत करैत छथि। ई काज स्तुत्य छनि मुदा ई छुछुआन काज भेल. एकर विस्तार जरुरी छैक. पन्द्रह सँ बीस पन्ना मे भेला सँ ई काज बहुत नीक रहितैक। मुदा अतबो काज त वैह केलनि ताहि लेल साधुवाद हिनका।
लेखक रमेश सँ ज्ञात होइत अछि जे भवनाथ जी एक दीर्घ कथा "घुरि आउ कमला" लिखने छलाह। रमेश जी एक परिपक्व आलोचक केर नाते पोथी केर भाषा, हिनक विवरण, दीर्घ कथा आ उपन्यासिका केर द्वन्द आदिक चर्च करैत कहैत छथि जे भवनाथ जी कथा आ साहित्य कम लिखैत छथि मैथिली मे तँइ हिनक ई विधा ओतेक ठोसगर नहि भ' रहल छनि। मुदा एक बात तऽ अवश्य स्पष्ट होइत अछि जे सभ ठाम हिनक पाण्डुलिपि केर सांच खोजबाक प्रवृत्ति जीवंत रहैत छनि। रमेश जी कथा गोष्ठी अभियान केर "सगरि राति दीप जरय" मे पंडित भवनाथ झाक प्रारंभिक सक्रियता केर वर्णन सेहो करैत छथि।
डॉ. आभा झा केर आलेख पंडित भवनाथ झा केर एक संस्कृत पोथी "भ्रूणपञ्चाशिका" पर छनि। जेना कि नामकरण सँ स्पष्ट छैक, एहि पोथी मे कन्या भ्रूणहत्या पर पचास गोट श्लोक केर मादे समाजिक मानसिकतापर प्रहार कएल गेल छैक. ई छनि पंडित भवनाथ झा केर व्यक्तित्व केर अनुपम छवि अथवा विशेषता। आ अहि पर आलोचना अथवा व्याख्या करक हेतु डॉ. आभा झा सर्वाधिक उचित पात्र छथि। एक तऽ पोथी संस्कृत भाषा मे लिखल छैक आ दोसर जे एकर विषय छैक, दुनू एहि केर व्याख्या हेतु अभा जी के उपस्थिति सार्थक बनबैत अछि। एहि पर अतबे कहब जरुरी जे एकरा अवश्य पढ़क चाही।
पंडित भवनाथ झा केर मैथिली कथा "उसरन डीह" पर दीपा मिश्र केर वक्तव्य (समालोचना कहब उचित नहि) पुनः इतिहास दिस ल' जाइत छैक. कथा केर मूल ई छैक आर्थिक प्रलोभन दए सांस्कृतिक उपनिवेशवादक स्थापनाक कथा। तकर जे विरोध करै छै तकरा भकसी झोंका कए हत्या करबाक प्रवृत्ति देखल गेलैए। इहो आलेख पठनीय छैक।
सुनिल कुमार भानू एक डेग आगा बढैत पंडित भवनाथ झा केर अप्रकाशित मैथिली उपन्यास "गहबरक बाटपर" जे बौद्धकालीन संघारामक पृष्ठभूमि पर लिखल गेल अछि तकर बात करैत छथि । ई अपना आपमे एक ऑय ओपनर छैक. ई कथा केवल भूतकालक इतिहास नहि, अपितु समाजक भीतर चलैत धार्मिक पाखंड आ नैतिक पतनक कथा सेहो कहैत अछि। मुदा मूल मे इतिहास छैक आ पंडित भवनाथ झा केर पाण्डुलिपि प्रेम देखार भऽ रहल छनि।
मुरारी कुमार झा अपन अनुभव सँ ई प्रमाणित करैत छथि जे पंडित भवनाथ झा ज्ञानक घमंड सँ बहुत दूर रहैत छथि। हिनक सहजता आ निश्छल प्रकृति हिनका भीड़ सँ अलग रखैत छनि।
एहि तरहें पंडित भवनाथ झा पर विदेह केर ई विशेषांक जन-जन लेल प्रेरणादायक अछि. सभ पाठक के एकरा पढ़क चाही आ आनो पाठक सभ के पढ़बाक हेतु प्रेरित करक चाही. जे नहि जनैत छथि तिनका ई जानक चाही जे पंडित भवनाथ झा मैथिली, मिथिलाक्षर, मैथिली संस्कृति, संस्कृत, मिथिला, मिथिला केर इतिहास, पाण्डुलिपि केर एक प्रमाणिक विद्वान छथि।
-दिल्ली
अजित कुमार झा
विदेह विशेषांक लेल जखन पं० भवनाथ झा जी केर नाम 16 अगस्त 2025 केँ ज्ञात भेल त' किछु समझ मे नहि आयल। झूठ नहि बाजब, हमरा हिनका विषय मे कोनो जानकारी नहि छल। फेर विदेह विशेषांक केर विशेषता ध्यान मे आयल। एकर उद्देश्य मात्र कोनो जीवित व्यक्ति केर मूल्यांकने करब टा नहि अछि, मुदा हमरा सन अज्ञानी व्यक्ति केँ मिथिलाक विभूति सबहक विषय मे जानकारी भेटैक सेहो अछि। अहि सँ पूर्व नारायण चौधरी जी बेर सेहो अहिना भेल छल। ओना हमरा सन बहुत गोटे हेताह जे कि हिनकर नाम सँ पूर्व परिचित नहि हेताह। तकर कोनो एकटा कारण त' नहि भ' सकैत अछि। अनेक कारण मे सँ एकटा भेल विषय वस्तु केर संबंध मे ज्ञानक अभाव। दोसर प्रमुख कारण अछि जे हम सब ग्लैमर के दुनिया मे जीबि रहल छी आ ओहन व्यक्ति सँ अनभिज्ञ रहैत छी जे नेपथ्य मे रहि क' अनवरत जिम्मेवारीक निर्वहन करैत रहैत छथि। अपन समाज मे डाक्टर इंजीनियर सबहक भरमार अछि मुदा ताहि मे अधिकांश डिग्री धारी, जिनका कोनो विषय पर शोध करबाक कोनो बेगरता नहि बुझाइत छन्हि। अथवा एना कहल जा सकैत अछि जे धनोपार्जन सँ पलखति होइन तखन न' एहि तरहक काज सँ जुड़ताह। साधारणतया एत्तह जीवनक एकमात्र उद्देश्य अछि टका कमेनाइ। ओनाहुतो अपना सबहक समाज मे एकटा कहबी छैक जे बुड़िबक बेटा टके काबिल। एकटा बात और छैक जे साहित्य केर क्षेत्र मे अधिकांश शोधकर्ता कट, कापी,पेस्ट मे बाझल छथि। मौलिकता लुप्तप्राय भेल जा रहल अछि। किछु तकनीकी समस्या केर कारण पूर्व निर्धारित तिथि अर्थात् 15 अक्टूबर 2025 केँ विदेहक पं० भवनाथ झा विशेषांक साइट पर अपलोड नहि भ' सकल। अन्ततः 19 अक्टूबर 2025 केँ ई विशेषांक मैथिली भाषी जनता लेल उपलब्ध भेल आ सच पुछु त' अतेक जल्दबाजी मे एखनधरि हम कोनो विशेषांक पूरा नहि पढ़ने छलहुँ। एकर मुख्य कारण अछि पं० भवनाथ झा जी केर विषय मे जनबाक उत्सुकता। विदेहक टीम केँ अहि महत्वपूर्ण कार्य हेतु साधु वाद ।
एक पाठक केँ रूप मे हमरा पं० भवनाथ झा जी पर केन्द्रित विशेषांक पढ़बाक सौभाग्य भेटल अछि आ अहि पर किछु लिखबाक दुस्साहस क' रहल छी। शुरु करब संक्षिप्त परिचय सँ जे कि कोनो तरहें संक्षिप्त नहि भ' सकैत अछि, जौँ केओ एहन विद्वानक परिचय लिखय बैसताह त' से संक्षिप्त भेनाइ संभव नहि। जाहि परिमाण मे हिनका द्वारा कैल गेल काज अछि चाहे ओ शुरुआती दौर मे साहित्यकार केँ रूप मे होइन अथवा पाण्डुलिपि एवं शिलालेख विज्ञान केँ क्षेत्र मे होइन। चाहे ओ पाण्डुलिपिक लिप्यंतरण केर काज होइन अथवा 'बुद्धचरितम्' महाकाव्यक खण्डित अंश केँ पूरा केनाइ सन दुरुह काज किएक नहि होइन। चाहे ओ धार्मिक ग्रंथक अनुवाद होइन अथवा माँ जानकी केँ विवाह स्थलक जानकारी किएक नहि होइन। एक सँ बढ़ि एक विलक्षण काज सब हिनका द्वारा भेल अछि। ओहि केँ बाद आबी कल्पना जी द्वारा लेल गेल हिनक साक्षात्कार पर। सटीक प्रश्न सब पर जेहन प्रभावी ढंग सँ हिनक जवाब अछि से अपूर्व अछि। आठम वर्ग मे पढ़ैत काल कविता लिखनाइ शुरू कयलनि आ जखन 'सगर राति दीप जरय' कार्यक्रम सँ जुड़लनि तखन कथा लिखलनि। एक दू टा नहि मुदा लगभग 20टा कथा गोष्ठी मे निरन्तर न'ब न'ब कथा पाठ कयलनि। शिलालेख पढ़ब बड्ड दुरूह कार्य होइत अछि मुदा विभिन्न भाषा एवं लिपि केर ज्ञानक संग हिनक दृढ़ इच्छाशक्ति अहि काज केँ आसान क' देलकनि। आदरणीय डा० शशि नाथ झा जी केर निर्देशन मे ई निरन्तर प्रेरित होइत रहलाह। कल्पना जी जखन प्रश्न कयलनि जे मैथिलीक प्रोफेसर सभ पांडुलिपि वा शिलालेख विज्ञान मे किएक नहि आगू अबैत छथि ताहि केँ जवाब मे जे कहलनि से एखन काफी चर्चा मे अछि। अपन साक्षात्कार मे ई कहलनि जे यथार्थ सँ बेसी हिनका आदर्श अपना तरफ आकृष्ट करैत छन्हि तथापि अहि प्रश्नक उत्तर मे विशुद्ध यथार्थ केर प्रमाण भेटैत अछि। अहि साक्षात्कार केर माध्यम सँ पाण्डुलिपि एवं शिलालेख विज्ञान केर क्षेत्र मे आबय वाला युवा सब केँ नीँक संदेश देलनि अछि। जरुरत सेहो अछि जे आब नबतुरिया सब आगू आबथि। कल्पना जी द्वारा लेल साक्षात्कार सारगर्भित अछि एवं बहुत रास जानकारी भेटल। ओहि केँ उपरांत डा० श्री कृष्ण 'जुगनू' केर हिंदी आलेख जे कि आशीष जी मैथिली मे अनुवादित कयलनि अछि पढ़ि हिनक विद्वता सँ अभिभूत भेलहुँ। विजयदेव झा जी केर आलेख सँ सेहो पुष्ट जानकारी भेटैत अछि। पंजी शास्त्रक ज्ञाता एवं इतिहासकार डा० विनयानन्द झा पाण्डुलिपि सँ संपादित हिनक पोथी सबहक अद्यतन सूचना बड्ड नीँक ढ़ंग सँ प्रस्तुत कयलनि अछि।
भैरव लाल दास जी केर आलेख मे भविष्यक चिन्ता केर झलक भेटैत अछि। नबतुरिया सब केँ मार्गदर्शन करैत यदि पं० भवनाथ झा जी एकटा दल बना क' काज करथि त' दूटा लाभ सुनिश्चित भ' सकैत अछि। पहिल, काज अधिक मात्रा मे होएत एवं दोसर महत्वपूर्ण बात जे अहि क्षेत्र मे भविष्य केँ ल' क' चिन्ता करबाक प्रयोजन नहि रहत। सेनापति केँ पास सेना त' रहबाके चाही। निस्संदेह हिनका पर महावीर जी केर असीम कृपा छन्हि मुदा तैयो एकटा कहबी छैक जे एसकरि बृहस्पतियो झूठ। आगू आबी पं० भवनाथ झा जी द्वारा बीहनि कथाक शास्त्रीय पक्षक निर्धारण पर। अहि विषय पर मुन्नाजी केर आलेख ज्ञानवर्धक अछि। लघु कथा एवं बीहनि कथा केँ विषय मे फरिछा क' लिखलनि अछि। संगहि अहि आलेख मे जे लिंक सब देल गेल अछि सेहो अहि विषय केँ ल' क' जे भ्रमक स्थिति बनल अछि तकरा तोड़बा मे सफल भेल अछि। 'घुरि आउ कमला' पर लिखैत काल रमेश जी अपन बात बेबाकी सँ रखलनि अछि। ओनाहिते दीपा जी सेहो 'उसरन डीह' पर लिखैत काल बहुत स्पष्ट ढ़ंग सँ अपन विचार प्रस्तुत कयलनि अछि। धार्मिक पाखंड एवं नैतिकताक पतन विषय पर हिनक पहिल मैथिली उपन्यास 'गहबरक बाट पर' सुनील कुमार 'भानु' केर आलेख सेहो नीँक लागल। शोधार्थी मुरारी कुमार झा केर संस्मरण बड्ड रोचक लागल। संगहि अहि बातक पुष्टि करैत अछि जे पं० भवनाथ झा जी कतेक सहज एवं सरल व्यक्ति छथि। भ्रूण हत्या पर हिनक 50टा श्लोकक विवेचना श्रीमती आभा झा बड्ड नीँक जँका केलनि अछि। हितनाथ झा जी केर पोथी कोइलख मे हिनक योगदान छन्हि एवं अपन जन्म दिवस पर साल भरिक काजक स्व विवेचना वाला बात वास्तव मे अनुकरणीय लागल।
आशीष जी त' अपन चिर परिचित अन्दाज मे बेबाक नजर अयलनि। वास्तव मे पं० भवनाथ झा जी सन मिथिलाक विभूति अपन कविता, कथा ओ उपन्यास केँ ल' क' प्रसिद्धि नहि पौलनि आ ओहि विषय पर बहुत चर्चा सेहो नहि भेल अछि । अहि संदर्भ मे महानायक अमिताभ बच्चन केर एकटा साक्षात्कार मोन पड़ि रहल अछि जकर चर्चा करब उचित बुझा रहल अछि। एकबेर अमिताभ बच्चन अपन पिता हरिवंश राय बच्चन सँ जिज्ञासा केने रहथि जे हुनका अहि बातक कोना भान हेतनि जे ज्ञानक क्षेत्र मे ओ आब सब तरहें परिपूर्ण भ' गेल छथि? हरिवंश राय बच्चन जी बहुत सरल एवं सहज भाव सँ उत्तर देलखिन जे दुनियाक कोनो भाषाक एकटा अखबार उठाउ एवं ओकरा पूरा पढ़ि जाउ। शुरु सँ अन्त धरि जौँ सब विषय समझ मे आबि जाय त' बूझब जे ज्ञानक क्षेत्र मे अहाँ आब परिपूर्ण छी। हम त' बस एतबहि कहब जे डा० धनाकर ठाकुर जी ठीके कहलनि जे पं० भवनाथ झा जी एकटा संग्रहणीय व्यक्ति छथि आ संगहि डा० कैलाश मिश्र जी केँ अनुसार जीवित मानव धरोहर वाला गप्प सेहो उपयुक्त लागल। हिनका सम्मानित करबाक उद्देश्य सँ जे ई विशेषांक प्रकाशित भेल अछि ताहि लेल विदेहक संपूर्ण टीम केँ साधुवाद।
-मुज्जफरपुर / जजुआर
जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल'
साहित्यकार, संपादक, धर्मशास्त्र आ कर्मकाण्डक विद्वान, पुरातत्वविद संगहि पाण्डुलिपि शास्त्रक़ ज्ञाता और गंभीर शोधकर्ता पं. श्री भवनाथ झाजीक सम्बन्धमे एहि विशेषांकक प्रस्तुतिसँ 'विदेह' द्वारा एकटा और उल्लेखनीय एवं प्रशंसनीय काज भेल अछि।
श्री मुरारी कुमार झाक अनुसार पण्डित श्री झाजी सरलताक आवरणमे विद्याक विराट रूप छथि।
डा. धनाकर ठाकुर जी हिनका संग्रहणीय व्यक्तित्व मानैत छथि।
रमेशजी द्वारा हिनक दूटा कथा 'ऐंठ' आ 'घुरि आउ कमला' क सुन्दर समीक्षा कयल गेल अछि।
विदुषी दीपा मिश्र द्वारा हिनक कथा 'उसरन डीह ' पर विलक्षण पाठकीय प्रतिक्रिया प्रस्तुत कयल गेल अछि।
अपन आलेखमे आशीष अनचिन्हार कहने छथि जे-हिनका द्वारा समाजक लेल नव दृष्टिकोणक संग बहुत अनिवार्य आ उपयोगी काज सभ कयल गेल अछि जाहिसँ मैथिली आ मिथिला दुनू कें फायदा भेल छै खास क' मिथिलाकें बेसी।
मुन्नाजीक अनुसार बीहनि कथा गद्य साहित्यक जाहि शास्त्रीय पक्षपर ठाढ अछि तकर पूर्ण श्रेय जाइत छनि श्री भवनाथ झा 'भवन'जी कें।
श्री भैरव लाल दास जी द्वारा हिनक बहुमुखी प्रतिभाक विश्लेषण करैत सुचित कयल गेल अछि जे कंप्यूटरसँ सम्बंधित सभ विधाक जानकार आ अभ्यासी सेहो छथि आ 'ब्राह्मी' नामक वेब पेज सेहो स्वयं विकसित केने छथि जाहि ठाम हिनका द्वारा कयल गेल सभ काज सेहो उपलब्ध अछि।
केन्द्र सरकारक मैथिली -भोजपुरी अकादमिक परामर्शदाता रहि चुकल डा. कैलाश कुमार मिश्र हिनका गुरु मानैत छथि आ हिनक महत्वपूर्ण योगदानक चर्चा करैत। कहैत छथि जे एखन बिहारमे पाण्डुलिपि विज्ञान अथवा शास्त्र केर सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता आ आधिकारिक विद्वान छथि संगहि मिथिलाक ज्ञान परम्पराक जीवित मानवीय धरोहर छथि। मिश्र जीसँ ईहो जानकारी प्राप्त भेल अछि जे पं. झा 'धर्मायण पत्रिका' सँ जुड़ल धर्मशास्त्र, वेद, ज्योतिष, इतिहास, साहित्य, आयुर्वेद, जैन, बुद्धिज्म आदि केर विद्वान सभक एकटा व्हाट्सप्प समूह बनेने छथि।
डा. विनयानन्द झाजी द्वारा हिनक विद्वताक उल्लेख करैत हिनका द्वारा पाण्डुलिपिसँ सम्पादित पोथीक अद्यतन सूचना देल गेल अछि।
आदरणीया कल्पना झा द्वारा प्रस्तुत साक्षात्कारमे व्यक्त विचारक अनुसार पं. भवनाथ झाजी साहित्यकें समाजक दर्पण नहि, समाजक दिशा निर्देशकक रूपमे देखैत छथि आ अही दृष्टिकोणसँ
मिथिला, मिथिलाक संस्कृति, साहित्यक उदारताक अनुशीलन करैत बामपंथ, ईसाई मिशनरी, आर्य समाज द्वारा पसारल गेल भ्रान्तिकें दूर करय चाहैत छथि। आशा अछि एहि दिशामे भेल प्रगति 'विदेह'क पाठककें अवश्य उपलब्ध करौताह। ई देखब रोचक होयत जे संस्कृति आ साहित्यक उदारताक अनुशीलनक मोहमे सत्य कतेक स्वीकृत अथवा उपेक्षित रहैत अछि।
- पटना
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
[भवनाथ झा विशेषांक]
१.०.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय
१.१.भवनाथ झा विशेषांकक संदर्भमे
१.२.भवनाथ झा केर संक्षिप्त परिचय
१.३.कल्पना झा- साक्षात्कार
१.४.डा.श्री कृष्ण 'जुगनू'-अगस्त्य संहिता- तीस बर्खक प्रतीक्षा
१.५.Vijay Deo Jha-Pandit with MacBook and manuscripts
१.६.डा.विनयानन्द झा-पं.भवनाथ झाक पाण्डुलिपिसँ संपादित पोथीक अद्यतन सूचना
१.७.पंडित भवनाथ झा मिथिलाक जीवित मानव धरोहर- डॉ. कैलाश कुमार मिश्र
१.८.भैरव लाल दास-पं.भवनाथ झाक शोध दृष्टि
१.९.मुन्नाजी-बीहनि कथाक शास्त्रीय पक्षक निर्धारक- श्री भवनाथ झा
१.१०.रमेश-'घुरि आउ कमला'
१.११.डॉ.आभा झा-कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे
१.१२.दीपा मिश्र-उसरन डीह- पाठकीय प्रतिक्रिया
१.१३.सुनिल कुमार भानू -गहबरक बाटपर संघारामक पाखंड आ समाजक यथार्थ
१.१४.पण्डित भवनाथ झा-हितनाथ झा
१.१५.डॉ.धनाकर ठाकुर-संग्रहणीय व्यक्तित्व पं.भवनाथ झा
१.१६.मुरारी कुमार झा-सरलताक आवरण मे निहित विद्याक विराट रूप
१.१७.कौशल कुमार- भवनाथ झा सँ साक्षात्कार
१.१८.डा. शैलेन्द्र मिश्र- नेपथ्य मे रहनिहार मिथिलाक एकटा अदम्य सेवक ओ प्रहरी: पंडित भवनाथ झा
१.१९.आशीष अनचिन्हार-भारतीय ज्ञान परंपरामे भवनाथ झाजीक महत्व
१.०.गजेन्द्र ठाकुर- नूतन अंक सम्पादकीय (भवनाथ झा विशेषांक)
भवनाथ झा- असञ्जाति मन (बुद्धचरितम्- सम्पादक भवनाथ झा, २०१३)
अश्वघोष प्राचीन भारतक अद्वितीय कवि, दार्शनिक आ तर्कशास्त्री छलाह। हुनका संस्कृत बौद्ध साहित्यक प्रथम महाकवि मानल जाइत अछि। हुनक प्रमुख रचनामे *बुद्धचरितम्*, *सौन्दरानन्दम्* आ *शारीपुत्रप्रकरणम्* शामिल अछि। एहि सभमे *बुद्धचरितम्* बौद्ध धर्मक रामायण कहल जाइत अछि, जे भगवान बुद्धक जीवन, उपदेश आ तत्त्वज्ञानक काव्यात्मक रूप प्रस्तुत करैत अछि। ई कृति संस्कृत साहित्यक एहन अनुपम रचना अछि जे कालिदासक *रघुवंश* आ *कुमारसंभव* सँ तुलनीय अछि।
इत्सिंग, प्रसिद्ध चीनी यात्री, लिखने छथि जे *बुद्धचरितम्* सम्पूर्ण भारत, चीन, तिब्बत आ दक्षिण पूर्व एशियामे गायल आ पठित होइत छल। धर्मरक्षा द्वारा पाँचम शताब्दीमे ई चीनी भाषामे अनूदित भेल आ सातम शताब्दीमे तिब्बती भाषामे सेहो अनुवाद भेल। युआन च्वांग (ह्वेनसांग) अश्वघोष केँ बोधिसत्त्व कहि सम्मान दैत छथि आ हुनका चतुर्थ बौद्ध संगीतिक प्रमुख विद्वान् रूपमे वर्णन करैत छथि।
परंतु, दुर्भाग्यवश, *बुद्धचरितम्* महाकाव्यक मूल संस्कृत पाठ केवल चौदहम सर्ग धरि सुरक्षित रहि सकल। पन्द्रह सँ अट्ठाइस सर्ग पूर्णरूपेण नष्ट भए गेल। तिब्बती आ चीनी अनुवादक सहायतासँ बादमे अंग्रेजी अनुवाद ई. एच. जॉन्सटन (E. H. Johnston) द्वारा कएल गेल, जे अत्यंत प्रामाणिक मानल जाइत अछि।
स्वतंत्र भारतक समयमे आचार्य किशोर कुणालक प्रेरणासँ मिथिलाक प्रसिद्ध संस्कृताचार्य पंडित भवनाथ झा एहि नष्ट भागक संस्कृतमे पुनःनिर्माण कएलनि। भवनाथ झा अत्यंत विद्वान् कवि छथि, संस्कृत व्याकरण, छन्द, अलंकार आ भावशैलीक गहन ज्ञाता छथि। हुनक पुनर्निर्माण मूल अश्वघोषक शैलीक समान अछि जेहि मे समान छन्द योजना, काव्यिक सौंदर्य, आ दार्शनिक गाम्भीर्य विद्यमान अछि।
महन्त रामचन्द्रदास शास्त्री आ सूर्यनारायण चौधरी द्वारा पूर्वमे हिंदी संस्कृत अनुवाद भेल छल, मुदा आचार्य किशोर कुणालक मत अनुसार भवनाथ झा कृत पुनर्निर्माण अधिक काव्यिक आ प्रामाणिक अछि। हुनक छन्द चयन आ भावाभिव्यक्ति एहन अछि जे मूल ग्रंथक सौंदर्यक पुनरुत्थान करैत अछि। ई केवल भाषिक पुनर्निर्माण नहि, अपितु सांस्कृतिक पुनर्जीवन सेहो अछि।
भवनाथ झा द्वारा पुनःस्थापित भागमे अश्वघोषक रूपक, उपमा, आ करुण रसक उत्कृष्ट प्रयोग पुनः प्रकट भेल अछि। वृद्धावस्था, मृत्यु, दुख आ मोक्षक चित्रण अत्यंत मर्मस्पर्शी अछि। उदाहरणस्वरूप, आचार्य किशोर कुणाल लिखने छथि जे ई पुनर्निर्माण केवल साहित्यिक उपलब्धि नहि, अपितु भारतीय संस्कृत साधनाक गौरव प्रतीक अछि।
भवनाथ झा अपन पुनर्निर्माणमे केवल जॉन्सटनक अंग्रेजी संस्करणपर निर्भर नहि रहलाह, बल्कि चीनी आ तिब्बती अनुवादक गहर अध्ययन करि अनेक ठाम सुधार सेहो प्रस्तुत केलनि। एहि कारणे हुनक कार्य अधिक विश्वसनीय आ वैज्ञानिक मानल जाइत अछि।
आचार्य किशोर कुणाल एहि ग्रंथक प्रकाशनक अवसरपर कहने छथि जे * पंडित भवनाथ झा कृत पुनर्निर्माण स्वतंत्र भारतक संस्कृत साहित्यक सर्वोत्तम योगदान छी। * एहि कार्य सँ बौद्ध साहित्यक एहन अमूल्य रत्न पुनः पूर्ण रूपमे उपलब्ध भेल अछि जे सहस्राब्दीसँ अपूर्ण रूपमे विद्यमान छल।
अंततः, *बुद्धचरितम्* केवल धार्मिक महाकाव्य नहि, बल्कि मानवीय चेतना, करुणा आ बोधक विश्वसाहित्यिक संदेश अछि। पं. भवनाथ झा द्वारा कएल गेल ई पुनःस्थापना अश्वघोषक गौरव आ भारतक सांस्कृतिक धरोहर केँ पुनः जीवित कएलक अछि।
**निष्कर्ष रूपेँ**, पं. भवनाथ झा द्वारा *बुद्धचरितम्*क पुनर्निर्माण भारतीय संस्कृत परंपराक पुनर्जागरण अछि। ई केवल अश्वघोषक रचना नहि, बल्कि भारतीय बौद्ध संस्कृति, काव्यकला आ मानवता क भावनाके पुनर्स्थापित करैत अछि। आचार्य किशोर कुणालक शब्दमे, जेना इत्सिंगक समयमे बुद्धचरितम् श्रद्धा आ प्रेम सँ गायल जाइत छल, ओहिना आब फेर सँ भारत आ समस्त बौद्ध देशसभमे ई पुनः गुँजित हएत।
सञ्जाति मन (गीत प्रबन्ध)-[कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर खण्ड-६, २००९]
[अश्वघोषक २८ सर्गक संस्कृत बुद्धचरितम् विलुप्त भऽ गेल मुदा एकर तिब्बती अनुवादसँ पुनः संस्कृत रूपान्तर भेल, रूपान्तरकारक नाम अज्ञात। ओ अनुवाद अश्वघोषक मूल संस्कृत बुद्धचरितम् नामसँ ओइ अज्ञात अश्वघोष भक्त (आ बुद्धक भक्त) अनुवादक द्वारा जारी कएल गेल। ओइ अद्भुत् अनुवादकक संस्कृत बुद्धचरितम् केर अति-संक्षिप्त मैथिली अनुवाद- अनुवादक- गजेन्द्र ठाकुर]
[सर्ग १- सर्ग २८]
असञ्जाति मन [कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-गजेन्द्र ठाकुर खण्ड-६, २००९]
असञ्जाति मन
सर्ग १
ई पुरातन देश नाम भरत,
राज करथि जतऽ इक्ष्वाकु वंशज।
ऐ वंशक शाक्य कुलक राजा शुद्धोधन,
पत्नी माया छलि,
कपिलवस्तुमे राज करथि तखन।
अश्वघोषक वर्णन ई सकल,
दैत अछि सम्बल असञ्जाति मनक।
माया देखलन्हि स्वप्न आबि रहल,
एकटा श्वेत हाथी आबि मायाक शरीरमे,
पैसि छल रहल हाथी मुदा,
मायाकेँ भऽ रहल छलन्हि ने कोनो कष्ट,
वरन् लगलन्हि जे ऐल अछि मध्य क्यो गर्भ।
गर्भक बात मुदा छल सत्ते,
भेल मोन वनगमनक,
लुम्बिनी जाय रहब, कहल शुद्धोधनकेँ।
दिन बीतल ओत्तै लुम्बनीमे दिन एक,
बिना प्रसव-पीड़ाक जन्म देलन्हि पुत्रक,
आकाशसँ शीतल आ गर्म पानिक दू टा धार,
कएल अभिषेक बालकक लाल-नील पुष्प कमल,
बरसि आकाश।
यक्षक राजा आ दिव्य लोकनिक भेल समागम,
पशु छोड़ल हिंसा पक्षी बाजल मधुरवाणी।
धारक अहंकारक शब्द बनल कलकल,
छोड़ि ’मार’ आनन्दित छल विश्व सकल,
’मार’ रुष्ट आगमसँ, बुद्धत्व प्राप्ति ई करत।
माया-शुद्धोधनक विह्वलताक प्रसन्नताक,
ब्राह्मण सभसँ सुनि अपूर्व लक्षण बच्चाक,
भय दूर भेल माता-पिताक तखन जा कऽ,
मनुष्यश्रेष्ठ पुत्र आश्वस्त दुनू गोटे पाबि कऽ।
महर्षि असितकेँ भेल भान शाक्य मुनि लेल जन्म,
चली कपिलवस्तु सुनि भविष्यवाणी बुद्धत्व करत प्राप्त,
वायु मार्गे एला राज्य वन कपिलवस्तुक,
बैसायल सिंहासन शुद्धोधन तुरत ।
राजन् ऐल छी देखय बुद्धत्व प्राप्त करत जे बालक।
बच्चाकेँ आनल गेल चक्र पएरमे छल जकर,
देखि असित कहल, हा! मृत्यु समीप अछि हमर,
बालकसँ शिक्षा प्राप्त करितौं मुदा वृद्ध हम अथबल,
उपदेश सुनऽ लेल शाक्य मुनिक, जीवित कहाँ रहब।
वायुमार्गे घुरला असित कऽ दर्शन शाक्य मुनिक,
भागिनकेँ बुझाओल पैघ भऽ बौद्धक अनुसरण करथि।
दस दिन धरि केलन्हि जात-संस्कार,
फेर ढेर रास होम जाप,
करि गायक दान सिंघ स्वर्णसँ छारि,
घुरि नगर प्रवेश केलन्हि माया,
हाथी-दाँतक महफा चढ़ि।
सर्ग २
धन-धान्यसँ पूर्ण भेल राज्य,
अरि छोड़ल शत्रुताक मार्ग,
सिद्धि साधल नाम पड़ल सिद्धार्थ।
मुदा माया नै सहि सकली प्रसन्नता,
मृत्यु ऐल मौसी गौतमी कएल शुश्रुषा।
उपनयन संस्कार भेल बालकक,
शिक्षामे छल चतुर,
अंतःपुरमे कय ढेर रास व्यवस्था विलासक,
शुद्धोधनकेँ छल मोन असितक बात,
बालकक योगी बनबाक।
सुन्दरी यशोधरासँ फेर करबाओल सिद्धार्थक विवाह,
समय बीतल सिद्धार्थक पुत्र राहुलक भेल जन्म।
सर्ग ३
उत्सवक संग बितैत रहल दिन पल,
सुनलन्हि चर्च उद्यानक कमल सरोवरक,
सिद्धार्थ इच्छा देखेलन्हि घुमक ।
सौँसे रस्तामे आदेश भेल राजाक,
क्यो वृद्ध दुखी रोगी रहथि बाट ने घाट।
सुनि नगरवासी देखबा लेल व्यग्र,
निकलि ऐल पथपर दर्शन लेल सिद्धार्थक ।
चारू कात छल मनोरम दृश्य,
मुदा तखने ऐल पथपर एक वृद्ध।
हे सारथी, सूतजी के अछि ई,
आँखि झाँपल भौँहसँ,
श्वेत केश,
हाथ लाठी,
झुकल की छै भेल?
कुमार अछि ई वृद्ध,
भोगि बाल युवा अवस्था जाय
अछि भेल वृद्ध आइ ।
की ई हएत सभक संग,
हमहूँ भऽ जायब वृद्ध एक दिन?
सभकेँ अछि बुझल ई खेल,
फेर चहुदिस ई सभ करय किलोल ?
हर्षित मुदित बताह तँ नै ई भीड़?
घुरि चलू सूत जी आब,
उद्यानमे मोन कतऽ लाग !
महलमे घुरि-फिरि भऽ चिन्तामग्न,
पुनि लऽ आज्ञा राजासँ निकलल अग्र ।
मुदा ऐबेर भेटल एकटा लोक,
पेट बढ़ल, झुकल लैत निसास,
रोगग्रस्त छल ओ पूछल सिद्धार्थ,
सूत जी छथि ई के, की भेल?
रोगग्रस्त ई कुमार अछि ई तँ खेल,
कखनो ककरो लैत अछि अपन अधीन ।
सूत जी घुरू भयभीत भेलौं हम आइ फेर।
घुरि घर विचरि-विचरि कय चिन्तन,
शुद्धोधन चिन्तित जानि ई घटनाक्रम।
आमोद प्रमोदक कऽ आर प्रबन्ध,
रथ सारथी दुनू नव कएल शुद्धोधन।
फेर एक दिन पठाओल राजकुमार,
युवक-युवती संग पठाओल करय विहार ।
मुदा तखने एकटा यात्रा मृत्युक,
हे सूतजी की अछि ई दृश्य,
सजा-धजा कऽ चारि गोटे धऽ कान्ह,
मुदा तैयो सभ कानि रहल किए नै जानि ?
हे कुमार आब ई सजाओल मनुक्ख,
नै बाजि सकत, अछि ई काठ समान।
कानि-खीजि जाथि समस्त ई लोक,
छोड़ऽ ओकरा मृत्यु केलन्हि जे प्राप्त।
घुरू सारथी नै हएत ई बर्दाश्त,
भय नै अछि ऐबेर,
मुदा बुझितो आमोद प्रमोदमे भेर,
अज्ञानी सन केना घुमब उद्यान।
सर्ग ४
मुदा नव सारथी घुरल नै द्वार,
पहुँचल उद्यान पद्म खण्ड जकर नाम।
युवतीगणकेँ देलक आदेश उदायी, पुरोहित पुत्र,
करू सिद्धार्थकेँ आमोद-प्रमोदमे लीन ।
मुदा देखि इन्द्रजीत सिद्धार्थक अनासक्ति,
पुछल उदायी भेल अहाँकेँ ई की?
हे मित्र क्षणिक ई आयु,
बुझितो हम केना गमाउ?
साँझ भेल घुरि युवती सभ गेल,
सूर्यक अस्तक संग संसारक अनित्यताक बोध,
पाबि सिद्धार्थ घुरल घर चिन्ता मग्न,
शुद्धोधन विचलित मंत्रणामे लीन।
सर्ग ५
किछु दिनक उपरान्त,
मांगि आज्ञा बोन जेबाक,
संग किछु संगी निकलि बिच खेत-पथार,
देखि चास देल खेत मरल कीट-पतंग ।
दुखित बैसि उतरल घोड़ासँ अधः सिद्धार्थ,
बैसि जोमक गाछक नीचाँ धऽ ध्यान,
पाओल शान्ति तखने भेटल एक साधु।
छल ओ मोक्षक ताकिमे मग्न,
सुनि ओकर गप, देखल होइत अन्तर्धान।
गृह त्यागक ऐल मोनमे भाव,
बोन जेबाक आब अखन नै काज।
घुरि सभ चलल गृहक लेल,
रस्तामे भेटलि कन्या एक,
कहल अहाँ छी जनिक पति,
से छथि निश्चयेन निवृत्त।
निवृत्त शब्दसँ निर्वाणक प्रसंग,
सोचि मुदित सिद्धार्थ घुरल राज सभा,
रहथि ओतऽ शुद्धोधन मंत्रीगणक बिच।
कहल – लऽ संन्यास मोक्षक ज्ञानक लेल,
करू आज्ञा प्रदान हे भूदेव।
हे पुत्र कएल की गप,
जाउ पहिने पालन करू भऽ गृहस्थ ।
संन्यासक नै अछि ऐल बेर,
तखन सिद्धार्थ कहल अछि ठीक,
तखन दूर करू चारि टा हमर भय,
नै मृत्यु, रोग, वृद्धावस्था आबि सकय,
धन सेहो नै क्षीण हुअय।
शुद्धोधन कहल अछि ई असंभव बात,
तखन हमर वियोगक करू नै पश्चाताप।
कहि सिद्धार्थ गेला महल बिच,
चिन्तित एम्हर-ओम्हर घुमि निकलला बाह्य ।
सूतल छंदककेँ कहल श्वेत वेगमान,
कंथक घोड़ा अश्वशालासँ लाउ।
सभ भेल निन्नमे भेर कंथक ऐल,
चढ़ा सिद्धार्थकेँ लऽ गेल नगरसँ दूर ।
नमस्कार कपिलवस्तु !
घुरब जखन पायब जन्म-मृत्युक भेद !
सर्ग ६
सोझाँ ऐल भार्गव ऋषिक कुटी उतरि सिद्धार्थ,
लेलन्हि रत्नजटित कृपाण, काटल केश ।
मुकुट मणि आभूषण देल छंदककेँ।
अश्रुधार बहल छंदकक आँखि,
जाउ छंदक घुरु नगर जाउ ।
नै सिद्धार्थ हम नै छी सुमन्त,
छोड़ि राम जे घुरल अयोध्या नग्र।
घोटक कंथकक आँखिमे सेहो नोर,
तखने एक व्याध छल ऐल,
कषाय वस्त्र पहिरने रहय, कहल सिद्धार्थ,
हमर शुभ्र वस्त्र लिअ दिअ ई वस्त्र,
अदलि-बदलि दुनु गोटे वस्त्र पहीरि,
छंदक देखि केलक प्रणाम गेल घुरि।
सर्ग ७
सिद्धार्थ एला आश्रम सभ भेल चकित,
देखि नानाविध तपस्या कठोर,
नै संतुष्ट कष्ट भोगथि पाबय लेल स्वर्ग,
अग्निहोत्रक यज्ञ तपक विधि देखि ।
निकलि चलल किछु दिनमे सिद्धार्थ आश्रम छोड़ि,
स्वर्ग नै मोक्षक अछि हमरा खोज ।
जाउ तखन अराड मुनि लग विंध्यकोष्ठ,
नमस्कार मुनि प्रणाम घुरू सभ जाउ,
सिद्धार्थ निकलि बढ़ि पहुँचला आगु।
सर्ग ८
एम्हर कंथकक संग छंदक खसैत-पड़ैत,
एक दिनक मार्ग आठ दिनमे चलैत,
घरमुँहा रस्ता आइ कम नै, अछि भेल अनन्त।
घुरि सुनेलक खबरि कषाय वस्त्र पहिरबाक सिद्धार्थक,
गौतमी मूर्छित, यशोधरा कानथि बाजि-बाजि,
एहन कठोर हृदय सिद्धार्थक मुखेटा कोमल रहय,
ओकरो सँ कठोर अछि हृदय हमर जे फाटय अछि नै।
शुद्धोधन कहथि दशरथक छल भाग्य,
पुत्र वियोगमे प्राण हमर निकलय अछि नै।
पुरहित आ मंत्रीजी निकलि ताकू जाय,
भार्गव मुनिक आश्रममे देखू पुछू ओतय।
सर्ग ९
जाय जखन सभ ओतऽ पूछल भार्गव कहल,
गेलथि अराड मुनिक आश्रम दिस मोक्षक लेल बेकल।
दुनू गोटे बढ़ि आगाँ देखैत छथि की,
कुमार गाछक नीचाँ बैसल ओतय।
पुरोहित कहल हे कुमार पिताक ई गप सुनू,
गृहस्थ राजा विदेह, बलि, राम आ वज्रबाहु,
केलन्हि प्राप्त मोक्ष करू अहाँ सेहो।
मुदा सिद्धार्थ बोनसँ घुरता नै,
मोक्षक लेलन्हि अछि प्रण तोड़ता नै।
हे सिद्धार्थ पहिनहु घुरल छथि बोनसँ,
अयोध्याक राम, शाल्व देशक द्रुम आ राजा अंबरीष ।
हे पुरहित जी घुरू व्यर्थ समय नष्ट छी कऽ रहल,
राम आ कि आन नै उदाहरण समक्ष ।
नै बिना तप कोनो क्यो बहटारि सकत,
ज्ञान स्वयं पायब नव रस्ता तकैत।
घुरल दुहु गोटे गुप्त-दूत नियुक्त कऽ।
सर्ग १०
सिद्धार्थ बढ़ि आगाँ कएल गंगाकेँ पार,
राजगृह नगरी पहुँचि कऽ भिक्षा ग्रहण,
पहुँचि पाण्डव-पर्वत जखन बैसलथि,
राजा बिम्बसार आबि बुझाओल बहुत ।
सूर्यवंशी कुमार जाउ घुरि।
सर्ग ११
सिद्धार्थ कहल हे राजा बिम्बसार, हर्यंक वंशज,
मोहकेँ छोड़ल घुरि जाउ कतऽ?
राजा सेहो होइछ कखनो काल दुखित,
दास वर्गकेँ सेहो कखनो काल भेटै छै खुशी ?
करू रक्षा प्रजाक संग अपन सेहो,
सिद्धार्थ वैश्वंतर आश्रम दिस बढ़लाह,
मगधराज चकित !
सर्ग १२
अराडक आश्रममे ज्ञान लेल,
गेला शाक्य,
कहल मुनि अविद्या अछि पाँचटा,
अकर्मण्यता आलस्यक अछि अन्हार,
अन्हारक अंग अछि क्रोध आ विषाद,
मोह अछि ई वासना जीवनक आ संगे मृत्युक,
कल्याणक मार्ग अछि मार्ग मोक्षक।
मुदा सिद्धार्थ कहल हे मुनिवर!
आत्माक मानब तँ अछि मानब अहंकारकेँ,
अहाँ गप नै रुचल बढ़ल आश्रम उद्रकक से।
नगरी गेला राजर्षिक जे आश्रम छल,
मुदा नै उत्तर भेटल ओत्तौ सिद्धार्थक।
गेला तखन नैरंजना तट पाँचटा भिक्षुक भेटल,
छह बरख तप कएल मुदा प्रश्न अनुत्तरित छल।
स्वस्थ तनमे भेटत मनसिक प्रश्नक उत्तर,
प्रण कएल ई निरंजनामे कएल स्नान ओ,
बाहर बहराय एली तखने कन्या गोपराजक,
श्वेत रंग नील वस्त्रमे नन्द बाला जकर नाम छल ।
आयलि पायस पात्र लेने तृप्त भऽ सिद्धार्थ भोजन कएल।
पाँचू संगी देखि ई सिद्धार्थक संग छोड़ल ।
मुदा ओ भेला सबल बोधिसत्वक प्राप्तिक लेल,
दृढ़ प्रण लऽ पीपरक तर ओ आसन देलन्हि।
काल सर्प कहल देखू ऐ नीलकंठक झुण्डकेँ,
घुमि रहल चारू दिस अहाँक,
प्रमाण अछि जे बोधिसत्व प्राप्त करब अहाँ।
सुनि ई तृण उठा कएल प्रतिज्ञा तखन,
सिद्धार्थ पाओत ज्ञान आ तखने उठत छोड़ि आसन।
सर्ग १३
ब्रह्मांड छल प्रसन्न मुदा दुष्ट मार डरायल,
कामदेव, चित्रायुध पुष्पसर नाम मारक,
सिद्धार्थ प्राप्त कऽ ज्ञान जगकेँ बताओत।
हमर साम्राज्यक हएत की तखन,
पुत्र विभ्रम, हर्ष, दर्प छल ओकर,
पुत्री अरति, प्रीति, तृषाकेँ सेहो कऽ संग।
चलू ई लेने ढाल प्रतिज्ञाक,
सत् धनुषपर बुद्धिक वाण चढ़ाय,
जीतत से की जीतय देबै हमरा सभ आइ?
हे सिद्धार्थ यज्ञ कऽ पढ़ि कऽ शास्त्र,
करू इन्द्रपद प्राप्त भोगू भोग,
छोड़ू आसन देब वाण चलाय।
नै देलन्हि सिद्धार्थ ऐपर ध्यान,
मार तखन देलक वाण चलाय,
मुदा भेल कोनो नै परिणाम।
शिवपर सेहो चलल रहय ई वाण,
विचलित भेल रहथि ओ सेहो,
के अछि ई से नै जानि!!
हे सैनिक हमर विकराल-विचित्र,
त्रिशूल घुमाय, गदा उठाय,
साँढ़ सन दऽ हुंकार,
आउ करू विजित अछि शत्रु विकराल।
राति घनघोर अन्हरियामे कतऽ छथि चन्द्र?
तरेगणक सेहो कोनो नै दर्श!
मुदा सभ गेल व्यर्थ पदार्पण भेल अदृश्य,
मार जाउ हएत नै ई विचलित।
देखू एकर क्षमा प्रतीक जटाक,
धैर्य अछि एकर जेना गाछक मूल,
चरित्र पुष्प बुद्धि शाखा धर्म फलक प्रतीक।
स्थान जतऽ अछि आसन पृथ्वीक थिक नाभि,
प्राप्त करत ई ज्ञान सहजहि आइ।
पराजित मार गेल ओतयसँ भागि।
सर्ग १४
रातिक पहिल पहरमे शाक्य मुनि,
पाओल वर्णन स्मरण पूर्व जन्मक सहजहि।
दोसर पहरमे दिव्य चक्षु पाबि,
देखल कर्मक फल वेदनाक अनुभूति।
गर्भ सरोवर नरक आ स्वर्ग दुहुक,
पाओल अनुभव देखल खसैत स्वर्गहुँ,
अतृप्त भोगी जन्म, जरा, मृत्यु।
बीतल तेसर पहर चारिममे जाय,
पाओल ज्ञान बुद्ध भऽ पाओल शान्ति।
शान्त मन शान्त छल पूर्ण जगत !!!
धर्म चारू दिस बिन मेघ अछार !!
सूचना देल दुन्दुभि बाजि अकास!
सकल दिशा सिद्धगणसँ दीप्तमय छल,
स्वर्गसँ वृष्टि पुष्पक इक्ष्वाकु वंशक ई मुनि छल।
बैसल ऐ अवस्थामे सात दिन धरि मुनि शाक्य,
विमान चढ़ि एला तखन देवता दू टा,
करू उद्धार जगतक दऽ मोक्षक शिक्षा।
आ भिक्षुपात्र लऽ एला फेर एक देव,
कएल स्मरण अराड आ उद्रकक बुद्ध,
मुदा दुहु छल छोड़ल जगत ई तुच्छ।
आब जायब वाराणसी भिक्षु पाँचो संगी जतऽ,
कहल देखि बोधिक गाछ दिस स्नेहसँ।
सर्ग १५
बुद्ध चलला असगरे रस्तामे भिक्षु एक भेटल,
तेजमय अहाँ के? गुरु के छथि अहाँक?
हे वत्स गुरु नै क्यो हमर
प्राप्त कएल निर्वाण हम,
सभ किछु जानल जे अछि जनबा योग्य
लोक कहै छथि हमरा बुद्ध!
जा रहल छी काशी दुखित कल्याण लेल
दूर सँ देखल वरुणा आ गंगाक मिलन
आ गेला बुद्ध लगहिमे मृगदाव वन।
पाँचू संगी हुनक रहथि ओतहि
देखैत अबैत विचारल क्यो नै करत अभिवादन हुनक
मुदा पहुँचिते ई की गप भेल?
सभ हुनक सत्कारमे छल लागि गेल?
आसन दऽ जखन बैसेलन्हि हुनका सभ क्यो,
उपदेश देब शुरु करितथि मुदा तखने बाजल कियो,
अहाँ तँ तत्वकेँ नै छी बुझैत,
तप छोड़ि बीचहि उठल छलौं किए?
बुद्ध कहल घोर तप आ आसक्ति दुनुक हम त्याग कएल
मध्य मार्गकेँ पकड़ि बोधत्व प्राप्त कएल।
सर्ग १६
बोधत्व सूर्य अछि सम्यक दृष्टि आ
एकर सुन्दर रस्तापर चलैए सम्यक संकल्प।
ई करैए विहार सम्यक आचरणक उपवनमे
सम्यक आजीविका अछि भोजन एकर।
सेवक अछि सम्यक व्यायाम,
शान्ति भेटैए एकरा सम्यक स्मृति रूपी नगरीमे
आ सुतैए सम्यक समाधिक बिछाओनपर ई।
ऐ अष्टांग योगसँ अछि सम्भव ई
जन्म, जरा, व्याधि आ मृत्युसँ मुक्ति।
मध्य मार्ग चारिटा अछि ध्रुव सत्य
दुख, अछि तकर कारण, दुखक निरोध
आ अछि उपाय निरोधक ।
कौंडिन्य आ ओकर चारू संगी सुनल ई,
प्राप्त कएल सभ दिव्यज्ञान ।
हे नरमे उत्तम पाँचू गोटे
भेल ज्ञान अहाँ लोकनि के?
कौंण्डिन्य कहलन्हि हँ, भेल भंते,
कौंडिन्य भेला तखन प्रमुख धर्मवेत्ता
तखने यक्ष सभ पर्वतपरसँ केलक सिंहनाद,
शाक्यमुनि अछि केलक धर्मचक्र प्रवर्तित !!!!
शील कील अछि क्षमा-विनय अछि धूरी,
बुद्धि-स्मृतिक पहिया अछि सत्य अहिंसासँ युक्त,
ऐमे बैसि भेटत शान्ति ई बाजल सभ यक्ष,
मृगदावमे भेल धर्मचक्र प्रवर्तित।
फेर अश्वजित आ ओकर चारि टा आन भिक्षु
कएल निर्वाण धर्ममे बुद्ध दीक्षित,
फेर कुलपुत्र यश प्राप्त कएल अर्हत पद
यश आ चौवन गृहस्थकेँ
कएल बुद्ध सद्धर्ममे प्रशिक्षित।
घरमे रहि कऽ भऽ सकै छी अनाशक्त
आ वनमे रहियो प्राप्त कऽ सकै छी आशक्ति।
ऐमे सँ आठ गोट अर्हत प्राप्त शिष्यकेँ
विदा कऽ आठो दिशामे चलला बुद्ध।
पहुँचि गया जितबाक रहन्हि इच्छा
सिद्धि सभसँ युक्त काश्यप मुनिकेँ।
गयामे काश्यप मुनि केलन्हि स्वागत बुद्धक,
मुदा रहबा लेल देल अग्निशाला रहै छल महासर्प जतऽ।
रातिमे मुदा ओ सर्प प्रणाम कएल बुद्धकेँ
भोरमे काश्यप देखल सर्पकेँ बुद्धक भिक्षापात्रमे।
कऽ प्रणाम ओ आ हुनकर पाँच सय शिष्य
संग एला काश्यपक भाय गय आ नदी ।
कएल स्वीकार धर्म बुद्धक
प्राप्त कएल गय उत्तुंगपर निर्वाणधर्मक शिक्षा
लऽ सभकेँ बुद्ध पहुँचल राजगृहक वेणुवण ।
सर्ग १७
बिम्बसार सुनि ऐल ओतऽ देखल काश्यपकेँ बुद्धक शिष्य बनल
पूछल बुद्ध तखन काश्यपसँ,
छोड़ल अहाँ अग्निक उपासना किए भंते?
काश्यप कहल मोह जन्मक रहि जाइछ देने
आहुति अग्निमे केने पूजा पाठ ओकर ।
बुद्धक आज्ञा पाबि कएल काश्यप दिव्य शक्तिक प्रदर्शन
आकाश मध्य उड़ि अग्निक समान जरि कऽ।
तखन बिम्बसारकेँ देल बुद्ध अनात्मवादक शिक्षा
विषय, बुद्धि आ इन्द्रीक संयोगसँ अबैछ चेतनता
शरीर इन्द्रिय आ चेतना अछि भिन्न
आ अभिन्न सेहो।
बिम्बसार भऽ प्रसन्न दान बुद्धकेँ वेणुवनक देल
तथागतक शिष्य अश्वजित नग्र गेल भिक्षाक लेल।
कपिल संप्रदायक लोक देखि तेज पूछल अहाँक गुरु के?
कहल अश्वजित सुगत बुद्ध छथि जे इक्ष्कवाकु वंशक।
सएह हमर गुरु कहै छथि बिन कारणक नै होइछ किछुओ
उपतिष्य ब्राह्मणकेँ प्राप्त भेल ज्ञान कहलक ओ मौद्गल्यायनकेँ
मौद्गल्यायनकेँ सेहो प्राप्त भेलै सम्यक दृष्टि सुनिकेँ।
सुनि वेणुवनमे उपदेश त्यागल जटा दंड
पहिरि काषाय कएल साधना, प्राप्त कएल परम पद
काश्यप वंशक एकटा धनिक ब्राह्मण छोड़ल पत्नी परिजन
प्रसिद्धि भेटल हिनका महाकाश्यप नामसँ।
सर्ग १८
कोसलक श्रावस्तीक धनिक सुदत्त ऐल वेणुवन
गृहस्थ रहितो प्राप्त भेल तत्वज्ञान ओकरा।
उपतिष्य संगे सुदत्त गेल श्रावस्ती नगर
जेत केर वनमे विहार बनेबाक कएल निश्चित।
जेतवनक मालिक रहय लोभी ढेर पाइ लेलक जेतवनक लेल
मुदा देखि दैत पाइ हृदय परिवर्तित भेल ओकर
सभटा वन देलक ओ विहारक लेल
विहार शीघ्रे बनि गेल उपतिष्यक संरक्षकत्वमे
जेतवनमे।
सर्ग १९
बुद्ध फेर राजगृहसँ चलि देलन्हि कपिलवस्तु दिस
ओतऽ पिता शुद्धोधनकेँ देल अमृत बोधि
कोनो पुत्र पिताकेँ नै देने रहय ई।
कर्म धरैत अछि मृत्युक बादो पछोड़
कर्मक स्वभाव, कारण, फल, आश्रयक रहस्य बुझू,
जन्म, मृत्यु, श्रम, दुखसँ फराक पथ ताकू।
आनन्द, नन्द, कृमिल, अनुरुद्ध, कुन्डधान्य, देवदत्त, उदायि
कऽ ग्रहण दीक्षा छोड़ल गृह सभ।
अत्रिनन्दन उपालि सेहो कएल ग्रहण दीक्षा
शुद्धोधन देल राजकाज भाय केँ
रहय लगला राजर्षि जकाँ ओ।
फेर बुद्ध कएल प्रवेश नगरमे
न्यग्रोध वनमे बुद्ध पहुँचि
चिन्तन जीवक कल्याणक करय लगला।
सर्ग २०
फेर ओ ओतऽ सँ निकलि गेला प्रसेनजितक देस कोसल
श्रावस्तीक जेतवन छल श्वेत भवन आ अशोकक गाछसँ सज्जित
सुदत्त कएल स्वर्णमालासँ स्वागत बुद्धक
कएल जेतवन बुद्धक चरणमे समर्पित।
प्रसेनजित भेल धर्ममे दीक्षित
तीर्थक साधु सभक कऽ शंकाक समाधान
कएल बुद्ध हुनका सभकेँ दीक्षित।
जा कय स्वर्ग माताकेँ
केलन्हि सेहो दीक्षित
सर्ग २१
ओतऽसँ एला बुद्ध फेर राजगृह
ज्योतिष्क, जीवक, शूर, श्रोण, अंगदकेँ उपदेश दऽ,
कएल सभकेँ संघमे दीक्षित।
ओतऽ सँ गंधार जाय राजा पुष्करकेँ कएल दीक्षित
विपुल पर्वतपर हेमवत आ साताग्र दुनू यक्षकेँ उपदेश दऽ
एला जीवकक आम्रवन।
ओतऽ कऽ विश्राम घुमैत-फिरैत
पहुँचल आपण नगर,
ओतऽ अंगुलीमाल तस्करकेँ
कएल दीक्षित प्रेमक धर्ममे।
वाराणसीमे असितक भागिन कात्यायनकेँ कएल दीक्षित
देवदत्त मुदा भऽ ईर्ष्यालु संघमे चाहलक पसारय अराड़ि।
गृध्रकूट पर्वतपर खसाओल शिलाखंड बुद्धपर
राजगृह मार्गमे छोड़ल हुनकापर बताह हाथी
सभ भागल मुदा आनन्द संग रहल बुद्ध
लग आबि गजराज भऽ गेल स्वस्थ कएल प्रणाम झुकि
उपदेश देल गजराजकेँ बुद्ध।
देखल ई लीला राजमहलसँ अजातशत्रु
भऽ गेल ओहो तखन बुद्धक शिष्य।
सर्ग २२
राजगृहसँ बुद्ध एला पाटलिपुत्र
मगधक मंत्री वर्षाकार बना रहल छल दुर्ग,
बुद्ध कएल भविष्यवाणी हएत ई नगर प्रसिद्ध
तखन तथागत गेला गौतम द्वारसँ गंगा दिस।
गंगापार कुटी गाममे
देल उपदेश धर्मक
फेर गेला नन्दिग्राम जतऽ भेल छल बहुत रास मृत्यु।
दऽ सान्त्वना गेला वैशाली नगरी
निवास कएल आम्रपालीक उद्यानमे।
श्वेत वस्त्र धरि एली ओ
बुद्ध चेताओल शिष्य सभकेँ,
धरू संयम रहब स्थिरज्ञानमे लऽ बोधिक ओखध अमृत
प्रज्ञाक वाणसँ शक्तिक धनुषसँ करू अपन रक्षा।
आम्रपाली आबि पओलक उपदेश
भेलै ओकरा घृणा अपन वृत्तिसँ
मांगलक धर्मलाभक भिक्षा,
बुद्ध केलन्हि प्रार्थना ओकर स्वीकार,
आयब भिक्षाक लेल अहाँक द्वार।
सर्ग २३
सुनि ई गप जे ऐल छथि बुद्ध आम्रपालीक उद्यान
लिच्छवीगण एला बुद्धक समीप
बुद्ध देलन्हि शीलवान रहबाक सन्देश।
लिच्छवीगण देलन्हि भिक्षाक लेल अपन-अपन घर एबाक आमन्त्रण,
पाबि आमन्त्रण कहलन्हि बुद्ध
मुदा जाएब हम आम्रपालीक द्वार
कारण हुनका हम देलियन्हि अछि वचन।
लिच्छवीगणकेँ लगलन्हि ई कनेक अनसोहाँत,
मुदा पाबि उपदेश बुद्धक,
घुरला अपन-अपन घर-द्वार।
पराते आम्रपालीसँ ग्रहण कऽ भिक्षा
बुद्ध गेला वेणुमती करय चारि मासक बस्सावास।
चारि मास बितओला उत्तर,
रहऽ लगला मर्कट सरोवरक तट।
ओत्तै आयल मार,
कहलक हे बुद्ध नैरंजना तटपर अहाँक संकल्प
जे निर्वाणसँ पूर्व करब उद्धार देखायब रस्ता दोसरोकेँ,
आब तँ कतेक छथि मुक्त, कतेक छथि मुक्ति पथक अनुगामी,
आब कोनो टा नै बाँचल अछि कारण
करू निर्वाण प्राप्त।
कहलन्हि बुद्ध, हे मार
नै करू चिन्ता,
आइसँ तीन मासक बाद,
प्राप्त करब हम निर्वाण,
मार होइत प्रसन्न तृप्त
गेल घुरि।
बुद्ध धऽ आसन प्राणवायुकेँ लेलन्हि चित्तमे
आ चित्तकेँ प्राणसँ जोड़ि योग द्वारा समाधि कएल प्राप्त।
प्राणक जखने भेल निरोध,
भूमि विचलित, विचलित भेल अकास !!
सर्ग २४
आनन्द पूछल करू अनुग्रह लिच्छवी सभपर,
किए ई धरा आ आकास,
दलमलित मर्त्य आ दिव्यलोक !!!
बुद्ध कहलन्हि आबि गेल छी हम बाहर,
छोड़ि अपन प्रकोष्ठ,
मात्र तीन मास अनन्तर
छोड़ब ई देह,
निर्वाण मे रहबा लेल सतत !!!!
आनन्द सुनि ई करऽ लागल हाक्रोस,
सुनि विलाप लिच्छवी गण जुटि सेहो,
विलापमे भऽ गेला संग जोड़।
बुद्ध सभकेँ बुझा-सुझा,
चलला वैशालीक उत्तर दिशा।
सर्ग २५
पहुँचि भोगवती नगरी,
देल शिक्षा जे विनय अछि हमर वचन,
जे बोल अछि विनयविहीन,
से अछि नै धर्म।
तखन मल्लक नगरी पापुर जाय,
अपन भक्त चुंद केर घरमे कएल भोजन बुद्ध,
दऽ ओकरा उपदेश बिदा भेला कुशीनगर दिस।
संगे चुन्द पार कएल इरावती धार
सरोवर तटपर कऽ विश्राम,
कऽ हिरण्यवती धारमे स्नान,
कहल हे आनन्द,
दुनू शालक गाछक बीच करब हम शयन।
आजुक रातिक उत्तर पहर,
करब प्राप्त निर्वाण।
हाथक बना गेरुआ,
दऽ टांगपर टांग,
लऽ दहिना करोट कहल हे आनन्द,
बजा आनू मल्ल लोकनिकेँ,
भेँट करबा लेल निर्वाण पूर्व।
शान्त दिशा, शान्त व्याघ्र-भालु,
शान्त चिड़इ शान्त सभटा जन्तु।
आबि मल्ल लोकनि कएल विलाप,
मुदा घुरेलन्हि सभकेँ दऽ सांत्वना बुद्ध।
सर्ग २६
ऐल सुभद्र त्रिदंडी संन्यासी तकर बाद,
पाबि अष्टांग मार्गक शिक्षा,
कहल सुभद्र हे करुणावतार
अहाँक मृत्युक दर्शनसँ पहिने हम करय
चाहै छी निर्वाण प्राप्त।
बैसल ओ पर्वत जकाँ
आ जेना मिझा जाइत अछि दीप
हवाक झोँकसँ,
तहिना क्षणेमे केलक निर्वाण प्राप्त।
छल ई हमर अन्तिम शिष्य!
सुभद्रक करू अन्तिम संस्कार!
बीतल आध राति,
बुद्ध बजा सभ शिष्यकेँ,
देल प्रातिमोक्षक उपदेश,
कोनो शंका हुअय तँ पूछू आइ।
अनिरुद्ध कहल नै अछि शंका आर्य सत्यमे ककरो।
बुद्ध तखन ध्यान कऽ एकसँ चारिम तहमे पहुँचि,
प्राप्त कएल शान्ति।
सर्ग २७
भेल ई महापरिनिर्वाण!
मल्ल सभ आबि उठेलक बुद्धकेँ स्वर्णक शव-शिविकामे,
नागद्वारसँ बाहर भऽ केलन्हि पार हिरण्यवती धार,
मुदा शवकेँ चन्दनसँ सजाय,
जखन लगाओल आगि, नै उठल चिनगारि।
शिष्य काश्यप छल बिच मार्ग,
ओकरा अबिते लागल चितामे आगि!
मल्ल लोकनि बीछि अस्थि धऽ स्वर्णकलशमे,
आनल नगर मध्य,
बादमे कऽ पूजा भवनक निर्माण,
कएल अस्थिकलश ओतऽ विराजमान।
सर्ग २८
फेर सात देशक दूत,
आबि मांगलक बुद्धक अस्थि,
मुदा मल्लगण कएल अस्वीकार,
तँ बजड़ल युद्ध।
सभ आबि घेरल कुशीनगर,
मुदा द्रोण ब्राह्मण बुझाओल दुनू पक्ष।
बाँटि अस्थिकेँ आठ भाग,
द्रोण सेहो लेलक नौम घट जइमे छल सभटा अस्थि पहिले पहिल
आ दसम घट लेलक ’पिसल’ जाति, जइमे छल छाउर बुद्धक शरीरक।
सभ घुरला अपन देश आब।
अस्थि कलश आ छाउर कलश पर बना कऽ दस स्तूप,
करै गेला पूजा अर्चना जाय,
दसटा स्तूप बनि भेल ठाढ़,
जतऽ अखण्ड ज्योति आ घण्टाक होइ छल निनाद।
फेर राजगृहसँ ऐल पाँच सय भिक्षु,
आनन्दकेँ देल गेल ई काज,
बुद्धक सभ शिक्षाकेँ कहि सुनाउ,
हएत ई सभ समग्र आब।
हम ई छलौं सुनने ऐ तरहेँ,
कएल सम्पूर्ण वर्णन नीके।
कालान्तरमे अशोक स्तूपसँ लऽ धातु
कऽ कय सय विभाग,
बनाओल कएक सय स्तूप,
श्रद्धाक प्रतीक।
जहिया धरि अछि जन्म, अछि दुख,
पुनर्जन्मसँ मुक्ति अछि मात्र सुख,
तकर मार्ग देखाओल जे महामुनि,
शाक्यमुनि सन दोसर के अछि शुद्ध।
असञ्जाति मनक ई सम्बल,
देलौं अहाँ हे बुद्ध
हे बुद्ध
हे बुद्ध ।
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१.१.भवनाथ झा विशेषांकक संदर्भमे
भवनाथ झा विशेषांकक संदर्भमे
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2008 सँ एखन धरि विदेह http://videha.co.in/ द्वारा जे विशेषांक सभ आएल अछि तकरा तीन चरणमे बाँटि सकैत छी।
पहिल चरण 2008सँ जनवरी 2015 धरि जाहिमे विषय आधारित विशेषांक सभ प्रकाशित भेल आ मधुपजीपर सेहो विशेषांक प्रकाशित भेल। एकदम प्रारंभिक विशेषांक सभमे "विशेषांक" नाम नहि लीखल गेल छै मुदा ओहिमे ओहन रचनाक बेसी स्थान देल गेल छै सायास रूपें (क्रम-1 सँ 12 केर अधिकांश)।
दोसर चरण भेल फरवरी 2015 सँ लऽ कऽ एखन धरि जाहिमे मात्र जीवित लेखकपर विशेषांक प्रकाशित करबाक निर्णय लेल गेल आ इम्हर पछिला बर्ख एहिमे संस्था आ पत्र-पत्रिकापर विशेषांक प्रकाशित करबाक सेहो निर्णय लेल गेल (क्रम-13, 14 एवं 20 सँ लऽ एखन धरिक 38म प्रस्तुत विशेषांक)। जीवैत लेखकपर विशेषांक विभिन्न नामसँ होइत आब "विदेहक जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकपर विशेषांक शृंखला" नामसँ जानल जाइत अछि। मैथिलकर्मीसँ हमर सभहक आशय जिनकर काज मिथिला-मैथिली-मैथिली लेल कोनो माध्यमसँ भेल हो। ओ संगठनकर्ता सेहो भऽ सकै छथि, आन भाषाक लेखक सेहो। तहिना संगीतकर्मी मने गीत-संगीतसँ जुड़ल लोक।
तेसर चरण भेल विदेहक संपादक द्वारा "नित नवल सिरीज" प्रकाशित करबाक (विवरण आगू देल गेल अछि)।
विदेह विशेषांकमे औसत दसे टा (10 टा) आलोचना-समीक्षा मानि लेल जाए तऽ 38 टा विशेषांकमे 380 आलोचना-समीक्षा भेल। संगहि एकै टा (1 टा) आलोचना-समीक्षा केर औसत विदेहक सामान्य अंकमे प्रकाशित मानि लेल जाए एवं दूनूकेँ जोड़ि देल जाए तऽ एखन धरि लगभग 750 आलोचना-समीक्षा प्रकाशित भेलै (वास्तविक संख्या एहिसँ बेसी हेतै)। मिथिला मिहिरक बाद अहाँ सभहक नजरिमे आर कोन एहन पत्रिका अछि जे आन विधाक रचनाक अतिरिक्त 750 टा आलोचना-समीक्षा प्रकाशित केने हो? संगहि जे पाठक ओ शोधार्थी लेल बिना कोनो मूल्य, बिना कोनो बाधाकेँ सार्वजनिक रूपे 24x7x365 आधारपर उपल्बध हो?
पाठक लेल विदेहक हरेक विशेषांक वा नित नवल सिरीज पाँच स्तर, पाँच स्वाद रखने अछि (पाँचम स्वाद सभसँ विरल अछि)-
1) पत्रिका विशेषांक केर स्वाद,
2) आलोचनात्मक पोथीक स्वाद,
3) शोध ग्रंथक स्वाद,
4) साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित मोनोग्राफ केर स्वाद,
5) जँ विदेहक विशेषांकमे कोनो एहन रचनाकार चयनित होइत छथि जिनकर पति वा पत्नी सेहो रचनाकार छथिन तँ विदेह अपन विशेषांकमे दूनूकेँ मूल्यांकन करैत अछि। उदाहरण लेल विदेहक लक्ष्मण झा 'सागर' विशेषांक , नरेन्द्र झा विशेषांक आ शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक देखल जा सकैए। विदेह अपन अंक लेल सागरजी, नरेन्द्र झा एवं शिवशंकर श्रीनिवासक चयन केने छल मुदा सागरजीक पत्नी शैल झा 'सागर' सेहो रचनाकार छथिन तँ लक्ष्मण जी बला विशेषांकमे शैलजीक रचनाकर्मपर सेहो विचार भेल, नरेन्द्र झाजीक पत्नी पन्ना झा कथाकार से नरेन्द्र झा विशेषांकमे पन्नाजीक रचनाकर्मपर सेहो विचार भेल आ तेनाहिते श्रीनिवासजीक पत्नी मीनू मधु सेहो रचनाकार छथिन तँइ हुनको रचनाकर्मपर विचार भेलै। ई विचार वा घटना संपूर्ण मैथिली साहित्यमे नहि भेल छल हमरा जनैत, से मात्र विदेह द्वारा संभव भेल। जँ हम गलत होइ तऽ सूचित करी हम अपन ज्ञानकेँ सुधारि लेब। साहित्य अकादमीक कथित मोनोग्राफ तँ आइ धरि बहुतो लेखकपर प्रकाशित नहि भऽ सकल अछि। एहन परिस्थितिमे विदेह एकटा नव बाट बना कऽ मैथिली लगमे राखि देने अछि। पाठक चाहथि तँ एहि विशेषांक सभमेसँ आनो स्वाद ताकि सकै छथि।
मैथिलीमे जे लोक सभ विश्वविद्यालयसँ जुड़ल छथि आ कि ओहनो लोक जे सभ प्रोफेसर सभहक संगतिमे छथि ताहिमे किछु लोकक मूँहे ईहो सुनबा लेल भेटल जे जिनका-जिनकापर विदेह विशेषांक प्रकाशित भऽ चुकल अछि ताहिमेसँ अधिकांशपर विश्वविद्यालय सभमे शोध हेबाक लेल पंजीयन भऽ रहल छै। हमरा लेल ई समाद बहुत पहिनेसँ सूनल मानू। वास्तविकता ई छै जे विदेह विशेषांकमे जते सूचना रहैत छै ततेमे ओही एक लेखकपर एकै समयमे कमसँ कम 15-20 दृष्टिकोणसँ शोध भऽ सकैत छै। खएर मैथिलीमे विश्विद्यालयक शोध जेहन होइत छै, जेहन प्रोफेसर आ शोधार्थी सभ होइत छै ताहिमे हम सभ मानि बैसल छी जे विदेह विशेषांक एहिना सार्वजनिक होइत रहत आ शोधार्थी सभ बिना अनुमति, बिना क्रेडिट देने चोरा कऽ कथित शोध करैत रहता।
जँ अहाँ अइ विशेषांक केर PDF पढ़ि रहल छी तँ कोनो शब्द वा पाँति अंडरलाइनमे वा बिना अंडरलाइनकेँ नीला वा कोनो रंगक (कारी रंग छोड़ि) देखाए तँ बुझि लिअ जे ओहिमे लिंक देल गेल छै रेफरेंस लेल आ तकरा क्लिक करबै तँ ओ लिंक खुजि जाएत। कोनो-कोनो फोटोमे सेहो लिंक देल गेल छै। पाठक एहि माध्यमसँ कम समयमे रेफरेंस सभहक अध्य्यन कऽ सकै छथि। मुदा प्रिंटमे प्रकाशित पोथीमे ई सुविधा नै रहत। अइ कारणसँ भऽ सकैए जे पाठककेँ एहि पोथीक किछु पाँति प्रचलित नै बुझेतनि। जाहि ठाम लिंक देल गेल छै ताहि ठामक पाँतिक किछु शब्दक बीच बेसी स्थान छूटल छै। ओकरा एक पाँति बना पढ़ी से आग्रह। हम चाहितहुँ तँ सभ लिंक वा चित्रकेँ एकठाम दऽ सकै छलहुँ मुदा हमर सोच अछि जे पाठककेँ एकै ठाम तर्क आ सबूत भेटनि। एकटा आर बात ई जरूरी नहि छै जे एक लेखक लेल हम एकैटा लिंक प्रयोग करी। ओहन लेखक जिनका बारेमे बहुत रास लिंक छै गूगलपर हुनकर नाम जखन एक बेरसँ बेसी अबैत अछि तँ हमर प्रयास रहैए जे हुनकर नाम सभमे अलग-अलग लिंक लगा दी। तँइ पाठक जखन एकै नामक बहुत रास लिंक देखथि तँ ई मानि लेथि जे हुनका लग रेफरेंसक भंडार पहुँचल छनि।
विदेहक विशेषांक सभ लेल हम ओहनो लोक सभ लग आलेख लेल जाइत छी, हुनका सूचना दैत छी जे कि हमर (आशीष अनचिन्हार), विदेह या गजेन्द्र ठाकुरक धुर विरोधी छथि। दू-चारि लोक कहि सकै छथि जे हमरा सूचना नहि भेटल, तऽ हुनकासँ हमर आग्रह जे कमसँ कम ओ अपन ह्वाटसएप आ फेसबुक केर मैसेज बॅाक्स (इनबॅाक्स) देखथि। हमर एहि प्रयासक प्रतिफल विदेहक आन विशेषांक संगे एहूमे देखाइ पड़त से उम्मेद अछि।
16 अगस्त 2025 केँ विदेह भवनाथ झा जीक ऊपर एकटा संस्मरण अंक प्रकाशित करबाक सार्वजनिक घोषणा केलक। एहि सूचनाकेँ एहि लिंकपर देखि सकैत छी-घोषणा। किछु लोक संस्मरण शब्दसँ असमहति व्यक्त करैत छथि, हुनकर मानब छनि जे संस्मरण स्मृतिमे लिखल जाइत छै मने मरलाक बाद। मुदा ई सही परिभाषा नै छै। संस्मरण जीवितेमे लिखल जाइत छै। जँ हिंदीक बात करी तऽ महान आलोचक नामवर सिंहपर संस्मरण लिखल गेलै सेहो हुनके लेखक भाए काशीनाथ सिंह द्वारा ओहो नामवर सिंहक जीवैतमे। संस्कृतक पुराण सभहक आख्यान पढ़बै तऽ साफ पता लागत जे ओ सभ संस्मरणे विधामे लीखल गेल छै। हमरा बुझाइए जे 'संस्मरण' शब्दमे जे "मरण" छै तकरे कारण किछु लोक एहि विधाकेँ अशुभ मानऽ लगलाह अछि, जे उचित नहि। विदेह आन चीजक संगे समाजमे पसरल अंधविश्वासकेँ तोड़बाक लेल सेहो कृतसंकल्पित अछि।
भवनाथ झाजीक दू रूप छनि पहिल एकदम शुरूआती समय बला जाहिमे साहित्यकारक रूपमे छलाह आ कथा, बीहनि कथा आदि लिखैत छलाह। हुनकर दोसर रूप बादक समय अछि जाहिमे ओ शोधकर्ता, पांडुलिपि विशेषज्ञ, प्राचीन ग्रंथक संपादक आदि रूपमे आबि गेलाह। हिनक वर्तमान स्वरूप शोधकर्ता, पांडुलिपि विशेषज्ञ, प्राचीन ग्रंथक संपादके बला अछि। तँइ एहि विशेषांक केर शुरूआत हम शोधकर्ता, पांडुलिपि विशेषज्ञ, प्राचीन ग्रंथक संपादक आदिक रूप बलापर केंद्रित केलहुँ आ तकर बाद पहिल ओ प्रारंभिक रूपपर।
चूँकि संस्मरण अंकक घोषणा भेल छलै तँइ एहिमे पाठकक सुझाव बला बाध्यता हमरा लग नहि छल। मुदा जखन हम एकर स्वरूप निर्धारण करऽ लगलहुँ तऽ कतहुँ ने कतहुँ ई विशेषांके सन भऽ गेल। पाठक चाहथि तऽ एकरा नकारि सकै छथि मुदा हम एकरा विशेषांके मानि लेबाक लोभ कऽ रहल छी।
सीताक विवाह स्थान जनकपुर (नेपाल)मे नहि भऽ कऽ भारतमे छै से तथ्य प्रमाणित केलाह अछि भवनाथ झाजी। मिथिला नेपालोमे छै आ ओहिठामक बहुत लोक विदेहक पाठक सेहो छथि। हम फेसबुकपर एक पोस्ट लीखि नेपालक विद्वान ओ लेखक सभकेँ आग्रह केलियनि जे जँ हुनका लग समुचित तथ्य होइन तऽ ओ भवनाथजीक बातक खंडन करथि, विदेह ओकरा भवनाथ झा विशेषांकमे प्रकाशित करत। एकटा संपादकक तौरपर ई हमर नैतिक दायित्व सेहो छल। भविष्यमे नेपालक विद्वान ई नहि कहि सकै छथि जे एकभगाह काज भऽ गेलै विदेह द्वारा। संपादक तऽ मात्र आग्रहे कऽ सकैए, लिखबाक काज तऽ लेखकक छनि। फेसबुक पोस्टक लिंक निच्चाक फोटोमे देल गेल अछि-
विविध विषयपर विशेषांकक बाद 2015 मे विदेहक संपादक लग आशीष अनचिन्हार द्वारा जीवित लेखकपर विशेषांक निकालबाक प्रस्ताव राखल गेल आ संपादकक सहमतिक बाद ई एखन धरि एकटा नमहर रस्ता बना चुकल अछि।
ई विचार ओहि समयमे एकटा नवाचार छल। नवाचार किएक से एना बूझू।
मैथिलीमे एखनो धरि अधिकांश पत्रिका द्वारा कोनो लेखक वा आन कोनो लोकक विशेषांक हुनक मृत्युक बादे प्रकाशित करैत अछि। ओना एक-दू पत्रिका द्वारा विदेहसँ पहिनेहे जीवित लेखक ऊपर विशेषांक प्रकाशित कएल गेल अछि मुदा जिनकापर ओ विशेषांक प्रकाशित भेलै, जे प्रकाशित केलाह तिनकर सभहक संबंध देखबनि तऽ साफे लागत जे ओ सभ एक गुटक छलाह तँइ एहन काज संभव भेलै, एक गुट द्वारा दोसर गुटक लेखकक ऊपर विशेषांक ओ सभ कहियो प्रकाशित नै कऽ सकलाह।
तँइ 2015मे जखन विदेह एहन काज केलक तऽ एकरा नवाचार मानल गेलै। अहाँ सभ विदेह द्वारा एखन धरि प्रकाशित विशेषांक केर सूची देखि लिअ ई नवाचार साफ-स्पष्ट रूपे दृष्टिगोचर हएत। नवाचार माने ईहो जे मात्र साहित्यिके लोक एहि हदमे नहि छथि, विदेह भाषाविद्, पर्यावरणविद्, पांडुलिपिविद् , संगीतकला सहित चित्रकला सभपर विशेषांक सेहो प्रकाशित केलक जे सामान्यतः मैथिली पत्रिकामे उपेक्षित रहैत छल।
मुदा आशीष अनचिन्हार एवं विदेहक ई नवाचार अतबेपर नहि बंद भेल, बहुत रास नव-नव दृष्टिकोणक संग विदेह विशेषांकक परिकल्पना कएल गेल आ बहुत हद धरि ओकरा साकार सेहो कएल गेल। नीचाक सूची देखल जाए-
1) 2022 मे आशीषे अनचिन्हार द्वारा विदेह लग संस्थाक ऊपर विशेषांक प्रकाशित करबाक प्रस्ताव राखल गेल।
2) 2023 मे आशीष अनचिन्हार द्वारा विदेह लग दू टा विचार राखल गेल 1) लेखक-प्रकाशकसँ इतर आन जे लोक पोथी-पत्रिका केर बिक्री कऽ अपन जीवय-यापनक संग मैथिली पोथीक प्रचारमे सहायक छथि तिनको ऊपर विशेषांक प्रकाशित, एवं 2) मैथिलीक कोनो पत्रिकाक उपर विदेह विशेषांक प्रकाशित हो।
3) दिसंबर 2024 मे "विदेह लिटरेचर फेस्टीभल” केर घोषणा भेल।
4) जनवरी 2025 मे विदेह द्वारा "मिथिलाक वर्तमान उद्योग, उद्योगपति एवं एकर भविष्य" विशेषांक प्रकाशित करबाक घोषणा भेल।
5) 2025 मे "स्व-निंदा विशेषांक" केर सेहो घोषणा भेल अछि जाहि लेल पहिल चयन अशीषे अनचिन्हारक भेल अछि।
6) अक्टूबर 2025 मे "विदेहक रील / शार्ट भीडियो विशेषांक" उर्फ "मैथिली भाषाक विकासमे रील / शार्ट भीडियो केर भूमिका" केर घोषणा भेल।
ऊपर घोषणाक सूची देखने हेबै तऽ साफे पता लागल हएत जे विदेह मात्र लेखक वा साहित्यकारे केर गुट नहि तोड़लकै, विषय केर गुट सेहो तोड़लकै आ एहन विषय सभ चुनलक जे आन पत्रिका सभ लेल वर्जित छल।
विशेषांक एवं अन्य सामान्य अंक समेत विदेह एकटा नमहर यात्रा कऽ चुकल अछि आ एहिठाम आब हम कहि सकैत छी जे ई एकटा चुनौतीपूर्ण काज छै। अनेक संकट केर सामना करए पड़ैत अछि लेख एकट्ठा करएमे। मुदा संगहि ईहो हम कहब जे संकटसँ बेसी हमरा लग समर्थन अछि। हँ, ई मानएमे हमरा कोनो दिक्कत नहि जे जतेक लेख केर उम्मेद केने रहैत छी हम ततेक नै आबैए, जतेक लोक लिखबाक लेल गछैत छथि से सभ अंत-अंत धरि आबि चुप्प भऽ जाइत छथि। आ एकर कारणो छै, किनको ई लागै छनि जे आनपर लिखब से हम अपने रचना किए ने लीखि लेब, किनको लग पोथिए नै रहै छनि, जखन कि हम सभ यथासंभव पाठककेँ विकल्प रूपमे पोथीक पी.डी.एफ फाइल सेहो देबाक लेल तैयार रहैत छी। कियो विदेहक समावेशी रूपसँ दुखी छथि, तँ किनको मित्रकेँ विदेहसँ दिक्कत छनि तँइ ओ अपन मित्रक ईगो के रक्षा लेल रचना / आलेख नहि देता। एकरो हम संकटे बुझै छियै जे सभ फेसबुकपर लंबा-लंबा लेख वा कमेंट टाइप कऽ लै छथि सेहो सभ विदेह लेल हाथसँ लिखल पठाबैत छथि। जे सभ कहियो काल फेसबुकपर टाइप कऽ लीखै छथि तिनकर आलेख हम सभ टाइप करिते छी। खएर पहिने कहलहुँ जे संकटसँ बेसी समर्थन अछि तँइ आइ पहिलसँ लऽ कऽ एहि प्रस्तुत विशेषांक धरि पहुँचलहुँ हम। निश्चिते समर्थन बेसी भेटल हमरा। जखन कि विदेहक एहि विशेषांक सभहक अलावे आन अंक हरेक पंद्रह दिनपर (मासमे दू बेर) लगातार प्रकाशित भइए रहल अछि। एकर अतिरिक्त ईहो बात संतोषदायक अछि जे विदेहक हरेक व्यक्तिपरक विशेषांक अभिनंदनग्रंथ हेबासँ बाँचि गेल अछि। मुख्यधारा जकाँ विदेहकेँ अभिनंदनग्रंथ नहि चाही। अभिनंदनग्रंथ अहू दुआरे नै चाही जे ओहिसँ लेखक वा जिनकापर निकालल गेल छनि तिनकामे सुधारक गुंजाइश खत्म भऽ जाइत छै। तँइ विदेहक विशेषांकमे आलोचना-प्रसंशा सभ भेटत।
विदेह विशेषांकमे प्रकाशित आलेख सभ जखन अहाँ सभ पढ़ैत चलि जेबै तऽ अनुभव हएत जे या तऽ अहाँ सीढ़ीपर चढ़ि रहल छी या उतरि रहल छी। माने एक समान ऊर्जासँ अहाँ पढ़ैत चलि जेबै। बिना कोनो रुकावट बिना कोनो धुकचुकाहटकेँ। आ ई संभव होइत छै आएल लेख सभह प्रस्तुतिकरणक कारणे। अही प्रस्तुतिकरणक कारणे कम्मो आलेख रहैत विदेह विशेषांकमे सूचना भरल रहैत छै। विदेह विशेषांकमे प्रकाशित आलेख कोन ठाम राखल जाए (माने कोन लेखक केर लेख ऊपर हो वा कि नीचा हो) से निर्णय चयनित लेखकक काज एवं हुनकापर आलेख केर प्रवृतिकेँ धेआनमे राखि कएल जाइत अछि। मुदा बहुत बेर ई संभव नहि भऽ पाबैत छै कारण आलेख सभ एकदम अंतिम समयमे अबैत छै आ तखन ओकरा ऊपर-नीचा करब संभव नहि रहैत छै। तथापि हमर सभहक प्रयास रहहैए जे प्रस्तुतिकरण एकदम सही हो। दुर्भाग्यवश मैथिलीमे किछु एहनो लेखक सभ छथि जिनका अपन लिखल आलेखपर कम भरोसा रहैत छनि आ ओ चाहैत छथि जे हमर आलेख सभसँ ऊपर राखल जाए। पछिला एक विशेषांकमे सद्य अनुभव भेल हमरा। मुदा एहि प्रवृतिकेँ हम सभ नकारि देने छी आ जे आलेख जाहि ठाम सही बुझाइए तही ठाम राखैत छी बिना कोनो समझौताकेँ।
पहिने विदेहक सभ अंक नागरी, तिरहुता आ ब्रेल लिपिमे प्रकाशित होइत छल। एकर अतिरिक्त विदेहक किछु अंक कैथी, नेवाड़ी, आइ.पी.ए. लिपि, रंजना (नेवारी केर एक आर रूप), ब्राह्मी, खरोष्ठी, उर्दू, तिब्बती एवं तिब्बती-उमे लिपिमे सेहो छपल अछि। कुल मिला कऽ देखी तँ विदेह 11-12 लिपि अपना लेल रखने अछि।
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पाठक जखन एहि विशेषांक वा विदेहक नियमित अंक (सामान्य अंक)केँ पढ़ताह तँ हुनका वर्तनी ओ मानकताक अभाव लगतनि। विदेह मूलतः शब्दमे विभक्ति सटा कऽ लिखैत अछि संगहि मैथिली मानक भाषा आ मैथिली भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम लेल “भाषापाक” नामक अपन दिशानिर्देश सेहो रखने अछि मुदा विदेहमे छपए बला लेखक लेल स्वतंत्रता छै जे ओ कोन रूपमे लिखै छथि, माने जे विदेह शुरुएसँ हरेक वर्तनी बला लेखककेँ स्वीकार करैत एलैए। तँइ मानकता अभाव स्वाभाविक। विदेह सभ वर्तनी आ स्वरूपक सम्मान करैत अछि। तथापि वर्तनीक गलती जे थिक से सोझे-सोझ हमर सभहक गलती थिक जे हम सभ संशोधन नै कऽ सकलहुँ। मैथिलीमे किछुए एहन पत्रिका अछि जकर वर्तनी एक रंगक रहैत अछि आ ई हुनक खूबी छनि मुदा जखन ओहो सभ कोनो विशेषांक निकालै छथि तखन वर्तनी तँ ठीक रहैत छनि मुदा सामग्री अधिकांशतः बसिये रहैत छनि। ऐतिहासिकताक दृष्टिसँ कोनो पुरान सामग्रीक उपयोग वर्जित नै छै। हमहूँ सभ करैत छियै, मुदा सोचियौ जे 72-80 पन्नाक कोनो प्रिंट पत्रिका होइत छै ताहिमे लगभग आधा सामग्री साभार रहैत छै (माने दू भाग पुरने सामग्री), तेसर भागमे लेखक केर किछु रचना रहैत छै आ चारिम भागमे किछु नव सामग्री। हमरा लोकनि नव सामग्रीपर बेसी जोर दैत छियै। एकर मतलब ई नहि जे वर्तनीमे गलती होइत रहै। हमर कहबाक मतलब ई जे संपादक-संयोजककेँ कोनो ने कोनो स्तरपर समझौता करहे पड़ैत छै से चाहे वर्तनीक हो कि, मुद्राक हो कि विचारधारक हो कि सामग्रीक हो। हमरा लोकनि वर्तनीक स्तरपर समझौता कऽ रहल छी मुदा कारण सहित। प्रिंट पत्रिका एक बेर प्रकाशित भऽ गेलाक बाद दोबारा नै भऽ सकैए (भऽ तँ सकैए मुदा फेर पाइ लागि जेतै) तँइ ओकर वर्तनी यथाशक्ति सही रहैत छै। इंटरनेटपर सुविधा छै जे बीचमे (इंटरनेटसँ प्रिंट हेबाक अवधि) ओकरा सही कऽ सकैत छी मुदा सामग्रिए बसिया रहत तँ सही वर्तनी रहितो नव अध्याय नै खुजि सकत तँइ हमरा लोकनि वर्तनी बला मुद्दापर समझौता केलहुँ। हमरा लोकनि कएलनि, कयलनि ओ केलनि तीनू शुद्ध मानैत छी, एतेक शुद्ध मानैत छी एकै रचनामे तीनू रूप भेटि जाएत। आन शब्दक लेल एहने बूझू। उम्मेद अछि जे पाठक विदेहक आने विशेषांक जकाँ एकरा पढ़ताह आ पढ़ि एकर नीक-बेजाएपर अपन सुझाव देताह। विदेहक हरेक अंक विदेह वेबसाइटपर भेटत आ एकर अलावे गूगल बुक्स Google Books आ आर्कइभ.कॅम archive.org पर सेहो भेटत। तँइ स्वाभाविक रूपसँ विशेषांक सेहो तीनू प्लेटफार्मपर भेटत। मुदा तीनू प्लेटफार्मपर अंक सभकेँ अलग ढंगसँ सजाएल गेल छै जकरा हम पाठक लग राखि रहल छी। पाठक निच्चा बला पैराग्राफपर ध्यान देताह तऽ हुनका कम्मे समयमे नीक रिजल्ट भेटतनि।
विदेहक अपन साइट आ आर्कइभ.कॅम archive.org पर विदेहक हरेक अंक क्रमबद्ध तरीकासँ भेटत। आर्कइभ.कॅम archive.org पर विदेहक हरेक अंक पढ़बाक लेल पाठक Gajendra Thakur सर्च करथि आ https://archive.org/details/@videha_editorial_staff पर जाथि जाहिठाम क्रमबद्ध तरीकासँ सभ भेटतनि। संगे ईहो लिंक सहायक हेतनि https://archive.org/details/videha_pdf_202305 मुदा गूगल बुक्स Google Books पर विदेहक अंक सभकेँ सर्च करबाक हिसाबसँ राखल गेल अछि। माने जे पाठक गूगल बुक्स Google Books पर जँ कोनो शब्दकेँ वा लेखककेँ वा किताबक नामकेँ वा आन कोनो की वर्ड (Key Word)सँ तकताह आ जँ ओ शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड विदेहमे प्रकाशित भेल छै तऽ पाठक लग विदेहक ओ सभ अंक देखाबऽ लगतै जाहिमे पाठक द्वारा शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड देल गेल छै। एकर माने ई भेल जे विदेहमे प्रकाशित हरेक शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड (Search Word) पाठकक मुट्ठीमे आबि गेल आ अन्य माध्यमक अपेक्षा बेसी दिन धरि पाठक केर पहुँचमे रहत। आ संगहि जँ ओ शब्द, लेखक, किताब वा ओ सर्च वर्ड विदेहसँ इतर आन कोनो पोथीमे छै तँ ओहो पाठकक सामने आबि जेतनि माने पाठक लेल दुन्ना फायदा।
पाठक गूगल बुक्स Google Books पर विदेहक Videha eLearning पर जा कऽ विदेहक अंक पढ़ि सकै छथि ओत्तहि संपादक गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur पर क्लिक कऽ बहुत रास पोथी पढ़ि सकै छथि। तहिना पाठक जा कऽ गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur सर्च करथि हुनका विदेहक अंक सहित ओ सभ पोथी भेटि जेतनि जे विदेहपर देल गेल छै। एकर माने ई भेल जे मात्र विदेहक अंके नै आनो-आनो पोथी सभ भविष्यमे बाँचल रहि जेतै। संगहि विशेषांक सभहक प्रिंट रूप किनबाक लेल ओकर पोथी रूपक लिंक पोथी.कॅम Pothi.com पर देल गेल छै। पाठक पोथी.कॅम Pothi.com पर जा कऽ गजेन्द्र ठाकुर Gajendra Thakur सर्च करथि हुनका विदेहक विशेषांक सहित बहुत रास पोथी भेटि जेतनि किनबाक लेल। पाठक देवनागरीमे गजेन्द्र ठाकुर आ रोमन केर Gajendra Thakur दूनू सर्च करथि से हमर आग्रह रहत। कारण देवनागरी आ रोमन दूनूमे संपादक अपन एकाउंट बनेने छथि आ अपन सुविधासँ दूनू एकाउंटसँ विदेहक अंक आ पोथी अपलोड केने छथि। एहिठाम हम पहिने विदेहक लिंक देब आ ठीक ताही संगे एहि विशेषांकक पोथी.कॅम Pothi.com केर प्रिंट आॉन डिमांड बला लिंक देने छी जाहि ठाम पाठक एकरा आॉनलाइन कीनि सकै छथि। विदेहक द्वारा जीवैत लेखक ओ संस्थाक विशेषांक शृखंलामे प्रकाशित भेल संगहि आन विशेषांक सभहक लिस्ट एना अछि (एहिठाम जे अंकक लिस्ट देल गेल अछि ताहि अंकपर क्लिक करबै तँ ओ अंक खुजि जाएत)-
1) हाइकू विशेषांक 12 म अंक, 15 जून 2008
2) गजल विशेषांक 21 म अंक, 1 नवम्बर 2008
3) विहनि कथा विशेषांक 67 म अंक, 1 अक्टूबर 2010
4) बाल साहित्य विशेषांक 70 म अंक, 15 नवम्बर 2010
5) नाटक विशेषांक 72 म अंक 15 दिसम्बर 2010
6) समीक्षा विशेषांक 74म अंक 15 जनवरी 2011
7) नारी विशेषांक 77म अंक 01 मार्च 2011
8 अनुवाद विशेषांक (गद्य-पद्य भारती) 97म अंक 1 जनवरी 2012
9) बाल गजल विशेषांक विदेहक अंक 111 म अंक, 1 अगस्त 2012
10) भक्ति गजल विशेषांक 126 म अंक, 15 मार्च 2013
11) गजल आलोचना-समालोचना-समीक्षा विशेषांक 142 म, अंक 15 नवम्बर 2013
12) काशीकांत मिश्र मधुप विशेषांक 169 म अंक 1 जनवरी 2015
13) अरविन्द ठाकुर विशेषांक 01 नवम्बर 2015 अंक 189, विदेहक अरविन्द ठाकुर विशेषांक केर पोथी रूप "स्वतंत्रचेता- अरविन्द ठाकुर: व्यक्तित्व-कृतित्व" केर नामसँ प्रकाशित भेल।
14) जगदीश चन्द्र ठाकुर अनिल विशेषांक 01 दिसम्बर 2015 अंक 191, पोथी.कॅम pothi.com
15) विदेह सम्मान विशेषाक- 200म, भाग-1, 15 अप्रैल 2016
16) विदेह सम्मान विशेषाक- 205म, भाग-2, 1 जुलाई 2016
17) मैथिली सी.डी./ अल्बम गीत संगीत विशेषांक- 217 म अंक 01 जनवरी 2017
18) मैथिली वेब पत्रकारिता विशेषांक-313म अंक 1 जनवरी 2021
19) मैथिली बीहनि कथा विशेषांक-2, 317 म अंक 1 मार्च 2021
20) रामलोचन ठाकुर विशेषांक 01 अप्रैल 2021 अंक 319, पोथी.कॅम pothi.com
21) राजनन्दन लाल दास विशेषांक 01 नवम्बर 2021 अंक 333, पोथी.कॅम pothi.com
22) रवीन्द्र नाथ ठाकुर विशेषांक 15 जून 2022 अंक 348, पोथी.कॅम pothi.com
23) केदारनाथ चौधरी विशेषांक 15 अगस्त 2022 अंक 352, पोथी.कॅम pothi.com
24) प्रेमलता मिश्र 'प्रेम' विशेषांक 01 नवम्बर 2022 अंक 357, पोथी.कॅम pothi.com
25) शरदिन्दु चौधरी विशेषांक 15 नवम्बर 2022 अंक 358, पोथी.कॅम pothi.com
26) “कला-विमर्श विशेषांक (सन्दर्भ- संजू दास, कृष्ण कुमार कश्यप, शशिबाला, एस.सी.सुमन आ श्वेता झा चौधरी)” 15 अप्रैल 2023 अंक 368, पोथी.कॅम pothi.com
27) अशोक विशेषांक 1 मइ 2023 अंक 369, पोथी.कॅम pothi.com
28) रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर' विशेषांक 15 मइ 2023 अंक 370, पोथी.कॅम pothi.com
29) मिथिला स्टूडेंट यूनियन (MSU) विशेषांक 1 जून 2023 अंक 371, पोथी.कॅम pothi.com
30) लक्ष्मण झा सागर विशेषांक (15 नवम्बर 2023 अंक 382), पोथी.कॅम pothi.com
31) नरेन्द्र झा विशेषांक (1 जून 2024 अंक 395), पोथी.कॅम pothi.com
32) भाषाविद् रामावतार यादव विशेषांक 1 जून 2024 अंक 395, पोथी.कॅम pothi.com
33) अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद् विशेषांक 15 अगस्त 2024 अंक 400, पोथी.कॅम pothi.com
34) हितनाथ झा विशेषांक 1 नवम्बर 2024 अंक 405, पोथी.कॅम pothi.com
35) मिथिला विकास परिषद् विशेषांक 15 दिसंबर 2024 अंक 408, पोथी.कॅम pothi.com
36) नारायणजी चौधरी विशेषांक 1 जून 2025 अंक 419, पोथी.कॅम pothi.com
37) शिवशंकर श्रीनिवास विशेषांक 15 अगस्त 2025 अंक 424, पोथी.कॅम pothi.com
एहि लिस्टमे 1, 2, 4, 5, 6, 7, 8, 15 एवं 16 विदेहक स्वतः संख्याक हिसाब बला विशेषांक अछि। ओतहि 2 आ 19 क्रम संख्याक विशेषांक मुन्नाजीक संयोजनमे प्रकाशित भेल अछि। शेष सभ बाँचल विशेषांकक परिकल्पना एवं संयोजन आशीष अनचिन्हार द्वारा भेल अछि।
अरविन्द ठाकुर, जगदीश चन्द्र ठाकुर 'अनिल', केदारनाथ चौधरी, प्रेमलता मिश्र 'प्रेम', शरदिन्दु चौधरी, अशोक, रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर', लक्ष्मण झा 'सागर', नरेन्द्र झा, रामावतार यादव, हितनाथ झा, नारायणजी चौधरी, शिवशंकर श्रीनिवास ई सभ एहन लेखक / सामाजिक कार्यकर्ता छथि जे सभ अपना ऊपर प्रकाशित विशेषांक अपन आँखिए पूरा होशो-हवाशमे पढ़ि सकलाह, देखि सकलाह, ई हमर सभहक सौभाग्य। रामलोचन ठाकुर, राजनन्दन लाल दास आ रवीन्द्र नाथ ठाकुर केर विषयमे हम सभ हतभाग्य रहलहुँ जे घोषणा भेलाक बाद मुदा एकरा प्रकाशित भेलासँ पहिने ओ सभ नहि देखि सकलाह।
संस्था बलामे मिथिला स्टूडेंट यूनियन (MSU) केर अधिकांश सदस्य, अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद् केर अधिकांश सदस्य आ मिथिला विकास परिषद् केर अधिकांश सदस्य सभ संस्थाक ऊपर प्रकाशित विशेषांक पढ़ने छथि। नित नवल सिरीज बलामे सभ लेखक (राजदेव मंडल, सुभाष चंद्र यादव, सुशील) अपने एकरा पढ़ने छथि। ईहो हमर सभहक सौभाग्य। किछु फोटो आ सूचना जे हमरा भेटि सकल जाहिमे विशेषांकसँ संबंधित लेखक-व्यक्तित्व-संस्था अपने पढ़ि सकलाह तकर फोटो हम निच्चा दऽ रहल छी।
आशीष अनचिन्हार द्वारा संपादित पोथी 'प्रीति कारण सेतु बान्हल' जे कि मिथिला ओ मैथिलीक संवर्धनमे गजेन्द्र ठाकुर एवं प्रीति ठाकुरक योगदानक आलोचनात्मक ग्रंथ अछि ताहिमे संकलित शिवशंकर श्रीनिवास जीक एक शोध आलेख मैथिली पत्रिकामे व्यक्तिपरक विशेषांकक इतिहास अछि आ ओहि इतिहासमे विदेह विशेषांक कोन ठाम अछि तकर मूल्याकंन भेटत संगहि ओही आलेखमे श्रीनिवास जीक मोताबिक जीवितेमे अपन मूल्याकंन पढ़ि लेब कोनो लेखक लेल कोनो सम्मानसँ बेसी महत्वपूर्ण अछि। मैथिलीक बहुत रास पाठक विदेहक जीवित लेखक विशेषांककेँ मूल्यवान मानै छथि ('प्रीति कारण सेतु बान्हल’ मे कीर्तिनाथ झा, कल्पना झा, प्रणव कुमार झा, धनाकर ठाकुर आदिक आलेख), ओतहि किछु पाठक विदेह विशेषांककेँ साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ बेसी महत्वपूर्ण मानै छथि ('प्रीति कारण सेतु बान्हल’ मे लक्ष्मण झा 'सागर'जीक आलेख) यद्पि विदेह साहित्य अकादमी पुरस्कारक आलोचना करैत अछि मुदा अकादमी द्वारा पुरस्कार छोड़ि जे प्रकाशन एवं आन काज छै तकर प्रसंशा सहो करैत अछि। तथापि जँ किछुओ पाठक विदेह विशेषांककेँ कोनो सम्मान-पुरस्कार वा कि साहित्य अकादमी पुरस्कारसँ बेसी महत्वपूर्ण मानै छथि तँ ई विदेह लेल निश्चिते प्रेरणादायी बात छै।
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विदेहक जीवित विशेषांक शृंखलामे किनकर चयन हो ताहि लेल मोटा-मोटी निच्चाक किछु बिंदुक पालन कएल जाइत अछि-
1) लगभग पाँच-छह मास पहिनेसँ विदेह अपन पाठककेँ सुझाव देबा लेल लेल सूचना दैत अछि।
2) आएल सुझावमेसँ विदेह मात्र जीवित लेखककेँ चयन करैत अछि। संस्था सेहो वर्तामनमे जीवंत हेबाक चाही।
3) सभ जीवित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक बीचमे हुनकर लेखन/ काज एवं आचरणक साम्यता देखल जाइत अछि। जाहि लेखकक लेखन/ काज ओ आचरणमे बेसी साम्यता (कम फाँक) भेटैए तेहन छह टा नाम चयनित होइत अछि।
4) छह नाम एलापर ई तुलना कएल जाइत छै जे ई छहो मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक अथवा संस्थाकेँ रचना लिखबाक वा समाजिक काज केलाक एवजमे समाजसँ की भेटलनि।
5) जिनका सभसँ कम भेटल बुझाइत अछि ताहि तीन मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशक, संस्थाकेँ अगिला चरण लेल राखि लैत छी।
6) एहि तीन चयनित जीबित मैथिलकर्मी, संगीतकर्मी, साहित्यकार-सम्पादक आ रंगमंचकर्मी-रंगमंच-निर्देशकक वा संस्थाक रचना, काज, हुनक उद्येश्य आदिक बीचमे परस्पर तुलना कएल जाइत अछि आ,
7) अंतिम रूपसँ विदेह द्वारा नाम चुनि सालक अंतमे घोषणा कएल जाइत अछि आ नियत समयपर ई विशेषांक निकालबाक प्रयास करैत छी। एकर मतलब ई भेल जे पाठककेँ सुझाव देबाक सूचना हरेक बर्खक अप्रैल-मइ धरिमे चलि जाइत छनि।
प्रश्न उठि सकैए जे कि उपरक नियम एहन छै जाहिमे अंतिम रूपसँ सभ सुयोग्य जीवित लेखक केर चयन समयपर भ़ऽ जेतनि? तऽ एकर उत्तर छै- नै। विदेहक अपन सीमा छै आ विदेहक पाठक लग सेहो अपन सीमा छनि। मुदा अही सीमाक संगे हमरा सभकेँ अपन यथासाध्य श्रेष्ठ देबाक छै आ मैथिली लेल एकटा एहन रस्ता बना देबाक छै जाहिसँ आबए बला 500-600 बर्खक साहित्य विदेहक लीकसँ प्रेरणा पाबए। अही विचारक संग विदेह ओहन जीवित लेखकपर अपन धेआन सेहो केंद्रित कऽ रहल अछि जे कि सुयोग्य छथि मुदा जिनकापर विदेहक विशेषांक कोनो कारणवश नहि प्रकाशित भऽ सकल। एकर नाम भेल विदेहक "नित नवल सिरीज"। एहि नव विचारक मुख्य बिंदु एना अछि-
1) विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर एकटा कोनो जीवित लेखक वा कलाकारपर एकाग्र आलोचना करता मने ओहि लेखक केर उपलब्ध सभ साहित्यपर। एहि पोथीक भाषा मैथिली अथवा अंग्रेजी कोनो एक भाषामे रहत। एहि पोथीक पहिल रूप ई-बुक केर रूपमे आएत आ प्रयास रहत जे एकर प्रिंट सेहो आबए जे कि परिस्थितिपर निर्भर करतै।
2) लेखक वा कलाकार केर चुनाव संपादक अपन रुचि वा विदेह टीमक रुचि केर हिसाबें करता।
3) एहिमे ओहने लेखक वा कलाकार केर चयन संभव हएत जिनकर उपलब्ध हरेक पोथीक PDF रूपमे विदेहक माध्यमसँ सार्वजनिक भेल छनि। कलाकार लेल यूट्यूब एवं आन साइट सेहो मान्य हेतै।
4) एहि परियोजनाक लेल चयनित लेखक वा कलाकारपर काज संपादक केर समय केर अनुसारे हेतै। तँइ एकर समय सीमा कहब संभव नहि।
नित नवल सिरीजमे एखन धरि प्रकाशित पोथीक सूची एना अछि (पहिनेक विशेषांक सभमे ई क्रम नहि छल, एहिठाम संशोधित आ पूर्ण सूची अछि)-