१.१६.मुरारी कुमार झा-सरलताक आवरण मे निहित विद्याक विराट रूप
मुरारी कुमार झा
(शोधार्थी, प्रा.भा.इ. पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग, ल.ना.मि.वि., दरभंगा। संपर्क-7562952095)
सरलताक आवरण मे निहित विद्याक विराट रूप
10 दिसम्बर 2015 केर भिनसरे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालयक प्राचीन भारतीय इतिहास पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग सँ तत्कालीन शिक्षक डॉक्टर अयोध्यानाथ झा सरक फोन आयल जे आइ कने सबेरे विभाग अबिहऽ। हम कहलियैन ठीक छै सर! तद्नुसार, हम दस बजे विभाग पहुँच कऽ जल्दी बजायल जयबाक प्रयोजन बुझबाक प्रयास कयल तऽ पता चलल; जे मोती महल स्तंभ लेख केर पढ़बाक लेल पटना सँ एक विद्वान आबि रहल छथि। मोती महल स्तंभलेख 2 दिसम्बर 2015 केर विभागक परिसरे सँ हम सभ माँटि खूनि कऽ निकालने रही, जाहिपर पाँच पाँतिक मिथिलाक्षर लिपि आ संस्कृत भाषामे लेख उत्कीर्ण कएल गेल छल। विद्वानक अबैया बुझि अन्तरमन सँ विद्वानक एकटा दृश्य सोझाँ आयल जाहिमे ओ कोट-पेंट, करिया जुत्ता, छोटका बैग संग बड़का गाड़ी (कार) मे बैसि कऽ औताह। ई सब चलिये रहल छल कि सरक फोन बजलैन, फोन उठा सर बजलाह; कोन ठाम छी? श्रीमान! फेर कहलाह आबि गेलहुँ! हम तुरत अपन विद्यार्थीकेँ पठा रहल छी। फोन काटैत सर कहलाह, दौगि कऽ जा श्रीमानकेँ लऽ अबहुन। हम पूछलियैन हम कोना चिन्हबैनि, के छथि, नाम की छियैन? स्नातकोत्तर सँ पूर्व तऽ कहियो अकादमिक संसार देखने नहि रही। नाना कहैथ जे, जँ कियो आबैथ तऽ कम सँ कम हुनक नाम आ गाम अवश्य पूछि लेल जयबाक चाही। सर कहलाह पहिने कार्यालय सँ बहरेबहक तखने ने देखेथुन्ह! हम बाहर भऽ देखल, तऽ कोनो गाड़ी नहि आबि रहल छल; बाट जोहैत रही कि एक गोटे कुर्ता-धोती पहिरने हमरा सोझाँ आबि पुछलाह प्राचीन इतिहास विभाग यैह अछि की? हम कहलियनि हँ! हमरा सँ एतबा सुनि ओ कार्यालय दिस चलि गेलाह। हम हुनका दिस ओतेक ध्यान नहि देलियनि। किएक हम तऽ ओहि विद्वानक प्रतिक्षामे वकोध्यान लगा ठाढ़ रही, जे स्तंभलेख केर अवलोकनार्थ आबि रहल छलथि। हमरा प्रतीक्षा करैत करीब पन्द्रह मिनट भऽ गेल, डॉ. अयोध्यानाथ झा सर आ विभागाध्यक्ष डॉ. मदन मोहन मिश्र सर ओहि व्यक्तिक संग बाहर अयलाह; जे हमरा सँ विभागक परिचय पूछैत भीतर गेल रहथि। तीनू गोटे बाहरे मे ओसारा पर राखल स्तंभलेख दिस बढ़लाह। दुनू सर कहलखिन, श्रीमान् यैह अछि अभिलेख! आब नीक जकाँ अवलोकन कएल जाउ। एतबे सुनलहुँ कि मोन उद्वेलित भऽ उठल, जे ओ हमर काल्पनिक भयावह सन परिदृश्य नहि छनि आ हिनक प्रशस्ति मे सरक मुँहे आरो बहुत रास गप्प सुनने रही; खैर! ओहन सन दृश्य हमर कल्पनाशक्ति सँ कोना नहि बहरायत! किएकि ओहि सँ पहिने हमर कोनो तरहक अकादमिक पृष्ठभूमि नहि रहल छल आ सिनेमाक प्रभाव सँ ओहन सन मनोदशाक सृजन भेल। ई विद्वान रहथि महावीर मंदिर, पटनाक प्रकाशन एवं शोध पदाधिकारी परम आदरणीय पंडित भवनाथ झा।
पं भवनाथ झाजीकेँ मोती महल अभिलेखक छवि व्हाट्सएप सँ दू दिसम्बर केर साँझ मे पठाओल गेल छलनि। मुदा ओहि काल माटि सँ निकालि कऽ धोनहे रही, तैँ छवि लेबा काल अभिलेख भीजल छल; जाहि कारणेँ मात्र सं. 1398 आ श्री सङ्केश्वर नामटा फरछियाओल रहनि। आब एहि दिन लग मे बैस कऽ पढ़ि-पढ़ि कागत पर लिखैत गेलाह। ओकर उपरान्त विभागक कार्यालय मे बैसि कऽ सभटा रिपोर्ट बनौलाह आ फेर दुपहरिया मे प्रस्थान कऽ गेलाह। ओही रिपोर्टक अनुसारेँ अभिलेखक लिपि मिथिलाक्षर आ भाषा संस्कृत अछि, जकर सम्प्रति आदरणीय पंडित झा विशेषज्ञे छथि। आ ओहि अभिलेखक विवरण देखू-
प्रकार- स्तम्भलेख
लिपि- तिरहुता (मिथिलाक्षर)
भाषा- संस्कृत
आकार- 23×26 सेमी., 5 पाँति
काल- 1341 ई.
1. ॐ (मंगल चिन्ह) सं. 1398 वैशा
2. ष (ख) वदि 5 बुधे ।
3. सप्रक्रिय महाट्ट (ट्टे) श्व
4. र श्रीसङ्केश्वर
5. कस्य धवल गृह्यं (।)
एहि तरहेँ हमरा हिनका सँ पहिल भेँट छल। एहि भेंटक उपरान्त एखन धरि कतेको शैक्षिक मंच, पुरास्थलक अन्वेषण, मिथिलाक्षर कार्यशाला मे गुरु-शिष्यक रूपेँ, भू. ना. मं. विश्वविद्यालय, मधेपुरा मे पाण्डुलिपिक संरक्षण एवं संवर्धनक उद्देश्य सँ आयोजित तीस दिवसक प्रशिक्षण कार्यशालामे प्रशिक्षकक रूपेँ (हमर दुनू गोटेक दिन फराक छल) आदि कतेको ठाम हिनका सङ्गे रहलहुँ अछि। हिनक ज्ञान भण्डार अथाह अछि, जकर विस्तार सँ जनतब करायब हमरा सन नवीन अकादमिक आ अतिसाधारण व्यक्तिक लेल दुरूह काज अछि। सम्प्रति पण्डित झा मिथिलाक्षर, प्राचीन देवनागरी, बांग्ला आ असमिञा लिपिक विद्वान छथि। आइ धरि हिनका द्वारा मिथिला सँ भेटल कतेको रास अभिलेखक पाठ फरछियाओल गेल अछि सङ्गहि हिनका लग शोध आ प्रकाशनक सेहो विशाल भण्डार छनि, जाहिमे सैकड़ो आलेख, शोधालेख, प्राचीन ग्रन्थ सभक अध्ययन, सम्पादन आ प्रकाशन, पुरास्थल आ मंदिरक अन्वेषण, पुस्तक लेखन, पुस्तक सम्पादन, धर्मायण पत्रिका सम्पादन आदि अछि। जाहि महावीर मंदिर पटनाक प्रकाशन एवं शोध पदाधिकारी छथि ओहि ठाम सँ धर्म, दर्शन, इतिहास, संस्कृति आदि पर आधारित शोध ग्रन्थ, पोथी, पत्रिका, पुस्तिका आदि प्रकाशित होइत अछि, एहिक परिणाम स्वरूप महावीर मंदिर मात्र आस्थाक केन्द्र नहि, अपितु शोध आ संस्कृतिक जीवन्त केन्द्र बनि गेल अछि।
हमरा जतेक अनुभव भेल एखन धरि ताहिमे आदरणीय पण्डित भवनाथ झा सरलताक आवरण मे निहित विद्याक विराट रूप छथि।c
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।