विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

परमात्मा के वास कतए? : एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण

ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा · 2025-11-01 · अंक 429

१.११.ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा- परमात्मा के वास कतए ? : एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण
ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा
परमात्मा के वास कतए ? : एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण

परमेश्वरक स्वरुप
हमर सनातन आ किछु अन्य धर्म व आस्था परमात्मा में पूर्ण विश्वास करैत अछि। उपनिषद के निम्नांकित वैदिक मन्त्र विष्णु सहस्त्रनामक भाग अछि, जाहि सँ भगवान् विष्णुक किछु अवस्थाक काल्पनिक वर्णन भेटैत अछि। याद रहए, भगवान् विष्णु सृ्स्टि केर पालनहार छथि आ शेषनागक सिया पर रत रहितहुँ सृ्स्टि के अनवरत सञ्चालन ओ जीवमात्र के पालन करैत छथि।
मिथिला आ मैथिल केँ परमेश्वर पर परम विश्वास आ सनातन धर्म के सभु देवी देवता पर प्रगाढ़ आस्था सेहो अछि I प्रायः सभु धर्म ओ आस्था मानैत अछि जे पूरा ब्रह्माण्ड के संचालन परमात्मा के कृपा सँ होइत अछि। सनातन धर्मानुसार भगवान् विष्णु, बौद्ध धर्मक 'ब्रह्म', सिख समुदाय के 'गुरु' द्वारा देखाओल 'परब्रह्म' आ जैनक २४ तीर्थांकर द्वारा देखाओल 'मोक्ष' के मार्ग आदि सैद्धांतिक रूप सँ समान अवधारणा छथि जे कमोवेश आर्यावर्त के आध्ययात्मिक स्वरुप सँ सम्बंधित अछि । विश्व में अन्यान्य धर्म ओ आस्था के प्रादुर्भाव अलग-अलग काल खंड में भेलन्हि जे सामने के बॉक्स में देखाएल गेल अछि I
दोसर दिस अन्य विचारधारा में पारसी के 'अहुरा मज्दा' किछु सनातन सँ मिलैत-जुलैत अछि मुदा ओ लोकनि भगवान् इन्द्र व देव केँ नकारात्मक भूमिका में देखैत छथि। ओहिनें अब्राहमिक आस्था में इसाई के एकहि सर्वशक्तिमान 'God' छै जाहि पर अन्य आस्था सँ मत-विवाद वा मतान्तर नहि अछि, मुदा यहूदी 'यावे' (YHWH) केँ एकमात्र अविभाज्य शक्ति मानैत छथि। ओ सभु धर्म-आस्था परमेश्वर के अन्यान्य रूप-प्रारूप सँ विरोध या घृणा नहि करैत छथि। अब्राहमिक आस्थामें एकमात्र इस्लाम एक एहन अछि जे कोनो अन्य धर्म या आस्था के अनुयायी केँ अपन अल्लाह के दुश्मन मानैत अछि आ ताहि लेल धर्मांतरण करै या ह्त्या के विचार व्यक्त करैत अछि। एहि लेल इस्लाम विश्वभर में मानवाधिकार हनन करए के दोषी छथि ( पढ़ें �Gross Fundamental Rights Violations in Many Verses of Quran�, https://thecounterviews.in/articles/gross-fundamental-rights-violations-in-many-verses-of-quran/) I त्रेता युग में जे सुरासुर (देवासुर) संग्राम भेल रहए जेकर वर्णन गांधार राजकुमारी व माता केकई केनें छली, अनुमानतः ओहि भौगोलिक खंड में पड़ैत छैक हालाँकि पारसी-इस्लाम रूपी आसुरी आस्था ओहि काल खंड में नहिं छलैक किन्तु अमानविक राक्षसी वृत्ति वाला मानव अवश्य आसुरी शक्ति के साथ होतैक I खैर, ई सब हमर लेख के विषय-वस्तु नहि थीक I मुदा ई निश्चित अछि जे आसुरी आस्था ओ भूखंड में तत्कालीन सेहो छलन्हिं जे आजु एशिया के मध्यपूर्व देश में देखल जा रहल अछि I
अनेकों विचारधारा मानैत छै जे ब्रह्माण्ड के कण-कण में परमात्माक कृपा, शक्ति व वास निहित छै। स्वयं परमात्माक आकार कहें अछि, कियो नहि जानैत। अनेकों ग्रंथ में ब्रह्म केँ निराकार आ ओंकार मानल गेल अछि I अनेकों ऋषि-मुनि के अवधारणा अछि जे परमपिता परमेश्वर सामान्य मानवक संकुचित आध्यात्मिक ज्ञान सँ लाखौं गुना अधिक तेज वाला अनेकों मस्तिष्क समकक्ष, अनेकों आँखि, कान आ हाथ वाला अनंत शक्ति सन्निहित सर्व-विद्यमान छथि I साकार ब्रह्मक अपन अपन समय में अनेकानेक मानव अलग अलग कल्पना केलथि, जेकरा अलग-अलग चित्रकार अलग-अलग रूप देलन्हि । तदनुसार परब्रह्म अनेक मस्तिष्क, अनेक आँखि- कान सँ असंख्य जीवक पीड़ा आ अनुभूति देखैत-सुनैत छथि आ अनेकों हाथ-प्रयास सँ ओकर दुःख निवारण करैत छथि। ब्रह्माण्ड में सभु जीव में ओहि परमेश्वर आत्मा रूप में विद्यमान छथि आ मरणोपरांत ओहि में लीन भ जाइछ I असंख्यों जीवात्मा केँ परमात्मा में लीन होवए के प्रक्रिया किछु क्लिष्ट बुझल जाइछ जाहि में मोक्ष, स्वर्ग, नर्क वा प्रेत योनि आदि सम्मिलित अछि I एकर चर्चा अन्यत्र कएल गेल अछि I
ब्रह्मवेत्ता ओ ज्ञानी जे समग्र ब्रह्मक निराकार आ अनंत रूप बुझैत छथि, ओ सभ ई जानैत छथि जे प्रत्येक देवी-देवता ओहि एक परमब्रह्म के अनेकों कला के अलग-अलग कार्यरूप / स्वरुप छथि। तखनहि साकार रूप में देखए, अनुभूति कराए वा ताहि संग समन्वय करै लें लोकनि ओ परब्रह्म के तीन स्वरुप देखे छथि I ब्रह्माण्डक सृष्टिकर्ता भगवान् 'ब्रह्मा' जे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में अनेकों आकाशगंगा, सौर्यमंडल तथा ग्रह आदि में संतुलन बनाओल राखै छथिन I दोसर छथिन भगवान् शंकर जे जीवात्माक सृजक-विनाशक मानल जाएत छन्हि I तेसर छथिन भगवान् विष्णु जे सभु जीवात्माक पालन-पोषण करनिहार मानल जाएत छथिन। ई सब, या तँ अमूर्त रूप में निराकार परब्रह्म मानल जा सकैछ अन्यथा ब्रह्मस्वरूप अन्यान्य रूप में ; जेना ब्रह्मा, विष्णु, महेश, माँ लक्ष्मी, सरस्वती, गायत्री, सावित्री देवी आदिक मातृ वा स्त्री-शक्ति वा स्वरूप में अनुभव करैत छथि, वा अग्नि, वरुण, इन्द्र आदि देवताक पुरुष रूप में। मूर्त रूप में अनेक देवी-देवता मूलतः एकहि परमात्माक अन्यान्य विशिष्ट कलापूर्ण अलग-अलग स्वरुप छथि। मुदा जखन समय-समय पर परमात्मा के जैविक अवतार होइत छै, त हम सभ हुनक दशावतार सँ भिज्ञ छी जे विभिन्न कालखण्ड में भिन्न-भिन्न निमित्त लेल भिन्न-भिन्न आकार-प्रकार में प्रकट भेल छल ।
अज्ञानी सनातन धर्म में देवी- देवता के अनगिनत संख्यां के गिनती करै लागै छथि जे लाखों या करोड़ों में छै, मुदा आध्यात्म-ज्ञानी जानैत छैथ कि ओ सभु देवी देवता एकै परमात्मा के अलग-अलग कार्य-स्वरूप छैथ। ओ सभु देवी देवता में परब्रह्म के अनेकों कला में सँ मात्र किछु समाहित होइत छै। हँ ! एक प्रश्न बारम्बार उठल छै कि की पुरुषत्त्व के क्षमता राखै वाला आ स्त्रीत्व के संवेदन सन्निहित कला एकै परमात्मा के छै या ओहि परमात्मा के दू समान दिखे वाला किन्तु असमान गुणात्मक भाग छैथ, जकरा महादेव अर्धनारीश्वर के रूप में प्रकट कैल रहतिन्ह । लेखक के ई मत अछि जे जीवात्मा में पुरुषत्व भगवान् विष्णु के तथा अति संवेदनशील स्त्रीत्व देवी लक्ष्मी के सूक्ष्म अंश भ सकैछ I
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान् कृष्ण अर्जुन केँ अपन अनंत व विराट स्वरूप के एक झाँकी देखौने छलन्हि । अधिकांश धर्म आ आस्था मानैत छथि जे हर जीव में एक आत्मा वास करैत छै, जे ओहि परमात्मा के अतिसूक्ष्म अंश छै। कोनहुँ जीव में ओ आत्मा के जतेक अंश समाहित होइत छै, हुनका में ओहि तरहक दैविक/आध्यात्मिक गुण या प्रभाव हेतैक । कोनों जीव में परमात्मा के जे कला के जतैक अंश होइत ओहि जीव या प्राणी में ओहि तरह के गुण-प्रभाव होतैक जाहि में ओ प्राणी के निकट वातावरण के सेहो प्रभाव पड़ैत छैक । परमात्मा में निहित ६४ कला में सँ प्रत्येक कला अपने-आप में पूर्ण होएत छै। ताहि कला के अंश मात्र सँ जीव में अन्तर्निहित केवल ओहि आध्यात्मिक गुण के प्रादुर्भाव होए छैक जे परमात्मा के ओहि कला में निहित अछि I जीव में सन्निहित आंशिक कला सामान्यतः सम्पूर्ण नहिं होइत छै। ओहि ६४ कला में सँ कोन कला के कतेक अंश कौन जीव के भेटल छै, ओहि से ई तय होइत छै कि अमुक जीव के आध्यात्मिक गुण के स्तर कतबा होएत।
कोनों प्राणी के आध्यात्मिक गुण में करुणा, धैर्य, क्षमा, न्याय, निष्पक्षता, वैराग्य, आध्यात्मिक शक्ति, अजेयता, उदारता, सौंदर्य, नृत्य, गायन, ईमानदारी, सच्चाई आदि के अंश मात्र सँ ल केँ परम निपुणता तक भ सकैछ जे कोनों प्राणी केँ तत्स्वरूप देवता बना देत छै जेना गुरुदेव, मातृदेव, पितृदेव
परमात्मा के अवतार
सनातन धर्म में मान्यता छै कि परमात्मा के ६४ कला छैथ, जकर अतिसूक्ष्म अंश सँ ब्रह्माण्ड के सभ जीव जीवंत बनाैत छै। याहि कला निर्धारित करैत छै कि किछु जीव या प्राणी में कौन कौन दैविक/आध्यात्मिक गुण होयत। परमात्मा के एहि अंश पर ई निर्भर छै कि किनका में कतेक शक्ति वा क्षमता होयत। भगवान् कृष्ण में १६ कला मौजूद छलथि जबकि भगवान् राम में १२। ई दुनू अवतार युग-दृष्टा छलाह आ क्रमशः त्रेता आ द्वापर के समापन संकेत करैथ। ओहना तँ भगवान् परशुराम सेहो त्रेता में ही अवतार लेने छलाह । भगवान् विष्णु अपन मतस्यावतार, कूर्म आ वराह अवतार में एक ही कला सँ सम्पन्न मानल जाइत छलाह । तावहिं नृसिंह आ वामन अवतार में दुई कला सँ सम्पन्न छलाह । परशुराम अवतार तीन कला सँ संपन्न मानल गेल छै।
भगवान् बुद्ध के कलियुग के पूर्वार्ध में जन्म भेल छल आ हुनका में एहन अद्भुत आत्मा के वास छल कि महल से बाहर निकलि क' तत्कालीन एक एहसन सामाजिक व्यवस्था बनौलथि, जाहि में अहिंसा के प्राथमिकता देबाक आ सरलता सँ जीवन बितेबाक नया मार्ग प्रशस्त भेल । भगवान् बुद्ध द्वारा प्रशस्त 'बौद्ध धर्म' के में विश्व में बहुत प्रचार भेल। हुनका में कतेक कला छलन्हिं, एहि सम्बन्ध में कोनों वर्णन नहिं भेटल, मुदा ग्रंथ में ई अवश्य कहल गेल अछि कि भगवान् विष्णु के दस अवतार में सँ ओ एक छलाह। हुनका द्वारा देल गेल आध्यात्मिक ज्ञान चहुँ दिशा में विभिन्न शैली के जीवन यापन करबाक प्रेरणा उत्पन्न केलक, ओ स्वयं में दैविक चमत्कार जेकाँ अछि। भविष्य में होवए वाला कल्कि अवतार कतेक कला युक्त की रूप में हतैक कियो नहिं जानैत किन्तु ई बात जरूर अछि जे हुनका समक्ष चुनौतीपूर्ण बहुतों कार्य हेतेय किये कि आसुरी शक्ति चरम पर होतैक I
परमात्मा के ६४ कला की अछि ?
अक्सर लोकनि आध्यात्मिक कला आ जैविक कला में अंतर करय लें बिसर जाइ छैथ। संगीत, साहित्य, नृत्य, जीवन-मूल्य, भौतिक ज्ञान, वास्तु रचना, दैनिक कर्म केर विभिन्न विधि आदि-आदि सांसारिक आ जैविक कला छैथ। ओहि ठाम परम व सर्वोत्तम कला के कल्पना एक या अधिक दैविक कला में कएल जा सकैत अछि। उदाहरणक लेल प्रत्येक देवी-देवता एक या अधिक दैविक कला में पूर्णता केर प्रतीक छथि जेना माता सरस्वती शिक्षण-ग्रहण केर परम कला केर स्वरूप अछि। एहि तरहें माता लक्ष्मी धन-संपत्ति में, भगवान विश्वकर्मा भौतिक सृजन में, भगवान इंद्र (या देवेंद्र) अन्यान्य शक्ति में समन्वय राखय वाला व जीवात्मा केँ उपकार केर पराकाष्ठा छथि। संगहि ईओ नहि बिसरय चाही जे ई सभ देवी-देवता सर्वगुणसम्पन्न परमात्मा केर एक या अधिक कलाक द्योतक छथि।
चमत्कारी-जन व थोपल आस्था
युग-युगांतर सँ अलग-अलग कालखण्ड में परमात्मा अलग-अलग कला सँ परिपूर्ण अवतार लेलनि अछि, संगहि परमात्मा किछु लोकनि केँ आत्माक एक एहन अंश प्रदान कएलक जाहि सँ ओ महामानव वा अलग-अलग चमत्कार सँ सुसज्जित चमत्कारी प्राणी बनि गेलन्हिं । एहि तरह एक महामानव भगवान महावीर छलाह, जे जैन धर्मक नीव राखलन्हि ओ अहिंसाक द्योतक भेलन्हि जकर अनुयायी के संख्या बहुत अछि। सनातन धर्म में तऽ अनेकों त्रिकालदर्शी आ चमत्कारी व्यक्ति भेलन्हि । ई अति उल्लेखनीय अछि जे सनातन धर्म में ही �विश्वेदेवाः��विश्वक सभ देवी-देवता के मान-मर्यादाक प्रथा रहल छैथ, आ एहि कारणे कई जनजाति जे असुरी शक्तिकें सेहो मानैत आ पूजैत छैथ, ताहि पर अपन विश्वास राखै छैथ। भारतभूमि पर अनेक कला सँ विभूषित अनेक चमत्कारी विभूति जन्म लेलन्हि, जे अपने केँ स्वयं भगवान नहि बल्कि हुनक भक्त कहलेलन्हि जिनका पर भगवतक कृपा भेल।
एहि तरहेँ, १६म शताब्दी में मुस्लिम-उत्पीड़नक कालखण्ड में सनातन धर्म बहुत प्रताड़ित भेल छल, जखन सामान्य लोक अपन धर्म सँ उदासीन होए लगलाह। अंधविश्वास, रीति-रिवाज, परम्परा सँ निम्न वर्गक लोक विचलित भए रहल छल, तखने खत्री कुलक नानकदेव जी में, जे एकटा मुस्लिम गवर्नरक भंडारी छलाह, दैविक अनुकम्पा आयल आ हुनक कविता माध्यम सँ निर्गुण भक्ति शुरू भेल, जेमे गुरुकें सबसे पहिले राखल गेल। छठा गुरु एक नवीन �सिख पंथ� केर स्थापना कएलक, जाहिमे सिख के सभु गुरु द्वारा रचित भजनक संकलन करि एक पुस्तक बनाओल गेल, जकर नाम �गुरु ग्रन्थ साहिब� राखलन्हि । एहि मे भगवान राम, माता सीता, हरि, गोविन्द गोपाल, ब्रह्मा विष्णु महेश आदि सभक वंदन अछि। मुदा ब्रह्म तक पहुँचबाक माध्यम गुरु केँ मानल गेल।
अब्राहमिक आस्था में पश्चिमी देश में एक चमत्कारी व्यक्ति �जीसस� केर जन्म भेल, जाहि के स्पर्श मात्र सं कई रोगी आ पीड़ित ठीक भऽ जायत छलन्हि । जीसस में अवश्यहि किछु दैविक / आध्यात्मिक शक्ति हेतन्हि । ओ अपन अनुयायी केँ संदेश देलखिन कि ई संसारके चलानिहार एकटा सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा अछि, जकरा अनुसार सब कुछ चलैत अछि। ई बात सही अछि जे बाद के शताब्दि में ओकर अनुयायी हुनहिं केँ भगवान माने लगल जे ईसाई पंथ के आरम्भ केलन्हि ।
जीसस के जन्म के लगभाग छः सत्रक बाद, अरब के बर्बर सभ्यता वाला भूमि पर एक व्यक्ति अपने के पैगम्बर घोषित कएलक, जे अधिकांशतः तलवारिक नोक पर दर्जनों संघर्षरत अरब जनजाति के नरसंहार कएलक या अपन बनाओल इस्लाम प्रथा केँ अनुकरण करबाक लेल लाखों व्यक्ति केँ बलपूर्वक धर्मांतरण कएलक बाध्य कएलक । अपन द्वारा बनाओल इस्लाम के अलावा कोनों अन्य धर्म-आस्था के माननिहार लोकन्हि केँ ओ वा तऽ अपन धर्म बदलबाक लेल मजबूर करैत या मारि देत। ई असुरी प्रथा तत्कालीन कमज़ोर व्यक्ति, समाज व देश पर बहुत भारी पड़ल ।
परमात्मा के वास कहाँ छैक?
परमेश्वर के वास कतए छन्हि ? स्वर्ग में या कतए आओर ? स्वर्ग या नर्क केहन व कतए अछि कियो नहि जानैत अछि ( पढ़ें "स्वर्ग केहेन, नर्क केहेन?", page 37-42; विदेह ४१२ म अंक १५ फरबरी २०२५, https://mail.google.com/mail/u/0/#inbox/FMfcgzQZTVqKqQXLLlJbDfClBgsDGKDs?projector=1&messagePartId=0.2) I ई मानल जाइत रहल अछि जे स्वर्ग धरती के उत्तर दिस आ नर्क दक्षिण दिस मे अछि, मुदा सैकड़ों वर्ष में विज्ञान आ वैज्ञानिक सभ केँ ओकर कोनों प्रमाण नहि भेटल अछि; न ही हिमालय पर, न ही अंतरिक्ष में। आकाश आ अंतरिक्ष में धरती सँ ६०० किलोमीटर ऊपर, पोलर ऑर्बिट में रोज सैंकड़ों वैज्ञानिक उपग्रह अनगिनत चक्कर लगा रहल अछि मुदा कोनो दैवीय उपस्थिति के संकेत नहि भेटल अछि, आ न ही कोनो असीम ऊर्जा स्रोत रूपी परमात्मा केर। सूर्य केर परिक्रमा करैत पृथ्वी केर लगभग वृत्ताकार पथ के सेहो अनेक स्कैन कएल गेल अछि मुदा आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग या नर्क, कोनो संकेत नहि मिलल अछि।
दूर अंतरिक्ष में देखए वाला रेडार, जे एक छोटका पाथर सेहो देख लैत अछि, लाखों किलोमीटर दूर तक कोनो अलौकिक ऊर्जा या परमात्मा के कोनो पता नहि लगाओल सकलाह। अंतरिक्ष में स्थापित नासा केर 'हबल' आ यूरोप के 'जेम्स' टेलिस्कोप तँ अरबों किलोमीटर दूर अन्तरिक्ष में देख सकैत अछि, मुदा परमात्मा या तादृश कोनो ऊर्जा स्रोत केँ नहि देख सकल अछि। जहिना गीता में वर्णित अछि, संभव अछि कि परमात्मा के कोनो आँखि या भौतिक यंत्र नहि देख सकैत। तँ एकर पता कोना लागत जे भगवान के वास कहाँ होइत छैक? भगवान शंकर केर वास कैलाश पर्वत पर मानल जाइत रहल अछि, मुदा एखन तक एकर कोनो सबूत नहि मिलल अछि। हँ! ओतए गेल लोकनि अपन अपन अलग अनुभूति के वर्णन अवश्य कएलक, जे अत्यधिक उँचाई पर हवा में ऑक्सीजन कम होवै से सेहो महसूस कएल जा सकैत।
किछु ग्रंथ में परमात्मा के निवास �क्षीर सागर में बताओल गेल अछि जाहि में सहस्र फन वला शेषनाग पर आसित भगवान् विष्णु के मानल गेल अछि, मुदा ओ क्षीर सागर कतए छै? कम सँ कम धरती या एकर आस-पास मंगल या शुक्र ग्रह पर त नहि अछि। यदि हम भगवान् के निराकार स्वरूप के बारे में बात करी तs उ कोनो एहेन ऊर्जा-श्रोत जेकाँ भ सकैत अछि जे आधुनिक वैज्ञानिक यंत्र, उपकरण या सेंसर के पकड़ में नहि आबि रहल हो I याद रहए कि भगवान् कृष्ण स्वयं गीता में कहलन्हिं रहए जे हुनकर विराट रूप के दर्शन करए लें अर्जुन केँ दिव्य दृष्टि चाही I तँ की ? एकर मतलब ई भेल जे जीवात्मा के चक्षु जे विद्युत्-चुंबकीय प्रकाश किरण केँ देखि सकैत अछि, ताहि सँ अलग कोनों एहन किरण अछि जेकरा दिव्य दृष्टि कहल जाइछ ? मुदा वैज्ञानिक वा आध्यात्मिक खोज के अभाव में ई अवधारणा मात्र छी, साक्ष्य नहिं । आज जखन अंतरिक्ष में जाए केँ प्रयोग आ खोज करब संभव भेल अछि, तs भारतीय / आध्यात्मिक पद्धति आखिर एहन कोनो रिसर्च कियैक नहिं क रहल अछि जे आवै वाला समय में एक एहन 'ॐकार� रूपी नव प्रकाश, विकिरण या किरण के खोज कए सके जे आत्मा, परमात्मा वा अन्य अलौकिक पदार्थ के द्योतक वा परिचायक होवै ? ताहि प्रकाश, विकिरण या किरण के की रूप-प्रारूप हेतै ओकर कल्पना करव सम्प्रति संभव नहिं छैक मुदा वैज्ञानिक / आध्यात्मिक अनुसंधान व खोज के अनवरत प्रयास अत्यावश्यक अछि I एहेन परिष्कृत आध्यात्मिक अनुसंधान करबाक लेल अनेकों ओ तरह के नया उपकरण के आविष्कार करबाक चाही जाहि में �दिव्य दृष्टि� के गोपनीय सूत्र के पता लगाओल जा सकए I
एकटा आओर सूत्र के सहारा लेल जा सकैत अछि। हर वर्ष आश्विन मास (सितंबर) के आस-पास सनातनी मान्यता अछि कि 'पितृपक्ष' में सभु पूर्वज के आत्मा पृथ्वी के अत्यंत निकट होइत अछि जेकरा दक्षिण दिशा में जल क अर्घ्य देल जाइत अछि। तऽ की ओहि दिन पृथ्वी अंतरिक्ष के कोनो एहेन भाग से जा रहल छै जतए बिछुड़ल आत्मा के संग्रह या परमात्मा सँ नजदीकी होवए ? ध्यान में इहो राखू जे सनातन धर्म के बहुतों पावनि-त्यौहार एहि कालखंड में होइत अछि, जइसन गणपति पूजा, रक्षा बंधन, अनंत चतुर्दशी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, जिमूतवाहन पूजा, दुर्गा पूजा, लक्ष्मी पूजा, दीपावली आदि आदि।
सारांश
लगभग सभ धर्म आ आस्था ई मानैत अछि जे हर जीव में आत्मा के निवास अछि आ हर आत्मा परमात्मा द्वारा संचालित अछि आओर मृत्यु पश्चात ओहि में समाहित होए छैक । मुदा ई कियो नहि जानैत अछि जे आत्मा-परमात्मा कतय, कौन रूप में आसीन छथि । क्षीर सागर कतए अछि जाहि में ६४ कला पूर्ण ओ परमात्मा वास करैत छन्हि, जताए सँ हुनकर अनंत लीला के अनुभूति मात्र हम सभु जीव कए रहल छी। गीता में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा कहल गेल अछि जे हजारों सूर्य समान हुनकर आकृति व स्वरुप केँ मानव के आँखि नहि वल्कि केवल �दिव्य दृष्टि� सँ देखल जा सकैछ I तँ की कोनो एहेन वैज्ञानिक यंत्र नहि बनाओल जा सकैत अछि जे आत्मा-परमात्मा या 'ॐकार� रूपी ताहि असीम ऊर्जावान प्रकाश किरण के होएबाक प्रमाण दे सकए ? हम तुच्छ मानव वा वैज्ञानिक लोकन्हि केँ एहि तरह के बहुतों आध्यात्मिक प्रश्न अछि मुदा उत्तर बहुत कम।
-ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा; सेवा निवृत्त वायुसेना अधिकारी; मुख्य, वायुसेना चिकित्सा अनुसन्धान प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष ओ स्नातकोत्तर परीक्षक (RUGHS वरिष्ठ वैज्ञानिक �F� व सह निदेशक (डी आर डी ओ)
सदस्य, Institute of Defence Scientists & Tech (IDST)

(लेखक एक साधारण वैज्ञानिक छथि जेकरा सनातन के अथाह आध्यत्म के सूक्ष्म-मात्र ज्ञान अछि I अपितु ई लेख में वैज्ञानिक दृष्टिकोण सँ परमपिता परमात्मा के समीक्षा करए के प्रयत्न कए रहल छी जे शायद तर्कसंगत नहिं अछि )
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
पद्य

Suggested citation: ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा. “परमात्मा के वास कतए? : एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 429, 2025-11-01. https://www.videha.co.in/research/2025/429/परमात्मा-के-वास-कतए-एक-वैज्ञानिक-दृष्टिकोण.htm

मूल विदेह अंक / Original issue