विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-08

हितनाथ झा · 2025-11-01 · अंक 429 · पृष्ठ 8–16

(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-08
समस्यापूर्ति
'प्रभात' बहुभाषिक पत्रिका छल। एहि पत्रिकामे मैथिली, संस्कृत, हिन्दी आ अंग्रेजीक रचना सेहो छपैत छल। देवनागरी प्रमुख लिपि छल, मुदा किछु रचना मिथिलाक्षरमे सेहो अछि। तत्कालीन समयमे अधिकांश पत्र-पत्रिका बहुभाषिके होइत छल। मुदा एहि पत्रिकाक विशेषता छल जे निबन्ध, कथा, कविताक अतिरिक्त समाचार, आन्दोलनक गतिविधि, सनातन आ स्वदेशीकरणपर जोड़, समस्यापूर्ति, चुटुक्का, प्रश्नोत्तर, पाठकक पत्र आ ओहि पत्रमे छपल रचनाक आलोचना पक्षकेँ सेहो स्थान देल जाइत छल। नीक आ उपयोगी रचना आबय एहि लेल एक लेखककेँ जनिक वर्ष भरिमे सर्वोत्कृष्ट रचना हेतनि, हुनका पदक प्रदान कयल जयतनि। रचना प्रकाशनक पारदर्शिताक अद्भुत उदाहरण अछि। जाहि रचनाकारकेँ ई होनि जे हमर रचना जानि-बूझि क' नहि छापल गेल अछि ओ लिखित शिकायत करथु युवक संघक सचिवकेँ। ओ रचना युवक संघक सभामे राखल जायत, विचार-विमर्श होयत, तखन जे निर्णय कयल जायत, ओकर पालन सम्पादक करताह।
प्रसिद्ध आलोचक मोहन भारद्वाजक एहि विशिष्टताक विषयमे कहब छनि -
"ओहि समयक पत्रिकाक भाषिक चरित्र एहने होइत छलैक।मैथिल हित साधन, मिथिला मोद, मिथिला-मिहिर, मैथिल-प्रभा, मैथिली-प्रभाकर, ई सभ पत्रिका बहुभाषिक छल। केवल श्री मैथिली तथा मिथिलामे मैथिलीक रचना रहैत छल। प्रभात एहि दुनू पत्रिकाक अनुगमन नहि कयलक। ओना, अधिकाधिक रचना मैथिलीमे हो से इच्छा आ आग्रह सम्पादकीयमे कतोक बेर कयल गेल अछि। मुदा युवक लोकनिक उत्साह भाषिक बन्धनकेँ मानबाक लेल प्रायः तैआर नहि छल। तेँ भाषिक शुद्धि आ प्रांजलता तथा विषयक परिपक्वतापर ध्यान देलनि, मुदा अवान्तर भाषाक चयनपर नहि।�
(सन्दर्भ: एकलपाठ-मोहन भारद्वाज)
नव रचनाकारकेँ प्रोत्साहनक हेतु प्रत्येक अंकमे समस्यापूर्ति तीन भाषामे देल जाइत छल- देवभाषा, मैथिली आ हिन्दी। ओहि समय समस्यापूर्तिक प्रचलन छल, शास्त्रार्थ जकाँ । कविचूड़ामणि मधुपजी प्रेरणापुंजमे समस्यापूर्तिपर एक प्रसंग लिखनहुँ छथि, जखन मधुपजी एक तात्कालिक घटनाक बाद दू पाँती रचि तुरत सुना देलथिन, ओ कविता सूनि तारानाथबाबू बाजल छलाह -�हमर काशीकान्तबाबू आशुकवि हैताह शीघ्रे"। ओहि बातपर मधुपजी 'प्रेरणापुंज'मे लिखने छथि-
" हमर सम्बद्ध-विषयक गप्प बजला
मुदित तारानाथबाबू
जे श्रवण क' दैत चौअन्नी हँसी
हिन्दीक पटु पण्डित चकित
संयोगसँ उपविष्ट ताहीठाम
ब्रजनाथबाबू बाजि उठला :
" जौं समस्या-पूर्ति कविजी क' सकथि
तँ हमहुँ बुझबनि
छनि कवित्वक सृजन-प्रतिभा '
कहि, ' नौआ ' पदें पूर्ण करैक ताही क्षण समस्या।
चट हमहुँ ताहीठाम कागत और पिनसिल ग्रहण क'
पन्द्रह मिनट बिततैह तकरा कयल पूरा
जकर अपनउंलोकनि देखु स्वरूप :
" देत सेर भरि दूध, मिलौने पानि तीनएँ पौआ,
झौआ गामक गोप, मुदा पहिनहिं किछु पौने ढौआ।
तहिना केश कटैत, कलोल कराबै बनि मुँहबौआ,
लबलब बजइत बात सदच्छन की बलचनमा नौआ।।
(सन्दर्भ: प्रेरणापुंज-मधुप, पृष्ठ-15)
एहि घटनाक बाद अनेक समस्या-पूर्तिक सन्दर्भ अछि।
समस्यापूर्तिक जे विषय प्रभातमे देल अछि आ किछु कविक समस्यापूर्तिक कविता एतय उद्धृत करय चाहब, मैथिलीमे देल समस्यापूर्तिक विषय निम्नलिखित छल-
(विभिन्न अंकक समेकित समस्यापूर्तिक विषय एतय लेल अछि)
विचारू अहाँ, यदि हो, युवक संघ सेवक जतय, अकचकाय निज कार्यमे, आब हमर रक्षा होयत,
व्यक्ति चीन्हि कय भोट दी, मधुकर मदन जगाबय, मिथिला कवि विद्यापति, जत चन्द्रावति रानी,
भूतल रहि-रहि डोलय, युवक जगत संचालक, राष्ट्रपति राजेन्द्रबाबू, कुसियार छी, जय ध्वनि कोना? छोड़ने की भय सकैछ? ,
01.युवक संघ अछि सेवक जतय !
~श्री श्याम सुन्दर झा, कोइलख।
सूनू मिथिला के औ वासी, कियैक नहि आब जागल छी।
ताजू आलस्य निद्रा काँ, कियैक छी मोहमे फँसय॥ 01॥
हटाऊ द्वेष ईर्ष्या केँ, परस्पर ऐक्यता जोडू ।
अविद्या काँ हटाउ सब, करू विद्याक मिलि उदय ॥ 02॥
करू उत्साह ओ साहस, हटाऊ विघ्नबाधा के।
' सुन्दर ' क अर्ज काँ मानू, युवक संघ अछि सेवक जतय॥ 03॥
(वर्ष-01, अंक-04, अप्रैल 1933)
02 विचारू अहाँ
~श्री रामचन्द्र झा, रानीटोल।
यावत ईर्ष्या द्वेष रहत मन ताबत मेलक नाम कहाँ ।
यावत मेल-मिलाप बढ़त नहि तावत उन्नति हैत कहाँ।।
जौं उन्नति मार्गे चलब नहि त कलुषित जानि क हैब अहाँ।
किय कलुषित जाति कहाय रहब मैथिलवृन्द विचारू अहाँ।।
03 यदि हो
ओ घर उन्नति करत अवश्यहि भ्रातृ प्रेम सब दिन यदि हो।
जाति ओ उन्नति करत अवश्यहि जाति प्रेम सब दिन यदि हो।।
ग्राम ओ उन्नति करत अवश्यहि युवक संघ रक्षित यदि हो ।
देश ओ उन्नति करत अवश्यहि युवक संघ दक्षित यदि हो।।
(वर्ष-01, अंक-11, नवम्बर-1933)
04. मिथिलाक कवि विद्यापति
~श्री रामचन्द्र झा 'चन्द्र ' रानीटोल
आधुनि ब्रज भाषाक कविता,
देखू नयन पसारी।
करि की सकला केओ बराबरि,
कविता रसिक विहारी।।
छथि औखन बहुतो मिथिलामे,
मैथिल काव्य कलापति।
पर समानता कय सकता के,
मिथिला कवि विद्यापति।।
(वर्ष-02, अंक-मइ-1934ई.)
05 युवक संघ लेखक जतय
~रामचन्द्र झा 'चन्द्र ' रानीटोल।
गो मातु चलू वनमे विचरय
हरित ग्रास अछि, बहुत ओतय।
फुलित पुष्प सौ बाग सुशोभित
चित्त प्रफुल्लित हैत चितय।।
करिके हरि नै कै सकता किछु
रहब सभय मिलि एक मतय।
भय नहि किछुओ रहल ओहि ठा
युवक संघ सेवक जतय।।
(वर्ष-2, अंक -01, जनवरी-10934 ई.)
06 मौन भई फुलि ई फुलवारी
~श्री ब्रजमोहन ठाकुर 'मोहन' (चपाही)
सवैया
फूलन के बँगले बिच राजत
संग सखा सखि प्याउ अरु प्यारी ।
अंगन अंग विचित्र वन्यउ
पट भूषन जा छवि है न्यारी ।
आनन फूल समान लसे
वच फूल सभी मन फूल उभारी।
मोहन संग समाज लिये
जनु मौन भई फुलि ई फुलवारी।।
( वर्ध-02, अंक-05, मइ 1934 ई.)
07 शान को बढावेंगे
~श्री महन्थ झा, बड़गांव)
शान्ति के पुजारी सुविचारी आज भारत में,
सेवा के भिखारी सदा हिय हुलसा वेंगे।
खादी के प्रचारक समर्थ देश नायक हूँ
हरिजन सहायक प्रिय वाणी को सुनावेंगे।।
प्रान्तों में घूमि-घूमि प्यारी भूमि चूमि चूमि,
भारत मचादी धूम जान को लड़ावेंगे।
चारो ओर गूँजती वाणी फिर भविष्य
आज गान्धी से सपूत हिन्द शान को बढ़ावेंगे।।
(वर्ष-2, अंक-06, जून-1934ई.)
08 मिथिला कवि विद्यापति
~श्री अनिरुद्ध मिश्र, बी.ई.
जनिकर रचना केरि नकल कय बंगक कवि सब पूजित भेला।
जनिकर भाव चोराय पुनर्लिखि तुलसी नाम कमैला।।
जनिकर सन रचना सुन्दरता कतहु अहाँ नहि पायब।
हिन्दी बंगला काव्य ग्रन्थ सब ताकि अहाँ जे जायब ।।
जनिकर पाँती ह्वैछ समादृत तीनि तीनि भाषा मे।
जनिका सन की कतहु एको कवि अछि ककरहु लेखा में?
मैथिल कोकिल -हित उगना बनि रहला स्वयं उमापति ।
हयत हुनक अपमान कहब जँ�मिथिला कवि विद्यापति"।।
(वर्ष-2, अंक-09, सिंतबर-1934ई.)
09� युवक जगत संचालक�
~श्री रामचन्द्र झा रानीटोल
द्वेष उठाय हृदय करु प्रफुलित,
बेर एखन नहि बैसि गमाबक।
हाथ उठाउ? प्रभातक लेखक !
अहि पर केवल भार प्रचारक।।
मेल मिलाप बढ़ाउ युवकगण,
आवहु होउ प्रभातक पालक।
देश विदेश सदा कहइत अछि,
केवल युवक जगत संचालक।।
(वर्ष-02, अंक-11, नवम्बर-1934ई.)
10�जत चन्द्रावति रानी"
~श्री रामचन्द्र झा 'चन्द्र' ( रानीटोल)
नहि पाय प्रभावक लेस रहे,
विच जह्नु सुताक वहैतछि पानी।
सुचि सुन्दर वायु प्रफुल्ल हिये,
परजा सह शोभित अछि राजधानी।।
अति मोद विनोद गुणीगण सौं,
दरबारहि बास करै छथि वाणी,
'रामचन्द्र' कहु कमती किय हो,
छथि राजित जत चन्द्रावति रानी।।
मधुपजी आशुकवि छलाह, प्रभातसँ लगाव छलनि, मुखपृष्ठपर हुनकहि कविता छपैत छलनि, रानीचंद्रावतीपर तँ धारावाहिक निकलैत छलनि, तथापि हुनक एकहु टा समस्यापूर्तिक कविता नहि अभरल, एकर कारण जखन सोचय लगलहुँ तँ प्रेरणापुंज(संस्मरणात्मक पद्यकथा)पर ध्यान गेल जतय एक ठाम मधुपजी लिखने छथि, भ' सकैछ वैह कारण हो -
देखल जाय :-
" ओइ समयमे
प्रतियोगिता कविताक जै ठा होइत छल
भगवतीक कृपें प्रथम हमरे रहै छल काव्य
ई ख्याति बढ़ल ततेक जे
(स्थल केर अछि नहि स्मरण)
एकर सम्मेलनक मंचस्थित कविक प्रतियोगितामे
जै अपन हम नाम देलियै
की दिवंगत बुधमण्डली-मूर्धन्य
श्लेष-सारस्वत-सुधा-संतृप्त-सहृदय
पद्यमय-भाषण-क्षम
मिश्रोपनामक त्रिलोकनाथ ख्यात
रोकि हमरा कहल :
" विजयी बनि पुरस्कृत भेलहुँ बहुतो ठाम
आब नव-नव कविक हेतुक मधुप जी !
प्रतियोगितामे ली अहाँ नहि भाग।"
मुदित मन
पद-पुण्डरीक स्पर्श क ' हुनकर
कहल हम
"ऐ कथन-रूप इनामसँ क' नाम लेलहुँ धन्य
की त्रिलोकक नाथसँ दोसर पुरस्कृत अन्य? "
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7

Suggested citation: हितनाथ झा. “मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-08.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 429, pp. 8–16, 2025-11-01. https://www.videha.co.in/research/2025/429/मैथिली-साहित्यमे-तारानाथ-झा-एवं-हुनक-परिवारक-योगदान-08.htm

मूल विदेह अंक / Original issue