१.७.ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा-श्राद्ध कर्म के लौकिक व अलौकिक महत्त्व
ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा
श्राद्ध कर्म के लौकिक व अलौकिक महत्त्व
(एहि लेख में आत्मा के परमात्मा में विलय के सम्बन्ध में श्राद्ध कर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोण छै। लेखक आधुनिक विज्ञानक नजरिए सँ आत्मा के परमात्मामें लीन होयबाक परिकल्पना करैछ, जे निश्चय ही अपूर्ण ओ साक्ष्य-रहित अछि आ केवल अनुमान मात्र अछि । सामान्य व्यक्ति के बुझबा लेल श्राद्ध-कर्मक अवधारणा के व्यक्त करबाक ई एक प्रयास मात्र अछि। लेखक केँ परम हर्ष हेतन्हि जौं कियो आध्यात्मिक शास्त्र-विशेषाज्ञ कोनों तरह केर शास्त्र-आधारित विवेचन वा आलोचना प्रस्तुत करतन्हि)
शरीर, मृत्यु, आत्मा आओर परमात्मा
अपन पूर्वज क नाम पर हुनकर आत्माक शान्ति आ कल्याण लेल श्रद्धापूर्वक कएल गेल कर्महि श्राद्ध छै। यद्यपि मानल जाइत अछि जे हर जीवात्मा परमात्माक एक अंश मात्र अछि, तँ परमात्माक ओहि अंश-मात्र आत्मा लेल, जे स्वतः में निर्विकार अछि, एहि श्राद्ध कर्मक की आवश्यकता अछि? संभवतः ई उत्तर आत्मा, प्रेतात्मा, पुनर्जीवन आदि जेकाँ अवस्थाक गूढ़ रहस्य मे अछि (पढू "परमात्मा का वास", https://thecounterviews.com/article/almighty-god-his-location) ।
सनातन वा हिन्दू धर्म में ई धारणा सदिखन रहल अछि जे आत्मा अविनाशी अछि आ किछु जीव में, जकर जन्म भेल होवै, कखनो छोट कालखंड तके रहैत अछि आ ततपश्चात वा तँ देह के रूप बदैल लैत अछि वा फेर परमात्मा में लीन होयबाक कारण एहि मृत्युलोक सँ बाहर निकलि जायत अछि। हर जीवात्माक जीवन-काल कईटा अन्य घटक पर सेहो निर्भर करैत अछि। मानल जाइत अछि जे ककरो मृत्यु ओकर आयु सीमा सँ पहिने वा बाद मे नहि होयत, मुदा ओहि ग्रंथ सभ में अकाल मृत्यु के बर्णन सेहो अछि। ताहि सँ ई बुझायल जाइत अछि जे मृत्यु निश्चित समय सँ पहिनें वा बाद में सेहो भ सकैत अछि आ एहि कारणे जीव अपन आत्म-रक्षा लेल अपन-अपन विवेक सँ दीर्घायु होवै के प्रयास अवष्य करैत अछि। अर्थात्, डाक्टर, वैद्य के चिकित्सा या गुरुजन के आशीर्वाद के प्रभाव सँ आयु छोट या बड़ भ सकैत अछि।
जीवात्मा पर कर्म केर प्रभाव
प्रत्येक जीवात्मा जीवन भरि अपन-अपन कर्म करैत अछि I हुनकर ओ सुकर्म वा कुकर्म में आत्मा सेहो सहायक होतैक I तँ सुकर्म के सुफल व कुकर्म के कुफल में हुनक आत्मा सेहो साझीदार रहतन्हि I एकर मतलब ईहो भ सकैत अछि कि संपर्क केर प्रभाव आत्मा पर सेहो पड़ैत अछि आ एहि लेल विकृत देह में आत्मा सेहो विकृत होएत अछि, जइना कोनो सुगंधित जंगल या बगिचा सँ आबै वाली हवा सुगंधित रहैत अछि आ कोनो दुर्गंध स्थान सँ आबै वाली हवा में दुर्गंध होइत अछि। ई तँ अकाट्य सत्य अछि कि जीवात्मा सँ गलती या पापकर्म अवश्य होइत छै आर ओहो कलियुग में I एहि लेल आजुक युग में लगभग हर व्यक्ति व हुनक आत्मा के दोषी होयबाक बहुत संभावना छै। तँ परोक्ष रूप सँ इहो कही सकैत छी जे सम्प्रति अधिकतर आत्मा दूषित आ कलुषित अछि । चूँकि हर प्राणी के आत्मा कमोवेश दूषित छै, तें तेहेन कलुषित आत्मा में भगवान् या परमेश्वर केर वास नहि भ सकैछ । तँ ई मानि केँ चलू जे परमात्मा के प्रतीक मानल जाए वाला आत्मा जौं दूषित भ गेल तँ देहावसान पश्चात जौं श्राद्ध कर्म नहि भेल छै तँ ओ आत्मा जीवलोक में भटकि रहल होयत, भले ओ प्रेत योनि हो या अन्य जीव के पुनर्जन्म के रूप में । मनुष्य एक एहेन योनि अछि जाहि में बुद्धि आ विवेक सँ निर्णय लेबाक क्षमता छै। तें यदि मनुष्य योनि में लोकनि सत्कर्म नहि केलन्हि तँ ओकर उद्धार नहि हेतन्हि I तखन संभावना छै कि ओकरा फेर स पुनः जीवन चक्र में जाए पड़त, चाहे ओ चाहे सीमित जन्म हो या सहस्त्रों जन्म केर पुनरावृत्ति।
अंग्रेजी में एक कहावत अछि �To err is human�। आजुक समय में या कलियुग में कहू, लौकिक विलासिता बढ़ि रहल अछि आ ओकरा पूरा करए लेल लोक अनैतिक कर्म करै सँ परहेज नहि राखै छथि । किछु लोकनि तँ ह्त्या करए लेल सुपारी लेवै के व्यवसाय अपनाए लेने छथि। असत्य बाजब आजुक समय में एक कला बनि गेल अछि, जकरा अंगरेजी में अक्सर 'डिप्लोमेसी' सेहो कहल जाएत अछि। माता-पिता आ सम्मानित लोकक अपमान कलियुग में आम बात बनि गेल अछि। मानवीय शोषण, बलात्कार, छोट-छोट बात पर प्रताड़ना आ हत्या आब सामान्य बात भऽ रहल अछि। संक्षेप में कहू तऽ आजुक युग में विरलहि कियो अहिना व्यक्ति होएत जे दिनानुदिन पापकर्मक भागीदार न हेताह।
आत्माक अलौकिक यात्रा आ प्रवाह
कोनहुँ जीव में आत्मा अन्यान्य गुणात्मक कला कें ग्रहण कएने एहन जल धारा के जेकाँ प्रवाह करइ छथि, जे आगाँ बढ़ैत एक सँ दोसर बड़ नदी में क्रमशः समाहित हएत अंततः अथाह समुद्र में मिल जाइक छथि। संभव अछि जे जल-बूँद रूपी कओनो जीवात्मा केँ कोनों प्रवाहित जलश्रोत के भेटय तक के यात्रा में जे भटकनाई होइछ, ओ शायद प्रेत योनि में भटकाए के सामान होइछ I जखन ओहि जलबूँद कोनों शुद्ध जलश्रोत सऽ मिलैत निरंतर आगाँ बढ़ैत रहैत अछि, तँ ओ शायद स्वर्गक प्रतीक होइछ आ अशुद्ध जलश्रोत में मिलि केँ नरक। मुदा आत्माक जल श्रोत रूपी निरंतर प्रवाह शायद जीवात्मा के अन्यान्य अवस्थाक पूरा वर्णन नहि कऽ सकैत अछि। यैह ठाम श्राद्ध कर्मकें बहुत महत्त्व होइछ, जइ सँ ओहि बूँद रूपी आत्माकें प्रेत-योनि में या पुनर्जन्म में भटकन सँ बचएबाक लेल श्राद्ध मन्त्र शुद्ध जल रूपी मार्ग प्रशस्त करैत अछि, आ हुनका स्वर्गलोक या मोक्षक रास्ता खोलि दैत अछि। ओहिनाहिं किछु तीर्थ स्थल के सेहो बहुत महत्त्व होइछ, जकरा बारे में मानल जाइछ जे ओहिठाम मृत्यु होवै पश्चात अमुक आत्मा किछु शुद्ध या अशुद्ध जलश्रोत रूपी प्रवाह में समा कऽ क्रमशः स्वर्ग या नरक में जाइत होइछ वा सीधा समुद्र रूपी परमात्मामें लीन भऽ कऽ मोक्ष प्राप्त करैत अछि जेकर उदाहरण काशी में प्राणत्याग या गया में पिंड दान अछि I एहि सँ हुनका प्रेत योनि वा पुनर्जीवन के चक्र सँ मुक्ति भेटबाक पथ भेट जाइछ I
शास्त्रानुसार प्रत्येक जन्म लेनिहार प्राणी या जीवात्मा क मृत्यु, जे अल्प वा दीर्घ आयु में होवै, से निश्चित अछि। हमर ग्रंथक अनुसार अमर वा चिरंजीवी मानल गेल मात्र सात पुरुष छलाह, जाहि में हनुमान, अश्वत्थामा, परशुराम, विभीषण, महर्षि वेदव्यास, कृपाचार्य आ राजा महाबली शामिल छथि । अमरत्व नाम वा कर्म केँ भेट सकैत अछि, देह केँ नहि। शरीर त पंचतत्व सं बनल अछि, कभू न कभू ताहि में विलीन होवै अवश्यम्भावी अछि आ ओकर यात्रा एतहिं मृत्युलोक में समाप्त होइत अछि; मुदा एतहिं सं शरीर सँ विमुक्त आत्मा के परमात्मा सँ मिलै के यात्रा शुरू होइत अछि।
देहावसान यदि तीर्थ स्थान मे होवै जताए सँ मानल जाइत अछि जे आत्मा वा जीवात्मा के स्वर्गक मार्ग प्रशस्त होइत अछि, तऽ आत्मा के यात्रा सहज भ जाइत अछि जेकर उदाहरण काशी में देहावसान या गया में पिंड दान अछि I मुदा यदि देहावसान कोनों दोसर ठाम भेल तऽ जल-बूँद रूपी ओ आत्मा केँ श्राद्ध कर्म सँ जलधारा रूपी ओ प्रवाह दिस प्रेरित करब अनिवार्य भऽ जाइत अछि, जाहि सँ ओ आत्माक यात्रा सागररूपी परमात्माक दिस बढ़ी जाएत अछि । तद्यपि ओ जलप्रवाह के यात्रा में अवरोध वा अड़चन आबि सकैत अछि, जइमे किछु जल उपयोग में आबि सकैत अच्छी जेना किनको प्यास बुझेबाक, फसलक सिंचाई या आन किछु कार्य करबाक आदि भ सकैत अछि ।
एकटा आओर बात ध्यान में रखब जरूरी अछि जे आत्मा आ जलविंदु केर बीच हर मायने में समानता होवए से जरूरी नहि। ई दुनू बिलकुल अलग-अलग अवयव छथि, जाहि के हम मात्र आत्मा केँ बुझबाक-समझेबाक लेल तुलना कऽ रहल छी।
श्राद्ध कर्म केकर ? देह या आत्मा के?
अगिला सवाल उठैत अछि जे यदि देहावसान के बाद आत्मा देह से अलग भऽ कऽ चलि गेल अछि आ दोसर दिस देह केँ अग्निदाह पश्चात पंच-तत्व में मिला देल गेल रहए तऽ हम श्राद्ध कर्म केकरा लेल कऽ रहल छी? देह के कि आत्मा के? याद राखउ जे परमात्मा सँ मिलै लेल आत्मा मृत्यु के दिन ही रवाना भऽ चुकल छलि, तँ श्राद्ध कर्म करबाक लेल उपलब्ध नहि रहली आ देह मृत्यु के तुरंत बाद पंच-तत्व में विलीन भ गेल छल्हि। तऽ हम श्राद्ध कर्म में तर्पण कियैक आ केकरा लेल करब ?
औरो दोसर प्रश्न उठैत अछि कि यदि देहावसान के बाद आत्मा देह से अलग भऽ चुकल अछि आ देह केँ पंच-तत्व में विलीन क देल गेल अछि, तऽ फेर श्राद्ध कर्म लेल ने तँ आत्मा बचल अछि आ नें मृत शरीर। तऽ हम किएक अमुक व्यक्ति के देहावसान के ग्यारह दिन बाद तर्पण करैत छी ? की मृत व्यक्ति के आत्मा के किछु भाग ओकर घर में, ओकर द्वारा उपयोग में लाओल वस्तु में या ओकर परिजन में मृत्योपरांत विद्यमान रहे छन्हि जकरा लेल श्राद्ध कर्म कएल जाइत अछि? ई तँ संभव नहि कि अमुक व्यक्ति के आत्मा के एक भाग परमात्मा से मिलै लेल निकल चुकल हो आ दोसर भाग घर-परिवार में अटकल हो।
श्राद्ध कर्म में आएल पात्र महोदय यदि भोजन सामग्री, भोजन पकावै-खाय के बर्तन, जल राखै-पीवै लेल जलपात्र, चलब-फिरब लेल खड़ाऊँ-पादुका, पहनबा-ओढ़बा लेल वस्त्र, सुतबए लेल चौकी, गद्दा, विस्तर, तकिया, मच्छरदानी, उत्सर्ग के नाम पर पशुधन व श्री-धन (जमीन, द्रव्य-रुपया) आदि मृतक आत्मा के नाम पर लैत छथि जे स्वयं नहि छथि, त ई सब कोनों तरहेँ तर्क-सांगत नहीं अछि I दोसर तरफ यदि ओ सामग्री ओकर आत्मा के सुख लेल लेबैत छथि तँ ध्यान रहए जे परलोक में ओ आत्मा के मृत्युलोक के सामिग्री भेटत, ई संभव नहीं अछि I
ई बात विचारणीय अछि जे कोनों आत्मा वा प्रेतात्मा के एहि लोक या परलोक में रहब, पुनर्जन्म या परब्रह्म में लीन होयबाक लेल मर्त्यलोक सँ एहेन वस्तु वा सामिग्री के आवश्यकता होतइ I कोनो ईश-भक्त शास्त्र-विद सँ ई प्रश्न पूछब तँ बेझिझक उत्तर भेटत...कदापि नहि। तऽ ई सब ढकोसला कियैक? हम श्राद्ध कर्म में सैकड़ों-हजारौं लोक के निमंत्रण द केँ एकादशा, द्वादशा के भोज-भात में अनगिनत पकवान, व्यंजन, मिष्टान आदि के भोजन करबै छी, जाहि में अनेक गरीब के रोजी-रोटी के साधन तक बिक जाइत अछि। की ई सभ तर्क-संगत अछि? आडम्बर नहि? एहि विषय पर एक शास्त्रार्थ होनाए चाही जे श्राद्ध कर्म में प्रेतात्मा केँ श्राद्धकर्ता सँ भक्ति-निष्ठा के अपेक्षा हेतैक वा द्रव्य-पदार्थ व भोजभात के ? आजु के समय में गरीब व मध्यवर्ग के लोकनि एहि सभु आडम्बर के भय सँ भागि गया में श्राद्धकर्म व पिंडदान करावैत छथि मुदा ओहो ठाम पंडा ओ पात्र लोकनि कर्ता केँ आर्थिक रूपेण नोचए-खसोटए लेल तत्पर रहे छथि I सनातन में श्राद्ध कर्म कराए-कराओल में आएल ई विकृति केँ हटाइबाक चर्चा व प्रयास होएबाक चाही I विषय सँ सम्बंधित शंकराचार्य जौं उपयुक्त बुझए, तँ विषय-वस्तु व क्रिया-कर्म में अवश्य हस्तक्षेप या संसोधन करथि I
कलुषित जीवात्मा के श्राद्ध रूपी शुद्धिकरण
सामान्य तर्क हमरा ई मानय लेल प्रेरित करैत अछि जे राक्षसी वा अमानुषी आत्मा में परमेश्वर के प्रतिनिधि नहि भ सकैत अछि जकरा निर्विकार मानल जाएत अछि । की जीवात्मा अपन जीवित अवस्था में कएल गेल कुकर्म वा सुकर्म सँ प्रभावित नहि होए छैक ? अवश्य होयत ! जन्म सँ मृत्यु धरि कोनों जीवक अंदर समाहित आत्मा ओकर सभटा नीक-दूषि कृत्य देखै, करै में भागीदार रहे छलाह I जीवन पर्यन्त ओकर सभटा कृति केँ साक्ष्य सेहो रहैत छलाह । एहि कारणें, ओ आत्मा परमात्माक अंश रहितहुँ बेदाग, निर्मल, शुद्ध, पावन आ निष्कलंक नहि रहि जाइत अछि I एहि लेल कोनों आत्मा जखन शरीर मे प्रवेश करैत अछि तँ ओ कतिनहुँ विशुद्ध किये नैं रहल हएत, ओकर जीवन काल में विकृत भ जाएत छै जेकर कारण सँ ओ कोनो तरहेँ परमात्मा मे विलय नहि भ सकैत अछि। ओहि विकृत आत्माक परमात्मा मे लीन होइ सँ पूर्व यथासंभव शुद्धिकरण करबाक लेल श्राद्ध-कर्म, जाहि में दाह संस्कार, अस्थि-विसर्जन आ एकादश-द्वादश के कर्म शामिल अछि, अत्यंत आवश्यक भऽ जाइत अछि।
चूँकि कलियुग में अधिकतम जीव आ प्राणी मे किछु नें किछु पाप वा कुकर्म होयबाक अत्यधिक संभावना होएत छै, तिनकर आत्मा सेहो दूषित हेतइ आ परमात्मा ओ विकृत आत्मा केँ दूषित अवस्था मे स्वीकार नहि क सकैत छथि। कंप्यूटरक भाषा मे, ई किछु हद तक विश्वस्त रूप सँ कहल जा सकैत अछि जे दूषित आत्मा परमात्मा में विलय लेल अनुकूल (कम्पेटिबल) नहि अछि। एहि लेल प्रत्येक जीवात्मा केँ परमात्मा मे लीन होवै लेल दाह संस्कार, पावन नदी मे अस्थि-विसर्जन आ ओकर बाद श्राद्ध कर्म द्वारा शुद्धिकरण परमावश्यक अछि। एहि पर एक आओर संभावना प्रवल भ जाइत अछि जे यावत् जीवात्मा केँ श्राद्ध कर्म सँ शुद्धि नहि देल जाय, तावत संभवतः ओ एक प्रेतात्मा के रूप में अपने घर आ परिवारक आस-पास घूमैत रहल हेतैक।
एक समय ओहो छल जखन अपन पूर्वज सभक कालखण्ड में अस्वस्थ आ मरणासन्न लोकनि ई बुझि जाइत छलाह जे हुनकर अन्त समय आबि गेल छन्हि आ तखन शास्त्रानुसार हुनकर वैतरणी कएल जाइत छल, जे तथाकथित भवसागर पार करबा में सहायक मानल जाइत छल। तत्कालीन आपातकालीन चिकित्सा पद्धति आधुनिक समय जेकाँ विकसित नहि छल आ मरणासन्न लोकनिक अधिकतया मृत्यु भ जाएत छल। मुदा आजुक समय में आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था एहेन विकसित अछि जे कोनों भी मरणासन्न व्यक्ति केँ पहिने अस्पताल पहुँचाओल के प्रयास केल जाइत अछि जे जीवनदायक तँ होइते छैक, न्याय-सांगत सेहो अछि I ओहि समय वैतरणीक व्यवस्था में समय व्यतीत नहि क सकैत छी। ओ व्यक्ति के जौं आपातकालीन मृत्यु भ गेल तँ ओ आत्मा के, जकर पहिने वैतरणी के सहारा होइत छल, सम्प्रति नहि भेटैत अछि। संगहि आकस्मिक मृत्यु एतेक बढ़ि गेल अछि जे आब लोकनि कए हस्पताल तक पहुँचे के समय नहि भेटैत अछि, वैतरणीक बात त छोड़ि देल जाओ। अतएव एहि कहबाए में कोनो आपत्ति नहि होएबाक चाही कि कलियुग क बाकी काल में लगभग सभु लोकनि छोट-बड़ पापकर्म क भागीदार होएत आ हुनक आत्मा सब दूषित होएत जाएत जाहि लेल दक्ष व सक्षम श्राद्धकर्म अनिवार्य होएत। मुदा ई सक्षम श्राद्धकर्म अछि की?
दक्ष व सक्षम श्राद्ध कर्म
आजु-कालि के जीवन क दौड़-भाग मे, लोक कम सँ कम मेहनत सँ अपन बेशी सँ बेशी काज निकालऽ चाहैत छथि। बहुत कम एहन ब्राह्मण छथि जिनका समुचित वैदिक ज्ञान अछि। आजु के समय के कारखाना आ तकनीकी युग में, कम ही लोकनि अध्यात्मिक ज्ञान अर्जन करऽ चाहैत छथि। ओहिपर भारत क राजनेता सभ एकटा 'क्षद्म धर्म-निरपेक्षता' वाला संविधान अपनाए क सनातनी आध्यात्मिक उन्नति-उत्थान केँ बहुत आघात पहुँचौने छथि। वेद-उपनिषदक अध्ययन-अध्यापन तँ मानु ठप्प भऽ गेल अछि। कर्मकांडी पंडित वा विद्वान् के त अभाव भऽ गेल अछि। फेरु निरंतर बढ़ि रहल पापी लोकनिक मृत्यु पश्चात कलुषित आत्माक शुद्धिकरण कोना हएत ? जौं अधिकाँश पंडित केँ कर्मकांड के ज्ञान नहीं अछि, तँ ओ बढि रहल कलुषित आत्माक सक्षम शुद्धिकरण केना करथिन? सम्प्रति जे ब्राह्मण लोकनि नित्यकर्म वा श्राद्ध-कर्म करावैत छथि, शास्त्र-ज्ञान या कर्म-काण्ड में हुनकर दक्षता पर बड़ प्रश्नवाचक चिन्ह लागल होए छन्हि आ ओ प्रायः असक्षम, अकुशल पंडितक वर्ग में आवैत छथि। श्राद्ध कर्म कराए वाला एहेन सभु ब्राह्मण या पंडित के गुणवत्ता सुनिश्चित करब अत्यावश्यक अछि जे कोनों नें कोनों उपाय सँ अवश्य करए पडत।
श्राद्ध कर्म में जे परमावश्यक छै ओ थीक जे कर्ता (श्राद्धकर्ता) केँ चाही जे प्रेतात्मा के सभु सुकर्म केँ अपन चित्त में राखि पूर्ण श्रद्धा भक्ति सँ श्राद्ध कर्म ई निमित्त सँ करू जे परमपिता परमेश्वर ओ आत्मा केँ अमुक व्यक्ति के जीवनकाल में कएल गेल पापकर्म के साक्ष्य रहल �अकर्म या दुष्कर्म� केँ क्षमादान द केँ अपन शरण में लीन क लिये I अक्सर देखल गेल अछि जे कर्ता में प्रेतात्मा के प्रति श्रद्धापूर्ण निष्ठा के अभाव होए छैक जे अक्षम्य थीक I एकरा लेल श्राद्ध कर्म करवावे वाला पंडित-पुरोहित सेहो जिम्मेवार अछि जे कर्ता केँ एहि विषय पर समुचित मंत्रणा - परामर्श नहिं देलन्हि I
सारांश
सभु जीव में अंतर्निहित आत्मा निश्चित रूप सँ परमात्मा केर द्योतक होइछ, मुदा दुष्कर्म कराए वाला, पापी लोकनि के आत्मा मृत्योपरांत कलुषित भ निर्विकार परमात्मा में लीन होवै लायक नहि रहि जाइछ। मरणोपरांत प्रेत-योनि सँ मुक्ति आ स्वर्ग वा मोक्ष प्राप्त करबाक लेल ओहि कलुषित आत्माक शुद्धिकरण अति आवश्यक भऽ जाइत अछि, नहि तँ ओ आत्मा प्रेत-योनि वा पुनर्जीवन मे ही फँसि जाइत । एहिठाम श्राद्ध-कर्म के बड़ महत्त्व अछि जे हुनकर शुद्धिकरण करि अलौकिक पथ-गमनक कार्य सम्पन्न करैत अछि। एहि में मुख्य समस्या एक सक्षम आ ज्ञानी कर्मकाण्डी के अभाव अछि। अधिकांश श्राद्ध-कर्म कराओल वाला ब्राह्मण या पंडित केँ कर्मकाण्ड के विशेष ज्ञान नहि होइत अछि। भारतीय संविधान सेहो एहि लेल जिम्मेवार छैक, जकर कारण सनातन धर्मक अवनति भऽ रहल अछि। आब के एहि युग में मानय पड़ैत जे मनुष्यक दुराचार व पाप के दुष्प्रभाव हुनकर अन्तर्निहित आत्मा पर सेहो पड़ैत अछि, जाहि सँ ओ दूषित आ कलुषित भ जाएत अछि, आ एहि लेल मृत्युक पश्चात लगभग सभु कलुषित, दूषित आत्मा के श्राद्ध-कर्म एक गुणी पंडित द्वारा सक्षम व उचित रूपेण करौनाइ अनिवार्य अछि।
-ग्रुप कॅप्टन (डॉ) वी एन झा; सेवा निवृत्त वायुसेना अधिकारी; मुख्य, वायुसेना चिकित्सा अनुसन्धान प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष ओ स्नातकोत्तर परीक्षक (RUGHS वरिष्ठ वैज्ञानिक �F� व सह निदेशक (डी आर डी ओ)
सदस्य, Institute of Defence Scientists & Tech (IDST)
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।