विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२३

कल्पना झा · 2026-02-15 · अंक 436 · पृष्ठ 3–7

उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जीक परिवारक अन्य सदस्यक विवरण
दर्शन शास्त्रक शोध-विशेषज्ञ: डॉ. ब्रजेन्द्र कुमार झा
ई एकटा अद्भुत संयोग छल जे 'व्यास' जीक दोसर बालक किशोर जीक विवाह भेलनि किशोरी नामक कन्याक संग। मतलब ई गीत जे अछि-
जेहने किशोरी मोरी तेहने किशोर हे....
बिधना लगाओल जोड़ी केहन बेजोड़ हे......
से बुझू ई गीत हिनके सभ लेल लिखल गेल हो, अक्षरशः फिट' बैसैत छनि। पी.एच.डीक उपाधि प्राप्त डॉ. ब्रजेन्द्र कुमार झा आ हुनक जीवनसंगिनी किशोरी झा पर। आश्चर्यक गप्प इहो जे मात्र नामहि टा मे नहि, आचरण मे सेहो अद्भुत समानता देखना जाइछ, हिनका दुनू गोटे मे। मतलब जेहने माता-पिताक आज्ञाकारी पुत्र रहलाह किशोर जी, तेहने आज्ञाकारी, संस्कारी पुत्रवधू सिद्ध भेलीह हुनकर अर्द्धांगिनी किशोरी झा। सासु चाह पीबि कप खाली करितथिन, ताहि सँ पहिनहि पुत्रवधू हाथ सँ कप लेबा लेल मोस्तैद। सासु-ससुरक प्रति एहि तरहक कर्तव्य निर्वहन बला प्रवृत्ति विरले देखबा लेल भेटैत छै समाज मे।
दर्शन शास्त्र (Philosophy) सँ पी.एच.डीक उपाधि प्राप्त क' चुकल ब्रजेन्द्र कुमार झा 'लेक्चररशिप'क बाट धएलनि, रोजगार लेल। राजनगर कॉलेज मे पहिल पोस्टिंग भेल छलनि हुनकर। आ रिटायरमेंट भेलनि जे. एन. कॉलेज मधुबनी सँ। 'एसोसिएट प्रोफेसर'क पद सँ अवकाश प्राप्त कएने छलाह प्रोफेसर साहब। हिनकर शोधक विषय छलनि, "प्राचीन भारतीय वाङ्मय मे आर्थिक अवधारणा।" मूलतः ओ "स्मृति नीति के तत्व"क अध्येता छलाह। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, अत्रि स्मृति, विष्णु स्मृति, पराशर स्मृति, हारीत स्मृति, गौतम स्मृति, इत्यादि लगभग सभ स्मृतिक अध्ययन कएल छनि हुनकर। मुदा एतेक गहन अध्ययन क' चुकल किशोर जी सँ गप्प-शप्प करैत क्षणहु मात्र लेल आभास नहि हेतनि सामने बला केँ जे एतेक रास अध्ययन कएल छनि हुनकर। बड्ड स्थिर चित्त आ 'लो वॉल्यूम' मे गप्प करताह ओ। जहाँ सभ तरि लोक अपन अल्प ज्ञानक बखान करैत नहि अघाइए, तहाँ ई अपना द्वारा अर्जित ज्ञान कें 'प्रदर्शन'क 'प्'ओ सँ भेंट नहि होमए देलथिन अछि। ई हिनकर सभ सँ पैघ विशेषता छनि।
बिधना द्वारा लगाओल एहि अनुपम जोड़ीक मात्र एक गोट संतान छथिन। हिनकर धिया अमिता झा। मतलब हिनकर व्यक्तिगत परिवार मात्र तीन गोटाक छनि। मुदा स्वार्थी जकाँ मात्र अपने तीनू गोटा लेल सोचबाक हिनकर प्रवृत्ति कहियो नहि देखाएल हमरा। सभ कें संग ल' क' चलब, अपन पिता सँ सीखल छनि बुझि पड़ैए। ई प्रवृत्ति एखनहु धरि दृष्टिगोचर होइत अछि, से आश्चर्यक गप्प! मतलब माता-पिताक उपरान्तहु जस-के-तस बनल रहलनि पहिने सन मनोवृत्ति।
संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1
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Suggested citation: कल्पना झा. “मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२३.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 436, pp. 3–7, 2026-02-15. https://www.videha.co.in/research/2026/436/मैथिली-साहित्यमे-उपेन्द्र-नाथ-झा-व्यास-एवं-हुनक-परिवारक-योगदान--२३.htm

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