(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
'प्रभात'मे प्रकाशित कांचीनाथ झा 'किरण'क रचना
हस्तलिखित पत्रक उपयोगिता
श्री कांचीनाथ झा (धर्मपुर)
कोनो वस्तुक प्रारम्भिक रूप क्षीण तथा छुद्र देखि ओकर उपेक्षा करब सर्वथा अनुचित। कारण संसारक शृष्टि मात्र परमाणुए सौं बनल अछि। बड़क बीज देखि क्यो कहि सकैछ जे एही राइ समान छुद्र कणमे ओहेन-2 महान वृक्षक आकार गुप्त अछि। हाथी सन-सन प्रकाण्ड जनवरौक शृष्टि एके सेल मात्र सँ ह्वैत छैक। तहिना कोनो संस्था वा संघ प्रारम्भे सौं महान तथा सर्वमान्य नहि रहैछ।
सर्वप्रथम कोनो भावनाक उत्पत्ति एके व्यक्तिक हृदयमे होइत छैक। अनन्तर विचारक प्रचार भेलासँ अनुयायीक संख्या बढ़ि एक समूह बनि जाइछ। और एक विचारावलम्बी जन समूहक नामे संस्था थिक। भावना दृढ़मूल नहि भेलासँ नष्ट भय जाइछ। और पक्षान्तरमे विकसित।
उदाहरण वर्तमान इंडियन नेशनल कांग्रेस एकरो स्थापना प्रायः बहूत अल्प व्यक्तिक द्वारा भेल छल। परन्तु एकर साम्प्रतिक वैभव देखू। हँ, एतवा अवश्य जे संख्या के चिरस्थायी तथा सफल बनेबाक हेतु ओकर संचालक के, भगीरथ समान दृढ़ प्रतिज्ञ तथा प्रयत्नशील होयब एकान्त आवश्यक।
क्वैलख सन सामान्य देहात मे युवक संघक स्थापना तथा ओकर द्वारा द्वारा 'प्रभात' नामक मासिक पत्रक प्रकाशन मिथिलाक उन्नतिक उज्वल भविष्यक सूचना थिक। यद्यपि प्रभातक स्वरूप क्षुद्र क्षीण तथा अपरिष्कृत अछि तथापि उपेक्ष्य नहि थिक। उद्योग कयलासँ ई ' प्रभात' मिथिलाक अशिक्षा रजनीक अज्ञानान्धकार के नासि वास्तविक प्रभात बनि सकैछ।
सम्प्रति, अमुदृति साहित्यक नाम नहि होइछ। एकर आदर नहि ह्वैछ। परन्तु ई, मनोवृत्ति वर्तमान पाश्चात्य-विलासी वातावरणसँ दूषित अछि। जाहि दिनमे मुद्रण यन्त्र नहि छल, कागजक स्थानमे तालपत्र चलैत छल, ओहि दिनमे की विद्याक प्रचार कम छल ! साहित्यक उन्नति कम छलैक? विश्वविख्यात सर्वश्रेष्ठ संस्कृत साहित्यक उन्नति हाथहिसँ तालपत्रेपर लिखि भेल छल। तखन की हमरा सब मैथिलीक उन्नति एहि हस्त लिखित पत्र सँ नहि कय सकैत छी ?
सम्प्रतियो चरखा तथा एकर द्वारा देसी वस्त्रक उद्धारपर दृष्टिपात करू! यदि चरखाक द्वारा, लंकाशायर मैनचेस्टर सन विश्वविख्यात मसीनक प्रतिद्वन्द्विता कय देसी वस्त्रक निर्माणकलाक उद्धार सम्भव हो तँ की प्रभातादिक पत्र द्वारा मैथिली साहित्यक उद्धार असम्भव मानक चाही ? कदापि नहि। एकर उपेक्षा नहि कय, सवहिं सहयोग प्रदान करय तँ एकर मुद्रणो कठिन नहि रहत। हम प्रभातक दयनीय दशा देखि चकित छी कारण एहि गाममे विद्वानक अभाव नहि। फेर प्रभातक ई रूप कियैक! हमर एहि गामक प्रत्येक विद्वानसँ अनुरोध जे प्रभातक पालन सुचारु रूपसँ करथि।
तखन एक बात ! जहाँ तक भय सकय, एखन मैथिलीक दिसि ध्यान देब उचित। बंगलाक वैभव महान छैक। हिन्दीक सेवक बहुत छैक। अंग्रेजीक तँ कथे नहि। सागरमे एक पोखरियोक जल प्रदान कयने कोनो लाभ नहि तखन एक चुरुक आध चुरुक सँ की हो। परन्तु चुकरी एके चुरुकसँ उमटाम भै जाएत।
यद्यपि हिन्दी राष्ट्रभाषा थिक। एकर प्रचार सर्वथा कर्त्तव्य। परन्तु एखन नहि। एखन मैथिली मरि रहल अछि। यावत अन्य प्रान्तीय भाषाक समान नहि बनलि अछि तावत हमरासव तनमन धनसँ एकरे सेवामे एकनिष्ठ रही। अन्यथा एकर अस्तित्व सर्वथा सर्वथा असम्भव। हमरा जहाँ तक आशा अछि- क्यो व्यक्ति एहन नहि होयताह जे मैथिली नहि लीखि सकताह। विशेष 'विज्ञेशु किम अधिकम'।
ईश्वरसँ प्रार्थना जे प्रभात प्रभात हो और युवक संघ सर्वदा युवके रहय।
(प्रभात अंक- 06, जून 1933, पृष्ठ- 21)
कविता
युवकसौं
कांचीनाथ झा "किरण"
(धर्मपुर)
हो पैघ काज केहनो
साहस के नै हड़ाबी।
औचित्य लखि पढ़य जौं
निर्भय कदम बढ़ाबी।।
-0-
आरम्भ काज कय केँ
मुख नै कदापि मोड़ी।
पथमे पड़ल रहौ किछु
कोमल कली की रोड़ी।।
- 0 -
अपना बुते हुए जौं
नहिँ आनकेँ अढ़ाबी।
कर्तव्यनिषु भय पुनि
कर्तव्यता पढ़ाबी।।
- 0 -
सद्धर्म थिक युवक केर
निज देश जाति सेवा।
पहिने भेटत कठिनता
परिणाम किन्तु मेवा।।
-0-
विश्वास निज श्रमक दृढ़
जाधरि रहत हृदयमे।
दासी बनलि सफलता
रहतीह पयर धयने।।
-0-
यावत रुधिर गरम अछि
चलू ता "सुकाज " कयने।
पुनि कय सकब "किरण" की
जर जर शरीर भयने।।
---0---
प्रियतमसौं
प्रभु ! मम जीवन जीर्ण कुटीमे
कहिया होयत भाग्योदय।
हाय ! अनन्तक अमा निशामे
लेत मनोहर चन्द्र उदय।।
-0-
कुमुदिनि-अरुण- अधर पर देखव
कखन सरल मुस्कान।
प्रेम-पथिक मधुकरक सुनब हम
मधुर याचना गान।।
-0-
विरह-विह्वला मुग्ध चकोरी
निरखत नव। ज्योत्सनाक प्रकास।
मालतीक पुलकित तनु तनमे
होयत नव कलिकाक विकास।।
-0-
हृतन्त्री मे लहरि उठत प्रिय-
मिलन राग केर मृदु झंकार।
मुरझल शीर्ण शिथिल तनमे पुनि
होयत नव जीवन संचार।।
-0-
दुर्दिन-विरह बितत पर प्रभु ! कहिया?
होयत हृदय-गगन अभिराम।
तीव्र अथक-गति नयन निर्झरक
श्रोतक कहिया ह्वैत वितान।।
-0-
होयत शान्त कखन मम मानस-
सागर केर हिल्लोल महान।
प्रियतम ! ऐ निरीह दुखिया केर
मूक वेदना केर अवसान।।
-0-
मलार
हे सखिया ! आजहुन आयल पँतिया !
नीरद नील गगन मंह शोभय
चमकि रहय बिजुलतिया।
झिंगुर, मोर, पपिहरा गाबय
और अमावस रतिया।।
सून सदन, वय तरुण चपलमति
पीड़थि हिय रति-पतिया।
"कांचिनाथ" आवहुँ सुधि लेथिन
भय गेल केहन कुमतिया।।
- -0-
रति-पति = कामदेव
(प्रभात अंक- 06, जून 1933, पृष्ठ- 21, उपर्युक्त तीनू कविता एही अंकमे )
याचना
नहि मड�इत छी सौख्य सक्ति
सम्पति नहि प्रभुता।
नहि विद्या यश कीर्ति वुद्धि
वल नहि सुन्दरता।।
दृढ़तर हो ई ज्ञान प्राण रह
यावत तन मे।
"शुभमय ईश विधान"
भान हो सन्तत मनमे।।
(प्रभात अंक- 08, अगस्त 1933)
ललित-निबन्ध
वैदेहि
देवि ! औ स्यमन्तक मणि की भेल ? जे अंशुमालिक समान हृदय -कमल के उत्फुल्ल करैत छल। नवीन नील नीरदक समान मन-मयूर के उद्भ्रान्त कय दैत छल। शीतल शारदीय सुधांशुक समान नयन चकोर के उन्मत्त कय दैत छल। जे संगीतक प्रथम ध्वनि, वेदक प्रणव, शृष्टिक मूल प्रकृतिक समान महान छल।
जकर मधुर धवलिमा सँ आकृष्ट भय स्वयं जगज्जननी एहि स्थानमे अवतीर्ण भेलि छली। जकर मनोहर प्रकाशक अन्वेषण करैत आदर्श रूप मर्य्यादा पुरुषोत्तम, त्रिभुवन पातक रामचन्द्र अयोध्यासँ पैरहिं एक सामान्य अतिथिक रूपमे एहि भूमिक पालक जनकक गृह आयल छलाह।
मा ! की ओ मणि हड़ा गेल! अथवा मादृष क्यो हठी सन्तान अहाँ सँ लय कय नष्ट कय देलक। जाहि मणिक प्रकाशमे व्यास अष्टादश पुराणक रचना कय अज्ञानान्धकार सागरमे निमग्न के पथ देखौलक। याज्ञवल्क्य-स्मृति शृंखलाक निर्माण कय विछऋंखल (vitchhrinkhal)-शक्तिहीन समाज के श्रृंखलित, सम्पन्न बनाय, चिरस्थायी होयबाक योग्य बनौलक। जे श्रृंखला असंख्य अनाचार प्रहार सह्य करैत अद्यावधि ओहने दृढ़ बूझि पड़ैछ। मा ! ओ अमूल्य मणि कतय अछि। जकर सुधांशु शीतल प्रकाशमे अयाचीक साग अंकुरित भेल। वेदान्तवादी सुकक जन्म भेल छल।
कविकोकिल विद्यापतिक कविता मन्दाकिनीक मूल स्रोतो ओही मणिक प्रकाश छल। जाहि मणिक एक किरण पाबि सूर्य्य दिनकर कहाय रहल छथि से मणि की भेल। हाय ! अम्ब ! की कहल ? हड़ा गेल। तखन कियैक नहि कहै छी जे मिथिले हड़ा गेल। मैथिले हड़ा गेल। कियैक जीवित रखने छी।
(प्रभात अंक- 08, अगस्त 1933)
रण साज
सपदि चलु सुन्दरि केलि कुटीर
कय आमन्त्रित तोहि रसिक वर
शीतल यमुना तीर।
सुरत समर परतीक्षा मे छथि
सज्जि सर रतिवीर।।
कमर वन्द कोच वन्द कंचुकी
दृढ़ कए आँचर चीर।
उन्नत उरज पताक निरखि सुभ
सकुन मीन ससि कीर।।
किरण कहथि विजयी निश्चय
यदि नहि हयब अधीर।
रहत थीर के पीर जखन तुअ
छूटत नयज तीर।।
(अंक 9, सितम्बर-1933)
उपलब्ध अंकक आधारपर कांचीनाथ झा 'किरण' केर दू आलेख एवं पाँच कविता प्रकाशित छनि, सेहो मात्र तीन अंकमे। ओहि समय किरणजी 26-27 वर्षक छलाह। लेखनी हिनक प्रारम्भिक समयक छनि, मुदा ओहि समय हस्तलिखित पत्रिकाक हस्तक्षेपपर महत्वपूर्ण आलेख लिखने छलाह, एहि पत्रिकामे सेहो आ मिथिला मिहिरमे सेहो। उपर्युक्त आलेख आ कविताक नीचाँ कोनोमे मात्र कांचीनाथ झा (धर्मपुर) आ कोनोमे कांचीनाथ झा 'किरण'(धर्मपुर)।
मैथिलीक प्रसिद्ध आलोचक किरणजीक उपर्युक्त आलेख आ कवितापरटिप्पणी करैत लिखैत छथि- " कांचीनाथ झा 'किरण'क पाँच टा कविता आ दू टा निबन्ध प्रभातक विभिन्न अंकमे प्रकाशित अछि। एक टा निबन्ध हस्तलिखित पत्रक उपयोगिता सँ सम्बद्ध अछि तँ दोसर ललित निबन्ध अछि- वैदेहि। ई सातो रचना किरणजीक दुनू मुक्तक काव्य-संग्रह आ एकटा निबन्ध-संग्रहमे नहि अछि, अन्यत्रो कतहु मुद्रित अछि वा नहि से कहब कठिन। किरणजीक प्रारम्भिक कालक काव्य-स्वरूपक परिचितिक लेल प्रभातक पेटीमे सैंति कs राखल कविता पठनीय अछि।"
(सन्दर्भ: एकल पाठ-मोहन भारद्वाज)
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