(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
विषय आ विधाक विविधता प्रभातक उपलब्ध अंकमे दृष्टिगोचर होइत अछि। समसामयिक विषय-वस्तुक समावेश सेहो देखना जाइछ। फगुआक समयमे जेना मार्च-१९३३क अंकमे होलीपर विशेष हास्य-लेख छपल छल , एकर सूचना 'चैत्रक मजा'क लेखक जखन अप्रैल१९३३क अंकमे निम्नांकित लेख देलनि, तँ होलीक परिक्रमाक चर्चा कयलनि। चूँकि मार्च१९३३क अंक अनुपलब्ध अछि, तेँ ओ एतय प्रस्तुत नहि भ' सकल,मुदा पत्रिकाक दृष्टि तँ झलकिये गेल। एहि अंकमे प्रस्तुत अछि ' चैत्रक मजा' आ एक टा एही अंकक कविता ' प्रातःकाल'।
चैत्रक मजा
हा-हा-हा...........
लेखक - श्री नारायण ठाकुर, कोइलख।
श्रीमान सम्पादक जीक कृपासँ होलीक परिक्रमाक तँ मजा देखै गेलौं, आब चैत्रक मजा देखै जाउ...
करीब ५बजे भोरक समय थीक। कतेक बाबू लोकनि उठय लागल छथि। कियो त ठररे पारि रहल छथि। कियो उठि कान पर जनौ चढ़ाय तमाल पत्रमे सितुआक चूर्ण मिलाय चुटकी अवति ठोर पर दय हाथमे जलपात्र लय अपन-अपन कलम दिशि दीर्घ शंकाक हेतु जाइत भेला। कियो टहलबोक हेतु जाइत छथि आ मजरक सुगंध लैत शुद्ध-हवाक मजा लुटैत चल अबैत जाइत छथि। आब किछु देर वितलाक बाद फ़ेकु बाबू ओ ढेकु बाबू दुनू गोटे दीर्घ शंका दिशि सँ अबैत भेला। ओ कलममे टहलय लगला। टहलि-टहलि देखय लगला ?
फेकु बाबू- की औ ढेकु बाबू, केहेन लक्षण ऐ बेर अछि ? अहाँक कलकतिया तँ खूब जोड़ मजरल अछि ?
ढेकु बाबू - हँ, आब देखा चाही। आशा तँ एकरे टा। जँ ई सुतरि जाय तँ ई दुनू गाछ काम सँ कम 25 रु.मे बिकायत ? अहूँक भदैबा तँ बेस मजरल अछि।
फेकु बाबू- हँ, भदैबा खूब अछि, परन्तु कलकतिया किछु कम अछि।गाममे तँ रुपैया गढ़बाक कल कलकतिये टा अछि कि कुसियारे । त कुसियारमे पुरजीएक बखेड़ा उठइये, तखन रहल कलकतिया आम जिनका कलकतिया अछि तनिके किछु रुपैया होइ छैन्ह।औ ढेकु बाबू, त अहाँ दुनू गाछ कलकतिया बेचिए लेब कि खेबो वास्ते किछु राखब।
ढेकु बाबू- खेवा वास्ते कोहवा और कौआ भोग राखब ?
फ़ेकु बाबू- औ एते मनसूबा एखन जनु करी, मज्जर भेने की ? सुतरत तैखन ने ! ता गाछ मे कटहर ओठ मे तेल, पानी मे माछ न न कुटिया बखरा की करै छी ? आब चलू फेर स्नानो करब ग आइ मधुबनी जेबाक अछि ओ धोढ़बा वाला मोकदमाक तारीख आइ थिकैक ? ता विलैया माय ओ सजना के देखलन्हि।
फ़ेकु बाबू- गै हरमजादी, के छिके जारन तोरैत। मजरल गाछमे जारन तोड़य एलेहें ?
वि.मा. - औ फ़ेकु बाबू, अहाँक मूँह बड़ छुटल अछि।देखू औ ढेकु बाबू, हम एखने एबे टा केलौं अछि, इहे चारि काठी बाँझी तोरली ऐ अछि, तै ले जे गाड़ि पढ़ैत छथि। देखलौं अछि, एखने सजनी एक पथिया खाली धौढ़ी तोरि क ल गेलै से किछु ने ! ओकर तँ खुशामद रहैत छन्हि। भला बुढ़ि भेलहुँ तँ दूरि गेलहुँ।
ढेकु बाबू- जो, जो, बात नहि बढ़ा, ओ नहि चिन्हलथुन। चीन्हि क' जानि क नैन गाड़ि पढ़लथुन अछि, तै यो एखन मजरल गाछमे नहि ने तोड़क चाही ?
आब फ़ेकु बाबू ढेकु बाबू दुनू गोटे अबैत भेला। धोती लय अन्हरी पोखरिक बिदा भेला। स्नान केलन्हि। संध्या बन्धन ककरा ले करता ? एकर त सब वा खास क युवक लोकनि पटले हटा देने छथि। ऐ पर यदि आब लिखय लागब तँ बहुत बात लम्बाचौड़ा भ' जैत। दुनू गोटे आँगन अयला। चूड़ा दही खाय मधुबनीक जाइत भेला ।
(प्रभात, वर्ष-१,अंक-४, १९३३ ई.)
प्रातःकाल
श्री चन्द्र कान्त मिश्र, क्वैलख।
केहेन अछि सुन्दर प्रातःकाल।
कार्योपयोगी थीक समय ई, प्रकृति करत नव धार।
शीतल-२ पवन चलै अछि, पुष्पसब करे फुफकार।।
फलसँ झूकल शाखा सभसँ, शिशिरक बूँद खसै भूतल पर।
एहि समय पूर्व दिशा मे, रवि सँ शोभा हो पृथ्वी पर।।
नवनव सूर्य किरण सभ केर, वृक्षपर खोता क रेखा।
क्रमशः पृथ्वी उज्ज्वल भ' क ' करनि अन्हारक लेखा।।
जीव सभ उठि एहि पृथ्वी काँ, भोजनक करै अछि तलाश।
शय्या कां त्यागि मनुष्य सभ, करै छथि काजक प्रयास।।
कृषक सभ निज काज करै छथि, छात्र सभ पढ़थि निज पाठ।
सब काँ मन प्रफुल्ल रहै अछि, सिखैछ प्रशान्तक पाठ।।
आनन्द होय भ्रमण कयला सँ, सूतब नहि ककरौ उचित।
काज क्षमता होय शरीर मे, राति जगरना छी अनुचित।।
(प्रभात, वर्ष'0-१, अंक-४, अप्रैल १९३३)
उपर्युक्त कविता ,जेना लगैछ, कविक प्रोत्साहन हेतु छापल गेलनि अछि, कविताक गुण-अवगुण पर ध्यान नहि दय कविक नीक सोचक ध्यान राखल गेलनि अछि। पत्रिकाक ई प्रारंभिक समयो छल, तेँ हम एहि अंकमे एक हास्य आ एक कविता प्रस्तुत कैल अछि। अग्रिम अंकमे दोसर रचनाक संग प्रस्तुत होयब।
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
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