विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

A Parallel History of Mithila & Maithili Literature

Gajendra Thakur · 2026-03-15 · अंक 438

[page 75-1030]
23 Language Transliterator
A Parallel History of Maithili Literature: Introduction
PART 1
PART 2
PART 3
The Revitalization of Maithili Ghazal: The Anchinhar Aakhar Movement
PART 4
The Videha Movement and Contemporary Parallel Literature
PART 5
PART 6
PART 7
PART 8
PART 9
PART 10
Dalit Literary Criticism: Telugu, Gujarati, and Odia Dalit Literature in Maithili Translation
PART 11
PART 12
PART 13
PART 14
PART 15
Gangesa Upadhyaya
PART 16
PART 17
PART 18
PART 19
PART 20
The River Whisperer: Dinesh Kumar Mishra's Quest for Mithila's Soul
PART 21
PART 22
PART 23
PART 24
PART 25
PART 26
PART 27
PART 28
PART 29
PART 30
5.Maithili Literature in English Translation
5.1.Thirty-Two Teeth-Jagdish Prasad Mandal (Original Maithili Short Story) Rameshwar Prasad Mandal (English Translation) [Page 1031-1044]

१.१.अंक ४३७ पर टिप्पणी
विदेह ४३७ म अंक पर पाठकीय मन्तव्य
प्रणव कुमार झा
विदेहक होली उपाधि एकटा युनिक प्रयोग लागय अछि। एहि के द्वारा विदेह टीम समसामयिक मैथिली साहित्य, कला, मीडिया, सोशल मीडिया आदि से जुडल लोक के नै खाली एकत्रित कय सूची बनाबय छैथ अपितु लगन से हुनक आचार व्यवहार आ गतिविधि पर समझ बना के चुनि चुनि क एक से एक उपाधि गढ़य छथि। ऐ से पाठक सभक स्मृति पटल पर ई सभ लोक के चित्र एक संगे स्मरित होइत छैक आ संगहि मोन सेहो गुदगुदाबय छैक।

आशीष अनचिन्हार के मैथिली गजल के प्रति समर्पण बेजोड़ छैक, ओ खोजि-खोजि मैथिली गलज के पढय छथि आ ओहि पर अपन प्रतिक्रिया/आलोचना लिखय छथि। स्वाइत हिनका गजल-गोहि के उपाधि सेहो देल जाय छैन। हमरा ई आलोचना पढ़ि, बचपन मे पढल एकटा कोनो पत्रिका मोन पड़ि गेल जाहि मे अघोड़ी सभक कहानी छल, जाहि मे एकटा अघोड़ी के कथा छल जे जेकरा ककरो गरिया दै, कटु वचन कहय ओकर काज सुतरय लागय। हमारा लेखे एहन आलोचना से ओहु लेखक सभक लेखनी के धार बढईत हेतई।

प्रीति कुमारी अपन गामक फौजी उमाकांत के व्यक्तित्व के उजागर करैत मैथिल युवा के तौर पर जे विचार लिखलि अछि ओकर स्वागत अछि। हमरा लेखे सेहो अशिक्षा, कौशल आ उद्योग धंधा आ गुणवत्तापूर्ण सस्ता चिकित्सा व्यवस्था के कमी त मिथिला के आर्थिक सामाजिक विपन्नता के कारण छैके देखावटी आ पैछिमी सभ्यता केर होर सेहो पिछला एक-डेढ़ दसक मे मिथिला के आर्थिक आ सांस्कृतिक विपन्नता मे सहायक बनि रहल अछि। आ ऐ बात के कोनो मैथिल युवा अपन लेख मे कहि रहल अछि ई स्वागत योग्य अछि।
राम शंकर झा

मिथिला -मैथिली साहित्य कुम्भ
मणिकांत झा, दिल्ली

कहै लेल अनचिन्हार,मुदा सभक चिन्हार�

लक्ष्मण झा 'सागर'

आशिष अनचिन्हार- ककरो छोड़य वला जीव नै।

कल्पना झा, पटना

विदेह होली उपाधि - 2026क कारणेँ विदेहक सद्य: प्रकाशित अंक (437म) बेस रुचिकर लागल। हमरे टा नहि; सभ पाठक केँ लागल हेतनि।

होली उपाधिक अतिरिक्त आरो महत्वपूर्ण लेख, जोगीरा, हाइकू, वगैरह अभरल। हितनाथ झा जी द्वारा लिखल जा रहल सीरीज "तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक मैथिली साहित्यमे योगदान" तऽ जानिए कऽ पठनीय रहिते अछि।

प्रणव कुमार झाक किछु जोगीरा ध्यानाकृष्ट करबामे सफल रहल। नीक छनि सभ जोगीरा। एकटा जे हमरा बेसी नीक लागल, से अछि
युवा कहै
रोजगार नै,
मुदा मेहनत से राखय दूरी,
समय बितै रील मे
तखन शिकायत कोन मजबूरी?
कौशल सीखब छोड़ि कऽ सब, खोजै बस आराम
सूतल सूतल पाई बटोरी, एहने ताकय काम।
जोगिरा सा रा रा रा रा !

प्रणव कुमार झाक "रंगा सियार रिटर्न" सेहो पढ़लहुँ। नीक लागल।

प्रीति कुमारीक लिखल "फौजी उमाकान्त कामत : एक व्यक्तित्व" पढ़लहुँ। ठीके प्रीति कुमारीक रूप मे एकटा नीक लेखक भेटलनि अछि विदेह टीम के। जेना कि आशीष अनचिन्हार पुरना अंक (४३६म अंक) पर अपन प्रतिक्रिया दैत लिखलनि अछि, हमरा लोकनि केँ निश्चिते हिनकर लिखल आनो नीक नीक रचना सभ पढ़बा लेल भेटत। एहि युवा रचनाकार के स्वागत छनि हमरहु दिस सँ।

"किछु लीखि देलासँ, किछुओ लीखि देलासँ गजल नहि होइत छै" आशीष अनचिन्हारक लिखल ई लेख महत्वपूर्ण अछि। सभकेँ पढ़बाक चाही।

लालदेव कामत जीक लिखल पोथी समीक्षा एखन पूरा नहि पढ़लहुँ अछि। जतबा पढ़लहुँ, ताहि सँ ई बुझलहुँ, जे श्री राज किशोर मिश्रक नव मैथिली पोथी 'श्री मिथिला' संक्षिप्त इतिहास काव्य अछि।

ओवरऑल मे कही तऽ पठनीय अंक अछि।
कल्पना झा, बोकारो
बहुत नीक अंक,रचना सभ यथार्थ।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
गद्य
२.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२५
२.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१७
२.३.प्रणव कुमार झा-उजरका मुर्गा
२.४.मयंक कुमार झा- एआई युग मे मैथिली
२.५.प्रीति कुमारी-अशिक्षाक शिकार: केवट समाज (शोध आलेख)
२.६.गजेन्द्र ठाकुर- संरचनात्मक अस्थिरता आ अर्थक लीला: रमेशक मैथिली कथा-संग्रह 'कथा-समय' क एकटा आलोचना
२.७.लाल देव कामत- बदलैत जीवन एक पोथी
२.८.परमानन्द लाल कर्ण- बेटाक विवशता
२.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान -२५
कल्पना झा
उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' जीक परिवारक अन्य सदस्यक विवरण
'व्यास' जीक आँखिक पुतरी: विजया झा
'विदेश-भ्रमण' पोथीक पृष्ठ संख्या तीन पर विदेश-यात्रा लेल प्रस्थान कालक बड्ड मार्मिक चित्रण कएल गेल अछि 'व्यास' जी द्वारा। परिवारक लोक तँ सहजहि, शताधिक मित्रगण स्टेशन पर आबि नोराएल आँखिए कोना विदा कएने छलथिन, ताहि प्रसंगक चर्चा करैत एक पैराग्राफ लिखल गेल अछि लेखक द्वारा उक्त पोथी मे। ओहि 'पैराग्राफ'क अन्तिम तीन वाक्य हम अक्षरशः उद्धृत क' रहल छी। देखल जाउ - "हाथ ओ रूमाल हिलबैत लोक सभ विदाइ देलक- हमहूँ हाथ हिलबैत रहलहुँ जाबत धरि विद्युतक आलोक मे किछुओ अंश देखबा मे आएल। ...मन पड़ल कविगुरु
रवीन्द्रक कविता- 'जेते नाहि दिबो'- आ हमर अपन तीनि वर्षक चि. श्री विजया...ओकर मुह....छोट हिलैत हाथ। 'तबू जेते दिते हय, तबू चले जाय'। 21 सितम्बर 1958 क चारि बजे भोरुकबाक एहि मार्मिक दृश्यक चित्रांकन जाहि तरहेँ कएल गेल अछि, से पढ़ि हमहीं टा नहि सभ पढ़निहार लेखकक भावुक हृदय सँ सहजहि परिचित भ' जाएत।
साल 1954 मे ठीक विजया दशमी दिन जन्म भेल छलनि 'व्यास' जीक एकमात्र सुपुत्रीक। तैँ नाम राखल गेलनि विजया। 'व्यास' जी अपन धियाक व्यक्तित्व निर्माण मे कतहु कोनो कसरि नहि छोड़ने छलाह। पढ़ाइ-लिखाइ आ घरेलू लूड़ि-व्यवहारक संग बजाप्ता शास्त्रीय संगीतक शिक्षा सेहो दिआओल गेल छलनि विजया दाइ केँ। श्याम नारायण खवाड़े आ सीताराम झा हुनकर गुरु रहलथिन; जनिकर शिष्या रूप मे ओ संगीत सिखलनि। नीक गाबैत छलीह, गाबैत छथि एखनहु। हुनका मुहेँ पारम्परिक गीत तँ हमहूँ सुनने छी, विवाह, मूड़न, उपनएन, इत्यादिक अवसर पर।
"विदेश-भ्रमण" पोथी मे उद्धृत ओहि प्रसंगक विषय मे पढ़ैत हमरा स्मरण आएल अपन नानी 'फूल देवी'क मुहें सुनल एकटा वृत्तान्त। 'व्यास' जीक करेजक टुकड़ी विजया झा, घरक नाम 'मुन्नी' जखन सोलहम वर्ष पूर्ण क' सतरहम मे प्रवेश कएलीह; तखन बहुत जोर-सोर सँ हुनका लेल सुयोग्य 'वर' ताकल जाए लागल। ककरा हाथ मे देल जाए एहि सुकुमारि के; जे हुनके लोकनि जकाँ ओरिआ क' रखथिन हुनकर धिया के। कोना परखल जाए....भारी मोशकिल। एहन समय मे किंकर्तव्यविमूढ़ बला स्थिति रहैत छै प्रायः सभ पिताक। अन्ततः थाकि हारि क' सप्ता ग्रामक मूल निवासी, फारबिसगंज कॉलेजक प्रिंसिपल धनेश्वर झाक सुपुत्र डॉक्टर के. के. झा (eye specialist) संग संबंध तय क' एलाह। तय क' क' अँगना पहुँचितहि ओसारा पर राखल चौकी पर बैसि बहुते जोर सँ कानए लगलाह 'व्यास' जी। छोट हिलैत हाथ सँ पिता के विदाइ देनिहारि विजया दाइ केँ घर सँ विदा करबाक बेर जे आबए बला छलनि। किंवा एकटा पिताक हृदय आशंकित छल; जे हमर निर्णय सही सिद्ध होएत कि गलत। वास्तव मे ई निर्णय लेब कठिन तँ रहिते छै। आखिर पिता, जन्मदाते टा ने रहैत अछि। ओ भाग्यविधाता तँ नहिए ने भ' सकैए अपन संतानक।
विजया दाइ दू टा पुत्र आ दू टा पुत्रीक माए छथि। आब अपन चारू संतानक विवाह-दान क' क' निश्चिन्त भ' गेल छथि। हिनकर चारू संतान सुखमय गृहस्थ जीवन जीबि रहलाह अछि। दुर्भाग्यवश पतिक संग छूटि चुकल छनि, पन्द्रह वर्ष पहिनहि। धर्म-कर्मक संग जीवनक गाड़ी निरन्तर बढ़ि रहल छनि। अन्तिम सत्यो तँ इएह ने अछि- जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च...
संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-24
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
२.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१७
हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१७
हितनाथ झा
(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
'प्रभात'मे प्रकाशित काशीकान्त मिश्र 'मधुप', कांचीनाथ झा 'किरण' एवं अनेक रचनाकार लोकनिक विशेष सन्दर्भक मैथिली कविता पूर्वक खण्ड सभमे प्रकाशित भेल अछि। प्रभातक उपलब्ध अंकमे मैथिलीक कुल कविता 46 अछि। धारावाहिक रूपें सेहो किछु कविक रचना छनि, जाहिमे प्रमुख चपाहीक प. ब्रजमोहन ठाकुर 'मोहन' छथि आ सम्पादकक ज्येष्ठ भ्राता प. चन्द्रनाथ झाक सेहो। दुनू कविक अनुवाद सेहो छनि जे धारावाहिक रूपसँ प्रकाशित होइत छल। सभ अंक उपलब्ध नहि रहलाक कारण कविताक ओहि अंकक उपलब्ध नहि होयब खण्डित सन लगैछ, किन्तु जतबे उपलव्ध अछि, ओहो पाठकवृन्दक समक्ष प्रस्तुत करबाक प्रयास करब। कोइलखक अतिरिक्त अनेक गामक रचनाकार लोकनिक सहयोग बनल रहलनि, से प्रभातक महत्वपूर्ण उपलब्धि अछि। एहि अंकक जे कविलोकनि छथि ओ कोइलखक अतिरिक्त्त रानीटोल, मंगरौनी, मंगरपट्टी गामक छथि। ब्राह्मणक अतिरिक्त आनो वर्णक छथि। एहि खंडमे दस कविता अछि। अग्रिम खंडमे बांकी कविता आ कोशिश करब जे कवि लोकनिक अन्य अवदानक विषयमे चर्चा करी आ मैथिलीक प्रसिद्ध आलोचकक मंतव्य सेहो अंकित करी।

'प्रभात'मे प्रकाशित मैथिली कविता
माधव
रामचन्द्र झा, रानीटोल
आयल ऋतु वसन्त अव रे, नहि आयल कंत।
त्रिविध बयार लगैत तन रे, हो जीवक अन्त॥१॥
पिक गण सोर सुनीउ चहु रे, हिय फाटत मोर।
अव न सहब मदन सर रे, तन मन भेल भोला॥२॥
अलि सव लख घुमीउ घुमि रे, इच्छित कचनार।
मम अलि कतय भुलायल रे, तजि फल रतनार॥३॥
जौ नहि आजु मिलन हरि रे, होयत जिव कात।
रामचन्द्र धरू धैरज रे, अव ऐल " प्रभात "॥४॥
(प्रभात- अंक-४, १९३३ई.)

॥ श्री मिथिला माता ॥
श्री मदनानन्द झा, मंगरपट्टी।

जननी अहिंक चरण हम धयलहुँ।

अहिं जगतारिणि, भव-दुख हारनि।
ई बुझि चरण पकड़लहुँ।।
अहिं दुष्टनाशनि, क्रूर विनाशनि।
तैं हम अहिंकेँ मनौलहुँ।।
अहाँ मायामय, ओ करुणामय।
अहिंक शरण तैं भयलहुँ।।
'मदन' कहथि पुनि हे ! भव भालनि।
हमहुँ अहिंक पद गहलहुँ।।
(प्रभात- अंक-४, १९३३ ई.)

रुपैया वर्णन
श्री रूप नारायण चौधरी, कोइलख।

जयति-जयति ठन्न-ठन्न शब्दकारी।

तोला भर तुलित तोल,
सोलह आने सुमोल।
गौर गात गोल-गोल,
सुख मम मन हारी।। जयति।।

छाती छवि छपित आप,
किंग इम्परर छाप।
पृष्टभाग मूल्य छाप,
इस्वी सन धारी ।।जयति।।

तुमहि गुरु तात, मात,
नारी,नात, यार, भ्रात।
तुम बिन नहि बनत बात,
कहत सब नर- नारी।।जयति।।

(प्रभात : वर्ष-01, अंक-08 अगस्त-1933)
(साभार : प्रभात वर्ष 01 , अंक 10 ,अक्टूबर 1933 )

कोइलख ग्राम

श्री केदारमणि झा, मंगरौनी

देखू , धन्य कोइलख ग्राम !

भूमि सुन्दर सजल हरियर उर्वरा सभ ठाम !!

पाठशाला संस्कृतक अछि बीच गामक ठाम ।

दिव्य शिक्षा देथि गिरिजा दत्त शर्मा नाम ।।

स्कूल एम.ई. ,फ्री तहूपर पढ़ै सब बिन दाम ।

धन्य चन्द्रावती जगमे अमर जनिकर नाम ।।

एल . पी . इसकूल अछि अछि भव्य सेहो धाम ।

तेजनारायण गुरूजी उद्यमी अविराम ।।

पण्डितो छथि पास बी. ए. भले मानुष योग ।

तनिक की हम नाम भाखब ,छथि कतेक एहिठाम।।

(प्रभात'-अंक १०, १९३३ ई.)

विपरीत वाण
राम चन्द्र झा, रानीटोल।

आजु रैनि हम देखल सजनी गे,
रंग सुरंग अ ना रे ।
तिहि पर मन शुक मोहल सजनी गे,
यहि सम फल नहि आरे।।

कुमुद रंग स रंजित सजनी गे,
मुख पर शोभित गर ले ।
मलय पवन स वासित सजनी गे,
कोमल अति मृदु कमले।।

कर युग तापर लपकल सजनी गे,
लपकल चख दुहु ता रा।
किन्तु मुरछि पुनि फिरल सजनी गे,
लखि तिहि पर मनि आरा।।

'रामचन्द्र' सुनुअ सव सजनी गे,
छल कर करम अभागे।
भ्रम वश फल महि तोरल सजनी गे,
छल नहि मन अनुरागे।।

(नोट:- यदि यहि तरहक पद्यक रसास्वादन करबाक इच्छा हो तँ दरभंगा कन्हैयालालसँ हमर बनाओल तिरहुति गीत पुष्पांजली माँगि सकैत छी।)

(प्रभात-अंक-११,१९३३ ई.)

परमुण्डे फलाहारी
(श्री रामचन्द्र झा 'चन्द्र', रानीटोल

अपना नै चेत अछि, धूरो नै खेत अछि
पेटे महासेतु अछि त तकरा भरत की।
मन नै संतोष अछि, जीभ अति चोख अछि
बाजब सरोख अछि, त पैघत्वे करत की।।

वनैत अति दानी छी,होइत अभिमानी छी,
भीतरीक कृपाणी छी,त कहु निमहत की।
बड़ बड़ राज सव, दैत दैत थाकि गेल,
ताहि ठाम देहाती के ठकने चलत की ।।
(प्रभात- अंक १२,१९३३ ई.)

॥विरिहिनि विलाप॥
रामचन्द्र झा 'चन्द्र', रानीटोल।

की कहु सखि हम निज अपमाने !
सगर राति हम निन्द गमाओल,
राखल नहि मोर माने॥१॥

आनक कहल सुनै छथि प्रियतम,
हमर कहल लग तीते।
बुझैत छलहुँ हमरे ओ हैता,
पुरुषक नहि पर तीते॥२॥

आनक सुख आनक शुभ चरचा,
आनहि के अपनावथि।
हमर दुख कहियो ने बुझलनि,
पोछि न नोर सुखावथि॥३॥

यहि दुख स अव तजव नेह ई,
अव न रहव एहि गेहे।
जहिठा अपन केओ नहि सूझय,
तहि ठा कोन सनेहे।॥४॥

'रामचन्द्र' धैरज धरु विरिहिनि,
चित्त करू समधाने।
चतुर चित्त अपना के चिन्है,
अपन हैत नहि आने॥५॥

(प्रभात-अंक-१२, १९३३ई.)

उषा स्वप्न
श्री सूर्यनारायण वर्मा, रानीटोल।

अंतरिक्ष के छत पर मुग्धित, छला सुधाधर राजित।
सस्मित वदन हर्ष उत्फुल्लित, छला ताड़िका सज्जित।।
अर्ध निशा निस्तब्ध दिशा छल,सिक्त चन्द्रिका धरणी।
सिहकि-सिहकि वायु संचारथि, कामदेव तन रमणी।।


देखि कलाधर कुसमित कुमदिन, अपन छटा छहराबथि।
कोकी कोक विरह सँ आकुल, कुहकि कुहकि पिक बाजथि।।
पूर्ण समुज्ज्वल सिता यामिनी, लय मन मुग्ध कराबथि।
मन्मथ अपन शक्ति वसुधापर, अंतरिक्षसँ लाबथि।।


सोना सन कमनीय कान्ति तन, नव यौवन सुकुमारी।
रूप गर्विता भृकुटी कुटिला, वाणा सुरक कुमारी।।
सुतलि छली काम मद मातलि, अपना शयनागारे।
लंक चारि सन लय पर्यंको, सुखद निन्द विस्तारे।।


दुनू गोल कपोल दशे सँ, चिकुर फरक फहराबथि।
श्रेणी वद्ध गन्ध भृंग लय, जनु छत्ता निज साजथि।।
आबि झरोखे वदन विलोकिय, शशि स्वरूप निज भूले।
शीतल किरण सुधा सरसावैत, छला तनिक अनुकूले।।


शीतल मन्द समीर तनिक तन, परसि मनोज जगावथि।
अविवाहित तन गन्ध मधुर लय, मलय पवन प्रस्तारथि।।
सुखद निन्द मे मगन बालिका, स्वप्न देखलनि सुन्दर।
कामरूप कमनीय कान्तिमय, जनिक वादन छनि शशिकर।।


अरुण अधर इन्दीवर लोचन, उर बैजयन्ती माला।
तरुण वयस घनश्याम वदन इव परम् प्रिये जे वाला।।
श्री यदुनाथ कुमार वदन शशि, उषा सेज पर राजथि।
कुसुमायुध जनु अस्त्र साजि कय, कामिनि वदन सताबथि।।


मदन मोद काँ दुसह वेग कय, सहि सकली नहि वाला।
झट पट तन मन अर्पण कयलन्हि, शान्ति कर' लेल ज्वाला।।
हाव भाव मन दुनुक परस्पर, एक छलन्हि भय गेले।
अधर सुधा रस चाखय कारण, युवा प्रगट रुचि कैले।।


मदनातुर जे उषा नायिका, हुनक मनोरथ जानलि।
उदित उमंग प्रेम मे सरवरि, पूर्ति करब मन ठानलि।।
उभय परस्पर हाथ बढ़ोलनि, शशि सम्मुख शशि कैले।
किन्तु हाय तेहि अवसर मे झट, निन्द अधम टुटि गेले।।


चक्षु खोलि कय चहु दिशि ताकलि, अकचकाय से बाला।
किन्तु कतहु नहि पावलि प्रियतम, रोदन कैलि बेहाला।।
हे प्राणेश हृदय के वल्लभ, हमरा तजि कत गेलो।
प्राण तजब हम अही कष्टसँ,एहेन निठुर किय भेलो।।

(प्रभात-वर्ष-२, अंक- १, १९३४ ई.)

गोपी विलाप
श्री रामचन्द्र झा, रानीटोल।

आज चलू मम सदनम प्रिय हे !
श्याम सरोज तन पीत वसन धरि पाणिमहे पद चपलम।।

जखन मिलत हरि युग करकंजे, उर सौं मिलत उरोजम।
तखन सरस सस भीजत तनमन, जन्म बुझव शुभ सफलम।।

जँ नहि आजु चलव हरि संगे,सुचि न करव मम सयनम।
तजब मदन विरहाकुल तन हम, धरि मन तुअ पद कमलम।।

जेहि पद पदम् पराग परसि कै, पाहन भै बर वदनम।
'रामचन्द' ताही संग गोपी केलि चहत निज भवनम।।

प्रिय हे आजु चलू मम सदनम।।
(प्रभात-वर्ष-२, अंक-१,१९३४ ई.)

प्रार्थना
श्री जितेन्द्र मणि झा
(तारा संस्कृत विद्यालय, मंगरौनी)

तारा अहिंक कैल फेर ध्यान।
ग्राम जाहिमे नीति विद्या सँ पुनः करै अभिमान॥ तारा॥

ग्रामिक गण सभ नाम गान कय नित्य धरथि ई ध्यान।
अहिंक सुपद सँ संघ युवक मे राखथि लोलुप मान ॥ तारा ॥

जाहि मिथिला मे नाम विस्मृत छल भेल कतेक अपमान।
बहुत दिनन पर ओतय चलल छी जहाँ अचल अछि धाम ॥ तारा॥

दीन युवक सभ द्रव्य हीन भय साहस कय सुज्ञान।
छात्र ' जितेन्द्र' करुणामय सागर मूर्ति बनाबथि ताम ॥ तारा॥

(प्रभात-वर्ष-२,अंक-१, १९३४ ई.)
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-7
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-8
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-9
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-10
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-11
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-12
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-13
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-14
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-15
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-16
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
२.३.प्रणव कुमार झा-उजरका मुर्गा
प्रणव कुमार झा
उजरका मुर्गा
होलीक सीजन रहय। खस्सी-पाठा सभक बीच अनिश्चितता आ अफरा-तफरीक माहौल बनल छल। कतहु खस्सी त कतहु पाठाक संहार भऽ रहल छल। आब त पाठी-बकरी सेहो अछूत नै छल। ओतहि बगलक गोटैक देसी मुर्गाक टोलियो मे एहि आपातकाल पर चर्चा-परिचर्चा चलि रहल छल।
एहि कोलाहलक बीच, एकटा मुर्गा फार्मक बाड़ा लग फार्मक मालिकक दोस्त ठाढ़ भऽ उजरा मुर्गा सभ केँ संबोधित करैत कहलथिन - देखही रे! ओहि खस्सी-पाठी सभक हाल देखही, केहन त्राहि-त्राहि मचल छैक। केकर गर्दन कखय रेत देल जेतै, केकरो ठिकाना नै। आ तो सभ कतेक नीक जकाँ अपन बाड़ा मे निश्चिंत बैसल छही। समय पर दाना भेटि रहल छौ, शीतल पानि छौ, आ दुपहरिया मे सुखद निन्दो मारि रहल छहि। तोरा सभ केँ त अपन मालिकक गुण गाबय केँ चाही, जे तोरा सभ केँ एहन सुरक्षित जीवन देलथिन अछि।
ओतहि ठाढ़ दू-चारि टा पैकार सेहो हुनकर दही मे सही मिलाबैत बाजल - हँ भाय जी! एकदम टका गप्प कहलहुँ। देखियौ ने, एकरा सभ केँ फोकट मे माल खिया-पिया कऽ पोसल जा रहल छैक। ई सभ त एकर मालिकक रहमो-करम अछि जे ई सभ एतेक मौज मे अछि! एहि बीच दू टा पैकार के टेंपू पर मुर्गा लदा गेल छल, आ टेंपू शनैः शनैः आगा बढ़य लागल छल।
ओहि ठाम बगल मे महींस चरा रहल ललटूनमा के कान मे सेहो ई गप्प-सप्प जा रहल छल। ई सभ सुनि ओकरा मोन पड़ि गेल मास्टर साहेब के पढ़ाओल बात � देसी मुर्गा के देखने हेबहक रोज भोरे उठि बाङ्ग देतौ। अपना भड़ि खूब दिमाग लगेतौ । पकड़बहक त जल्दी हाथ नै एतौ। मुदा ई उजरका मुर्गा मस्त मजा मे रहतौ। किएकि एकरा सभ के एकटा विशेष प्रयोगशाला मे तैयार कैल गेल छैक। एकरा सभ के दिमाग के ऐ तरह से कुंद कऽ देल गेल छैक जे ई सभ साँस लेबऽ आ दाना खेबा भरिए के विकास बुझईत छैक। ओकरा ई पता नै छैक जे ई दाना ओकर सेवा लेल नै, बल्कि ओकर ओजन बढ़बै लेल देल जा रहल छैक। ओकर बुद्धि के एहि लेल हरि लेल गेल छैक जे ओकर मालिक के कारोबार मे बेसी परेशान नै करय आ ओकर ओजन जल्दी से जल्दी बढय।
-प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
२.४.मयंक कुमार झा- एआई युग मे मैथिली
मयंक कुमार झा
एआई युग मे मैथिली
गत वर्ष सन्तान प्राप्त भेल। जखन बालकक प्रथम स्वर बहरयाल , तखन ई भावना मोनमे भेल जे ई बालक जखन बाजय लगताह तऽ अपन मातृभाषा कतय सऽ सिखताह? हम आ हमर धर्म- पत्नी तऽ बेसी समय हिन्दीये, किन्तु कखनो किछु बेसी क्रोध वा प्रेम भेला पर अंग्रेजी वा हिंग्लिशक प्रयोग करैत छी। बालकक बाबा- बाबी सभ लगमे नहि रहैत छथिन तऽ बालक मातृभाषा कोना सीखत? हमसभ ताहि पर प्रवासी मैथिल, नेनाकेँ जे निकट भविष्यमे बन्धु- बान्धवी होएतन्हि से सभ मैथिलीभाषी होएताह तकरो संभावना शून्यप्राय:। ओना मिथिला क्षेत्रमे रहनिहार नव पीढ़ीक बालक- बालिका सभ कतेक मैथिली बाजत आ सीखत तकरो संभावना सेहो क्षीण बुझना जाइत अछि। एकटा जीवन्त भाषाक रूपमे मैथिलीक अस्तित्व संकटमे अछि से तऽ प्रत्यक्ष, किन्तु एकरा केना संरक्षित कयल जा सकैत अछि ताहि प्रश्नक उत्तरमे दू टा मूलमंत्र होबय जा रहल अछि- सोशल मीडिया आ एआई( AI)।यदि भाषाकेँ जीवित आ जीवन्त रखबाक अछि तऽ एहि दुनू क्षेत्रमे आन्दोलन आनय पड़त ।
सोशल मीडिया सँ तऽ आब सभ अवगत छैक आ कतेकोक लत्ते लागल छैक फेसबुक, इन्सटा, X ( पूर्वक ट्वीटर ,) यूट्यूबक आदि। ई नव- मीडियाक तकनीक अछि जे लोकसभकेँ आनलाइन एक दोसरसँ जोड़यमे आ विचार, विषय-वस्तुक आदान- प्रदान करबाक लेल प्लेटफार्म प्रदान करैत अछि। आधुनिक जीवनक सोशल मीडिया एक टा अभिन्न अंग भऽ चुकल अछि।
किन्तु (AI) अर्थात् कृत्रिम बुद्धिमता एकटा जटिल आ एखनहुँ बड़ द्रुत गतिसँ विकसित होइत क्षेत्र अछि। किएक तऽ लोकसभ एकरा नीक जकाँ नहि बुझैत अछि ताहि लेल एआई सम्बन्धित बहुत रास भ्रान्ति आ भय सेहो छैक लोकसभमे आ वस्तुत: एकर परिनति की होएत से एहि क्षेत्रक विशेषज्ञ लोकनि सेहो सटीक रूपें कहबामे असक्षम छथि। किन्तु भाषाक संरक्षणक काजमे एआई एकटा सशक्त आ सहायक उपकरण भऽ सकैत अछि से दृढ़ धारणा अछि। एतय ई स्पष्ट कहनाइ आवश्यक जे हम कोनो तरहसँ एआई सम्बन्धित विशेषज्ञ नहि छी आ नहि एहि विषयक कोनो डिग्री- डिप्लोमा अछि। तथापि जतेक सामान्यत: बूझल- जानल होइत अछि ताहि आधार पर एकटा मार्ग चित्र आँकबाक प्रयास करब। यद्यपि एआई केर परिभाषित केनाइ आ एकर विस्तृत विवरण देनाई एहि आलेखक परिधिसँ बाहर अछि, तइयो एकटा परिभाषा देनाइ अनिवार्य। एआई ( Artificial Intelligence ) अर्थात् कृत्रिम बुद्धिमता, कम्प्यूटर विज्ञान/ साफ्टवेयर अभियांत्रिकीक एक टा शाखा अछि जे कम्प्यूटरसँ मनुक्ख तुल्य बौद्धिक कार्य करेबाक प्रयास कर'बैत अछि । एकर बहुत रास प्रयोग छैक,इंटरनेट पर तकनाई, सोशल मीडिया आ विपणन वेवसाइट पर अनुशंसा केनाइ , स्वत: चालित वाहन चलेनाई आदि । एकर अतिरिक्त एआईक प्रयोग लेंगवेज माॅडल्स (language models) द्वारा लेखनी आ रचनात्मक,साहित्यिक आ कलात्मक कार्य लेल सेहो होइत अछि। सोशल मीडिया आ एआईक संयुक्त प्रयोगसँ बहुत एहन पदक्षेप लेल जा सकैछ जाहिसँ भाषाक मात्र संरक्षणे नहि अपितु विकास आ विस्तार सेहो कयल जा सकैत अछि।
डिजिटल कन्टेन्ट ( सामग्री ) युवा ,किशोर आ नेना सभमे सर्वाधिक लोकप्रिय अछि। लघु विडियो, रील्स, शाॅट्स आदि विधा मे रोचक विषय- वस्तु बननाई मैथिलीमे आरम्भ भऽ चुकल अछि। एआईक प्रयोगसँ एकरा आओर सरल, सुलभ बनाओल जा सकैत अछि। आन भाषाभाषी लोकनि लेल सब- टाइटल्स सेहो देल जा सकैछ।आन- आन भाषामे बनल लोकप्रिय सामग्री मैथिलीमे सहजतासँ अनुवाद कऽ एकरा मैथिल श्रोता, दर्शक सभक सम्मुख प्रस्तुत कयल जा सकैत अछि। एआई द्वारा नेना सभ लेल धार्मिक, लौकिक आ स्थानीय गीत, लोरी, खिस्सा- पिहानी आ रुचिगर कन्टेन्ट एनिमेशन सहित बनाय एकर प्रचार- प्रसार सोशल मीडिया द्वारा सहजहि कयल जा सकैत अछि। Maithili.ai नामक एक टा वेबसाइट अछियो जाहि पर मिथिला चित्रकला आधारित एआई कृत पौराणिक कथाक चित्रण उपलब्ध अछि। दुर्भाग्यवश एहिमे मैथिली भाषाक सामग्री उपलब्ध नहि अछि। उपरोक्त सकल कार्यकलाप एआईक सहायतासँ अत्यन्त सहज रूपेँ कयल जा सकैत अछि।
मैथिलीक लिखित प्रयोगमे सेहो ए०आईकेँ विशेष रूपसँ सम्मिलित करेबाक चाही। मैथिली भाषाक वर्तनी, व्याकरणक शुद्धिकरण एआई माध्यमसँ कयल जा सकैत अछि। हमरा एहि आलेख लिखबाक क्रममे बेस कठिनाई भेल, कारण की देवनागरीमे टाइप करबाक लूरि नहि अछि,तेँ प्रयास कयलहुँ जे रोमन मे लिखि ट्राँसलिटरेट ( transliterate) कयल जाय।किन्तु से सुविधा हिन्दी भाषा लेल उपलब्ध अछि किन्तु मैथिलीक लेल नहि। रोमनमे टाइप कयलासँ स्वत: हिन्दी शब्दकोषक शब्द सभ तऽ प्रकट भऽ जाइछ, किन्तु मैथिली शब्द, विशेष कऽ मैथिलीक जटिल क्रियापद सभ नहि अबैत अछि। मैथिलीमे एहन एआई 'टूल 'क आविष्कार अति शीघ्र होए तकर प्रतीक्षा । ओना एहि संदर्भमे CIIL मैसूर ( सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेज़ ) द्वारा बनायल टूल अनुलेखिका उल्लेखनीय अछि। एहि पर डिक्टेशन (Dictation) दय वा ध्वनि ( ऑडियो ) फाइल अपलोड कयलासँ लिखित शब्द स्वत: आबि जाइछ। संगहि आनो टूल्सक आवश्यकता अछि जे सहजतासँ आन भाषा सभसँ मैथिलीमे अनुवाद आ तकर उलट सेहो कऽ पाबय। एआईमे एकर उपाय बड़ सरल आ सहज अछि। सर्वम (Sarvam) एआई नामक एकटा भारतीय कंपनी छैक जे ई काजमे यथेष्ट दक्षता प्राप्त कऽ चुकल अछि। सर्वम द्वारा बनाओल बुलबुल ए०आई माॅडल, लिखित शब्दकेँ मौखिक शब्दमे स्वत: परिवर्तित कऽ दैत अछि ।संगहि एकर टूल्स सभ अनुवाद, लिखितसँ मौखिक, आ मौखिकसँ लिखितमे परिवर्त्तन करबाक सुविधा सेहो उपलब्ध कराबैत अछि। मैथिली भाषाक लेल एखन धरि सभटा सुविधा उपलब्ध नहि अछि, किन्तु आशा जे भविष्यमे शीघ्रहिं उपरोक्त सभटा प्रावधान मैथिली लेल सेहो उपलब्ध भऽ जायत।
मिथिलाक्षर/तिरहुता लिपि तऽ मृत्प्राय भऽ चुकल अछि। एआई किन्तु एकर पुनरुत्थानक एक टा प्रशस्त मार्ग भऽ सकैत अछि। ' चैट जीपीटी' तिरहुता लिपिक सपोर्ट करैत अछि यद्यपि एकर प्रयोगमे कनी अशुद्धि सेहो देखल गेल। यदि बेसी संख्यामे लोकसभ एकर प्रयोग करताह तऽ शुद्धता स्वत: बढ़ि जयबाक चाही। फीडबैक आ प्रशिक्षण सऽ चैट जीपीटी वा अन्य कोनो एआई माॅडलक शुद्धता बढ़ायल जा सकैत अछि। जन साधारणमे मिथिलाक्षरक प्रचार- प्रसार सोशल मिडीया द्वारा रचनात्मक तरीकासँ सेहो कयल जा सकैत अछि। एहन सोशल मीडिया हैण्डल बनायल जाय जाहि पर व्यवस्थित आ आकर्षक रूपसँ मिथिलाक्षरक शिक्षण होए।जखन नव पीढ़ीक युवक- युवती लोकनि ए०आईक माध्यमसँ विदेशी भाषा सभ सीख सकैत छथि तऽ हमरा विश्वास अछि जे निज मातृभाषाक मौलिक लिपि सिखबामे सेहो ओ लोकनि रुचि देखेताह।
सोशल मीडिया पर एकटा नव विधा बड़ लोकप्रिय भऽ रहल अछि- पाॅडकास्ट! एहिमे कोनो वक्ता, एकसरि वा दू या अधिक लोकसभ कोनो विषय पर चर्चा करैत छथि वा वक्तव्य दैत छथि। एहि विधाक आरंभ तऽ ऑडियो रूपमे भेल रहय किन्तु आइ काल्हि विडियो रूप बेसी लोकप्रिय भऽ चुकल अछि। पाॅडकास्टक माध्यमसँ विभिन्न विषयक विशेषज्ञ लोकनिकेँ बजा कऽ मैथिली भाषामे चर्चा कयल जा सकैछ- साहित्य, धर्म, समाजशास्त्र, विज्ञान, चिकित्सा, कृषि, संगीत, कला, राजनीति आदि। एकर विषय- वस्तुकेँ रोचक बनयबाक लेल एआई कृत, ऑडियो- विजुवल ( दृश्य- श्रव्य ) ,विषय- वस्तु सेहो जोड़ल जा सकैत अछि।
मैथिलीक साहित्यिक आ सामाजिक जीवनक एकटा पैघ विशिष्टता थिक- व्यंग्य।मैथिली भाषामे कहबी आ फकड़ा केर महत्वपूर्ण स्थान छैक। इएह आजुक सोशल मीडियामे ' ,मीम' क रूपेँ प्रचलित अछि। एआईक माध्यमसँ मैथिलीक फकड़ाकेँ सदृश्य, विडियो स्वरूप दऽ लोकप्रिय बनायल जा सकैत अछि। संगहि देशज,ठेंठ भाषामे नव- नव 'मीम' रचना कऽ लोक संस्कृति आ अनौपचारिक भाषाक प्रयोगकेँ आओर बेसी रुचिगर बनाओल जा सकैत अछि। एहन ' मीम' बनयबामे मिथिला चित्रकलाक भंगिमा के सेहो आनल जा सकैछ एआई द्वारा |
मैथिली साहित्यक इतिहास समृद्ध आ विविध अछि। दुर्भाग्यवश कतेको एहन पुरान ग्रन्थ वा हस्तलिखित पाण्डुलिपि होएत जे या तऽ अप्रकाशित रहि गेल अछि या सम्प्रतिमे प्रकाशित प्रति अनुपलब्ध भऽ गेल अछि। एहि विशाल भंडारकेँ डिजिटाइज कयनाइ अनिवार्य। एआई एहि सम्पूर्ण प्रक्रियामे बड़ सहायक भऽ सकैत अछि। एआई तकनीक द्वारा स्केन कयल गेल ग्रन्थ सभकेँ शुद्धतापूर्वक "टेक्स्ट" रूपमे परिवर्तित कयल जा सकैत अछि आ एकर डिजिटल अभिलेखागार (Archive )बनाओल जा सकैत अछि। एहन अभिलेखागार सार्वजनिक होएबाक चाही आ एहिसँ मैथिली भाषा आ मिथिला संबंधी अन्य विषय पर शोधकार्य करयमे सेहो बड़ सुविधा भऽ जायत।भाषीणी ए०आई सेल्यूशन्स नामक कंपनी एहि क्षेत्रमे काज कऽ रहल अछि। मैथिली शिक्षाक क्षेत्रमे सेहो ए०आईक महत्वपूर्ण योगदान भऽ सकैत अछि- विशेष कऽ नेना- भुटका आ अप्रवासी मैथिल सब लेल एआई प्रयोग कऽ पाठ्यक्रम वा लघु कोर्स प्रकल्पित कयल जा सकैत अछि। एआई चैटबाॅट या एआई कृत शिक्षक/ शिक्षिकाक प्रयोगसँ दक्षताक विभिन्न स्तर पर मैथिली भाषाकेँ सिखायल जा सकैत अछि।
मैथिली भाषामे वैज्ञानिक विषय- वस्तु पर आलेख लिखवामे एआई सहायक भऽ सकैत अछि। एतय ई कहनाइ आवश्यक जे एआई माॅडल सभ उपलब्ध डाटा पर आधारित भऽ प्रशिक्षित होइत अछि। अर्थात् जतेक बेसी मैथिलीमे विषय- वस्तु आ सामग्रीक रचना होएत एआई माॅडल सभ ओतबहि सटीक आ दक्ष होइत जायत। विकीपीडीया, जे आजुक दिनमे ऑनलाइन उपलब्ध आलेख सभक सभसँ पैघ भंडार अछि, ताहि पर मैथिली भाषामे योगदान देनाइ सेहो आवश्यक अछि।ऑनलाइन माध्यमसँ आ एआईक सहयोगसँ देशी भाषाक संग विभिन्न प्रकारक बोली केर नमूना सभकेँ रिकार्डिंग कय एआई माॅडलक प्रशिक्षण प्रदान कराबय पड़त।जतेक बेसी सामग्री आ डाटा उपलब्ध होएत एआई माॅडल सभ ओतबहि शुद्ध, सक्षम, आ दक्ष होएत। एहि परिकल्पनाकेँ यथार्थ पर आनय लेल मैथिलीमे डिजीटल आ एआईक क्रान्ति आनय पड़त। जतेको विश्वविद्यालय सभमे मैथिलीक पठन- पाठन होइत अछि ताहि सभमे एआई शोध केन्द्रक स्थापना करय पड़त। संगहि भाषा- शास्त्रमे शोध करय वला संस्थान सभकेँ सेहो महत्वपूर्ण भूमिका रहत। सरकार दिससँ एआई सम्बन्धित नीति सभ आ नव राष्ट्रीय शिक्षा नीतिमे मातृभाषाक प्रयोगकेँ लय सामनजस्य आ समन्वय बुझना जाइत अछि। सरकार आ विश्वविद्यालयक त्रंत्रक अतिरिक्त, गैर- सरकारी संस्था, एन०जी०ओ आ सामाजिक संस्थान सभकेँ सेहो योगदान देबय पड़तैक।
प्रवासी मैथिल लोकनि कतेको साफ्टवेयर इंजिनीयर सभ सफलतापूर्वक प्रौद्योगिकी क्षेत्रमे कुशलता संग योगदान दऽ रहल छथि। एहि सभमे कतेको रास मैथिली अनुरागी होयताह जिनकर योगदानसँ एक टा अनौपचारिक अपितु प्रभावशाली व्यवस्था बनाओल जा सकैत अछि। सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्रमे ओहुना बहुत रास महत्वपूर्ण परियोजना सभ विकेन्द्रीकृत ( Decentralized ) आ Crowd Sourced अर्थात् - सामुहिक आ एच्छिक प्रयाससँ पूर्ण कयल जा सकैत अछि। आशा अछि मैथिली भाषी लोकनि एहि प्रणालीक प्रयोग कुशलतापूर्वक करताह। नव- पीढ़ी मैथिली भाषाक अस्तित्वक मात्र रक्षे टा नहि करत अपितु एहि भाषाक जे- जे अधिकारसँ वंचित कय कऽ राखल गेल अछि तकर सभक सुदि जोड़ि भरपाई करैत एआईक प्रयोगसँ।
-मयंक कुमार झा, पिता- सत्येंद्र कुमार झा, निवास- बोरिंग रोड, पटना, ग्राम- बक्सी टोल, हरिपुर, मधुबनी; भारतीय पुलिस सेवा, असम मे कार्यरत
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
२.५.प्रीति कुमारी-अशिक्षाक शिकार: केवट समाज (शोध आलेख)
प्रीति कुमारी
अशिक्षाक शिकार: केवट समाज (शोध आलेख)

आधुनिक कालमे हरेक वर्ग आ जाति- उपजाति लेल प्रगतिक मूलमंत्र थीक शिक्षा। देश स्वाधिन होईत समय पुरुष वर्गके अपेक्षा नारी शक्तिमे साक्षरता दर बहुत कम छल। से अगुआएल समाजक स्त्रीगणमे लुअर प्राइमरी स्कूल स्तर धरि पढ़ाय हेबाक जोर पकड़ि लेने रहैक। मुदा पछुआएल समाजक लोक अपना बहिन- धी केँ इसकूल नहिं पठाबथि। एक दशक धरि १० प्रतिशत पुरूख अपर प्राइमरी आ ५ प्रतिशत पुरुष मध्य विद्यालय आ २ प्रतिशत पिछरल आ दलित समाजके छात्र मैट्रिक तक पहुँच सकल छलैथ। इयह कारण रहैक जे केवट समाज'क सर्वहारा लोक निरक्षर रहि गेल, शिबाए धनीक लोक अपना धीयापुताकेँ पढ़ा लिखा सकलाह। एहि समाजक अधिकतर लोक भूमिहीन किसानी श्रमिक बनल रहलैक। देहात क्षेत्रमे किछु गामक श्रीमन्त केवट केर स्वामित्वमे गुजर - बसर करय सँ अधिक जोतसीम खेत रहनि,जे कालान्तरमे निलामी युग रहलाक कारणेँ बंदोबस्त आ केवाला द्वारा अर्जित कयलासन्ता रकबामे जयदाद बढ़ोतरी भेलनि। बेर - बेर रौदी'क अकाल आ वाढ़िक दहार सँ टुट- पुजिया काश्तकार केर माली हालत बढ़ दयनीय स्थितिमे आबि गेलैक। धान,मरुआ सबैया - डौढ़ा सलाना पर ऋण लैत उपजाएल अन्न मालिक - महाजनके बेमाक करय पड़ैन। फेर जर्जर गरीबी पछारि दैन। बेसितर पुरुष बेगारि आ मौगि - मेहेर कुटाउन- पिसौन कय बाल बच्चा पोसथि। से छौरा - छौरी ढेरबा वयसधरि बकरी,गाय- महींस' क चरवाहि करैक। एखुनका मोदी युग जहांति अलेल अन्न- वस्त्रके सुविधा नहिं छलैक। तैयो खनदानी जनश्रुति मजगूत बनोने ईमानदारी सँ कष्टप्रद जीवन खेपि लैथि।
. पौराणिक काल सँ सप्तऋषि'क आधार पर गोत्र नामकरणमे काशयव ऋषिके वंशज सँ केवट कूलके - गोत्र रूपेँ मान्यता होइत आबि रहलैक अछि। चौधरी,सनवानी,तेलियागाथ आ कोलगाथ गोत्र मछुआरा समाजमे छैक। भारतवर्षमे ई एक आदिकालीन जाति निवास करैत आबि रहल छैक। एहि प्रसंग वर्णन प्रमाण रूपेँ शास्त्र - पुराणमे भेटैछ। हालमे ' दिव्य दृष्टि ' मैथिली पोथीमे संक्षिप्त रुपेँ एक पाठ सँ हम गुरू पूर्णिमा मादे पढल। जनतब पाबि आरो अधिक जानबाक पियास मोनमे हमरा जागल। उत्तर प्रदेश आ बिहार मे केवटकेँ राम सँ ,त्रिपुरामे शैव परंपरा सँ आओर असाममे वैष्णव संत शंकरदेव'क अनुयाई बतौल गेल छै। प्रसिद्ध नृवंश विज्ञानी रसेल आ हिरलाल सन् १९१६ मे भारतके केन्द्रीय पान्तके जनजातिय आ जातीमे विवरण लिखकेँ दर्शेने छैथ ई एक मिश्रित जाति छै,जकर संवन्ध आर्य सं नहिं छैक। एच एच रिजले १८९१ ई० मे बंगालक जाति आ जनजाति केँ रेखांकित करैत एकर रक्त संबंध आदिवासी सँ रहबाक तथ्य सुकारलनि अछि।
मागी नाव न केवट आना !
कहई तुम्हार मरमु मै जाना !!
चरण कमल रज कहुँ सबु कहई !
मानुष करनि मुरि कछु अहई !!
केवट शव्दक पहिल प्रयोग गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरित मानसके अयोध्या काण्डमे कयने छथि। उपरोक्त पाँति सँ ई बुझाइत छैक जे केवट कौम नाह चलाएके नदी,नाला कात बसल, बालू बूरूज पर बसि गंगा नदीक छीटपर कांकैर ,तारभूज आ सजमैन आन तरकारी खेती कय गुजर- बसर करय बाला मूलनिवासी थीक।
कालांतरमे केवट समाज के आठ कुरी बनि गेलैक जे दू धारामे कब्बडिक डांढ़ि जेकाँ एक भाग नोनीयां , निषाद,गोढ़ि ,सुरहिया, खुलवट आ तियर रहल ,से माछ मारैक हुनर अपनेलक। दोसर भाग केउट , कैवर्त, हलदार आ चाई रमैनी कहार कृषि काजकेँ अपनाबैत खेतिहर बनल। एहि मुख्य काजक अतिरिक्त समयानूकूल छिटपुट रूपेँ आनो लोकक पेशाके क्षणिक रूपें अपनाबैत मानवीय जीवन सुदृढ़ करयमे आगू बढ़लैक । सामाजिक वेव्यस्था अनूकूल कोनू -कोन राज्यमे भारतवर्षक केवट समुदाय केँ अनूसूचित जाति आओर अतिपिछड़ा जाति ; पिछरा वर्गमे राखल गेलैक। गोवा आ महाराष्ट्र राज्यमे कामथ उपनाम ब्राह्मण कहबैत छथि। केवटके उपनाम (टाईटल) कामैत,कामति, चौधरी, भंडारी, कापड़ी,कापड़, मड़र, मंडल, शर्मा,वर्मा, राय , प्रसाद, कुमार, व्यास, आनन्द, डरेडार, घीबहा,सगहा, गढ़बाईत, सिंह, पंडित, दास,महतो , विश्वास,कमती, केवट आ कामत आदि छिरियाएल बुझाईत छैक। दोसर दिस मल्लाह समाजमे सहनी, निषाद, मल्लाह आ मुखिया उपनामे संगठित होईत गजगज करैत। देखाईछ। ई समाज मुख्यतः भारत आ नेपाल देशमे अपन जातीयता आधार पर बेटी - रोटीके संबंध बनाय वियाह दान निमाहैत आबि रहल छैक। पंजाब ,चन्द्रिगढ, हरियाणा, लुधियाना, राजस्थान इत्यादि ठाम ई चौधरी कहाबैत छैक। छत्तीसगढ़मे निषाद,जलछत्री आ पार्कर कहाबैत छैक। आब एशियाके अतिरिक्त दोसरो महादेशमे पसरल केवट समाज अन्तर गोतरीय वियाहक समर्थनमे जुबक - जुवती अन्तर्जातीय प्रेम विवाह करैछ , सामाजिक माईन दियेबाक लेल यथेष्ट परियासमे रहैत अछि। एक सर्वेक्षण अनुसारे हालहिमे गामसँ पलायन करैत मिथिलांचल केर पर्वासी नगर- शहरमे स्थापित भेल छैक। आ अन्तर जातीय वियाहक व्यक्तिगत मान्यताकेँ बढ़ेबाक विकृतिके सामाजिक रेवाजमे बदलवाक लेल मूल निवास स्थल आबिकय सामाजिक प्रथा जेकां खाएन पीन, छेका - तिलक , फलदान, वरतुहारी आ मटकोर- कुमरन धरिक' गृहपूजाक आयोजन सम्पन्न करैत देखल जाईछ। एहि काजमे जातीय मान्यजन आ मुखपुरूख सेहो अपन प्रभाउ घटैत पबैत अछि। पहिलुकबा मानता अनुसारे वियाह,गैत श्राध आ सामाजिक ताना- बानाके विपरीत पेयलापर मैनजन देबान (छरीदार) दोखीकेँ जुरवानामे ग्रामीत/ सबहैति एकसंझू भतभोज लैत सुआक्षण देल करथि। बेसीतर केवट समाज अपना जातीय समगोत्रीय वियाहकेँ अदौ सँ मर्यादा निमाहैत गरिमापूर्ण व्यवस्थामे अछि। मिथिलाके बिहार प्रांतमे मधुबनी, दरभंगा , समस्तीपुर, सुपौल,सहरसा, मधेपुरा, बेगूसराय , मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी, शिवहर, अररीया, कटिहार, पूर्णिया आ भागलपुर जिलामे सघन आबादी छैक। बिहार जातीय गणनानुसार नऊ लाख ३७ हजार ८६१ कियोट आ दूई लाख ६५ हजार ९४३ लगधक कैवर्त मल्लाह समाजमे ३४,१०,०९३ आ विंद जाति १२,८५,३५८ केर आवादी'क उल्लेख कयल गेल छैक। नेपाल अधिराज्यके तराई क्षेत्रक जिला यथा- धनुषा, महोतरी, सिरसा,सप्तरी सर्लाही, सुनसरी आ मोरंगमे सघन रुपेँ निवास करैत छैक। एहूठाम कैवर्त अनुपातमे कम छैक। गर्वाईत केयट केर जातीय उपाधि मण्डल छैन। हुनका घरमे गौंसाई पित्तर नहिं होईछ, जहनकि कियोट केर घरमे हिन्दू पध्दति सँ चौदहो देवानक अराधना होईछ। मण्डलीकरणके दौरमे खतबे आ अमात तथा यादव एवं गंगौता समाजके टाईटिल सेहो मंडल छैक। राजपूत आ भूमिहार जातिक आवादी कम रहैत ऐ समाज सं राजनीतिक लाभमे बढ़ बेशी छैक।
देखल जाईछ एक शिशुक नामकरण सँ लऽ कऽ मुरन ,सतनारायणके पूजा, घर देखी, भुमिपूजन , घरवास, वियाह आ श्राध ओ बरखीमे ब्रह्मण पूरोहीत आ महापात्र सँ गरूड़ पुराण आ अनुष्ठान करेबाक चलैन आबि रहल छैक। किछु परिवारमे अपने सजातीय धर्माचार्य सँ पंडित बाला काज करेबाक नव चलैन सेहो स्थापित भेलैक अछि। मुदा कर्म काण्डके पोषक नमरदार लोकनि अपवादमे वैदिक रीति अपनेने छैक। अधिकतर लोक तै केँ जागरूक लोकक चलाकी बुझि मृत्यु भोज बाबत मिश्रित प्रतिक्रिया रखैत छै। समाज शास्त्र सँ कोनू सरोकार नहिं राखि शिक्षित समाज निर्माणमे वाधक छै। तेँ अनपढ़ के बीच प्रजातांत्रिक व्यवस्थामे मूरखक बोलबाला अछि।
- प्रीति कुमार,ी बी.ए., बीएड.
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
२.६.गजेन्द्र ठाकुर- संरचनात्मक अस्थिरता आ अर्थक लीला: रमेशक मैथिली कथा-संग्रह 'कथा-समय' क एकटा आलोचना
गजेन्द्र ठाकुर
संरचनात्मक अस्थिरता आ अर्थक लीला: रमेशक मैथिली कथा-संग्रह 'कथा-समय' क एकटा आलोचना
मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक विमर्श परंपरागत रूप सँ भावुक आंचलिकता आ यथार्थवादक बीच डोलैत रहल अछि, मुदा समकालीन समय मे पाठ (text) कें भाषाई आ वैचारिक द्वंद्वक रूप मे देखबाक आवश्यकता अछि। रमेशक कथा-संग्रह कथा-समय पर-जाहि मे समानान्तर (1997) आ समाङ (1991)क कथा-संग्रह समेकित अछि-जे परंपरा आ आधुनिकताक बीच खंडित मैथिल समाजक एकटा जटिल भाषा-मानचित्र प्रस्तुत करैत अछि । एहि कथा सभक विखंडन करब मात्र ओकर कथानक कें अलग-अलग करब नहि, बल्कि ओइ 'अपोरिया' (aporia) वा तार्किक गतिरोध कें ताकब अछि, जतय पाठ अपनहि संदेश कें अस्थिर करय लगैत अछि । कथा-समय क कथा सभक गहन विश्लेषण ई देखबैत अछि जे केना ई कथा सभ द्वैतवादी सोपान (binary hierarchies) कें भंग करैत अछि आ 'अनिर्णयता' (undecidability) क स्थिति कें उजागर करैत अछि ।
विखंडनवादक सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य आ मैथिली गद्य
विखंडनवाद ई मानैत अछि जे भाषा 'डिफरेंस' (differance) क एकटा प्रणाली अछि-देरिदाक अनुसार अर्थ कहियो स्थिर नहि रहैत अछि, ई हरदम एक शब्द सँ दोसर शब्द मे विस्थापित वा विलंबित (deferred) होइत रहैत अछि । मैथिली साहित्यक संदर्भ मे ई आर महत्वपूर्ण भ' जाइत अछि, कारण मैथिली भाषा स्वयं संस्कृत, हिंदी आ अंग्रेजीक संग एकटा निरंतर संवाद आ संघर्षक स्थिति मे रहैत अछि । आलोचकक लेल लक्ष्य पाठ मे 'शब्द-केंद्रवाद' (logocentrism) कें ताकब अछि-अर्थात ओइ मान्यता कें ताकब जे कोनो एकटा परम सत्य अछि-आ फेर ओकरा अस्थिर करब अछि ।
रमेशक कथा सभ उत्तर बिहार/दक्षिण-पूर्व नेपाल क सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता मे डूबल अछि, तैयो ई शहरी/ग्रामीण, राज्य/व्यक्ति, आ ज्ञान/वर्जना (Knowledge/Taboo) जेहन द्वैत सभक संग खेलैत अछि । विखंडक प्रयोग सँ ई पता चलैत अछि जे ई कथा सभ मात्र वास्तविकता कें 'प्रतिबिंबित' नहि करैत अछि, बल्कि अर्थक एकटा लीला (play of signifiers) मे शामिल अछि, जतय 'रक्षक' (राज्य, अभिभावक, शिक्षक) अक्सर 'भक्षक' वा 'आतंकवादी' सिद्ध होइत अछि ।
अवधारणा
विखंडनवादी परिभाषा
मैथिली गद्य मे प्रयोग
द्वैतवादी विरोध (Binary Opposition)
उपस्थिति/अनुपस्थिति जेहन जोड़ा।
गामक परंपरा आ शहरक निष्ठुरताक बीच तनाव।
अपोरिया (Aporia)
तार्किक गतिरोध वा आंतरिक अंतर्विरोध।
जखन विवाहक विधान ( ritual) जमीनक 'बलि' मे बदलि जाइत अछि।
चिह्न (Trace)
कोनो शब्दक प्राचीन अर्थक प्रभाव।
'पिलसिम' जेहन शब्द जकर पाछू सरकारी व्यवस्थाक विफलता अछि।
अनिर्णयता (Undecidability)
अंतिम अर्थ धरि नहि पहुँचबाक स्थिति।
कथाक अंत जतय जीत वा हारि कोनो अंतिम नहि होइत अछि।
'पलास्टी के खेलौना' क विखंडन
"पलास्टी के खेलौना" कथा संग्रहक एकटा महत्वपूर्ण कथा अछि, जे एकटा पिताक आदर्शवादी मानवतावाद आ टीवी/सिनेमाक माध्यम सँ आयल उपभोक्तावादी संस्कृतिक बीचक द्वंद्व कें देखबैत अछि । पिता एकटा उच्च संस्कृति कें श्रेष्ठ मानैत छथि-जतय पंडित रविशंकरक सितार कें बम्बइया फिल्म सँ ऊपर राखल गेल अछि ।
कला/हिंसाक द्वैत भंग
एहि सोपान क विखंडन तखन होइत अछि जखन पुत्र पप्पू 'सितार' (जे मानवता क प्रतीक अछि) कें अस्वीकार क' क' 'पेस्तौल' कें चुनैत अछि । पिताक तर्क अछि जे सितार (कला) हिंसा सँ श्रेष्ठ अछि। मुदा बच्चाक लेल पेस्तौल 'हिंसा' नहि बल्कि 'स्मार्टनेस' आ 'फुर्ती' अछि, जखन कि सितार ओकरा लेल 'जड़' हएब अछि । एहिना ई कथा 'नेनपनक निश्छल हएब/बिनु बुझने आक्रमण करब' क द्वैत कें भंग क' दैत अछि ।
राज्यक रक्षक/भक्षक रूप
कथाक एकटा मुख्य अपोरिया (aporia) तखन आबैत अछि जखन पिता अपन पत्नी कें कहैत छथि जे "सरकारी आतंकवादी" (पुलिस) आ "प्राइवेट आतंकवादी" (अपराधी) मे कोनो अंतर नहि अछि । ई वक्तव्य राज्यक ओइ रक्षक वाली छवि (logocentric claim) कें विखंडित क' दैत अछि । जँ 'पुलिस' आ 'अपराधी' कार्यात्मक रूप सँ एकहि अछि, त' सामाजिक व्यवस्थाक आधार अस्थिर अछि ।
'कनखी' मे उपस्थिति आ अनुपस्थिति
"कनखी" (The Side-Glance) कथा मे रमेश 1991 सँ 2019 धरि बिहारक बिजली संकट कें माध्यम सँ व्यवस्थाक विफलता कें देखबैत छथि ।
क्षणभंगुर आशा आ समयक चिह्न
प्रकाश (बिजली) आ अन्हार (लोड-शेडिंग) क द्वैत एहि कथाक केंद्र अछि । आधुनिक जीवन मे बिजली कें 'उपस्थिति' मानल गेल अछि, मुदा झा बाबूक जीवन मे 'अनुपस्थिति' सदिखन उपस्थित रहैत अछि । बिजलीक ओइ 'भुक-भुक' (blink) मे 1991 आ 2019 मे कोनो अंतर नहि अछि-समय बीति गेल, मुदा विफलताक चिह्न (trace) स्थिर अछि । जखन झा बाबू कें अन्हार मे रहितो सात सय क बिल भेटैत अछि, त' ओइ 'बिल' (signifier) क कोनो वास्तविक अर्थ (signified) नहि रहि जाइत अछि ।
'नरमेध' : त्यागक अर्थशास्त्र
"नरमेध" कथा दहेज प्रथाकेँ भयानक रूप कें देखबैत अछि, जतय संजूक विवाह लेल पुरखाक जमीन बेचल जाइत अछि ।
जमीन आ पूँजीक द्वैत
जमीन 'अन्नपूर्णा' अछि, मुदा पूँजी एकटा 'राक्षस' अछि । एतय दादीक 'बतहपन' आ माता-पिताक 'बुधियारी' क बीचक द्वैत कें विखंडित कयल गेल अछि। दादी बुझैत छथि जे जमीन बेचब आत्महत्या अछि, मुदा माता-पिता विवाहक 'पवित्रता' कें बचेबा लेल दादी कें सुइया द' क' शांत क' दैत छथि । जखन दादीक मृत्यु जमीन बेचबाक समय होइछ, त' 'विवाह/शोक' क द्वैत खतम भ' जाइत अछि। विवाहक 'सफलता' मृत्युक 'उपस्थिति' पर निर्भर भ' जाइत अछि ।
'दिनकर बाबू कें भ्रम भेल छलनि?' : परिवारक विखंडन
एहि कथा मे रमेश टीवी कें एकटा एहन माध्यमक रूप मे देखबैत छथि जे परिवार कें जोड़बाक बदला ओकरा खंडित क' दैत अछि । दिनकर बाबू समाचार (सत्य) कें महत्व दैत छथि, मुदा हुनकर बच्चा 'डिस्को संगीत' आ 'बलात्कारक दृश्य' मे रमल रहैत छथि । अंतिम दृश्य मे जखन दिनकर बाबू अपन बच्चा कें टीवी क हिंसाक नकल करैत देखैत छथि, त' ओ 'निश्छल' क विखंडन अछि ।
'नागदेस मे अयनाक व्यवसाय' : दर्पण आ यथार्थ
ई कथा एकटा रूपक (allegory) अछि, जतय 'नागदह' गामक लोक अपन भ्रष्टाचार कें धार्मिक मान्यता सँ जोड़ि क' सही मानैत छथि ।
दर्पण (mirror) विखंडनवादी स्थल अछि जतय 'स्व' (self) 'दोसर' (other) बनि जाइत अछि । व्यापारीक दर्पण गामक मिथक कें विखंडित क' दैत अछि-लोक जखन अइना देखैत अछि, त' ओकरा देवी नहि बल्कि साँप देखाबैत अछि । ई देरिदाक ओइ विचार कें पुष्ट करैत अछि जे भाषा सँ बाहर कोनो 'परम सत्य' नहि अछि, सब किछु मात्र एकटा प्रतिबिंब अछि ।
स्त्री देह आ 'दुधुआ'
"दुधुआ" कथा स्त्री देह कें मातृत्व आ सौंदर्यक द्वंद्व मे देखबैत अछि । कामिनीक पति ओकर देह कें मात्र कामुकताक वस्तु मानैत छथि आ ओकर दूध सुखेबाक लेल सुइया दियबैत छथि । विखंडनवादी दृष्टिकोण सँ, ई मातृत्वक 'चिह्न' कें मिटा देबाक प्रयास अछि। मुदा जखन कामिनी कें स्तन कैंसर होइछ, त' ओ 'अनुपस्थिति''उपस्थिति' (बीमारी) मे बदलि जाइत अछि ।
द्वैतवादी जोड़ा
श्रेष्ठ पद
गौण पद
विखंडनवादी उलटफेर
सौंदर्य / जीवविज्ञान
"हिरोइन" जेहन देह
दूध / ममता
दमन सँ कैंसर जेहन बीमारी आबय लगैत अछि।
पति / बच्चा
पति क इच्छा
माताक कर्तव्य
दुनू भूमिका स्त्री देह कें उपभोग करैत अछि।
स्वास्थ्य / छवि
बाहरी छवि
जैविक कार्य
'छवि' बचेबाक चक्कर मे 'स्वास्थ्य' खतम भ' जाइत अछि।
'ऑक्टोपस' : पर्यावरणीय अपोरिया
"ऑक्टोपस" कथा मे नेहा शहरी प्रदूषण कें एकटा राक्षसक रूप मे देखैत अछि । नेहाक शिक्षा (वनस्पति विज्ञान) ओकरा तबाही कें नाम देबाक क्षमता त' दैत अछि, मुदा ओकरा रोकबाक नहि । ई ज्ञानक एकटा अपोरिया अछि: जतेक ओ प्रकृति कें जानैत अछि, ततेक ओकरा ई अनुभव होइत अछि जे प्रकृति खतम भ' रहल अछि । उद्योग (Industry), जे विकासक प्रतीक अछि, ओही शहर कें मारि रहल अछि-ई 'विकास/विनाश' क सोपान कें विखंडित करय बला स्थिति अछि ।
'प्रवेश-निषेध' : मौन आ वर्जना
"प्रवेश-निषेध" कथा यौन शिक्षा पर समाजक 'चुप रहबाक' (silence) प्रवृति कें विखंडित करैछ । किशोर अपन विज्ञानक पोथी मे 'प्रजनन तंत्र' वाला अध्याय पढ़य चाहैत अछि, मुदा शिक्षक आ अभिभावक ओकरा 'गंदा' कहि क' टालि दैत छथि । ई कथा देखाबैत अछि जे 'मौन' रक्षक नहि बल्कि घातक अछि । किशोरक भउजीक मृत्यु प्रसव काल मे अज्ञानताक कारणे होइत अछि। किशोरक ई कहनाइ जे "अहाँक एम.ए. बेकार अछि," शिक्षा आ अज्ञानताक पारंपरिक द्वैत कें उलटि क' रखि दैत अछि ।
'ध्रुपद-धमार' : संगीत आ अभाव
ई कथा शास्त्रीय संगीतक शब्दावलीक प्रयोग सँ महगी आ राज्यक विफलता कें देखबैछ । पंडित टुनटुन मिसर सेवानिवृत्त शिक्षक छथि, जे 'पिलसिम' (पेंशन) पर आश्रित छथि। नोट पर गवर्नरक 'वचन' (promise) एतय एकटा डकढोल चेन्ह (hollow signifier) बनि गेल अछि, कारण महगी ओइ वचन कें मेटा देने अछि । जखन मंत्री 'कंप्यूटरीकरण' क बात करैत छथि आ टुनटुन मिसर 'किरासन' क, तखन 'आधुनिक/आदिम' क द्वैत खतम भ' जाइत अछि ।
'समाङ' क अन्य कथा सभक विखंडन
एक सेर चाउर: प्रतिष्ठा (Dignity) आ उत्तरजीविता (Survival) क द्वैत। माई अपन 'फूलक थाड़ी' (प्रतिष्ठा) कें 'चाउर' लेल बेचि दैत अछि। एतय मानवीय मूल्यक विखंडन अछि ।
सहानुभूति: रक्षक आ भक्षक क द्वैत। मुखियाजी सहानुभूति देखबैत स्त्री कें अपन बगैचा मे ल' जाइत छथि, मुदा ओ सहानुभूति वास्तव मे शोषणक एकटा आवरण (signifier) अछि ।
लुट्टीस-केस: कमला नदी पर बान्ह बनब 'सुरक्षा/विपत्ति' क द्वैत कें भंग करैत अछि। बान्ह सुरक्षा लेल नहि, बल्कि लूट लेल बनल अछि ।
अक्ष आ वृत्तचक्र: प्रेम आ अर्थशास्त्रक द्वंद्व। वैवाहिक वर्षगाँठ पर प्रेम नहि, उधारी आ बिल क हिसाब केंद्र (axis) बनि जाइत अछि ।
भाषाई अस्थिरता
रमेशक मैथिली गद्य मे अंग्रेजी आ हिंदीक शब्द मात्र आधुनिकताक प्रतीक नहि, बल्कि एकटा एहन संस्कृति क चिह्न (trace) अछि जे मैथिली कें विस्थापित क' रहल अछि ।
पिलसिम (Pension): शब्दक ई विरुपण संस्थागत भ्रष्टाचारक प्रतीक अछि।
मम्मी/ पापा बा माँ/बाबूजी: संबोधन मे बदलाव पारंपरिक पितृसत्तात्मक अधिकारक विखंडन कें देखबैत अछि ।
भुआ (Caterpillar): ई मात्र एकटा कीड़ा नहि, बल्कि पुरुष क कामुक नजरिक एकटा 'चिह्न' बनि जाइत अछि ।
निष्कर्ष: मिथिलाक अनिर्णित भविष्य
कथा-समय संग्रह कोनो समाधान (resolution) क संग नहि, बल्कि अनिर्णय (undecidability) क गहन भावक संग समाप्त होइत अछि। रमेश पारंपरिक अर्थमे "कथाक नैतिक शिक्षा" नहि दैत छथि; बदलामे ओ अपन पात्रसभकेँ अपोरियाक चौराहापर छोड़ि दैत छथि। नेहा अखनो धुंधमे अछि; दिनकर बाबू अखनो कुश्ती करैत बच्चासभकेँ ताकि रहल छथि; संजू अखनो अपन सोनक कीड़ा-बेड़ी पहिरने अछि।
विखंडनवादी दृष्टिकोणसँ देखल जाय तँ समाधानक ई अभाव पाठक सबसँ पैघ शक्ति थिक। ई मिथिलाक समस्याक कोनो "अतिक्रमणीय संकेतित"-कोनो अंतिम, सहज उत्तर-देबासँ इनकार करैत अछि। बदलामे ई पाठककेँ अर्थक "क्रीड़ा"मे संलग्न होबाक, नगरमे गाँवक "अनुरेख" आ अधिकारीमे साँपक "अनुरेख" देखबाक आमंत्रण दैत अछि।
रमेशक रचना सिद्ध करैत अछि जे "मैथिली-पथ" एकटा जटिल, अस्थिर आ गहनतासँ चिंतनशील भाषा थिक। राज्य, परिवार आ देहक द्विआधारीकेँ विखंडित कऽ, कथा-समय आधुनिक मैथिली पहचानक दरारि सभकेँ देखार करैत अछि। साहित्यिक आलोचकक लेल ई संग्रह मात्र कथासभक एकटा पोथी नहि, बल्कि एकटा "मचान" थिक जे समाजक निर्माणमे "छिद्र"सभकेँ प्रकट करैत अछि-ओ स्थान सभ जतए सत्य आ असत्य, रक्षक आ शिकारी, तथा जीवन आ मृत्यु सदिखन एकमे एक गाँथल रहैत अछि। कथा-समय एहि बातक निश्चायक प्रमाण बनि कए ठाढ़ अछि जे मैथिली साहित्य "उपस्थितिक तत्त्वमीमांसा"सँ आगाँ बढ़ि उत्तर-संरचनावादी यथार्थक चुनौतीपूर्ण, बहुआयामी संसारमे प्रवेश कए लेलक अछि।
सन्दर्भ:
1.Deconstruction - Literary Theory and Criticism, accessed on March 11, 2026, https://literariness.org/2016/03/22/deconstruction/
2.Deconstruction: A Cornucopia of Esoteric Meanings - International Journal of English Literature and Social Sciences (IJELS), accessed on March 11, 2026, https://ijels.com/upload_document/issue_files/46-IJELS-APR-2019-14-Deconstruction.pdf
3.Deconstructionism in Literature | Definition & Examples - Lesson - Study.com, accessed on March 11, 2026, https://study.com/academy/lesson/deconstructionism-in-literature-definition-examples-quiz.html

Suggested citation: Gajendra Thakur. “A Parallel History of Mithila & Maithili Literature.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 438, 2026-03-15. https://www.videha.co.in/research/2026/438/a-parallel-history-of-mithila-maithili-literature.htm

मूल विदेह अंक / Original issue