विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

संरचनात्मक अस्थिरता आ अर्थक लीला: रमेशक मैथिली कथा-संग्रह 'कथा-समय' क एकटा आलोचना

गजेन्द्र ठाकुर · 2026-03-15 · अंक 438 · पृष्ठ 37–49

मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक विमर्श परंपरागत रूप सँ भावुक आंचलिकता आ यथार्थवादक बीच डोलैत रहल अछि, मुदा समकालीन समय मे पाठ (text) कें भाषाई आ वैचारिक द्वंद्वक रूप मे देखबाक आवश्यकता अछि। रमेशक कथा-संग्रह कथा-समय पर-जाहि मे समानान्तर (1997) आ समाङ (1991)क कथा-संग्रह समेकित अछि-जे परंपरा आ आधुनिकताक बीच खंडित मैथिल समाजक एकटा जटिल भाषा-मानचित्र प्रस्तुत करैत अछि । एहि कथा सभक विखंडन करब मात्र ओकर कथानक कें अलग-अलग करब नहि, बल्कि ओइ 'अपोरिया' (aporia) वा तार्किक गतिरोध कें ताकब अछि, जतय पाठ अपनहि संदेश कें अस्थिर करय लगैत अछि । कथा-समय क कथा सभक गहन विश्लेषण ई देखबैत अछि जे केना ई कथा सभ द्वैतवादी सोपान (binary hierarchies) कें भंग करैत अछि आ 'अनिर्णयता' (undecidability) क स्थिति कें उजागर करैत अछि ।
विखंडनवादक सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य आ मैथिली गद्य
विखंडनवाद ई मानैत अछि जे भाषा 'डिफरेंस' (differance) क एकटा प्रणाली अछि-देरिदाक अनुसार अर्थ कहियो स्थिर नहि रहैत अछि, ई हरदम एक शब्द सँ दोसर शब्द मे विस्थापित वा विलंबित (deferred) होइत रहैत अछि । मैथिली साहित्यक संदर्भ मे ई आर महत्वपूर्ण भ' जाइत अछि, कारण मैथिली भाषा स्वयं संस्कृत, हिंदी आ अंग्रेजीक संग एकटा निरंतर संवाद आ संघर्षक स्थिति मे रहैत अछि । आलोचकक लेल लक्ष्य पाठ मे 'शब्द-केंद्रवाद' (logocentrism) कें ताकब अछि-अर्थात ओइ मान्यता कें ताकब जे कोनो एकटा परम सत्य अछि-आ फेर ओकरा अस्थिर करब अछि ।
रमेशक कथा सभ उत्तर बिहार/दक्षिण-पूर्व नेपाल क सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता मे डूबल अछि, तैयो ई शहरी/ग्रामीण, राज्य/व्यक्ति, आ ज्ञान/वर्जना (Knowledge/Taboo) जेहन द्वैत सभक संग खेलैत अछि । विखंडक प्रयोग सँ ई पता चलैत अछि जे ई कथा सभ मात्र वास्तविकता कें 'प्रतिबिंबित' नहि करैत अछि, बल्कि अर्थक एकटा लीला (play of signifiers) मे शामिल अछि, जतय 'रक्षक' (राज्य, अभिभावक, शिक्षक) अक्सर 'भक्षक' वा 'आतंकवादी' सिद्ध होइत अछि ।
अवधारणा
विखंडनवादी परिभाषा
मैथिली गद्य मे प्रयोग
द्वैतवादी विरोध (Binary Opposition)
उपस्थिति/अनुपस्थिति जेहन जोड़ा।
गामक परंपरा आ शहरक निष्ठुरताक बीच तनाव।
अपोरिया (Aporia)
तार्किक गतिरोध वा आंतरिक अंतर्विरोध।
जखन विवाहक विधान ( ritual) जमीनक 'बलि' मे बदलि जाइत अछि।
चिह्न (Trace)
कोनो शब्दक प्राचीन अर्थक प्रभाव।
'पिलसिम' जेहन शब्द जकर पाछू सरकारी व्यवस्थाक विफलता अछि।
अनिर्णयता (Undecidability)
अंतिम अर्थ धरि नहि पहुँचबाक स्थिति।
कथाक अंत जतय जीत वा हारि कोनो अंतिम नहि होइत अछि।
'पलास्टी के खेलौना' क विखंडन
"पलास्टी के खेलौना" कथा संग्रहक एकटा महत्वपूर्ण कथा अछि, जे एकटा पिताक आदर्शवादी मानवतावाद आ टीवी/सिनेमाक माध्यम सँ आयल उपभोक्तावादी संस्कृतिक बीचक द्वंद्व कें देखबैत अछि । पिता एकटा उच्च संस्कृति कें श्रेष्ठ मानैत छथि-जतय पंडित रविशंकरक सितार कें बम्बइया फिल्म सँ ऊपर राखल गेल अछि ।
कला/हिंसाक द्वैत भंग
एहि सोपान क विखंडन तखन होइत अछि जखन पुत्र पप्पू 'सितार' (जे मानवता क प्रतीक अछि) कें अस्वीकार क' क' 'पेस्तौल' कें चुनैत अछि । पिताक तर्क अछि जे सितार (कला) हिंसा सँ श्रेष्ठ अछि। मुदा बच्चाक लेल पेस्तौल 'हिंसा' नहि बल्कि 'स्मार्टनेस' आ 'फुर्ती' अछि, जखन कि सितार ओकरा लेल 'जड़' हएब अछि । एहिना ई कथा 'नेनपनक निश्छल हएब/बिनु बुझने आक्रमण करब' क द्वैत कें भंग क' दैत अछि ।
राज्यक रक्षक/भक्षक रूप
कथाक एकटा मुख्य अपोरिया (aporia) तखन आबैत अछि जखन पिता अपन पत्नी कें कहैत छथि जे "सरकारी आतंकवादी" (पुलिस) आ "प्राइवेट आतंकवादी" (अपराधी) मे कोनो अंतर नहि अछि । ई वक्तव्य राज्यक ओइ रक्षक वाली छवि (logocentric claim) कें विखंडित क' दैत अछि । जँ 'पुलिस' आ 'अपराधी' कार्यात्मक रूप सँ एकहि अछि, त' सामाजिक व्यवस्थाक आधार अस्थिर अछि ।
'कनखी' मे उपस्थिति आ अनुपस्थिति
"कनखी" (The Side-Glance) कथा मे रमेश 1991 सँ 2019 धरि बिहारक बिजली संकट कें माध्यम सँ व्यवस्थाक विफलता कें देखबैत छथि ।
क्षणभंगुर आशा आ समयक चिह्न
प्रकाश (बिजली) आ अन्हार (लोड-शेडिंग) क द्वैत एहि कथाक केंद्र अछि । आधुनिक जीवन मे बिजली कें 'उपस्थिति' मानल गेल अछि, मुदा झा बाबूक जीवन मे 'अनुपस्थिति' सदिखन उपस्थित रहैत अछि । बिजलीक ओइ 'भुक-भुक' (blink) मे 1991 आ 2019 मे कोनो अंतर नहि अछि-समय बीति गेल, मुदा विफलताक चिह्न (trace) स्थिर अछि । जखन झा बाबू कें अन्हार मे रहितो सात सय क बिल भेटैत अछि, त' ओइ 'बिल' (signifier) क कोनो वास्तविक अर्थ (signified) नहि रहि जाइत अछि ।
'नरमेध' : त्यागक अर्थशास्त्र
"नरमेध" कथा दहेज प्रथाकेँ भयानक रूप कें देखबैत अछि, जतय संजूक विवाह लेल पुरखाक जमीन बेचल जाइत अछि ।
जमीन आ पूँजीक द्वैत
जमीन 'अन्नपूर्णा' अछि, मुदा पूँजी एकटा 'राक्षस' अछि । एतय दादीक 'बतहपन' आ माता-पिताक 'बुधियारी' क बीचक द्वैत कें विखंडित कयल गेल अछि। दादी बुझैत छथि जे जमीन बेचब आत्महत्या अछि, मुदा माता-पिता विवाहक 'पवित्रता' कें बचेबा लेल दादी कें सुइया द' क' शांत क' दैत छथि । जखन दादीक मृत्यु जमीन बेचबाक समय होइछ, त' 'विवाह/शोक' क द्वैत खतम भ' जाइत अछि। विवाहक 'सफलता' मृत्युक 'उपस्थिति' पर निर्भर भ' जाइत अछि ।
'दिनकर बाबू कें भ्रम भेल छलनि?' : परिवारक विखंडन
एहि कथा मे रमेश टीवी कें एकटा एहन माध्यमक रूप मे देखबैत छथि जे परिवार कें जोड़बाक बदला ओकरा खंडित क' दैत अछि । दिनकर बाबू समाचार (सत्य) कें महत्व दैत छथि, मुदा हुनकर बच्चा 'डिस्को संगीत' आ 'बलात्कारक दृश्य' मे रमल रहैत छथि । अंतिम दृश्य मे जखन दिनकर बाबू अपन बच्चा कें टीवी क हिंसाक नकल करैत देखैत छथि, त' ओ 'निश्छल' क विखंडन अछि ।
'नागदेस मे अयनाक व्यवसाय' : दर्पण आ यथार्थ
ई कथा एकटा रूपक (allegory) अछि, जतय 'नागदह' गामक लोक अपन भ्रष्टाचार कें धार्मिक मान्यता सँ जोड़ि क' सही मानैत छथि ।
दर्पण (mirror) विखंडनवादी स्थल अछि जतय 'स्व' (self) 'दोसर' (other) बनि जाइत अछि । व्यापारीक दर्पण गामक मिथक कें विखंडित क' दैत अछि-लोक जखन अइना देखैत अछि, त' ओकरा देवी नहि बल्कि साँप देखाबैत अछि । ई देरिदाक ओइ विचार कें पुष्ट करैत अछि जे भाषा सँ बाहर कोनो 'परम सत्य' नहि अछि, सब किछु मात्र एकटा प्रतिबिंब अछि ।
स्त्री देह आ 'दुधुआ'
"दुधुआ" कथा स्त्री देह कें मातृत्व आ सौंदर्यक द्वंद्व मे देखबैत अछि । कामिनीक पति ओकर देह कें मात्र कामुकताक वस्तु मानैत छथि आ ओकर दूध सुखेबाक लेल सुइया दियबैत छथि । विखंडनवादी दृष्टिकोण सँ, ई मातृत्वक 'चिह्न' कें मिटा देबाक प्रयास अछि। मुदा जखन कामिनी कें स्तन कैंसर होइछ, त' ओ 'अनुपस्थिति''उपस्थिति' (बीमारी) मे बदलि जाइत अछि ।
द्वैतवादी जोड़ा
श्रेष्ठ पद
गौण पद
विखंडनवादी उलटफेर
सौंदर्य / जीवविज्ञान
"हिरोइन" जेहन देह
दूध / ममता
दमन सँ कैंसर जेहन बीमारी आबय लगैत अछि।
पति / बच्चा
पति क इच्छा
माताक कर्तव्य
दुनू भूमिका स्त्री देह कें उपभोग करैत अछि।
स्वास्थ्य / छवि
बाहरी छवि
जैविक कार्य
'छवि' बचेबाक चक्कर मे 'स्वास्थ्य' खतम भ' जाइत अछि।
'ऑक्टोपस' : पर्यावरणीय अपोरिया
"ऑक्टोपस" कथा मे नेहा शहरी प्रदूषण कें एकटा राक्षसक रूप मे देखैत अछि । नेहाक शिक्षा (वनस्पति विज्ञान) ओकरा तबाही कें नाम देबाक क्षमता त' दैत अछि, मुदा ओकरा रोकबाक नहि । ई ज्ञानक एकटा अपोरिया अछि: जतेक ओ प्रकृति कें जानैत अछि, ततेक ओकरा ई अनुभव होइत अछि जे प्रकृति खतम भ' रहल अछि । उद्योग (Industry), जे विकासक प्रतीक अछि, ओही शहर कें मारि रहल अछि-ई 'विकास/विनाश' क सोपान कें विखंडित करय बला स्थिति अछि ।
'प्रवेश-निषेध' : मौन आ वर्जना
"प्रवेश-निषेध" कथा यौन शिक्षा पर समाजक 'चुप रहबाक' (silence) प्रवृति कें विखंडित करैछ । किशोर अपन विज्ञानक पोथी मे 'प्रजनन तंत्र' वाला अध्याय पढ़य चाहैत अछि, मुदा शिक्षक आ अभिभावक ओकरा 'गंदा' कहि क' टालि दैत छथि । ई कथा देखाबैत अछि जे 'मौन' रक्षक नहि बल्कि घातक अछि । किशोरक भउजीक मृत्यु प्रसव काल मे अज्ञानताक कारणे होइत अछि। किशोरक ई कहनाइ जे "अहाँक एम.ए. बेकार अछि," शिक्षा आ अज्ञानताक पारंपरिक द्वैत कें उलटि क' रखि दैत अछि ।
'ध्रुपद-धमार' : संगीत आ अभाव
ई कथा शास्त्रीय संगीतक शब्दावलीक प्रयोग सँ महगी आ राज्यक विफलता कें देखबैछ । पंडित टुनटुन मिसर सेवानिवृत्त शिक्षक छथि, जे 'पिलसिम' (पेंशन) पर आश्रित छथि। नोट पर गवर्नरक 'वचन' (promise) एतय एकटा डकढोल चेन्ह (hollow signifier) बनि गेल अछि, कारण महगी ओइ वचन कें मेटा देने अछि । जखन मंत्री 'कंप्यूटरीकरण' क बात करैत छथि आ टुनटुन मिसर 'किरासन' क, तखन 'आधुनिक/आदिम' क द्वैत खतम भ' जाइत अछि ।
'समाङ' क अन्य कथा सभक विखंडन
एक सेर चाउर: प्रतिष्ठा (Dignity) आ उत्तरजीविता (Survival) क द्वैत। माई अपन 'फूलक थाड़ी' (प्रतिष्ठा) कें 'चाउर' लेल बेचि दैत अछि। एतय मानवीय मूल्यक विखंडन अछि ।
सहानुभूति: रक्षक आ भक्षक क द्वैत। मुखियाजी सहानुभूति देखबैत स्त्री कें अपन बगैचा मे ल' जाइत छथि, मुदा ओ सहानुभूति वास्तव मे शोषणक एकटा आवरण (signifier) अछि ।
लुट्टीस-केस: कमला नदी पर बान्ह बनब 'सुरक्षा/विपत्ति' क द्वैत कें भंग करैत अछि। बान्ह सुरक्षा लेल नहि, बल्कि लूट लेल बनल अछि ।
अक्ष आ वृत्तचक्र: प्रेम आ अर्थशास्त्रक द्वंद्व। वैवाहिक वर्षगाँठ पर प्रेम नहि, उधारी आ बिल क हिसाब केंद्र (axis) बनि जाइत अछि ।
भाषाई अस्थिरता
रमेशक मैथिली गद्य मे अंग्रेजी आ हिंदीक शब्द मात्र आधुनिकताक प्रतीक नहि, बल्कि एकटा एहन संस्कृति क चिह्न (trace) अछि जे मैथिली कें विस्थापित क' रहल अछि ।
पिलसिम (Pension): शब्दक ई विरुपण संस्थागत भ्रष्टाचारक प्रतीक अछि।
मम्मी/ पापा बा माँ/बाबूजी: संबोधन मे बदलाव पारंपरिक पितृसत्तात्मक अधिकारक विखंडन कें देखबैत अछि ।
भुआ (Caterpillar): ई मात्र एकटा कीड़ा नहि, बल्कि पुरुष क कामुक नजरिक एकटा 'चिह्न' बनि जाइत अछि ।
निष्कर्ष: मिथिलाक अनिर्णित भविष्य
कथा-समय संग्रह कोनो समाधान (resolution) क संग नहि, बल्कि अनिर्णय (undecidability) क गहन भावक संग समाप्त होइत अछि। रमेश पारंपरिक अर्थमे "कथाक नैतिक शिक्षा" नहि दैत छथि; बदलामे ओ अपन पात्रसभकेँ अपोरियाक चौराहापर छोड़ि दैत छथि। नेहा अखनो धुंधमे अछि; दिनकर बाबू अखनो कुश्ती करैत बच्चासभकेँ ताकि रहल छथि; संजू अखनो अपन सोनक कीड़ा-बेड़ी पहिरने अछि।
विखंडनवादी दृष्टिकोणसँ देखल जाय तँ समाधानक ई अभाव पाठक सबसँ पैघ शक्ति थिक। ई मिथिलाक समस्याक कोनो "अतिक्रमणीय संकेतित"-कोनो अंतिम, सहज उत्तर-देबासँ इनकार करैत अछि। बदलामे ई पाठककेँ अर्थक "क्रीड़ा"मे संलग्न होबाक, नगरमे गाँवक "अनुरेख" आ अधिकारीमे साँपक "अनुरेख" देखबाक आमंत्रण दैत अछि।
रमेशक रचना सिद्ध करैत अछि जे "मैथिली-पथ" एकटा जटिल, अस्थिर आ गहनतासँ चिंतनशील भाषा थिक। राज्य, परिवार आ देहक द्विआधारीकेँ विखंडित कऽ, कथा-समय आधुनिक मैथिली पहचानक दरारि सभकेँ देखार करैत अछि। साहित्यिक आलोचकक लेल ई संग्रह मात्र कथासभक एकटा पोथी नहि, बल्कि एकटा "मचान" थिक जे समाजक निर्माणमे "छिद्र"सभकेँ प्रकट करैत अछि-ओ स्थान सभ जतए सत्य आ असत्य, रक्षक आ शिकारी, तथा जीवन आ मृत्यु सदिखन एकमे एक गाँथल रहैत अछि। कथा-समय एहि बातक निश्चायक प्रमाण बनि कए ठाढ़ अछि जे मैथिली साहित्य "उपस्थितिक तत्त्वमीमांसा"सँ आगाँ बढ़ि उत्तर-संरचनावादी यथार्थक चुनौतीपूर्ण, बहुआयामी संसारमे प्रवेश कए लेलक अछि।
सन्दर्भ:
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19.हिंदी आलोचना: विकास, प्रमुख विधाएँ और आधुनिक साहित्यिक दृष्टियाँ - Testbook, accessed on March 11, 2026, https://testbook.com/ugc-net-hindi/alochana

Suggested citation: गजेन्द्र ठाकुर. “संरचनात्मक अस्थिरता आ अर्थक लीला: रमेशक मैथिली कथा-संग्रह 'कथा-समय' क एकटा आलोचना.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 438, pp. 37–49, 2026-03-15. https://www.videha.co.in/research/2026/438/संरचनात्मक-अस्थिरता-आ-अर्थक-लीला-रमेशक-मैथिली-कथा-संग्रह-कथ-3c59cedb5d.htm

मूल विदेह अंक / Original issue