अतिथि शिक्षक
सर्व नारायण सिंह राम कुमार सिंह महाविद्यालय, सहरसा (बिहार)
मो.: 9931654742
परिचय
श्री राम विलास साहु समकालीन मैथिली साहित्यक एहन रचनाकार छैथ, जिनकर साहित्यिक उपस्थिति प्रतिबद्धता, सक्रियता आ निरन्तर सृजनशीलतासँ चिह्नित होइत अछि। हुनकर जन्म 01 जनवरी 1957 ई. केँ मधुबनी जिलाक लक्ष्मीनियाँ गाममे भेल। हुनकर माता स्वर्गीय कैली देवी आ पिता स्वर्गीय नशीव लाल साहु रहला। जीवन-संगिनी स्वर्गीय मंजूला देवी छेली, जिनकर सहचर्य हुनकर रचनात्मक जीवनमे प्रेरणादायी आ महत्त्वपूर्ण स्थान रखैत अछि। प्रारम्भिक आ उच्च शिक्षा पूरा केलाक बाद ओ निर्मली महाविद्यालय, निर्मलीसँ स्नातक उपाधि प्राप्त केलैन, जे आब हरि प्रसाद साह महाविद्यालय नामसँ जानल जाइत अछि। व्यावसायिक जीवनक शुरुआत ओ हंसवाहिनी निकेतन स्कूलमे अध्यापन कार्यसँ केलैन। शिक्षण क्षेत्रमे अर्जित अनुभव, अनुशासन आ नेतृत्व क्षमता आधारपर ओ ज्ञान भारती पब्लिक स्कूल, निर्मलीमे प्राचार्य पदक दायित्व सम्हारलैन, जतए लगभग चौदह वर्ष धरि पूर्ण निष्ठा आ समर्पणसँ सेवा देलैन। शिक्षणक व्यस्त जीवनक बीच साहित्य-साधनाक प्रति हुनकर अनुराग निरन्तर बनल रहल। वर्तमानमे ओ कृषि कार्यसँ जुड़ल रहैत गामक जीवन-धारासँ अपन आत्मीय सम्बन्ध अक्षुण्ण रखने छैथ।
सन् 2008 इस्वीसँ ओ नियमित रूपेँ साहित्य-लेखनमे सक्रिय भेला आ थोड़े समयमे पद्य आ गद्य दुनू क्षेत्रमे अपन विशिष्ट पहचान बनौलैन। मैथिली साहित्यकेँ हुनका द्वारा अनेक महत्त्वपूर्ण पोथीसभ भेटल अछि। हुनकर मैथिली पद्य-संग्रहमे रथक चक्का उलैट चलए बाट 2013, कोसीक कछेर 2017, गामक सुख 2018 आ मनक मैल 2018 विशेष रूपेँ उल्लेखनीय अछि। कथा-साहित्य क्षेत्रमे अंकुर 2016, दुधबेचनी 2018 आ अंशुमान 2021 प्रकाशित भेल अछि। खण्डकाव्य रूपमे नेत्रदान 2022 हुनकर रचनात्मक क्षमता केर सशक्त उदाहरण अछि। हिन्दीमे सेहो हुनकर काव्य-सर्जना प्रकाशित भेल अछि, जाहिमे ‘खुला आसमां धरती की गोद में’ 2023 इस्वीमे प्रकाशित काव्य-संग्रह रूपेँ महत्त्वपूर्ण अछि। ऐ सभक अतिरिक्त ‘आगिये आगि’ शीर्षक कविता-संग्रह प्रकाशनक प्रतीक्षामे अछि।
साहित्यिक सक्रियताक संग ओ प्रगतिशील लेखक संघ, मधुबनी, बिहार केर उपाध्यक्ष पदपर कार्यरत छैथ। हुनकर साहित्यिक योगदान लेल हुनका नरेन्द्र सम्मान 2018, लेखकीय सम्मान 2018 आ सृजनरत्न सम्मान 2019 प्रदान कएल गेल अछि।
श्री राम विलास साहु अपन रचनासभमे ग्रामीण परिवेश, सामाजिक सरोकार, नैतिक मूल्य आ मानवीय चेतनाक स्वर सजीव रूपेँ प्रस्तुत करैत छैथ। हुनकर लेखन मैथिली समाजक अनुभव संसारसँ अनुप्राणित अछि आ समकालीन साहित्यमे अपन विशिष्ट पहचान स्थापित कएने अछि।
हुनकर स्थायी निवास मधुबनी जिलाक ग्राम लक्ष्मीनियाँमे अवस्थित अछि। प्रशासनिक दृष्टिसँ ई ग्राम पोस्ट छजना, भाया नरहिया, थाना लौकही अंतर्गत आबैत अछि। ई स्थानिक परिवेश ग्रामीण मिथिलाक पारम्परिक जीवन-धारासँ जुड़ल अछि, जेतए ओ आइयो अपन सांस्कृतिक जड़िसँ सम्बद्ध रहैत सक्रिय सामाजिक उपस्थिति बनौने छैथ।
राम विलास साहु एहेन व्यक्तित्व छैथ जे लगभग 2010 इस्वीसँ ‘सगर राति दीप जरय’ संग निरन्तर रूपेँ संलग्न रहल छैथ। ऐ मंचसँ हुनकर जुड़ाव मात्र औपचारिक उपस्थिति भरि नहि रहल अछि, बल्कि सक्रिय सहभागितापर आधारित अछि। ई निरन्तरता दीर्घकालसँ बनल रहल अछि। एहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे हुनकर जीवन-दृष्टि क्षणिक प्रेरणासँ प्रभावित नहि होइत छैथ। असलमे ओ भीतरसँ उपजल सांस्कृतिक निष्ठासँ संचालित होइत छैथ। हुनक ऐ निष्ठामे स्थिरता अछि, गाम्भीर्य अछि, आ दीर्घ साधनाक संकेत निहित अछि। ‘सगर राति दीप जरय’ कथागोष्ठीक प्रति हुनकर सरोकार व्यवहारिक रूपेँ स्पष्ट प्रकट होइत अछि।
ओ नाममात्रक लेखक नहि छैथ। कथापाठ, विमर्श, आयोजन-सहयोग आ आत्मीय उत्तरदायित्व आदि सभ स्तरपर हुनकर उपस्थिति अनुभव कएल जा सकैत अछि। मंचक अनुशासन आ लोकतांत्रिक भावनाक ओ सम्मानपूर्वक निर्वाह करैत छैथ। ऐ सक्रियतासँ हुनकर व्यक्तित्वक एक सशक्त आयाम उभरि कऽ सामने अबैत अछि।
एहि सँ ईहो सिद्ध होइत अछि जे हुनका लेल अर्थात् श्री राम विलास साहुक विचार, वचन आ कर्म परस्पर पृथक् खण्ड नहि छैथ, बल्कि जीवन-व्यवहारमे परस्पर सम्बद्ध तत्त्व अछि। जे मूल्य ओ अभिव्यक्त करैत छैथ, ताहिकेँ व्यवहारमे उतारबाक सजगता सेहो रखैत छैथ। ऐ प्रकारेँ हुनकर व्यक्तित्व मात्र वक्तव्यपर आधारित नहि; वरण आचरणसँ प्रमाणित होइत अछि।
मैथिली साहित्य-जगतमे ई मान्यता स्थापित अछि जे ‘सगर राति दीप जरय’ जकाँ मुक्त आ सतत मंचक स्थायित्व प्रतिबद्ध व्यक्तित्वसभपर निर्भर करैत अछि। राम विलास साहुजीक नियमित उपस्थिति ऐ प्रतिबद्धताक विश्वसनीय प्रमाण अछि। ऐ आधारपर स्पष्ट होइत अछि जे हुनकर भूमिका लेखन-क्षेत्र धरि सीमित नहि अछि। ओ सांस्कृतिक आ सामाजिक गतिविधिसभमे सक्रिय रूपेँ जुड़ल रहैत छैथ। ई हुनकर उपस्थिति निष्ठा आ विश्वसनीयतासँ चिह्नित होइत अछि। ऐ कारण ओ मात्र सहभागी नहि, बल्कि प्रेरक शक्ति रूपेँ देखबामे अबैत छैथ।
‘रथक चक्का उलैट चलए बाट’ श्री राम विलास साहुक पहिल काव्य-संग्रह अछि, जाहिमे कविता, गीत, हाइकू, शेनर्यू आ टनका जकाँ विविध काव्य-रूप समाविष्ट अछि। ई कृति ग्राम्य जीवन, सामाजिक यथार्थ, प्रकृति-संवेदना आ मानवीय मूल्यक समेकित अभिव्यक्ति रूपेँ स्थापित अछि। एकर प्रथम संस्करण 2013 इस्वीमे प्रकाशित भेल छल आ द्वितीय संस्करण 2024 इस्वीमे पुनर्प्रकाशित भेल अछि, जे एकर स्थायित्व आ पाठकीय स्वीकृतिकेँ सूचित करैत अछि।
संग्रहक काव्य-विस्तार व्यापक अछि। ‘महगाइ’, ‘बेरोजगारी’, ‘भ्रष्टाचारी’, ‘खेतिहरक जिनगी’, ‘बलानक बाढ़ि’ आदिमे समकालीन समाजक आर्थिक असंतुलन, प्रशासनिक विडम्बना, कृषक-जीवनक संघर्ष आ प्राकृतिक आपदाक मार्मिक चित्र प्रस्तुत अछि- “महगाइ अहाँ केतएसँ आ किए एलौं/आकि जबरदस्ती हमरा देशमे घुसि एलौं/अहाँ विदेशमे भलहिं छेलौं/के अहाँकेँ बजेलक आकि भूलसँ एलौं/अहाँ अबिते हमरा देशमे आगि लगेलौं”
कवि श्रम, अभाव आ जीवन-संघर्षक यथार्थ चित्रण करैत समाज-चिन्तनक सशक्त धरातल निर्मित करैत छैथ।
प्रकृति-चित्रण ऐ संग्रहक प्रमुख विशेषता अछि। “रामविलास साहुजी चैतावर गबै/लिखै छैथ, बिरहा सुनै छैथ, धनरोपनीपर आ किसानीपर कविता कहै छैथ। आ ऐ सभ विषयपर हिनकर कविताक जोड़ा भेटब कठिन अछि। ई सभ विषय मैथिली कविताकें विस्तार देलक अछि, आ ओइपर लिखबाक सामर्थ्य रामविलास साहुजीमे छन्हि, ओकर भीतरमे ताकिकऽ लिखबाक सामर्थ्य रामविलास साहुजीमे छन्हि।” ‘पियासल धरती’, ‘धनरोपनी’, ‘बेंगक बरियाती’, ‘चैताबर गीत’, ‘चैती गीत’ आदिमे ऋतु-चक्र, वर्षा-प्रतीक्षा, कृषि-कर्म आ जीव-जगतक सामूहिक स्पन्दन जीवन्त रूपेँ अभिव्यक्त अछि। प्रकृति कवि लेल प्रेरणा-स्रोत आ संवेदनात्मक सहचर रूपेँ उपस्थित अछि।
दार्शनिक आ आध्यात्मिक चेतना सेहो संग्रहमे सक्रिय अछि। ‘ज्ञानक दीप’, ‘हराएल भगवान’, ‘चिन्ता-चिता’, ‘कर्मक फल’ आदिमे जीवन-मूल्य, कर्म-प्रधानता, आत्मावलोकन आ नैतिक अनुशासनपर बल दैत गम्भीर चिन्तन प्रस्तुत कएल गेल अछि। कवि बाह्य आडम्बरक अपेक्षा अन्तर्मनक प्रकाशपर अधिक आग्रह रखैत छैथ।
नारी-जीवन आ पारिवारिक संरचनाक चित्रण सेहो उल्लेखनीय अछि। ‘गामक नारी’, ‘प्रेमक बान्ह’, ‘केकरा संग खेलब होरी’ जकाँ रचनामे स्त्री-मनक प्रतीक्षा, श्रम-सहभागिता, सांस्कृतिक भूमिका आ भाव-गहनता स्पष्ट रूपेँ प्रकट अछि। ग्रामीण समाजक संरचनामे नारीक सक्रिय उपस्थिति संग्रहक संवेदनात्मक आयामकेँ विस्तृत करैत अछि।
भाषा-शैली सरल, लोकाभिमुख आ भावप्रधान अछि। ग्राम्य शब्दावली, कृषि-सम्बद्ध बिम्ब, लोक-जीवनक संकेत आ संवादात्मक प्रवाह रचनाक प्रामाणिकता सुदृढ़ करैत अछि। लघु-विधा जकाँ हाइकू आ टनकामे कवि अल्प शब्दमे सार्थक भाव-संप्रेषण करबाक क्षमता प्रदर्शित करैत छैथ, जे मैथिली काव्य-परिदृश्यमे विशेष रूपेँ ध्यान आकर्षित करैत अछि।
‘अंकुर’ श्री राम विलास साहुक लघुकथा-संग्रह अछि, जाहिमे 22 गोट कथा संग्रहीत अछि। कथा-सूची अनुसार ‘डोमक आगि’ सँ प्रारम्भ भऽ ‘बेंगक महंथी’ धरि रचनाक विस्तार समाजक विविध स्तर, मनोवृत्ति आ संरचनात्मक यथार्थकेँ उद्घाटित करैत अछि। संग्रहक प्रकाशन-विवरण आ कथा-क्रमसँ स्पष्ट होइत अछि जे ई कृति सुविचारित संपादन आ संयोजनक परिणाम अछि।
‘डोमक आगि’ सामाजिक विषमता आ जातिगत संरचनाक कठोर यथार्थ सामने आनैत अछि। मृत्यु जकाँ सार्वभौमिक प्रसंगमे सेहो भेदभावक उपस्थिति कथाकेँ मार्मिक बना दैत अछि। ‘स्वर्गक सुख’ श्रम, संतोष आ जीवन-संघर्षक सन्दर्भमे वास्तविक सुखक अर्थ उद्घाटित करैत अछि। ‘स्कूलक खिचड़ी’ आ ‘इमानदारीक पाठ’ शिक्षा-व्यवस्था, शासकीय योजना आ नैतिक शिक्षणक व्यवहारिक अन्तरालपर संकेत करैत अछि।
‘चोर-सिपाही’, ‘घूसहा घर’, ‘केते उचित’ आ ‘इज्जतक सवाल’ कथासभ सामाजिक-राजनीतिक विसंगति, भ्रष्टाचार आ मूल्य-ह्रासक प्रश्न उपस्थित करैत अछि- “घुसहा घरमे घुसल रहै छी/ने जीबै छी आ ने मरै छी/टुकुर-टुकुर तकैत रहै छी/केतेक कहब गामक दोख/बेवस्थाकेँ नहि भेल अखैन धरि होश”
लेखक व्यवस्था-तंत्रक आलोचनात्मक अवलोकन करैत सामान्य जनजीवनपर पड़ैत प्रभावकेँ उभारैत छैथ। ‘बौआ बाजल’ आ ‘बाल बोध’ बाल-मनोविज्ञान, पारिवारिक परिवेश आ आरम्भिक सामाजिक शिक्षाक प्रसंगकेँ सरलतासँ प्रस्तुत करैत अछि।
जातिगत चेतना आ सामाजिक विभाजन संग्रहक एक प्रमुख विषय अछि। ‘जातिक भोज’, ‘जाति’, ‘छुतहर’ आ ‘हहौती’ कथासभ रूढ़ मानसिकता, सामाजिक दूरी आ मानवीय गरिमाक प्रश्नपर गम्भीर विमर्श प्रस्तुत करैत अछि। लेखक जाति-आधारित व्यवहारक आलोचना करैत समतामूलक दृष्टिकोण अपनबैत छैथ।
‘गंगा नहाएब’, ‘बिलाइ रास्ता कटलक’ आ ‘अबिसवास’ जकाँ कथासभ लोकविश्वास, अन्धमान्यता आ मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तिपर विचार करैत अछि। कथासभ व्यवहारिक विवेक आ सामाजिक चेतना जागृत करबाक संकेत दैत अछि। ‘बुजुर्गक दुख के हरत?’ वृद्धावस्थाक उपेक्षा आ पारिवारिक दायित्वक संवेदनशील चित्र प्रस्तुत करैत अछि। ‘मोंछक लड़ाइ’ सामाजिक प्रतिष्ठा आ अहंकारक विडम्बनापूर्ण रूपपर व्यंग्यात्मक दृष्टि दैत अछि। ‘ई छी हमर मजबुरी’ परिस्थितिजन्य विवशताक मानवीय विश्लेषण करैत अछि।
अन्तिम कथा ‘बेंगक महंथी’ प्रतीकात्मक संरचना माध्यमे नेतृत्व, समूह-मनोवृत्ति आ सामाजिक आचरणपर विचारोत्तेजक संकेत दैत अछि। संग्रहक शिल्प लघु आकारक होइतहुँ कथ्य गम्भीर अछि। भाषा सहज, लोक-संस्पर्शी आ संवादप्रधान अछि। ग्रामीण परिवेश, दैनन्दिन प्रसंग आ व्यवहारिक स्थिति कथा-विश्वकेँ विश्वसनीय बनबैत अछि।
‘कोसीक कछेर’ श्री राम विलास साहुक काव्य-संग्रह अछि, जाहिमे बहुसंख्य कविता संकलित अछि। ‘कोसीक कछेर’ सँ आरम्भ भऽ ‘बटैया खेती’ धरि शीर्षक-क्रम स्वयं संकेत करैत अछि जे संग्रहक भाव-विस्तार प्रकृति, किसान-जीवन, मिथिला-चेतना, सामाजिक विसंगति, राष्ट्रीय अस्मिता, मानवीय द्वन्द्व आ आध्यात्मिक मनन धरि पसरल अछि।
प्रारम्भिक कवितासभ जकाँ ‘कोसीक कछेर’, ‘रौदी’, ‘मेघक बरियाती’, ‘पुसक राति’, ‘नदी’, ‘नदीक धारा’, ‘धधकैत धरती’ आदिमे प्रकृतिक प्रकोप, ऋतु-चक्र, बाढ़ि, सुखाड़ आ धरती-जीवनक संघर्षपूर्ण यथार्थ सजीव रूपेँ उपस्थित अछि। कोसी अंचलक भूगोल आ मानवीय त्रासदी कवि-चेतनामे स्थायी संवेदना रूपेँ विद्यमान अछि।
किसान-जीवन संग्रहक केन्द्रवर्ती विषय अछि। ‘सुखल खेत आ भूखल पेट’, ‘किसानक दुख’, ‘किसान’, ‘खेतीक काज’, ‘बटैया खेती’, ‘धन जुआनी बाढ़िक पानि’ जकाँ कवितामे कृषक-वर्गक आर्थिक असुरक्षा, प्राकृतिक निर्भरता आ श्रम-संघर्षक तीक्ष्ण चित्रण भेटैत अछि। कवि श्रमक गरिमा स्थापित करैत व्यवस्था-दोषक आलोचनात्मक विवेचन सेहो करैत छैथ।
मिथिला-अस्मिता आ सांस्कृतिक गौरव संग्रहक प्रमुख आयाम अछि। ‘मिथिलाक पियास’, ‘मिथिलाक लाल’, ‘मिथिलाक अपमान’, ‘मिथिलाक गुमान’, ‘मिथिला महान पावन धाम’, ‘केहेन मिथिला’ जकाँ शीर्षक मिथिला-भूमिक प्रति अनुराग, वेदना आ आत्मगौरव दुनू भाव एक संग उद्घाटित करैत अछि। ऐ माध्यमे भाषा, संस्कृति आ पहिचानक प्रश्न सेहो उभरैत अछि।
राष्ट्रीय चेतना आ सामाजिक आलोचना सेहो संग्रहक सशक्त धरातल अछि। ‘केना कहब भारत महान’, ‘भारतक शान’, ‘लोकतंत्रक खून’, ‘जागु इंसान’, ‘अग्निपथ’, ‘ई केकर दोख’, ‘जे डरल से मरल’, ‘दोष निर्दोष’ आदिमे राजनीतिक विसंगति, सामाजिक असमानता आ नैतिक पतनपर स्पष्ट टिप्पणी भेटैत अछि- “किए हमरा दइ छी दोख/अहाँ सभकेँ नै अछि होश/अहाँक देशमे होइए बड़-बड़ घोटाला”
व्यक्तिगत अनुभूति आ मनोवैज्ञानिक संवेदना सेहो सशक्त रूपेँ व्यक्त भेल अछि। ‘मनक आगि’, ‘मनक पियास’, ‘दिलक दरद’, ‘प्रीत वियोग’, ‘जरल तकदीर’, ‘चंचल मन’, ‘नीन टुटि गेल’, ‘अनमोल जिनगी’, ‘जीवन पथ’, ‘मोह माया’, ‘स्वर्गक खोज’ जकाँ कवितामे आन्तरिक संघर्ष, प्रेम-विरह, जीवन-दर्शन आ अस्तित्व-चिन्तन अभिव्यक्त अछि।
ऋतु-सौन्दर्य आ लोक-रस संग्रहक भाव-सम्पदाकेँ समृद्ध करैत अछि- “मनक पियाससँ करेज जरैए/पिया बिनु मन तरसैए हे/वसन्त बनल अछि चित्तचोर जखन/केकरापर करब शृंगार हे”
संगहि हिनक ‘वसन्त वहारक गीत’, ‘ऋतुराज वसन्त’, ‘सौन भादो’, ‘फागुक रंग’, ‘मधुरस’, ‘माघक जाड़’ जकाँ कवितासभ लोक-संस्कृति, ऋतु-परिवर्तन आ उत्सवधर्मी जीवन-लयकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि।
भाषा लोकाभिमुख, सहज आ प्रवाहमय अछि। शीर्षक-विविधतासँ स्पष्ट होइत अछि जे कवि समाजक बहुआयामी स्थितिसँ सतत संवाद स्थापित करैत छैथ। कथ्य-गम्भीरता आ भाव-स्वच्छता संग्रहक प्रमुख विशेषता अछि।
‘दुधबेचनी’ श्री रामविलास साहुक लघुकथा-संग्रह अछि, जाहिमे कुल 12 लघुकथा संग्रहीत अछि। ‘गामक गाछी’ सँ प्रारम्भ भऽ ‘ई केकर दोख’ धरि कथा-क्रम ग्रामीण समाजक बदलैत संरचना, आर्थिक संक्रमण, अंधविश्वास, स्त्री-संघर्ष, कुटीर-उद्योग, नैतिक दुविधा आ सामुदायिक चेतना जकाँ विविध विषयकेँ समेटैत अछि।
‘गामक गाछी’मे पुरान गछकट्टी, कालेसरक मृत्यु आ बोन-कलमसँ बनल गाछीक प्रसंग कथा-क्लाइमेक्समे उजागर होइत अछि। नवका पंचायत सदस्य आरम्भमे ऐ इतिहाससँ अनभिज्ञ रहैत छैथ अथवा ओकर सामाजिक अर्थपर ध्यान नहि दैत छैथ। मुखियाजी जखन घटनाक स्मरण करैत छैथ, तखन गाम-समाज अपन सामूहिक उत्तरदायित्व बुझैत अछि। कथा ग्राम-इतिहास, पर्यावरण आ सामुदायिक स्मृतिक संग गहींर सम्बन्ध स्थापित करैत अछि।
‘कमतिया हबेली’ शीर्षक स्वयं सामाजिक व्यंग्यक संकेत अछि। कमतियाक घरकेँ ‘हबेली’ कहल गेलापर मदीना दादीक विरोध आ शब्द-प्रयोगपर उठल प्रश्न कथा-विन्यासक केन्द्र बनैत अछि। ऐ माध्यमे ग्रामीण शब्दावली, स्वामित्व-बोध आ सामाजिक प्रतिष्ठाक स्वरूपपर लेखक सूक्ष्म टिप्पणी करैत छैथ।
‘घुमि गाम चलु’ परिवेश-परिवर्तनक आग्रह राखैत अछि, मुदा कथाक आरम्भ आ समापनक बीच संरचनात्मक सघनता अपेक्षित प्रतीत होइत अछि। ‘बिपैत’मे विपत्ति-स्थिति आ मानवीय व्यवहारक संयोजन प्रभावोत्पादक अछि। ‘झंझैटक जड़ि सिनुरिया आमक गाछ’ भिन-भिनौज आ पारिवारिक तनावपर केन्द्रित अछि, जाहिमे प्रतीकात्मक वृक्ष-बिम्ब कथाकेँ वैचारिक प्रौढ़ता प्रदान करैत अछि।
‘जारैन’ नव वस्तु-स्वीकार आ परम्परागत सोचक टकराव प्रस्तुत करैत अछि। लेखक परिवर्तन-विरोधी मनोवृत्तिपर प्रश्न उठबैत छैथ। स्त्री-परिश्रम आ धुँआसँ जुड़ल कष्टक पक्ष यदि आओर स्पष्ट रूपेँ उभरैत तँ विमर्श आओर व्यापक बनैत। ‘जेहेन पाठ ने पढ़ए पुत्ता अपने सिर विसए’ अंधविश्वास-आधारित मानसिकतापर केन्द्रित अछि, मुदा कथ्य-प्रस्तुति पाठकमे किछु दुविधा उत्पन्न करैत अछि।
‘कौल्हुक सुच्चा करु तेल’ कुटीर-उद्योग आ पूँजीवादी संक्रमणक कथा अछि। पारम्परिक तेल-घानी उद्योगक अवसान आ नव व्यवस्था-दबावक यथार्थ प्रभावी ढंगसँ चित्रित अछि। कथा आशामूलक संकेतक संग समाप्त होइत अछि, जाहि कारण ई संग्रहक एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानल जा सकैत अछि।
‘दुधबेचनी’ शीर्षक कथा स्त्री-संघर्षक मार्मिक आख्यान अछि- “हम तँ अहींक वचन ने निभेलौं। कहि गेल छेलौं किने जे जाबे हम गाममे नहि रहब ताबे बालो-बच्चा आ अहूँक देख-रेख हमर दोस करत। हमरा तँ अहाँ माल-जाल जकाँ पोसियाँ लगा गेलौं।” पतिक मृत्यु उपरान्त नायिका अपन श्रम आ संकल्पक बलपर बाल-बच्चाकेँ पोषण करैत अछि, बेटीक बियाह सम्पन्न करैत अछि आ आत्मसम्मानक रक्षा करैत अछि। मोहभंग उपरान्त समाज-हितमे सक्रिय होएबाक भाव कथाकेँ व्यापक मानवीय धरातलपर स्थापित करैत अछि।
‘गामक सुख’ श्री राम विलास साहुक काव्य-संग्रह अछि, जकर प्रथम संस्करण 2018मे प्रकाशित भेल। संग्रहमे 107 कविता सुव्यवस्थित रूपेँ संग्रहीत अछि, जे ‘मनक मोलि’ सँ आरम्भ भऽ ‘चरि पँतिया’ धरि विस्तृत काव्य-यात्रा प्रस्तुत करैत अछि। ई पोथी पल्लवी प्रकाशन, निर्मली द्वारा प्रकाशित अछि।
ई संग्रह आधुनिक मैथिली काव्य-धारामे ग्रामीण चेतना, सामाजिक संक्रमण आ समसामयिक प्रश्नसँ गहन संवाद स्थापित करैत अछि। आरम्भिक कविता ‘मनक मोलि’मे आन्तरिक शुद्धि, सत्संग आ आत्मबोधक आग्रह व्यक्त भेल अछि। ‘तृष्णा’ जीवन-दर्शनक धरातलपर मानवीय लिलसा आ संतोषक विमर्श प्रस्तुत करैत अछि। ‘बेटी’ कवितामे नारी-अस्तित्व, शिक्षा आ सामाजिक सम्मानक स्पष्ट उद्घोष भेटैत अछि।
संग्रहक एक सशक्त पक्ष किसान-जीवन आ श्रम-यथार्थ अछि। ‘किसानक मजबुरी’, ‘हरबाहाक जिनगी’, ‘पेटक सवाल’, ‘भूखमरी’, ‘धनक खातिर’ आदिमे आर्थिक विषमता, श्रमक अवमूल्यन आ ग्रामीण दरिद्रताक मर्मस्पर्शी चित्रण अछि। ‘कोसीक कहर’ आ ‘बाढ़ि’ प्राकृतिक आपदाक त्रासदीक सजीव अनुभव सामने आनैत अछि। कवि देखल-भोगल यथार्थकेँ साक्ष्य रूपेँ प्रस्तुत करैत छैथ।
मिथिला-अस्मिता आ सांस्कृतिक चेतना सेहो संग्रहक प्रमुख आधार अछि। ‘मिथिला महान’, ‘गामक नाच’, ‘घरहटी’, ‘पनिभरनी’, ‘शारदा बन्दना’, ‘सरस्वती वन्दना’ जकाँ रचनामे लोक-जीवन, परम्परा आ भाषिक गौरव प्रकट होइत अछि। ठेँठ मैथिली शब्दावलीक सजीव प्रयोग संग्रहक विशिष्ट पहचान बनैत अछि।
राष्ट्रीयता आ सामाजिक उत्तरदायित्वक स्वर ‘देशक सेवा’, ‘शहीदक इच्छा’, ‘अमर शहीद’, ‘कवि लेखकक बलिदान’ आदिमे मुखर अछि। कवि नागरिक कर्त्तव्य, बलिदान-परम्परा आ सामूहिक चेतनाक स्मरण करैत छैथ।
सामाजिक आलोचना सेहो संग्रहमे प्रखर रूपेँ उपस्थित अछि। ‘केकरा लेल’, ‘अप्पन बीरान’, ‘बिसवासघात’, ‘कर्म कुकर्म’, ‘अपराधाक उपराग’ आदिमे नैतिक विचलन, भ्रष्टाचार, जातिगत विभाजन आ मूल्य-संकटपर विचार व्यक्त भेल अछि। शहरी आ ग्रामीण जीवनक तुलनात्मक विवेचन ‘गाम शहर’ आ ‘गामक सुख’ जकाँ रचनामे स्पष्ट देखबामे अबैत अछि।
नारी-विमर्श संग्रहमे विचारणीय आयाम रूपेँ उभरैत अछि। ‘हम छी नारी’, ‘दहेज’, ‘सेनूरक लाज’, ‘बेटी’ आदिमे स्त्री-सम्मान, शिक्षा, सामाजिक न्याय आ कुरीति-विरोधी दृष्टिकोण मुखर अछि।
भाषा सहज, प्रवाहमय आ लोकाभिमुख अछि। छन्द-योजना, गीतात्मकता आ कथ्य-स्वच्छता संग्रहकेँ पठनीय बनबैत अछि। विषय-विविधता आ समसामयिक चिन्तनसँ ‘गामक सुख’ समकालीन मैथिली काव्य-परम्परामे महत्त्वपूर्ण स्थान रखैत अछि।
‘मनक मैल’ श्री राम विलास साहुक लघु काव्य-संग्रह अछि, जाहिमे मैथिली टंका आ हाइकू-शेनर्यू विधाक संक्षिप्त, गहन आ विचारोत्तेजक रचना संकलित अछि। प्रकाशन-सूचना अनुसार ई कृति 2018मे पल्लवी प्रकाशन, निर्मली द्वारा प्रकाशित भेल अछि। आकारमे लघु होइतहुँ ई संग्रह विषय-गम्भीरता आ भाव-घनत्वक कारण विशेष ध्यान आकर्षित करैत अछि।
एहि संग्रहक केन्द्रीय बिन्दु मानवीय अंतःकरण, सामाजिक चेतना आ नैतिक आत्मपरीक्षण अछि। शीर्षक स्वयं संकेत करैत अछि जे कवि ‘मनक मैल’ केँ चिह्नित कए ओकर परिमार्जन दिस उन्मुख छैथ। टंका आ हाइकू जकाँ लघु विधामे कम शब्दमे अधिक भाव व्यक्त करबाक सामर्थ्य ऐ रचनासभमे निरन्तर देखबामे अबैत अछि।
रचनासभमे सामाजिक विसंगति, भ्रष्टाचार, अन्याय, हिंसा, नैतिक पतन, आडम्बर, लिलसा आ मूल्य-संकटपर तीक्ष्ण टिप्पणी भेटैत अछि। द्रष्टव्य अछि- “गरीबक तँ तकदीर जरल छै/जरलाहा हिस्सा भेटै छै/देशक लेल जे खून बहबै छै/पानियोँ समयपर नै भेटै छै।” कवि अनेक ठाम आत्मबोध, सत्यनिष्ठा, श्रम-गरिमा आ लोक-कल्याणक आग्रह रखैत छैथ। ग्रामीण परिवेश, किसान-जीवन, जल-प्रकृति, कोसी अंचलक पीड़ा, गरीबी आ सामाजिक असमानताक बिम्ब सेहो लघु छन्दमे उभरैत अछि।
मानवीय सम्बन्ध, प्रेम, क्षमा, संयम, विवेक, करुणा आ सहअस्तित्वक भाव बारम्बार प्रकट होइत अछि। धार्मिकता आ आध्यात्मिकताकेँ नैतिक धरातलपर पुनर्परिभाषित करबाक चेष्टा ऐ संग्रहक उल्लेखनीय विशेषता अछि। कवि बाह्य कर्मकाण्डसँ अधिक आन्तरिक सुचितापर बल दैत छैथ।
भाषा सहज, संक्षिप्त आ लोक-सम्बद्ध अछि। ठेँठ मैथिली शब्दावलीक सजीव प्रयोग संग्रहकेँ स्थानीयता आ प्रामाणिकता प्रदान करैत अछि। छन्द-संयम, शब्द-संक्षेप आ बिम्ब-सूक्ष्मता लघु विधाक अनुरूप संतुलित अछि।
‘अंशुमान’ श्री राम विलास साहुक लघुकथा-संग्रह अछि, जकर प्रथम संस्करण 2021मे पल्लवी प्रकाशन, निर्मली द्वारा प्रकाशित भेल। पोथीमे कुल 39 कथा संकलित अछि। कथा-सूची अनुसार ‘माइक ममता’ सँ ‘अंशुमान’ धरि कथा-क्रम ग्रामीण समाज, पारिवारिक सम्बन्ध, सामाजिक कुरीति, प्रशासनिक विसंगति आ नैतिक प्रश्नक विविध आयाम उद्घाटित करैत अछि।
संग्रहक आरम्भिक कथा ‘माइक ममता’ मातृत्वक अजस्र करुणा प्रस्तुत करैत अछि। पुत्र द्वारा प्रताड़ना उपरान्तो माएक हृदय आशीष-प्रधान रहैत अछि। ‘दहेज पाप छी’ दहेज-प्रथाक सामाजिक आ आर्थिक दुष्परिणाम सामने आनैत अछि, जेतए प्रतिष्ठा-लोलुपता अन्ततः परिवारक विघटनमे परिणत होइत अछि।
‘लिंग जाँच’ कन्या-भ्रूण-हत्या जकाँ ज्वलन्त विषय उठबैत अछि आ समाजमे व्याप्त मानसिकतापर प्रश्न करैत अछि- “बाबूजी, अहाँ एक्को पाइ चिन्ता नै करू। हम मनुख संगे बिआह करब। पढ़ल-लिखल कम्मो रहत तइले एको पाइ चिन्ता नहि। एही खातिर ने एते झमेल होइए। एक्को पाइ चिन्ता नै करू।” ‘आतंकी के?’ प्रतीकात्मक शिल्प माध्यमे राजनीतिक शब्दावलीक अर्थ-विस्तारपर विचार प्रस्तुत करैत अछि। ‘विवेक अविवेक’ आ ‘बाबाक विचार’ शिक्षा-व्यवस्था, नैतिक विवेक आ सामाजिक नेतृत्वक प्रश्नपर आलोचनात्मक दृष्टि दैत अछि।
श्रम, आत्मनिर्भरता आ संघर्ष संग्रहक प्रमुख आधार अछि। ‘दुखिया बनल सुखिया’ परिश्रम आ धैर्य द्वारा विपरीत परिस्थितिसँ उबरबाक प्रेरक आख्यान अछि। ‘हूनर’ शिक्षाक महत्त्व आ स्वप्रयासक गरिमा रेखांकित करैत अछि। ‘श्रमदान’ सामुदायिक सहभागिता आ सामाजिक सहयोगक आग्रह करैत अछि।
‘दोखी के?’ आ ‘केकर दोख’ कथा-रचनामे व्यंग्य आ प्रतीकक प्रयोग द्वारा व्यवस्था-तंत्र, सत्ता-विलासिता आ सामाजिक उदासीनतापर चोट कएल गेल अछि। ‘सेरपर सबा सेर’ ढोंग-पाखण्डपर व्यंग्यात्मक टिप्पणी प्रस्तुत करैत अछि- “लीअ रूपैआ, कोन जनमक कर्जा अहाँ हमरासँ चुकबै छी ई हम नै जानलौं।”
संग्रहक केन्द्रीय कथा ‘अंशुमान’ संयुक्त परिवारक विघटन, संपत्ति-लोभ, भैयारीक तनाव आ माता-पिताक उपेक्षा जकाँ समकालीन प्रश्न सामने आनैत अछि। कथा पारिवारिक संरचनामे बदलैत मूल्यमान्यता आ नैतिक पुनर्स्मरणक आवश्यकतापर संकेत करैत अछि।
भाषा ठेँठ ग्रामीण, संवादप्रधान आ सहज अछि। कथासभ लघु आकारक होइतहुँ गहन सामाजिक आशय रखैत अछि। लोक-प्रचलित शब्दावली आ व्यवहारिक प्रसंग कथा-विश्वकेँ प्रामाणिकता प्रदान करैत अछि।
‘नेत्रदान’ श्री रामविलास साहुक रचित खण्डकाव्य अछि, जे समकालीन मैथिली साहित्यमे मानवीय करुणा, त्याग आ सामाजिक उत्तरदायित्वक सशक्त प्रतिपादन करैत अछि। आकारमे अपेक्षाकृत लघु होइतहुँ ई कृति भाव-विस्तार आ नैतिक आशयमे व्यापक प्रभाव छोड़ैत अछि।
काव्यक केन्द्रीय प्रसंग धर्मनाथक दृष्टिबाधित पुत्री अन्धरानी आ दीना नामक युवकक आत्मोत्सर्गपर आधारित अछि- “अन्धरानी अछि दुनू आँखिसँ आन्हर/तेकरा बनाएब हम पहिने अँखिगर/तखन सम्पन्न करब बिआहक काज”
कथानक संवेदनाक धरातलपर विकसित होइत अछि। अन्धरानी अन्धकारमय जीवन जी रहल छैथ। दीना मानवीय करुणासँ प्रेरित होइत छैथ।
ओ अपन एक नेत्र दान करैत छैथ। अन्धरानी पुनः प्रकाश देखैत छैथ। ई नेत्रदान साधारण शारीरिक क्रिया नहि रहि जाइत। ई मानवीय सहानुभूति आ त्यागक उत्कर्ष रूपेँ स्थापित होइत अछि।
काव्यमे दानक भाव उच्च नैतिक आदर्शक रूप ग्रहण करैत अछि। सामाजिक समरसता, सेवा-व्रत आ आत्मबलिदानक चेतना एतए केन्द्रमे रहैत अछि। ऐ प्रकारेँ रचना त्यागक मूल्यकेँ समाजसामुख प्रतिष्ठित करैत अछि।
पात्र-निर्माण प्रतीकात्मक आ प्रभावकारी अछि। अन्धरानी अज्ञान, असहायता आ अभावक प्रतीक रूपेँ देखाइत अछि, जबकि दीना उदारता, सहानुभूति आ लोकमंगलक प्रतिनिधि बनि उभरैत अछि। धर्मनाथ आ पारिवारिक परिवेश ग्रामीण समाजक यथार्थकेँ सामने आनैत अछि। पात्र-नाम आ कथानक संरचना काव्यक शीर्षकक सार्थकता सुदृढ़ करैत अछि।
शिल्प-संरचना छन्दोबद्ध, प्रवाहयुक्त आ भावप्रधान अछि। प्रकृति-चित्रण, ऋतु-संकेत, सामाजिक परिवेश आ करुणा-रसक संतुलित समन्वय काव्यकेँ प्रभावकारी बनबैत अछि। भाषा सहज, सरस आ ठेँठ मैथिली शब्दावलीसँ समृद्ध अछि, जे रचनाकेँ प्रामाणिकता प्रदान करैत अछि।
ई खण्डकाव्य पाठककेँ आत्मचिन्तनक दिशा दैत अछि। त्याग, करुणा, पारिवारिक निष्ठा आ सामाजिक दायित्व जकाँ मूल्य आधुनिक जीवन-परिस्थितिमे नव अर्थ ग्रहण करैत अछि। विशेषतः नव पीढ़ीक लेल ई कृति मानवता-केन्द्रित दृष्टिकोणक प्रेरक पाठ सिद्ध हो सकैत अछि।
‘खुला आसमां धरती की गोद में’ श्री रामविलास साहुक हिन्दी काव्य-संग्रह अछि। भाषा हिन्दी होइतहुँ ऐ संग्रहक भाव-दृष्टि मिथिला-संस्कारसँ अनुप्राणित अछि। ऐ कृति मे किसान-जीवन, श्रमिक-संघर्ष, आर्थिक विषमता, राजनीतिक विसंगति आ नैतिक संकट जेकाँ समसामयिक प्रश्न सजीव रूपेँ अभिव्यक्त भेल अछि। राष्ट्र-चेतना, नागरिक कर्तव्य आ सामाजिक उत्तरदायित्व प्रमुख स्वर रूपेँ उभरैत अछि; संगहि लोकतन्त्रक आदर्श आ व्यवहारिक यथार्थक अन्तर पर सेहो आलोचनात्मक दृष्टि प्रस्तुत कएल गेल अछि।
मानवीय सम्बन्ध, आत्मचिन्तन आ सामाजिक समरसताक आग्रह ऐ संग्रहकेँ गम्भीर आयाम प्रदान करैत अछि। शिल्पक स्तर पर गीतात्मकता आ मुक्तछन्दक संतुलित प्रयोग, सहज भाषा आ प्रतीकात्मक संकेत एकरा विचारोत्तेजक बनबैत अछि। समग्रतः ई कृति सामाजिक जागरण आ मानवीय मूल्यबोधक दृष्टिसँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानल जा सकैत अछि।
उपसंहार
श्री राम विलास साहु समकालीन मैथिली साहित्यमे एहन रचनाकार रूपेँ प्रतिष्ठित छैथ, जे ग्राम्य जीवनक यथार्थ, सामाजिक सरोकार, नैतिक मूल्य आ मानवीय संवेदनाकेँ निरन्तर सर्जनात्मक अभिव्यक्ति दैत रहल छैथ। पद्य, लघुकथा, खण्डकाव्य आदि सभ विधामे हुनकर सक्रिय उपस्थिति विषय-विस्तार आ अभिव्यक्ति-विविधताकेँ स्पष्ट रूपेँ दर्शबैत अछि। किसानी-जीवन, श्रम-गरिमा, जातिगत प्रश्न, नारी-अस्मिता, राष्ट्रीय चेतना आ आत्मचिन्तन जकाँ विविध आयाम हुनकर रचनासंसारकेँ बहुआयामी बनबैत अछि।
भाषा-शैलीक सहजता, लोक-आधार आ अनुभवजन्य दृष्टि हुनकर साहित्यकेँ प्रामाणिकता प्रदान करैत अछि। साहित्यिक सृजन संग-संग सांस्कृतिक सक्रियता सेहो हुनकर व्यक्तित्वक महत्त्वपूर्ण पक्ष अछि। ऐ प्रकारेँ राम विलास साहुजी लेखन आ आचरण दुनू स्तरपर प्रतिबद्ध रचनाकारक रूपमे समकालीन मैथिली साहित्यमे अपन सशक्त पहचान स्थापित केने छैथ।
सन्दर्भ सकेत-
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ALL INDIA INSTITUTE OF MEDICAL SCIENCES ANSARI NAGAR, NEW DELHI ~—20029 MEDIA CELL 24/March/2026 PRESS RELEASE Mr. Harish Rana passed away at 4:0 PM on 24th March 2026 at AIIMS, New Delhi. He was under the care of a dedicated team of doctors and was admitted to the Palliative Oncology Unit (IRCH), led by Dr. (Prof.) Seema Mishra, HoD, Onco-Anaesthesia. AIIMS extends its heartfelt condolences to his family and loved ones during this difficult time. yen i Ot With regards, Dr.(Prof.) Rima Dada Media Cell AIIMS New Delhi
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6) SS, ee top | 7 ९ ३ fade मैथिली साहित्य आन्दोलन: मानुषीमिह संस्कृताम् सम्पादक: गंजेन्द्र ठाकुर।
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