APPENDIX: METHODOLOGICAL NOTE
The Nepal Bikram Samvat years cited have been converted to approximate CE years using the standard offset of BS minus 56–57 years. Web sources consulted include the Videha digital archive (videha.co.in). All URLs were last accessed April 2026. This research was prepared using primary texts, and standard academic resources. All quoted material is from the cited sources. For the most current scholarship, consult the Videha Parallel History series at www.videha.co.in/gajenthakur.htm.
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A PARALLEL HISTORY OF MAITHILI LITERATURE: INTRODUCTION
DALIT LITERARY CRITICISM: TELUGU, GUJARATI, AND ODIA DALIT LITERATURE IN MAITHILI TRANSLATION
GANGESA UPADHYAYA: LIFE, LOGIC, AND LEGACY IN THE NAVYA-NYAYA TRADITION [NAVYA-NYAYA’S HIERARCHICAL USE OF LIMITORS IS COMPATIBLE WITH MODERN ARTIFICIAL INTELLIGENCE AND NATURAL LANGUAGE PROCESSING (NLP)]
MITHILA & MAITHILI: CRITICAL ANALYSIS OF INSTITUTIONS
THE MAITHILI GHAZAL
VIDEHA (ISSUE 1-350) SADEHA SERIES (1-37)
VIDEHA ISSUES 351-438
VIDEHA MAITHILI PARALLEL DRAMA THEATRE
VIDEHA PARALLEL AUDIO VIDEO ARCHIVE
VIDEHA PARALLEL CHILDREN'S LITERATURE
ABDUR RAZZAK , ABHA JHA , ABHILASH THAKUR, ACHARYA RAMANAND MANDAL, ACHARYA RAMLOCHAN SHARAN, ACHHE LAL SHASTRI, AJIT KUMAR JHA, AMIT MISHRA, AMOD KUMAR JHA, AMRENDRA YADAV, ANAMIKA RAJ, ANAND KUMAR JHA, ANIL MALLIK, ANJANI KUMAR VERMA, ANMOL JHA, ARVIND THAKUR, ASHISH ANCHINHAR, ASHOK (KATHAKAR ASHOK), ASHRAF RAIN, BADRI NATH ROY 'AMATYA’ , BECHAN THAKUR, BINAY BHUSHAN, BINDESHWAR THAKUR, CHANDAN KUMAR JHA, DINESH KUMAR MISHRA, DR KAMINI KAMAYINI, DR KIRTINATH JHA, DR KISHAN KARIGAR, DR PRAFULL KUMAR SINGH ‘MAUN’, DR SHAMBHU KUMAR SINGH, DR SHIV KUMAR PRASAD, DR. KAILASH KUMAR MISHRA, DURGANAND MANDAL, GOPALJI JHA ‘GOPESH’, HARIMOHAN JHA, HITENDRA GUPTA, HITNATH JHA, HRIDAY NARAYAN JHA, ILARANI SINGH, JAGDANAND JHA ‘MANU’, JAGDISH CHANDRA THAKUR ‘ANIL’, JAGDISH PRASAD MANDAL, JITENDRA KUMAR JHA ‘JEETU’, KALIKANT JHA ‘BUCH’, KALPANA JHA, BOKARO; KALPANA JHA, DELHI; KALPANA JHA, PATNA, KAMESHWAR JHA ‘KAMAL’, KAMLA CHAUDHARY, KAPILESHWAR RAUT, KEDAR NATH CHAUDHARY, KRISHNA KUMAR KASHYAP, KUMAR MANOJ KASHYAP, KUMAR PAWAN, KUNDAN KUMAR KARN, KUSUM THAKUR, LAL DEV KAMAT, LALITA JHA, LALLAN PRASAD THAKUR, LAXMAN JHA ‘SAGAR’, MALA JHA, MEENA JHA, MUNNA JI, MUNNI KAMAT, NABO NARAYAN MISHRA, NAGENDRA KUMAR, NAND KUMAR MISHRA ‘NAND’, NAND VILAS ROY, NARAYANJI CHAUDHARY, NARENDRA JHA, NAVENDU KUMAR JHA, OM PRAKASH JHA, PANDIT BHAVNATH JHA, PANNA JHA, PHANISHWAR NATH RENU, PRABHAT RAI BHATT, PRADEEP PUSHPA, PRANAV JHA, PRAYAS PREMI MAITHIL, PREETI THAKUR, PREMLATA MISHRA ‘PREM’, PREMSHANKAR SINGH, PROF DR RAMAWATAR YADAV, PROF UDAYA NARAYANA SINGH ‘NACHIKETA’, PT. RAMJI CHAUDHARY, RABINDRA NARAYAN MISHRA, RAJDEO MANDAL, RAJEEV RANJAN MISHRA, RAJNANDAN LAL DAS, RAM BHAROS KAPARI 'BHRAMAR', RAM SOGARTH YADAV, RAMDEO PRASAD MANDAL ‘JHARUDAR’, RAMESH, RAMESH NARAYAN, RAMLOCHAN THAKUR, RAMVILAS SAHU, RAVI MISHRA BHARDWAJ, RAVIBHUSHAN PATHAK, RAVINDRA NATH THAKUR, S.C. SUMAN, SANDEEP KUMAR SAFI, SANJU DAS, SANTOSH KUMAR MISHRA, SANTOSH KUMAR ROY 'BATOHI', SATYANAND PATHAK, SHAIL JHA ‘SAGAR’, SHANTI LAKSHMI CHAUDHARY, SHARDINDU CHAUDHARY, SHASHI BALA, SHASHIDHAR KUMAR 'VIDEH', SHIV KUMAR JHA ‘TILLU’, SHIVSHANKAR SINGH THAKUR, SHIVSHANKAR SRINIWAS, SIYARAM JHA ‘SARAS’, SRIJAN SHEKHAR 'AJNEYA', SUBHASH CHANDRA YADAV, SUBHASH KUMAR KAMAT, SUBODH JHA, SUBODH KUMAR THAKUR, SUJIT KUMAR JHA, SUSHIL, SWETA JHA CHAUDHARY, TARANAND VIYOGI, UMESH MANDAL, UMESH PASWAN, VIBHA RANI, VIJAYNATH JHA, VINEET UTPAL, YOGANAND JHA, YOGENDRA PATHAK VIYOGI, YOGENDRA PRASAD YADAVA
… AND MORE TO COME IN TOME 5.
23 Language Transliterator
१.१.अंक ४३९ पर टिप्पणी
विदेह ४३९ म अंक पर पाठकीय मन्तव्य
प्रणव कुमार झा
रवीद्र नारायण मिश्र के कविता 'रामक जल समाधि' एहि अंक मे छपल हमर कविता 'राम चरित' के एक्सटेंशन बुझना गेल। राजदेव मण्डल के कविता 'शरशैय्या' जिनगि मे अनेकों भावनात्मक आ लौकिक तीर से घायल लोक के मनोव्यथा कहबाक प्रयास अछि। मानेश्वर मनुज द्वारा तेलुगू काव्य के मैथिली अनुवाद काठक घोड़ा स्वागत योग्य। भारतीय भाषा मे अनुवाद के माध्यम से साहित्यिक आदान प्रदान भारतीय संस्कृति आ ज्ञान परंपरा के समझ बढाबे मे उपयोगी छैक।
आशीष अनचिन्हार के आलेख इच्छा मृत्यु (Euthanasia) कें भीष्म पितामहक पौराणिक प्रसंग सँ लऽ कऽ आधुनिक कानूनी विमर्श धरि समेटैत अछि। लेखक हरीश राणाक मामला (2026) कें पहिल 'वैध उदाहरण' मानि, आत्महत्या आ 'गंगालाभ' जेहन कुप्रथा सँ एकर अंतर स्पष्ट कयलनि अछि। ई लेख भावुकताक बदला न्यायिक आ तार्किक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करैत अछि।
गजेंद्र ठाकुर जे A Parallel History of Mithila & Maithili Literature (Part 1-100) एकटा वृहत्त काज अछि जे कठोर परिश्रम आ साधना से लिखल जा सकाल हेतैक। गजेन्द्र ठाकुरक ई मैराथन लेख "विदेह" आन्दोलनक वैचारिक आधार प्रस्तुत करैत अछि। ई पारंपरिक संकीर्णता कें त्यागि कऽ 'समांतर साहित्य' क वकालत करैत अछि, जतय उपेक्षित वर्ग, दलित विमर्श आ आधुनिक बोधक स्थान अछि। नव्य-न्याय आ पाश्चात्य आलोचनाक समन्वय सँ मैथिलीकें वैश्विक आ डिजिटल क्षितिज पर विस्तार देबऽ मे ई अति महत्वपूर्ण अछि।
आशीष अनचिन्हार
प्रणव कुमार झाजीक आलेख 'एआई युग मे सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग - कोडिंग से सिस्टम थिंकिंग तक' पढ़ल। नील लागल। पाठकक जिज्ञासा शांत करैत अछि ई आलेख। एहि तरहक आलेखक रचना करैत रहताह से, उम्मेद अछि। संगहि हिनक कविता राम चरित सेहो नीक अछि।
विद्यालंकारजीपर सिरीजक शुरुआत के नव युगक शुरुआत अछि, शुभकामना कल्पनाजीकेँ।
लालदेव कामजी एवं प्रीति कुमारी लगातार लीखि रहल छथि से नीक बात।
कुमार मनोज काश्यपजी लघुकथामे की कहऽ चाहि रहल छथि से हमरा नहि बुझाएल।
मदन मोहन सिन्हा
A Parallel History of Mithila & Maithili Literature (Part 1-100): मैथिली भाषाक दुर्लभ प्रतिभा आ विलक्षण व्यक्तित्वक लोक सभक साहित्यिक रचना आ दृष्टिकोणक अत्यंत उत्कृष्ट साहित्यिक विश्लेषण।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
गद्य
२.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-२
२.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१९
२.३.प्रणव कुमार झा-सहकारिताक धागा सभसँ आगा
२.४.डॉ. उमेश मण्डल- पयस्विनी : लोकचेतना आ संवादधर्मिताक समेकित अभिव्यक्ति
२.५.१. प्रीति कुमारी- शेष जीवन केर नायक : एक चरित्र चित्रण २.नशामुक्ति अभियान
२.६.प्रणव कुमार झा- अर्थ आवर
२.७.लाल देव कामत-१. उपराग केर निहितार्थ २.सगर राति दीप जरय कथा गोष्ठी १२४म् नहरिया: कथाक संक्षिप्त अवलोकन ३.मिथिला - मैथिली सपूतक अवसान
२.८.डॉ. उमेश मण्डल-'बदलैत जीवन' कथा-संग्रहक आलोकमे सामाजिक परिवर्तन आ मानवीय चेतनाक समीक्षात्मक विवेचन
२.९.रबीन्द्र नारायण मिश्र- जयतु जानकी (धारावाहिक उपन्यास)
२.१०.विप्रकान्त मंडल- हॉस्पिटलक हिसाब
२.११.बद्रीनाथ राय अमात्य- ३ टा बीहनि कथा
२.१२.गजेन्द्र ठाकुर- मैथिली लेल दलित साहित्य समीक्षाशास्त्र
२.१.कल्पना झा-मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-२
कल्पना झा
कल्पना झा
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-२
कोइलखक अलंकार: 'विद्यालंकार'
श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' केँ कोइलख गामक अलंकार कहल जाए तऽ अतिशयोक्ति नहि होएत। ओ एहन अलंकार छलाह कोइलखक जनिकर जन्म सँ, जनिकर कर्म सँ हुनकर गामक मान बढ़लनि, नाम बढ़लनि। ओना कोइलखक मान बढ़ौनिहार आरो बहुत विद्वान लोकनिक जन्म एहि पहिनहुँ भऽ चुकल छलनि। एक सँ बढ़ि कऽ एक धुरन्धर (ई सिनेमा बेस चर्चित रहल तैं एहि शब्दक प्रयोग भऽ गेल स्वत:)क जन्म आ हुनकर योग्यता/विद्वता, सत्कर्मक प्रभावेँ मिथिलाक भूगोल मे 'कोइलख' अपन एकटा विशेष स्थान बनौने अछि। से आइ सँ नहि, सैकड़ो वर्ष पहिनहि सँ। श्री हितनाथ झा अपन ग्राम-गाथा लिखैत 'कोइलख'क मान बढ़ौनिहार सभ मनीषीक परिचय दैत, हुनका लोकनिक व्यक्तित्व ओ कृतित्व पर संक्षिप्त विवरण दऽ कऽ मैथिल समाज पर बड़का उपकार केलनि अछि। 'कोइलख' नामक एहि पोथी मे आदरणीय भीमनाथ झाक लिखल "कोइलख-प्रसंग" सँ उद्धृत अंश देखल जाए-
"एहि गाम मे एक सँ एक विद्वान भेल छथि। सोरहम शताब्दी मे विख्यात कीर्तनियाँ नाटककार महामहोपाध्याय उमापति उपाध्याय भेलाह, जनिक 'पारिजात-हरण' मध्यकालीन मैथिली साहित्यक मेरुदण्ड मानल जाइछ। हिनक उपाधि 'सुमति' तथा 'कविपण्डितमुख्य' छलनि, जे सामाजिक प्रतिष्ठा तथा पाण्डित्य एवं कवित्व प्रतिभाक शिखरत्वक सूचक छल। मैथिली साहित्यक आद्य दू प्राध्यापक कलकत्ता विश्वविद्यालय मे पण्डित खुद्दी झा एवं पण्डित बबुआजी मिश्र रहथि। व्याकरण, न्याय, ज्योतिष, कर्मकाण्ड, वेद, तंत्रक संगहि मैथिली साहित्यक अनेकानेक कवि-साहित्यकार एहि गाम मे होइत अएलाह अछि, जे अपन-अपन क्षेत्र मे पूर्ण प्रतिष्ठित-सम्मानित भेलाह अछि। राजनीति, पत्रकारिता, प्रशासन, चिकित्सा, शिक्षा, अभियांत्रिकी, व्यवसाय प्रभृति प्रायः प्रत्येक क्षेत्र मे कोइलखक सपूतक अवदान चिरस्मरणीय अछि।"
श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' जीक जन्म 17 जुलाइ 1901 ई. मे भेल छलनि आ अवसान 20 मइ 1989 मे। लगभग अठासी वर्षक हुनकर जीवन मूल रूप सँ राजभाषा हिन्दीक उन्नयन मे बितलनि। हिन्दीक जानल-मानल पत्रकार, सम्पादक, स्तम्भकार, रहलाह। मुदा मातृभाषा मैथिलीक प्रचार-प्रसार लेल सेहो तत्पर रहलाह; आजीवन रहलाह। हिन्दी पत्रकारिता मे तऽ खुट्टा गाड़बे केलनि, संगहि राज्यपाल द्वारा समाजसेवा आ शिक्षा क्षेत्र मे विशेष योगदान लेल मनोनीत कएल गेलाह। पाँच वर्ष लेल। बिहार विधान परिषदक सदस्य रूप मे 1968 सँ 72 धरि हिनकर कार्यकाल रहलनि एम.एल.सी. रूप मे। अपन 'पद' आ 'पावर'के वास्तव मे उपयोग केलनि। चेतना समिति लेल राजेन्द्र नगर मे प्लॉट आवंटित करबाएब एकटा महत्वपूर्ण काज रहलनि। हितनाथ झाक कहब छनि, "पटनाक चेतना समितिक सक्रिय उन्नेतावर्ग मे छलाह, 1963 सँ 66 धरि अध्यक्षो रहलाह। हिनके योगदानक प्रतिफल अछि राजेन्द्र नगरक भूखण्ड तथा ओहिठाम भवन-निर्माण मे भेल बाधाक निराकरण।"
चेतना समितिक अतिरिक्त मैथिली अकादमीक अध्यक्ष सेहो रहल छलाह 'विद्यालंकार' जी। से एक टर्म नहि; तीन-तीन वर्षक दू टर्म (1976-82) अध्यक्ष रहलाह आ सेवा देलथिन। वास्तव मे सेवा देलथिन। अपन खून-पसीना सँ सीँचि अकादमी कें ठाढ़ कएने छलाह, से कहबाक चाही। हिनकर अध्यक्षता काल मे मैथिली अकादमी मे सभ सँ बेसी काज भेल, से बहुत लोक केँ निश्चित बूझल हेतनि। शोधार्थी/विद्यार्थी, साहित्य प्रेमी लोकनिक अबरजात रहल अकादमी मे। सभ लाभान्वित होइत गेलाह। साहित्यिक गतिविधि, संगोष्ठी वगैरह होइत रहैत छलए। शताधिक पोथी प्रकाशित भेल। अनूदित आ मूल, सभ तरहक पोथी।
काज भले हिन्दी लेल बेसी केलनि, मुदा हृदय सँ 'सुच्चा मैथिल' छलाह ओ।
सन्दर्भ ग्रन्थ : "कोइलख" (लेखक हितनाथ झा)
संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-1
संपादकीय सूचना- विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि एवं आब विद्यालंकारजीपर भऽ रहल अछि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि-
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-24
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-25
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
२.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१९
हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१९
हितनाथ झा
(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
श्री दिगम्बर नाथ झा जीक कथा जे कि प्रभात मे धारावाहिक रूपें प्रकाशित भेल-
स्वतन्त्रता
रमेश बाबू तथा दीनेश बाबू साक्षात ममिऔत पिसिऔत भाइ छलाह। कमला देवी ज्येष्ठ भाइक पत्नी छलथिन्ह। ओ बहुत नीक कुलशीलक कन्या छलीह।थोड़ बहुत लिखने पढ़ने सेहो छलीह। यद्यपि ओहि परिवारमे यैह तीनू गोटे छलाह, तथापि हुनकालोकनिक व्यय अत्यन्त बेसी छलैन्ह। रमेश बाबू भागलपुरमे एक पैघ फैक्टरीक अधिष्ठाता छलाह जाहिसँ हुनका लाभ पूर्ण रूपेँ होइत छलन्हि। हुनक कनिष्ठ भाइ दीनेश बाबू प्रवेशिका परीक्षा पास कय भागलपुर कॉलेजमे पढ़ैत छलाह। यद्यपि रमेश बाबू तथा दीनेश बाबू सहोदर नहि छलाह तथापि दूनू गोटाक पारस्परिक-प्रेम अत्यन्त गूढ़ छलनि। हुनकालोकनिक आचार, विचार तथा व्यवहारसँ ई ककरो प्रतीत नहि होइत छलैक जे ई लोकनि एक पिताक पुत्र नहि थिकाह।
ओहि दिन जखन रमेश बाबू आफिससँ आबि क� अपन कोठरीमे मेजक नजदीकमे बैसि कय विश्राम क� रहल छलाह। हुनक हृदय- हारिणी प्राणेश्वरी कमला देवी ओहि कोठरीमे प्रवेश करैत पूछय लगलथिन्ह--�हमर चूड़ी अनलौं कि नहि? दीअ ने।�
रमेश बाबू किछु काल छुओ रहि पुनः धीरे-धीरे ई वचन उच्चारण कयलन्हि--" चूड़ी ! आहाँक चूड़ी त� हम नहि लावि सकलौं। चूड़ी लाब� त� आहाँ ठीक कहने रही परञ्च किञ्चित रुपैआ बाँकी रहि गेला सन्ता दीनेश बाबू केँ एक मित्रक वहिनिक विवाह रुकि गेलनि हैं। बुझल किने, ओ लोकनि बड़ सीदित छथि। भरि पेट अन्नहु टा समयपर नहि प्राप्त होइत छन्हि। यैह सब कारणसँ -" ई सब वार्तालाप के वीचहिमे रोकि कमला देवी दिस ताक लगलाह। श्रीमती कमला देवी मुँह बनाक� किछु मोनहि मोन वाज� लगलीह। परन्तु मोन मे किछु विचारि कय सकुचित मुख-कमलसँ किछु उच्चारण नहि केलनि। पुनः ओ भौंह केँ धनुषाकार करैत स्वामी दिश ताक� लगलीह। अकारण क्रोध करैत शीघ्रता पूर्वक कोठरीसँ बाहर भ� गेलीह। रमेश कोनो तरहेँ पिण्ड छोड़यलन्हि। ओ अपना मोनमे कल्पनो नहि कयने छलाह जे आइ श्रीमती जी एतेक शीघ्र शान्त भय जयतीह। परन्तु एक बात सोचि कय हुनका मोनमे बड़ा अशान्त भ� गेलन्हि। कहल नहि जा सकैत अछि जे कियैक श्रीमतीजीक प्रवृत्ति दिनानुदिन हीनता केँ प्राप्त करय लगलैन्ह।
कत शृंगार-पेटार तथा आडम्बरक सामग्री और कत एक कलुषित परिवार के कन्यादान मे सहायता।रमेश बाबू केँ ई दूनू बात नर्क तथा स्वर्गक सदृश प्रतीत भेलन्हि।
(२)
रमेशबाबू जाहि रूपेँ एहि मामिलाकेँ निवृत्ति जकाँ बुझलनि वास्तवमे ओहि रूपेँ निवृत्ति नहि भेलैक।ओहि दिन संध्याकाल रमेशबाबू टहलि बुलि अपना ओहिठाम जखनि अयलाह तखनि हुनका बुझि पड़लनि जे हुनका सँ बिना पुछनहिं श्रीमती जी पड़ोसीक बंगाली-महिला संग वायस्कोप देख� गेली है। एहि बीचमे किछु दिनसँ वो महिला श्रीमतीजीक घनिष्ठ सखी भ� गेल छलथिन्ह। ओ महिला स्त्री-स्वाधीनताक बहुत पैघ हिमायती छथि।मासमे प्रायः १५ दिन स्त्री सभा करैत छथि आर पुरुषसभक बन्धन तोड़बाक विषयपर बहुत भाषण करैत छथि।
रमेशबाबू दू तीन मिनट चुपचाप ठाढ़ छलाह। तदुपरान्त कोठापर अपन कोठरी मे चल गेलाह। ओहिठाम दीनेशबाबू अध्ययन क� रहल छलाह। ओ भाइकेँ देखिते देरी चटपट उठि ठाढ़ भय गेलाह।रमेशबाबू तौनी केँ डोर पर रखैत बजलाह--" बैसू, दीनेशबाबू।ठाढ़ कथी लय छी? तदुपरान्त रमेशबाबू पुनः बजैत भेलाह --" आइ अहाँक मूँह उदास कियै अछि? कॉलेज सँ आबि क� किछु जलपान कयलौं हैं कि नहि? दीनेशबाबू किञ्चित कालतक माथ झुकौने ठाढ़ छलाह। कोनो तरहक उत्तर नहि देलखिन। बात ई छलैक जे जखनि दीनेशबाबू कॉलेज सँ आयल छलाह अपन भाउजकेँ नहि देखि भनसीयासँ जलखै मंगलखिन्ह, ताहिपर भनसीया कहलखिन्ह-" बाबू साहेब, आइ त� आहाँ लय जलपान नहि अछि।" भूख जोर लागल छलन्हि तैं पुनः डपटि कय पुछलथिन्ह--" कियैक नहि अछि? ताहिपर भनसीया बहुत उष्ण स्वरमे उत्तर देलखिन्ह --� ओहि घरसँ एक महिला आयल छलीह, वैह जलपान कय आहाँक भाउजक संग वायस्कोप देख� चल गेलीहि। तत्पश्चात दीनेशबाबू पुनः किछु नहि पुछि तथा अश्रुपातकेँ रोकि कोठापर चल गेलाह। परन्तु रमेशबाबूकेँ ई बात बुझबामे विलम्ब नहि भेलनि।क्रोधसँ ओ कम्पायमान हुअ लगलाह। पुनः ओ दीनेशबाबू केँ अत्यन्त स्नेहक संग कहलखिन्ह-� आहाँ एही ठाम बैसल रहू, हम शीघ्र चल अबै छी।" एतबा कहि ओ शीघ्रतासँ नीचाँ आबि बाजार सँ जलपान लानि कय भाइकेँ सोझाँमे राखि देलथिन्ह तथा कहलथिन्ह। -" लिअ, जलखै क'क� तत्पश्चात पढ़ब। भूखमे कतौ पढ़ल जाइ।" दीनेशबाबू अपन भाइक बात खण्डन कहियो नहि करै छलथिन्ह। आइयो ओ चुपचाप जलखै कय लेलन्हि।
ओहि रातिमे रमेशबाबू अत्यन्त खिन्न चित्त भेला सन्ता भनसीयाकेँ बजा क� कहलथिन्ह जे आइ दूनू भाइक भोजन ऊपरे नेने आउ। भनसीया डेराइत-डेराइत कहलथिन्ह-� बाबू साहेब ! आइ त� केवल अहीं टाक भानस भेल अछि। श्रीमतीजी छोटकाबाबूक वास्ते सामग्री नहि देलथिन्ह। जखन हम हुनका वास्ते मंगलियनि त ओ कहलनि जे� हुनका खेबाक कमी कोन छन्हि। भाइसँ जे मित्रक नामपर रुपैया लेलन्हि अछि ओहिसँ हुनक कार्य किछु दिन तक खुशीसँ चलतन्हि।"
ई सुनतहि रमेशबाबू क्रोधान्ध भय गेलाह।परन्तु भनसीयाक एहिमे दोष की? अतः रमेशबाबू अपनाकेँ काबू मे राखि भनसीया सँ पुछलथिन्ह -" दीनेशबाबू कत� छथि?� ओ निचला महलमे पढ़ि रहल छथि"।-� जाउ, तुरन्त ऊपर पठा देबनि।" दीनेशबाबू केँ ऊपर अबितहि देरी रमेशबाबू कहलथिन्ह-� राति बहुत भ� गेलैक अछि, भोजन कय लिअ। विलम्ब कयलासँ भात ठंढा भ� जायत।" एकहि स्थानपर भोजनक वास्ते बैसैत दीनेशबाबू भाइक दिश ताकि क� बजलाह-� आर अहाँक थारी? आहाँ नहि भोजन करब की? रमेशबाबू दुखितक भाव दर्शबैत कहलखिन्ह--" नहि दीनेशबाबू। आइ हम भोजन नहि करब । एकाएक हमरा पेटमे दर्द प्रारम्भ भय गेल अछि।" एतबा कहि विछावन पर जा क� पड़ि रहलाह। ई विलोकि दीनेशबाबू तुरन्त भाइक निकट चल अयलाह तथा बहुत कातर स्वरमे पुछलथिन्ह -" भाइ, पेटमे दर्द होइत अछि की? निमक सुलेमानी नेने आउ?� रमेशबाबू तुरन्त उत्तर देलथिन्ह -" कोनो चीज लेबाक जरूरत नहि। एक सन्ध्या उपवास कयला उत्तर काल्हि धरि दर्द छूटि जायत।" त� थोड़ बहुत दूध-तूध पी लिअ। ने ने आउ?� नहि दीनेशबाबू, पेट दर्दमे कतौ दूध पिअल जाइत छैक? आहाँ चिन्ता जुनि करी। बस, हमर कहिनी मानू, जाउ, आहाँ भोजन क� लिअ।" लाचार भ� क� दीनेशबाबू कोनो तरहेँ भोजन कय लेलन्हि।
(३)
राति बहुत व्यतीत भ� गेल छलैक। एक हावगाड़ी रमेशबाबूक घरक सामने ठाढ़ भय गेल। श्रीमतीजी गाड़ी सँ उतरली, ता तक रमेशबाबू सूतल नहि छलाह। लालटेनक सिरहानामे ल� क� � सर्चलाइट� पढ़ि रहल छलाह।श्रीमतीजीकेँ घरमे प्रवेश करतहि श्री रमेशबाबू आँखि उठा क� हुनका दिश तकलखिन्ह, परन्तु पुनः अखबार पढ़बमे लीन भय गेलाह।श्रीमतीजी अपन पतिकेँ तिरछी नजरिसँ देखैत अपन वस्त्रकेँ परिवर्तन करय लगलीह। लालटेनक ज्योति सब दिश एक समान नहि पड़ैत छलैक। अतः कोनो चीज श्रीमतीजीकेँ तकला उत्तर नहि भेटलन्हि। ताहि ओ खिसिआ क� कहलथिन्ह--" घरमे त� एक टा लालटेन, ओहो आहाँ अपन निकटमे राखि पढ़ाइ कय रहल छी। हजारो बेर बाजल होयब जे लालटेन सँ काज नहि चलि सकैत अछि, बिजली लगबा लेबाक चाही। परन्तु हमर बात सुनैत के अछि?
रमेशबाबू लालटेनकेँ चुपचाप हटा क� राखि करोट बदलि कय सुति रहलाह।श्रीमतीजी पुनः किछु नहि बजलीह।लालटेन केँ तेज कय एक अँग्रेजी किताब हाथमे ल'क� पढ़य लगलीह।किछु कालक बाद ओम्हर मुँह फेरि कय रमेशबाबू बजलाह -- जे किछु दोष अछि से हमर। बिना पुछि कय वायस्कोप देखय जायब तथा एकर अतिरिक्त राति क� पुस्तक पढ़बमे जेना कोनो बात नहि।" श्रीमतीजी पुस्तक दिस तकैत बजलीह-� पुछबाक की मतलब अछि? सब कार्यमे पुछहि पड़त की? एतेक कठिन बन्धन मे हम नहि रहि सकै छी। हम ई पहिने सूचित कय देबय चाहैत छी। किछु क्षण ठहरि क� पुनः बजलीह --" श्रीमतीजी बनर्जी ठीके कहैत छथिन्ह जे पुरुषजाति अन्यायपूर्वक स्त्री-जातिकेँ पराधीन बना क'रखैत अछि। जिनकर वास्ते मरै छी अथवा जीवै छी, ओही दुलरुआ भाइकेँ उपदेश दिअ। ओ सब सहन करताह। परन्तु दुःख एहि बातक अछि जे एहेन बुद्धि ल'क� जन्म नहि लेलहुँ आर ताहू पर पितासँ गलती स� दू अक्षर पढ़ब सीख लेलौं। एहि कारणसँ कह� पड़ैत अछि जे किछु कहब ओकरा सिर नबा क �मानि लेब हमरासँ नहि भ� सकैत अछि।"
रमेशबाबू चटपट शय्यापर उठि बैसि रहलाह। हुनक चक्षु अग्नि सदृश भय गेलनि। डपटि क� बजलाह -" हँ, हँ, छोट भाइकेँ आदेश देबनि आ हजारो बेर देबनि।किन्तु ....." तदुपरान्त बातकेँ अपूर्ण छोड़ि ओ तुरन्त कोठरीसँ बाहर भय गेलाह। श्रीमतीजी क्रोधित भय किछु काल प्रयन्त चुपचाप किताब खोलने बैसल रहलीह।
(४)
माघ मास प्रायः खतम भ'रहल छलैक। एक दिन आफिस घर अबैत समयमे रास्तामे रमेशबाबू एकाएक एक प्राइवेट हवागाड़ीपर श्रीमती कमला देवी, प्रबोध चन्द्रबाबू तथा एक कोनो तेसर व्यक्तिकेँ जाइत देखलखिन्ह। प्रबोधबाबू मोटर चला रहल छलाह तथा श्रीमती कमला देवी हुनक पाँजर मे बैसल छलीह। मोटर रमेशबाबूक कात सँ तीरक समान चल जाइत रहल। रमेशबाबू अभिमान तथा क्रोधसँ भारी मोन ल'क� धीरे-२ घर अयलाह। अवितहि देरी दीनेशबाबू केँ पुछलथिन्ह--" आहाँक भाउज घर सँ जाइत काल किछु कहने रहथि?� दीनेश उत्तर देलथिन्ह-� ओ तँ हमरा किछु नहि कहलन्हि।"
अनुमान नहि कैल जा सकैछ जे आइ कियैक रमेशबाबू भाइक संग वायस्कोप देख� चल गेलाह। बीचमे जखन 'इनटरभल� भेलैक तँ सहसा रमेशबाबूक दृष्टि ऊपरक एक 'बॉक्स� पर जा पड़लन्हि। ओहिठाम
श्रीमती कमला देवी, प्रबोधबाबू तथा श्रीमती बनर्जी तीनू गोटे बैसल छलीह। रमेशबाबू पुनः रुमालसँ आँखि पोछि देखलन्हि,
ताकि कोनो सन्देह नहि रहि जाय। देखलनि जे वास्तवमे वैह तीनू गोटे उपस्थित अछि। ओ स्पष्ट देखलथिन्ह जे कोनो बातपर प्रबोधबाबू हँसैत-हँसैत ओतेक लोकक समक्षमे अत्यन्त निर्लज्जतापूर्वक श्रीमतीजीक देहपर लोटि गेल छलाह।
*********
छि: छि: ! रमेशबाबू अधिक काल तक ओम्हर नहि ताकि सकलाह। ओ झटपट अपन स्थानपर सँ उठि दीनेशबाबूकेँ कहलथिन्ह --" आहाँ बैसल रहू, हम कनेक बाहरसँ अबैत छी।� ओ मोनहि मोन ई सोचय लगलाह--" ऐ कमला ! कि पर पुरुषके संग एतेक घनिष्ठता।"
पुनः वायस्कोप प्रारम्भ भेल।परन्तु रमेशबाबूकेँ मोन नहि लगलन्हि। ऊपरक घृणित दृश्य पुनः-पुनः स्मरण भेला सन्ता ओ बहुत अगुता गेलाह। जैखन वायस्कोप बन्द भेलैक, ओ झट बिना कोम्हरो देखैत सोझे भाइक संग बाहर भय गेलाह। तथा 'बस� पकड़बाक हेतु आगू बढ़लाह। दैव प्रतिकूल छलथिन्ह सहसा 'कमला'क सँग पुनः एक बेरि हुनक दृष्टि एकत्रित भय गेलन्हि।ओहि समयमे कमलाक एक हाथ प्रबोधबाबूकेँ हाथमे फँसल छलन्हि। रमेशबाबू शीघ्र ओम्हरसँ दृष्टि फेरि �बस� मे सवार भय गेलाह। किन्तु ओहि समयमे रमेशबाबू श्रीमतीजीसँ किछु नहि पुछलथिन्ह। श्रीमतीजी सेहो ओहि प्रसंगकेँ छोड़ि देलनि।परन्तु भीतरे भीतर ओ अग्नि प्रज्वलित हुअ लागल।
(५)
किछु दिनक बाद एक दिन जखनि रमेशबाबू आफिससँ अयलाह तँ हुनका देहमे धाह भय गेल छलनि।हुनक शरीर ज्वर सँ अत्यन्त प्रज्वलित भय रहल छलन्हि। घर मे प्रवेश करितहिं पलंगपर पड़ि रहलाह तथा तुराइ देहपर ओढ़ि लेलन्हि।माथ दर्दसँ हुनक मोन पीड़ित छलैन्ह। साँझक लालटेन जखन लेसबाक हेतु श्रीमती कमला देवी अयलीह त� हुनक दृष्टि बिछौना पर पडलैन्ह। धीरे-धीरे लालटेन लेसि क� टेबुल पर राखि देलथिन्ह तथा किछु काल पर्यन्त स्वामीकेँ म्लान मुखक दिस तकैत छलीह। एहि बीचमे दूनू गोटाक बीचमे मुँहाबज्जी अकारण बन्द भय गेल छलन्हि। कमला देवी सेहो जी खोलि कय वार्तालाप नहि करैत छलीह तथा रमेशबाबू सेहो नहि करैत छलाह।अनुमान नहि कैल जा सकैछ जे कियैक श्रीमतीजीक हृदय विदीर्ण भय गेलन्हि। ओ एक अपराधिनीक सदृश धीरे-धीरे आगू बढ़लीह तथा स्वामीकेँ निकट मे आबि क� स्नेहपूर्ण स्वरमे बजलीह --" ज्वर भय गेल अछि?� रमेशबाबू किछु उत्तर नहि देलथिन्ह। तुराइ ल'क� माथ-पर्यन्त झाँपि करोट बदलि लेलन्हि। श्रीमतीजी किछु कालतक चुपचाप ठाढ़ छलीह तथा पुनः धीरे-धीरे बाहर चल गेलीह।
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जैखन दीनेश बाबू टहलि बुलिक� घर अयलाह, भाउज बहुत दुखित भय कहलथिन्ह -" आहाँ भाइ के ज्वर भय गेलन्हि अछि। कनेक ऊपरे आबि क� बैसू।हम ता तक दूध गर्म कय नेने अबैत छी।�
एकर थोड़े कालकबाद श्रीमती बनर्जी प्रबोध तथा श्रीमतीजीकेँ सोर कयलथिन्ह। आइ स्त्री-स्वाधीनताक विषयपर श्रीमती बनर्जीक अत्यन्त महत्वपूर्ण भाषण हुअ बला अछि। श्रीमती बनर्जी श्रीमतीजीसँ कहने रहथिन्ह जे हम जाइ काल संग कय लेब।
सखी स्वर जानि कय श्रीमतीजी तुरन्त भनसा घरसँ बाहर अयलीह तथा उदास मोन सँ कहलथिन्ह-� आइ हम नहि जा सकब--हुनका ज्वर भय गेलनि अछि।" श्रीमती बनर्जी जोरसँ ठहक्का मारलन्हि तथा श्रीमतीजीकेँ कनेक धक्का द'क� बजलीह--� ज्वर भय गेलन्हि अछि? त� थोड़ेक ज्वर भेला सँ ...." श्रीमतीजीकेँ ई नीक नहि लगलन्हि। ओ बीचहिमे बात कटैत बजलीह -;" सखी, कनेक कम जोड़ सँ, नहि तँ सुनि लेताह। हमरा छोड़ि दिअ, एहन अवस्थामे हम हुनका छोड़ि क� नहि जा सकैत छी। एतवा कहि ओ फेरि चुलही लग चल गेलीह। श्रीमती बनर्जी गम्भीरतापूर्वक बजलीह-� मि. प्रबोधचन्द्र गाड़ी पर बैसल बहुत उत्सुकताक संग आहाँक रास्ता देखि रहल छथि।आहाँक नहि गेला सँ हुनका बड़ दुःख होयतन्हि। आहाँसँ हमरा एहन आशा नहि छल।" श्रीमतीजी धीरे-धीरे परन्तु दृढ़तापूर्वक कहलथिन्ह-" श्रीमती बनर्जी मनुष्यकेँ मोन विचार परिवर्तन कर'मे अधिक विलम्ब नहि लगैत छैक। तथा हम हुनका बाट देख� नहि कहने छलिअन्हि, ओ खुशी रहथि वा नाराज, हुनका सँ हमरा लगाव कोन तरहक?� ई कहि ओ भनसा घर मे चल गेलीह तथा तुरन्त गर्म दूध कटोरामे लय ऊपर चल गेलीह।
***********
श्रीमती बनर्जी विस्मित भय किछु काल पर्यन्त हुनका दिस तकैत छलथिन्ह तथा पुनः धीरे-धीरे ओहिठाम सँ बाहर चल गेलीह।
(६)
क्रमशः
(प्रभात: वर्ष-१, अंक-१०,अक्टूबर-१९३३ई.)
उपर्युक्त कथा जँ आगाँ खण्ड अबितैक तँ उपन्यासो भ� सकैत छलैक, यद्यपि अपूर्ण अछि, आगाँ ६ लिखि क� क्रमशः लिखल अछि, किन्तु अपने आपमे पूर्ण अछि। सभ अंक उपलब्ध नहि रहलाक कारणसँ आगाँक अंकमे कतहु नहि भेटल, लिखल तँ गेले छलैक, कारण ६ लिखल छैक। जे से, अछि धरि ई कथा महत्वपूर्ण। मैथिलानीक नारी स्वतन्त्रताक बात आ ओहि स्वतंत्रतामे पर-पुरुषसँ प्रेम जे बंगाली अछि, ओकर पत्नीक समक्षहि आलिंगनबद्ध होयब, मुदा बिना कोनो दवावक पुनः मैथिलानीक संस्कारकेँ आत्मसात क� लेब,आगाँ बढ़ि, पैर पाछाँ क� लेब नीक जकाँ लेखकक कलम चललनि अछि। जँ आगाँक अंक उपलब्ध रहितैक, तँ ई कथा कोन मोड़ लैत, से कहनाइ कठिन अछि। कथामे शब्दक प्रयोगमे देशज शब्दक बहुतायत अछि, जे आब क्रमशः लुप्त भेल जा रहल अछि।
एहन आनो कथा, निबन्ध, कविता सभ अछि, जे पूर्ण नहि अछि, मुदा जे अछि से कोशिश करब आगाँक सभमे प्रस्तुत करबाक, जाहिमे भवनाथ मिश्रक �कुंडली-चक्र� ( एक अन्य उपन्यासक आधारपर), देवनारायण चौधरीक 'आश्चर्य-विचार', अमरनाथ ठाकुर, सिंहवाड़क 'देहाती अर्थ� आदि जाहिमे हास्यो अछि, व्यंग्य सेहो संगहि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्थापर आलेख सेहो। कवितामे ययातिक कथा, किष्किन्धा काण्ड-रामायणक अनुवाद सम्पादक तारानाथ झाक ज्येष्ठ भ्राता चन्द्रनाथ झाक अनेक अंकमे अछि, ओहो यथासाध्य पाठकक लेल प्रस्तुत करबाक प्रयास करब।
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-4
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अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
२.३.प्रणव कुमार झा-सहकारिताक धागा सभसँ आगा
प्रणव कुमार झा
सहकारिताक धागा सभसँ आगा
"सहकारिता के धागे, सबसे आगे"- हमर पिता जी जे पंडौल सहकारी सूत मील, मधुबनी मे काज करैत छलाह, ओहि मीलक दीवारि पर ई सूक्ति जखन मीलक भीतर घूमैक अवसर भेटैत छल तखन हम सभ अक्सर पढ़ैत छलहुँ । ओहि समय मे हम बच्चा रही। 'सहकारिता' की होइत अछि, ओकर किछु ज्ञान नहि छल। बस एतबे जानैत छलहुँ जे कारखाना मे सूत बनैत अछि, पिता जी ओतय काज पर जाइत छथि, आ दीवारि पर लिखल ओहि पंक्ति केँ हम सभ मजा मे अक्सर छंद जकाँ दोहराबैत छलहुँ। बाद मे नागरिकशास्त्रक कक्षा आ पोथी सभ मे सहकारी समितिक विषय मे पढ़बाक मौका भेटल आ एकरा सँ परिचय भेल छल। बात किछु किछु बुझना मे आयल छल मुदा बहुत किछ नै। आब जखन सोचैत छी तऽ लगैत अछि जे ओहि दीवारि पर किछु किछु नहि, अपितु बहुत किछु लिखल छल।
निश्चित रूप सँ ई सूक्ति मील मे काज करय बला लोकक मनोबल बढ़यबाक लेल आ सहकारी कारखाना मे बनल सूत (धागा) क गुणवत्ताक समर्थन मे लिखल गेल होयत, मुदा एकरा गहिराई सँ देखला पर एकटा गूढ़ विचारधारा सेहो पिरोयल देखाइत पड़े अछि।
"सहकारिताक धागा, सभ सँ आगाँ" - ई केवल एकटा सूक्ति नहि, बल्कि भारतक सामाजिक जीवन, सामूहिक प्रयास आ आत्मनिर्भरताक गहीर समझ केँ दर्शाबय वाला एकटा विचार काहल जा सकय अछि। जेना सूतक महीन रेशा सभ आपस मे जुड़ि कऽ मजबूत धागा बनबैत अछि, ओहिना सहकारिता मे हरेक व्यक्तिक सहभागिता सँ एकटा एहन तंत्र बनैत अछि जे समाज केँ मजबूती प्रदान करैत अछि। सहकारिताक मूल भाव अछि: "साझा प्रयास, साझा लाभ"। एहि मे नै कोनो मालिक होइत अछि, नै कोनो कर्मचारी। सभ सदस्य होइत छथि आ सभक समान अधिकार होइत अछि। ई लोकतंत्रक जड़ि केँ मजबूत करैत अछि, कियाक तऽ निर्णय सामूहिक रूप सँ लेल जाइत अछि आ लाभक वितरण सेहो समान रूप सँ होइत अछि।
भारत मे दुग्ध उत्पादन मे 'अमूल' जकाँ सहकारी संस्था सँ लय कऽ बिहारक 'सुधा डेयरी', महाराष्ट्रक 'वारणा', कर्नाटकक 'नंदिनी' आ पंजाबक सहकारी मंडी सभ - ई सभ उदाहरण अछि जे कोना सहकारिता किसान, श्रमिक आ छोट व्यापारी सभ केँ शोषण सँ मुक्ति दिया कऽ हुनका आर्थिक, सामाजिक आ मानसिक रूप सँ सशक्त बना सकय अछि।
ई सूक्ति हमरा याद दियाबैत अछि जे अकेले चलला सँ लोक तेज चलि सकैत छी, मुदा संग चलला सँ लोक दूर धरि जा सकैत छी। यैह सहकारिताक आत्मा अछि - मिलि-जुुलि कऽ आगाँ बढ़ब, एकटा महीन धागा सँ सभक संग बान्हल रहब।
यदि लोकतंत्रक आत्मा गामक चौबटिया आ पंचायत मे बसैत अछि, तऽ ओकर धड़कन सहकारिताक ताना-बाना मे स्पंदित होइत अछि। ई ओ धागा अछि, जे कच्ची सड़क पर धूर उड़बैत ट्रैक्टर सँ लय कऽ शहरी चकाचौंध मे हाउसिंग सोसाइटीक वार्षिक सभा धरि, हर नागरिक केँ एक सूत्र मे पिरोबैत अछि। सहकारिता केवल आर्थिक साझेदारी नहि अछि; ई ओ विचार अछि, जे खेत-खलिहान, बजार, बस्ती आ हाउसिंग सोसाइटी मे जन-जीवन केँ गरिमा दैत अछि। ई ओ मंच अछि, जतय आम नागरिक केवल मतदाता नहि रहि कऽ सहभागी बनैत अछि, निर्णयकर्ता बनैत अछि, आ अपन सपना केँ गढ़बाक हकदार बनैत अछि।
सहकारिता ओ पुल अछि, जे सत्ताक गलियारा सँ दूर, गामक माटि मे बसल उम्मीद केँ शहरक चमक सँ जोड़ैत अछि। ई ओहि किसानक पुकार अछि, जे साहूकारक ब्याज दर सँ मुक्त भऽ अपन सहकारी बैंक सँ कर्ज लैत अछि। ई ओहि महिलाक ताकत अछि, जे स्वयं सहायता समूहक सिलाई मशीन सँ, हस्त उद्योग सँ, अपन बच्चा सभ लेल स्कूलक खर्च जुड़बैत अछि। ई ओ लोकतंत्र अछि, जे संसदक ऊँच दीवारि सँ पार, गामक चौबटिया पर साँस लैत अछि।
सहकारिता संसाधनक साझेदारी, मुनाफाक बराबरी, निर्णय मे हिस्सेदारी आ जिम्मेदारीक समानताक प्रतीक अछि। ई ओ प्रक्रिया अछि, जतय लोक मिलि कऽ किछु सकारात्मक रचैत अछि। चाहे ओ दूधक नदी होय, अनाजक गोदाम होय, या स्वरोजगारक स्टार्टअप के नव राह। सहकारिता ओ पाठशाला अछि, जे सामूहिक निर्णय लेबऽ सिखाबैत अछि; ओ बैंक अछि, जे भरोसा बाँटैत अछि; आ ओ गोदाम अछि, जे उम्मीद सभ केँ सँजोइत अछि।
वर्तमान भारत मे, जखन लोकतंत्र केँ अक्सर मतदान धरि सीमित कऽ देल गेल अछि, सहकारिता ओकर आत्मा केँ जीवंत रखैत अछि। ई ओ मंच अछि, जतय हर व्यक्ति, चाहे ओ गामक किसान होय, शहरक मजदूर या बस्तीक गृहिणी, अपन मुद्दा के लेल बनल छोट-छोट समूह सभ मे अपन आवाज केँ बुलंद कऽ सकैत अछि। ई ओ व्यवस्था अछि, जे समाज केँ सरकार सँ पहिने रखैत अछि, आ लोक केँ लोकतंत्रक असल नायक बनाबैत अछि।
सहकारिता भारतक लेल कोनो आयातित विचार नहि अछि। अपना ओतय तऽ सहभोजन, सहयात्रा, आ सहश्रवणक परंपरा पुरान समय से रहल अछि - संग खायब, संग चलब, आ संग सुनब। ई सामूहिकताक ओ भावना अछि, जे ग्रामीण समाज आ नगरीय अर्थव्यवस्था दुनू मे जीवंत छल। मुदा ब्रिटिश काल मे गुलामीक बेड़ी मे जकड़ल देश मे किछु समय लेल ई भावना कदाचित नैपथ्य मे चलि गेल छल।
कहल जाइत अछि जे, हरेक बड़का बदलाव एकटा छोट कदम सँ शुरू होइत अछि। 19म सदीक अंतिम दशक मे, जखन भारत ब्रिटिश राजक बेड़ी मे जकड़ल छल, गामक किसान साहूकार सभक ब्याजक बोझक नीचाँ दबल छलाह। खेत मे पसीना बहैत छल, मुदा फसलक दाम साहूकारक अंटी (पॉकेट) मे जाइत छल। तखने, जर्मनी सँ एकटा विचार आयल - रायफाइज़न मॉडल। ई एहन बीया छल, जे सामूहिकताक माटि मे जनमैत छल। 1904 मे सहकारी क्रेडिट सोसाइटी अधिनियम एहि बीज केँ भारतक धरती पर बाउ केलक। मद्रासक कन्याकुमारी मे पहिल औपचारिक सहकारी समिति बनल, जे किसान सभ केँ सस्ता कर्जक वादा लय कऽ आयल छल। परतंत्र भारतक हजारो-लाखो किसान, कामगार, व्यापारी सभ लेल ई एहन छल, मानु गामक चौबटिया पर एकटा नव गीत शुरू भेल हो - आपसी विश्वास आ एकजुटताक गीत।
1912 मे सहकारी समिति अधिनियम एहि स्वर केँ आर बुलंद कयलक। आब नै केवल कर्ज, बल्कि फसलक विपणन, उपभोक्ता सामान आ उत्पादन लेल सेहो सहकारी समिति सभ बनय लागल। देश लेल ई एकटा नव भोर जकाँ छल, जतय लोक अपन रोज़मर्रा आ आजीविका व्यवस्था लेल आब अकेले नहि, बल्कि एक-दोसरक काँध सँ काँध मिला कऽ चलि रहल छलाह।
महात्मा गांधी सहकारिता केँ ग्राम स्वराज क आधार बनौलनि। हुनका लेल, सहकारिता केवल आर्थिक साधन नहि छल; ई सामाजिक आ नैतिक सशक्तीकरणक रास्ता छल। दक्षिण अफ्रीका मे फीनिक्स सेटलमेट (1904) आ टॉल्स्टॉय फार्म (1910) मे ओ सहकारी जीवनक मॉडल प्रस्तुत कयलनि, जतय लोक सामूहिक रूप सँ खेती, उत्पादन आ जीवनयापन करैत छलाह। भारत मे, स्वदेशी आंदोलन (1905) आ असहयोग आंदोलन (1920-22) मे सहकारी समिति सभ स्वदेशी उत्पाद केँ बढ़ावा दऽ कऽ ब्रिटिश शोषणक विरोध कैल गेल छल। सेवाग्राम आश्रम मे गांधीजी सहकारी सिद्धांत केँ जीवंत कयलनि, जतय ग्रामीण समुदाय केँ सामूहिक निर्णय लेबय आ आत्मनिर्भरताक शिक्षा देल गेल छल। ई ओ दौर छल, जखन सहकारिता गाम गामक नस मे गंगाक धारा जेना बहय लागल छल।
स्वतंत्रताक बाद, सहकारी आंदोलन भारतक लोकतान्त्रिक ढाँचा मे एकटा महत्वपूर्ण स्थान बनौलक। पंडित जवाहरलाल नेहरू सहकारिता केँ पंचायत आ विद्यालयक संग ग्रामीण लोकतंत्रक आधार मानलनि। प्रथम पंचवर्षीय योजना (1951-1956) सहकारी समिति सभ केँ ग्रामीण विकासक केंद्र बनौलक। 1963 मे राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) क स्थापना सहकारी समिति सभ केँ वित्तीय आ तकनीकी सहायता प्रदान कयलक। श्वेत क्रांति सँ अमूलक सफलता साबित कयलक जे सहकारिता लोकतंत्रक ओ परछाइ अछि, जे संसदीय लोकतंत्र सँ सेहो कहीं बेसी जन-केंद्रित अछि।
2011 क 17म संविधान संशोधन सहकारिता लेल एकटा ऐतिहासिक कदम छल। अनुच्छेद 43B सहकारी समिति सभ केँ नीति निदेशक तत्वक रूप मे मान्यता देलक, आ अनुच्छेद 19(1)(c) संगठन बनाबयक मूल अधिकार प्रदान कयलक। ई संशोधन सहकारी समिति सभ केँ लोकतान्त्रिक भागीदारीक एकटा संवैधानिक मंच बनबैत अछि, जतय सदस्य सभ केँ समान मत आ निर्णय लेबय के अधिकार प्राप्त अछि।
6 जुलाई 2021 के भारत सरकार मे अलग सहकारिता मंत्रालयक स्थापना भारत मे सहकारी आंदोलन केँ एकटा नव गति देलक अछि। तखन सँ आई धरि देशक विभिन्न राज्य मे हजारो नव सहकारी संघ बनल अछि, जइ मे महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, जम्मू कश्मीर आ मध्य प्रदेश अग्रणी राज्य अछि। एहि मंत्रालयक उद्देश्य सहकारी समिति सभ केँ एकटा सच्चा जन-आधारित आंदोलनक रूप मे जमीनी स्तर धरि पहुँचाबयब आ सहकारी आधारित आर्थिक मॉडल विकसित करब अछि, जतय प्रत्येक सदस्य जिम्मेदारीक भावनाक संग काज करैत अछि। मंत्रालय 'सहकार सँ समृद्धि' कऽ मंत्रक संग सहकारी समिति सभ लेल प्रक्रिया सभ केँ सुव्यवस्थित कयलक आ बहु-राज्य सहकारी समिति (MSCS) कऽ विकास केँ सक्षम बनौलक। ई लोकतान्त्रिक भागीदारी केँ बढ़ावा देबाक एकटा महत्वपूर्ण कदम अछि, कियाक तऽ ई सुनिश्चित करैत अछि जे सहकारी समिति सभ पारदर्शी आ समावेशी ढंग सँ संचालित हो।
सहकारी समिति अपन संरचना मे ही लोकतान्त्रिक अछि। प्रत्येक सदस्य केँ एक वोटक अधिकार होइत अछि, चाहे ओकर आर्थिक स्थिति किछुओ हो। ई 'एक व्यक्ति, एक वोट' कऽ सिद्धांत सहकारी समिति सभ केँ लोकतंत्रक एकटा माइक्रोकॉसम (लघु रूप) बनबैत अछि। उदाहरण लेल, प्राथमिक कृषि ऋण समिति (PACS) गाम स्तर पर कार्य करैत अछि आ किसान सभ केँ सस्ता ऋण, बीज, उर्वरक आ विपणन सुविधा प्रदान करैत अछि। वर्ष 2023 धरि, भारत मे लगभग 1 लाख PACS चलि रहल अछि, जे 13 करोड़ सँ बेसी किसान केँ जोड़ैत अछि। ई समिति सभ ग्रामीण भारत मे लोकतान्त्रिक भागीदारीक एकटा जीवंत उदाहरण अछि, कियाक तऽ ई किसान सभ केँ सामूहिक निर्णय लेबय आ संसाधनक समान वितरणक अवसर दैत अछि।
स्वतंत्रताक बाद सहकारिता सँ सशक्तीकरणक दिशा मे किछु मीलक पत्थर:
अमूल: लोकतान्त्रिक सशक्तीकरणक प्रतीक: कैरा सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ (अमूल) सहकारिता आ लोकतान्त्रिक भागीदारीक एकटा जीवंत उदाहरण अछि। 1946 मे स्थापित, अमूल डॉ. वर्गीज कुरियनक नेतृत्व मे श्वेत क्रांतिक नींव राखलक। ई मॉडल गाम स्तर पर दुग्ध सहकारी समिति सभ केँ संगठित करैत अछि, जतय प्रत्येक सदस्य केँ एक वोट आ लाभांशक समान अधिकार छैक। ई 'एक व्यक्ति, एक वोट' कऽ सिद्धांत लोकतान्त्रिक भागीदारीक आत्मा केँ दर्शाबैत अछि। 2023 धरि, अमूल 36 लाख दुग्ध उत्पादक केँ जोड़ने अछि, जइ मे 40% महिला छथि। ई करीब 18 हजार गाम से प्रतिदिन 2.5 करोड़ लीटर दूधक संग्रह करैत अछि, आ एकर वार्षिक कारोबार अस्सी हजार करोड़ टका सँ बेसी अछि। अमूल नै खाली लाखो किसान आ कर्मचारी सभ केँ आर्थिक सशक्तीकरण प्रदान कयलक अछि, अपितु ग्रामीण महिला आ सीमांत किसान सभ केँ सामाजिक समानताक मंच सेहो देने अछि। ई सहकारिताक ओ चेहरा अछि, जे लोकतंत्र केँ गामक चौबटिया धरि लय जाइत अछि।
सुधा: बिहार मे सहकारी लोकतंत्र: बिहार मे सुधा दुग्ध उत्पादन समिति 1990 कऽ दशक मे आर्थिक संकट केँ बीच एकटा नव उम्मीद जगौने छल। 1990 कऽ दशक मे जखन बिहार मे कल-कारखाना एक के बाद एक बंद भऽ रहल छल, बिहार राज्य दुग्ध सहकारी संघ (कॉम्फेड) कऽ तहत संचालित सुधा, छोट आ सीमांत दुग्ध उत्पादक सभ केँ संगठित कयने छल। 2023 धरि, सुधा दस हजार सँ बेसी दुग्ध सहकारी समिति सभक माध्यम सँ 15 लाख दुग्ध उत्पादक केँ जोड़ने अछि। ई प्रतिदिन 15 लाख लीटर दूधक संग्रह करैत अछि, आ एकर वार्षिक कारोबार पाँच हजार करोड़ टका सँ बेसी अछि। सुधा बिहारक मरइत ग्रामीण अर्थव्यवस्था केँ पुनर्जीवन देलक आ लोकतान्त्रिक भागीदारी केँ सशक्त बनौलक। ई बिहारक दुग्ध उत्पादक किसान आ वितरण आ विपणन मे लागल लोक सभ केँ विकासक एकटा नव दिशा देखौलक, जकर परिणामस्वरूप सुधाक अलावा सेहो कतेको सहकारी दुग्ध उत्पादक समिति सभक गठनक मार्ग प्रशस्त भेल आ आई बिहारक गाम-गाम मे एहन दुग्ध उत्पादक समिति देखय लेल भेटत जे राज्यक लाखो लोकक जीविकाक साधन बनल अछि।
किसान उत्पादक संगठन (FPO): सामूहिक सौदेबाजीक शक्ति - किसान उत्पादक संगठन (FPO) सहकारी आंदोलनक एकटा आधुनिक स्वरूप अछि। ई संगठन किसान सभ केँ सामूहिक सौदेबाजी, इनपुट, आ बजार धरि पहुँच प्रदान करैत अछि। राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) 2023 धरि दस हजार FPO स्थापित करबाक लक्ष्य राखने छल, जइ मे सँ 1100 PACS कऽ माध्यम सँ गठित कयल गेल अछि। 2023 धरि, भारत मे 8 हजार सँ बेसी FPO कार्यरत अछि, जे 20 लाख सँ बेसी किसान केँ जोड़ैत अछि। एहि मे सँ 60% FPO सहकारी मॉडल पर आधारित अछि। उदाहरण लेल, महाराष्ट्रक 'सह्याद्री फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी' बारह हजार किसान केँ जोड़ैत अछि आ फल तथा तरकारीक निर्यात मे हजार करोड़ टकाक कारोबार करैत अछि। ई मॉडल किसान सभ केँ बजारक अनिश्चितता सँ बचबैत अछि आ हुनका लोकतान्त्रिक निर्णय लेबाक मंच दैत अछि।
स्वयं सहायता समूह (SHG): महिला सभक आवाज - स्वयं सहायता समूह (SHG) ग्रामीण भारत मे महिला सभ केँ लोकतान्त्रिक भागीदारीक एकटा सशक्त मंच प्रदान कयलक। ई समूह महिला सभ केँ स्वरोजगार, वित्तीय साक्षरता आ सामुदायिक नेतृत्वक अवसर दैत अछि। लिज्जत पापड़ आ 'सेल्फ-इम्प्लॉयड वीमेन एसोसिएशन' (SEWA) एकर जीवंत उदाहरण अछि। 2023 धरि, भारत मे 1.2 करोड़ SHG अछि, जे 14 करोड़ महिला केँ जोड़ैत अछि। एहि मे सँ तीस हजार सँ बेसी SHG सहकारी समितिक रूप मे पंजीकृत अछि, जे 50 लाख महिला केँ रोजगार दैत अछि। उदाहरण लेल, लिज्जत पापड़ 45 हजार सँ बेसी महिला केँ रोजगार दैत अछि आ एकर वार्षिक कारोबार सोलह सौ करोड़ टका सँ बेसी अछि। ई सहकारिताक ओ शक्ति अछि, जे महिला सभ केँ सामाजिक परिधि सँ बाहर अनैत अछि आ हुनका लोकतान्त्रिक नेतृत्वक अवसर दैत अछि।
डिजिटल सहकारिता: CSC आ PACS क एकीकरण - कॉमन सर्विस सेंटर्स (CSC) आ PACS क बीच 2022 मे भेल समझौता सहकारी आंदोलन केँ डिजिटल युग मे प्रवेश करौलक। PACS आब 300 सँ बेसी डिजिटल सेवा प्रदान करैत अछि, जइ मे बैंकिंग, बीमा, आ सरकारी योजनाक लाभ शामिल अछि। ई पहल ग्रामीण भारत मे डिजिटल साक्षरता आ लोकतान्त्रिक भागीदारी केँ बढ़ावा दैत अछि। 2023 धरि, 50,000 सँ बेसी PACS डिजिटल सेवा प्रदान कऽ रहल अछि, जे 2 करोड़ सँ बेसी ग्रामीण नागरिक धरि पहुँचि रहल अछि। उदाहरण लेल, उत्तर प्रदेश मे PACS ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि आ किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) क माध्यम सँ 1.5 करोड़ किसान केँ लाभ पहुँचाओल। ई सहकारिताक ओ चेहरा अछि, जे डिजिटल मंचक माध्यम सँ लोकतान्त्रिक भागीदारी केँ सशक्त बनबैत अछि।
सहकारी समितिक चुनौती: लोकतंत्रक आत्ममंथन सहकारिता जतय एक दिश समाजवादी लोकतन्त्रक व्यावहारिक तंत्र विकसित करैत अछि, ओतहि सहकारिताक बाट मे अनेकानेक काँटा सेहो भरल अछि। स्वतन्त्रता सँ पहिनेहे एहि व्यवस्थाक चुनौती उजागर होबय लागल छल। मैक्लेगन समिति (1915) सहकारी समितिक संचालन मे निरक्षरता, भाई-भतीजावाद आ धनक दुरुपयोग जकाँ समस्या केँ उजागर कयने छल। स्वतन्त्रताक बाद, रामनिवास मिर्धा समिति बतौलक जे 25% सहकारी समिति निष्क्रिय अछि। वर्तमान मे, सहकारी आंदोलन केँ निम्नलिखित चुनौतीक सामना करय पड़ि रहल अछि:
राजनीतिक हस्तक्षेप: अक्सर कतेको सहकारी समिति राजनीतिक प्रभाव मे आबि जाइत अछि, जइ सँ ओकर स्वायत्तता कमजोर होइत अछि आ ओकर परिचालन बाधित अथवा प्रभावित होइत अछि। NCUI क 2023 क आँकड़ाक अनुसार, 30% सहकारी समिति मे नियमित चुनाव नहि होइत अछि। ऊपर जइ पंडौल सहकारी सूत मीलक चर्चा कयल गेल अछि, ओहो 2000 क दशक शुरू होइत-होइत बंद भऽ गेल, जकर पाँछा एकटा पैघ कारण राज्यक तात्कालिक आ स्थानीय राजनीति केँ ही मानल जा सकैत अछि। जखन पंडौल जकाँ स्थानीय इकाई सभ वैश्विक प्रतिस्पर्धा या आंतरिक कुप्रबंधनक कारणे बंद होइत अछि, तऽ ई केवल एकटा मील नहि, बल्कि एकटा ओहि से जुड़ल हजारो परिवार के आ सहकारी सपना कऽ टूटब होइत अछि।
वित्तीय अस्थिरता: सहकारी बैंक मे गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) क समस्या गंभीर अछि। 2023 मे, सहकारी बैंक मे NPA क स्तर 10% सँ बेसी छल, जे एकटा चिंताक विषय अछि।
पारदर्शिताक कमी: सहकारी समिति मे अनुगमन आ निरीक्षण अपर्याप्त रहल अछि। 2016-17 मे केवल 68 सहकारी समितिक अनुगमन कयल गेल, जे कुल समितिक 0.1% सँ सेहो कम अछि।
शहरी सहकारिता मे वर्गभेद: शहरी हाउसिंग सोसाइटी अक्सर वर्गभेद आ बहिष्करणक अड्डा बनि जाइत अछि, जे सहकारिताक समावेशी भावनाक विपरीत अछि।
ई चुनौती अक्सर ई प्रश्न ठाढ़ करैत अछि कि की सहकारिताक ई लोकतान्त्रिक माध्यम स्वयं पूर्ण रूपेण लोकतान्त्रिक मूल्य पर चलि रहल अछि?
भविष्यक राह: सहकारिताक पुनरुद्धार सहकारिता लोकतंत्र मे विश्वास जोड़बाक एकटा वैकल्पिक स्वर अछि। जखन युवा बेरोजगारी सँ जूझि रहल होथि, तऽ सहकारी स्टार्टअप्स रोजगारक नव राह देखा सकैत अछि। जखन महिला सामाजिक परिधि मे कैद होथि, तऽ स्वयं सहायता समूह हुनका सशक्तीकरणक पुल प्रदान करैत अछि। जखन बजार मे पूँजीक प्रभुत्व देखाइत अछि, तऽ उपभोक्ता सहकारी संस्था एकटा नैतिक आ समावेशी बजार ठाढ़ कऽ सकैत अछि। भारत टैक्सी (Bharat Taxi) सहकारिता के तहत स्टार्टअप के एकटा टटका उदाहरण अछि जे देशक पहिल सहकारी राइड-हेलिंग सेवा शुरू केलक अछि, जतय ड्राइवर मालिको छथि। एहि मे जीरो-कमीशन मॉडल लागू छै, अर्थात् ड्राइवर सिर्फ मामूली दैनिक शुल्क दऽ कऽ पूरा कमाई कऽ सकैत छथि।
नीतिगत सुधार: सहकारिता मंत्रालय 2023 मे मॉडल उप-नियम लागू कयलक, जइ PACS केँ बहुउद्देश्यीय बनौलक। आब PACS डेयरी, मत्स्य पालन, भंडारण आ अन्य 25 क्षेत्र मे काज कऽ सकैत अछि। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) क संग सहयोग सँ सहकारी बैंक मे वित्तीय पारदर्शिता केँ बढ़ाओल जा रहल अछि।
डिजिटल सहकारिता: PACS क डिजिटलीकरणक योजना 1 लाख PACS केँ डिजिटल प्लेटफॉर्म सँ जोड़ि रहल अछि। ई-नाम (नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट) क संग एकीकरण किसान केँ बजार सँ सीधेत जोड़ैत अछि। ई पहल ग्रामीण भारत मे डिजिटल साक्षरता आ लोकतान्त्रिक भागीदारी केँ सशक्त बनबैत अछि।
सतत विकास लक्ष्य (SDG): सहकारी समिति सतत विकास लक्ष्य केँ साकार करय मे अग्रणी अछि। गरीबी उन्मूलन, खाद्य सुरक्षा, आ लैंगिक समानता जकाँ लक्ष्य केँ अमूल, सुधा आ SHG जकाँ मॉडल आगाँ बढ़ा रहल अछि। जैविक खेती आ नवीकरणीय ऊर्जा पर आधारित सहकारी समिति पर्यावरण संरक्षण केँ बढ़ावा दऽ रहल अछि।
अतः कुल मिला कऽ कहि सकैत छी जे सहकारिता ओ धागा अछि, जे भारतक लोकतंत्र केँ एक सूत्र मे बान्हि कऽ मजबूत बनबैत अछि। सहकारिता मंत्रालय, डिजिटल सहकारिता, आ SDG क संग ई आंदोलन नव ऊँचाई केँ छूबाक प्रयास कऽ रहल अछि। सहकारिता ओ आशा अछि, जे गामक चौबटिया सँ लय कऽ डिजिटल मंच धरि, भारत केँ एकटा समृद्ध, समावेशी आ सच्चे अर्थ मे लोकतान्त्रिक भविष्यक दिशि लय जाइत अछि।
सहकारिता बीतल समयक कोनो मीठगर स्मृति मात्र नहि अछि, अपितु ई 21वीं सदीक भारतक आर्थिक आत्मनिर्भरता कऽ महामार्ग अछि। जखन पंडौलक सूत मीलक ओ दीवारि नव रूप मे गाम-गाम कस्बा-कस्बा मे पुनः नव तकनीक आ पारदर्शिताक संग ठाढ़ होयत, तखने सही अर्थ मे 'सहकार सँ समृद्धि' कऽ सपना साकार होयत।
-प्रणव कुमार झा, राष्ट्रीय परीक्षा बोर्ड, नई दिल्ली
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२.४.डॉ. उमेश मण्डल- पयस्विनी : लोकचेतना आ संवादधर्मिताक समेकित अभिव्यक्ति
डॉ. उमेश मण्डल
अतिथि शिक्षक
सर्व नारायण सिंह राम कुमार सिंह महाविद्यालय, सहरसा (बिहार)
मो.: 9931654742
पयस्विनी : लोकचेतना आ संवादधर्मिताक समेकित अभिव्यक्ति
आधुनिक मैथिली साहित्यमे जगदीश प्रसाद मण्डलजीक उपस्थिति एकटा सशक्त लोकधर्मी रचनाकारक रूपमे जानल जाइत अछि। हुनकर लेखन जीवनक ठोस धरातलसँ उपजल अछि। गामक सामाजिक संरचना, खेतक श्रम-संस्कृति, परिवारक भीतरक तनाव, लोकाचारक निरन्तरता, स्त्री-पुरुषक पारस्परिक स्थिति, उपेक्षित समाजक पीड़ा आ मानवीय गरिमाक प्रश्न हुनकर साहित्यक मूल क्षेत्र बनैत अछि। ऐ कारण हुनकर रचनासभ पाठककेँ दूरक कल्पना-लोकमे नहि, अपन परिचित जीवन-जगतमे लऽ जाइत अछि। ओइ जीवन-जगतमे अनुभवक ऊष्मा, संघर्षक कठोरता आ आशाक मानवीय प्रकाश एक संग उपस्थित रहैत अछि।
जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म 5 जुलाइ 1947 केँ मधुबनी जिलाक लखनौर प्रखण्ड अन्तर्गत बेरमा गाममे भेलैन। हिनकर मातृभाषा मैथिली रहल छैन। हिनक प्रारम्भिक संस्कार गामक परिवेशमे आकार ग्रहण केलक। शिक्षा जनता कॉलेज, झंझारपुरसँ स्नातक स्तरधरि आ सी. एम. कॉलेज, दरभंगासँ हिंदी तथा राजनीति शास्त्रमे स्नातकोत्तर स्तरधरि पूर्ण भेल। पारिवारिक दायित्व, खेती-बाड़ी आ आत्मानुशासनक संग अध्ययनक ई समन्वय हुनकर जीवनक आरम्भिक गठनक महत्त्वपूर्ण पक्ष थिक। ई संयोजन हुनका पुस्तकीय ज्ञान आ व्यवहारिक अनुभव दुनूक साझा धरातल प्रदान केलकैन अछि।
मण्डलजीक जीविकोपार्जनक साधन मूलत: खेती-बाड़ी रहल छैन। जीवनवृत्तमे हुनकर सामाजिक परिचय आत्मनिर्भर कृषकक रूपमे दर्ज अछि। परम्परागत अनुभव आ वैज्ञानिक दृष्टि हुनकर जीवन-दृष्टिक दू महत्त्वपूर्ण आधार मानल गेल अछि। हुनका लेल कृषि केवल उपार्जनक माध्यम भरि नहि, समाज-निर्माणक आधारशिला सेहो अछि। ऐ दृष्टिसँ श्रम, माटि, उत्पादक वर्ग, लोकनिर्भर जीवन-व्यवस्था आ सामुदायिक नैतिकता हुनकर साहित्यिक चिन्तनक केन्द्रीय तत्त्व बनि जाइत अछि। पछुआएल वर्गक संघर्ष, खेती-बाड़ी, कृषक-जीवनपर आधारित यथार्थवादी साहित्य आ सामाजिक रूढ़ि, अंधविश्वास तथा सामन्तवादक विरुद्ध सक्रिय प्रतिरोधक हिनकर जीवनवृत्तमे स्पष्ट रूपेँ भेटैत अछि।
हुनकर जीवन-शैली सेहो विशेष ध्यानाकर्षक अछि। भोर 2 बजेसँ लेखन आरम्भ करबाक आदत, खेतक निरीक्षण, ऋतुगत सादा भोजन, शुद्धलेखन, पुनर्पाठ, शब्द-गणना आ आत्मावलोकनक अनुशासन मण्डलजीकेँ एक सजग साहित्य-साधकक रूपमे स्थापित करैत अछि। लेखकक जीवन आ साहित्य सृजनक बीच एहेन सामंजस्य दुर्लभ होइत अछि। एतए विचार कागजपर उतरल निष्कर्ष मात्र नहि रहैत अछि, बल्कि ओ दिनचर्याक अनुभवसँ पोषित रचनात्मक बोधक रूपमे विकसित होइत अछि। ऐ अनुशासनक प्रतिफल हुनकर विपुल कृतित्व आ लेखनक निरन्तरता दुनूमे देखल जा सकैत अछि।
कृतित्वक स्तरपर जगदीश प्रसाद मण्डल अत्यन्त विपुल रचनाकारक रूपमे प्रसिद्ध छैथ। जीवनवृत्तक अनुसार वर्ष 2000 ई.सँ नियमित लेखनक आरम्भ भेल आ तेकरा पछाइत कथा, उपन्यास, नाटक, पद्य, बाल-साहित्य, आत्मकथात्मक गद्य आ शोध-आलेख धरि हुनकर रचनात्मक क्षेत्र निरन्तर विस्तृत होइत गेल। 1100 सँ अधिक कथा, 20 सँ अधिक उपन्यास, 12 एकांकी ओ नाटक, 12 पद्य संग्रह आ 10 बाल-साहित्यक पुस्तकक उल्लेख हुनकर साहित्य-साधनाक व्यापकता प्रमाणित करैत अछि। एतबे नहि, अखन तक हुनकर 135 सँ अधिक पोथी प्रकाशित भऽ चुकल छैन, जे अपने-आपमे एक विलक्षण सर्जनात्मक उपलब्धि थिक। हुनकर पोथीसभ प्रायः पल्लवी प्रकाशन, निर्मली, सुपौलसँ प्रकाशित होइत रहल छैन, जइसँ हुनकर लेखनक सतत प्रकाशन-परम्परा सेहो स्पष्ट होइत अछि।
जगदीश प्रसाद मण्डलक साहित्यिक अवदानकेँ समय-समयपर अनेक महत्वपूर्ण पुरस्कार आ सम्मानसँ मान्यता भेटल अछि। हुनका विदेह सम्मान- 2011, वैदेह सम्मान- 2012, कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015, वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ सम्मान- 2016, कौमुदी सम्मान- 2017, यात्री चेतना पुरस्कार- 2017, स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान-2018, राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020, अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022, यात्री सम्मान- 2022, मिथिला शिखर सम्मान- 2022 आ महाकवि पण्डित लालदास साहित्य गौरव सम्मान- 2023 प्रदान कएल गेल अछि। एकर अतिरिक्त, ‘गामक जिनगी’ कथा संग्रह टैगोर साहित्य पुरस्कारसँ 2011 इस्वीमे अलंकृत भेल आ ‘पंगु’ उपन्यास साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ 2021 इस्वीमे सम्मानित भेल। ऐ सम्मानसभसँ स्पष्ट अछि जे हुनकर लेखन केवल संख्याक दृष्टिसँ नहि, बल्कि गुण, प्रभाव, वैचारिक गहराइ आ साहित्यिक मान्यताक स्तरपर सेहो विशिष्ट अछि।
हुनकर लेखन परिश्रम, अनुशासन आ वैचारिक सजगताक संग रचनात्मक निरन्तरताक दीर्घ साधनापर आधारित अछि। मैथिली साहित्यमे मण्डलजीक नियमित, अविराम आ बहुविध लेखन बहुतो विद्वानकेँ सदिखन सोचबाक, पुनर्मूल्यांकन करबाक आ समकालीन साहित्यिक मानदण्डसभपर पुनर्विचार करबाक लेल विवश करैत अछि। वर्तमानमे ओ ‘संस्कार’ नामक पोथीक लेखनमे संलग्न छैथ, जे ऐ तथ्यक प्रमाण अछि जे हुनकर सर्जनात्मक प्रवाह अखनौं अविराम रूपेँ सक्रिय छैन।
मण्डलजीक साहित्यक विशिष्टताकेँ स्पष्ट करबामे मैथिली साहित्यक वरेण्य आलोचकसभक मत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध होइत अछि, किएक तँ ऐ मतसभक माध्यमसँ हुनकर रचनाशीलताक बहुआयामी स्वरूप उद्घाटित होइत अछि। किछु आलोचक हुनका ग्रामीण जीवनक सूक्ष्म चित्रकारक रूपमे देखै छैथ, कारण ओ गामक बाह्य दृश्यकेँ मात्र नहि, बल्कि ओकर भीतरी स्पन्दन, श्रम-संस्कृति, सम्बन्धक ऊष्मा, अभावक पीड़ा, लोक-व्यवहारक सहजता आ जीवन-संघर्षक यथार्थकेँ अत्यन्त आत्मीयता आ सजीवतासँ रूपायित करै छैथ। दोसर दिस, अनेक समीक्षकसभक मत अछि जे हुनकर लेखनमे परम्परागत आजीविकाक गौरव, लोक-समाजक स्वाभिमान आ सामाजिक वास्तविकताक स्वाभाविक चित्रण विशेष रूपेँ दृष्टिगोचर होइत अछि। ओ किसान, मजदूर, वंचित, घरेलू स्त्री, बुजुर्ग, युवाक संग लोक-रीति आ ग्राम्य संस्कार सभकेँ एहेन संवेदनात्मक गहराइसँ उपस्थित करै छैथ जे पाठककेँ मिथिलाक जीवन-संसार अपन समग्रतामे सामने उपस्थित बुझि पड़ैत अछि। कियो हुनका मिथिलाक माटि आ जीवन-सत्त्वक सशक्त स्वर कहने छैथ, तँ कियो हुनकर साहित्यकेँ स्वातंत्र्योत्तर भारतमे एक समानान्तर लोक-संसारक सर्जना कहि अभिहित केने छैथ। एहि प्रकारक अभिमत केवल प्रशंसात्मक टिप्पणी भरि नहि अछि, बल्कि ई बातक प्रमाण अछि जे मण्डलजीक रचना-संसार लोकजीवनक साधारण अनुभवसभकेँ गम्भीर साहित्यिक गरिमा प्रदान करैत अछि।
ऐ समालोचनात्मक मतसभसँ ई सुस्पष्ट होइत अछि जे मण्डलजी अपन गामकेँ अवश्य केन्द्रमे रखै छैथ, मुदा हुनकर दृष्टि कोनो सीमित आंचलिक परिधिमे आबद्ध नहि रहैत अछि। गाम हुनका लग केवल भौगोलिक स्थल नहि, बल्कि समाजकेँ बुझबाक मूल आधार अछि। ओहि आधारपर ठाढ़ भऽ कऽ ओ वर्ग, श्रम, असमानता, मानवीय मर्यादा, लोक-संस्कृति, सामुदायिक सम्बन्ध आ बदलैत सामाजिक मूल्यसभपर गम्भीर चिन्तन प्रस्तुत करै छैथ। एही कारण हुनकर साहित्य आंचलिकता सँ जन्म लैत अछि, मुदा ओकर अर्थ, सरोकार आ प्रभाव व्यापक सामाजिक धरातलपर सक्रिय भऽ उठैत अछि।
ऐ व्यापक रचना-संसारमे पयस्विनी एक विशेष महत्त्वपूर्ण कृति थिक। ई पोथी मैथिलीमे papers, essays and criticism केर संग्रह रूपमे पल्लवी प्रकाशन, निर्मली (सुपौल) सँ प्रकाशित अछि। एकर पहिल संस्करण 2021 इस्वीमे आ दोसर संस्करण 2023 इस्वीमे प्रकाशित भेल अछि। शीर्षक पृष्ठ आ अनुक्रमसँ स्पष्ट होइत अछि जे ऐ पोथीमे दार्शनिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक आ संवादात्मक प्रकृतिक बहुविध सामग्री समाहित अछि। ‘अवतारवाद’, ‘संस्कार आ संस्कार गीत’, ‘वर्चस्ववादी संस्कृति बनाम हाशियाक समाजक संघर्ष’, ‘अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन’, ‘सगर राति दीप जरय’क 100म कथागोष्ठीक मादे, ‘वेब प्रोग्राम’, ‘भाय राजनन्दन लाल दासजीक जीवन यात्रा’, विभिन्न प्रश्नक जवाब आ दू गोट परिसंवाद ऐ संग्रहक सामग्रीगत विस्तारकेँ प्रमाणित करैत अछि।
पयस्विनीक पहिल लेख ‘अवतारवाद’ मण्डलजीक तर्कशील चेतनाक एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण थिक। एतए लेखक धार्मिक अवधारणाकेँ प्रश्नक कसौटीपर परखै छैथ। अवतारवादक ऐतिहासिक विकास, शास्त्रीय सन्दर्भ, मिथकीय संरचना आ मानवीय विवेकक सम्बन्धमे ओ गम्भीर प्रश्न उपस्थित करै छैथ। विचारक केन्द्र मनुष्यक चेतना, तर्क आ आत्मनिर्भर नैतिक दृष्टिपर रहैत अछि। ई लेख मण्डलजीक व्यक्तित्वक तर्कनिष्ठ, निर्भीक आ वैचारिक रूपकेँ उजागर करैत अछि। ओ परम्परागत मान्यताकेँ केवल श्रद्धा, आदर आ भावात्मक स्वीकृतिक आधारपर ज्यों-के-त्यों स्वीकार कऽ लेल जाए, एकरा उचित नहि मानै छैथ। ओ प्रश्नक माध्यमसँ विवेक-जागरणक भूमिका निभबै छैथ।
‘संस्कार आ संस्कार गीत’ मण्डलजीक सांस्कृतिक दृष्टिक समान रूपेँ महत्त्वपूर्ण पाठ थिक। ऐ लेखमे मिथिलाक संस्कार-परम्परा, लोकगीतक संरचना, स्त्रीक भागीदारी, मौखिक परम्परा, जातिगत विभाजन, लोकधरोहर, देवी-पूजा, लोकभाषिक परिवर्तनीयता आ सांस्कृतिक इतिहास-बोधक अनेक स्तरक विश्लेषण भेटैत अछि। मण्डलजी एतए परम्पराकेँ निष्क्रिय रूपमे ग्रहण नहि करै छैथ। ओ एकर सामाजिक निर्माण, ऐतिहासिक कारण आ व्यवहारिक रूपपर विचार करै छैथ। ऐ लेखसँ स्पष्ट होइत अछि जे लोक-संस्कृति हुनका लेल संग्रहालयक वस्तु नहि, बल्कि जीवित समाजक चलैत-फिरैत अनुभवक क्षेत्र थिक।
‘वर्चस्ववादी संस्कृति बनाम हाशियाक समाजक संघर्ष’ मण्डलजीक सामाजिक पक्षधरताकेँ स्पष्ट रूपेँ सामने अनैत अछि। ऐ पाठमे भाषा, साहित्य, संस्कृति, सत्ता, शोषण, सामाजिक विभाजन आ उपेक्षित समाजक प्रश्नकेँ ओ एकहि विमर्श-फलकपर आनै छैथ। एतए हुनकर दृष्टि समाजक बहुसंख्य छुटल हिस्साकेँ केन्द्रमे अनबाक प्रयत्न करैत अछि। प्रश्नोत्तरक एक अंशमे सेहो ओ कहै छैथ जे साहित्य समाजक दर्पण अछि आ अपन रचनामे हुनकर लगातार कोशिश रहै छैन जे छुटल समाजकेँ पकैड़ सृजन कएल जाए। ई कथन पयस्विनीक सामाजिक आशयकेँ बुझबाक लेल केन्द्रीय महत्त्व रखैत अछि।
पयस्विनीक एकटा विशिष्ट पक्ष एकर संवादात्मक संरचना सेहो अछि। गजेन्द्र ठाकुरजी, मुन्नाजी आ मुकेश दत्तजीक प्रश्नक जवाब तथा दू गोट परिसंवाद एकरा स्थिर निबन्ध-संकलनसँ आगाँ लऽ जाइत अछि। एतए लेखक अपन साहित्य-दृष्टि, जीवन-बोध, लेखन-प्रेरणा, सामाजिक चिन्ता आ भाषा-सम्बन्धी विचारसभ खुलि कऽ रखै छैथ। एहेन सामग्री आलोचनात्मक अध्ययनक लेल असाधारण महत्त्व रखैत अछि, किएक तँ ऐ माध्यमसँ लेखकक आत्मदृष्टि प्रत्यक्ष रूपमे उपलब्ध होइत अछि। ऐ रूपमे पयस्विनी रचनाकारक भीतरक वैचारिक चालि, सामाजिक प्रतिबद्धता आ संवाद-धर्मिताकेँ बुझबाक आधार-पुस्तक बनि जाइत अछि।
जीवनवृत्तमे उल्लिखित मण्डलजीक साहित्य-दर्शन पयस्विनीक मर्मक संग गहींर सम्बन्ध रखैत अछि। “लेखन प्रदर्शन नहि, प्रतिबद्धताक अनुशासित साधना छी”, “हम ओइ लोक लेल लिखै छी जे जीबि रहल छैथ, मुदा बाजि नहि सकैत”, “साहित्यक उद्देश्य मौन पीड़ाकेँ स्वर देब अछि”, आ “मैथिली साहित्य जन-संवादक सजग दस्तावेज बनए” जकाँ कथन हुनकर समग्र सृजन-दृष्टिक सघन रूप प्रस्तुत करैत अछि। पयस्विनीक पाठ केलाक बाद स्पष्टत: बुझि पड़ैत अछि जे ऐ कृतिमे विचार, समाज, संस्कृति आ संवाद चारू तत्त्व ऐ साहित्य-दर्शनक अधीन संयोजित भेल अछि। तर्क एतए लोकसँ जुड़ल अछि। संस्कृति समाजक भीतर सक्रिय अछि। संवाद लेखकक सार्वजनिक आ आत्मीय दायित्वक रूपमे उपस्थित अछि।
ऐ कारण पयस्विनीपर पृथक आलोचनात्मक अध्ययनक आवश्यकता स्वाभाविक रूपेँ सामने अबैत अछि। मण्डलजीपर सामान्यतः कथा, उपन्यास आ ग्राम्य यथार्थक प्रसंग अधिक चर्चामे रहल अछि। हुनकर वैचारिक गद्य, सांस्कृतिक विवेक, सार्वजनिक बौद्धिकता आ प्रश्नोत्तर-आधारित आत्मव्याख्याक समेकित परीक्षण अपेक्षित रहल अछि। पयस्विनी ऐ चारू पक्षकेँ एकहि ठाम उपस्थित करैत अछि। तइ कारण एकरा केन्द्रमे राखि लिखल जाइबला पुस्तक मण्डलजीक समग्र रचनाधर्मिताकेँ बुझबाक लेल विशेष उपयोगी सिद्ध होएत।
प्रस्तुत पुस्तकक विशेषता ऐ बातमे निहित अछि जे ई पयस्विनीक केवल सार-संक्षेप वा सामान्य परिचय प्रस्तुत नहि करैत अछि, बल्कि ऐ पोथीक भीतरी वैचारिक संरचना, सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक पक्षधरता, संवादधर्मिता, रचना-शिल्प आ मण्डलजीक समग्र रचनाधर्मितासँ एकर अन्तर्सम्बन्धकेँ एकत्र रूपेँ उद्घाटित करब अछि। एतए पयस्विनीकेँ मण्डलजीक स्वतंत्र गद्य-पोथी मात्र नहि, हुनकर चिन्तनक संगठित दस्तावेज रूपमे पढ़ल गेल अछि। ऐ दृष्टिसँ ई अध्ययन मण्डलजीक वैचारिक गद्यक सम्यक् मूल्यांकनक दिशामे एक आरम्भिक, किन्तु आवश्यक योगदान प्रस्तुत करैत अछि।
प्रस्तुत पुस्तक पयस्विनी विमर्श ऐ आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि तैयार कएल जा रहल अछि। एकर उद्देश्य पयस्विनीक स्वरूप, अन्तर्वस्तु, विचार-प्रवृत्ति, सांस्कृतिक धरातल, सामाजिक पक्षधरता, संवाद-धर्मिता, भाषा-शैली, तर्क-पद्धति आ मण्डलजीक समग्र कृतित्वमे एकर स्थानक परीक्षण करब अछि। ऐ भूमिकामे मण्डलजीक व्यक्तित्व आ कृतित्वक चर्चा ऐ कारण विस्तारसँ कएल गेल अछि जे लेखकक जीवन-दृष्टि बुझने बिना ऐ पोथीक अन्तरस्वर पूर्ण रूपेँ पकड़ब कठिन होइत अछि। जे लेखक अपन जीवनमे श्रम, अनुशासन, लोकानुभव, सामाजिक न्याय आ जन-संवादकेँ केन्द्रमे रखै छैथ, हुनकर गद्यक प्रकृति सेहो ओहिना होइत अछि। पयस्विनी अही सुसम्बद्ध जीवन-दृष्टिक साहित्यिक परिणति थिक।
ऐ अध्ययनमे मुख्यतः पाठ-विश्लेषणात्मक, व्याख्यात्मक, सन्दर्भपरक आ आलोचनात्मक पद्धतिक उपयोग कएल गेल अछि। पयस्विनीक भीतर संकलित लेख, प्रश्नोत्तर, परिसंवाद आ सार्वजनिक टिप्पणीक निकट पाठक आधारपर एकर वैचारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आ शैलीगत स्वरूपक परीक्षण कएल गेल अछि। जइ ठाम आवश्यक बुझल गेल अछि, ओतए मण्डलजीक जीवन-दृष्टि, कृतित्व आ लोकसम्बद्ध साहित्यिक भूमिकाकेँ सहायक पृष्ठभूमि रूपेँ ग्रहण कएल गेल अछि। ऐ पद्धतिक माध्यमसँ पुस्तककेँ केवल सामग्री-संग्रह रूपमे नहि, एक संगठित वैचारिक गद्य-पाठ रूपमे बुझबाक प्रयास कएल गेल अछि।
समकालीन मैथिली आलोचना-साहित्यक सन्दर्भमे पयस्विनीक अध्ययन विशेष महत्त्व रखैत अछि। आजुक समयमे जखन भाषा, लोक-संस्कृति, सामाजिक प्रतिनिधित्व, सार्वजनिक बौद्धिकता आ साहित्यक जनपक्षधर भूमिकापर नब सिरासँ विचार भऽ रहल अछि, तखन एहेन पोथीक आलोचनात्मक पुनर्पाठ आवश्यक भऽ जाइत अछि। पयस्विनी एहेन कृति थिक जइमे विचार, समाज, संस्कृति, प्रतिरोध, लोक-चेतना आ संवाद एक-दोसरासँ जुड़ल रूपमे सामने अबैत अछि। तइ कारण प्रस्तुत अध्ययन केवल एक पुस्तकक समीक्षा नहि, बल्कि आधुनिक मैथिली वैचारिक गद्य, लोकधर्मी साहित्य-दृष्टि आ सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्शक एक महत्त्वपूर्ण पाठक दिशामे उठाओल गेल एक गम्भीर डेग मानल जा सकैत अछि।
आगाँक प्रकरणसभमे पयस्विनीक बहुआयामी स्वरूप क्रमशः विश्लेषित कएल गेल अछि। पहिल अध्यायमे एकर स्वरूप, रचना-प्रसंग आ विधागत संरचनापर विचार भेल अछि। तदनन्तर दार्शनिक प्रश्न आ तर्कशील दृष्टि, संस्कृति, संस्कार आ लोक-चेतना, हाशियाक समाज, वर्चस्व-विमर्श आ सामाजिक प्रतिरोध, तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक सक्रियता आ सार्वजनिक लेखनक विवेचन प्रस्तुत कएल गेल अछि। ऐ क्रममे प्रश्नोत्तर आ परिसंवादमे उद्घाटित मण्डलजीक व्यक्तित्वक चर्चा कएल अछि, तेकर बाद पयस्विनीक आलोकमे मण्डलजीक वैचारिक व्यक्तित्व पृथक रूपेँ सेहो स्पष्ट कएल अछि। आगाँ पयस्विनीक भाषा, शैली, तर्क-पद्धति आ गद्य-सौष्ठवक विश्लेषण भेल अछि, तेकर उपरान्त पयस्विनीक रचना-शिल्प, विन्यास आ अभिव्यक्ति-कौशलपर विचार कएल अछि। अन्तिम अध्यायमे मण्डलजीक समग्र रचनाधर्मितामे पयस्विनीक स्थान निर्धारित कएल आ उपसंहारमे समूचा अध्ययन समेटल अछि। आशा अछि जे प्रस्तुत पोथी मण्डलजीक वैचारिक गद्यक महत्त्वकेँ अधिक सुस्पष्ट करत आ मैथिली आलोचना-परम्परामे एक उपयोगी योगदान सिद्ध होएत।
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२.५.१. प्रीति कुमारी- शेष जीवन केर नायक : एक चरित्र चित्रण २.नशामुक्ति अभियान
प्रीति कुमारी