विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

पयस्विनी : लोकचेतना आ संवादधर्मिताक समेकित अभिव्यक्ति (पृष्ठ- २४-२८)

डॉ. उमेश मण्डल · 2026-04-15 · अंक 440

२.४.डॉ. उमेश मण्डल- पयस्विनी : लोकचेतना आ संवादधर्मिताक समेकित अभिव्यक्ति
डॉ. उमेश मण्डल
अतिथि शिक्षक
सर्व नारायण सिंह राम कुमार सिंह महाविद्यालय, सहरसा (बिहार)
मो.: 9931654742
पयस्विनी : लोकचेतना आ संवादधर्मिताक समेकित अभिव्यक्ति
आधुनिक मैथिली साहित्यमे जगदीश प्रसाद मण्डलजीक उपस्थिति एकटा सशक्त लोकधर्मी रचनाकारक रूपमे जानल जाइत अछि। हुनकर लेखन जीवनक ठोस धरातलसँ उपजल अछि। गामक सामाजिक संरचना, खेतक श्रम-संस्कृति, परिवारक भीतरक तनाव, लोकाचारक निरन्तरता, स्त्री-पुरुषक पारस्परिक स्थिति, उपेक्षित समाजक पीड़ा आ मानवीय गरिमाक प्रश्न हुनकर साहित्यक मूल क्षेत्र बनैत अछि। ऐ कारण हुनकर रचनासभ पाठककेँ दूरक कल्पना-लोकमे नहि, अपन परिचित जीवन-जगतमे लऽ जाइत अछि। ओइ जीवन-जगतमे अनुभवक ऊष्मा, संघर्षक कठोरता आ आशाक मानवीय प्रकाश एक संग उपस्थित रहैत अछि।
जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म 5 जुलाइ 1947 केँ मधुबनी जिलाक लखनौर प्रखण्ड अन्तर्गत बेरमा गाममे भेलैन। हिनकर मातृभाषा मैथिली रहल छैन। हिनक प्रारम्भिक संस्कार गामक परिवेशमे आकार ग्रहण केलक। शिक्षा जनता कॉलेज, झंझारपुरसँ स्नातक स्तरधरि आ सी. एम. कॉलेज, दरभंगासँ हिंदी तथा राजनीति शास्त्रमे स्नातकोत्तर स्तरधरि पूर्ण भेल। पारिवारिक दायित्व, खेती-बाड़ी आ आत्मानुशासनक संग अध्ययनक ई समन्वय हुनकर जीवनक आरम्भिक गठनक महत्त्वपूर्ण पक्ष थिक। ई संयोजन हुनका पुस्तकीय ज्ञान आ व्यवहारिक अनुभव दुनूक साझा धरातल प्रदान केलकैन अछि।
मण्डलजीक जीविकोपार्जनक साधन मूलत: खेती-बाड़ी रहल छैन। जीवनवृत्तमे हुनकर सामाजिक परिचय आत्मनिर्भर कृषकक रूपमे दर्ज अछि। परम्परागत अनुभव आ वैज्ञानिक दृष्टि हुनकर जीवन-दृष्टिक दू महत्त्वपूर्ण आधार मानल गेल अछि। हुनका लेल कृषि केवल उपार्जनक माध्यम भरि नहि, समाज-निर्माणक आधारशिला सेहो अछि। ऐ दृष्टिसँ श्रम, माटि, उत्पादक वर्ग, लोकनिर्भर जीवन-व्यवस्था आ सामुदायिक नैतिकता हुनकर साहित्यिक चिन्तनक केन्द्रीय तत्त्व बनि जाइत अछि। पछुआएल वर्गक संघर्ष, खेती-बाड़ी, कृषक-जीवनपर आधारित यथार्थवादी साहित्य आ सामाजिक रूढ़ि, अंधविश्वास तथा सामन्तवादक विरुद्ध सक्रिय प्रतिरोधक हिनकर जीवनवृत्तमे स्पष्ट रूपेँ भेटैत अछि।
हुनकर जीवन-शैली सेहो विशेष ध्यानाकर्षक अछि। भोर 2 बजेसँ लेखन आरम्भ करबाक आदत, खेतक निरीक्षण, ऋतुगत सादा भोजन, शुद्धलेखन, पुनर्पाठ, शब्द-गणना आ आत्मावलोकनक अनुशासन मण्डलजीकेँ एक सजग साहित्य-साधकक रूपमे स्थापित करैत अछि। लेखकक जीवन आ साहित्य सृजनक बीच एहेन सामंजस्य दुर्लभ होइत अछि। एतए विचार कागजपर उतरल निष्कर्ष मात्र नहि रहैत अछि, बल्कि ओ दिनचर्याक अनुभवसँ पोषित रचनात्मक बोधक रूपमे विकसित होइत अछि। ऐ अनुशासनक प्रतिफल हुनकर विपुल कृतित्व आ लेखनक निरन्तरता दुनूमे देखल जा सकैत अछि।
कृतित्वक स्तरपर जगदीश प्रसाद मण्डल अत्यन्त विपुल रचनाकारक रूपमे प्रसिद्ध छैथ। जीवनवृत्तक अनुसार वर्ष 2000 ई.सँ नियमित लेखनक आरम्भ भेल आ तेकरा पछाइत कथा, उपन्यास, नाटक, पद्य, बाल-साहित्य, आत्मकथात्मक गद्य आ शोध-आलेख धरि हुनकर रचनात्मक क्षेत्र निरन्तर विस्तृत होइत गेल। 1100 सँ अधिक कथा, 20 सँ अधिक उपन्यास, 12 एकांकी ओ नाटक, 12 पद्य संग्रह आ 10 बाल-साहित्यक पुस्तकक उल्लेख हुनकर साहित्य-साधनाक व्यापकता प्रमाणित करैत अछि। एतबे नहि, अखन तक हुनकर 135 सँ अधिक पोथी प्रकाशित भऽ चुकल छैन, जे अपने-आपमे एक विलक्षण सर्जनात्मक उपलब्धि थिक। हुनकर पोथीसभ प्रायः पल्लवी प्रकाशन, निर्मली, सुपौलसँ प्रकाशित होइत रहल छैन, जइसँ हुनकर लेखनक सतत प्रकाशन-परम्परा सेहो स्पष्ट होइत अछि।
जगदीश प्रसाद मण्डलक साहित्यिक अवदानकेँ समय-समयपर अनेक महत्वपूर्ण पुरस्कार आ सम्मानसँ मान्यता भेटल अछि। हुनका विदेह सम्मान- 2011, वैदेह सम्‍मान- 2012, कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015, वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ सम्मान- 2016, कौमुदी सम्मान- 2017, यात्री चेतना पुरस्कार- 2017, स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान-2018, राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020, अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022, यात्री सम्मान- 2022, मिथिला शिखर सम्मान- 2022 आ महाकवि पण्डित लालदास साहित्य गौरव सम्मान- 2023 प्रदान कएल गेल अछि। एकर अतिरिक्त, ‘गामक जिनगी’ कथा संग्रह टैगोर साहित्य पुरस्कारसँ 2011 इस्वीमे अलंकृत भेल आ ‘पंगु’ उपन्यास साहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ 2021 इस्वीमे सम्मानित भेल। ऐ सम्मानसभसँ स्पष्ट अछि जे हुनकर लेखन केवल संख्याक दृष्टिसँ नहि, बल्कि गुण, प्रभाव, वैचारिक गहराइ आ साहित्यिक मान्यताक स्तरपर सेहो विशिष्ट अछि।
हुनकर लेखन परिश्रम, अनुशासन आ वैचारिक सजगताक संग रचनात्मक निरन्तरताक दीर्घ साधनापर आधारित अछि। मैथिली साहित्यमे मण्डलजीक नियमित, अविराम आ बहुविध लेखन बहुतो विद्वानकेँ सदिखन सोचबाक, पुनर्मूल्यांकन करबाक आ समकालीन साहित्यिक मानदण्डसभपर पुनर्विचार करबाक लेल विवश करैत अछि। वर्तमानमे ओ ‘संस्कार’ नामक पोथीक लेखनमे संलग्न छैथ, जे ऐ तथ्यक प्रमाण अछि जे हुनकर सर्जनात्मक प्रवाह अखनौं अविराम रूपेँ सक्रिय छैन।
मण्डलजीक साहित्यक विशिष्टताकेँ स्पष्ट करबामे मैथिली साहित्यक वरेण्य आलोचकसभक मत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध होइत अछि, किएक तँ ऐ मतसभक माध्यमसँ हुनकर रचनाशीलताक बहुआयामी स्वरूप उद्घाटित होइत अछि। किछु आलोचक हुनका ग्रामीण जीवनक सूक्ष्म चित्रकारक रूपमे देखै छैथ, कारण ओ गामक बाह्य दृश्यकेँ मात्र नहि, बल्कि ओकर भीतरी स्पन्दन, श्रम-संस्कृति, सम्बन्धक ऊष्मा, अभावक पीड़ा, लोक-व्यवहारक सहजता आ जीवन-संघर्षक यथार्थकेँ अत्यन्त आत्मीयता आ सजीवतासँ रूपायित करै छैथ। दोसर दिस, अनेक समीक्षकसभक मत अछि जे हुनकर लेखनमे परम्परागत आजीविकाक गौरव, लोक-समाजक स्वाभिमान आ सामाजिक वास्तविकताक स्वाभाविक चित्रण विशेष रूपेँ दृष्टिगोचर होइत अछि। ओ किसान, मजदूर, वंचित, घरेलू स्त्री, बुजुर्ग, युवाक संग लोक-रीति आ ग्राम्य संस्कार सभकेँ एहेन संवेदनात्मक गहराइसँ उपस्थित करै छैथ जे पाठककेँ मिथिलाक जीवन-संसार अपन समग्रतामे सामने उपस्थित बुझि पड़ैत अछि। कियो हुनका मिथिलाक माटि आ जीवन-सत्त्वक सशक्त स्वर कहने छैथ, तँ कियो हुनकर साहित्यकेँ स्वातंत्र्योत्तर भारतमे एक समानान्तर लोक-संसारक सर्जना कहि अभिहित केने छैथ। एहि प्रकारक अभिमत केवल प्रशंसात्मक टिप्पणी भरि नहि अछि, बल्कि ई बातक प्रमाण अछि जे मण्डलजीक रचना-संसार लोकजीवनक साधारण अनुभवसभकेँ गम्भीर साहित्यिक गरिमा प्रदान करैत अछि।
ऐ समालोचनात्मक मतसभसँ ई सुस्पष्ट होइत अछि जे मण्डलजी अपन गामकेँ अवश्य केन्द्रमे रखै छैथ, मुदा हुनकर दृष्टि कोनो सीमित आंचलिक परिधिमे आबद्ध नहि रहैत अछि। गाम हुनका लग केवल भौगोलिक स्थल नहि, बल्कि समाजकेँ बुझबाक मूल आधार अछि। ओहि आधारपर ठाढ़ भऽ कऽ ओ वर्ग, श्रम, असमानता, मानवीय मर्यादा, लोक-संस्कृति, सामुदायिक सम्बन्ध आ बदलैत सामाजिक मूल्यसभपर गम्भीर चिन्तन प्रस्तुत करै छैथ। एही कारण हुनकर साहित्य आंचलिकता सँ जन्म लैत अछि, मुदा ओकर अर्थ, सरोकार आ प्रभाव व्यापक सामाजिक धरातलपर सक्रिय भऽ उठैत अछि।
ऐ व्यापक रचना-संसारमे पयस्विनी एक विशेष महत्त्वपूर्ण कृति थिक। ई पोथी मैथिलीमे papers, essays and criticism केर संग्रह रूपमे पल्लवी प्रकाशन, निर्मली (सुपौल) सँ प्रकाशित अछि। एकर पहिल संस्करण 2021 इस्वीमे आ दोसर संस्करण 2023 इस्वीमे प्रकाशित भेल अछि। शीर्षक पृष्ठ आ अनुक्रमसँ स्पष्ट होइत अछि जे ऐ पोथीमे दार्शनिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक आ संवादात्मक प्रकृतिक बहुविध सामग्री समाहित अछि। ‘अवतारवाद’, ‘संस्कार आ संस्कार गीत’, ‘वर्चस्ववादी संस्कृति बनाम हाशियाक समाजक संघर्ष’, ‘अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन’, ‘सगर राति दीप जरय’क 100म कथागोष्ठीक मादे, ‘वेब प्रोग्राम’, ‘भाय राजनन्दन लाल दासजीक जीवन यात्रा’, विभिन्न प्रश्नक जवाब आ दू गोट परिसंवाद ऐ संग्रहक सामग्रीगत विस्तारकेँ प्रमाणित करैत अछि।
पयस्विनीक पहिल लेख ‘अवतारवाद’ मण्डलजीक तर्कशील चेतनाक एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण थिक। एतए लेखक धार्मिक अवधारणाकेँ प्रश्नक कसौटीपर परखै छैथ। अवतारवादक ऐतिहासिक विकास, शास्त्रीय सन्दर्भ, मिथकीय संरचना आ मानवीय विवेकक सम्बन्धमे ओ गम्भीर प्रश्न उपस्थित करै छैथ। विचारक केन्द्र मनुष्यक चेतना, तर्क आ आत्मनिर्भर नैतिक दृष्टिपर रहैत अछि। ई लेख मण्डलजीक व्यक्तित्वक तर्कनिष्ठ, निर्भीक आ वैचारिक रूपकेँ उजागर करैत अछि। ओ परम्परागत मान्यताकेँ केवल श्रद्धा, आदर आ भावात्मक स्वीकृतिक आधारपर ज्यों-के-त्यों स्वीकार कऽ लेल जाए, एकरा उचित नहि मानै छैथ। ओ प्रश्नक माध्यमसँ विवेक-जागरणक भूमिका निभबै छैथ।
‘संस्कार आ संस्कार गीत’ मण्डलजीक सांस्कृतिक दृष्टिक समान रूपेँ महत्त्वपूर्ण पाठ थिक। ऐ लेखमे मिथिलाक संस्कार-परम्परा, लोकगीतक संरचना, स्त्रीक भागीदारी, मौखिक परम्परा, जातिगत विभाजन, लोकधरोहर, देवी-पूजा, लोकभाषिक परिवर्तनीयता आ सांस्कृतिक इतिहास-बोधक अनेक स्तरक विश्लेषण भेटैत अछि। मण्डलजी एतए परम्पराकेँ निष्क्रिय रूपमे ग्रहण नहि करै छैथ। ओ एकर सामाजिक निर्माण, ऐतिहासिक कारण आ व्यवहारिक रूपपर विचार करै छैथ। ऐ लेखसँ स्पष्ट होइत अछि जे लोक-संस्कृति हुनका लेल संग्रहालयक वस्तु नहि, बल्कि जीवित समाजक चलैत-फिरैत अनुभवक क्षेत्र थिक।
‘वर्चस्ववादी संस्कृति बनाम हाशियाक समाजक संघर्ष’ मण्डलजीक सामाजिक पक्षधरताकेँ स्पष्ट रूपेँ सामने अनैत अछि। ऐ पाठमे भाषा, साहित्य, संस्कृति, सत्ता, शोषण, सामाजिक विभाजन आ उपेक्षित समाजक प्रश्नकेँ ओ एकहि विमर्श-फलकपर आनै छैथ। एतए हुनकर दृष्टि समाजक बहुसंख्य छुटल हिस्साकेँ केन्द्रमे अनबाक प्रयत्न करैत अछि। प्रश्नोत्तरक एक अंशमे सेहो ओ कहै छैथ जे साहित्य समाजक दर्पण अछि आ अपन रचनामे हुनकर लगातार कोशिश रहै छैन जे छुटल समाजकेँ पकैड़ सृजन कएल जाए। ई कथन पयस्विनीक सामाजिक आशयकेँ बुझबाक लेल केन्द्रीय महत्त्व रखैत अछि।
पयस्विनीक एकटा विशिष्ट पक्ष एकर संवादात्मक संरचना सेहो अछि। गजेन्द्र ठाकुरजी, मुन्नाजी आ मुकेश दत्तजीक प्रश्नक जवाब तथा दू गोट परिसंवाद एकरा स्थिर निबन्ध-संकलनसँ आगाँ लऽ जाइत अछि। एतए लेखक अपन साहित्य-दृष्टि, जीवन-बोध, लेखन-प्रेरणा, सामाजिक चिन्ता आ भाषा-सम्बन्धी विचारसभ खुलि कऽ रखै छैथ। एहेन सामग्री आलोचनात्मक अध्ययनक लेल असाधारण महत्त्व रखैत अछि, किएक तँ ऐ माध्यमसँ लेखकक आत्मदृष्टि प्रत्यक्ष रूपमे उपलब्ध होइत अछि। ऐ रूपमे पयस्विनी रचनाकारक भीतरक वैचारिक चालि, सामाजिक प्रतिबद्धता आ संवाद-धर्मिताकेँ बुझबाक आधार-पुस्तक बनि जाइत अछि।
जीवनवृत्तमे उल्लिखित मण्डलजीक साहित्य-दर्शन पयस्विनीक मर्मक संग गहींर सम्बन्ध रखैत अछि। “लेखन प्रदर्शन नहि, प्रतिबद्धताक अनुशासित साधना छी”, “हम ओइ लोक लेल लिखै छी जे जीबि रहल छैथ, मुदा बाजि नहि सकैत”, “साहित्यक उद्देश्य मौन पीड़ाकेँ स्वर देब अछि”, आ “मैथिली साहित्य जन-संवादक सजग दस्तावेज बनए” जकाँ कथन हुनकर समग्र सृजन-दृष्टिक सघन रूप प्रस्तुत करैत अछि। पयस्विनीक पाठ केलाक बाद स्पष्टत: बुझि पड़ैत अछि जे ऐ कृतिमे विचार, समाज, संस्कृति आ संवाद चारू तत्त्व ऐ साहित्य-दर्शनक अधीन संयोजित भेल अछि। तर्क एतए लोकसँ जुड़ल अछि। संस्कृति समाजक भीतर सक्रिय अछि। संवाद लेखकक सार्वजनिक आ आत्मीय दायित्वक रूपमे उपस्थित अछि।
ऐ कारण पयस्विनीपर पृथक आलोचनात्मक अध्ययनक आवश्यकता स्वाभाविक रूपेँ सामने अबैत अछि। मण्डलजीपर सामान्यतः कथा, उपन्यास आ ग्राम्य यथार्थक प्रसंग अधिक चर्चामे रहल अछि। हुनकर वैचारिक गद्य, सांस्कृतिक विवेक, सार्वजनिक बौद्धिकता आ प्रश्नोत्तर-आधारित आत्मव्याख्याक समेकित परीक्षण अपेक्षित रहल अछि। पयस्विनी ऐ चारू पक्षकेँ एकहि ठाम उपस्थित करैत अछि। तइ कारण एकरा केन्द्रमे राखि लिखल जाइबला पुस्तक मण्डलजीक समग्र रचनाधर्मिताकेँ बुझबाक लेल विशेष उपयोगी सिद्ध होएत।
प्रस्तुत पुस्तकक विशेषता ऐ बातमे निहित अछि जे ई पयस्विनीक केवल सार-संक्षेप वा सामान्य परिचय प्रस्तुत नहि करैत अछि, बल्कि ऐ पोथीक भीतरी वैचारिक संरचना, सांस्कृतिक चेतना, सामाजिक पक्षधरता, संवादधर्मिता, रचना-शिल्प आ मण्डलजीक समग्र रचनाधर्मितासँ एकर अन्तर्सम्बन्धकेँ एकत्र रूपेँ उद्घाटित करब अछि। एतए पयस्विनीकेँ मण्डलजीक स्वतंत्र गद्य-पोथी मात्र नहि, हुनकर चिन्तनक संगठित दस्तावेज रूपमे पढ़ल गेल अछि। ऐ दृष्टिसँ ई अध्ययन मण्डलजीक वैचारिक गद्यक सम्यक् मूल्यांकनक दिशामे एक आरम्भिक, किन्तु आवश्यक योगदान प्रस्तुत करैत अछि।
प्रस्तुत पुस्तक पयस्विनी विमर्श ऐ आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि तैयार कएल जा रहल अछि। एकर उद्देश्य पयस्विनीक स्वरूप, अन्तर्वस्तु, विचार-प्रवृत्ति, सांस्कृतिक धरातल, सामाजिक पक्षधरता, संवाद-धर्मिता, भाषा-शैली, तर्क-पद्धति आ मण्डलजीक समग्र कृतित्वमे एकर स्थानक परीक्षण करब अछि। ऐ भूमिकामे मण्डलजीक व्यक्तित्व आ कृतित्वक चर्चा ऐ कारण विस्तारसँ कएल गेल अछि जे लेखकक जीवन-दृष्टि बुझने बिना ऐ पोथीक अन्तरस्वर पूर्ण रूपेँ पकड़ब कठिन होइत अछि। जे लेखक अपन जीवनमे श्रम, अनुशासन, लोकानुभव, सामाजिक न्याय आ जन-संवादकेँ केन्द्रमे रखै छैथ, हुनकर गद्यक प्रकृति सेहो ओहिना होइत अछि। पयस्विनी अही सुसम्बद्ध जीवन-दृष्टिक साहित्यिक परिणति थिक।
ऐ अध्ययनमे मुख्यतः पाठ-विश्लेषणात्मक, व्याख्यात्मक, सन्दर्भपरक आ आलोचनात्मक पद्धतिक उपयोग कएल गेल अछि। पयस्विनीक भीतर संकलित लेख, प्रश्नोत्तर, परिसंवाद आ सार्वजनिक टिप्पणीक निकट पाठक आधारपर एकर वैचारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक आ शैलीगत स्वरूपक परीक्षण कएल गेल अछि। जइ ठाम आवश्यक बुझल गेल अछि, ओतए मण्डलजीक जीवन-दृष्टि, कृतित्व आ लोकसम्बद्ध साहित्यिक भूमिकाकेँ सहायक पृष्ठभूमि रूपेँ ग्रहण कएल गेल अछि। ऐ पद्धतिक माध्यमसँ पुस्तककेँ केवल सामग्री-संग्रह रूपमे नहि, एक संगठित वैचारिक गद्य-पाठ रूपमे बुझबाक प्रयास कएल गेल अछि।
समकालीन मैथिली आलोचना-साहित्यक सन्दर्भमे पयस्विनीक अध्ययन विशेष महत्त्व रखैत अछि। आजुक समयमे जखन भाषा, लोक-संस्कृति, सामाजिक प्रतिनिधित्व, सार्वजनिक बौद्धिकता आ साहित्यक जनपक्षधर भूमिकापर नब सिरासँ विचार भऽ रहल अछि, तखन एहेन पोथीक आलोचनात्मक पुनर्पाठ आवश्यक भऽ जाइत अछि। पयस्विनी एहेन कृति थिक जइमे विचार, समाज, संस्कृति, प्रतिरोध, लोक-चेतना आ संवाद एक-दोसरासँ जुड़ल रूपमे सामने अबैत अछि। तइ कारण प्रस्तुत अध्ययन केवल एक पुस्तकक समीक्षा नहि, बल्कि आधुनिक मैथिली वैचारिक गद्य, लोकधर्मी साहित्य-दृष्टि आ सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्शक एक महत्त्वपूर्ण पाठक दिशामे उठाओल गेल एक गम्भीर डेग मानल जा सकैत अछि।
आगाँक प्रकरणसभमे पयस्विनीक बहुआयामी स्वरूप क्रमशः विश्लेषित कएल गेल अछि। पहिल अध्यायमे एकर स्वरूप, रचना-प्रसंग आ विधागत संरचनापर विचार भेल अछि। तदनन्तर दार्शनिक प्रश्न आ तर्कशील दृष्टि, संस्कृति, संस्कार आ लोक-चेतना, हाशियाक समाज, वर्चस्व-विमर्श आ सामाजिक प्रतिरोध, तथा साहित्यिक-सांस्कृतिक सक्रियता आ सार्वजनिक लेखनक विवेचन प्रस्तुत कएल गेल अछि। ऐ क्रममे प्रश्नोत्तर आ परिसंवादमे उद्घाटित मण्डलजीक व्यक्तित्वक चर्चा कएल अछि, तेकर बाद पयस्विनीक आलोकमे मण्डलजीक वैचारिक व्यक्तित्व पृथक रूपेँ सेहो स्पष्ट कएल अछि। आगाँ पयस्विनीक भाषा, शैली, तर्क-पद्धति आ गद्य-सौष्ठवक विश्लेषण भेल अछि, तेकर उपरान्त पयस्विनीक रचना-शिल्प, विन्यास आ अभिव्यक्ति-कौशलपर विचार कएल अछि। अन्तिम अध्यायमे मण्डलजीक समग्र रचनाधर्मितामे पयस्विनीक स्थान निर्धारित कएल आ उपसंहारमे समूचा अध्ययन समेटल अछि। आशा अछि जे प्रस्तुत पोथी मण्डलजीक वैचारिक गद्यक महत्त्वकेँ अधिक सुस्पष्ट करत आ मैथिली आलोचना-परम्परामे एक उपयोगी योगदान सिद्ध होएत।

Suggested citation: डॉ. उमेश मण्डल. “पयस्विनी : लोकचेतना आ संवादधर्मिताक समेकित अभिव्यक्ति (पृष्ठ- २४-२८).” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 440, 2026-04-15. https://www.videha.co.in/research/2026/440/पयस्विनी-लोकचेतना-आ-संवादधर्मिताक-समेकित-अभिव्यक्ति-पृष्ठ--२४-२८.htm

मूल विदेह अंक / Original issue