विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

'बदलैत जीवन' कथा-संग्रहक आलोकमे सामाजिक परिवर्तन आ मानवीय चेतनाक समीक्षात्मक विवेचन (पृष्ठ- ४६-५५)

डॉ. उमेश मण्डल · 2026-04-15 · अंक 440

२.८.डॉ. उमेश मण्डल-'बदलैत जीवन' कथा-संग्रहक आलोकमे सामाजिक परिवर्तन आ मानवीय चेतनाक समीक्षात्मक विवेचन
‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रहक आलोकमे सामाजिक परिवर्तन आ मानवीय चेतनाक समीक्षात्मक विवेचन
डॉ. उमेश मण्डल
अतिथि शिक्षक
सर्व नारायण सिंह राम कुमार सिंह महाविद्यालय, सहरसा (बिहार)
मो.: 9931654742
1. प्रस्तावना
जगदीश प्रसाद मण्डल समकालीन मैथिली साहित्यमे ओहन रचनाकार छैथ, जिनकर समग्र व्यक्तित्व मिथिलाक माटि, कृषक जीवन, लोकानुभव, सामाजिक संघर्ष आ मानवीय प्रतिबद्धतासँ निर्मित अछि। मण्डलजीक जन्म 5 जुलाइ 1947 केँ मधुबनी जिलाक लखनौर प्रखंड अन्तर्गत बेरमा गाममे भेलैन। शिक्षा ग्रहण कएला-पछाति ओ जीवनक मूल कर्मभूमि रूपेँ खेती-बारीकेँ अपनौलैन। हुनकर जीवन-दृष्टि स्पष्ट अछि जे खेती केवल जीविकाक साधन नहि, बल्कि समाज-निर्माणक आधार छी। ऐ कारण हुनकर लेखनमे लोकजीवनक अनुभव पुस्तक-ज्ञानक अपेक्षा अधिक प्रामाणिक रूपेँ अभिव्यक्त होइत अछि।
नियमित लेखन-यात्रा वर्ष 2000 इस्वीसँ आरम्भ भऽ कए विशाल रचनासंसारमे परिणत भेल, जाहिमे एगारह सए (1100) सँ अधिक कथा, 20 सँ बेसी उपन्यास, 12 टा सँ अधिक नाटक-एकांकी, दर्जन भरि पद्य-संग्रह आ बाल-साहित्यक्षेत्रक अनेक महत्त्वपूर्ण कृति सम्मिलित अछि। हुनकर लेखनक मुख्य विशेषतामे आन्तरिक संवाद, मौन पात्रक सशक्त प्रस्तुति, ग्राम्य यथार्थ, स्त्री-विमर्श, दलित चेतना, लोकबोली-आधारित संवादपरक भाषा आ सामाजिक विषमताप्रति सजग दृष्टि विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि।
मैथिली साहित्यक परिदृश्यमे जगदीश प्रसाद मण्डलक स्थान विशिष्ट अछि, किएक तँ ओ केवल कथाकार नहि, बल्कि ग्राम्य समाजक अनुभवी अभिलेखक आ परिवर्तनशील लोकजीवनक सजग व्याख्याकार छैथ। आलोचकसभ हुनकर साहित्यकेँ मिथिलाक ग्रामीण समाजक सूक्ष्म, व्यापक आ जीवन्त दस्तावेज मानने छैथ। मन्त्रेश्वर झाक मतानुसार मण्डलजी गाम-घरक कथाकेँ स्वाभाविक परिणति धरि पहुँचबैत छैथ, जखन कि डॉ. तारानन्द वियोगी हुनकर लेखनकेँ ग्रामीण समाजक सकारात्मक जीवन-शैलीक दस्तावेज मानैत छैथ। गजेन्द्र ठाकुरक मतमे हुनकर रचनासंसार परम्परागत आजीविकाक गौरव, आत्मनिर्भर कृषक-संस्कृति आ कथ्य-कर्मक एकात्मताक कारण मैथिली साहित्यमे पुनर्जागरणकारी भूमिका केर निर्वहन करैत अछि।
एहि दृष्टिसँ मण्डलजीक साहित्य लोकजीवनक बाह्य चित्रण मात्र नहि, बल्कि सामाजिक संरचना, मूल्य-संकट, चेतना-विकास आ मानवीय संघर्षक अन्तर्धाराकेँ पकड़निहार सशक्त साहित्यिक उपस्थिति अछि।
एहने व्यापक साहित्यिक पृष्ठभूमिमे ‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रहक उपस्थिति विशेष रूपसँ महत्त्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। पल्लवी प्रकाशनद्वारा 2025 इस्वीमे प्रकाशित ऐ संग्रहमे ‘गामसँ दूर’, ‘स्मृति शेष’, ‘केकरा-ले केलौं’, ‘बदलैत जीवन’, ‘पोथीक ज्ञान पोथीए मे रहि गेल’, ‘केना फरिछाएत’, ‘दसमीक डगर’, ‘अप्पन दोख’, ‘यात्रा’ आ ‘गंगासागर’ शीर्षक दस कथा संकलित छैथ। संग्रहक प्रारम्भिक टिप्पणीमे स्पष्ट कहल गेल अछि जे ऐ कथासभमे मानव-जीवनक सूक्ष्म रूपान्तरण, स्मृतिसँ परिवर्तन धरि, आत्मबोधसँ सामाजिक चेतना धरि, तथा परम्परा आ आधुनिकताक अन्तर्संघर्षक अभिव्यक्ति भेटैत अछि। ई संग्रह मिथिलाक बदलैत यथार्थक चित्रण करैत मानव-गरिमा, धैर्य, अन्तरात्माक आवाज आ सामाजिक उत्तरदायित्वकेँ कथा-दृष्टिक केन्द्र बनबैत अछि। तेँ ‘बदलैत जीवन’क महत्त्व केवल एतबे नहि जे ई दस गोट कथाक संग्रह अछि; एहिमे बदलैत समयक भीतर मनुक्खक बदलैत विवेकक रचनात्मक अभिलेख सेहो सुरक्षित अछि।
वस्तुतः ‘बदलैत जीवन’ मैथिली कथा-साहित्यमे ओहि धाराक प्रतिनिधि संग्रह मानल जा सकैत अछि, जाहिमे ग्राम्य समाजक संकट, सम्बन्धक बदलैत प्रकृति, आत्ममन्थन, नैतिक विवेक, स्मृति-बोध आ सामाजिक चेतनाक बहुआयामी स्वर एकसंग उभरि अबैत अछि। मण्डलजी अपन कथासभमे नाटकीयता वा कृत्रिम बौद्धिकतापर निर्भर नहि रहैत छैथ। ओ जीवनक भीतर चलैत तनाव, धीरे-धीरे होइत परिवर्तन, सामाजिक असमानता, लोक-आस्था, पछतावा, आत्मज्ञान आ मनुक्खक नैतिक प्रश्नसभकेँ सहज किन्तु प्रभावकारी ढंगसँ उद्घाटित करैत छैथ। ऐ कारण ई कथा-संग्रह बदलैत ग्रामीण समाजक मात्र प्रतिबिम्ब नहि रहि जाइत; ई मानवीय सम्बन्धक पुनर्पाठ आ जीवन-मूल्यक पुनर्समीक्षाक साहित्यिक उपक्रमक रूपमे सामने अबैत अछि। प्रस्तुत शोध-आलेखमे एही आधारपर ‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रहकेँ परिवर्तनशील समाज आ मानवीय चेतनाक आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्यमे बुझबाक प्रयत्न कएल जाएत।
‘बदलैत जीवन’ शीर्षक ऐ कथा-संग्रहक केवल एकटा कथा-नाम भरि नहि अछि; ई सम्पूर्ण संग्रहक मूल संवेदना, वैचारिक धुरी आ रचनात्मक संकेतकेँ अभिव्यक्त करैत अछि। संग्रहक कथा-क्रमपर दृष्टि देलासँ स्पष्ट होइत अछि जे ‘गामसँ दूर’, ‘स्मृति शेष’, ‘केकरा-ले केलौं’, ‘बदलैत जीवन’, ‘पोथीक ज्ञान पोथीए मे रहि गेल’, ‘केना फरिछाएत’, ‘दसमीक डगर’, ‘अप्पन दोख’, ‘यात्रा’ आ ‘गंगासागर’ जकाँ कथासभ जीवनक भिन्न-भिन्न अवस्थासभ, मानवीय अनुभवक बदलैत धरातल आ समाजक रूपान्तरित स्थितिक संकेत दैत अछि। तेँ ई शीर्षक अपन एकल कथात्मक सीमा छोड़ि सम्पूर्ण संग्रहक प्रतिनिधि शीर्षक बनि जाइत अछि।
संग्रहक आरम्भिक परिचयमे सेहो स्पष्ट कहल गेल अछि जे ऐ पोथीमे संकलित कथासभ मानव-जीवनक रूपान्तरणशील यात्रा, स्मृतिसँ परिवर्तन धरि, आत्मबोधसँ सामाजिक चेतना धरि, आ परम्परा-आधुनिकताक अन्तःसंघर्ष धरि पसरल अनुभवक आख्यान प्रस्तुत करैत अछि। ऐ कथनसँ स्पष्ट होइत अछि जे ‘बदलैत जीवन’क अर्थ केवल बाह्य जीवन-स्थितिक अदला-बदली तक सीमित नहि अछि; एकर भीतर मनुक्खक चेतनात्मक रूपान्तरण सेहो समाहित अछि। जीवन एतए स्थिर नहि, गतिमान अछि। समाज जकाँ मनुक्खक विचार, सम्बन्ध, मूल्यबोध आ आत्मदृष्टि निरन्तर परिवर्तित होइत रहैत अछि। ऐ कारणसँ ई शीर्षक सम्पूर्ण कथा-संग्रहक केन्द्रीय अर्थ-क्षेत्रक संक्षिप्त, सार्थक आ प्रतिनिधि रूपमे उभरैत अछि।
एहि शीर्षकक औचित्यक दोसर महत्त्वपूर्ण पक्ष ई अछि जे मण्डलजी परिवर्तनकेँ केवल प्रगतिक उत्सव रूपमे नहि देखैत छैथ, आ ने मात्र पतनक करुण आख्यान रूपमे। हुनका कथासंसारमे परिवर्तन एक जटिल प्रक्रिया छी, जाहिमे सामाजिक विडम्बना, आर्थिक विषमता, पीढ़ीगत अन्तर, नैतिक संकट, आत्ममन्थन, पछतावा, जागरण आ नव बोध सभ एकसंग सक्रिय रहैत अछि। ‘गामसँ दूर’मे सामाजिक-प्रशासनिक दूरी, वर्गीय असमानता आ चेतनामूलक प्रश्न उठैत अछि। ‘स्मृति शेष’मे समय, जीवन आ नश्वरताक बोध सघन होइत अछि। ‘केकरा-ले केलौं’मे धन, स्वार्थ आ अन्ततः आत्मबोधक स्वर उभरैत अछि। ‘बदलैत जीवन’ शीर्षक कथा जीवन-यात्राक क्रमशः परिवर्तित रूपकेँ केन्द्रीय अर्थ प्रदान करैत अछि। ऐ प्रकार ई शीर्षक संग्रहक भीतर उपस्थित बहुविध परिवर्तनक समेकित प्रतीक बनि जाइत अछि।
प्रस्तुत शोधक मूल उद्देश्य ई बुझब अछि जे जगदीश प्रसाद मण्डल परिवर्तनकेँ कोन दृष्टिसँ देखैत छैथ। पहिल, सामाजिक स्तरपर ई देखब अपेक्षित अछि जे हुनका कथासभमे ग्रामीण समाजक संरचना, जातीय सम्बन्ध, प्रशासनिक व्यवहार, लोक-मानस आ सामुदायिक जीवनमे कोन-कोन बदलाव सामने अबैत अछि। दोसर, आर्थिक स्तरपर ई विश्लेषण आवश्यक अछि जे आजीविका, श्रम, कृषक-संस्कृति, महाजनी प्रवृत्ति, जीविकोपार्जनक संकट आ आत्मनिर्भरता जकाँ तत्वसभ कथानकमे कोना सक्रिय छैथ। तेसर, पारिवारिक स्तरपर ई देखल जाएत जे पीढ़ीगत अन्तर, सम्बन्धक बदलैत ऊष्मा, उत्तरदायित्व, स्मृति आ बिखरावक प्रक्रिया कथासभमे कोन रूपमे व्यक्त भेल अछि। चारिम, मानवीय चेतनाक स्तरपर शोधक मुख्य लक्ष्य ई रहत जे पात्रसभ बाह्य घटनासभसँ गुजरैत-गुजरैत आत्मबोध, नैतिक विवेक, पछतावा, संवेदना आ सामाजिक जिम्मेदारीक कोन अवस्था धरि पहुँचैत छैथ।
एहि शोधक एकटा गम्भीर उद्देश्य ईहो अछि जे ‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रहकेँ केवल कथात्मक सामग्रीक रूपमे सीमित कए नहि पढ़ल जाए, बल्कि एक वैचारिक पाठक रूपमे ग्रहण कएल जाए। मण्डलजीक समग्र साहित्य-दृष्टि, जाहिमे मौन पीड़ाकेँ स्वर देबाक, जन-संवादकेँ साहित्यक केन्द्र बनेबाक आ जीवनक यथार्थकेँ प्रतिबद्धताक संग अभिव्यक्त करबाक आग्रह प्रमुख अछि, ऐ संग्रहमे सेहो सक्रिय रूपेँ उपस्थित अछि। तेँ शोध-उद्देश्य एतेपर सीमित नहि अछि जे कथासार प्रस्तुत कएल जाए; उद्देश्य ईहो अछि जे ऐ संग्रहमे परिवर्तन जीवनक अपरिहार्य सत्यक रूपमे उभरैत अछि आ लेखक ओकरा मानवीय गरिमा, सामाजिक चेतना आ नैतिक मंथनक धरातलपर परखैत छैथ।
अन्ततः कहल जा सकैत अछि जे ऐ शीर्षकक औचित्य संग्रहक समग्रतामे निहित अछि। ‘बदलैत जीवन’ एतए एक कथा मात्र नहि अछि, ई एक दार्शनिक संकेत अछि; एक घटना मात्र नहि अछि, ई एक सतत प्रक्रिया अछि; एक पात्रक अनुभव मात्र नहि अछि, ई मिथिलाक बदलैत समाज आ मनुक्खक बदलैत अन्तर्जगतक सम्मिलित अभिव्यक्ति अछि। एही बुझबक आधारपर प्रस्तुत शोध-आलेख आगाँ संग्रहक कथासंरचना, विषय-विस्तार, सामाजिक यथार्थ, मानवीय चेतना आ शिल्पगत विशेषतासभक आलोचनात्मक परीक्षण करैत चलत।
3. कथा-संग्रहक संरचना आ विषय-विस्तार
‘गामसँ दूर’ बदलैत जीवन कथा-संग्रहक पहिल कथा ‘गामसँ दूर’ संग्रहक वैचारिक आधार निर्मित करैत अछि। कथाक केन्द्रमे गोपीकृष्ण छैथ, जे बी.डी.ओ. बनिकए गामसँ बाहर कर्मभूमिपर पहुँचैत छैथ, मुदा मानसिक रूपेँ अपन गाम, जातीय-सामाजिक संरचना, पूर्वजक वंचना आ श्रमिक वर्गक दयनीय स्थितिसँ अलग नहि भऽ पबैत छैथ। कथा एतए स्थापित करैत अछि जे गामसँ दूरी केवल भौगोलिक नहि अछि; ई सामाजिक, प्रशासनिक आ मानवीय दूरी सेहो बनि जाइत अछि।
आलोचनात्मक दृष्टिसँ देखल जाए तँ ऐ कथामे बाह्य घटना कम आ आन्तरिक विचार-प्रवाह अधिक प्रमुख अछि। ई विशेषता कथाकेँ साधारण आख्यानसँ ऊपर उठा कए चिन्तनप्रधान सामाजिक कथा बनबैत अछि। गोपीकृष्णक आत्ममन्थनक माध्यमसँ लेखक स्वतंत्र भारतक ओ विडम्बना उद्घाटित करैत छैथ जेतए राजनीतिक स्वतंत्रता अवश्य प्राप्त भेल अछि, मुदा सामाजिक समानता अखनो अपूर्णहि अछि। जनकलाल आ हरिमोहन बाबा जकाँ पात्र कथा-यथार्थकेँ अनुभवजन्य आधार प्रदान करैत छैथ आ ई संकेत दैत अछि जे सत्ता-तंत्र, जातीय विभाजन आ आर्थिक असमानता ग्रामीण समाजमे गहींर रूपसँ जड़ि जमा चुकल अछि।
कथाक आलोचनात्मक महत्त्व ऐ तथ्यमे निहित अछि जे मण्डलजी परिवर्तनकेँ रोमानी आशावादक रूपमे नहि देखैत छैथ। ओ परिवर्तनकेँ संघर्षशील चेतनाक प्रक्रिया रूपमे प्रस्तुत करैत छैथ। गोपीकृष्ण बदलाव चाहैत छैथ, मुदा ओ व्यवस्थाक सीमासँ सेहो परिचित छैथ। तेँ ई कथा सामाजिक विषमताक वर्णन भरि नहि रहि जाइत, जागृत विवेकक बेचारगी आ उत्तरदायित्वक गम्भीर अभिव्यक्ति बनि जाइत अछि। एही रूपमे ‘गामसँ दूर’ संग्रहक विषय-वस्तु, परिवर्तनशील समाज आ मानवीय चेतना, दुनूक प्रभावशाली प्रारम्भिक प्रतिनिधि कथा रूपेँ स्थापित होइत अछि।
‘स्मृति शेष’ संग्रहक दोसर कथा रूपमे जीवनक नश्वरता, स्मृतिक स्थायित्व आ मानवीय सम्बन्धक भीतरी तापकेँ अत्यन्त मार्मिक ढंगसँ सामने आनैत अछि। कथावाचक राधाकान्तक बीमारीक समाचार सुनि हुनकासँ भेँट करए निकलैत छैथ, मुदा यात्रा-क्रममे अप्रत्याशित रूपसँ रविशंकरक मृत्यु-समाचार भेटैत अछि। एतयसँ कथा सोझे वर्तमान घटनाक स्पष्ट वर्णन नहि करैत अछि; स्मृतिक बलेँ ई अतीत, संघर्ष, दोस्ती, श्रम, उन्नति, पतन आ सामाजिक मूल्यक ओझरीकेँ क्रमशः उद्घाटित करैत चलैत अछि।
आलोचनात्मक दृष्टिसँ ई कथा विशेष महत्त्व रखैत अछि, किएक तँ ऐठाम जीवनक नैतिक परीक्षणक माध्यम बनैत अछि। रविशंकरक जीवन-यात्रा गरीबीसँ आरम्भ भऽ शिक्षित, कर्मठ आ उन्नमुख व्यक्तित्व धरि पहुँचैत अछि, मुदा पछाति आर्थिक दबाव, पारिवारिक विस्तार आ दहेज-व्यवस्थाक विडम्बना हुनकर व्यक्तित्वमे अन्तर्विरोध उत्पन्न करैत अछि। कथावाचक रविशंकरक अन्तिम आग्रहपर सोचैत आ जूझैत छैथ, आ एही ठाम कथा सामाजिक आलोचनाक रूप ग्रहण करैत अछि। लेखक संकेत दैत छैथ जे शिक्षित भऽ जाएब मात्र पर्याप्त नहि अछि; वैचारिक नैतिक दृढ़ता बिना मनुक्ख समझदार होइतहुँ दिशाहीन भऽ सकैत अछि।
कथाक अन्तमे राधाकान्तक मृत्यु-समाचार जीवनक अस्थिरतापर निर्णायक विराम जकाँ अबैत अछि। “यएह छी जीवन” सन निष्कर्ष कथाकेँ दार्शनिक गहराइ प्रदान करैत अछि। एही कारण ‘स्मृति शेष’ परिवर्तनशील जीवनक बीच मानवीय सम्बन्ध, सामाजिक विडम्बना आ मृत्यु-बोधक अत्यन्त सारगर्भित कथा ठहरैत अछि।
‘केकरा-ले केलौं’ कथा-संग्रहमे आत्मालोचन, सामाजिक नैतिकता आ धनक मोहक विडम्बनाक अत्यन्त सशक्त अभिव्यक्ति सामने अबैत अछि। कथाक आरम्भ साधारण गामक समाचारसँ होइत अछि, मुदा क्रमशः ई स्पष्ट होइत अछि जे शोभित भायक अन्हरपन केवल शारीरिक घटना तक सीमित नहि अछि; ई हुनकर समूचा जीवन-चरित्रक नैतिक उद्घाटनक अवसर बनि जाइत अछि। कथावाचक लड़ूलाल, मकशूदन आ रूपलाल जकाँ पात्रसभक संवादक माध्यमसँ कथा गामक सामूहिक स्मृति आ सामाजिक निर्णयक धरातलपर विकसित होइत अछि।
आलोचनात्मक दृष्टिसँ ऐ कथाक विशेषता ई अछि जे लेखक प्रत्यक्ष उपदेश नहि दैत छैथ। ओ पात्रसभक कथोपकथन आ संकेतक माध्यमसँ महाजनी प्रवृत्ति, वर्गीय अन्याय आ सामाजिक दोहरापनकेँ उद्घाटित करैत छैथ। शोभित भाय आर्थिक रूपसँ सम्पन्न छैथ, मुदा ओही सम्पत्तिक पृष्ठभूमिमे बेइमानी, शोषण आ संवेदनहीनता जुड़ल अछि। मकशूदनक “अप्पन केलहा फल” आ रूपलालक “धन जमा करैक पाछू लगिते उचित-अनुचित हटि जाइए” सन कथन कथा केँ लोक-न्यायक स्वर प्रदान करैत अछि। एतए समाज एक प्रकारक मौन न्यायाधीशक रूपमे उभरैत अछि।
कथाक चरम बिन्दु शोभित भायक आत्मस्वीकृति अछि- “केतेको लोकक गरदैन काटि सम्पत्ति बनेलौं, मुदा आब बुझि पड़ैए जे केकरा ले एते केलौं।” एही वाक्यसँ कथा बाह्य घटनासँ ऊपर उठि गहींर नैतिक निष्कर्ष धरि पहुँचैत अछि। तेँ ‘केकरा-ले केलौं’ परिवर्तनशील जीवनक सन्दर्भमे धनक निरर्थकता, आत्मबोधक पीड़ा आ मानवीय मूल्यक पुनर्स्मरणक अत्यन्त सारगर्भित कथा ठहरैत अछि।
‘बदलैत जीवन’ ऐ कथा-संग्रहक केन्द्रिय कथा थिक आ एही कारण ई केवल शीर्षक कथा नहि अछि; ई सम्पूर्ण पोथीक वैचारिक मेरुदण्ड जकाँ प्रतीत होइत अछि। कथाक केन्द्रमे रघुवीर बाबा छैथ, जे अपन एकासीम वर्षगाँठक अवसरपर बीतल जीवनक पड़ावसभकेँ पुनः देखैत आ परखैत छैथ। पोतीक बधाइ, पड़ोसीक आगमन आ सहज गप-सप्पक बीच कथा क्रमशः गम्भीर जीवन-दर्शनक रूप धारण करैत अछि। एतए जीवनक अर्थ उत्सवमे नहि, आत्मस्मरणमे उद्घाटित होइत अछि। उपलब्धिक मूल्यांकन बाह्य वैभवसँ नहि, समयानुकूल बदलावक विवेकसँ निर्धारित होइत अछि।
आलोचनात्मक दृष्टिसँ ऐ कथाक सभसँ पैघ शक्ति ई अछि जे मण्डलजी परिवर्तनकेँ एकरेखीय प्रगतिक रूपमे नहि देखैत छैथ। रघुवीर बाबा अपन जीवनमे आएल चारि गोट बदलावक चर्चा करैत छैथ। पारम्परिक खेतीसँ सिंचाइक सुविधा धरि, उन्नत बीज आ बहुफसली खेतीसँ पशुपालन धरि, आ हाथक श्रमसँ मशीनक उपयोग धरि परिवर्तनक क्रम देखाइ पड़ैत अछि। मुदा ऐ परिवर्तनसभक प्रस्तुति केवल तकनीकी सुधारक इतिहास बनि नहि रहैत। ई ग्रामीण समाजक आर्थिक चेतना, श्रम-संस्कृति, आत्मनिर्भरता आ अनुभवजन्य बुद्धिक विकासक कथा बनैत अछि। लेखक स्पष्ट संकेत दैत छैथ जे बदलाव सफल तखन मानल जाएत जखन ओ जीवनक गरिमा बढ़बैत हो, मात्र उपभोगक लिप्सा बढ़ेबाक माध्यम नहि बनए। रघुवीर बाबाक “उपयोग” आ “उपभोग” बीचक भेद ऐ कथाक नैतिक केन्द्र थिक।
ई कथा आकर्षक एतए सेहो बनैत अछि जे एतए वृद्ध पात्र निष्क्रिय स्मृतिलोपी व्यक्ति नहि छैथ, बल्कि जीवनक सचेत दार्शनिक छैथ। ओ अतीतक महिमामंडन नहि करैत छैथ, नव समयक अन्धानुकरणो नहि करैत छैथ। ओ दुनूकेँ परखैत, छाँटैत आ अपन अनुभवनिष्पन्न निष्कर्ष अगिला पीढ़ीकेँ सौंपए चाहैत छैथ। “पाँचम बदलाव”क इच्छा रहितो मृत्यु-बोधक कारण ठमकि जाएब कथाकेँ मार्मिक गहराइ प्रदान करैत अछि। ऐठाम जीवनक विडम्बना ई अछि जे मनुक्ख सुधारक सम्भावना देखैत रहैत अछि, मुदा समय सीमित रहैत अछि। तेँ ‘बदलैत जीवन’ श्रम, समय, कृषि, तकनीकी रूपान्तरण, पीढ़ीगत संवाद आ अस्तित्व-बोधक एहेन कथा थिक जे सम्पूर्ण संग्रहक केन्द्रीय संवेदनाकेँ सर्वाधिक प्रभावशाली रूपमे मूर्त करैत अछि।
‘पोथीक ज्ञान पोथीए मे रहि गेल’ कथा ‘बदलैत जीवन’ संग्रहमे ज्ञान, कर्म आ सामाजिक उपयोगिताक प्रश्नकेँ अत्यन्त सारगर्भित ढंगसँ उठबैत अछि। कथाक केन्द्रमे रघुनन्दन आ दीनानाथ छैथ, जे विद्यार्थी-जीवनक संगी रहितो जीवन-पथमे दू भिन्न दिशा पकैड़ लैत छैथ। दीनानाथ उच्च सरकारी पद, अध्ययनशीलता आ पोथी-लेखनक माध्यमसँ बौद्धिक उपलब्धि अर्जित करैत छैथ, जखन कि रघुनन्दन गाममे रहि प्रत्यक्ष सामाजिक बदलाव, कृषिक उन्नति आ लोक-सहयोगक धरातलपर अपन जीवनकेँ सार्थक बनबैत छैथ। एही विरोधी जीवन-दृष्टिक आधारपर कथा अपन आलोचनात्मक अर्थ ग्रहण करैत अछि।
आलोचनात्मक दृष्टिसँ देखल जाए तँ लेखक एतए पुस्तक-ज्ञानक विरोध नहि करैत छैथ। ओ ओहि ज्ञानक निष्प्रयोज्यताक प्रश्न उठबैत छैथ जे समाजसँ कटल रहि जाइत अछि। दीनानाथक पोथी, अध्ययन आ प्रशासनिक अनुभव हुनका निजी उपलब्धि अवश्य दैत अछि, मुदा गामक लोकसँ जीवित सम्बन्ध स्थापित नहि भऽ पबैत। दोसर दिस, रघुनन्दन कम पढ़ल-लिखल होइतहुँ उपयोगी कर्म, निष्कपट सेवा आ मानवीय व्यवहारक माध्यमसँ समाजक आशाक केन्द्र बनि जाइत छैथ। एतए मण्डलजी स्पष्ट करैत छैथ जे ज्ञानक वास्तविक मूल्य तखन अछि जखन ओ लोकजीवनमे उतरि व्यवहारिक रूप ग्रहण करैत अछि।
कथाक अन्तिम भाव “पोथीक ज्ञान पोथीए मे रहि गेल” सम्पूर्ण कथाक निष्कर्ष प्रस्तुत करैत अछि। ई वाक्य मात्र व्यंग्य नहि अछि; ई बौद्धिकता आ सामाजिक उत्तरदायित्वक बीच बनल दूरीपर मार्मिक टिप्पणी करैत अछि। एही अर्थमे ई कथा परिवर्तनशील समाजमे जीवित ज्ञान आ संग्रहित ज्ञानक बीचक अन्तरकेँ आलोचनात्मक रूपेँ उद्घाटित करैत अछि।
‘केना परिछाएत’ कथा ‘बदलैत जीवन’ संग्रहमे परम्परा आ नवचेतनाक टकरावकेँ अत्यन्त सूक्ष्म ग्रामीण परिप्रेक्ष्यमे प्रस्तुत करैत अछि। कथाक केन्द्रमे सोमेसर काका, जागेसर आ सुतेसर छैथ। विवादक मूल कारण नवका धानक बीआ अछि। जागेसर परिवारक बढ़ैत आवश्यकता आ अन्न-उत्पादनक दृष्टिसँ उन्नत बीआक पक्षमे छैथ, जखन कि सुतेसर ओकरा “अशुद्ध” मानि पाबनि-तिहारक परम्परागत शुद्धताक प्रश्न उठबैत छैथ। एतए कथा केवल खेती-बाड़ी वा बीजक चयन धरि सीमित नहि रहैत; ई बदलैत ग्रामीण मानसक भीतर चलैत ज्ञान-अज्ञान, उपयोगिता-आस्था आ व्यवहार-परम्पराक तनावक कथा बनि जाइत अछि।
आलोचनात्मक दृष्टिसँ ऐ कथाक विशेष महत्त्व सोमेसर काकाक चिन्तनमे निहित अछि। ओ विवादकेँ साधारण पारिवारिक झगड़ाक रूपमे नहि देखैत छैथ; ओ एकरा मानवीय समाजक स्थायी द्वन्द्वक रूपमे ग्रहण करैत छैथ। हुनकर ई विचार जे दिन-राति, इजोत-अन्हार आ ज्ञान-अज्ञान संग-संग चलैत अछि, कथाकेँ दार्शनिक ऊँचाइ प्रदान करैत अछि। मण्डलजी एतए स्पष्ट करैत छैथ जे नव ज्ञानक प्रवेशमात्रसँ अज्ञान समाप्त नहि होइत अछि। दुनूक सह-अस्तित्वसँ संघर्ष जन्म लैत अछि।
कथाक समाधान सेहो विशेष ध्यान योग्य अछि। सोमेसर काका पूर्ण परम्परावादी नहि छैथ, आ ने अन्ध-आधुनिक। ओ व्यावहारिक समन्वय सुझबैत छैथ, उत्पादन लेल नव धान आ पाबनि-तिहार लेल परम्परागत धान। एही बिन्दुपर कथा मण्डलजीक संतुलित सामाजिक दृष्टिक परिचायक बनैत अछि। तेँ ‘केना परिछाएत’ परिवर्तनशील समाजमे विवेकपूर्ण समन्वयक सारगर्भित कथा ठहरैत अछि।
‘दसमीक डगर’ कथा ‘बदलैत जीवन’ संग्रहमे परम्परा, सामाजिक बदलाव आ सांस्कृतिक पुनर्पाठक प्रश्नकेँ तीक्ष्ण रूपसँ उठबैत अछि। कथाक केन्द्रमे रामलोचन भाय आ रघुवीर छैथ। रामलोचन भाय पुरान पूजाव्यवस्थाक पक्षधर छैथ, जिनका दुःख अछि जे दुर्गापूजामे एखन “डगर” नहि पड़ि रहल अछि आ मनोरंजनक रूप सेहो बदलि गेल अछि। दोसर दिस रघुवीर नव पीढ़ीक प्रतिनिधि छैथ, जे परम्पराकेँ आँखि मुँदि स्वीकार नहि करैत छैथ; ओ ओकर सामाजिक प्रयोजन आ वर्तमान उपयोगिताकेँ प्रश्नक केन्द्रमे आनैत छैथ।
आलोचनात्मक दृष्टिसँ ऐ कथाक मुख्य शक्ति संवादमे निहित अछि। लेखक ककरो सोझे खलनायक नहि बनबैत छैथ। ओ पुरान आ नव, दुनूक विचारकेँ सोझा-सोझी रखि समाजक बदलैत मानसिक धरातलकेँ उद्घाटित करैत छैथ। रघुवीरक तर्क जे “डगर” मूलतः सूचना देबाक माध्यम छल आ बदलल समयमे अप्रासंगिक भऽ गेल अछि, परम्पराक ऐतिहासिक अर्थकेँ वर्तमान जीवनसँ जोड़ि देखबाक आग्रह करैत अछि। एतए मण्डलजी संस्कृतिक जीवित रूप आ जड़ रूपक अन्तर स्पष्ट करैत छैथ।
कथाक दोसर महत्त्वपूर्ण पक्ष महिला कलाकारक कार्यक्रमपर उठल विवाद अछि। रघुवीर “रंडी नाच”क प्रति अपन हेय दृष्टिक विरोध करैत छैथ, जकरा माध्यमसँ लेखकक प्रगतिशील सामाजिक बोध स्पष्ट होइत अछि। ओ समाजक दोहरी नैतिक मानदण्डकेँ उजागर करैत छैथ आ कला, स्त्री-अस्तित्व आ सामाजिक सम्मानक प्रश्नकेँ नव अर्थ प्रदान करैत छैथ। तेँ ‘दसमीक डगर’ सांस्कृतिक परिवर्तनक बीच विवेकपूर्ण पुनर्मूल्यांकनक अत्यन्त सारगर्भित कथा ठहरैत अछि।
‘अप्पन दोख’ कथा ‘बदलैत जीवन’ संग्रहमे आत्मालोचन, धार्मिक आडम्बरक आलोचना आ सामाजिक विषमताक सूक्ष्म परीक्षणक महत्त्वपूर्ण कथा थिक। कथाक केन्द्रमे सुवोध छैथ, जे दुर्गापाठ करबाक विचार करैत छैथ; मुदा ई विचार निष्कलुष भक्ति-संवेदनासँ अधिक शंकर देवक व्यंग्यपूर्ण निन्दाक प्रत्युत्तर देबाक मनोवृत्तिसँ प्रेरित अछि। एही ठाम कथा अपन आलोचनात्मक अर्थ ग्रहण करैत अछि, किएक तँ लेखक धर्मक बाह्य कर्मकाण्डक भीतर छिपल अहं, प्रतिद्वन्द्विता आ जातीय उन्मादकेँ पकड़ैत छैथ।
आलोचनात्मक दृष्टिसँ ई कथा विशेष रूपेँ उल्लेखनीय अछि, किएक तँ मण्डलजी ऐठाम सोझे उपदेश नहि दैत छैथ। ओ सुवोधक मनःस्थितिक माध्यमसँ देखबैत छैथ जे मनुक्ख प्रायः अपन दोष छोड़ि दोसराक दोषपर दृष्टि केन्द्रित करैत अछि। सुवोध अपन शिक्षकीय योग्यता, आत्मविश्वास आ तर्कशीलतापर गर्व करैत छैथ, मुदा दुर्गापाठ करबाक मूल प्रेरणा धार्मिक साधना नहि अछि; ई अपन संस्कृत-पाठक क्षमता सिद्ध करबाक इच्छासँ जुड़ल अछि। एतए कथाकार धार्मिक प्रदर्शन आ वास्तविक अध्यात्म बीचक अन्तर स्पष्ट करैत छैथ। राम परीछन काकाक पात्र एही कारण कथामे नैतिक सन्तुलन आनैत अछि। हुनकर ई सलाह जे “केकरो देखेलासँ कियो धर्मात्मा नहि बनैए”, कथाक केन्द्रीय आलोचनात्मक निष्कर्ष बनि जाइत अछि।
एहि प्रकार ‘अप्पन दोख’ केवल धार्मिक प्रसंगक कथा भरि नहि रहैत; ई आत्मपरीक्षणक कथा रूपमे उभरैत अछि। ई बुझबैत अछि जे परिवर्तनक पहिल चरण दोसराकेँ दोष देब नहि, अपन अन्तर्मनक प्रवृत्तिक पहचान करब अछि। एही अर्थमे ई कथा मानवीय चेतनाक गहींर व्याख्या प्रस्तुत करैत अछि।
‘यात्रा’ कथा ‘बदलैत जीवन’ संग्रहमे धार्मिक अनुष्ठानक बाह्य रूपसँ आन्तरिक जीवन-दर्शन दिस बढ़बाक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण कथा थिक। कथा दुर्गापूजाक अन्तिम दिनक परिप्रेक्ष्यमे घटैत अछि, जेतए एक दिस गामक सामूहिक धार्मिक क्रियाकलाप चलि रहल अछि आ दोसर दिस कथावाचक मनोहरक भीतर “यात्रा” शब्दक असल अर्थ बुझबाक जिज्ञासा जागृत होइत अछि। प्रारम्भमे ओ “विसर्जन” आ “यात्रा”क अर्थमे अन्तर नहि बुझि पबैत छैथ, मुदा वैदिक काशी भायक व्याख्यासँ स्पष्ट होइत अछि जे पूजा मात्र कर्मकाण्ड नहि अछि; ई जीवनक क्रमिक साधनाक प्रतीक रूपेँ स्थापित होइत अछि।
आलोचनात्मक दृष्टिसँ ऐ कथाक विशेषता ई अछि जे मण्डलजी धार्मिक परम्पराकेँ जड़ रूपमे प्रस्तुत नहि करैत छैथ। ओ तकर प्रतीकात्मक अर्थकेँ उद्घाटित करैत छैथ। महाकाली, महालक्ष्मी आ महासरस्वतीक तीन-तीन दिनक आराधनाकेँ क्रमशः स्वास्थ्य, कर्मशक्ति आ ज्ञानशक्तिसँ जोड़ि काशी भाय पूजा-विधानकेँ जीवन-व्यवहारक धरातलपर स्थापित करैत छैथ। एतए कथा धार्मिक संस्कारकेँ आधुनिक मानवीय अर्थ प्रदान करैत अछि। ई मण्डलजीक विशिष्ट दृष्टि थिक जे ओ अनुष्ठानक भीतर सँ जीवनोपयोगी तत्त्वकेँ चिन्हित करैत छैथ।
कथाक गहींर अर्थ ऐ तथ्यमे निहित अछि जे “यात्रा” समापन नहि अछि; ई नव आरम्भक संकेत बनि अबैत अछि। तेँ ई कथा बदलैत जीवनक सन्दर्भमे ई स्थापित करैत अछि जे सामाजिक-धार्मिक परम्परा तखन अर्थवान बनैत अछि जखन ओ मानवीय चेतना, कर्म आ जीवन-मार्गकेँ आलोकित करैत अछि।
‘गंगासागर’ कथा ‘बदलैत जीवन’ संग्रहमे तीर्थ, आस्था, लोकविश्वास आ मानवीय चेतनाक अत्यन्त अर्थगर्भित कथा थिक। कथाक आरम्भ गोपीक मनमे केतेको वर्षसँ पलैत गंगासागर-यात्राक अभिलाषासँ होइत अछि। लोकप्रचलित मान्यता “सभ तीरथ बेर-बेर, गंगासागर एक बेर” क प्रभाव हुनका मनमे गहींर रूपसँ बसल अछि, मुदा कथा क्रमशः बाह्य तीर्थ-यात्रासँ आन्तरिक बोधक यात्रामे परिणत होइत जाइत अछि। भजनलाल आ विशेष रूपसँ लोचन मास्टर साहैब संग संवाद एही रूपान्तरणक माध्यम बनैत अछि।
आलोचनात्मक दृष्टिसँ ऐ कथाक मूल शक्ति ई अछि जे मण्डलजी तीर्थकेँ केवल कर्मकाण्ड वा मोक्षलाभक रूढ़ धारणाधरि सीमित नहि रखैत छैथ। गोपी पहिने गंगासागरकेँ एक पवित्र भौगोलिक स्थल रूपेँ देखैत छैथ, जेतए एक बेर स्नान कए जीवन मुक्त भऽ जाएत। मुदा लोचन मास्टर साहैब एकर अर्थकेँ विस्तृत करैत छैथ। गंगाक समुद्रमे मिलनकेँ ओ समाजमे व्यक्तिक विलयन, निजी अहंकारक क्षय आ व्यापक समत्व-बोधक प्रतीक मानैत छैथ। एतए कथा धार्मिक यात्राकेँ सामाजिक आ दार्शनिक अर्थ प्रदान करैत अछि।
एहि कथाक सार्थकता ऐ बातमे निहित अछि जे मण्डलजी बाह्य तीर्थक महत्त्वकेँ अस्वीकार नहि करैत छैथ, मुदा ओकर गम्भीर अर्थक खोज अवश्य करैत छैथ। ‘गंगासागर’ ई स्पष्ट करैत अछि जे सच्चा स्नान जलमे नहि, चेतनामे होइत अछि, जखन व्यक्ति अपनाकेँ मात्र व्यक्ति रूपमे नहि, समाजक एक अंश रूपमे बुझए लगैत अछि। एही अर्थमे ई कथा संग्रहक सामूहिक जीवन-दर्शनक परिपक्व अभिव्यक्ति थिक।
समेकित आलोचनात्मक मूल्यांकन
‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रहक समेकित मूल्यांकनसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे ई केवल दस गोट कथाक संचय भरि नहि अछि; ई बदलैत ग्रामीण समाज, मानवीय सम्बन्ध आ नैतिक चेतनाक सुसंगठित कथा-दस्तावेज थिक। संग्रहक कथासभ गाम, स्मृति, कर्म, ज्ञान, परम्परा, आत्मालोचन, पूजा, यात्रा आ सामूहिक जीवन-दर्शनकेँ परस्पर जोड़ैत छैथ।
एहि पोथीक सभसँ पैघ विशेषता ई अछि जे मण्डलजी परिवर्तनकेँ एकरेखीय रूपमे नहि देखबैत छैथ। हुनका कथा-संसारमे परिवर्तनक भीतर संघर्ष सेहो अछि, सम्भावना सेहो अछि, भ्रम सेहो अछि आ विवेक सेहो। ‘गामसँ दूर’, ‘केना परिछाएत’ आ ‘दसमीक डगर’ जकाँ कथासभ सामाजिक बदलाव, परम्परा-नवीनता तनाव आ व्यवहारिक समन्वयक प्रश्न उठबैत छैथ।
एहि संग्रहक दोसर महत्त्वपूर्ण पक्ष आत्मालोचन थिक। ‘केकरा-ले केलौं’, ‘अप्पन दोख’ आ ‘पोथीक ज्ञान पोथीए मे रहि गेल’ जकाँ कथासभ ई संकेत दैत छैथ जे बाह्य उपलब्धिसँ अधिक आवश्यक अछि अन्तर्मनक शुद्धि, लोकजीवनसँ जुड़ल ज्ञान आ नैतिक जिम्मेदारी।
समग्र रूपेँ ई संग्रह बदलैत मिथिला आ बदलैत मनुक्ख दुनूक कथा अछि। मण्डलजी यथार्थक चित्रण भरि नहि करैत छैथ; ओ ओकर सामाजिक आ मानवीय अर्थ सेहो उद्घाटित करैत छैथ। एही कारण ‘बदलैत जीवन’ समकालीन मैथिली कथा-साहित्यमे एकटा विचारोत्तेजक आ सार्थक कथा-संग्रह रूपेँ प्रतिष्ठित होइत अछि।
भाषा-शिल्प आ कथा-दृष्टि
‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रहक भाषा-शिल्प एकर महत्त्वपूर्ण शक्ति थिक। मण्डलजी लोकजीवनसँ उपजल, सहज, संवादप्रधान आ अनुभवसमर्थ भाषा प्रयोग करैत छैथ। कथासभमे ग्रामीण बोलचाल, मुहावरा, लोक-व्यवहार आ आत्मकथ्यात्मक स्वर एकसंग मिलि कऽ एहेन प्रभाव उत्पन्न करैत अछि जाहिसँ कथा कृत्रिम नहि लगैत, बल्कि जीयल-जागल अनुभव जकाँ प्रतीत होइत अछि। हुनकर कथन-शैलीमे बाह्य घटना संग आन्तरिक मंथन सेहो समान रूपसँ चलैत रहैत अछि। एही कारण कथासभ केवल आख्यान धरि सीमित नहि रहैत, मानवीय विचार-प्रक्रियाक अभिलेख बनि जाइत अछि।
शिल्पगत दृष्टिसँ मण्डलजीक विशेषता ई अछि जे ओ छोट घटना वा साधारण संवादसँ पैघ सामाजिक आ नैतिक अर्थ उद्घाटित करैत छैथ। कथासभमे उपदेशात्मकता कम आ अनुभवजन्य निष्कर्ष अधिक अछि। पात्रसभ अपन कथोपकथन, व्यवहार, स्मृति आ आत्मस्वीकृतिक माध्यमसँ स्वयं अपन अर्थ उद्घाटित करैत छैथ। ‘गामसँ दूर’मे आत्ममंथन, ‘केकरा-ले केलौं’मे नैतिक आत्मस्वीकार, ‘पोथीक ज्ञान पोथीए मे रहि गेल’मे व्यंग्यात्मक निष्कर्ष, ‘यात्रा’ आ ‘गंगासागर’मे प्रतीकात्मक व्याख्या, ई सभ लेखकक कथा-दृष्टिक परिचायक अछि। मण्डलजीक कथा-दृष्टि मूलतः लोकजीवनकेन्द्रित, मानवीय, नैतिक आ विचारप्रवण अछि, जेतए परिवर्तनक मूल्यांकन जीवनक उपयोगिता आ मनुक्खताक धरातलपर कएल जाइत अछि।
उपसंहार
अन्तमे ई स्पष्ट रूपसँ कहल जा सकैत अछि जे जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘बदलैत जीवन’ कथा-संग्रह समकालीन मैथिली कथा-साहित्यमे विशेष महत्त्व रखैत अछि। ऐ पोथीमे बदलैत ग्रामीण समाजक बहुआयामी रूप अत्यन्त संवेदनशील आ विचारोत्तेजक ढंगसँ उद्घाटित भेल अछि। गामक सामाजिक संरचना, आर्थिक संघर्ष, परम्परा आ नवीनताक बीचक द्वन्द्व, ज्ञानक उपयोगिता, धार्मिक व्यवहार, आत्मालोचन आ सामूहिक जीवन-बोध, ई सभ तत्त्व कथासभमे तेना गुंथल अछि जे पाठककेँ मिथिलाक जीवन-यथार्थक गहींर अनुभूति होइत अछि। मण्डलजी अपन कथा-दृष्टिद्वारा ई देखबैत छैथ जे परिवर्तन केवल बाह्य परिस्थिति बदलनासँ पूर्ण नहि होइत अछि; ओ तखन अर्थवान बनैत अछि जखन मनुक्खक भीतर चेतना, विवेक, जिम्मेदारी आ मूल्यबोधक जागरण होइत अछि।
एहि संग्रहक सभसँ उल्लेखनीय पक्ष ई अछि जे लेखक जीवनक साधारण लगैत घटनासभसँ पैघ सामाजिक आ मानवीय निष्कर्ष उद्घाटित करैत छैथ। पात्रसभक अनुभव, संवाद, पछतावा, स्मृति, संघर्ष आ आत्मस्वीकृति मिलि कऽ जीवनक एहेन रूप सामने आनैत अछि जेतए मनुक्ख अपनेकेँ, परिवारकेँ, समाजकेँ आ समयकेँ नव दृष्टिसँ देखए लगैत अछि। ‘बदलैत जीवन’क कथासभ पाठककेँ ई बोध करबैत अछि जे पद, धन, कर्मकाण्ड, ज्ञानक प्रदर्शन वा बाह्य प्रतिष्ठासँ जीवन सार्थक नहि होइत अछि। जीवनक सार्थकता उपयोगी कर्म, लोकहित, आत्मपरीक्षण, मानवीय संवेदना आ समाजोन्मुखी दृष्टिमे निहित अछि। तेँ ई कथा-संग्रह बदलैत मिथिला आ बदलैत मनुक्ख दुनूक प्रामाणिक, मर्मस्पर्शी आ स्थायी साहित्यिक दस्तावेज रूपेँ स्वीकार कएल जा सकैत अछि।

Suggested citation: डॉ. उमेश मण्डल. “'बदलैत जीवन' कथा-संग्रहक आलोकमे सामाजिक परिवर्तन आ मानवीय चेतनाक समीक्षात्मक विवेचन (पृष्ठ- ४६-५५).” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 440, 2026-04-15. https://www.videha.co.in/research/2026/440/बदलैत-जीवन-कथा-संग्रहक-आलोकमे-सामाजिक-परिवर्तन-आ-मानवीय-चेत-7712f17e7f.htm

मूल विदेह अंक / Original issue