२.२.हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१९
हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-१९
हितनाथ झा
(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
श्री दिगम्बर नाथ झा जीक कथा जे कि प्रभात मे धारावाहिक रूपें प्रकाशित भेल-
स्वतन्त्रता
रमेश बाबू तथा दीनेश बाबू साक्षात ममिऔत पिसिऔत भाइ छलाह। कमला देवी ज्येष्ठ भाइक पत्नी छलथिन्ह। ओ बहुत नीक कुलशीलक कन्या छलीह।थोड़ बहुत लिखने पढ़ने सेहो छलीह। यद्यपि ओहि परिवारमे यैह तीनू गोटे छलाह, तथापि हुनकालोकनिक व्यय अत्यन्त बेसी छलैन्ह। रमेश बाबू भागलपुरमे एक पैघ फैक्टरीक अधिष्ठाता छलाह जाहिसँ हुनका लाभ पूर्ण रूपेँ होइत छलन्हि। हुनक कनिष्ठ भाइ दीनेश बाबू प्रवेशिका परीक्षा पास कय भागलपुर कॉलेजमे पढ़ैत छलाह। यद्यपि रमेश बाबू तथा दीनेश बाबू सहोदर नहि छलाह तथापि दूनू गोटाक पारस्परिक-प्रेम अत्यन्त गूढ़ छलनि। हुनकालोकनिक आचार, विचार तथा व्यवहारसँ ई ककरो प्रतीत नहि होइत छलैक जे ई लोकनि एक पिताक पुत्र नहि थिकाह।
ओहि दिन जखन रमेश बाबू आफिससँ आबि क� अपन कोठरीमे मेजक नजदीकमे बैसि कय विश्राम क� रहल छलाह। हुनक हृदय- हारिणी प्राणेश्वरी कमला देवी ओहि कोठरीमे प्रवेश करैत पूछय लगलथिन्ह--�हमर चूड़ी अनलौं कि नहि? दीअ ने।�
रमेश बाबू किछु काल छुओ रहि पुनः धीरे-धीरे ई वचन उच्चारण कयलन्हि--" चूड़ी ! आहाँक चूड़ी त� हम नहि लावि सकलौं। चूड़ी लाब� त� आहाँ ठीक कहने रही परञ्च किञ्चित रुपैआ बाँकी रहि गेला सन्ता दीनेश बाबू केँ एक मित्रक वहिनिक विवाह रुकि गेलनि हैं। बुझल किने, ओ लोकनि बड़ सीदित छथि। भरि पेट अन्नहु टा समयपर नहि प्राप्त होइत छन्हि। यैह सब कारणसँ -" ई सब वार्तालाप के वीचहिमे रोकि कमला देवी दिस ताक लगलाह। श्रीमती कमला देवी मुँह बनाक� किछु मोनहि मोन वाज� लगलीह। परन्तु मोन मे किछु विचारि कय सकुचित मुख-कमलसँ किछु उच्चारण नहि केलनि। पुनः ओ भौंह केँ धनुषाकार करैत स्वामी दिश ताक� लगलीह। अकारण क्रोध करैत शीघ्रता पूर्वक कोठरीसँ बाहर भ� गेलीह। रमेश कोनो तरहेँ पिण्ड छोड़यलन्हि। ओ अपना मोनमे कल्पनो नहि कयने छलाह जे आइ श्रीमती जी एतेक शीघ्र शान्त भय जयतीह। परन्तु एक बात सोचि कय हुनका मोनमे बड़ा अशान्त भ� गेलन्हि। कहल नहि जा सकैत अछि जे कियैक श्रीमतीजीक प्रवृत्ति दिनानुदिन हीनता केँ प्राप्त करय लगलैन्ह।
कत शृंगार-पेटार तथा आडम्बरक सामग्री और कत एक कलुषित परिवार के कन्यादान मे सहायता।रमेश बाबू केँ ई दूनू बात नर्क तथा स्वर्गक सदृश प्रतीत भेलन्हि।
(२)
रमेशबाबू जाहि रूपेँ एहि मामिलाकेँ निवृत्ति जकाँ बुझलनि वास्तवमे ओहि रूपेँ निवृत्ति नहि भेलैक।ओहि दिन संध्याकाल रमेशबाबू टहलि बुलि अपना ओहिठाम जखनि अयलाह तखनि हुनका बुझि पड़लनि जे हुनका सँ बिना पुछनहिं श्रीमती जी पड़ोसीक बंगाली-महिला संग वायस्कोप देख� गेली है। एहि बीचमे किछु दिनसँ वो महिला श्रीमतीजीक घनिष्ठ सखी भ� गेल छलथिन्ह। ओ महिला स्त्री-स्वाधीनताक बहुत पैघ हिमायती छथि।मासमे प्रायः १५ दिन स्त्री सभा करैत छथि आर पुरुषसभक बन्धन तोड़बाक विषयपर बहुत भाषण करैत छथि।
रमेशबाबू दू तीन मिनट चुपचाप ठाढ़ छलाह। तदुपरान्त कोठापर अपन कोठरी मे चल गेलाह। ओहिठाम दीनेशबाबू अध्ययन क� रहल छलाह। ओ भाइकेँ देखिते देरी चटपट उठि ठाढ़ भय गेलाह।रमेशबाबू तौनी केँ डोर पर रखैत बजलाह--" बैसू, दीनेशबाबू।ठाढ़ कथी लय छी? तदुपरान्त रमेशबाबू पुनः बजैत भेलाह --" आइ अहाँक मूँह उदास कियै अछि? कॉलेज सँ आबि क� किछु जलपान कयलौं हैं कि नहि? दीनेशबाबू किञ्चित कालतक माथ झुकौने ठाढ़ छलाह। कोनो तरहक उत्तर नहि देलखिन। बात ई छलैक जे जखनि दीनेशबाबू कॉलेज सँ आयल छलाह अपन भाउजकेँ नहि देखि भनसीयासँ जलखै मंगलखिन्ह, ताहिपर भनसीया कहलखिन्ह-" बाबू साहेब, आइ त� आहाँ लय जलपान नहि अछि।" भूख जोर लागल छलन्हि तैं पुनः डपटि कय पुछलथिन्ह--" कियैक नहि अछि? ताहिपर भनसीया बहुत उष्ण स्वरमे उत्तर देलखिन्ह --� ओहि घरसँ एक महिला आयल छलीह, वैह जलपान कय आहाँक भाउजक संग वायस्कोप देख� चल गेलीहि। तत्पश्चात दीनेशबाबू पुनः किछु नहि पुछि तथा अश्रुपातकेँ रोकि कोठापर चल गेलाह। परन्तु रमेशबाबूकेँ ई बात बुझबामे विलम्ब नहि भेलनि।क्रोधसँ ओ कम्पायमान हुअ लगलाह। पुनः ओ दीनेशबाबू केँ अत्यन्त स्नेहक संग कहलखिन्ह-� आहाँ एही ठाम बैसल रहू, हम शीघ्र चल अबै छी।" एतबा कहि ओ शीघ्रतासँ नीचाँ आबि बाजार सँ जलपान लानि कय भाइकेँ सोझाँमे राखि देलथिन्ह तथा कहलथिन्ह। -" लिअ, जलखै क'क� तत्पश्चात पढ़ब। भूखमे कतौ पढ़ल जाइ।" दीनेशबाबू अपन भाइक बात खण्डन कहियो नहि करै छलथिन्ह। आइयो ओ चुपचाप जलखै कय लेलन्हि।
ओहि रातिमे रमेशबाबू अत्यन्त खिन्न चित्त भेला सन्ता भनसीयाकेँ बजा क� कहलथिन्ह जे आइ दूनू भाइक भोजन ऊपरे नेने आउ। भनसीया डेराइत-डेराइत कहलथिन्ह-� बाबू साहेब ! आइ त� केवल अहीं टाक भानस भेल अछि। श्रीमतीजी छोटकाबाबूक वास्ते सामग्री नहि देलथिन्ह। जखन हम हुनका वास्ते मंगलियनि त ओ कहलनि जे� हुनका खेबाक कमी कोन छन्हि। भाइसँ जे मित्रक नामपर रुपैया लेलन्हि अछि ओहिसँ हुनक कार्य किछु दिन तक खुशीसँ चलतन्हि।"
ई सुनतहि रमेशबाबू क्रोधान्ध भय गेलाह।परन्तु भनसीयाक एहिमे दोष की? अतः रमेशबाबू अपनाकेँ काबू मे राखि भनसीया सँ पुछलथिन्ह -" दीनेशबाबू कत� छथि?� ओ निचला महलमे पढ़ि रहल छथि"।-� जाउ, तुरन्त ऊपर पठा देबनि।" दीनेशबाबू केँ ऊपर अबितहि देरी रमेशबाबू कहलथिन्ह-� राति बहुत भ� गेलैक अछि, भोजन कय लिअ। विलम्ब कयलासँ भात ठंढा भ� जायत।" एकहि स्थानपर भोजनक वास्ते बैसैत दीनेशबाबू भाइक दिश ताकि क� बजलाह-� आर अहाँक थारी? आहाँ नहि भोजन करब की? रमेशबाबू दुखितक भाव दर्शबैत कहलखिन्ह--" नहि दीनेशबाबू। आइ हम भोजन नहि करब । एकाएक हमरा पेटमे दर्द प्रारम्भ भय गेल अछि।" एतबा कहि विछावन पर जा क� पड़ि रहलाह। ई विलोकि दीनेशबाबू तुरन्त भाइक निकट चल अयलाह तथा बहुत कातर स्वरमे पुछलथिन्ह -" भाइ, पेटमे दर्द होइत अछि की? निमक सुलेमानी नेने आउ?� रमेशबाबू तुरन्त उत्तर देलथिन्ह -" कोनो चीज लेबाक जरूरत नहि। एक सन्ध्या उपवास कयला उत्तर काल्हि धरि दर्द छूटि जायत।" त� थोड़ बहुत दूध-तूध पी लिअ। ने ने आउ?� नहि दीनेशबाबू, पेट दर्दमे कतौ दूध पिअल जाइत छैक? आहाँ चिन्ता जुनि करी। बस, हमर कहिनी मानू, जाउ, आहाँ भोजन क� लिअ।" लाचार भ� क� दीनेशबाबू कोनो तरहेँ भोजन कय लेलन्हि।
(३)
राति बहुत व्यतीत भ� गेल छलैक। एक हावगाड़ी रमेशबाबूक घरक सामने ठाढ़ भय गेल। श्रीमतीजी गाड़ी सँ उतरली, ता तक रमेशबाबू सूतल नहि छलाह। लालटेनक सिरहानामे ल� क� � सर्चलाइट� पढ़ि रहल छलाह।श्रीमतीजीकेँ घरमे प्रवेश करतहि श्री रमेशबाबू आँखि उठा क� हुनका दिश तकलखिन्ह, परन्तु पुनः अखबार पढ़बमे लीन भय गेलाह।श्रीमतीजी अपन पतिकेँ तिरछी नजरिसँ देखैत अपन वस्त्रकेँ परिवर्तन करय लगलीह। लालटेनक ज्योति सब दिश एक समान नहि पड़ैत छलैक। अतः कोनो चीज श्रीमतीजीकेँ तकला उत्तर नहि भेटलन्हि। ताहि ओ खिसिआ क� कहलथिन्ह--" घरमे त� एक टा लालटेन, ओहो आहाँ अपन निकटमे राखि पढ़ाइ कय रहल छी। हजारो बेर बाजल होयब जे लालटेन सँ काज नहि चलि सकैत अछि, बिजली लगबा लेबाक चाही। परन्तु हमर बात सुनैत के अछि?
रमेशबाबू लालटेनकेँ चुपचाप हटा क� राखि करोट बदलि कय सुति रहलाह।श्रीमतीजी पुनः किछु नहि बजलीह।लालटेन केँ तेज कय एक अँग्रेजी किताब हाथमे ल'क� पढ़य लगलीह।किछु कालक बाद ओम्हर मुँह फेरि कय रमेशबाबू बजलाह -- जे किछु दोष अछि से हमर। बिना पुछि कय वायस्कोप देखय जायब तथा एकर अतिरिक्त राति क� पुस्तक पढ़बमे जेना कोनो बात नहि।" श्रीमतीजी पुस्तक दिस तकैत बजलीह-� पुछबाक की मतलब अछि? सब कार्यमे पुछहि पड़त की? एतेक कठिन बन्धन मे हम नहि रहि सकै छी। हम ई पहिने सूचित कय देबय चाहैत छी। किछु क्षण ठहरि क� पुनः बजलीह --" श्रीमतीजी बनर्जी ठीके कहैत छथिन्ह जे पुरुषजाति अन्यायपूर्वक स्त्री-जातिकेँ पराधीन बना क'रखैत अछि। जिनकर वास्ते मरै छी अथवा जीवै छी, ओही दुलरुआ भाइकेँ उपदेश दिअ। ओ सब सहन करताह। परन्तु दुःख एहि बातक अछि जे एहेन बुद्धि ल'क� जन्म नहि लेलहुँ आर ताहू पर पितासँ गलती स� दू अक्षर पढ़ब सीख लेलौं। एहि कारणसँ कह� पड़ैत अछि जे किछु कहब ओकरा सिर नबा क �मानि लेब हमरासँ नहि भ� सकैत अछि।"
रमेशबाबू चटपट शय्यापर उठि बैसि रहलाह। हुनक चक्षु अग्नि सदृश भय गेलनि। डपटि क� बजलाह -" हँ, हँ, छोट भाइकेँ आदेश देबनि आ हजारो बेर देबनि।किन्तु ....." तदुपरान्त बातकेँ अपूर्ण छोड़ि ओ तुरन्त कोठरीसँ बाहर भय गेलाह। श्रीमतीजी क्रोधित भय किछु काल प्रयन्त चुपचाप किताब खोलने बैसल रहलीह।
(४)
माघ मास प्रायः खतम भ'रहल छलैक। एक दिन आफिस घर अबैत समयमे रास्तामे रमेशबाबू एकाएक एक प्राइवेट हवागाड़ीपर श्रीमती कमला देवी, प्रबोध चन्द्रबाबू तथा एक कोनो तेसर व्यक्तिकेँ जाइत देखलखिन्ह। प्रबोधबाबू मोटर चला रहल छलाह तथा श्रीमती कमला देवी हुनक पाँजर मे बैसल छलीह। मोटर रमेशबाबूक कात सँ तीरक समान चल जाइत रहल। रमेशबाबू अभिमान तथा क्रोधसँ भारी मोन ल'क� धीरे-२ घर अयलाह। अवितहि देरी दीनेशबाबू केँ पुछलथिन्ह--" आहाँक भाउज घर सँ जाइत काल किछु कहने रहथि?� दीनेश उत्तर देलथिन्ह-� ओ तँ हमरा किछु नहि कहलन्हि।"
अनुमान नहि कैल जा सकैछ जे आइ कियैक रमेशबाबू भाइक संग वायस्कोप देख� चल गेलाह। बीचमे जखन 'इनटरभल� भेलैक तँ सहसा रमेशबाबूक दृष्टि ऊपरक एक 'बॉक्स� पर जा पड़लन्हि। ओहिठाम
श्रीमती कमला देवी, प्रबोधबाबू तथा श्रीमती बनर्जी तीनू गोटे बैसल छलीह। रमेशबाबू पुनः रुमालसँ आँखि पोछि देखलन्हि,
ताकि कोनो सन्देह नहि रहि जाय। देखलनि जे वास्तवमे वैह तीनू गोटे उपस्थित अछि। ओ स्पष्ट देखलथिन्ह जे कोनो बातपर प्रबोधबाबू हँसैत-हँसैत ओतेक लोकक समक्षमे अत्यन्त निर्लज्जतापूर्वक श्रीमतीजीक देहपर लोटि गेल छलाह।
*********
छि: छि: ! रमेशबाबू अधिक काल तक ओम्हर नहि ताकि सकलाह। ओ झटपट अपन स्थानपर सँ उठि दीनेशबाबूकेँ कहलथिन्ह --" आहाँ बैसल रहू, हम कनेक बाहरसँ अबैत छी।� ओ मोनहि मोन ई सोचय लगलाह--" ऐ कमला ! कि पर पुरुषके संग एतेक घनिष्ठता।"
पुनः वायस्कोप प्रारम्भ भेल।परन्तु रमेशबाबूकेँ मोन नहि लगलन्हि। ऊपरक घृणित दृश्य पुनः-पुनः स्मरण भेला सन्ता ओ बहुत अगुता गेलाह। जैखन वायस्कोप बन्द भेलैक, ओ झट बिना कोम्हरो देखैत सोझे भाइक संग बाहर भय गेलाह। तथा 'बस� पकड़बाक हेतु आगू बढ़लाह। दैव प्रतिकूल छलथिन्ह सहसा 'कमला'क सँग पुनः एक बेरि हुनक दृष्टि एकत्रित भय गेलन्हि।ओहि समयमे कमलाक एक हाथ प्रबोधबाबूकेँ हाथमे फँसल छलन्हि। रमेशबाबू शीघ्र ओम्हरसँ दृष्टि फेरि �बस� मे सवार भय गेलाह। किन्तु ओहि समयमे रमेशबाबू श्रीमतीजीसँ किछु नहि पुछलथिन्ह। श्रीमतीजी सेहो ओहि प्रसंगकेँ छोड़ि देलनि।परन्तु भीतरे भीतर ओ अग्नि प्रज्वलित हुअ लागल।
(५)
किछु दिनक बाद एक दिन जखनि रमेशबाबू आफिससँ अयलाह तँ हुनका देहमे धाह भय गेल छलनि।हुनक शरीर ज्वर सँ अत्यन्त प्रज्वलित भय रहल छलन्हि। घर मे प्रवेश करितहिं पलंगपर पड़ि रहलाह तथा तुराइ देहपर ओढ़ि लेलन्हि।माथ दर्दसँ हुनक मोन पीड़ित छलैन्ह। साँझक लालटेन जखन लेसबाक हेतु श्रीमती कमला देवी अयलीह त� हुनक दृष्टि बिछौना पर पडलैन्ह। धीरे-धीरे लालटेन लेसि क� टेबुल पर राखि देलथिन्ह तथा किछु काल पर्यन्त स्वामीकेँ म्लान मुखक दिस तकैत छलीह। एहि बीचमे दूनू गोटाक बीचमे मुँहाबज्जी अकारण बन्द भय गेल छलन्हि। कमला देवी सेहो जी खोलि कय वार्तालाप नहि करैत छलीह तथा रमेशबाबू सेहो नहि करैत छलाह।अनुमान नहि कैल जा सकैछ जे कियैक श्रीमतीजीक हृदय विदीर्ण भय गेलन्हि। ओ एक अपराधिनीक सदृश धीरे-धीरे आगू बढ़लीह तथा स्वामीकेँ निकट मे आबि क� स्नेहपूर्ण स्वरमे बजलीह --" ज्वर भय गेल अछि?� रमेशबाबू किछु उत्तर नहि देलथिन्ह। तुराइ ल'क� माथ-पर्यन्त झाँपि करोट बदलि लेलन्हि। श्रीमतीजी किछु कालतक चुपचाप ठाढ़ छलीह तथा पुनः धीरे-धीरे बाहर चल गेलीह।
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जैखन दीनेश बाबू टहलि बुलिक� घर अयलाह, भाउज बहुत दुखित भय कहलथिन्ह -" आहाँ भाइ के ज्वर भय गेलन्हि अछि। कनेक ऊपरे आबि क� बैसू।हम ता तक दूध गर्म कय नेने अबैत छी।�
एकर थोड़े कालकबाद श्रीमती बनर्जी प्रबोध तथा श्रीमतीजीकेँ सोर कयलथिन्ह। आइ स्त्री-स्वाधीनताक विषयपर श्रीमती बनर्जीक अत्यन्त महत्वपूर्ण भाषण हुअ बला अछि। श्रीमती बनर्जी श्रीमतीजीसँ कहने रहथिन्ह जे हम जाइ काल संग कय लेब।
सखी स्वर जानि कय श्रीमतीजी तुरन्त भनसा घरसँ बाहर अयलीह तथा उदास मोन सँ कहलथिन्ह-� आइ हम नहि जा सकब--हुनका ज्वर भय गेलनि अछि।" श्रीमती बनर्जी जोरसँ ठहक्का मारलन्हि तथा श्रीमतीजीकेँ कनेक धक्का द'क� बजलीह--� ज्वर भय गेलन्हि अछि? त� थोड़ेक ज्वर भेला सँ ...." श्रीमतीजीकेँ ई नीक नहि लगलन्हि। ओ बीचहिमे बात कटैत बजलीह -;" सखी, कनेक कम जोड़ सँ, नहि तँ सुनि लेताह। हमरा छोड़ि दिअ, एहन अवस्थामे हम हुनका छोड़ि क� नहि जा सकैत छी। एतवा कहि ओ फेरि चुलही लग चल गेलीह। श्रीमती बनर्जी गम्भीरतापूर्वक बजलीह-� मि. प्रबोधचन्द्र गाड़ी पर बैसल बहुत उत्सुकताक संग आहाँक रास्ता देखि रहल छथि।आहाँक नहि गेला सँ हुनका बड़ दुःख होयतन्हि। आहाँसँ हमरा एहन आशा नहि छल।" श्रीमतीजी धीरे-धीरे परन्तु दृढ़तापूर्वक कहलथिन्ह-" श्रीमती बनर्जी मनुष्यकेँ मोन विचार परिवर्तन कर'मे अधिक विलम्ब नहि लगैत छैक। तथा हम हुनका बाट देख� नहि कहने छलिअन्हि, ओ खुशी रहथि वा नाराज, हुनका सँ हमरा लगाव कोन तरहक?� ई कहि ओ भनसा घर मे चल गेलीह तथा तुरन्त गर्म दूध कटोरामे लय ऊपर चल गेलीह।
***********
श्रीमती बनर्जी विस्मित भय किछु काल पर्यन्त हुनका दिस तकैत छलथिन्ह तथा पुनः धीरे-धीरे ओहिठाम सँ बाहर चल गेलीह।
(६)
क्रमशः
(प्रभात: वर्ष-१, अंक-१०,अक्टूबर-१९३३ई.)
उपर्युक्त कथा जँ आगाँ खण्ड अबितैक तँ उपन्यासो भ� सकैत छलैक, यद्यपि अपूर्ण अछि, आगाँ ६ लिखि क� क्रमशः लिखल अछि, किन्तु अपने आपमे पूर्ण अछि। सभ अंक उपलब्ध नहि रहलाक कारणसँ आगाँक अंकमे कतहु नहि भेटल, लिखल तँ गेले छलैक, कारण ६ लिखल छैक। जे से, अछि धरि ई कथा महत्वपूर्ण। मैथिलानीक नारी स्वतन्त्रताक बात आ ओहि स्वतंत्रतामे पर-पुरुषसँ प्रेम जे बंगाली अछि, ओकर पत्नीक समक्षहि आलिंगनबद्ध होयब, मुदा बिना कोनो दवावक पुनः मैथिलानीक संस्कारकेँ आत्मसात क� लेब,आगाँ बढ़ि, पैर पाछाँ क� लेब नीक जकाँ लेखकक कलम चललनि अछि। जँ आगाँक अंक उपलब्ध रहितैक, तँ ई कथा कोन मोड़ लैत, से कहनाइ कठिन अछि। कथामे शब्दक प्रयोगमे देशज शब्दक बहुतायत अछि, जे आब क्रमशः लुप्त भेल जा रहल अछि।
एहन आनो कथा, निबन्ध, कविता सभ अछि, जे पूर्ण नहि अछि, मुदा जे अछि से कोशिश करब आगाँक सभमे प्रस्तुत करबाक, जाहिमे भवनाथ मिश्रक �कुंडली-चक्र� ( एक अन्य उपन्यासक आधारपर), देवनारायण चौधरीक 'आश्चर्य-विचार', अमरनाथ ठाकुर, सिंहवाड़क 'देहाती अर्थ� आदि जाहिमे हास्यो अछि, व्यंग्य सेहो संगहि तत्कालीन सामाजिक व्यवस्थापर आलेख सेहो। कवितामे ययातिक कथा, किष्किन्धा काण्ड-रामायणक अनुवाद सम्पादक तारानाथ झाक ज्येष्ठ भ्राता चन्द्रनाथ झाक अनेक अंकमे अछि, ओहो यथासाध्य पाठकक लेल प्रस्तुत करबाक प्रयास करब।
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
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