साहित्य एकटा कलात्मक साहित्यिक कृतिक समुच्चय अछि जे मुक्त प्रेरणा सँ कएल गेल प्रयासक देन होएत अछि– आओर एकटा एहन प्रयासक देन होएत अछि जे कलाक लेल जन्म लैत छथि आओर कलाक लेल जीवैत छथि हुनक सुन्दर कृतिमे अन्तरमनक गहराई, स्वाभाविक अभिव्यक्ति, प्रकृत आ क्रमबद्ध नियोजन होएत अछि । साहित्यकेँ सामान्यत: समाजक दर्पण कहल जाइत अछि । कारण साहित्यमे समाजक चिन्तन-मनन, क्रिया-कलाप, आशा-अभिलाषा, खान-पान, भेष-भूषा, विधि-व्यवहार, आचार-विचार, व्यंगय विद्रूप ओ सभ्यता संस्कृति आदिक अभिव्यंजना कएल रहैत अछि वा प्रतिबिम्बित होयत अछि । साहित्य समाजक यथावत रूप स्वरूपायित करैत एकर विसंगति, विद्रूप अभव्यक परिस्कारक मार्ग-दर्शन करैत अछि । "समाजक अवॉंछनिय स्थिति-मनस्थिति पर प्रहार करैत साहित्य एकर संसोधन-संवर्द्धनक लेल समाजकेँ प्रेरित करैत अछि, सक्रिय करैत अछि ओ तेँ हम साहित्यकेँ दर्पण सँ विशिष्ट मानैत छी, प्रभावोत्पादक मानैत छी, मुदा साहित्यक ई रूप स्मपूर्णत: स्वरूपायित होइत अछि वस्तुत: उपन्यासहिमे। साहित्य वैयक्तित्वक दुश्चितन्तन, समाजिक विसंगति ओ मानविय दुर्बलताक उद्घाटन कए अपन विशिष्ट शैली सँ ओही पर प्रहार करैत सुधारक मार्ग दर्शनक सर्वाधिक अवसर सुनियोजित करैत अछि ।"1
उपन्यास पश्चिमी संस्कृतिक देन थीक। मैथिलीमे एकर आगमन बँगलासँ भेल । अंग्रेजीमे एकरा नॉवेल आ मराठीमे कादम्बरी कहल जाइत अछि । एकर उत्पति 'उप' तथा 'नि' पूर्वक 'अस' धातुमे 'धञ' प्रत्यय लगलासँ बनल अछि जकर अर्थ होइत अछि राखब, स्थिर करब, प्रक्षेपण करब । अर्थात् एहन वस्तु वा कृति जकरा देखला वा पढ़ला सँ एहन सन प्रतित होइत अछि जे अमुक वस्तु वा कृति ओकरे थिक । भारतीय साहित्यकार ओ आलोचक लोकनिक दृष्टिमे उपन्यास साहित्यक एकटा महत्वपूर्ण अंग थीक । उपन्यास विधाक बिना साहित्य अपूर्ण मानल जाइत । उपन्यास एकटा एहन नवीन ओ सशक्त विधा अछि जाहि मध्य कथानकक सघटना, चरित्र-निर्माण, देश-काल संयोजन, अभिव्यक्ति, भंगिमा अथवा भाषा-शैली, उद्देश्य वो वातावरणक शिल्पगत संयोजन कएल जाइत अछि जाहिमे मनारंजकता ओ कलात्मक सौंदर्य होएब आवश्यक होएत अछि । उपन्यास साहित्यक एहन विधा जाहिमे कल्पनाक आधार पर मानव जीवनक यथावत चित्रण कथानकक रूपमे रहैत अछि । कथानक तँ तकर मुख्य अंग भेल किन्तु घटनाक संग-संग चरित्र वो वातावरणक सृष्टि सेहो ओहीमे आवश्यक होएत अछि । "कलाक दृष्टिसँ उपन्यासक उपादान कथानक, चरित्र वातारण, कथोपकथन, भाषा-शैली, लेखकक अपन दृष्टिकोण प्रभृति सबहूँ स्वीकार करैत अछि । मैथिलीमे उपन्यास नव वस्तु थीक। वस्तुत, उपन्यास साहित्य पश्चिमसँ आएल अछि ओ एकर विकास भारतीय भाषा सभमे पश्चिमहिक प्रभावसँ भेल अछि ।"2 मैथिली साहित्यमे उपन्यासक बहुत महत्व छैक किएक जखन एकबेर उपन्यासक रचना प्रारम्भ भेल ओ निरंतर नव-नव विषय-वस्तु समाजिक समस्या आ नव विचारधाराक संग चलैत आबि रहल अछि ।
उपन्यास "नैका बनिजारा'क रचनाकार डॉ० ब्रजकिशोर वर्मा 'मणिपद्म' दरभंगा जिलाक बहेड़ाक निवासी छलाह । हिनक जन्म 7 सितम्बर 1918 ई० मे भेल । ई शिक्षा-दिक्षा सँ नहि, अपन अध्यवसायक बलेँ विधालाभ कयलनि, तेँ हिनका स्वयम्भू विद्वान कहब उपयुक्त होयत। दस्तावेज लिखब हिनक कौलिक व्यवसाय छल । ई ताहि सँ ऊपर उठि होमियोपेथी चिकित्साकेँ अपन जीविकाक साधन बनओलनि, आ साहित्यकेँ अपन साधना । "मणिपद्मो हूँ स्वाहा" सँ लेल गेल 'मणिपद्म' उपनाम हिनक बौद्ध तान्त्रिक प्रवृतिक संकेत दैत अछि आ वर्मा प्रगतिशीलताक । ई मैथिली, हिन्दी बंगला आ अंग्रेजी भाषा जनैत छलाह साहित्यक व्यापक अध्ययन कएने छलाह, आ विविध शास्त्र चिखने छलाह । "ई मिथिलाक लोकसाहित्यक नीक-जकाँ अध्ययन कएने छथि आओर एकर कवित्व एवं बाग्भंगीकेँ तेना कए पचाए लेने छथि जे अन्य सकल लेखकक बीच ई अपनाकेँ एकदम भिन्न प्रकारक सिद्ध कए देलनि अछि । हिनक मुह साहित्यक वर्षा करैत अछि आ हिनक लेखनी सिद्धहस्त साहित्यकारक लेखनी जकाँ सरपट दोड़ैत अछि ।"3 पुरात्व, तन्त्रमंत्र, कलाकृति आदि अनेक विषयक अनुरागी छलाह । 19 जून 1986 ई० केँ स्वर्गवासी भेलाह ।
डॉ० ब्रजकिशोर वर्मा 'मणिपद्म' मिथिलाक जीवन संघर्ष, एक स्वर्णिम सांस्कृतिक परम्परा ओ वीरत्वक गोरवमय-उत्कर्ष महागाथा सभक रचना जीवन पर्यन्त करैत रहलाह । हिनक एहि साहित्य-साधनाक अन्यतम उपलब्धि भेल । हिनक प्रकाशित मैथिलीक मौलिक उपन्यास– (1) अनलपथ (सामाजिक) (2) विद्यापति (चरित्रात्मक) (3) लोरिक विजय (लोकमहागाथा पर आधारित) (4) राजा सलहेस (लोकमहागाथा पर आधारित) (5) नैका बनिजारा (लोकमहागाथा पर आधारित) (6) लवहरि कुशहरि (लोकमहागाथा पर आधारित) (7) राय रणपाल (लोकमहागाथा पर आधारित) (8) दुलरा दयाल (लोकमहागाथा पर आधारित) (9) क्रोब्रागर्ल (तांत्रिक) (10) कनकी (आंचलिक) (11) भारतीक बिलाड़ी (12) अर्द्धनारीश्वर (तांत्रिक) (13) नागभूमि (लोकगाथात्मक) (14) फूटपाथ। डॉ० मणिपद्म क ओजस्वी व्यक्तित्व छाप हुनक सम्पूर्ण साहित्य साधना पर नीक जकाँ अपन प्रभाव छोड़ने अछि आ जे प्राय: सभ विधामे एतेकरास सामग्रीसँ मैथिलीक भण्डारकेँ भरने छथि जे हुनका एहि श्रेणीक अद्वितिय साहित्य साधक सिद्ध करैत अछि । हिनका "नैका बनिजारा" उपन्यास पर 1972 ई० मे साहित्य अकादमीक द्वारा पुरस्कृत कएल गेल ।
साहित्यमे लोकरूचिकेँ सभसँ बेसी महत्व देल जायत अछि । लोकरूचि समाजक समान्य चिन्तनक प्रतिफल होयत अछि, संगहि जीवनक सातव्यक संग ओकर अभिन्न होयत छैक । लोकरूचि ध्यान राखि जे साहित्य लिखल जायत अछि ताहिमे युगसत्यक स्वभाविक विवेचनक संग पारम्परिक व्यवहार ओ संस्कृति ओ वर्तमान नवभावधाराक स्वर ध्वनित रहैत अछि । लोक रूचि लोक साहित्यक मात्र प्रतिनिधित्व नहि करैत अछि, अपितु समकालिन समाजिक प्रवृति ओ पारम्परिक सांस्कृतिक स्वभाविक चित्र ओहीमे उद्घाटित रहैत अछि । मणिपदम् "नैका बनिजारा" एहने समसामयिक भावधाराक संग लोक चेतनाक उद्घाटक ओ सांस्कृतिक स्वरूपक सम्मिलित रूप अछि । "नैका बनिजारा" मणिपद्म नीक सुप्रसिद्ध उपन्यास लोकत्व पर आधारित एवं महाकाव्यक सदृश प्रमाणिक उपन्यास अछि । एकर मुख्य पात्र अछि– लाजी, रमकी, तिलेश्वरी, राङगी मालिन, दस्युराज, धाङड़, उम्फा चण्डाल, काशीक, कुम्भा डोम, रानी फुलेश्वरी, तिलंगा बाछा आ गुल्ली गाय जकरा कपिला कामधेनु सेहो कहल जायत अछि । एहि उपन्यासमे अजन्ताक गुफा संख्या सत्रहमे एकटा विश्वमोहक चित्र अंकित अछि। एहि रचनाकालमे स्त्री, शूद्र, हवान आ गायकेँ 'अमृत'क संज्ञा देल जाइत छलै गुलामक स्थिति सोचनिय छल । ओकरा सभकेँ पशुक समान खरीदल आ बेचल जाइत छलै । एहि उपन्यासमे तीन तरहक कथाक समायोजन भेल अछि– (1) हिमालय अंचलक कनकमंजरी (2) सागरक बनिजारा रत्नसेन आ (3) महाभिक्षु देवपद्मक कथा । लेखक बड़ कुशलताक संग एहि तीनू कथाकेँ मूलकथासँ जोड़ि तात्कालिन समाजक सजीव चित्र प्रस्तुत कएलनि अछि । उत्तमक माय वृद्ध रमकी उपदेशक क्रममे बाजली जे– "संगति, सहानुभूति, अध्ययन, मनन आ भ्रमण यैह पांचोटा ज्ञान संग्रहक माध्यम अछि ।"4 यात्रा व्यापारक क्रममे महासार्थ आदित्य देव आश्वारोहण, अस्त्र शस्त्र चालन आ सैन्य संचालनक शिक्षा दैत रहलाह । संगहि महावाणिक नैका सदिखन याद दिअबैत छल जे– "संसारमे मनुक्ख लेल महाधन छैक ज्ञान, महासम्पदा छैक उत्तम स्वास्थ, महाशक्ति छैक श्रेष्ठ चरित्र, महाविभूति छैक विनय आ महाआन्नद छैक दिव्य-संगति । ई पॉंचो ऐश्वर्यक संग्रह जिनका भए जाइत अछि तनिके जीवन सफल मानल जाइत अछि ।"5
नैका बनिजारा उपन्यासमे एक तरफ नैकाक विशाल व्यापार यात्राक वर्णन अछि तऽ दोसर तरफ नैकाक सती-साध्वी पत्नी फूलेश्वरीक षड्यन्त्र रचि राजभवनसँ निकालि देल जाइत अछि । बौद्धकालिन मिथिलामे राजा व्यापारी होइत छलाह । नैका सेहो एहने व्यापारी छलाह जे अपन दलक सङ सबा लाख बड़दक सवारी पर दूर-दूर धरि बारह बरख तक घूमि-घूमिक व्यापार करैत छल आ अपार वैभवक संग वापस घुरैत छल । नैका विवाहक बारहे वर्षक उमरमे बापक सङ भ' व्यापार कऽर' चल गेल छलै । व्यापारक बाट आ महाहाट आर्यावर्तक प्रसिद्ध व्यापारिक महानगरकेँ स्पर्श करैत चलैत छल । ओहि समयक बौद्ध भिक्षु-लोकनि अभियानी महावैद्य, रसायनी, रत्नापारखी, ज्योतिर्विद, यान्त्रिक, वास्तुविद्य, तान्त्रिक, मूर्त्तिकार, चित्रकार, वादक, कवि, दार्शनिक, साहित्यकार आओर साधक होइत छलाह । मिथिलाक वीर तथा साहसी सार्थवाहक कथा देश-देशान्तरमे प्रसिद्ध छल ।
नैका बनिजारा उपन्यासक प्रकाशन मिथिला सांस्कृतिक परिषद् कलकत्ता द्वारा भेल छल । एहिमे वीर ऐतिहासिक कथाक वर्णन अछि । नैकाक विवाह चम्पा नरेशक एक मात्र सन्तान फुलेश्वरीसँ भेल छल । नैकाक जेठ बहिन तुलेश्वरीक विवाह द्रोणनगर राजा द्रोणेश्वरसँ भेल छल । ओ सासुरमे छली । आ तिलेश्वरी जे नैकासँ जेठ रहए ओकर विवाह भारी धाकरक बेटासँ भेल छलै । एक राति तिलेश्वरीक घरवालासँ कोनो बातपर झगड़ा भए गेलए ओइ दिनसँ नैहर अपन कमलपुरमे रहैत छै । आ घरोवला दुरागमनक नाम नहि लैत छै। नैकाक दुरागमनक दिन लऽ कऽ अछवा नौवा आ उत्तम गेलए । राजा लोमपाद दिन मानि दुरागमन क' दैलकै । दुरागमन कए नैका रानी फुलेश्वरीक राजक कार्य-भार सौंपि देलकै आ फुलेश्वरीक' देखभालमे उत्तमक माय, लाजी, एकमीकेँ राखि अपने बापक संग व्यापार पर चलि गेलै । आब ओ अपार सम्पतिक सङ चौबिस वरखक जवान भ' क वापस औतए । व्यापार यात्राक पहिल पड़ाव सात कोसक दूरीपर भेलै । रातिमे जखन थाकल सब सूति रहलै । रानी फुलेश्वरीक सङ्गे जे बाछा तिलंगा आ भूल्ली गाय दुरागमनमे सङ्गे आयल छलै ओ तिलंगा गारामे सवा पसेरीक सोनाक घंटी बान्हल छलै जे कोनो संकटक समय फुलेश्वरीक सहोदर भायक समान रक्षा करैत छलै। आ भुल्ली गाय सब दिन दूध दैत रहल छलै । दुरागमन रातिमे फुलेश्वरी ओहि गायक दूधसँ ऐश्वर्यमयी खीर नैकाकेँ खुओलनि जे यमुना तटपर महारासक उपरान्त माधवी निकुञ्जमे राधा माधवकेँ खुऔने रहथिन । पहिल पड़ावक निशीभाग रातिमे हिमालय पहाड़पर एकटा 'अग्निदूत' नामक चिड़ै जकरा लोक विध-विधिन सेहो कहैत छलै आपसमे दुनू बजैत छल । नैका पक्षी भाषाक विशेषज्ञ छल जे केओ अपना पत्नीक सङ करत आ ओ जँ गर्भ धारण करत त' ओकर सन्तान दिर्घायु, प्रफुल्ल स्वास्थ, अक्षय पराक्रम आ शीलक भागी होयत। नैका गुप्त रूपसँ तिलंगापर सवार भ' ओही राति समयपर पत्नीक संङ सम्पर्क कए आ एकटा महायन्त्र रानीक बॉंहिपर बान्हि देलक जे यंत्र महायान्त्रिकक देल सुरक्षा मन्त्र छल आ फुलेश्वरी सँ कहलनि जे अहाँ सन्तानोकेँ ई यन्त्र बान्हि देबए त' ओकरो ई रक्षा करतए। आ ओ पुन: बाघनपर सवार भ' अपना पड़ाव जगह पर राताराती चलि गेल।
एम्हर तिलेश्वरी रानी फुलेश्वरी पर अनेक प्रकारसँ मालिन राङगीक सहयोगसँ उछन्नर कऽर' लागल। त्यभिचार नामपर औखरि समाठसँ धान कुटबौलक। गरम लौहाक पिंड हाथपर रखौलक। रानी सभमे उतरला तखन दस्यु-राज धवलसँ योजना बना राजभवनसँ निकालि दासी निवासमे जगह देलक। फुलेश्वरी गर्भवती भ' मास पूरलापर पुत्र रत्न पञ्चकौड़ीक जन्म देलक। आ नैकाक बान्हल यन्त्र खोलि बच्चाक बॉंहिपर बान्हि देलक। चमैन बच्चाक नारि-पुरैन काटि रानीक देखा ओही बच्चाक रमकी मैयाकेँ सौंपि देलक। वृद्धा रमकी जे नैकाक बाल सङ्गीक माय छली ओही बच्चाक ल' राजू कुम्हारक आवासमे राखि देलक जे नि:सन्तान छली। नैका व्यापार हाट होएत राजा द्रोणेश्वरक नगरमे पहुँचल। राजा द्रोणेश्वरक रानी तुलेश्वरी नैकाक जेठ बहिन छल। ओकरा एखन तक कोनां बच्चा नहि भेल छलै। उम्फा चण्डाल आ काशीक कुम्भा डोम नारी-सुन्दरी सबहक केन-दोन करैत छल। फुलेश्वरीक अपहरण करा तिलेसरी उम्फा चण्डालक माध्यमसँ कुम्भा डोमक हाथे बेचि देलक। राजा द्रोणेश्वर ओही दलमेसँ शीलवान सबक खरीद लए छल ओ जे घमिष्ठ रहैत छल तकरा अपन गृह कार्यक लेल राखि लैत छल। ओ रानी फुलेश्वरीक कुम्भा डोमसँ खरीद घरेलू काजक लेल राखि लेलक। एहि क्रममे नै रानी तुलेश्वरीक संतान भेल आ रानी फुलेश्वरीक नैकासँ मिलन भेल। तखन तुलेश्वरी अपन भाई नैकासँ परिचित भेली। भौजी फुलेश्वरीक दशापर बहुत अपसोच आ पाश्चाताप केलनि। नैका जखन व्यापारक पत्नी फुलेश्वरी सङ ल' वापस आयल त' महापंचैतीक आयोजन भेल। ताबत पुत्र पञ्चकौड़ी बारह वर्षक भ' गेल छल सँ मिलन भेलए। तिलेसरी आ मालिन रॉंगीक पंच फॉंसी देलक।
नैका बनिजारा मैथिलीक ई महान लोकमहाकाव्य एक दिस नैकाक व्यापारिक अभियानक गाथा अछि तँ दोसर दिस हुनका अनुपस्थितिमे हुनक साध्वी पत्नी फुलेश्वरीक, पारिवारिक षड्यन्त्र द्वारा गृहसँ निष्कासित भऽ कऽ नारीक व्यापारी कुम्भा डोमक हाथेँ बेचल गेलहु पर ओकरा महादलमे अपन सतीत्वक रक्षा करैत, अपना पति नैकासँ पुर्नमिलनक रोमांचक गाथा अछि। ओई कालमे स्त्री, शूद्र, स्वान आ गायकेँ 'अमृत'क संज्ञा देल गेल छल। नारी मात्र भोग्या बुझल जाइत छली। हुनक केन-दीन अबाध गतियेँ चलैत छल। गुलामक स्थिति दयनीय छल आ ओ सभ पशु जकाँ कीनल आ बेचल जाइत छल। चाण्डाल, डोम आ धांगड़क वर्णन सेहो एहिमे विशद रूपेँ आएल अछि। हत्याक काज चाण्डालसँ कराओल जाइत छल। काशीक कुम्भा डोम नारिक व्यापारी छल आ सबा लाख सुन्दरीक महादल लऽ कऽ व्यापार करैत छल। धांगड़ सभ प्रचण्ड योद्धा होइत छल आ नागमणि धांगड़ अपना कालक प्रसिद्ध दस्युराज छल जकरा डरेँ ताम्रलिपिसँ पाटलिपुत्र धरिक मार्ग थरथर कॉंपैत छलइ।
बौद्ध भिक्खु लोकनि अभियानी, महावैद्य, रसायनी, रत्नपारखी, ज्योतिर्विद, यान्त्रिक, वास्तुविध, तान्त्रिक, मूर्तिकार, चित्रकार, वादक, कवि, दार्शनिक, साहित्यकार आ साधक होइत छलाह। ई लोकनि व्यापारिक महादलक संग देश-देशान्तर जाइत छलाह आ सुगतक आलोककेँ लोक सुलभ करैत छलाह। मिथिलाक वीर तथा साहसी सार्थवाद सभहिक ख्याति देश-देशान्तरमे प्रसिद्ध छल। सागर-सार्थवाह आ थल-सार्थवाह फराक-फराक होइत छल। कश्मीरसँ गन्धार धरि मिथिलासँ सोझे एक सड़क आबैत छल जकरा मिथिलासँ उज्जैन, काशी, चम्पा, ताम्रलिपि, कपिलवस्तु, इन्द्रप्रस्थ, शाकल, कुसीबती आ पाटलीपुत्रक राजमार्गसँ सम्बन्ध छलइ। गोधन लोकजीवनक बड़का आधार छल आ कोनो-कोनो गाय-बाछाक चेतना अधिक विकसित रहैत छलैक। मैथिलीक ई महान लोकमहाकाव्य खोज, शोध आ उत्खननक अजस्त्र सम्भावना उपस्थित करैत अछि।
"लेखक एहि रचनाक प्रसंग ओकर मुखपात' मे अपनहि कहने छथि जे 'नेका बनिजारा' एखन धरि अलिखित एकटा पैघ आ सम्मोहक महाकाव्य अछि। एकरा मैथिली लोक-कण्ठ युग-युगसँ जोगौने चल आबि रहल अछि। ई मिथिलाक परम्परागत स्वर्ण-संस्कृतिक महान सम्पादामेसँ अछि जाहिमे तात्कालिन मिथिलाक इतिहास, संस्कृति, समाजिक स्थिति, व्यापारिक क्रम आ लोक-भावना मणि मुक्ता जकाँ छविमय भए उठल अछि। बोद्धकालीन समाज विशेषत: मिथिलाक एहन कलात्मक अभिव्यक्ति देमएवला आ लोक-जीवनकेँ जगजगार करएवला साहित्य भरिसक्के आन कोनो भाषामे उपलब्ध अछि।"6
डॉ० वीणा कर्ण लिखने छथि– 'नैका बनिजारा' जाहि उत्कृष्ट उपन्यास पर मणिपद्मकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार सँ पुरस्कृत कएल गैलेन, एहि तांत्रिक सूक्ष्मताक अत्यन्त तीव्र आवेगकेँ अपनामे समेटने अछि। एहि उपन्यासक पूज्यवाद देवपद्म, नैका ओ हुनक व्यापारिक दलमे चौदहटा ज्योतिर्मय श्रमण आदिक सूक्ष्मतर तांत्रिक प्रवृति सँ एकर पाठकक अवश्य परिचित होएता। देवपद्मक मानविय चेतनाकेँ जाग्रत करैत रहबाक लेल सम्पूर्ण क्रियाकलाप देवयान तंत्रक विशद निर्देश दैत अछि।"7
निष्कर्षत:– लोकगाथाक आधारपर लिखल गेल ई उपन्यास अनेक दृष्टिएँ आकर्षक अछि। उपन्यासक प्रधान नायक नैका बनिजाराक जीवन-यात्रा अथवा व्यापारिक यात्रा, हुनक पत्नी फुलेश्वरीक संघर्ष ओ चरित्र आ तहिना तिलंगा आ कामधेनुक अलौकिक क्रिया-कलाप एहि उपन्यासक आकर्षक बिन्दु अछि। तहिना जँ एक दिस जीवनक विविध पात्र ओ घटना लोकमानव चित्र उपस्थित करैत अछि तँ दोसर दिस परिवारिक षड्यन्त्र ओ उत्पीड़नक सजीव चित्रण अंकन सेहो एहिमे अछि।
सन्दर्भ सूची :–
1) मिश्र विश्वेश्वर 1996, मैथिली गद्य साहित्य, मैथिली विभाग, पटना विश्वविद्यालय पृष्ठ संख्या– 86
2) पाठक, अमरेश, 2007, मैथिली उपन्यासक आलोचनात्मक अध्ययन, आलोक प्रकाशन, पटना, भूमिका
3) मिश्र, जयकांत, 1998, मैथिली साहित्यक इतिहास, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली पृष्ठ संख्या– 232
4) वर्मा, ब्रजकिशोर, 1972, नैका बनिजारा, पृष्ठ संख्या– 12
5) तत्रैव, पृष्ठ संख्या– 26
6) हंसराज, 1996, भारतीय साहित्यक निर्माता मणिपद्म, साहितय अकादेमी, नई दिल्ली पृष्ठ संख्या– 31
7) झा, गोविन्द, 1992, शिखरणी, चेतना समिति, पटना पृष्ठ संख्या– 7
-अमरेश ठाकुर, शोधार्थी, विश्वविद्यालय मैथिली विभाग, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, कामेश्वरनगर, दरभंगा