२.१४. डॉ अजय कुमार झा- पोथी समीक्षा : “ आचार्य चाणक्य” (मैथिली खंडकाव्य)
डॉ अजय कुमार झा
पोथी समीक्षा : “ आचार्य चाणक्य” (मैथिली खंडकाव्य)
लेखक: राजकिशोर मिश्र
प्रकाशक: नवारंभ प्रकाशन, मधुबनी
समीक्षक: डॉ अजय कुमार झा
श्री राजकिशोर मिश्र द्वारा लिखित खंडकाव्य “आचार्य चाणक्य” मैथिली साहित्यक एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आ प्रभावशाली कृति अछि, जे इतिहास, काव्य-सौंदर्य आ नीति-दर्शनक अद्भुत संगम प्रस्तुत करैत अछि। नवारंभ प्रकाशन, मधुबनी द्वारा प्रकाशित ई खंडकाव्य भारतीय इतिहासक महान मनीषी चाणक्य केर जीवन, हुनकर संकल्प, संघर्ष आ राष्ट्रनिर्माणक दृष्टिकेँ काव्यात्मक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। ई कृति केवल ऐतिहासिक आख्यान नहि, बल्कि एक वैचारिक आ नैतिक मार्गदर्शिकाक रूपमे सेहो पाठक सभक समक्ष अबैत अछि।
एहि खंडकाव्यक मूल कथानक चंद्रगुप्त मौर्य केर उत्कर्ष आ धनानंदक पतन पर केन्द्रित अछि। लेखक अत्यन्त सजीव आ प्रभावी शैलीमे ई दर्शेलनि अछि जे कोना चाणक्य मगधमे अपन अपमानकेँ व्यक्तिगत प्रतिशोध तक सीमित नहि राखि, ओकरा एक व्यापक राष्ट्रीय उद्देश्यमे रूपांतरित कएलनि। हुनक दूरदर्शिता, रणनीतिक कुशलता आ अडिग संकल्प एक साधारण बालक चंद्रगुप्तकेँ प्रशिक्षित कए ओकरा मगधक सिंहासन तक पहुँचबामे सहायक भेल। ई प्रक्रिया केवल राजनीतिक परिवर्तन नहि, बल्कि एक युगांतरकारी घटना बनि गेल, जकर चित्रण लेखक अत्यन्त सशक्त ढंगसँ केलनि अछि।
खंडकाव्य होएबाक कारण एहि कृतिक संरचना संक्षिप्त होइतहुँ अत्यन्त प्रभावपूर्ण अछि। भाषा सरल, सरस आ लयात्मक अछि, जे मैथिली भाषाक स्वाभाविक मधुरताकेँ पूर्ण रूपेण व्यक्त करैत अछि। काव्यमे प्रयुक्त बिंब, प्रतीक आ उपमान पाठकक मनमे स्पष्ट दृश्य उत्पन्न करैत अछि। घटनाक प्रवाह स्वाभाविक आ रोचक अछि, जाहिसँ पाठक आरम्भसँ अन्त धरि जुड़ल रहैत अछि। संवादक सजीवता आ भावक गहराइ एहि काव्यकेँ मात्र पठनीय नहि, बल्कि अनुभूतिपरक सेहो बनबैत अछि।
एहि कृतिक एक विशेषता ई अछि जे एहिमे चाणक्य नीति केर चयनित अंश सेहो समाविष्ट कएल गेल अछि। ई अंश काव्यक वैचारिक आधारकेँ सुदृढ़ करैत अछि आ एहि कृतिकेँ मात्र ऐतिहासिक वर्णन तक सीमित नहि रहए दैत अछि। एहि नीति-सूत्रक माध्यमसँ लेखक ई स्पष्ट करैत छथि जे एक आदर्श राजाकेँ कोना शासन करबाक चाही, राजवंशकेँ कोन-कोन नैतिक मूल्यक पालन करबाक चाही, आ समाजक सामान्य जनकेँ अपन विचार, वाणी आ व्यवहारमे संतुलन केना बनाकए राखबाक चाही। एहि तरहे ई कृति अतीतक घटनासँ वर्तमान समाज लेल सेहो उपयोगी दिशा-निर्देश प्रस्तुत करैत अछि।
राजकिशोर मिश्रक लेखकीय गुण एहि कृतिमे अत्यन्त प्रभावशाली रूपमे प्रकट होइत अछि। ओ मात्र कथाकार नहि, बल्कि एक संवेदनशील चिंतक आ कुशल शिल्पकार सेहो छथि। ओ इतिहासकेँ मात्र तथ्यक रूपमे प्रस्तुत नहि कएलनि अछि, बल्कि ओहिमे भावनात्मक आ वैचारिक गहराई सेहो जोड़लनि अछि। चाणक्यक व्यक्तित्वक हुनक चित्रण बहुआयामी अछि—जहाँ ओ एक दिस कठोर, दृढ़ आ रणनीतिकार छथि, दोसर दिस ओ राष्ट्रहित लेल समर्पित, तपस्वी आ दूरदर्शी चिंतक सेहो छथि। पात्र सभक मनोवैज्ञानिक पक्षकेँ बुझबाक आ ओकरा काव्यात्मक रूपमे प्रस्तुत करबाक हुनकर क्षमता अत्यन्त प्रशंसनीय अछि।
लेखकक भाषा पर पकड़ सेहो अत्यन्त सुदृढ़ अछि। मैथिली भाषाक प्रति हुनकर प्रेम आ समर्पण एहि कृतिमे स्पष्ट झलकैत अछि। ओ भाषाकेँ केवल संप्रेषणक माध्यम नहि बनौलनि अछि, बल्कि ओकरा सौंदर्य आ भावप्रवणताक प्रभावी साधन सेहो बनौलनि अछि। हुनकर शब्द-चयन, लय आ शैली काव्यकेँ एक विशिष्ट पहिचान प्रदान करैत अछि। ऐतिहासिक तथ्य आ काव्यात्मक कल्पनाक बीच संतुलन बनाक’ रखबाक हुनकर क्षमता एहि कृतिकेँ विश्वसनीय आ आकर्षक बनबैत अछि।
राजकिशोर मिश्रक जीवन-परिचय सेहो एहि कृतिकेँ बुझबाक लेल महत्वपूर्ण अछि। ओ भारत संचार निगम लिमिटेड मे मुख्य महाप्रबंधकक पद पर कार्यरत रहि चुकल छथि। सेवामुक्तिक उपरांत ओ स्वयंकेँ पूर्ण रूपेण साहित्य-सृजन मे समर्पित कएने छथि। मैथिली भाषामे हुनकर एखन धरि कुल एक्कैस गोट कृति प्रकाशित भ’ चुकल अछि, जे हुनकर निरंतर सृजनशीलता आ साहित्यिक प्रतिबद्धताक प्रमाण थिक। हुनक प्रशासनिक अनुभव आ जीवन-दृष्टि सेहो एहि काव्यमे परोक्ष रूपेण परिलक्षित होइत अछि, जाहिसँ कृतिमे व्यावहारिकता आ गहराई दुनूक समावेश होइत अछि।
ओना, किछु स्थान पर यदि घटनाक विस्तार आ पात्रक मनोवैज्ञानिक पक्ष पर आरो प्रकाश देल जाइत, तँ काव्यक प्रभावशीलता आरो बढ़ि सकैत छल। तथापि, खंडकाव्यक संक्षिप्तता एकर शक्ति अछि, जे एहि कृतिकेँ सहज, प्रवाहपूर्ण आ प्रभावशाली बनबैत अछि।
समग्र रुपमे, “आचार्य चाणक्य” एक सशक्त, प्रेरणादायक आ ज्ञानवर्धक मैथिली खंडकाव्य थिक, जे इतिहास, काव्य आ नीति-दर्शनक सुंदर संगम प्रस्तुत करैत अछि। ई कृति मात्र मैथिली साहित्य लेल महत्वपूर्ण नहि, बल्कि ओहि सभ पाठक लेल सेहो उपयोगी अछि जे चाणक्य केर विचार, हुनकर जीवन-संघर्ष आ भारतीय इतिहासक गहराइकेँ बूझय चाहैत छथि।
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