मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-१)
सन्दर्भ- परमेश्वर कापड़ि- नाटक 'रेङ–रेङ'
विस्तृत साहित्यिक समीक्षा
[भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र • पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त • गंगेश उपाध्यायक नव्य-न्याय • विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क]
१. साहित्यकार परमेश्वर कापड़िक जीवन-परिचय
१.१ जीवन-वृत्त
परमेश्वर कापड़ि - नेपालक जनकपुरधामसँ सम्बद्ध एक बहुविधावादी, प्रयोगशील एवं सामाजिक-सांस्कृतिक प्रतिबद्धतासँ ओतप्रोत मैथिली साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं मिथिला-मैथिली अभियानी छथि। ओ राराब (त्रिभुवन विश्वविद्यालय) क्याम्पस जनकपुरधामक मैथिली विभागक पूर्व विभागाध्यक्ष रहल छथि। त्रिभुवन विश्वविद्यालयक केन्द्रीय मैथिली विभागक सेहो पूर्व विभागाध्यक्षक रूपमे हुनकर सेवा मैथिली भाषाशिक्षण, साहित्यिक अनुसन्धान एवं लोकसाहित्य-सञ्चयनमे अतुलनीय योगदान देलक अछि।
हुनकर व्यक्तित्वक विशेषता ई अछि जे ओ एकधारे- साहित्यकार, लोकसाहित्यक खाँटी अध्येता, मिथिला राज्य संघर्ष समितिक संयोजक, तथा मैथिली विकास कोषक पूर्व सदस्य-सचिव रहल छथि। समकालीन मैथिली साहित्यमे हुनकर स्थान प्रयोगधर्मी एवं यथार्थवादी नाटककारक रूपमे विशेष उल्लेखनीय अछि। हुनकर साहित्यिक उत्पादनमे लोककथा, नाटक, निबन्ध, आलोचनात्मक लेखन, सामाजिक टिप्पणी एवं सांस्कृतिक विमर्श सम्मिलित अछि।
१.२ साहित्यिक विधा एवं प्रकाशित कृति
परमेश्वर कापड़िक साहित्यिक कर्म बहुविध अछि। हुनकर ज्ञात रचनामे सम्मिलित अछि:
(क) नाटक: 'रेङ–रेङ' - समकालीन राजनीतिक-सामाजिक व्यंग्य नाटक (नेपाल, जनकपुरधाम, अवन्तिका मैथिली नाट्य संस्था) (ख) लोककथा (ग) सांस्कृतिक निबन्ध (घ) सामाजिक टिप्पणी (ङ) गीत-फकड़ा।
ऐ विविधतासँ स्पष्ट होइछ जे कापड़ि केवल विद्वान नहि, बरु एक सृजनशील, बहुआयामी सांस्कृतिक कर्मी थिकाह। हुनकर मूल चिन्ता लोकभाषा, लोकसमाज एवं मिथिलाक सांस्कृतिक अस्मिता अछि।
२. नाटक 'रेङ–रेङ' - कथावस्तु एवं रंगशिल्प
२.१ नाटकक परिचय
'रेङ–रेङ' परमेश्वर कापड़ि द्वारा रचित मैथिली नाटक थिक जे अवन्तिका मैथिली नाट्य संस्थाक रिहर्सल स्थानपर केन्द्रित अछि। नाटकक शीर्षक 'रेङ–रेङ' एक ध्वन्यात्मक प्रतीक थिक - जे रङ्गमञ्चक रङ्गभेद, जीवनक रङ्गपरिवर्तन एवं सामाजिक-राजनीतिक चरित्रक बहुस्तरीय रूपांकन करैछ।
नाटकक मुख्य पात्रसब: श्रीधर (निर्देशक), अनवर, हमाल, अक्षरा, छौंड़ा, लक्ष्मी/ऐश्वर्या, विष्णु/विवेक, बम बहादुर, नूनूकाका। इएह पात्रमण्डल नाटकक सामाजिक वर्ग-संरचनाक प्रतिनिधित्व करैछ - कलाकार, श्रमिक, दैवी शक्ति, पुलिस, एवं लोकनाट्यक आत्मा।
२.२ कथावस्तुक संक्षेप
नाटकक आरम्भ होइछ एक पुरान जिमिदारी भवनमे जतए अवन्तिका नाट्य संस्था रिहर्सल कऽ रहल अछि। श्रीधर एक कविता पढ़ैत तन्मय अछि - एक आह्वानगीत जाहिमे रङ्गमञ्चपर सक्रिय होयबाक, समाजक पुनर्निर्माणक आकांक्षा व्यक्त कयल गेल अछि।
तत्पश्चात नाटककेर मध्यमे लक्ष्मी (धन-देवी) प्रकट होइ छथि। तथापि ई प्रकटीकरण कोनो दैवी वरदान नहि, बरु एक कटु सत्यक उद्घाटन थिक - जे लक्ष्मी समाजमे वास्तवमे कतए अछि, आ भ्रष्टाचारी शासन-व्यवस्था ओकरा कोना हरण करैछ। गरीबी सभ पापक जड़ि थिक - इएह नाटकक केन्द्रीय सत्य थिक।
विष्णु (देवता) प्रकट होइछ - परन्तु ओ सेहो लक्ष्मीक सोना बाँटि नहि पबैछ। बम बहादुर (पुलिस) प्रकट होइछ आ कलाकारगणकेँ गिरफ्तार करैछ। अन्तमे नूनूकाका (लोकधर्मी प्रतीक) प्रकट होइछ जे लोकनाट्यक माध्यमसँ सत्यक उद्घाटन करैछ। नाटकक समाप्ति विवाह-संस्कारक दृश्यसँ होइछ - जे नवसृजनक, नवजीवनक प्रतीक थिक।
२.३ रङ्गशिल्प एवं नाट्यतकनीक
'रेङ–रेङ' एपिक थिएटरक शैलीमे रचित अछि। स्वर-भङ्गिमामे परिवर्तन, तन्मय-भावसँ राजनीतिक नारा-लगावटि, नृत्य एवं गायन - इएह ब्रेख्टियन 'वर्फ्रेम्डुङ्स्इफेक्ट' (अपरिचयीकरण) तकनीकक निकट अछि। नाटकमे पाँच प्रमुख नाट्यतकनीक व्यवहृत अछि:
(१) स्वर-भङ्गिमा परिवर्तन (Voice Modulation as Alienation Effect)
(२) रङ्ग-तरङ्ग - दृश्य-परिवर्तनक रूपकात्मक प्रयोग
(३) एपिसोडिक संरचना - खण्डित दृश्यविधि
(४) लय-परिवर्तन - लोकगीत, हुमरी, नाराशैली
(५) मेटाथिएटर - नाटकक भीतर नाटकक आत्म-सन्दर्भिता।
३. चतुर्धा विश्लेषण-पद्धति
विदेह समानान्तर साहित्य इतिहास फ्रेमवर्कक अनुसार, समीक्षाक चार स्तम्भ अछि: (अ) भारतीय रस-ध्वनि-वक्रोक्ति सौन्दर्यशास्त्र, (आ) पाश्चात्य आलोचना सिद्धान्त, (इ) नव्य-न्याय (गंगेश उपाध्याय), (ई) विदेह समानान्तर इतिहास फ्रेमवर्क।