विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-३

कल्पना झा · 2026-06-01 · अंक 443 · पृष्ठ 27–30

माँ मैथीलीक सुच्चा सेवक/उन्नायक 'विद्यालंकार'
"बहुतोकेँ इएह धारणा छनि जे, जे केओ कलम उठाए दस-पाँच पोथी खड़रलनि नहि, अपन ओजस्वी वक्तव्य आ सुक्खा वक्तव्य सँ मैथिलीक पत्र-पत्रिका भरलनि नहि, मंच पर कनफोड़ गर्जन-तर्जन कएलनि नहि, जय मिथिला जय मैथिलीक नारा लगबैत सड़क पर उतरलाह नहि, तनिका मैथिलीक सेवक/उन्नायक कोना कहबनि? सत्ते विद्यालंकार ई सभ कर्म नहि कएलनि। तथापि मैथिलीक हेतु जे ओ कएलनि, से आन जानओ वा नहि, हम तकर प्रत्यक्ष द्रष्टा छी।"
ई लिखित वक्तव्य छनि पण्डित गोविन्द झा जीक। ("अनुचिन्तन" पोथी मे संकलित लेख "लेल महातरु तर बिसराम" सँ उद्धृत)।
श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' जीक मैथिली साहित्य मे योगदान संबंधित तथ्यपरक जनतब सभ जुटेबाक क्रम मे कइअक-टा गणमान्य सँ गप्प करैत रहलहुँ अछि एमहर दू मास सँ हम। किछु गणमान्यक मुहेँ ठीके एहन सुनबा लेल भेटल,"विद्यालंकार जी हिन्दी दैनिक 'आर्यावर्त'क सम्पादक छलाह आ बिहारक प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार ओ शिक्षाविद छलाह। हिन्दीक लेल समर्पित रहलनि जीवन हुनकर। मैथिली लेल तँ किछु तेहन नहि केलनि।" संयोगवश किछु एहनो लोक सभ सँ सम्पर्क भेल, जे विद्यालंकार जीक सान्निध्य मे समय बिता चुकल छथि, हुनका संग काज कऽ चुकल छथि, माने प्रत्यक्षदर्शी रहि चुकल छथि विद्यालंकार जीक मैथिली भाषा-प्रेमक। आ मैथिली-भाषा प्रेमक अधीन भऽ कऽ कएल गेल हुनकर अथक प्रयास सभक। हुनकहि अथक प्रयासक परिणाम अछि मैथिली साहित्य केँ समृद्ध कएनिहार चारि प्रमुख संस्था मे सँ तीन संस्था। मैथिली भाषा ओ साहित्य सँ संबंधित चारि प्रमुख संस्था अछि-
1. न्यूज़ पेपर्स एण्ड पब्लिकेशन्स, पटना (जतए सँ मिथिला मिहिर छपैत छलए)
2. मैथिली अकादमी, पटना (जे मिथिला मिहिरक मंच पर पल्लवित पुष्पित भेल)
3. चेतना समिति, पटना (जे अनेक तरहेँ चेतना जगबैत रहल)
4. साहित्य अकादमी, दिल्ली (जे प्रकाशन, पुरस्कार, आदि द्वारा मैथिलीक लेखक लोकनि मे ऊर्जा भरि रहल अछि)
जाहि मे सँ साहित्य अकादमी, दिल्ली केँ छोड़ि सभटा विद्यालंकार जी अपन खून-पसीना सँ सिंचित कऽ ठाढ़ कएने छलाह। विद्यालंकार जीक योगदानहिक प्रतिफल अछि न्यूज़ पेपर्स एण्ड पब्लिकेशन्स, मैथिली अकादमी आ चेतना समिति। संस्था सभक गठन, जमीन आवंटनक अतिरिक्त ओहि संस्था सभ मे सुचारू रूप सँ मैथिली भाषा ओ साहित्य-संबंधी चर्चा-परिचर्चा, शोध-कार्य इत्यादि होइत रहए ताहि लेल जे तत्परता विद्यालंकार जी देखओलनि, से बादक पदाधिकारी मे सँ विरले केओ देखा सकलाह। मातृभाषा मैथिलीक प्रचार-प्रसारक संग ओकर स्थिति मजगूत करबा लेल यथासाध्य सभ यत्न करैत रहलाह आजीवन। जा धरि विद्यालंकार मैथिली अकादमीक अध्यक्ष रहलाह, हुनक प्रेरणा, प्रोत्साहन आ अकादमीक प्रश्रय पाबि साहित्यकार लोकनिक लेखनी घोड़ा जकाँ दौड़ैत रहल आ मैथिली साहित्यक भण्डार भरैत रहल। जैं एहन समर्पण रहलनि अपन मातृभाषा लेल, तैं ने पण्डित गोविन्द झा लिखने छथि,"विद्यालंकारक योगदान मोन पड़ैत अछि, तँ मस्तक अनायासहि श्रद्धावनत भए जाइत अछि।"
दुःखक गप्प अछि जे 17 मइ 1976 मे स्थापित मैथिली अकादमी, जे मैथिली भाषा, साहित्य आ शोधक केन्द्र छलए, से सरकारी उदासीनता, प्रशासनिक लापरवाही, स्टाफक कमीक कारणेँ तत्काल बन्द कऽ देल गेल अछि। आशा करैत छी शीघ्रातिशीघ्र मैथिली अकादमी सुचारू रूप सँ क्रियाशील होएत आ विद्यालंकार जीक आत्मा प्रफुल्लित हेतनि।
ओना विद्यालंकारक मैथिली-सेवा मे सभ सँ मूल्यवान अछि साप्ताहिक मिथिला-मिहिरक पटना सँ पुन:प्रकाशन। मिहिर केँ पुनः चलएबाक महाराज कामेश्वर सिंहक इच्छा ठामहि रहि जाइत जँ विद्यालंकार ओकर दायित्व प्रसन्नता पूर्वक अपना उपर लए हुनका प्रोत्साहित नहि करितथि। महाराज हुनक बड़ आदर करैत छलाह। हुनक सहयोगक आश्वासन भेटलहि पर मिहिर केँ पुनः चलएबाक निर्णय भेल। सम्पादक तँ बनाओल गेलाह सुधांशु शेखर चौधरी, परन्तु पर्यवेक्षणक भार विद्यालंकार स्वयं उठओलनि।
मिथिला-मिहिर, चेतना-समिति आ मैथिली अकादमीक उपलब्धि तँ सभ जनितहि छी। एक बात कम गोटे जनैत होएताह जे मैथिली भाषाक मानकीकरण मे विद्यालंकारक योगदान प्रायः सभ सँ अधिक रहलनि। ओ एक बेर मिथिला-मिहिरक हेतु मानक वर्तनी निर्धारित कएलनि। जखन मैथिली अकादमी मे अएलाह तँ पुनः एहि हेतु एक विज्ञ उपसमिति बनाए ओहि पर पुनर्विचार कराओल। निर्णय सूत्रबद्ध कएल गेल आ ताहि पर तीन गोटाक हस्ताक्षर भेल। विद्यालंकारक, प्रो. सुरेन्द्र झा 'सुमन' आ पण्डित गोविन्द झाक। एहि निर्णय केँ सभक समर्थन भेटल। एहि विषय मे अपन मत पर अड़ल रहलाह केवल दू विद्वान, आचार्य रमानाथ झा आ प्रो. सुभद्र झा। ज्ञातव्य जे एहि मानकीकरण सूत्र मे 'ए' तथा 'य' दुनू राखल गेल। किन्तु चलाओल गेल केवल य। ("अनुचिन्तन" पोथी मे संकलित लेख "लेल महातरु तर बिसराम" सँ उद्धृत)
"लेल महातरु तर बिसराम" लेख केर समापन करैत पण्डित गोविन्द झा लिखलनि अछि,"चलैत-चलैत थाकल-तबधल बटोही कोनो महातरु तर विश्राम लैत अछि। हमरा हेतु विद्यालंकारे ओ 'महातरु' भेलाह।" उक्त दू टा वाक्य पढ़ि अपन महान पूर्वजक प्रति हृदय श्रद्धा-भाव सँ ओत-प्रोत होमए लागल हमर। वास्तव मे 'महातरु' तँ छलाहे ओ। "जे केओ हुनका सान्निध्य मे थोड़बो समय बितओलक, से स्वयं केँ भाग्यशाली बुझए" आदरणीय घनश्याम ठाकुर जी एक दिन गप्पक प्रसंग मे एहि तरहक बात कहने छलाह हमरा। हमर सौभाग्य जे ओहि 'महातरु'क एकटा शाखा/उप-शाखाक संग हमहूँ जीवन भरि लेल जुड़ि गेल छी। ओहि 'महातरु'क प्रति अपन टूटल-फूटल भाषा-शैली मे जएह-जेहने भाव-कुसुमाञ्जलि अर्पित कऽ पाबि रहल छी, से हमरा लेल संतोषक बात !
नोट: एहि लेख मे अधिकांश तथ्य पण्डित गोविन्द झा जीक पोथी "अनुचिन्तन"मे संकलित लेख "लेल महातरु तर बिसराम" सँ उद्धृत अछि। पण्डित गोविन्द झाक सुपुत्र आदरणीय अरविन्द 'अक्कू' जीक माध्यम सँ ई लेख हमरा प्राप्त भऽ सकल अछि।
संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-2
विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि-
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7
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Suggested citation: कल्पना झा. “मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-३.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 443, pp. 27–30, 2026-06-01. https://www.videha.co.in/research/2026/443/मैथिली-साहित्यमे-श्रीकान्त-ठाकुर-विद्यालंकार-एवं-हुनक-परिव-3eff1708ab.htm

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