विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-४) सन्दर्भ- कुणाल-कृत बिदापत

गजेन्द्र ठाकुर · 2026-06-15 · अंक 444 · पृष्ठ 104–112

२.१. हितनाथ झा-मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२३
हितनाथ झा
(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
वियोगिनी
श्यामसुन्दर झा क्वैलख
भागलपुर जिलान्तर्गत सुपौल वो मधेपुरा सबडिवीजनक अन्दर दूइ ग्राम भद्रपूर वो रुद्रपूर नामे विख्यात अछि। दूनू ग्राम पच्चीस वर्षपूर्व अतिशय गुणवान छल, एहूसँ बेसी एहि दुनू ग्रामपर लक्ष्मीक पूर्णरूपेण कृपा छल। प्राकृतिक सुन्दरता कूट-कूट क भरल छल।परन्तु ई सभ रहलहु सन्ता विद्यारूपी बीज अंकुरित भेले टा छल।पूर्ण रूपेण विकसित नहि भेल छल।उक्त दुनू ग्राम अपना-अपना अंशमे उपर्य्युपरि छल। एहि दूनू ग्रामक जनसमूह प्राचीन सभ्यताक अनुयायी छलाह। पाश्चात्य देशक वा नवीन युगक आवोहवा नहि लागल छल।परन्तु युवक समुदाय काँ उत्कट अभिलाषा भेल जे नवीन युगमे प्रवेश कय पाश्चात्य देशक गुण ग्रहण करी ओ अवगुण काँ त्यागि दी। परन्तु वयोवृद्ध लोकनिक घोर विरोधसँ युवक लोकनि एहि कार्य्यमे सफलीभूत नहि भय सकलाह। युवक मण्डली संध्या काल ग्रामक बाहर एक पोखरिक घाटपर बैसल सब अपना-अपना हृदयमे एहि गूढ़ समस्या काँ विचारैत छलाह। अकस्मात ओहि निर्जन स्थानमे युवक मण्डलीकेँ संबोधन करैत आकाशवाणी भेल, युवक लोकनि साकांक्ष भेलाह - " युवक लोकनि ! धैर्य धयने रहू आ दस वर्षक मध्य एहि दूनू ग्राममे एक विशेष लीला हेतैक तखन अहाँ लोकनि काँ उठवाक अवसर होयत।वो वयोवृद्ध लोकनिक मूड़ी खसत।"
उक्त भद्रपूर ग्राम प्रायः दू सै घरक वस्ती जाहिमे सत्तरि अस्सी घर मैथिल ब्राह्मणक।और शेष निम्न वर्णक। ओहि मैथिल मण्डलीमे पंजीबद्ध लोक नहि किछु वंशक लोक शेष जयवार ब्राह्मण, ओही जयवार ब्राह्मणक मध्य चन्द्रमणि झा नामक लक्ष्मीक दुलरुआ छलाह परन्तु " कारी अक्षर महीस बराबरि" एहि कहावतकेँ चरितार्थ करैत छलाह। गाममे हिनक पूर्ण धाक छल।छोटका सँ बड़का धरि सभ हिनका शासन सँ शासित छल।कारण दू सेर वा दू टाकाक वास्ते हिनकहि दरबाजापर जाय पड़ैत छलैक।तैं हेतु ककरो मूड़ी उठा क ' बजबाक सामर्थ्य नही। दू चारि व्यक्ति एहनो छलाह जनिका हिनक प्रयोजन नहि। परन्तु जनसमूहक बीच की कय सकैछ ?
एहि ग्राममे पूर्वसँ परिपाटी छल जे कन्यादनमे कन्या जावत पूर्ण वयस्का अर्थात सोलह-सत्रह वर्षक नहि होथि तावत कन्यादान नहि करी।"अष्ट वर्षात भवेत गौरी" एहि मनु वाक्यक पूर्ण विरोधी छलाह।वो वरक गुण एतवै टा देखैत छलाह, कमसँ कम वर देखैत सुन्दर होथि। अवस्था पन्द्रह-सोलह रहनि।विद्याक प्रयोजन नहि। परन्तु बखारी धरि दरबज्जापर रहबे करनि। जाति-पाँजिमे श्रेष्ठ होनि वा समानो क्षति नहि। परन्तु एहू सव सँ बेसी ध्यान दैत जाइत छलाह वर यदि वहु विवाह कयने रहथि त सर्वोत्तम नहि त दू विवाह अवश्य रहनि कारण एकर एतवै छल जे वर विवाह कय अपन घर जाथि। वो दाइ काँ राखि भनसीया वा खबासिनीक कार्य्य करबियनि। धन्य ! धन्य मैथिल समाज। एहन स्थितिमे मिथिला देश वा मैथिल जाति रसातल जाथि त कोन आश्चर्य !
(2)
चन्द्रमणि बाबूक परिवार बृहत नहि। केवल एक स्त्री, एक बालक, एक कन्या। दुनू भाइ बहीन देखैत परम् सुन्दर बालकक नाम हीरामणि वो कन्याक नाम सावित्री।चन्द्रमणि बाबू बालककेँ हीरा कहि सम्बोधित करैत छलाह। हुनक स्त्री बेटी काँ दुलारसँ सविता कहि सम्बोधित करैत छलीह।टोल पडोसक स्त्री सविता कहि सोर करैत छलथिन्ह।
फाल्गुन मास इजोरिया राति आकाशमे मेघक दरश नहि।मन्द-मन्द समीर बहि रहल छल।चन्द्रमा अपन अपूर्व शीतल जल सँ एहि भूमंडल काँ आलोकित कय रहल छलाह।ऋतुराजक आगमन देखि ग्रामवृक्ष अपन जीर्ण-शीर्ण कलेवर काँ बदलि अपन-अपन सखा सभ काँ नव पल्लव ओ फूल फलसँ सुसज्जित कय ऋतुराजक स्वागतार्थ उपस्थित भेल छलाह, भ्रमर अपन प्रेमिकाक संग गान वाद्य लय अपना स्वामी काँ रिझावय लगलाह।कोइली अपन सखी सभ काँ एहि तरहेँ नाचैत गाबैत आनन्द मजा लुटैत देखि इहो कुहकय लगलीह। ई अपूर्व दृश्य देखि सुरराज वा सुरराज सभाक अप्सरा लज्जित भय मूड़ी गोड़ि लेल।ई सुन्दर राति टोलक सब लोक चन्द्रमणि बाबूक दालान पर अकड़ि कय बैसल छल।
एहि सभामे नाना प्रकारक गप भय रहल छल। क्यो गाँधी युगक आलोचना कय रहल छलाह तँ क्यो ब्रिटिश सरकारक गुणानुवाद कय रहल छलाह, क्यो पतित पावन भुत नाथ काँ नचारी गावि रिझा रहल छलाह तँ क्यो फागु गाबि कामिनीक हृदयमे कामरूपी वाण मारि रहल छलाह।कहबाक तात्पर्य जे सभ एहि फागुन मासक बहार लूटि रहल छलाह। संसारक प्राणी मात्र आनन्द कय रहल छल केवल दुखी छलीह सविता। कारण सविता बाल्यावस्थाक क्रीड़ाकेँ तिलाञ्जलि दय युवावस्थामे पदार्पण कयने छलीह। परन्तु विवाह नहि भेलासँ अतिखिन्न भय गेल छलीह, परन्तु हिनका माय-बाप काँ एकर एकोरत्ती धंधा-फिकीर नहि। एहन आनन्दक समयमे चन्द्रमणिबाबूक खवासिनी अपन कर्कश स्वरसँ सभा के भंग करैत सोर कयलक- " बाबू ठाँव भय गेल।"
चन्द्रमणिबाबू- की थिकौ ?
खबासिनी- बाबू ठाँव भय गेल !
चन्द्र:- बेश, बुझल कनेक जल दय जो, लघुशंका करब।
खबासिनी काँ अयबामे विलम्ब देखि चन्द्रमणिबाबू सोर कयल- " मंगली माय जल दय जो" । प्रत्युत्तरमे " अबैत छी" कहि मंगली माय लोटामे जल लय चन्द्रमणि बाबू काँ देलकैन। चन्द्रमणि बाबू काँ भोजन करबा लय जाइत देखि जे केओ चन्द्रमणिबाबूक दालानपर बैसल छलाह सब अपना-अपना घरक रास्ता लेल।एम्हर चन्द्रमणि बाबू पैर-हाथ काँ जलसँ प्रच्छालन कय पीढ़ी पर बैसलाह।सविताक माय थारी लय चिन्तित मते आगूमे राखि देल। चन्द्रमणिबाबू भोजन प्रारम्भ कयल। प्रथमहि ग्रासमे कहि उठलथिन्ह-राम! राम ! एहिना भानस करैत छी।छी: ! दालिमे एकदम नोनहि नोन तकरहु जितलक हरदि। ताहूसँ चिकन भेल तरकारी। सबटा आलू केँ डाहि देलियैक। ई शब्दक बौछारसँ सविताक माइक हृदय काँपि गेल। डेराइत-डेराइत बजलीह - भानस करबाक काल राधाक माय आयल छलीह।हुनके आदर-सत्कार करबामे विलम्ब भेल तेँ सभ वस्तु दूरि भय गेल।
चन्द- के आयल छलीह ?
स.माय- राधाक माय।
चन्द्र- कत' आयल छलीह ?
स.मा.- औती कत', टहल बुल, अपना इष्ट-अपेक्षित लोकक खोज पुछारी करs। अहाँ पुरुष लोकनि काँ टहलबामे कौखन कोन क्षति नहि। परन्तु स्त्रीगण यदि अपना इष्ट अपेक्षितक आँगन कुशालादि बुझs लेल गेल कि लगले कतय गेलीह कतय अयलीह, यैह प्रश्न उठैछ ।
चन्द- तैं नहि कहल। हमरा भेल जे कोनो कार्य्य सँ आयल छलीह।
स.मा : कहैत छलीह जे एहि बेर शुद्ध छैक। सविताक विवाह करा दियौक। आब विवाह करबै योग्य भय गेल। परंतु सविताक बापकेँ एकोरत्ती धन्धा-फिकीर नहि छैन्हि। शुद्ध बितल जाइत छैक।"सविताक विवाह जखन हयत तखनि बुझब जे भेल।" ई बात सविताक माय अपना दिससँ जोड़ि कय बजलीह।
चन्द्र:- अहाँ लोकनिकेँ विवाह इत्यादि बाड़ी महक गेन्हारी साग बुझि पड़ैछ। साँझ खन गेलौं साग खोटि लेल लोहियामे द' देलियैक तरकारी तैयार भय गेल। ई कन्यादान थिकैक। एहिमे वर ताकय ओ विचारय पड़ैछ। बैसाखमे सभा हेतैक। कतहु हेबे करतैक।
स. मा. :- घर कथा भय जाइत तँ नीक छल ।
चन्द्र- घर कथा कोना हो। पञ्जीकार गाम गेल छथि। घटक सेहो एखन गाम नहि छथि। बिन घरक पञ्जीकारक विचारसँ कार्य्य पाँचमे-छठम ठाम सम्बन्ध हयबाक सम्भावना।
चैत धरि ओ लोकनि अयताह , बैसाखमे कतहु हैबे करतैक।
स. मा. :- देखब, सविता केँ जाहिसँ घर वर नीक होइन से कय देबनि, एकेटा बेटी छथि दू चारि टा रहितथि तँ कियैक ने।
चन्द्र:- हम की कय सकै छी ।
स.मा. सैह देखब अहूँ चम्पाक बाप जकाँ तेहन वर नहि आनब।विवाह कय जे जाथि से फेर घुरि कय नहि आबथि। देखियौक चम्पाक वर विवाह की जे गेलाह से अद्यपर्यन्त नहि अयलाह। द्विरागमनक कोन कथा कोनो खोजो-पुछारी नहि कयल। चम्पाक भाउज चम्पा
पर सतत हुकुम फरमबैत छथिन्ह। हुनक लक्षण केहन जेना हुनक बाप द्विरागमनमे खबासिनी देने रहथिन्ह। बेचारी चम्पा बहुआसीनक आज्ञाकारिणी जे हुनका मूँह सँ खसल से तुरत मौजूद। धन्य चम्पा धन्य ।!
चन्द्र :- चम्पा की करती । स्वामी विवाह कय जे गेल थिन्ह से घुरि कय अयबो नहि कयलथिन्ह। तखन वो बेचारी की करय । कोनहु तरहे मानापमान उठाय व्यंग्य वाक्यक बौछार सुनि सहि एहि पापी पेट काँ भरैछ। बहुत स्त्रीगण अपना माय बाप तथा स्वामियोक तिरस्कार कय मुसलमानक बहकौला सँ वेश्या वा मुसलमानिनी बनि नारकीय जीवन बितबैछ। ताहिसँ सर्वोत्तम यैह थीक अपना भाइ-भाउजक कथा मानि जीवन यापन करैछ।
स. मा. - सैह देखब अहूँ ।ओ...ह..और न...हि...एतबा कहैत कण्ठ अवरुद्ध भय गेलनि। नेत्रसँ अश्रु मन्दाकिनी बहि चलल। आगू नहि किछु बाजि सकलीह।
चन्द्र - जेहन भाग्य विधाता दयने हयथिन्ह। हमर कोन साध्य !
एतबा कहि चन्द्रमणिबाबू मूँह-हाथ धोय पान-सुपारी जर्दा काँ गाल तर दाबि दलानपर जाय एहि बातक घोर चिन्ता करैत पड़ि रहलाह।
(क्रमशः)
(प्रभात : वर्ष-1, अंक-4, अप्रैल-1933)
{क्वैलख(कोइलख)क श्यामसुंदर झाक 'वियोगिनी' धारावाहिक शृंखलामे पहिल अंश अप्रैल-1933क अंकमे प्रकाशित भेल छल, जाहिमे एक आ दू छल। तेसर लेल आगाँक अंक जे उपलब्ध अछि, मइ,जून 1933 ओहिमे नहि अछि, जुलाइ अंक अनुपलब्ध अछि, प्रायः ओही अंकमे प्रकाशित भेल हेतैक। अगस्त-1933 अंक उपलब्ध अछि, ओहिमे चारिम खण्ड अछि। तेँ सम्पूर्ण नहि अछि, किन्तु एहि रचनाक ऐतिहासिक महत्वकेँ देखैत आ पढ़लाक बाद सम्पूर्ण लागत, ओहि समयक सामाजिक स्थितिक वर्णन आँखिक सोझाँ स्पष्ट झलकि जायत। )} - हितनाथ झा
(4)
भारत वर्षक ऋतुमे तीन ऋतु प्रधान अछि जाहिमे ग्रीष्म ऋतु , ओ एक प्रधान ऋतु अछि।ग्रीष्म ऋतुक प्रधान मास बैसाख थिक।एक दिन उपरोक्त मासमे दिवाकर अपन उग्र ज्योति सँ एहि भूमंडल काँ दग्ध कय रहल छलाह।गर्मीक ज्वालासँ मनुष्य,पशुपक्षी कहबाक तात्पर्य जे प्राणी मात्र अपन-अपन विश्रामक स्थानमे विश्राम कय रहल छल।वृक्ष अपन उदारताक परिचय देबा लै दुपहरक समयमे थाकल पथिक काँ अपन शीतल छाया प्रदान कय रहल छल। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड सड़कक काते-काते जे इनार छल ओ शीतल मधुर जल प्रदान कय रहल छल ताहूसँ जीतल दानी मारवाड़ी ओ धनी लोकनिक पनिशाला।
धन्य हमर सनातन धर्म। तैं एतेक ओजस्वी प्रभावशाली उदार अछि। नवीन जतेक धर्म भेल सब एहि धर्ममे एक-एक धक्का लगौलक। वर्तमानहु समयमे एक धक्का लागल अछि तथापि ई सनातन धर्म अपन पूर्वक नम्रता काँ चरितार्थ करैत लातमुक्का सहैत ज्वलन्त यशस्वी पताका काँ फहराय रहल अछि। अमेरिका वा अन्य पाश्चात्य देशमे दान देव् वा दान लेव परम घृणित बुझल जाइछ।परन्तु हमरा देशमे एकर बड़ महत्व छैक। हमरा देश काँ उदार होयबाक यैह मुख्य कारण थीक। दान वस्तु धार्मिक दृष्टिसँ, सामाजिक दृष्टिसँ, राजनैतिक दृष्टिसँ उत्तम थिक। यैह कारण थिक जे हमरा देशमे प्रति दिन किछु ने किछु दान होइत अछि।
उपरोक्त समयमे एक व्यक्ति खुटिया मिरजई, माथ पर कोढ़िलावाला पाग पहिरने कान्ध पर दोपटा नेने पैर मे ठीकरी पदत्रान पहिरने शिवहरक सड़क जे भागलपुर गेल छैक, ओहि सड़कपर खूब जल्दी-जल्दी पैर मारने चल जाइत छलाह। शुद्धक समय छल, तैं एतेक चालिमे हड़बड़ी छल। अकस्मात एक इनार लग बैसल पाँच-सात व्यक्ति काँ देखि आगन्तुक व्यक्ति काँ देखि आगंतुक व्यक्ति अटकि गेलाह वो बाजि उठलाह- के थिकहुँ ? आरे घटक। घटक देखितहि ठाढ़ भय नमस्कार । कुशल ? एकर प्रत्युत्तरमे आगन्तुक व्यक्ति नमस्कार पात कय पुछलथिन्ह- घटक ! चलब नहि ?
घटक - जेबे करब, एतेक हड़बड़ी कियैक ?
आगन्तुक - चारि दिन सभा भेना भय गेलैक।
घटक - अपने सेहो सभे जायब। हमरा तँ भेल जे सुपौल कोनो रजिस्ट्री करबै लै जा रहल छी।
आगन्तुक- की पुछै छी ? हमरा तँ एहि बेर सभा जयबाक नहि छल कारण जे एखन कन्यादान करबाक योग्य नहि अछि, 14 मे वर्ष थिकैक। हमरा इच्छा छल परुका साल कार्य करितौ। हमरा आँगनक हाल तँ बुझले अछि। टीक उजाड़ै पर तैयार।तखन की करू ? एही टीक बचैबा लय सभा जा रहल छी, यदि युगलत कथा हैत तँ करब नहि तँ छोड़ि देब कोनो हड़बड़ी नहि अछि।
घटक- (मनहि मन) कन्याक चौदहम वर्ष और कहैत छथि कोनो हड़बड़ी नहि(वाह रे0रे कलियुग) प्रकाशमे बेस,जल पीबि लिअ, रातिमे सुपौल रहि प्रातक गाड़ी सँ सभा जायब सैह नीक कारण जे रातिक सहरसा स्टेशन पर उतरब। कत रहब ? बड़ तकलीफ हयत।
आगन्तुक- वेश, चलू संगहि चलब।
घटक- आदमी नहि अछि ? आ कि पाछूसँ अबैछ।
आगन्तुक- हँ, अबैत अछि। मनचनमाकेँ नहि चिन्हैत थिकियैक! भारी कोढ़ियाठ अछि। टके डेग दैत अछि। चलैत कोना अछि जेना कोबरा महक वर।
घटक- अहूँ कोढ़ियाठे आदमी ल'क' चलैत छी। सभामे पनिगर आदमीक प्रयोजन ह्वैत छैक। आकि ओहूठाम रोपनिये करैब।
आगन्तुक- वेश आब' दियौक।
पाठक पाठिका एहि आगन्तुकसँ परिचित छथि परन्तु नामकरण नहि भेलासँ अकचकयबाक सम्भावना।मनचनमा खबासकेँ अयला पर जे सात-आठ व्यक्ति वैसल छलाह से सव सुपौल स्टेशन दिस विदा भेलाह। ओहि इनार सँ स्टेशन प्रायः दू कोस छल। घटकक भेष-भूषा अपूर्वे छल।एक टा लटपटही पाग कान्ध पर फाटल दोपटा वो अंगपोछा। एक हाथमे फराठी सेहो झुमकी लागल वो एक हाथमे तम्बाकुक झोरी सेहो प्रायः अढ़ाइ तीन हाथ लम्बा डेढ़-दू हाथ चौड़ा अनुमानसँ प्रायः पाठक लोकनि काँ बुझि पड़ैत जे गोटेक छोटका मसनद के खोल रहय। एहू सभसँ अपूर्व छल नोसिदानी।प्रायः ओहिमे आध सेर छह कनमा नोसि अटैत छलैक। घटक नोसि लेबामे ई आइ. आर. (इंडियन रेलवे) कम्पनीक इंजिन काँ छकबैत छलाह। नाकक दुनू पूड़ामे एक बेरमे प्रायः आध पाव नोसि ठूसि दैत छलथिन्ह। पाठक वो पाठिका विचारक विषय थिक यदि हम वा हमर समाज वा हमर देश एहि तरहक निशाखोर हो, तखन हमरा देशक सन्तान धनहीन बुद्धिहीन लम्पट दुराचारी व्यभिचारी हो तँ कोन आश्चर्य ? वाह रे नशा । यदि अहाँक ताण्डव नृत्य और किछु दिन एहि मिथिलामे भेल तँ मिथिलाक नामो निशान नहि रहत।
बलिहारी एहि नशाक ।
धन्य !धन्य !! ई नशा !!! ......
(प्रभात , वर्ष- 1, अंक-8, अगस्त1933)
उपर्युक्त आलेखमे एकहि सङ्ग बालविवाहक प्रचलनक तत्कालीन समाजक कुप्रथाक बहुत जीवन्त आ भयावह वृतान्त अछि। नशा सेवनसँ सामाजिक दुर्व्यवस्था सेहो देखल जा सकैछ।
एहि आलेखमे ई स्पष्ट कहल गेल अछि जे जँ ई स्थिति रहतैक तँ मिथिलाक एक दिन नामोनिशान तक नहि रहतैक।
एहन आलेख सभ धारावाहिक रूपमे अनेक अछि, किन्तु सभ अंकक उपलब्धता नहि रहलाक कारण खण्डित अछि, तथापि जतेक सम्भव भ' सकत से पाठकक सोझाँ प्रस्तुत करैत रहब।
संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
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Suggested citation: गजेन्द्र ठाकुर. “मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-४) सन्दर्भ- कुणाल-कृत बिदापत.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 444, pp. 104–112, 2026-06-15. https://www.videha.co.in/research/2026/444/मैथिली-नाट्यमंच-नाटक-लेल-एकटा-समीक्षा-सिद्धान्त-भाग-४-सन्दर-3881d7a12e.htm

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