मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-4
माँ मैथीलीक सुच्चा सेवक/उन्नायक 'विद्यालंकार'
मातृभाषाक सुच्चा सेवक श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' मैथिली साहित्यक प्रति सेहो अत्यधिक अनुराग राखैत छलाह। नहि जानि किएक किछु लोक हुनका मात्र 'राष्ट्रभाषा हिन्दीक अनन्य पुजारी'क रूप मे स्थापित कऽ देबा लेल बिर्त भेल सन बुझा रहल छथि। ई सत्य अछि जे ओ हिन्दी मे देखनुक काज बेसी केलनि। कारण, ओ पत्रकारिता सँ जुड़ल छलाह। आ से पत्रकारिता ओ हिन्दी मे केलनि। बीस बरख, अक्टूबर 1948 सँ मइ 1968 धरि ओ हिन्दी दैनिक 'आर्यावर्त' सँ जुड़ल रहलाह। प्रधान सम्पादक रूप मे। हुनकर समय मे आर्यावर्त दैनिक पत्रक प्रतिष्ठा आ प्रसार दुनू मे अपार बढ़ोतरी भेल। सम्पादकीय परम्परा केँ आगाँ बढ़ौलनि। जहिना पत्रकारिता आ 'विद्यालंकार' पर्यायवाची शब्द सन बनि गेल छल, तहिना 'आर्यावर्त' मतलब 'विद्यालंकार' एहने सन स्थिति बनि गेल छलए। "आर्यावर्तक इतिहास श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'क जीवन-गाथाक इतिहास थिक" ई कहब छनि सुरेश्वर झाक। काज ओ केलनि हिन्दीए मे, माने पत्रकार रूप मे जतेक-जे केलनि से हिन्दीए मे केलनि आ जैं हिन्दी मे केलनि तैं ओ जे यदा-कदा मैथिली भाषा ओ साहित्य तथा मिथिलाक सांस्कृतिक उत्थानक लेल आर्यावर्तक माध्यम सँ मैथिली-भाषीक भावना केँ मुखरित करबाक प्रयास करैत रहलाह, से बेसी लोक धरि पहुँचल। मतलब बेसी लोक पर प्रभाव पड़लैक, ओहि बात सभक। कहबाक माने हिन्दीओ मे काज करैत ओ मैथिलीक उपकार करबाक प्रयास करैत रहलाह। यथासाध्य कएबो केलनि। मुदा मात्र 'माध्यम' हिन्दी पर नजरि गड़ौने, लोक हुनकर 'हिन्दीक अनन्य पुजारी' बला छवि मात्र स्वीकार्य मानथि, से अनुचित होएत।
"मैथिली साहित्य मे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' एवं हुनक परिवारक योगदान" पर लिखबाक क्रम मे कइअक गोटा सँ गप्प करैत हुनका विषय मे जानबाक प्रयास करैत रहलहुँ अछि। आ गप्पे गप्प मे 'विद्यालंकार'क व्यक्तित्वक ओहन पक्ष सभ सेहो उजागर होइत जा रहल अछि, जे कोनो पोथी मे पढ़ल नहि छलए हमरा। आदरणीय भीमनाथ झा सँ गप्प करैत 'विद्यालंकार'क मैथिली भाषाक प्रति प्रेम आ साहित्य-प्रेमक संग मैथिली साहित्यकार लोकनिक प्रति सम्मान-भाव सँ सेहो परिचित भेलहुँ। भीमनाथ झा एकटा संस्मरणात्मक प्रसंग बतौलनि, 'विद्यालंकार' जी हरेक साल अगहन मास मे, धनकटनी समय मे, बरु दसे दिन लेल, गाम (कोइलख) अबस्से आबैत छलाह। आ हरेक बेर गामक यात्रा मे, हुनक उपस्थिति मे कोइलखक संग आस-पड़ोसक गाम सँ सेहो नबतुरिया सहित सभ बएसक लेखक-कवि सभक जुटान करबाक उद्देश्य सँ कोनो कवि-गोष्ठीक आयोजन निश्चित रूप सँ होइत छल कोइलखक "उमापति पुस्तकालय" पर। जे पुस्तकालय कवि आ नाटककार उमापति उपाध्यायक नाम पर कोइलख गाम मे 14 अक्टूबर 1932 ई. मे स्थापित भेल छलए। आ ई पुस्तकालय अद्यतन जीवन्त अछि, एहन जनतब भेटि रहल अछि हमरा। एहि पुस्तकालय लेल 'विद्यालंकार'क सिनेहक बानगी देखबैत भीमनाथ झा बतौलनि जे जा धरि 'विद्यालंकार' आर्यावर्त सँ जुड़ल रहलाह, सभ दिन एक प्रति "आर्यावर्त" डाक सँ आबैत रहल उमापति पुस्तकालय मे। एक दिन बादे सही, मुदा लोक धरि नित्य प्रतिक अखबार पहुँचिए टा जाइक। अपन गाम, गामक लोक, गामक पुस्तकालय लेल एहन सिनेह, जागरुकता, गामक लोक पढ़थि, बढ़थि, ताहि लेल एहि तरहक साकांक्षता विरले देखबा-सुनबा लेल भेटत। हँ, तँ बात कऽ रहल छलहुँ, कोइलख मे हरेक साल आयोजित होमए बला कवि-गोष्ठीक। एक बेर गामक लोक केँ विचार भेलनि जे कवि 'चूड़ामणि' मधुप जी केँ कोइलखक उमापति पुस्तकालय पर बजाए सम्मानित कएल जाए। 'विद्यालंकार'क सहमति सँ आयोजन भेल। स्वागत सम्मानक संग कविता पाठ सेहो करैत गेलाह किछु नब-पुरान कवि लोकनि। कार्यक्रमक अध्यक्षता केलनि स्वयं 'विद्यालंकार' जी। एही कार्यक्रम मे हितनाथ झा पहिल बेर मंच पर कविता-पाठ कएने छलाह। जखन ओ पँचमे कक्षाक छात्र छलाह। ई प्रायः 1966क बात होएत। पं० काशीकान्त मिश्र 'मधुप' आ श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'क उपस्थिति मे कविता-पाठ करबाक ई संस्मरण स्वयं हितनाथ झा हमरा सुनौलनि अछि। एहि आयोजनक प्रात भेने बड़का-बड़का अक्षर मे ई 'हेडलाइन' "कोइलख मे हुआ मधुप जी का सम्मान" देखि गामक लोक कतेक गदगद भेल हेताह, से हुनकहि सभक मुहेँ सुनला पर बुझबा मे आओत। अपन गामक नाम, अपन मैथिलीक साहित्यकारक नाम, राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र मे देखब वास्तव मे आह्लादकारी रहल हेतनि गौँआक लेल।
उक्त प्रसंगक चर्चाक उपरान्त भरिसक स्पष्ट भऽ गेल होएत जे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' हिन्दीक अनन्य पुजारी मात्र नहि, माँ मैथीलीक सुच्चा सेवक/उन्नायक सेहो छलाह।
संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-3
विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि-
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-24
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-25