विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-५): कुणाल-कृत कुसमा-सलहेस

गजेन्द्र ठाकुर · 2026-07-01 · अंक 445

मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-५) सन्दर्भ- कुणाल-कृत कुसमा-सलहेस
कुणाल-कृत नाट्य-समीक्षा शृंखला · तृतीय नाटक
कुसमा-सलहेस
[महागाथा (राजा सलहेस) आ लोक-नाट्य (सलहेस नाच) पर आधारित नाटक]
एकटा चतुर्भुज नाट्य-समीक्षा : भारतीय · पाश्चात्य · चीनी · इजरायली परिप्रेक्ष्यमे
पहिल मंचन : २९-३० अप्रैल १९९७, विद्यापति भवन, पटना · प्रकाशन : अंतिका, अप्रैल-सितंबर २००६
१. परिचय, कथा-संरचना आ ऐतिहासिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ
कुणालक तृतीय आ सर्वाधिक विस्तृत नाटक ‘कुसमा-सलहेस’ संग्रहक हृदय-स्थान रखैत अछि—लगभग ७० पृष्ठक ई नाटक कलात्मक, वैचारिक आ सांस्कृतिक, तीनू दृष्टिसँ संग्रहक केन्द्र-बिन्दु थिक। एकर आधार मिथिलाक दुसाध समुदायक लोक-देवता-नायक ‘राजा सलहेस’क महागाथा आ ओहि गाथा पर आधारित लोक-रंगमंच-परम्परा ‘सलहेस नाच’ थिक।
कथाक भूगोल विराट अछि—महिसौथा, मोरंग, बाघगढ़, रेवा-दाह, भोट/तिब्बत, समदागढ़, पकड़िया, गढ़-तरेगना, रंगीलागढ़—ई स्थान-नाम भारत-नेपाल-तिब्बत धरिक एक भौगोलिक-राजनीतिक संसार रचैत अछि। पात्र-वर्ग सेहो महाकाव्यात्मक अछि—नायक सलहेस, नायिका कुसमा (मालिन), तथा हिरामन (सूग्गा-कथावाहक), विपटा (विदूषक), ठनका (बाघ), बनका (भालु), कुनटा (वनचर), देवी दुर्गा, अनेक राजा-सैन्य-शत्रु।
नाटकक पाँच मुख्य नाट्य-क्रम—(१) पूर्वरंग : समन्वयवादी सुमिरन आ नाटककेँ आरम्भ करबाक मेटाथिएट्रिकल प्रसंग (विपटा-हिरामन द्वारा); (२) कुसमाक परिचय आ आत्म-शुद्धि-साधना; (३) सलहेसक वीरता, पहिल भेंट, आ दुर्गाक आशीर्वाद; (४) भोट-आक्रमण, षड्यंत्र आ कारागार-बन्धन; (५) स्वाधीन-चेतनाक घोषणा, लोक-एकजुटतासँ विजय, आ प्रेम-तत्त्वक समापन-घोषणा।
२. भारतीय नाट्य-सिद्धांत
२.१ सलहेस-नाच : लोकनाट्यक स्वायत्त सौन्दर्यशास्त्र
भरतमुनिक नाट्यशास्त्र संस्कृत-परम्पराक भीतरसँ नाटकक सिद्धांत रचैत अछि। मुदा मिथिलाक ‘सलहेस नाच’ एक स्वायत्त लोक-नाट्य परम्परा थिक जेकर अपन प्रदर्शन-व्याकरण (performance grammar) अछि। एहिमे—समाजीक सामूहिक गायन (कोरसक भूमिका), सुमिरन (लोकनाट्यक मंगलाचरण जे हिन्दू, मुस्लिम, आ जनजातीय देवताक एकसंग आह्वान करैत अछि), विपटाक विदूषक-भूमिका, हिरामन-सूग्गाक कथावाहक-भूमिका आ सलहेसक प्रवेशसँ पूर्व जय-जयकार—ई सभ लोकनाट्यक अपन नाटकीय संस्कार (ritual performance elements) थिक।
कुणाल एहि सम्पूर्ण लोक-व्याकरणकेँ प्रामाणिकतासँ अपनेने छथि—शुद्धि, क्रम, गायन, सम्बोधन—सभ लोक-परम्पराक अनुरूप। एहि अर्थमे ई नाटक अभिजन-रंगमंचक लोकनाट्य-अनुकरण नहि, अपितु लोकनाट्यक साहित्यिक पुनर्प्रस्तुति थिक—एहि भेदकेँ चिन्हनाइ आवश्यक अछि।
२.२ रस-महोत्सव : बहुरंगी रस-संरचना
संस्कृत काव्यशास्त्रक परम्पराक अनुसार उत्कृष्ट नाट्यकृतिक एक ‘प्रधान रस’ होएबाक चाही जकर सेवामे अन्य रस सहायक होइत अछि। ‘कुसमा-सलहेस’क जटिलता ई थिक जे एतय एकल प्रधान रस नहि, रसक एक महोत्सव उपस्थित अछि।
शृंगार (कुसमा-सलहेसक प्रेम—राधा-कृष्णक लोक-प्रतिरूप; “ओ तँ किसुन गोसाँइ छिऐ, आ तों राधारानी”); वीर (सलहेसक युद्ध-पराक्रम, पराजित शत्रुपर दया—“हारि क’ पड़ाइत सेना केँ खिहारनाइ अनुचित”); अद्भुत (ठनका-बनका-हिरामनक अलौकिक उपस्थिति, दुर्गाक साक्षात्कार); करुण (असम्भव प्रेम—सलहेस विवाहित छथि, कुसमा मालिन छथि, जाति-सीमा बाधक); भक्ति (दुर्गाक आराधना, सुमिरनमे सर्व-धर्म-समन्वय); वीभत्स/भयानक (सूचोंगक षड्यंत्र, कारागार-अत्याचार)।
भरत रसक ओ समन्वय स्वीकार करैत छथि जाहिमे ‘अंगी-रस’ (प्रधान) आ ‘अंग-रस’ (सहायक) मिलि एक जटिल रस-अनुभव उत्पन्न करैत अछि। एहि नाटकमे शृंगार आ वीर परस्पर ‘अंगी-रस’ बनि जाइत अछि—दुनूकेँ एक-दोसरक पूरक बनाबैत दुर्गाक घोषणा मध्यमे अबैत अछि—“मीलिक’ जे कुसमा सँ आब तों जन-मन मे विचरण करही / मात्र लोकक सुख लेल जीवन अरपन करही”। एतय प्रेम (शृंगार) स्वयं वीर-धर्मक प्रेरणा-स्रोत बनि जाइत अछि।
२.३ सबाल्टर्न-सौन्दर्यशास्त्र : कैनन-विरोध
संस्कृत नाट्यशास्त्रक नायक सामान्यतः ‘राजर्षि’ वा ‘दिव्य’ कुलक होइत अछि। एहि परम्परामे दुसाध नायक नहि। कुणालक सब सँ साहसिक नाट्य-निर्णय यैह थिक जे ओ एक सबाल्टर्न (सामाजिक पदक्रममे अधीनस्थ) समुदायक महागाथाकेँ ‘महाकाव्यात्मक नाटक’क केन्द्रमे रखैत छथि।
विद्यापति-परम्पराक शृंगार-काव्यमे राधा-कृष्ण आ शिवसिंह-लखिमाक प्रेमकेँ केन्द्रीयता भेटैत आएल अछि। कुणाल एहिसँ भिन्न मार्ग चुनैत छथि—कुसमाक ‘रधिया’ (राधाक लोक-रूप) आ सलहेसक ‘किसुन गोसाँइ’ (कृष्णक लोक-रूप)। ई प्रतीकात्मक प्रतिस्थापन एहि बातक नाट्य-घोषणा थिक जे दुसाध-लोक-परम्पराक प्रेम-कथा मैथिली साहित्यक मुख्यधाराक समतुल्य—वस्तुतः ओकर जड़ि—थिक।
२.४ कुसमाक आत्म-शुद्धि : देशज योगशास्त्र
हिरामन-कुसमाक संवाद (दोसर दृश्य)मे एक उल्लेखनीय आत्म-शुद्धि-अनुक्रम अछि जे योगशास्त्रक लोक-रूपान्तरण थिक—“अपन घर बहारि लैह... इर्ष्या, घमंड, घृणा, लोभ आ मोह बहरेलै... करुणाक जल सँ नीपलौं... सिनेहक चानन सँ सुगन्धित केलहूँ।” ई शारीरिक-क्रिया नहि, आन्तरिक शुद्धिक एक भाव-यात्रा थिक। भारतीय दार्शनिक परम्परामे—विशेषतः भक्ति-परम्परामे—‘हृदय-शुद्धि’ (चित्त-विशुद्धि)केँ प्रेम-प्राप्तिक पूर्व-शर्त मानल जाइत अछि।
कुणाल एहि भक्ति-दर्शनकेँ एक हास्य-फलक पर प्रस्तुत करैत छथि—हिरामन पहिने पुरस्कार माँगैत अछि (सोना, हीराक हार, रूपाक बाटी), तखन मार्गदर्शन करैत अछि। ई लोक-रसिकता भक्ति-दर्शनकेँ ‘सरल’ नहि, ‘सजीव’ बनाबैत अछि।
३. पाश्चात्य नाट्य-सिद्धांत
३.१ ग्रामशी : सबाल्टर्न इतिहास आ जैविक बुद्धिजीवी
इतालवी मार्क्सवादी विचारक आन्तोनियो ग्रामशी (Antonio Gramsci, १८९१–१९३७) अपन ‘प्रिजन नोटबुक’ (Prison Notebooks)मे ‘सबाल्टर्न’ (subaltern, अधीनस्थ/वंचित) समूहक इतिहासकेँ प्रभुत्ववादी इतिहास-लेखनक विकल्पक रूपमे प्रस्तुत कएलनि। ग्रामशी ‘जैविक बुद्धिजीवी’ (organic intellectual) कहैत छलाह ओहन व्यक्तिकेँ जे अपन समुदायक सांस्कृतिक अभिव्यक्तिकेँ उच्च साहित्यिक/बौद्धिक स्तर पर लऽ आबैत अछि।
एहि परिप्रेक्ष्यमे कुणाल मैथिली रंगमंचक एक जैविक बुद्धिजीवी छथि—दुसाध सलहेस-महागाथाकेँ, जे पहिने मात्र सलहेस-नाचक सीमित सामुदायिक प्रदर्शन-परम्परामे जीवित छल, ओ उठा क’ विद्यापति भवनक आधुनिक रंगमंच पर लऽ आएल छथि। ई सांस्कृतिक अनुवाद (cultural translation) ग्रामशीक अर्थमे एक राजनीतिक कार्य थिक—सबाल्टर्न स्वर मुख्यधाराक सांस्कृतिक स्थलमे प्रवेश पाबैत अछि।
ग्रामशीक दृष्टिसँ सलहेसक कारागार-भाषण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण क्षण थिक—“हमर प्राण अहाँक मुट्ठी मे भ’ सकैए सम्राट। मुदा हमर विचार आ भावना केँ बान्हल नै जा सकैए।” ग्रामशी ‘सांस्कृतिक आधिपत्य’ (cultural hegemony)क विरुद्ध जे प्रतिरोध-रणनीति बतबैत छलाह, सलहेसक यैह वक्तव्य ओकर एक लोक-नाट्य संस्करण थिक।
३.२ जादू-यथार्थवाद : लोक-विश्वास-दृष्टिक रंगमंचीय उपस्थिति
ग्रेट ब्रिटेन-कोलम्बियाई लेखक गार्सिया मार्केस (Gabriel García Márquez, १९२७–२०१४) आ भारतीय-ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी (Salman Rushdie, जन्म १९४७) अपन कथा-लेखनमे ‘जादू-यथार्थवाद’ (magic realism)क प्रयोग कएलनि—जाहिमे अद्भुत/अलौकिक तत्त्व यथार्थक स्वाभाविक अंग बनि जाइत अछि, बिना कोनो विशेष आश्चर्य वा व्याख्याक।
एहि नाटकमे ठनका (बाघ) आ बनका (भालु) सलहेसक वार्तालाप-साथी छथि, हिरामन (सूग्गा) स्वर्ग-मर्त्यक बीच संदेशवाहक छथि, दुर्गा साक्षात् प्रकट होइत छथि आ लोक-नायककेँ आशीर्वाद दैत छथि—ई सभ दुसाध लोक-विश्वास-दृष्टिक स्वाभाविक तत्त्व अछि, कोनो ‘चमत्कार’ नहि। जादू-यथार्थवादी सिद्धांतक परिप्रेक्ष्यमे एहि तत्त्वकेँ ‘magical’ नहि, ‘folk-cosmological real’ (लोक-ब्रह्माण्ड-वास्तविक) कहनाइ अधिक सटीक हएत।
रुश्दीक एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत थिक जे जादू-यथार्थवाद तखन प्रभावी होइत अछि जखन लेखक स्वयं ओहि ‘जादू’केँ वास्तविक मानैत हो—कोनो बाहरी दृष्टिसँ थोपल अलंकरण नहि। कुणालक नाटकमे ई प्रामाणिकता अछि—ठनका-बनका, हिरामन, दुर्गा सभ कथाक संरचनाक अनिवार्य अंग छथि, सजावटी नहि।
३.३ ब्रेख्त : लेहरस्टुक (शिक्षण-नाटक) आ जन-राजनीति
ब्रेख्त (Brecht) अपन ‘लेहरस्टुक’ (Lehrstück, teaching play)क सिद्धांतमे मानैत छलाह जे रंगमंच एक स्पष्ट राजनीतिक-नैतिक सन्देशक संवाहक बनि सकैत अछि। एहि नाटकमे समाजी आ हिरामन-विपटाक माध्यमसँ अनेक ‘शिक्षण-क्षण’ उपस्थित अछि—सलहेसक ‘भयमुक्त जीवनक मंत्र’, दुर्गाक ‘जन-मनमे विचरण आ लोक-हितक लेल जीवन-समर्पण’क आदेश।
मुदा कुणाल ब्रेख्तसँ एक महत्त्वपूर्ण बिन्दु पर भिन्न छथि—ब्रेख्त भावात्मक तादात्म्यसँ दूरी चाहैत छलाह; कुणाल प्रेम-भाव आ लोक-सेवाकेँ एकहि सिक्काक दू पट्टा मानैत छथि। लेहरस्टुकक बौद्धिक-राजनीतिक शिक्षण एतय शृंगार-भाव आ भक्ति-रसमे डूमल अछि—ई एक प्रकारे ‘एमोशनल एपिक थिएटर’ थिक जे ब्रेख्तीय श्रेणीसँ परे जाइत अछि।
३.४ होमी भाभा : सांस्कृतिक पहचान आ प्रतिरोध
इण्डियन-ब्रिटिश उत्तर-उपनिवेशवादी विचारक होमी भाभा (Homi Bhabha, जन्म १९४९) अपन ‘द लोकेशन ऑफ कल्चर’ (The Location of Culture)मे ‘तृतीय-स्थल’ (third space) आ सांस्कृतिक संकरता (hybridity) सन अवधारणा प्रस्तुत कएलनि—जाहिमे उपनिवेशित समूह उपनिवेशकारी प्रवचनकेँ आत्मसात करैत ओकर भीतरसँ ओकरा विघटित करैत अछि।
एहि नाटकमे सूचोंगक षड्यंत्र—सलहेसकेँ कुसमासँ अलग करबाक योजना—एक उपनिवेशकारी रणनीति थिक। ओ जनैत अछि जे कुसमाक ‘सिनेह आ ज्ञान’ सलहेसक शक्ति-स्रोत थिक। कुसमाकेँ अलग केलापर सलहेस कमजोर पड़त। यैह भाभाक ‘सांस्कृतिक पहचान-नाश’ (cultural identity erasure) थिक जे औपनिवेशिक शासन अवलम्बित करैत अछि। सलहेस एहि योजनाकेँ चीन्हि जाइ छथि आ घोषणा करैत छथि जे भावना आ विचार बन्धन नहि मानैत अछि।
४. चीनी नाट्य-सिद्धांत
४.१ यी : धर्म-आचरण आ सैन्य-नैतिकता
चीनी नैतिक-दार्शनिक परम्परामे ‘यी’ (righteousness/duty) एक केन्द्रीय मूल्य थिक। कन्फ्यूशियस परम्परामे ‘यी’क अर्थ थिक—कर्तव्य उचित प्रकारसँ निभाएब, भले ही ओ कठिन होइक। चीनी लोकनाट्य-महाकाव्यक सर्वप्रसिद्ध नायक ‘गुआन यू’ (Guan Yu / Guan Di) अपन ‘यी’ आचरणक लेल विख्यात छलाह—ओ अपन पराजित शत्रुकेँ सेहो सम्मान दैत छलाह।
सलहेसक यैह ‘यी’-व्यवहार नाटकमे उपस्थित अछि—“हारि क’ पड़ाइत सेना केँ खिहारनाइ अनुचित बात भेलै”। ई केवल कूटनैतिक व्यावहारिकता नहि, एक नैतिक-सैन्य आचरण-सिद्धांत थिक जे भारतीय क्षत्रिय-धर्म आ चीनी ‘यी’-परम्परा दुनूसँ समर्थित अछि। गुआन यूक सन सलहेस सेहो अपन जनसाधारणक लेल एक लोक-देवता बनि जाइत छथि—युद्धक मैदानमे नहि, जनताक हृदयमे।
४.२ हुआलियान : नाटकीय पात्र-वर्गीकरण आ रंग-प्रतीक
चीनी क्लासिकल रंगमंच (जिंगजू/बेइजिंग ओपेरा)मे ‘हुआलियान’ (painted face) पात्र-प्रकार एक विशेष भूमिका थिक—जाहिमे विभिन्न रंगक मुखाकृति पात्रक नैतिक-चारित्रिक स्वभाव सूचित करैत अछि। लाल मुख = साहस आ निष्ठा (गुआन यू); नील/हरियर = दुर्जेय शक्ति; उज्जर = खलनायक/कुटिल; कारी = बलशाली/न्यायकारी।
एहि प्रतीक-व्यवस्थाकेँ ‘कुसमा-सलहेस’क पात्र-वर्गमे अनुवाद कएल जा सकैत अछि। सलहेस = लाल हुआलियान (साहस-निष्ठा); सूचोंग = सफेद हुआलियान (कुटिल-षड्यंत्री); चूहड़मल्ल = नील (सैन्य-बल); कुसमा = ‘तान’ (नारी-भूमिका, परंतु शक्तिशाली—‘वनदेवी’); हिरामन-विपटा = ‘चोउ’ (विदूषक); दुर्गा = ‘उमेन’ (divine appearance, shénmíng)। एहि वर्गीकरणसँ नाटकक पात्र-विन्यास एक सार्वभौम नाट्य-तर्क प्रदर्शित करैत अछि।
४.३ तियानमिंग : स्वर्गीय-आदेश आ नायकक धर्म
चीनी राजनीतिक-दार्शनिक परम्परामे ‘तियानमिंग’ (Mandate of Heaven / स्वर्गीय-आदेश) एकटा महत्त्वपूर्ण अवधारणा थिक—जे शासक अपन प्रजाक कल्याण करैत अछि, ओकरा ‘तियानमिंग’ प्राप्त अछि; जे ओकरा भ्रष्ट करैत अछि, ओकर ‘तियानमिंग’ नष्ट भ’ जाइत अछि।
दुर्गाक आशीर्वाद एहि नाटकमे ‘तियानमिंग’क अनुरूप थिक—देवी सलहेसकेँ ‘मात्र लोकक सुख लेल जीवन अरपन करबाक आदेश दैत छथि। ई स्वर्गीय-आदेश सलहेसक शासन-शक्तिकेँ वैधता दैत अछि। ओइ विरुद्ध सूचोंग—जे विस्तारवादी, लोभी, प्रजा-पीड़क अछि—क ‘तियानमिंग’ हीन अछि। कुणालक नाटकमे यैह नैतिक-राजनीतिक दर्शन अंततः सलहेसकेँ ‘विजयी’ घोषित करैत अछि—शस्त्र-बलसँ नहि, नैतिक-जनशक्तिसँ।
४.४ मिनजियान : लोक-नायकक नाट्यीकरण-परम्परा
चीनी नाट्य-इतिहासमे लोक-नायकक नाट्यीकरण एक सुदीर्घ परम्परा थिक—‘मियाओ-झी-यिंग-जूंग-झुआन’ (Temple Hero Legends) जे लोक-देवताकेँ रंगमंचक नायक बनाबैत आएल अछि। सलहेस-नाचसँ एहि नाटकक सम्बन्ध ठीक एहि परम्पराक अनुरूप थिक—एक लोक-देवता (folk deity) पहिने लोक-रंगमंचक नायक बनैत अछि, तखन साहित्यिक रंगमंचक।
चीनी परम्परामे यैह संक्रमण (लोक-मन्दिर-प्रदर्शन → साहित्यिक रंगमंच) ‘गुआन यू’क लोकगाथासँ ‘रोमांस ऑफ द थ्री किंगडम्स’ आ तखन नाट्य-रूपधरबाक धरिक यात्रासँ समानांतर अछि। सलहेस-गाथाक यैह यात्रा—सलहेस-नाच → ‘कुसमा-सलहेस’ (कुणाल, २००६)—एक सांस्कृतिक जीवन-चक्रक अभिव्यक्ति थिक।
५. इजरायली नाट्य-सिद्धांत
५.१ एली रोज़िक : पशु-पात्रक रंगमंचीय प्रतिमात्मकता
एली रोज़िकक प्रतिमा-सिद्धांत (theatrical iconicity) एहि नाटकमे एक असाधारण परीक्षामे पड़ैत अछि—पशु-पात्रक प्रतिमात्मकता। ठनका (बाघ), बनका (भालु) आ हिरामन (सूग्गा) रंगमंच पर अभिनेता-शरीर द्वारा प्रस्तुत होइत छथि। रोज़िकक सिद्धांतक अनुसार, ई पात्र ‘icons’ थिकाह—ओ जे ‘देखाबैत’ छथि ओ एक काल्पनिक-पशु-जीवनक प्रतिरूप थिक, ने कि अभिनेता-शरीरक प्रतिरूप।
एहिसँ अधिक महत्त्वपूर्ण—रोज़िक कहलाह जे रंगमंच मानव-पशु सीमाकेँ लाँघबामे सक्षम अछि कारण प्रतिमा (icon) वास्तविकताक सीमासँ मुक्त होइत अछि। ठनका-बनका-हिरामनक उपस्थिति दुसाध लोक-विश्वास-दृष्टिक एक ‘animistic iconography’ थिक—एक विश्वास-दृष्टि जाहिमे मानव, पशु आ आत्मा सब एकहि नाट्य-संसारमे बराबर सत्ता रखैत छथि। ई ‘transgressive iconicity’ (सीमा-नांघैत प्रतिमात्मकता) थिक।
५.२ मिज़राही-थिएटरक समानांतर : सांस्कृतिक हाशिया पर ठाढ़ परम्पराक पुनरुद्धार
इजरायली रंगमंचमे ‘मिज़राही’ (मध्य-पूर्व/उत्तर अफ्रीकी यहूदी मूलक) सांस्कृतिक परम्परा बहुता काल धरि ‘अश्केनाज़ी’ (यूरोपीय यहूदी) प्रभुत्ववादी सांस्कृतिक मानकक कारण हाशिया पर रहल। मिज़राही थिएटर आन्दोलन (१९७०–वर्तमान) एहि हाशिया परम्पराकेँ—सेफ़ार्दी संगीत, पैतान/ज़मीरोत आदि—मुख्यधारामे अनबाक आन्दोलन थिक।
कुणालक ‘कुसमा-सलहेस’ मैथिली सन्दर्भमे ठीक एहन आन्दोलनक रूपमे देखल जा सकैत अछि। दुसाध लोक-परम्परा (सलहेस-नाच) मैथिली सांस्कृतिक पदक्रममे कात-करोटमे रहल अछि—जतय विद्यापति, चन्दा-झा, आ अभिजन-काव्य-परम्पराक प्रभुत्व रहल। कुणाल एहि कात-करोटक परम्पराकेँ विद्यापति भवन (मैथिली संस्कृतिक संस्थाक केन्द्रीय स्थल) पर लऽ जा क’ एक सांस्कृतिक-राजनीतिक दावा कएलनि।
५.३ हन्ना आरेंड्ट : ‘जन्मता’ आ सार्वजनिक कार्य
जर्मन-अमेरिकी राजनीतिक दार्शनिक हन्ना आरेंड्ट (Hannah Arendt, १९०६–1९७५) अपन ‘द ह्यूमन कंडीशन’ (The Human Condition)मे ‘नैटालिटी’ (natality, जन्मता) अवधारणा प्रस्तुत कएलनि—प्रत्येक राजनीतिक कार्य (political action) एक नवीन आरम्भ थिक, एक प्रकारका ‘जन्म’। सार्वजनिक क्षेत्र (public realm) मे ई कार्य अमर होइत अछि कारण ओकर साक्षी होइत अछि।
सलहेसक कारागार-वक्तव्य—“नहि रहता सलहेस मुदा भयमुक्त जीवनक मंत्र सँ भरल जनता रहतै”—आरेंड्टक अर्थमे एक ‘राजनीतिक कार्य’ थिक। ई वक्तव्य सूचोंगक कारागारमे कहल गेल (साक्षी : सूचोंग स्वयं), आ एहि साक्ष्यमे ई ‘अमर’ भ’ जाइत अछि—‘नैटालिटी’क एक नाट्य-क्षण। कुणाल एहि दृश्यद्वारा सलहेसकेँ लोक-देवतासँ ‘राजनीतिक कार्यकर्ता’मे रूपान्तरित करैत छथि।
५.४ शिमोन लेवी : समन्वयवादी सुमिरन आ ‘पवित्र रंगमंच’
शिमोन लेवी अपन ‘थिएटर ऑफ द सेक्रेड’ (Theatre of the Sacred) सिद्धांतमे तर्क दैत छलाह जे रंगमंच पर जखन सामुदायिक-धार्मिक मूल्यक पुनःप्रस्तुति होइत अछि, तखन ओ धार्मिक-अनुष्ठानक एक धर्मनिरपेक्ष-रूपांतरण थिक।
एहि नाटकक पूर्वरंगक सुमिरन शिमोन लेवीक सिद्धांतक एक विशेष परीक्षा प्रस्तुत करैत अछि। ई सुमिरन केवल हिन्दू धार्मिक आह्वान नहि—ओहिमे मुस्लिम पीर ‘मीरा-सुलतान’ (पश्चिम दिशाक देवता) सेहो सम्मिलित छथि। “परिनाम, नमस्ते, आदाब, गुड इवनिंग, सलाम”—ई दर्शक-सम्बोधन सभ धर्म, भाषा, वर्ग आ राष्ट्र-राज्यक सीमाकेँ एकहि साँसमे नांघि जाइत अछि। लेवीक परिप्रेक्ष्यमे ई एक ‘radical sacred’ (क्रान्तिकारी-पवित्र) रंगमंच थिक—जे विभाजक पहिचानकेँ अस्वीकार क’ एक समावेशी सामुदायिकताक स्वप्न रचैत अछि।
६. चतुर्भुज-संश्लेषण
संग्रहक शीर्षक-नाटकक रूपमे ‘कुसमा-सलहेस’ चारू नाट्य-परम्पराक समीक्षामे एकहि संग सर्वाधिक उर्वर आ सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण कृति थिक। एकर बहुआयामिता कोनो एक समीक्षा-दृष्टिसँ समाहित नहि होइत अछि।
भारतीय दृष्टि—सलहेस-नाचक स्वायत्त लोकनाट्य-व्याकरण; रस-महोत्सव (शृंगार+वीर+भक्ति+अद्भुत); सबाल्टर्न-सौन्दर्यशास्त्रक नाट्य-प्रकटीकरण; दुर्गाक आशीर्वाद = प्रेम+ज्ञान+लोक-सेवाक अभेद-घोषणा।
पाश्चात्य दृष्टि—ग्रामशीक जैविक बुद्धिजीवी; जादू-यथार्थवादक प्रामाणिक लोक-संस्करण; ब्रेख्तीय ‘इमोशनल एपिक थिएटर’; भाभाक सांस्कृतिक पहचान-प्रतिरोध।
चीनी दृष्टि—गुआन-यू-सदृश यी-नैतिकता; हुआलियान पात्र-वर्गीकरण; तियानमिंग= दुर्गाक स्वर्गीय-आदेश; मिनजियान लोक-नायक-नाट्यीकरण-परम्परा।
इजरायली दृष्टि—रोज़िकक transgressive animistic iconicity; मिज़राही थिएटरक सांस्कृतिक समानांतर; आरेंड्टक नैटालिटी (कारागार-वक्तव्य = राजनीतिक जन्म); लेवीक radical sacred सुमिरन।
चारू परम्पराक साझा निष्कर्ष—ई नाटक एक ‘सांस्कृतिक न्याय’ (cultural justice)क कार्य थिक। दुसाध सलहेसकेँ मैथिली साहित्य-मंचक केन्द्रमे आनब; लोकनाट्यकेँ साहित्यिक नाटकक आधार बनाएब; प्रेम आ जन-सेवाकेँ एक अभेद तत्त्व घोषित करब—ई तीनू कार्य एकहि संग भारतीय, पाश्चात्य, चीनी आ इजरायली नाट्य-चिन्तनक मानदण्डमे ‘उत्कृष्ट’ आ ‘आवश्यक’ सिद्ध होइत अछि।
नाटककेँ सम्पूर्ण करएवला अंतिम टेक—“प्रेम सत्य छै, प्रेम छै सौरभ, प्रेमक भाव चिरंतन / बिनु मकरंदक कुसुम हो तहिना, प्रेम बिना की जीवन”—एहि सभक व्याख्या अतीतमे जाइत अछि। ई वाक्य समग्र संग्रहक आत्मा-घोषणा थिक।
अगिला अंकमे : प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय!
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।

Suggested citation: गजेन्द्र ठाकुर. “मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-५): कुणाल-कृत कुसमा-सलहेस.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 445, 2026-07-01. https://www.videha.co.in/research/2026/445/मैथिली-नाट्यमंच-नाटक-लेल-एकटा-समीक्षा-सिद्धान्त-भाग-५-कुणाल-5aa06902a7.htm

मूल विदेह अंक / Original issue