विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२५

हितनाथ झा · 2026-07-15 · अंक 446 · पृष्ठ 94–98

हितनाथ झा- मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२५
हितनाथ झा
(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)
स्वास्थ्य प्रभात
'प्रभात'मे धार्मिक, सामाजिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक विषयक अतिरिक्त स्वास्थ्य विषयक आलेख सेहो रहैत छल। समाचार खण्डमे ग्रामीण एवं पड़ोसक गाममे दवाइक वितरण कैल जाइत छल, से अनेक अंकक समाचारमे अछि। ओ समाचार सभ पूर्वमे प्रकाशित अछि। ओहि समयमे स्वास्थ्य- सुविधाक हेतु अस्पताल अत्यल्प छल। आर्थिक अभाव सेहो छल। शिक्षाक सेहो कमी छल। क्षयरोग, गोटी, मलेरिया आदि रोगसँ प्रत्येक गाममे अत्यधिक मनुष्यक मृत्यु होइत छल। प्रत्येक लोककेँ भगवान-भगवतीए पर भरोस रहैत छल। प्रभात इएह सोचि क' प्रायः 'स्वास्थ्य प्रभात' स्तम्भ निकालैत छल। निरोगक रहबाक उपाय आ दबाइक सेहो अनेक अंकमे विभिन्न लेखक द्वारा अछि। एहि अंकमे प्रस्तुत अछि - श्री विद्यानन्द झा लिखित स्वास्थ्य निबन्ध आ तारानाथ झा लिखित 'गोटीक प्रकोप'। साहित्यिक आलेखसँ बेसी अन्यान्य विषयक आलेख अछि 'प्रभात'मे। समाजक ध्यान रखैत, समाजक लेल कतेक उपयोगी हैत, एहिपर विशेष दृष्टि रहैत छलैक। अग्रिम खण्ड मे आन कोनो विषयक आलेख प्रस्तुत करब।
स्वास्थ्य प्रभात
लेखक: श्री विद्यानन्द झा, कोइलख।
स्वास्थ्य ईश्वरीय दान थीक।अस्वस्थ मनुष्य काँ अतुल सम्पत्ति-अगाध विद्या-ओ दुर्दम्य शक्ति सभ प्रायः व्यर्थे बुझना जाइत छैन। अतएव निरोग ओ तंदुरुस्त शरीर पे मनुष्य काँ अत्यावश्यकीय ताहिमे संदेह नहि। आब ई प्रश्न अबैत अछि जे शरीर स्वस्थ कोना रहि सकैत अछि।सुपच भोजन, स्वच्छजल, निर्मल वायु और परिमित व्यायाम शरीर काँ तंदुरुस्त रखबामे परमावश्यक। हमरालोकनि काँ ई देखक चाही जे खाद्य पदार्थ पवित्र ओ उत्तम हो तथा पूर्ण सिद्ध हो। असिद्ध ओ अपवित्र भोजन सँ नाना प्रकारक व्याधिक यथा 'विशुचिका' इत्यादिक उत्पन्न होइछ। काँच वा अति घूलल ओ वासि फल खायब सर्वथा निषिद्ध। बाजारमे ताजा वस्तु देखि किनक थीक।
द्वितीय आवश्यक स्वच्छ जल थीक। हमरालोकनि काँ ध्यान देबाक चाही जे जाहि कूप वा इनारक जल पिबैत होइ ओ गन्दा नहि रहै। इनारमे पात ओ कूड़ा इत्यादि नहि खसै। गर्मी ऋतुमे एक बेरि इनारक पानि उपछबा क' फेकि, ओहिमे परिमित चून ओ परमेगनेट पोटास देवाक चाही। जाहिसँ एहि प्रक्रिया द्वारा जल शुद्ध करक सम्भव नहि हो तँ जल काँ उत्तमरीत्या औंट क' पीबाक चाही।
विशुद्ध वायु सर्वथा प्रयोजनीय। वासस्थलक चतुर्दिश गाछ रहक चाही जाहिसँ दूषित वायु नष्ट भय शुद्ध वायु सर्वदा सुलभ हो। घरमे खिड़की वा जंगला पूर्ण रहै जाहिसँ घरमे शुद्ध वायु सतत अबैत रहय। खुला वायुक सेवन सुलभ हो।
परिमित व्यायाम यथा फुटबॉल, क्रिकेट, टेनिस ओ कबड्डी इत्यादिक खेल दैनिक आवश्यक। एहि खेलमे अवस्थासँ कोनो विशेष सम्बन्ध नहि छैक, मनुष्यक प्रत्येक अवस्थामे व्यायाम करब आवश्यक। जनिका उपरोक्त व्यायाम सुलभ नहि होइन ओ कुस्ती, दण्ड, बैसकी, दौड़ब, कूदब ओ टहलबाक अभ्यास कय सकै छथि। व्यायाम बिना मनुष्यक शारीरिक ओ मानसिक उभय उन्नति असम्भव।
एतदरिक्त शरीर काँ स्वस्थ रखबाक हेतु शरीर ओ वसनक स्वच्छतहु पर पूर्ण ध्यान देवाक थीक।
अन्तमे ई कहक पड़ै अछि एहि बिना स्वस्थ शरीर के मनुष्य केर उन्नति होयब असम्भव ओ बिना उपरोक्त विषय सभक अवलम्बन कयने शरीर तंदुरुस्त नहि भय सकैछ।
खेदक विषय थीक जे मिथिलामे पाँच प्रतिशतो व्यक्ति एहि नियम सभक पालनक चर्चा कोन जे जनितहु टा नहि छथि और यैह कारण थीक जे मैथिलक सर्वथा अवनति भय रहल छैन।
'गोटी'क प्रकोप
तारानाथ झा, कोइलख।
एहि वर्ष दरभंगा जिलान्तर्गत गोटीक प्रकोप बहुत जोर-शोर अछि। प्रायः हजारो आदमी केँ एहि दुख सँ ग्रसित कय विकराल काल निज गालमे प्रवेश कय चुकलैन्हि अछि। तथापि आबहु तक सन्तोष नहि भेलैक अछि, यदि किछुओ दिन तक और अपन स्वरूप एहि प्रकारक देखाओत त' सभ केँ बुझक चाही जे आब हमरालोकनि केँ भव सागर पार उतरवामे बेशी विलम्ब नहि अछि। देशमे कतहु आफत आसमानी होइ छैक, कोइलख अयबामे कनेको विलम्ब नहि होइ छैक। एहिना स्थितिमे ई त' प्रान्तव्यापी अछि। तखन कोइलख एहिसँ मुक्त कोना रहि सकै अछि? करीब एक-डेढ़ मास सँ एकर उपद्रव कोइलख मध्य जोर-शोरसँ भय रहल अछि। सैकड़ो आदमी एकर भोग कय चुकलाह अछि, तथा सम्प्रति कय रहलाह अछि।
जहाँ तक पता लगैछ जे 3-4 पछबारि टोलमे तथा 10-15 पुबारि टोलमे एहि दुखसँ ग्रसित भय सदाक हेतु एहि संसारसँ विदा भय गेलाह अछि। एक-एक घरमे तीन-तीन व्यक्ति केँ मृत्यु भय गेला सँ सभ केओ अनुभव कय सकै छी जे ओहि घरक की अवस्था होयतैक। छोट-छोट बच्चा केँ असह्य-वेदना देखि ककर एहन कठोर हृदय होयतैक, जे नहि पिघलतैक तथा नेत्रसँ अश्रुपात नहि होयतैक। श्री 108 भद्रकाली जगन्माता थिकथि। मायकेँ अपन सन्तानक ऊपर दयो होइत विलम्ब नहि होइ छैक। अतः सभकेँ उचित थीक जे जगन्माता श्री 108 भद्रकाली केँ येनकेनोपायेन मनाबी तखन अवश्य खुशी होइतीह, तदनन्तर ककरो नाम मात्रो क्लेश नहि रहत।
(प्रभात वर्ष-01, अंक: 06, जून 1933ई.)
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Suggested citation: हितनाथ झा. “मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान-२५.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 446, pp. 94–98, 2026-07-15. https://www.videha.co.in/research/2026/446/मैथिली-साहित्यमे-तारानाथ-झा-एवं-हुनक-परिवारक-योगदान-२५.htm

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