बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ स्वतंत्रता सेनानी छलाह, हिंदी ओ मैथिलीक लेखक छलाह। विदेह एहिठाम पहिल खंडमे हुनक हिंदी रचना एवं हुनकापर लीखल गेल हिंदी रचना प्रस्तुत कऽ रहल अछि। बादक खंड सभमे स्वतंत्रता संग्राममे हुनक भूमिका, मैथिली रचना आदि प्रस्तुत कएल जाएत।
कोसी तीर के दिनकर : बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’
-- हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ’
कोसी अंचल में गुणसम्पन्न लोगों की कभी कमी नहीं रही। किन्तु, विभिन्न गुणों का जैसा समन्वय बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ में था, वह दुर्लभ है। क्रांतिकारी स्वतंत्रताकामी, राजनेता, समाजसेवी, साहित्यकार, पत्रकार, किसान, व्यवसायी के अतिरिक्त भी जीवन के अनेकानेक ऐसे रंग थे, जो विप्लव जी के अतिविराट आलोकपुंज व्यक्तित्व में समाहित होकर बहुरंगी छटा बिखेरा करते थे और उनका ‘विप्लव’ उपनाम उनके सम्पूर्ण जीवन-दर्शन का प्रतिबिंब बन गया था।
सन 1918 ई को सुपौल के मुनिलाल ठाकुर के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में उनका जन्म हुआ। इनकी शिक्षा-दीक्षा स्नातक स्तर तक हुई। इन्होंने फार्मासिस्ट में भी डिग्री प्राप्त की।
बचपन से ही वे समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे तथा सामाजिक समरसता एवं सर्वधर्म-समभाव के संरक्षक एवं मानवीय नैतिकता व आत्मसम्मान के कट्टर पैरोकार थे। इस कारण प्रायः अपने सभी समकालीनों से उनकी सैद्धांतिक टकराहट होती रही। जहां एक तरफ वे समाज के अलम्बरदारों की क्षुद्र मानसिकता पर निरन्तर हमला करते रहे, वहीं दीन-हीन, सीधे-सादे लोगों पर उनके आश्रय का क्षत्र तना रहा। दलगत रूप से उनका जुड़ाव कांग्रेस के साथ रहा, किन्तु गुटबाजी, जातिवाद और वर्चस्ववाद को चुनौती देने के लिए वे कांग्रेस के खिलाफ विधान सभा चुनाव (1969) लड़ने से भी नहीं हिचके। क्षेत्रीय विकास के लिए दलों की दीवार तोड़ने का एक अपूर्व प्रयास उन्होंने किया, जब उनकी अध्यक्षता में सात विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को सम्मिलित कर संयुक्त समन्वय समिति का सफलतापूर्वक गठन और संचालन किया गया।
विप्लव जी ने राष्ट्रीय आन्दोलन में छात्र जीवन से भाग लेना आरम्भ कर दिया था। ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में तो वे पूर्ण सक्रिय रहे तथा कलाली पर पिकेटिंग करने के क्रम में पुलिस की लाठियां भी खाई। उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ सुपौल रेलवे स्टेशन पर धावा बोल कर स्टेशन के कागजातों को जलाया, रेल पटरी को उखाड़ा तथा सुपौल कोर्ट पर तिरंगा लहरा दिया। इसके चलते ब्रिटिश सरकार ने डी आई आर के तहत इन्हें उद्घोषित अपराधी चिह्नित कर दिया। फरारी अवधि मे पुलिस ने उनके मकान पर कई बार हमला किया, परिजनों को मारा पीटा और धन-सम्पत्ति को जला कर नष्ट कर दिया।
ये ‘अगस्त क्रांति’ में 2 सितम्बर, 1942 से 3 मार्च, 1945 तक भूमिगत रहे। इस क्रम में ‘आजाद दस्ता’ के बिहार प्रान्तीय प्रभारी चित्र नारायण शर्मा के साथ नेपाल गये, जहां ‘आजाद दस्ता’ का मुख्यालय एवं उसके बेतार केन्द्र थे। इस दौरान जेल गये साथियों के परिवार को मदद करना, सियाराम दल के क्रान्तिकारी पर्चों को गांव-गांव बांटना और क्रान्तिकारियों के बीच संवाद माध्यम बनना आदि कार्य उनके जिम्मे था। इसका सम्पादन वे कुशलतापूर्वक करते रहे। सियाराम सिंह, जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अम्बिका सिंह ‘दादा’, शैलेश मिश्र, शिवनन्दन झा, वेदानन्द झा, जटाशंकर चौधरी, लखन लाल मिश्र आदि के सम्पर्क में ये दीर्घकाल तक रहे। इन्होंने ‘करिहो’ महन्थ के यहां से डा लोहिया को गुप्त रूप से निकाल कर परसरमा होते हुए कलकत्ता भेजने की व्यवस्था की थी।
भारत सेवक समाज, नागरिक परिषद एवं ग्राम स्वराज्य संगठन के पदाधिकारी के रूप में कोसी तटबन्ध के निर्माण हेतु श्रमदानियों का जत्था तैयार करने, राष्ट्रीय सार्वजनिक मेला समिति एवं कृषि उत्पादन बाजार समिति की स्थापना हेतु अपनी जमीन देने एवं अन्यों से दिलाने, बी एस एस कालेज, सुपौल एवं आई टी आई की स्थापना हेतु गांव-गांव घूम कर चन्दा इकट्ठा करने में उनकी तत्परता, लगनशीलता और उदारता की प्रशंसा उनके विरोधी भी किया करते थे। सहरसा जिला परामर्षदात्री समिति, लोक शिकायत एवं निगरानी समिति, बाढ राहत समिति आदि के गैर-सरकारी सदस्य एवं बीस सूत्री कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति के अध्यक्ष के रूप में उनकी प्रशासनिक क्षमता एवं सूझबूझ के कायल वरिष्ठ प्रशासनिक पदाधिकारीगण उनकी बातों को ससम्मान सुनते तथा तद्नुसार कार्य करते। बलेन्द्र बाबू व्यापार संघ, सुपौल के संस्थापक, पब्लिक लायब्रेरी एण्ड क्लब के आजीवन सदस्य तथा सहरसा जिला पुस्तक व्यवसायी संघ के अध्यक्ष रहे। सुपौल अधिसूचित क्षेत्र समिति को नगरपालिका बनाने एवं भारत सेवक समाज की ओर से जिले के विकास पर सम्मेलन आयोजित करने में उनकी महती भूमिका रही। राष्ट्रीय कार्यक्रमों एवं सार्वजनिक आयोजनों में उनकी संगठन क्षमता, अकाट्य तर्क, प्रांजल भाषा, संप्रेषणीय शैली से युक्त भाषण से श्रोतागण अभिभूत हो जाया करते थे।
विप्लव जी को कृषि एवं बागवानी से बेहद प्रेम था। इस क्षेत्र में एक वैज्ञानिक अनुसंधानकर्ता जैसी उनकी प्रयोगधर्मिता अनुकरणीय थी। अनेक किसानों ने उनसे प्रेरणा ग्रहण की। ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर प्रातः भ्रमण उनकी दिनचर्या थी। पशुपालन उनका शौक था। 1968 में उनके राजनीतिक चिन्तन की पुस्तिका ‘लोकतांत्रिक समाजवाद’ प्रकाशित और चर्चित हुई थी।
हिन्दी, मैथिली के कवि-कथाकार, लेखकार के रूप में जहां विप्लव जी की प्रगतिशीलता, राष्ट्रीयता एवं क्रान्तिधर्मिता के दर्शन होते थे, वहीं ‘विश्वमित्र’, नवराष्ट्र’, ‘प्रदीप’ आदि के संवाददाता एवं कई स्थानीय पत्रों के सम्पादक के रूप में उनकी निर्भीक पत्रकारिता की धार से कुपात्रों के दिल दहलते रहते थे। सम्पूर्ण कोसी क्षेत्र में कोई ऐसी साहित्यिक गतिविधि नहीं हुई, जिस में कवि, वक्ता, आयोजक, संचालक या सूत्रधार के रूप में उनकी सहभागिता न रही हो। हिन्दी साहित्य सम्मेलन, मैथिली साहित्य परिषद की स्थापना हो या तुलसी, निराला, दिनकर या चन्दा झा की जयन्ती हो, इसमे विप्लव जी की उपस्थिति की अनिवार्यता होती थी। 1933 ई से इनकी लेखनी इन के मृत्यु पर्यन्त तक अनवरत चलती रही।
“ प्रत्येक राजनीतिक दल किसी न किसी लेखक को अपना मानता है।दल के आग्रह में पड़ कर वैसे लेखक भी सम्पूर्ण सत्य बोलने से चूक जाया करते हैं। साहित्यिक जिस प्रकार सर्वतंत्र स्वतंत्र हो कर बोलना चाहता है, वह स्वतंत्रता किसी भी राजनीतिक दल को हमेशा अनुकूल नहीं बैठती। यदि राजनीति का सर्वथा त्याग किया जाय तो साहित्य के हाथ से एक कारगर यंत्र छूट जाता है। रास्ता एक ही है कि साहित्यकार राजनीति में जाने पर भी दल से मतभेद होने पर अपनी ही बात कहें। ‘तन सौंपे मन दे नहीं, सती कहावे सोय’। “ – ( साहित्यमुखी, पृष्ठ संख्या 27 )
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की यह पंक्तियां थोड़े में ही न केवल प्रश्न को सामने रखती हैं बल्कि उस प्रश्न के भीतर के असली संकट को भी उतने ही सीधे से उपस्थित करती हैं। संकट से निकलने का मार्ग भी बताया है। ‘विप्लव जी’ के काव्य के अनुशीलन में हम इन तथ्यों को सामने रखेंगे।
कहना नहीं होगा कि कवि रचनाकार साहित्य की इयत्ता के एक अलग स्तर के हिमायती होते हैं। इन के अनुसार ऐसा हो सकता है कि कोई राजनीतिक विचारधारा या नेतृत्व अपनी सीमाओं से टकरा जाय, या अपना अंत पा जाय। लेकिन साहित्य, इस के विपरीत, एक गतिशील सामाजिक ऊर्जा है जिस का प्रवाह समान रूप से अन्तहीन एवं अविछिन्न है ; साहित्य स्वयं क्रान्ति की चेतना की शब्दबद्ध अभिव्यक्ति है। इस तरह ये अपने को क्रान्ति से जन्मतः जुड़ा हुआ मानते हैं।
इस का तात्पर्य यह है कि जो कविता युग-चरित्र का प्रतिनिधित्व करती है तथा इस से कहीं आगे उस की क्रान्तिकारी संभावनाओं एवं सार्थक परिवर्तनों को रेखांकित करती हुई उसे रास्ता देती है, वही एक सही कविता कही जाएगी। कविता अपने-आप में गतिशील युग-चेतना का प्रथम शब्द-विस्फोट होती है। वह युग-चेतना को अपने भीतर जितना धारण करती है, उतना ही उसे प्रभावित करती, आगे ढकेलती भी है। कविता में यह गतिशीलता जितनी अधिक होगी, उस की प्रभावकारी क्षमता भी उतनी ही सिद्ध, विकसित, वैज्ञानिक और कारगर होगी। इस लिए जहां तक कविता या सही कविता के नये प्रतिमानों की आवश्यकता, उस की तलाश या उस के प्रयोग का प्रश्न है, मेरे विचार में उन्हें कविता, जीवन और युग-चेतना के इन्हीं गतिशील तत्वों में ढूंढा, पाया जा सकता है। आइए, हम इन तत्वों की खोज करें।
कोसी अंचल के छायावादोत्तर कवियों में ‘विप्लव जी’ की गणना ससम्मान होती है। इस युग में राष्ट्रीयता-बोधक गीत पर्याप्त लिखे गये। छायावादोत्तर युग कई प्रयोगों के लिए भी चर्चित रहा। इस अवधि में गीतों को कविता के समानान्तर नई दिशा देने का प्रयास आरम्भ हुआ। अनेक चर्चित कवियों ने गीतों के क्षेत्र में कतिपय प्रयोग भी किए। फिर प्रयोगवाद का दौर शुरू हुआ। किन्तु, इन प्रयोगवादी गीतकारों के नवीन प्रयोगों के बावजूद गीतों में रूप-विन्यास की नीरसता को मिटाया नहीं जा सका। इस के बाद हिन्दी साहित्य मंच पर ‘नयी कविता’ का उदय हुआ और इसी ‘नयी कविता’ के तर्ज पर ‘नयी कहानी’, ‘नव गीत’ आदि का आन्दोलन शुरू हुआ। इस के पूर्व बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की ‘उर्मिला’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ‘रेणुका’ और गोपाल दास ‘नीरज’ के गीत संकलन प्रकाशित हो चुके थे जिन में परम्परा निर्वाह के साथ राष्ट्रीय भावनाओं एवं समकालीन बोध को भी पर्याप्त अभिव्यक्ति मिली है।
स्वतंत्रता के बाद गीत-काव्य का विकास वस्तुतः ‘नवगीत’ से हुआ, जिस के ध्वजवाहक कवियों में राजेन्द्र प्रसाद सिंह, शंभुनाथ सिंह, केदारनाथ सिंह, रामनरेश पाठक, ओम प्रभाकर, गोपीवल्लभ सहाय, सत्यनारायण, गुलाब खंडेलवाल, राजेन्द्र किशोर, शलभ श्रीराम सिंह आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। कोसी अंचल के कवि ‘विप्लव’ भी इसी समकालीन नवगीतकारों की पंक्ति में ससम्मान अपना स्थान बना लेते हैं। वे मूल रूप से गीतकार थे। उन्होंने विविध प्रकार के गीतों की रचना की।
उन के गीत मात्र वैयक्तिकता ही नहीं ,समाज, संस्कृति और राजनीति तक भी विस्तार पाते हैं। वैसे अब तक भाव-प्रधान गीतों को ही गीत-काव्य के रूप में चिह्नित किया जाता रहा है, किन्तु गेय कविता भी गीत हैं। अतः ‘विप्लव’ के गीत इन पारिभाषिक तथ्यों से अलग नहीं किए जा सकते। भाषा, भाव, उक्ति-वैचित्र्य, रस-व्यंजना, बिंब, वाह्य एवं आंतरिक संसार का चित्रण, संवेदना, उद्भावना, दुख-दर्द, संत्रास और मानवीय संबंधों को अभिव्यक्ति देने में पूर्ण सक्षम हैं – ‘विप्लव’ के गीत। यही कारण है कि इन के गीत इन सारे तत्वों के समुच्चय हैं।
जीवन की अनुभूतियां ही काव्यानुभूतियां हैं। नवगीत के प्रखर गीतकार राजेन्द्र प्रसाद सिंह के शब्दों में – ‘व्यक्तिगत स्वभाव, परिवेशगत प्रभाव और परम्परागत मान्यताओं के अन्तर्द्वन्द्व से अनुभूति की प्रक्रिया में बहता हुआ हृदय जिस मार्मिक समग्रता को संजोते रहता है, उस का आत्मीयतापूर्ण स्वीकार ही गीत का उद्गम है।‘ छायावादोत्तर काल के इस कवि ने विश्वयुद्ध की विभीषिका, परतंत्र देश, समाज में व्याप्त शोषण, आर्थिक विषमता, सामन्तवादी प्रवृतियां आदि को बहुत निकट से देखा है। जो कुछ देखा, अनुभव किया, उसे बड़े ही निश्छल भाव से कोरे कागज पर उतार दिया, वही ‘विप्लव’ की कविता है – कालजयी कविता। वे जीवन, जगत, सौन्दर्य, प्रेम और मानवीय संबंधों के साथ ही भारतीय चिन्तन और संस्कृति पर अधिक केन्द्रित हुए। उन के गीतों के सम्यक अनुशीलन के लिए उन्हें निम्नलिखित खण्डों में विभक्त किया जा सकता है –
प्रणय गीत :
गीले स्वर मेरे नयनों में आंसू भर-भर आये
मेरी स्मृति में आ-आ कर मुझे अतीत रुलाये।
जीवन के वे दिन थे कैसे जब सुमनों की कलियां
झूम-झूम कर मुझे बुलाती थी करती रंगरलियां
नहीं कभी भी सुन पाया था है पतझड़ भी आता
केवल याद दिलाने के हित ही बसंत रह जाता
समझ न पाया कैसे बीती जीवन की वे घड़ियां
अब तो आंखें पिरो रही बस अश्रु कणों की लड़ियां
अब हैं दिन बांकी रोने के गीले नयनों, रो लो
साक्षी कौन तुम्हारा होगा अन्तर्तम को धो लो
उद्बोधन गीत :
साथियों, तुम रो रहे क्यों?
कौन है उसका सहारा
कर्म को जिसने बिसारा
सत्य है संसार ही यह
तुम अकर्मठ हो रहे क्यों?
है नहीं कोई विधाता
जो निठल्लों को खिलाता
आस की गठरी उठाये
मार्ग में तुम ढो रहे क्यों?
साथियों, तुम रो रहे क्यों?
पर्व गीत :
धूम मचाती होली आयी।
हरित-भरित पल्लवित धरातल
सज्जित वर बसंत ॠतु निर्मल
अरुण अधर परिधान हरित ले
कलियों की हमजोली आयी
धूम मचाती होली आयी।
जग को सौरभ-पान कराते
अधरों पर मुस्कान दिलाते
लाल पराग मेलते मुख पर
तरुण सुमन की टोली आयी
धूम मचाती होली आयी।
मुरझे भी खिल उठे रंग में
सरस गीत गाते उमंग में
मदहोशों ने पूर्व गमन के
आज भंग की गोली खायी
धूम मचाती होली आयी।
राष्ट्रीय गीत :
चले सींचने आज रक्त से हिमगिरि को मतवाले माली
चली सूरमाओं की टोली आज खेलने रक्तिम होली
लगा शुभ्र मस्तक पर रोली
बांध कमर में खंजर-गोली
हंस कर चले चढाने साकल
आज शीश की भेंट निराली
पद्मिनियां चल पड़ी समर में
आग लगाने को अंबर में
न्योछावर कर सारे गहने
चढा भेंट भाई को बहने
निकली आज भवानी घर से बन कर रणचण्डी मतवाली
जनता ने करवाल संभाली-----
आध्यात्मिक गीत :
बन्दी शुक
लौह पिंजर में फसा शुक है विकल हो छटपटाता
कौन जाने किस व्यथा से विश्वपति की रट लगाता?
इस दुखद बंदी-दशा में भी दुखद क्यों राग गाता?
कौन सा अपराध रे जिस के लिए वह दण्ड पाता?
क्या इसी के हेतु ही वह है जगत में जन्म पाता?
उड़ निकलने को सदा ही पंख को वह फड़फड़ाता
लौह पिंजर में फसा शुक है विकल हो छटपटाता।
एवं
महानाश का समर छिड़ा है
धन जन का यह खेला
उठ जावेगा कुछ दिवसों में
दुनियां से यह मेला
ईश्वर की इस रची सृष्टि में यह कैसा है अन्तर
मानव पर मानव का होता क्यों अन्याय निरन्तर
प्रकृति गीत :
परम मनोहर समय आज का था बसंत का प्रात
थी तरंग मालायें लहराती समीर के साथ
जहां तहां वे करती थी विचरण हो कर स्वच्छंद
गले-गले मिल आज परस्पर लेती थी आनंद
एवं
सावन घन आओ
तृषित धरा तल,
नव दुर्वादल
चातक चंचल
मानव विह्वल
नभ मंडल में छाओ
बरसो प्रतिपल
भर दो भूतल
फिर सरिता जल
कर दो कल-कल
अधिक नहीं तरसाओ
पी कर श्यामल
क्लिष्ट हलाहल
कर दो कोमल
सारे जल-थल
सुधावारि बरसाओ
वसुधा अंचल
कर दो शीतल
वर दो केवल
उज्ज्वल निर्मल
अविकल सब हो जाओ
आओ, सावन घन आओ
शोक गीत :
जननी के सूखे अधरों पर सींचे है शोणित की लाली
कहां गये वे हमें छोड़ कर उजड़े हुए चमन के माली
पल भर भी नहीं रुके आग में थे जो अपने कदम बढाये
माता के चरणों पर जिनने हंस-हंस अपने शीश चढाये
आज याद कर उन पगलों की मां के मुख पर हास नहीं है
शोक-दिवस है आज हमारा, मोद नहीं, उल्लास नहीं है
प्रगति गीत :
इस सुराज में हम घिसते हैं
हम पिसते हैं
दो बैलों के संग रात-दिन
गर्मी जाड़ों में खटते हैं
और मशीनों के धड़धड़ में
कान हमारा ही फटता है
देह हमारी ही जलती है
और इधर हम देख रहे हैं
एक ओर मुट्ठी भर साहब
खस की टट्टी में बैठे हैं
उस ठंढी में और इधर
मेरे इस तन में आग लगी है
तभी सोचता हूं मैं मन में
मेरे वह भगवान कहां हैं
ईसा और रहमान कहां हैं
और उनका यह इंसान कहां है?
कवि ‘विप्लव’ की काव्य-भाषा के तत्त्व का सम्यक विश्लेषण आधुनिक समीक्षकों द्वारा प्रमुख रूप से होना चाहिए था, क्योंकि काव्य-भाषा का प्रयोग, व्याख्या और निर्णय के लिए एक सुनिश्चित और तटस्थ आधार हो सकता है, जिस में समीक्षक के अपने पूर्वाग्रह और व्यक्तिगत रूचि के अनपेक्षित तत्त्व कम से कम मात्रा में रह जाते हैं। रचना की उत्कृष्टता की यह कसौटी सबसे अधिक विश्वसनीय है। ‘विप्लव’ की कविता गेय है, किन्तु अलंकारों से बोझिल नहीं। अलंकारों की उपयोगिता वह अस्वीकार कर चुकी है। काव्य-भाषा का प्रतिमान शेष रह गया है, क्योंकि कविता के गठन में भाषा-प्रयोग की मूल और केन्द्रीय स्थिति है – ‘ कविता उत्कृष्टतम शब्दों का उत्कृष्टतम क्रम है।‘ भाषा के वैचारिक एवं संवेद्य रूपों में यह संवेद्य संवेदना या अनुभूतियों की वाहिनी है। संवेदना की वाहिका या संवेदनात्मक भाषा का एक रूप लयात्मक होता है। भाषा का यही संवेदनात्मक या लयात्मक रूप काव्य-भाषा है। काव्य-भाषा में लय का होना अपरिहार्य है, अनिवार्य है। लय शब्दों का नर्तन है। सुकवि ‘विप्लव’ का सम्पूर्ण काव्य इस कसौटी पर खड़ा उतरता है। उसके शब्द-विन्यास या वर्णों का उच्चारण एक नियमित गति में होता है, जिस से उस में एक विलक्षण और विशेष प्रकार के आकर्षण आ जाते हैं। अतः उनकी सम्प्रेषण शक्ति बढ जाती है। लय के इस रूप और महत्व को हम ‘अतीत’ शीर्षक कविता में देख सकते हैं –
गीले स्वर मेरे नयनों में आंसू भर-भर आये
मेरी स्मृति में आ-आ कर मुझे अतीत रुलाये……
इसकी दूसरी बानगी ‘सावन घन आओ’ शीर्षक कविता में भी देखी जा सकती है –
तृषित धरातल
नव दुर्वादल
चातक चंचल
मानव विह्वल
नभ मंडल में छाओ…..
गीत में गान-तत्त्व अनिवार्य है। लय एवं सांगीतिकता के कारण गीत कविता से अधिक प्रभावोत्पादक सिद्ध होता है। कविता के समान गीत में भी लय का विशिष्ट स्थान होता है। छंद में लय गति प्रधान होता है, जबकि संगीत में लय स्वर प्रधान होता है। कवि ‘विप्लव’ के सारे गीत लयात्मक हैं और लय संगीतात्मक। उन्होंने ढेर सारे गीत लिखे हैं – सभी संगीत की कसौटी पर कसे हुए हैं। उनकी कविता और गीत का मूल आधार है – लय। इस लय और गति का जो व्यवस्थित और निश्चित नियमबद्ध स्वरूप है – वही सुकवि ‘विप्लव के छंद’ हैं। इनके छंदों की विशेषता यह है कि वे संगीत की व्यापक लहरियों की सृष्टि करते हुए भाव को शब्दों के द्वारा रूपायित करते हैं, जिस के कारण वे सहज ही में स्मरणीय बन जाते हैं।
कवि ‘विप्लव’ के सम्पूर्ण काल-खण्ड के काव्य के तीन आयाम मुख्य रूप से सामने आते हैं – 1. राष्ट्रीयता एवं सामाजिकता 2. प्रेम और सौन्दर्य 3. आध्यात्मिकता।
इन सभी आयामों का विकास सहज एवं स्वाभाविक है। चीनी आक्रमण के बाद इन की राष्ट्रीय भाव-धारा की अनेक कविताएं मिलती हैं। इन का राष्ट्र-बोध एक मोर्चे पर खड़े सैनिक का राष्ट्र-बोध है –
आज राष्ट्र को न कोई स्वांग चाहिए
देश के जवान को तवांग* चाहिए
(*उस समय ‘तवांग’ शहर पर चीनीयों ने कब्जा कर लिया था)
शांतिदूत! शांति है जवान मांगती
देख आंख खोल रक्तदान मांगती
मांगने से क्या किसी को शांति मिली है
शांति की पुकार पर तो भ्रांति मिली है
कर्णधार! व्यर्थ आज शांति का नारा
भारत के नौजवान तुझे मां ने पुकारा
कह दो कि रे, लद्दाख क्या तिब्बत है हमारा
हर्ष औ कनिष्क को क्या तुम ने बिसारा
भूलते हो ह्वेनसांग, फाहियांग को
रे कृतघ्न, धर्म-बुद्ध वर्द्धमान को
निश्चय ही डूब के रहेगा तेरा सितारा
भारत के नौजवान तुझे मां ने पुकारा…..
स्वाधीन कलम वाले कवि ‘विप्लव’ की राष्ट्रीय कविता शौर्य और ऊर्जा से भरी हुई है। इन राष्ट्रीय कविताओं में जागरण, उद्बोधन एवं समय-सन्दर्भ तथा जीवन-संवाद है। चीन के विश्वासघात ने भारत के कवियों को भी आक्रोश से भर दिया था। दिनकर, नेपाली आदि महाकवियों ने कई कालजयी रचनायें लिखी । उन्हें लगने लगा कि शांति और अहिंसा के उपदेश से राष्ट्र की रक्षा नहीं हो सकती। शत्रुओं को उपदेश से नहीं, अस्त्र-शस्त्रों से पराजित करना होगा। ‘विप्लव’ जी की ये कवितायें अपने-आप में एक अस्त्र हैं, जिन में शत्रुओं को पराभूत कर देने की क्षमता है और शोषण-चक्र को ध्वस्त कर देने की शक्ति है। कवि देश की रक्षा के लिए धर्म और जाति से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है। कवि की राष्ट्रीय चेतना का यह परिपक्व और प्रखर रूप मिलता है।
विप्लव जी के अनेक आलेख एवं कहानियां तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही थी। वे बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार थे, सधे गीतकार थे।
उनका जीवन दर्शन रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, लक्ष्मीनाथ गोसांई और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित था। वे धर्म को व्यापक और वास्तविक अर्थ में देखते थे। ऐसा ज्ञात होता है कि उन्होंने अनेक प्रमुख धर्मग्रंथों का अध्ययण किया है और उस के आधार पर उन में मौलिक एकता को देखने का प्रयास किया है। उन की दैनन्दिनी (डायरी) में उनके विचार आईने की तरह स्पष्ट होते हैं। वह स्वयं में उन के जीवन दर्शन का जीवन्त अभिलेख है। वे सर्वधर्म-समभाव के सिद्धान्त का जीवन भर निर्वाह करते रहे। वे हिन्दी के प्रति पूर्ण समर्पित थे। राजनीति में रह कर भी उन्होंने साहित्य कर्म को राजनीति से स्पर्श तक नहीं होने दिया। बाद में तो राजनीति को वे एक भार समझने लगे थे। उन्होंने अपने विचार को इस प्रकार व्यक्त किया है। उन की डायरी के पृष्ठों की कुछ बानगी देखें –
“राजनीति की यही दुर्गति देख कर समय-समय पर भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार मन में आते रहते हैं। कभी इच्छा होती है कि क्यों न राजनीति को छोड़ कर अन्य प्रकार के कार्यों में समय व्यतीत करना चाहिए। राजनीति के अतिरिक्त साहित्य है – खास कर हिन्दी साहित्य, जो अभी भी पीछे पड़ा हुआ है। अन्य भाषाओं की अपेक्षा यह एक गरीब भाषा ही कही जाएगी, क्योंकि अब तक जो प्रयत्न इसे समृद्धशाली बनाने के निमित्त हुए हैं, वे बहुत थोड़े हैं। इसे भारत की राष्ट्रभाषा बनाने के लिए भी काफी प्रयत्न करना पड़ा है, वरना हो सकता था कि यह राष्ट्रभाषा का भी स्थान नहीं ग्रहण कर सकती। खैर, किसी प्रकार यह स्थान तो इसे मिला, किन्तु अब इसकी व्यापकता पर विचार करना आवश्यक है। यदि इस ओर ध्यान न दिया गया और यह संकुचित वातावरण में पलती रही तो न जाने भविषय का क्या होगा?.....
आज आवश्यकता है हिन्दी भाषा को जनता की बोलचाल की भाषा बनाने की। नदियां ऊपर की ओर नहीं बहा करती, बल्कि नीचे की ओर ही बहती है। आज सरलता की आवश्यकता हर दिशा में है। संसार का इतिहास बतलाता है कि मानव समाज हर दिशा में सरलता की खोज करता रहा है और आगे भी खोज करता जाएगा। तो हम क्यों न हिन्दी में भी सरल, सुबोध एवं बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करें….. मेरे कथन का अभिप्राय यह नहीं कि मैं हिन्दी को हिन्दुस्तानी का रूप देना पसंद करता हूं।…..“
कवि श्री बलेन्द्र नारायण ठाकुर ‘विप्लव’ की डायरी के प्रत्येक पृष्ठ उन के सुलझे हुए विचारों के समुच्चय हैं। उन का जीवन-दर्शन इन पृष्ठों में परिलक्षित होता है। इस सिद्ध-पुरुष ने कोसी अंचल के बाहर भी इसे गौरवान्वित किया। इन्होंने हिन्दी साहित्य को सम्वर्द्धित किया।
24 दिसम्बर, 1984 को इन्होंने अपनी जीवन-यात्रा पूर्ण कर ली। आने वाली अनेक पीढियां इनके बहुमुखी और कद्दावर व्यक्तित्व से प्रेरित और ऊर्जस्वित होते रहेगी।
अपनी ओजपूर्ण कविता के लिए “कोसी के दिनकर” एवं सुरीले गीतों की रचना एवं पाठ के लिए “कोसी के केसरी” नाम से चर्चित सुकवि ‘विप्लव’ को इन पंक्तियों के लेखक का सादर प्रणाम निवेदित है।
विप्लव जी की रचनाएं
( हिन्दी कविता )
गायक
वह नहीं प्रभंजन कहलाता जो किसी-किसी को छूता है।
वह शिखर नहीं है पर्वत का जिस पर चढ जाता जूता है॥
वह सागर क्या जिस मे आता हर क्षण भारी ऊफान नहीं।
वह मौसम क्या जिस में उठता है प्रलयंकर तूफान नहीं॥
वह पावक क्या जो औरों को अपने-सा नहीं बनाता है।
वह जल-कण क्या जो शोलों को क्षण-भर में नहीं बुझाता है॥
वह धनुष नही जिस में होती है प्रलयंकर टंकार नहीं।
तलवार नहीं जो निकल म्यान से करती है झंकार नहीं॥
मृगराज नहीं जिस का गर्जन सुन छाती नहीं धड़कती है।
वह भुजा नहीं रणभेरी सुन आतुर हो नहीं फड़कती है॥
वह हृदय नहीं जिस में उठती औरों के दुख से पीर नहीं।
वह वीर नहीं ललकारों से लग जाता जिस को तीर नहीं॥
वह जीवन भी क्या जीवन है जिस में यौवन का वास नहीं।
वह गायक भी क्या गायक है स्वर-सायक जिस के पास नहीं॥
( 05-11-50, अकबरनगर, भागलपुर)
साथियों, तुम रो रहे क्यों?
कर्म भूमि महान है जग
उद्यमी हित खान है जग
प्राप्य है सब कुछ यहां पर
व्यर्थ अवसर खो रहे क्यों?
साथियों, तुम रो रहे क्यों?
कौन है उस का सहारा
कर्म को जिस ने बिसारा
सत्य है संसार ही यह
तुम अकर्मठ हो रहे क्यों?
साथियों, तुम रो रहे क्यों?
है नहीं कोई विधाता
जो निठल्लों को खिलाता
आश की गठरी उठाये
मार्ग में तुम ढो रहे क्यों?
साथियों, तुम रो रहे क्यों?
स्वयं तुम हो निज विधाता
भाग्य को गढता-बनाता
उठ बढो निज कर्म पथ पर
नींद में अब सो रहे क्यों?
साथियों, तुम रो रहे क्यों?
(26-07-1950)
दुर्गम पथ
साथी, तुम नहीं फिसलना
है दुर्गम पथ पर चलना
है राह महा यह दुर्गम
फिर शूल बिछे पग-पग में
कंकड़ पत्थर हैं रोड़े
बन रहे यहां डग-डग में
मत ठहर, देखना कुछ भी
होता अभिशाप यहां पर
है खेल नहीं फिर कोई
इस जीवन पथ पर चलना
साथी, तुम नहीं फिसलना
हैं कभी उतरते मन पर
बीते जीवन के कुछ क्षण
वे मधुर हास बचपन के
वे मादक रोदन-गायन
करना भौंरों-सा गुंजन
मधुमास लिये जीवन में
बैठे जग के प्रांगण में
तारों पर कभी मचलना
साथी तुम नहीं फिसलना
आती है फिर मदमाती
अलसाती तरुणी बाला
लेकर निज अरुण अधर पै
यौवन-रस का मद प्याला
जी ललचाया करता है
उस छलक रहे प्याले पर
पीना मत मस्ती में तू
होगा तिल-तिल कर जलना
साथी, तुम नहीं फिसलना
शिशु का मोहक किलकारी
भरना, तुतलाना, गाना
कम्पित करते वे चुम्बन
नन्हें होठों के माना
जीवन के मोहक क्षण ये
फिर-फिर कर आते रहते
है किन्तु नहीं पल-भर भी
निज दुर्गम पथ से टलना
साथी, तुम नहीं फिसलना।
वीणावादिनि मुझ को वर दो
गा चुका गीत मैं जीवन भर
मादक दो क्षण के सपनों के
सोने के दिन वे बीत चले
सोये अंचल में अपनो के
कड़वे कुछ गीत सुना पाऊं
मुझ में तुम ऐसा स्वर भर दो
वीणावादिनी मुझ को वर दो।
कोयल की कूक नहीं भाती
है आज मुझे इन घड़ियों में
भौरों का गुंजन कर्कश-सा
सुन पड़ता बेड़ी-कड़ियों में
लो सुधा छीन मेरे मुख से
फिर कालकूट से कर भर दो
वीणावादिनी मुझ को वर दो।
हैं आंसू सूख रहे जिन के
अन्तर्ज्वाला की दाहों से
है सुलझ नहीं पायी जिन की
ये जटिल समस्या आहों से
उन की आहों में मेरा यह
घनगर्जन प्रलयंकर भर दो
वीणावादिनी मुझ को वर दो।
ले अंगड़ाई हिल उठे धरा
मुझ में ऐसा भूचाल भरो
पानी में आग लगा पाऊं
मुझ में वह भीषण ज्वाल भरो
हो भस्मसात ये उच्च शिखर
मुझ में आंधी-अंधड़ भर दो
वीणावादिनी मुझ को वर दो।
श्रम करने वालों के बल पर
जो यहां आज तक जीते हैं
शोषक जो दानव बने हुए
मानव के शोणित पीते हैं
उन की चिर-प्यास बुझाने को
मेरा यह रक्त जहर कर दो
वीणावादिनी मुझ को वर दो।
मेरी वीणा के तारों को
वीणा वादिनी झंकृत कर दो
मेरे गीतों की लड़ियों को
मानवता से अंकित कर दो
जगमग हो जग का ओर-छोर
मुझ में वह ज्योति प्रखर भर दो
वीणावादिनी मुझ को वर दो।
हो सर्वनाश इस संस्कृति का
मुझ में ऐसा संहार भरो
हो नव-निर्माण पुनः जिस से
वह नवजीवन संचार करो
केवल लाचारी जीते जो
उन के ये गान अमर कर दो
वीणावादिनी मुझ को वर दो।
(30-07-50)
सावन घन आओ
सावन घन आओ।
तृषित धरातल
नव दुर्वादल
चातक चंचल
मानव विह्वल
नभ मंडल में छाओ।
बरसो प्रतिपल
भर दो भूतल
फिर सरिता जल
कर दो कल-कल
अधिक नहीं तरसाओ।
पी कर श्यामल
क्लिष्ट हलाहल
कर दो कोमल
सारे जल-थल
सुधावारि बरसाओ।
वसुधा अंचल
कर दो शीतल
वर दो केवल
उज्ज्वल निर्मल
अविकल सब हो जाओ।
आओ, सावन घन आओ।
(25-06-50)
प्रभाती
जाग जाग रे किसान हो रहा विहान है!
वक्ष था विशाल विश्व का अभी जो ठोंकता
रौंदता रहा प्रकाश को पगों से चांपता
हो रहा विहान है कि अंधकार कांपता
हांफता है भागता कि मार्ग आज मापता
स्वर्ण का प्रभात है कि तिमिर का प्रयाण है।
नील गगन विचर रहे मुक्त, नीड़ छोड़ कर
पक्षीगण कुलकुल कर बंद द्वार तोड़ कर
गीत कोई गा रहा है शब्द जोड़-जोड़ कर
उधर सूर्य निकल रहा तिमिर-भाल फोड़ कर
लाल-लाल है धरा कि लाल आसमान है।
हल-कुदाल हाथ ले खेत में चले चलो
तरनि तेज हो रहा कि रेत में बढे चलो
कोटि-कोटि आपदों को झेलते चले चलो
मेरे रहमान राम सृष्टि को गढे चलो
नवयुग के बुद्ध ईसा, करना निर्माण है।
आज विकल विश्व है कि दग्ध ओर-छोर है
डोलती है आज मही सिन्धु में हिलोड़ है
चीख है पुकार है कि हाय-हाय शोर है
त्राहि-त्राहि मानव की आज ठौर-ठौर है
ध्वस्त-त्रस्त भूमि है कि हो रही विरान है।
मानवों के रक्त से ही हो रही है होलियां
ठठ्ठरों के साथ आज हो रही ठिठोलियां
आह भी निकल सके न बंद रखो बोलियां
बरना इन छातियों को छेद देंगी गोलियां
कैसी यह सृष्टि है रे कौन सा विधान है?
आज शहीदों की चिता धांय-धांय बोलती
तख्ती है फांसी की सांय-सांय डोलती
आज गरीबों की हाय नब्ज है टटोलती
क्रांति अमर है जवान द्वार आज खोलती
पशु है क्या मानव भी, प्रश्न यह महान है।
विश्व, तुझे एक प्रश्न रे जवान पूछता
नेत्र-द्वार बंद हैं, न आज उसे सूझता
मानवों के देव, रक्त कौन दनुज चूसता
है पिशाच कौन तुझे राह में ही लूटता
करना है अश्रुपान या कि रक्त-पान है?
क्या न चीर दोगे आज सृष्टि लौह-फाल से
क्या न मेट दोगे लिखा मानवों के भाल से
खण्ड-खण्ड क्या न करोगे धरा कुदाल से
ज्योतित तू सृष्टि करोगे न क्या मशाल से
क्या न सींच दोगे आज सूखते जो प्राण हैं?
सामने शिला मिले उसे प्रहार फोड़ दो
कंटक हो राह में उसे मरोड़-तोड़ दो
कर निनाद सप्तसिन्धु को अभी हिलोड़ दो
सृष्टि को तू ओर-छोर तक पकड़ झकोर दो
लाल-लाल खून है कि लाल यह निशान है।
जाग जाग रे किसान हो रहा विहान है।
(24-04-50)
(मिति 11-06-50 की ‘जनता’ में प्रकाशित)
लक्ष्य
ये तेज मेरे खोजते हैं उस अधम के भाल को।
जिस ने बिखेरा है अभी मा के कसे कच-जाल को॥
हा! कौन है? रे आ निकट! छेड़ा है किसने नागिनी।
सोती हुई गजराज –पत्नी को बनाया बन्दिनी॥
किसने पवन के वेग में छींटा यहां अंगार को।
है क्या नहीं अब तक सुना वह इस प्रलय-हुंकार को॥
बोलो तनिक! क्यों छिप रहे? हो किस विटप की आड़ में।
रे! देख लो है क्या भरा इस वत्स के चिंघाड़ में॥
मैं देखता हूं आज केवल एक तेरा ही गला।
लो! छोड़ता हूं तीर यह, तू सोच ले अपना भला॥
(21-02-1943)
बन्दी शुक
लौह-पिंजर में फंसा शुक है विकल हो छटपटाता।
कौन जाने किस व्यथा से विश्वपति की रट लगाता?
इस दुखद बंदी-दशा में भी दुखद क्यों राग गाता?
कौन-सा अपराध रे! जिसके लिये वह दंड पाता?
क्या इसी के हेतु ही वह है जगत में जन्म पाता?
उड़ निकलने को सदा ही पंख को वह फड़फड़ाता।
लौह-पिंजर में फंसा शुक है विकल हो छटपटाता।
वांधवों के साथ था कैसा मधुरमय मुक्त जीवन।
सघन वन के मुक्त नभ में वह सुखद-स्वछंद विचरण।
देख कर निज वांधवों को उस तरफ से आज आता।
हा! लगी आशा उसे है, विनय पालक को सुनाता।
छोड़ दे रे नीच! जालिम! क्यों वृथा मुझ को सताता!
लौह-पिंजर में फंसा शुक है विकल हो छटपटाता।
(25-02-1943)
स्वतंत्रता दिवस पर
तेरे जन्मदिवस के शुभ अवसर पर कैसे गान करूं?
पड़ी बेड़ियां हैं पैरों में, कैसे निकल पयान करूं?
इस बंदी-जीवन में क्योंकर तुझ को भेंट चढाऊं मैं?
तू ही बोल! इस कठिन समय में कैसे तुझे सजाऊं मैं?
मुख है बंद, लगी ताली फिर, आज समय है गाने का।
ज्वार उठा है अन्तस्तल में खुल कर मोद मनाने का।
फड़क रही रह-रह कर बाहें यह निशान फहराने को।
उबल रहा लोहू धमनी में तेरे हित बलि जाने को।
देवि! विवश हूं आज, किन्तु अन्तर में वीणा बजती हैं।
झनक रही बेड़ियां, करों में कड़ियां खन-खन करती हैं।
इन वाद्यों के साथ कफन यह झण्डा नहीं तिरंगा है।
मूक-गान गाता हूं दिल से, यही कठौती गंगा है।
अस्तु! आज इस विकट समय में इन से ही संतोष करो।
अरी! बहुत केहरी जीवित हैं, मुख से एक न आह भरो।
वर दे कि फिर नवल रीति से तेरा मैं अभिसार करूं।
पिंजर-बद्ध व्यथित जीवन कुछ इस का भी प्रतिकार करूं।
(26-01-1943)
आंसू
जब शक्तिवान दलितों को
स्वारथ हित पीड़ा देता
असहायों का क्रोधानल
जब मौन ग्रहण कर लेता
तब तप्त-वारि सा चू कर
हूं धैर्य-दान मैं करता
पीड़ित के अन्तरतम को
कुछ क्षण आलोकित करता
रजनी की नीरवता में
प्यारे बिन विरहिन भोली
जब दीर्घ-स्वांस ले कर के
आहों से भरती झोली
मैं विरह-ज्वाल से निर्मित
बाहर आंखों से आता
हो कर कपोल-अबलंबित
तत्क्षण की पीड़ा हरता
बहुत दिनों के बिछुड़े
प्यारे जब फिर घर आते
तब प्रेमालिंगन कर के
दोनों ही मुझे बहाते
मत समझो हूं नन्हा-सा
कुछ काल हेतु ही आता
थोड़ा-सा खेल दिखा कर
फिर झट विलीन हो जाता
मैं हूं बेवश की शक्ति
युग से संचित होता हूं
बलवान, आततायी के
दुख का बोझा ढोता हूं
अब निकट यहां से सीमा
थोड़ा-सा ही चलना है
चल कर अतीत के दुख का
प्रतिकार अभी करना है
मैं हूं सुख का भी साथी
दुख का फिर एक सहारा
इतने पर भी क्यों कहते
लोचन की केवल धारा
(05-02-1943)
मनोकामना
मैं करूं जननि का नाम अमर।
बन कर सुपुत्र निज माता का
लहरा दूं क्षण में अमर लहर।
गौरव अतीत का भी असीम
शत शशि की आभा सम निसीम
कर रहा शोर उर में महान
हा, कैसा है वह भीषण स्वर।
हा, मा का सब अपहरण हुआ
पा कर मुझ-सा कायर कपूत
उस के दिल में है अमिट पीर
जो होती निस दिन अजर-अमर।
विश्राम काल जब मुझे नहीं
क्यों शयन करूं चिर-निद्रा में
दुंदुभी बजा अगणित सहास
पलटा दूं फिर नूतन अवसर (अपूर्ण)
(07-05-1937)
साम्राज्यवाद का ताण्डव
कर लो ओ साम्राज्यवादियों
खुल कर ताण्डव-नर्तन।
प्राची में जापान खेलता
नर-शोणित से होली
और निकलती है प्रतीचि में
जर्मन की भी गोली
एक-एक को निगल रहा है
दनुज रक्त का प्यासा
मानवता मिट रही जगत की
बचने की क्या आशा
हिटलर की आंखों से देखो
निकल रही चिनगारी
आज उसी की सत्ता छायी
युरप में भयकारी
तोपों का रौरव होता है
श्वेतों के प्रांगण में
आज वेदना कसक रही है
सकल विश्व आंगन में
लूट गया पोलैण्ड नोर्वे
वैभव की लिप्सा में
लगी आग चेकों-स्वीसों की
हरी-भरी आशा में
मुसोलिनी हुंकार रहा
भुमध्य-सिन्धु के तट से
सभ्य पुरातन मिश्र देश भी
कांप रहा आहट से
अरे कौन इस भग्न कुटी में
बीन रहा दाने को
छीन रहा कुत्तों के मुख से
जूठ-मूठ खाने को
इधर विश्व के इस कोने में
यह कैसा है क्रन्दन!
करलो ओ साम्राज्यवादियों
खुल कर ताण्डव नर्त्तन।
महानाश का समर छिड़ा है
धन-जन का यह खेला
उठ जावेगा कुछ दिवसों में
दुनियां से यह मेला
ईश्वर की इस रची स्रृष्टि में
यह कैसा है अन्तर
मानव पर मानव का होता
क्यों अन्याय निरन्तर
लूट-लूट दीनों का वैभव
सभ्य कहाते हो तुम
चूस-चूस कर अरे शासकों
हमें भुलाते हो तुम
एक ओर नरबली देते हो
नाजी! तुम निज कर से
और इधर हम चुप बैठे
साम्राज्यवाद के डर से
कौन कहे, है इन दोनों में
किस प्रकार का अन्तर
है खूबी नाजी में या
साम्राज्यवाद है सुन्दर
संभलो हे साम्राज्यवादियों
छिपा नहीं कुछ तेरा
उजड़ जायेगा तेरा भी अब
इस दुनियां से डेरा
शोषक औ शोषित का अन्तर
मिट जावेगा क्षण में
होगा फिर आनन्द तभी से
भूतल के कण-कण में
वक्षस्थल होगा विदीर्ण तब
सुन जन का नव-गर्जन
कर लो ओ साम्राज्यवादियों
खुल कर ताण्डव नर्त्तन।
(15-11-1942)
किसानों के प्रति
रे ! विश्व-विटप के जीवन-धन !
तू स्वार्थरहित धन के समान।
दिन-रैन रक्त से सींच-सींच
कर दिया किसे जग में महान।
*
तेरा ही सींचा लघु पौधा
अब तरुणाई पा लचक रहा
मद-प्रसून के सहज भार से
है तेरे सर पर सचक रहा
*
चरमहीन है अस्थि बची यह
तन-रक्त पिला बेरहमों को
वितरण कर के निज सुख सौरभ
क्या समझा था कुछ मरमों को
*
तेरी करनी से काक हुआ
महिमण्डल-मानस का कराल
अब झूम रहा है मस्त बना
बेफिक्री से वह ताल ताल
*
जब अग्नि स्वार्थ की भभक उठी
तो इस में क्या है जरा नहीं
हो मौन गहे सदियों से तुम
क्या दिल अब तक भी भरा नहीं
*
कुछ तो अतीत का ध्यान करो
तेरी कैसी थी शान यहीं
होता था नृप के महलों तक
तेरे ही यश का गान यहीं
*
यह अविराम परिश्रम करने
पर भी अब क्यों हो सुखी नहीं
अच्छे भोजन को कौन कहे
पर मिलती रोटी रूखी नहीं
*
शिशिर-रात की कठिन शीत में
पल भर तुझ को आराम नहीं
हृदय कांपता जाड़े से पर
है चिथड़े का भी नाम नहीं
*
रे ! यह सोने का समय नहीं
तू अब उठ कर अंगड़ाई ले
हो भूचाल अभी इस क्षण ही
और-------की कील हिले
*
जो निज पद से हैं चांप रहे
इस दीन-दशा में भी तुझ को
रण में दहाड़ कर आगे बढ
निज शक्ति दिखा दो अब उनको
*
भोले किसान ! अब देरी क्यों?
तू रूप धरो सब से विशाल
बन जा तू ऐसे अवसर पर
अपने अरियों का व्याल-काल
*
फिर नूतन रचना कर जिस में
हो भेद-भाव का नाम नहीं
प्रेम-रज्जु में गुंथे रहें सब
हो फूट-बैर का नाम नहीं।
(07-07-1939)
तरंग मालायें
परम मनोहर समय आज का था वसन्त का प्रात।
थी तरंग मालायें लहराती समीर के साथ।
जहां तहां वे करती थीं विचरण हो कर स्वच्छंद;
गले गले मिल आज परस्पर लेती थीं आनन्द।
किरणवाल भी कई उसी क्षण आईं उनके पास
बोली- ‘दोगी हमें खेलने। करके आईं आस’।
बोली तब तरंगमालायें नवागन्तुका जान
‘आओ बहिन! परस्पर मिल कर खेलें, हों गतिमान’।
लगी खेलने तब से निस दिन अधिक नेह में डूब;
रहती हुई बहुत दिनों तक बढा मेल जब खूब
कहा एक दिन किरणवाल ने पकड़ एक का हाथ-
‘चलो बहिन, तुमलोग खेलने आज व्योम तक साथ
सब कोई मिल मौज उड़ायें, करें गगन की सैर
चली चलो, मत देर लगाओ, बढो, उठाओ पैर’
सब ललचाने लगी उसी दम जाने की सुन बात
‘चलो बहिन----------------------------------
बोली एक सयानी-‘सुन लो मेरा भी प्रस्ताव
यहीं खुशी से खूब खेल लो, वहां नहीं तुम जाव’
झल्ला उठी दूसरी इस पर, बोली-‘है क्या लाज?
हम सब चलें घूमने मिल कर साथ बहिन के आज’।
सब कोई तब किरण-यान पर चढी गयी आकाश
घूमी खूब वहां पर जा कर जैसा था अवकास
पुनः दूसरे दिवस गिरीं वे बनी हुई थी ओस
बूंदें जहां-तहां बिखरी थीं, करती थीं अफसोस
किरणवाल फिर आज व्योम से उतरी उनके पास
बोली-‘आज बहुत सुन्दर हो, क्यों नहीं करती हास!’
सुन कर बातें वाल किरण की बोली बूंदें-‘वाह!
तुमने ही तो हमें भुला कर ऐसी गति की, आह!
हम थीं भली यहीं पर रह कर एक साथ, था प्रेम
अब तो नाश एकता का है, टूट गया सब नेम’
रोने लगीं सभी यह कह कर, खाने लगी पछार
यही नतीजा है लालच का, कर लो खूब बहार!
(28-02-1943)
कवि से –
कवि, तुम उन के गीत सुनाओ!
अश्रु बिन्दु के दो कण कवि तुम उनकी स्मृति में ढुलकाओ।
खिले कुसुम बहुतों ने उन पर निज श्रद्धा के फूल चढाये
अपनी अमर तुलिका से बहुतों ने उन के चित्र बनाये
जो अधखिली रही कलियां अथवा खिल कर जो हैं मुर्झाये
काल-चक्र के कुटिल थपेड़ों में पड़ जो खिलने नहीं पाये
हैं विस्मृति के तिमिर-पुंज में जिन की वे अतीत गाथायें
कवि, तुम उन की मधुर स्मृति में निज कविता के दीप जलाओ।
कवि, तुम उनके गीत सुनाओ!
स्वप्नों में भी नहीं ध्यान लोभी भौंरों की ओर दिया था
ललचाये नैनों से जल कर जिसने मुख को मोड़ लिया था
जान न पायी दुनियां जिन को निर्जन वन में छोड़ दिया था
महाप्रबल वायू के झोंकों ने जिन को झकझोर दिया था
असमय में ही लता कुंज से निठुर करों ने तोड़ लिया था
कलम नोंक से बिन कर कवि तुम उनके फिर से हार बनाओ
कवि, तुम उन के गीत सुनाओ!
रोटी के दो टुकड़ों तक ही जिन का यह संसार रहा है
नन्हा बालक सम्मुख में कर जिन के हाहाकार रहा है
आंसू जिन के सूख गये हैं अन्तर्ज्वाला की दाहों से
नहीं भूख की जटिल समस्या सुलझ सकी जिन की आहों से
प्रतिभा फैल न पायी जिन की, चले गये अपनी राहों से
सरस लेखनी कर में ले कर कवि तुम उन के छन्द बनाओ
कवि, तुम उन के गीत सुनाओ!
युग-पुकार पर बढ कर आगे पैर न पीछे दिखलाये हैं
बिना मूल्य मांगे ही भालों से छाती को छिदबाये हैं
सूखी-सी स्वातन्त्र्य लता को सींच खून से पनपाये हैं
अपने शीश चढा शाकल पर मन की माला बनबाये हैं
दुरूह पथों में स्वयं मिट कर जो मंजिल जग को दिखलाये हैं
धूल कणों से उन्हें उठा कर कवि तुम अब इतिहास रचाओ
कवि, तुम उन के गीत सुनाओ!
जिन पगलों की होली ने निज शोणित से स्नान किया है
होली खेली है गोली से, घूंट लहू का पान किया है
अपने घर को जला स्वयं जो इन्कलाब का गान किया है
जग की ममता छोड़ जिन्होंने जीवन को बलिदान किया है
अमर शहीदों की टोली का कवि तुम जय-जयकार मनाओ
कवि, तुम उन के गीत सुनाओ!
दिल्ली चले चलो, दिल्ली चले चलो
तरुण, आज हिन्द तुझे है पुकारता
नगपति का शैल श्रृंग है दहाड़ता
सिन्धु हिन्द लहरों को है उछालता
मलय पवन आज तुझे है धिकारता
नौजवान, वेग से बढे चले चलो।
दिल्ली चले चलो, दिल्ली चले चलो!
आज शहीदों की चिता बोल रही है
झांसी की रानी पट खोल रही है
कर में ले विष को वह घोल रही है
शक्ति आज तेरी वह तोल रही है
रे जवान! आज प्राण-प्राण तोल लो।
दिल्ली चले चलो, दिल्ली चले चलो!
देहली है खून लाल-लाल मांगती
कुतुब की मीनार मुण्डमाल चाहती
कब्रों में बेगमें दहाड़ मारती
युवक, तुझे आज है ‘जामा’ पुकारती
‘क्रान्ति अमर है’- जवान बोलते चले चलो।
दिल्ली चले चलो, दिल्ली चले चलो!
सामने शिला मिले प्रहार फोड़ दो
कंटक हो राह में उन्हें मरोड़ दो
कर निनाद सप्तसिन्धु को हिलोड़ दो
लाल किले की किबाड़ आज तोड़ दो
शीश दे जवान आज मुक्ति मोल लो।
दिल्ली चले चलो, दिल्ली चले चलो!
चलो रे जवान आज नव उमंग ले
बढो रे जवान आज नव तरंग ले
चढो दुर्ग पै जवान नव तिरंग ले
मरो रे जवान आज नवल जंग ले
अंग-अंग में शहीद रंग घोल लो।
दिल्ली चले चलो, दिल्ली चले चलो!
जीवन-दीप
साथी! चार घड़ी जलना है।
बीत गयी दो घड़ी निशा यह और घड़ी दो का चलना है
हो प्रकाश इस निविर अमा में, इसी हेतु हम गये जलाये
मन्द-मन्द जल रहे आज क्यों अपने सब अरमान छिपाये
बेला है दो पहर सामने, बाद इसी के तो टलना है
साथी! चार घड़ी जलना है।
एक बार इस महारात्रि में चकमक कर हम सभी उठेंगे
क्या भविष्य का ठौर, नेह जब सारे हम से बीत चुकेंगे
चल देना होगा बे-मन का, यह दुनियां ऐसी छलना है
साथी! चार घड़ी जलना है।
दो बिखेर वह ज्योति जगत में यौवन के इस प्रथम प्रहर में
निखरे दिग-दिगन्त, तम भागे, ज्योति पुंज की एक लहर में
भूले, भटके, दीन पथिक को राह पकड़ ही तो चलना है
साथी! चार घड़ी जलना है।
शोक-दिवस
यह कैसा उल्लास आज जग के इस कोने निर्जन में
कैसी यह स्वर लहरी गूंजी मानव के करुणा क्रन्दन में
कड़ियां टूटी है जननी की या दो टूक हुई है छाती
चकित मौन कवि सोच रहा है, सहसा कलम आज रुक जाती
यह उत्सव या शोक घड़ी है, पाये शत-शत अरमानों से
भींगे हैं अंचल जननी के अब भी अगनित बलिदानों से
छिना आज लाहौर भगत का और बोस का बंग छिना है
छिना प्रान्त सीमा पठान का और पंचनद अंग छिना है
गुरू गोविन्द सिंह, रणजित के अमृतसर की शान छिनी है
नानक के अविरल प्रयास पर भी सिखों की जान छिनी है
आज कहां है सिन्ध हमारा सिल्हट बलुचिस्तान कहां है
अंग-अंग खण्डित जननी के, प्यारा हिन्दुस्तान कहां है
वे अतीत के स्वर्ण खनित स्मृति के सभी निशान मिटे हैं
जलियांवाला की बुलबुल के कितने वे बलिदान मिटे हैं
माता के प्राणों से प्यारा शेखर वह आजाद कहां है
राजगुरू, सुखदेव, डींगरे सा यौवन उन्माद कहां है
जननी के सूखे अधरों पर सींचे है शोणित की लाली
कहां गये वे हमें छोड़ कर उजड़े हुए चमन के माली
पल भर भी नहीं रुके आग में थे जो अपने कदम बढाये
माता के चरणों पर जिन ने हंस-हंस अपने शीश चढाये
आज याद कर उन पगलों की मा के मुख पर हास नहीं है
शोक-दिवस है आज हमारा, मोद नहीं, उल्लास नहीं है
(15 अगस्त,1947 को औपनिवेशिक दिवस पर लिखित)
आजादी या बर्बादी
यह आजादी नहीं, देश की बर्बादी है!
ब्यालीस में भूडोल हुआ था
सारी दुनियां डोल उठी थी
खून हिन्द का खौल रहा था
दुश्मन का दिल धड़क रहा था
सारी फौजें तड़प रही थीं किस के बल पर ?
कदम बढा कर
जान लड़ा कर
घाम बहा कर
गोली खा कर हिम्मत की थी
मिहनत की थी हम ने।
डाक, तार और रेल जला कर
कचहरियां-थाने जब्ती कर
घोर दमन-भट्ठी में जल कर
जेलों में चक्कियां चलाई थीं हम ने या किस ने ?
पुलिस आयी, फौजें आयी, गोरे और बलूची आये
घर में मेरे आग लगा कर खूब शान से ताप रहे थे
और तुम पूंजीपतियों!
भीगे बिल्ली के जैसे छिपे हुए थे
नहीं नहीं
तुम उन्हें मदद कर हमें पिटाया, जेल दिलाया
कुटिया में फिर आग लगा कर
महलों में से झांक रहे थे
हां, झांक रहे थे
जी-हुजूर की झड़ी लगी थी
सिटपिट करते
दूम हिलाते उन गोरे चमड़ों के आगे।
और विश्व में युद्ध छिड़ा जब!
हम भूखे थे
हम नंगे थे
आग लगी थी
लपटें उठीं और सारा बंगाल जला था।
मानवता का नग्न-नृत्य था
मातायें भूखी-नंगी थीं
बच्चे इनके तड़प रहे थे
इन की खातिर युवती इज्जत बेच रही थी चौराहे पर
हाथ पसारे दो पैसों में
तुम जैसों में।
और तभी तो पैसे तुम ने खूब कमाये
हमें जला कर
हमें रुला कर
बहनों की इज्जत लुटबा कर।
और आज!
देश आजाद हुआ है
ब्रिटिश हुकूमत भाग गयी है
भारत को दो टूक बना कर
तुम महलों में से निकल रहे हो अपनी सारी लाज गंवाये।
तुम कहते हो – देश हमारा।
देशभक्त तुम नये बने हो खादी की टोपी को पहने
कांग्रेस के फिर मेम्बर बन कर।
और आज क्या भूल गये हो
कल तक जूते चाट रहे रहे थे
गोरों के तुम टाट बने थे
अवसरवादी पूंजीपतियों !
लाज नहीं आती क्या तुम को ?
जुल्मी!
फिर तुम आज चले हो हमें सताने
हमें मिटाने
हम गरीब के खून बहाने
गोली ले कर
गोले ले कर
भाले औ बर्छी को ताने।
याद रखो
हम नहीं मिटेंगे
नहीं हटेंगे
सीना खोले डटे रहेंगे
अपने हक पर
अपने बल पर
अपने पथ पर।
ऊंचे पर्वत को काटेंगे
गहरे गढ्ढों को पाटेंगे
फिर से यह सम्पति बांटेंगे
दलितों के अरमान पुराने
नव-युग का निर्माण करेंगे।
मिट जायेगी तेरी हस्ती
तेरी मस्ती
यह बुनियाद
पूंजीवाद।
होगा फिर से जनता-राज
कृषक और मजूरों का राज
भारत होगा तब आजाद।
हमें चाहिये वह आजादी।
यह आजादी नहीं, हमारी बर्बादी है।
अगस्त
यह अगस्त है नहीं, क्रांति की ज्वलित शिखा है
जिस के उर पर शोषित मानव का विप्लव इतिहास लिखा है।
यह इतिहास लिखा है जिस में
कोटि-कोटि मानव की आहें
निकल पड़ी थी चिनगारी बन महाप्रलय की
ज्वालामुखी दबी सदियों की
फूट उठी थीं अंगड़ाई ले बहुत दिनों पर।
हां, फूट उठी थी वह ज्वालामुखि
दबी हुई थी जो सदियों से
कभी जवानों की छाती में।
कभी इसी ने सिगनल दी थी
भरी सभा में नवागमन की
भगत सिंह के विस्फोटों से।
राजगुरू, सुखदेव और बटुकेश्वर दत्त ने
जता दिया था धता बता कर
सम्हलो, सम्हलो, अरे पिशाचों !
लपट उठी थी सब से पहले बम्बई से ही
हम ने नारा जहां लगाया –
‘ऐ अंग्रेजों, भारत छोड़ो !’
साथ लपट के धुआं उड़ा था
औ फिर वह तूफान उठा था इसी हिन्द में।
निकल पड़े थे शेर तोड़ कर
तभी गुलामी के पिजड़े को
मर-मिटने अपनी इज्जत पर।
तोड़ गुलामी चली जवानी
सन-सन करती
झन-झन करती
जर्रा-जर्रा दहल उठा था।
निकल पड़े थे सभी घरों से
जच्चे-बच्चे
दुबले-पतले
लम्बे-तगड़े
जल मरने को इसी आग में।
इसी आग ने महल जलाया
था गोरों का, अध-गोरों का
ले कर भाला, ले कर बर्छी, ले कर लाठी, ले कर डण्डा।
इसी लहर ने किस को तोड़ा, किस को फाड़ा
छीना-झपटा, मारा-पीटा
औ कितनो को आग में झोंका, याद नहीं है।
इसी लपट ने किस को खींचा
किस को फेका बन्द कोठरी से जंगल में
बियाबान में जल मरने को
जयप्रकाश को, पटवर्द्धन को
अरुणा, लोहिया, रामनन्दन को
चढी जवानी में मिटने को।
इसी लिये तो
यह अगस्त है नहीं, क्रांति की ज्वलित शिखा है
जिस के उर पर शोषित मानव का विप्लव इतिहास लिखा है।
और एक दिन
यह अगस्त आया फिर जिस में
मिस्टर जिन्ना ने भिन्ना कर
ललकारा सारे समाज को –
डाइरेक्ट एक्शन करो हिन्द में।
गूंज उठा मजहब का नारा –
पाकिस्तान जिन्दाबाद!
मुस्लिम लीग जिन्दाबाद!
खतरे में इस्लामी मजहब
रक्षक जिन्ना जिन्दाबाद!
शोर उठा फिर एक ओर से –
हम हिन्दू हैं
दबने वाला कौन यहां है
आ जाओ गर तुम्हें शौक हो।
और हिन्द का खून बह चला
मा-बहनों की लाज बह चली
कहां गुलामी ? कहां गरीबी ? किस की चिन्ता ?
सर पर चढ कर बोल रहा था
वह मजहब का भूत बना जो
और
घी के दीये जले हुये थे जिन्ना साहब की कोठी में
और नाच का रंग जमा था इन महलों में नब्बाबों के
और इधर
फूसों के छप्पर धधक रहे थे
अपने हाथों घर में अपने आग लगा कर
मा-बहनों की लाज लूटने
ये हत्यारे भटक रहे थे।
यही नृत्य था नब्बाबों का
जमींदार पूंजीपतियों का
इन कंकालों की हड्डी से
मजहब के पर्दे में बैठे।
इसी लिये तो हम कहते हैं
यह अगस्त है नहीं, क्रांति की ज्वलित शिखा है
जिस के उर पर शोषित मानव का विप्लव इतिहास लिखा है।
और साल भर बाद झूमता
यह अगस्त आया फिर देने
हम को यह कैसी आजादी !
पाकिस्तान मिला जिन्ना को
पूरा हुआ अरमान तभी इन
नब्बाबों का, कठमुल्लों का
और हिन्द का जिगर कट गया।
हां, आजादी तो मिली
किन्तु है नहीं हमारी
जिस ने यह कुर्बानी की थी
खून-पसीना एक किया था।
यह आजादी है चेट्टी की
मामा औ गिरिजाशंकर की
उन दिनों में बड़ी खुशी से
अंग्रेजों का साथ दिया था।
और हमें क्या मिला इनाम ?
भूखों मरना, जिल्लत सहना
कभी तड़पना, कभी विलपना
फटे हाल दर-दर का फिरना
हमें मिला है यही सुराज !
इस सुराज में हम घिसते हैं
हम पिसते हैं
दो बैलों के संग रात-दिन
गर्मी-जाड़ों में खटते हैं
और मशीनों के धड़धड़ में
कान हमारा ही फटता है
देह हमारी ही जलती है।
और उधर हम देख रहे हैं
एक ओर मुट्ठी भर साहब
खस की टट्टी में बैठे हैं उस ठंढी में
और इधर
मेरे इस तन में आग लगी है।
तभी सोचता हूं मैं मन में
मेरे वह भगवान कहां हैं ?
ईसा और रहमान कहां हैं ?
और उनका यह इन्सान कहां है ?
औ मेरे ही लिये बना क्या
सारा मजहब, मन्दिर-मस्जिद
यह भगवान, यह रहमान
यह चिर-आशा, यह संतोष ?
मेरे तन में आग लगी है
हड्डी-पसली धधक रही है
चटक रही है
और लपट है बढती जाती।
यही लपट क्या जला न देगी इन महलों को
इस झूठे मन्दिर-मस्जिद को
इस झूठे रहमान-राम को
और इसी के चिता-भस्म से
क्या न बनेगा नव-संसार ?
वह संसार, रहेगा जिस में
कोई न भूखा, कोई न नंगा
कोई न दुर्बल, कोई न निर्बल
और अकिंचन या बेकार।
नहीं निशान मिलेगा जिस में इन धनियों का
जमीन्दार, पूंजीपतियों का
कठमुल्ले मजहब वालों का।
हां, वह संसार, बसेगा जिस में
स्वर्ग उतर इस मानव हित में
और रहेगा नहीं देव और
दानव का झूठा व्यवहार।
औ होगी चिर-शान्ति
विश्व के इस कोने से उस कोने तक।
अभी दूर दिल्ली वह अपना
और अभी तो सुख है सपना
एक बार फिर से है तपना
जाग जाग रे शान्ति पुजारी आज हिन्द के
एक जंग फिर से है लड़ना दानवता से
आओ सब मिल यही मनायें
आओ अगस्त फिर से भूतल पर
यह हमारी एक तृषा है
यह अगस्त है नहीं, क्रान्ति की ज्वलित शिखा है
जिस के उर पर शोषित मानव का विप्लव इतिहास लिखा है।
तुलसीदास
आज अंधकार है कि सूर्य अस्त हो गया
निखर अतीत के दिवस महा प्रकाश पुंज में
विलीन हो गये कराल काल के निकुंज में
गूंजती है रागिनी पवित्र राम राज की
कल्पना उतर रही है मूर्ति में स्वराज की
दामिनी हो कौंध कलाकार स्वयं खो गया
आज अंधकार है कि सूर्य अस्त हो गया
काव्यकुंज कोकिल बन राष्ट्र को जगा गया
बिलोक व्याप्त तिमिर पुंज विश्व से भगा गया
ब्याकुल कर कविता को व्यथित कला छोड़ कर
कलाकार विलप रहे, प्रेमरज्जु तोड़ कर
सप्तमी है सावन की तुलसिदास खो गया
आज अंधकार है कि सूर्य अस्त हो गया
(तुलसी जयन्ती, 1949 के अवसर पर रचित)
गरल-पान
करेगा कौन गरल यह पान ?
अरे, यह देवासुर संग्राम
मचा है युग से हाहाकार
चली यह धरा मथन गति तीव्र
हो रहा यह भीषण संहार
घुट रहे जीव-जन्तु के प्राण
करेगा कौन गरल यह पान ?
हो चली सभी दिशायें त्रस्त
विकल हो सभी कमठ अटि कोल
भग रहे वसुन्धरे को छोड़
धरा यह रही डगमगाडोल
सुनो लो यह प्रचण्ड आह्वान
करेगा कौन गरल यह पान ?
उमड़ कर सागर पारावार
चतुर्दिक ओर-छोर झकझोर
त्रसित कर धरा और आकाश
रहा है जल, थल सभी हिलोर
करेगा कौन कहां कब त्राण ?
करेगा कौन गरल यह पान ?
अर्थ के पूत महामन्दार
घोंट जनसागर महाविशाल
रहे हैं कालकूट दुर्द्धर्ष
विदारित कर उर आज निकाल
जर्जरित निःसंबल बलवान
करेगा कौन गरल यह पान ?
हां, चली धरा मथन गति तीव्र
निकलता कालकूट विषराज
जर्जरित यह सारा संसार
अरे, इस गरल-पान को आज
चाहिये नीलकण्ठ भगवान
करेगा कौन गरल यह पान ?
कहां हैं नीलकण्ठ भगवान
तनिक तुम खोजो तो कैलाश
वृथा क्यों भ्रमित फिर रहे आज
निकट में ही तो तुर्य प्रकाश
छिटकता सारा विश्व महान
करेगा कौन गरल यह पान ?
अरे, यह जय प्रकाश ही आज
धरा पर नीलकण्ठ अवतार
शोषितों का चिर-परिचित देव
हुआ अवतीर्ण देख भू-भार
क्रांति का अग्रदूत बलवान
करेगा वही गरल यह पान
पुनः इस गरल-पान के बाद
मथन होगा सारा संसार
अरे, इस जीर्ण-शीर्ण प्राचीन
विश्व का होगा फिर संहार
करेगा नव श्री यही प्रदान
करेगा कौन गरल यह पान ?
अरे, यह सुख-दुख का संसार
कभी पतझड़ है कभी बसन्त
यही है नियत नटी के खेल
जिसी की आदि उसी का अन्त
कभी अभिशाप कभी वरदान
करेगा कौन गरल यह पान ?
किन्तु, युवकों, रहना तैयार
मथन करने जर्जर संसार
धुसरित करने ऊंचे शैल
वज्र ले कर प्रचण्ड प्रहार
अरे, कुछ सीखो तो बलिदान
करेगा कौन गरल यह पान ?
बनोगे क्या तुम भी तूफान ?
बनोगे क्या तुम भी तूफान ?
तो आओ चलो हमारे साथ
विश्व के सारे बन्धन तोड़
प्रलय पथ को करने स्वीकार
पुरातन की यह ममता छोड़
रहे हो अचल, बनो गतिवान
बनोगे क्या तुम भी तूफान ?
प्रकम्पित करते धरणि आकाश
हहरते चलो दिशा झकझोड़
तोड़ने डाल पत्र प्राचीन
उच्च तरु को तुम तोड़-मरोड़
सुनाते जग को विप्लव गान
बनोगे क्या तुम भी तूफान ?
उड़ाते दलित-धूल नभ बीच
कराते उन में भीषण क्रान्ति
खेलते मद्यनाश के फाग
तभी तो होगी वह चिर-शान्ति
जहां होगा नूतन निर्माण
बनोगे क्या तुम भी तूफान ?
अरे जड़, उठो, चलो, क्यों मूक
बने हो आज किसी के भृत्य
नहीं क्या जीवन है वह सत्य
बने जो संघर्षों में नित्य
विकल हैं आज विश्व के प्राण
बनोगे क्या तुम भी तूफान ?
(मिति 11 और 12 जून, 1950 के भयंकर तूफान के अवसर पर लिखित)
साथियों से
साथी, तुम नहीं फिसलना
है दुर्गम पथ पर चलना
है राह महा यह दुर्गम
फिर शूल बिछे पग-पग में
कंकड़ पत्थर हैं रोड़े
बन रहे यहां डग-डग में
मत ठहर, देखना कुछ भी
होता अभिशाप यहां पर
है खेल नहीं फिर कोई
इस जीवन-पथ पर चलना
हैं कभी उतरते मन पर
बीते जीवन के कुछ क्षण
वे मधुर हास बचपन के
वे मादक रोदन गायन
करना भौंरों सा गुंजन
मधुमास लिये जीवन में
बैठे जग के प्रांगण में
तारों पर कभी मचलना
आती है फिर मदमाती
अलसाती तरुणी बाला
लेकर निज अरुण अधर पर
यौवन-रस का वह हाला
जी ललचाया करता है
उस छलक रहे प्याले पर
पीना मत मस्ती में तू
होगा तिल-तिल कर जलना
शिशु की मोहक किलकारी
भरना, तुतलाना, गाना
कम्पित करते वे चुम्बन
नन्हें होठों के माना
जीवन के मोहक क्षण में
फिर-फिर कर आते रहते
है किन्तु नहीं पल भर भी
निज दुर्गम पथ से टलना
साथी, तुम नहीं फिसलना
है दुर्गम पथ पर चलना।
(26-07-1950)
जनता ने करवाल संभाली
जगी हुई ही नहीं बल्कि है जनता ने करवाल संभाली!
चले सींचने आज रक्त से हिमगिरि को मतवाले माली।
चली सूरमाओं की टोली
आज खेलने रक्तिम होली
लगा शुभ्र मस्तक पर रोली
बांध कमर से खंजर-गोली
हंस कर चले चढाने शाकल आज शीश की भेंट निराली।
पद्मिनियां चल पड़ी समर में
आग लगाने को अम्बर में
न्योछावर कर सारे गहने
चढा भेंट भाई को बहनें
निकली आज भवानी घर से बन कर रणचण्डी मतवाली।
बच्चे भी आ गये रंग में
लेने को प्रतिशोध जंग में
बाल-सिंह कर मसल रहे हैं
ओठ दांत से कुचल रहे हैं
चले पोतने चाऊ के मुख आज खेल में स्याही काली।
आज खेत-खलिहान बना रण
जूझ रहे मिट्टी से क्षण-क्षण
जर्जर साठ बरस के भी जन
जगा रहे मिट्टी के कण-कण
चला रहे दोनों हाथों से तेज घाम में आज कुदाली।
घन से पत्थर तोड़ रहे हैं
ईंट-ईंट से जोड़ रहे हैं
भेद-भाव के नाम भुलाते
गीत एकता के नव गाते
आज श्रमिक भी बढे सजाने नूतन निर्माणों की थाली।
भामाशाह सेठ की थैली
आज खुली है बिखरी-फैली
भिखमंगे तक जुटे हुए हैं
देश-प्रेम में लुटे हुए हैं
एक जून खा कर भी जिस ने अपनी सब सम्पति दे डाली।
आज गोलियों की बौछारें
उगल रही नभ में अंगारें
अरे संगीनों की झनकारें
सीमा पर देती ललकारें
चाऊ, तुझे चबा डालेंगे गर तुम ने फिर जीभ निकाली।
जगी हुइ ही नहीं बल्कि है जनता ने करवाल संभाली।
(चीनी आक्रमण के बाद 1962 में)
(दिनकर जी की ‘जनता जगी हुई है’ शीर्षक कविता पढने के बाद विस्तृत रूप देकर रचित)
हिमालय की पुकार
अश्रुनयन आज हिमालय ने पुकारा।
भारत के नौजवान, तुझे मा ने पुकारा।
शान्तिदूत! शान्ति है जवान मांगती
देख आंख खोल रक्तदान मांगती
मांगने से क्या किसी को शान्ति मिली है
शान्ति की पुकार पर तो भ्रान्ति मिली है
कर्णधार! व्यर्थ आज शान्ति का नारा।
कह दो कि रे लदाख क्या तिब्बत है हमारा
हर्ष औ कनिष्क को क्या तुम ने बिसारा
भूलते हो ह्वेनसांग फाहियांग को
रे कृतघ्न, धर्म-बुद्ध वर्द्धमान को
निश्चय ही डूब कर रहेगा तेरा सितारा।
देश है प्रताप का यह भूलना नहीं
कुछ देर की इस जीत से तू फूलना नहीं
मरते हैं यहां आदमी मूंछों की शान पर
निमुछिये चीनी, रहे हो खेल जान पर
ईंच-ईंच पर बहेगी खून की धारा।
मरती हैं यहां नारियां भी बात-बात पर
जलती है चिता जौहर की हाथ-हाथ पर
‘बादल’ यहां अनेक हैं तो लाख हैं ‘गोरे’
जान हथेली पै लिये चलते हैं छोरे
छोड़ कर लदाख को लग जाओ किनारा।
खेलना न आग से चीनी अफीमची
केशरी जगा है तू करना न ‘चाउ’ ची
पड़ती नहीं सुनाई तुझे क्या दहाड़ है
हिल रही है आज धरा, क्या पहाड़ है
चाह्वान* आ गया, न त्राण तुम्हारा।
आज राष्ट्र को न कोई स्वांग चाहिये
देश के जवान को तवांग** चाहिये
केक-बिस्कूट नहीं, राख चाहिये
घास खायेंगे मगर लदाख चाहिये
आज तुझे मानसरोवर ने धिकारा।
शक्ति के दबाव से हरगिज न झुकेंगे
गोलियों के सामने भी हम न रुकेंगे
हट जाओ हिमालय से, अरे! खून पी लेंगे
सूई की नोंक भर की जमी भी न हम देंगे
युग-युग से रहा है यही सिरमौर हमारा।
(* उस समय चाह्वान/चौहान नये प्रतिरक्षा मंत्री
के रूप में मेनन के स्थान पर आ गये थे
** उस समय तवांग शहर पर चीनियों
ने कब्जा कर लिया था)
दीपावली
संध्या
***
कैसी आज दिवाली आयी!
नीरवता को मार भगाने।
तमाच्छादिता अमा सजाने॥
दीपों की माला उर पहने संध्या आज निराली आयी।
चकमक करती दीप-शिखायें।
ज्योतित करती अखिल दिशायें॥
शैशव के इस मधुर क्षणों में चंचलता मतवाली लायी।
आपस में ये उलझ रही हैं।
बिगड़-बिगड़ कर सुलझ रही हैं॥
इस उलझन में ही भविष्य की रेखा उजली काली छायी।
मध्य रात्रि
***
अगणित ये दीपक जलते हैं!
मिट्टी के सुन्दर बने हुए।
हैं पूर्ण स्नेह से सने हुए॥
जगमग करते ये ओर-छोर कितनी तेजी से बलते हैं।
लाखों हैं आते परवाने।
कुछ पगले हैं, कुछ दीवाने॥
दीप-शिखा पर मर मिटने अल्हड़ से आज मचलते हैं।
यौवन का उद्याम प्रहर है।
मन की मस्ती एक लहर है॥
झंझावातों से हिलोर ले कितने इन में ढलते हैं।
शेष रात्रि
***
दीप की लौ टिमटिमाती।
स्नेह कुछ ही शेष है अब।
बर्तिका भी लेश है अब॥
जल रही निष्प्रभ अमा में श्रान्त हो कुछ कर न पाती।
उठ गये दिल पर फफोले।
आह तक को मुंह न खोले॥
गिन रही घड़ियां विदा की प्यार से उस को बुलाती।
है बिछुड़ती चिर-सहेली।
प्रश्न यह बनता पहेली॥
लाख कोशिश पर नहीं जो है कभी भी सुलझ पाती।
(‘विश्वमित्र’ समाचार-पत्र के दीपावली विशेषांक में प्रकाशित, 1 नवम्बर, 1959)
गीत
मुर्दे का जीना जीता हूं।
केवल सुधियों के हाथ थाम
तारे गिनता ही अविश्राम
नीरव रजनी के साये में
आंसू मैं हरदम पीता हूं।
मेरा सब कुछ है यहां धरा
पर इस से क्या मैं दूर खड़ा
आकर्षित क्या कर सकती है
मैं सब से गुजरा बीता हूं।
पैरों की धरती खिसक रही
अधजली कामना सिसक रही
इस मधुर ज्योति में रह कर
भी मैं काला कड़ुआ तीता हूं।
जग के सम्मुख है वर्त्तमान
है जहां गूंजता मदिर गान
पर मैं अतीत के टुकड़ों को
ले एक-एक कर सीता हूं।
(30-03-1952)
सुमन वन में खिल रहे हैं
सुमन वन में खिल रहे हैं।
प्रस्फुटित कुछ हो रहे हैं
सरस मद में खो रहे हैं
पुंज अलियों के विहंसते पुलक इन पर पिल रहे हैं
ले मधुर मुस्कान मुख पर
प्यार के मद नयन में भर
पवन दोले पर चढे ये मस्त हो कर हिल रहे हैं
सहन कर पाते नहीं जो
वहन सर लाते नहीं जो
पिछड़ मग में फूल कितने धूल मे फिर मिल रहे हैं
(26-03-1962)
होली
धूम मचाती होली आयी।
हरित भरित पल्लवित धरातल
सज्जित वर वसन्त ॠतु निर्मल
अरुण अधर परिधान हरित ले
कलिकों की हमजोली आयी
जग को सौरभ पान कराते
अधरों पर मुस्कान दिलाते
लाल पराग मेलते मुख पर
तरुण सुमन की टोली आयी
मुरझे भी खिल उठे रंग में
सरस गीत गाते उमंग में
मदहोशों ने पूर्व गमन के
आज भंग की गोली खायी
(होली, 1962)
चित्रपट
चित्र पट पर चल रहा है
है किसी की रूप छाया
ला जिसे पट पर सजाया
खींच कर सांसे किसी का
दिल इसी पर जल रहा है
चित्र पट पर चल रहा है
साथियों के दृग अचंचल
हेरते पट चित्र प्रतिपल
पलक में मेरे समाया
कोई मुझ को छल रहा है
चित्र पट पर चल रहा है
आ रहे क्षण-क्षण विलक्षण
कर रहे सम्मुख प्रदर्शन
रूप कितने, चित्र कितने
पर मुझे कुछ खल रहा है
चित्र पट पर चल रहा है।
अतीत
गीले स्वर, मेरे नयनों में आंसू भर भर आये
मेरी स्मृति में आ-आ कर मुझे अतीत रुलाये।
जीवन के वे दिन थे कैसे जब सुमनों की कलियां
झूम-झूम कर मुझे बुलाती थीं करती रंगरलियां
नहीं कभी भी सुन पाया था है पतझड़ भी आता
केवल याद दिलाने के हित ही वसन्त रह जाता
समझ न पाया कैसे बीतीं जीवन की वे घड़ियां
अब तो आंखें पिरो रही बस अश्रुकणों की लड़ियां
अब हैं दिन बांकी रोने के, गीले नयनों, रो लो
साथी कौन तुम्हारा होगा, अन्तरतम को धो लो।
विदा-यात्रा
1
घर जाने की धूम मची है
साथी हैं तैयार हो रहे
उठे शीघ्र जो अभी सो रहे
मेरे अलसाये नयनों में
नींद न, तन्द्रा शेष बची है।
आकुल हैं जल्दी चलने को
व्याकुल प्रियतम से मिलने को
सौंपेंगे उपहार प्यार से
कितनों ने शुभ भेंट रची है।
विलप रहा मेरा अन्तस्तल
नहीं पास मेरे कुछ संबल
ले कर क्या जाऊं विदेश से
ऐसी न कोई चीज जंची है
(बेगुसराय, 11-04-1957)
2
दूर होता जा रहा हूं!
वह मधुर कितना मिलन था
प्राण थे इक, अलग तन था
स्वप्न-सा अवशेष स्मृति
सिर्फ ढोता जा रहा हूं।
चला था अरमान ले कर
प्यार का सुचि ज्ञान ले कर
दिया था तू ने मुझे जो
उसे खोता जा रहा हूं।
फिर मिलेगा प्यार से जग
उठ रहे हैं राह में पग
विरह की चिर वेदना से
हाय, रोता जा रहा हूं।
(बेगुसराय, 11-04-1957)
3
जा रही गाड़ी हमारी!
कर रही चरमर चररमर
जा रही पथ पर निरन्तर
ढो रही सर पर चढाये
सैकड़ों का बोझ भारी।
है बहुत ही दूर मंजिल
औ पहुंचना शीघ्र मुश्किल
लांघती मरु मेरु समतल
भागती है यह सवारी।
वेदना उर में छिपाये
अश्रु पलकों में सुखाये
मौन तन्द्रिल हूं संजोता
मैं किसी की यादगारी
(बेगुसराय-सुपौल पथ पर, 11-04-1957)
4
मुझ को कहते हो हंसने को!
सूखा सावन सरिता का जल
आया न भटक कर भी बादल
इस शिशिर शीत में फिर से तुम
कहते हो उसे बरसने को।
मुरझाती भी है नयी कली
सूखे रेतों पर बढी-पली
मिल सका न सींचन-प्यार जिन्हें
अधिकार उन्हें क्या वसने को।
मेरा वसन्त भी बीत चला
मेरे अन्तर को भुना-जला
आया निदाघ यह दारुण बन
फिर जले हुए में डंसने को।
(सुपौल, 10-05-1957)
कविता
प्रातःकाल की इस वेला में
जिसे कहते हैं लोग ब्रह्ममुहूर्त
उस से पहले ही
मैं होता हूं सड़क पर।
पूर्व की ओर क्षितिज पर भोरुकवा तारा
उपर की ओर उठता रहता है।
और मैं सारे सुख दुखों को भूल
उस सुन्दर वेला में
कविता की सामग्रियों को बटोरता हुआ
लौट आता हूं घर को।
बैठ जाता हूं कागज-कलम ले कर
कविता लिखने।
तभी फुदकने लगता है गोरैया का एक जोड़ा
चूं-चूं करता हुआ मेरे कमरे में
और जहां-तहां गिरे दानों को चुन
अपने बच्चों को खिलाने में
हो जाता है व्यस्त।
मैं भी उन्हें देखने में हो जाता हूं तल्लीन
और पत्नी द्वारा आगे में रख दी गयी
चाय कि प्याली से उठती रहती है भाप।
गोरैया के जोड़े को देखता रहता हूं –
देखता रहता हूं
और इस तरह
ठंढी हो जाती है चाय कभी-कभी।
पत्नी आ कर दिला जाती है याद
और साथ ही कर जाती है
घरेलू चीजों की फरमाइश।
लगता हूं सोचने --
गोरैया उन्मुक्त है
मगर उसे भी चिन्ता है
खाने-खिलाने की।
इतना बड़ा परिवार है अपना
बच्चे हैं, काम है, धंधा है –
सारे चित्र सामने नाच जाते हैं।
और पहले आये विचारों की स्रृंखला
टूट जाती है
कविता का श्रोत सूख जाता है
और सूख जाती है
कलम की नोक पर आयी स्याही भी।
तब तक आ जाते हैं
मेरे खेतों में काम करने वाले मजदूर
सुबह सात बजे ही
फटे कपड़ों से अपनी देह को
ढांकने का करते हुए व्यर्थ प्रयास
जाड़े की कंपकंपी में।
चला जाता हूं तालाब पर
घर के आगे काम करवाने उन से
और हाथ में कागज-कलम
रहता हूं धरे ही।
पछवा हवा के झोंके आते हैं
जैसे-जैसे सूर्य उपर को बढता जाता है
और सुबह की कंपकंपी
गर्मी में बदलती जाती है।
सामने गेहूं के खेत हैं
जो सूखते जा रहे हैं हवा के झोंके से
और मुर्झा सी गयी हैं गेहूं की बालियां।
गर्मी बढ रही है
जैसे-जैसे बढता जाता है सूर्य उपर को
नीचे डुबकियां लगाते हैं कौए
कांय-कांय करते हुए तालाब में
और उपर बगुलों का झुण्ड
सामने से उड़ता हुआ
निकल जाता है नीलाकाश में।
गर्मी अच्छी लगती है कुछ देर
मगर धीरे-धीरे धूप हो जाता है असह्य
और मैं खींच ले जाता हूं कुर्सी
कटहल के पेड़ के नीचे।
मजदूर काम रोक पीने लगते हैं बीड़ी
और लेते हैं कुछ सुस्ता
फिर लगते हैं कहने
अपनी-अपनी रामकहानी –
जलपान दिलवा दीजियेगा कुछ अधिक, मालिक
खाना नहीं मिला रात में
- पैसे नहीं थे, कोटा नहीं ले सका
- और अल्हुआ भी तो
हो गया है एक रुपये किलो
- आ पहुंचा है उपर से मुहर्रम
जंग लगाता है लड़का
जिसे देने होंगे नये कपड़े
- एक मुर्गी देती थी अण्डे
उसे भी चुरा ले गया कोई।
ऐसी ही समस्या दूसरे की
इसी से मिलती-जुलती तीसरे की
और चौथे की भी।
वही रोटी, भूख, पेट, कपड़ा
रोजी-बेकारी और काम।
इस का अन्त है भी कहीं !
सामने तालाब मे
सूखता जा रहा है पानी धीरे-धीरे।
किनारे के लघु पौधे भी जा रहे हैं सूखते
किन्तु कटहल में मोंछे आ रहे हैं
और आ रहे हैं आमों में मंजर।
पुनः सूख गयी है मेरी कलम की नोक
और सूख गया है कविता का श्रोत।
नहीं लिख पाया हूं कुछ भी मैं।
पानी आग को बुझाता है मगर
आग भी तो पानी को सुखा देती है।
बीच में आ जाता है कोई भिखमंगा
कभी सच्चा कभी बनावटी
और लगाता जाता है हांक पर हांक।
डांटता हूं किसी को
और किसी को दिलवा देता हूं कुछ।
मगर लगते हैं ये भिखमंगे मुझे अच्छे –
बेफिक्र-बेपरवाह
न आज की चिन्ता न कल की।
कितना सरस जीवन है इन का!
इन के हृदय में अवश्य ही
उमड़ती होगी कविता की सरस धारा
और इसी लिये तो
सच्चा कवि भिखमंगा ही होता है शायद!
दिन भर की इन उलझनों के बाद
पहुंचता संध्या में दवा की दुकान पर।
कोई खरीदता है ‘सिवाजल’ की एक गोली
अपने बच्चे के घाव के लिये
कोई रतौंधी की दो गोलियां
तो कोई तीन गोलियां कफ की।
जानता हूं
इन एक-दो गोलियों से
न तो छूटेगा घाव
न जायेगी रतौंधी
और न ही आराम होगा कफ।
मगर पैसे के अभाव में
कैसे खरीदेंगे ये पूरी खुराक
जब की पेट की भी नहीं जुट पाती है।
पेट की खुराक मरते दम तक
चलती रहती है न!
तब तक आ जाते हैं पण्डित जी
चालीस रुपये में जोड़ा धोती खरीद कर।
इन्हें यजमानों से अब
अच्छी धोतियां नहीं मिलती
खरीदना पड़ा है – ऐसा कहते हैं।
दाम कितना गया है बढ कपड़ों का।
इस तरह के और भी लोग रहते हैं आते-जाते
और चौराहे से लोग निकलते रहते हैं
हा-हा-ही-ही करते।
चौंका देती है मुझे
अस्पताल में मरे किसी मरीज के
स्वजनों के रूदन की आवाज
और उधर मदमस्तों की टोली
निकल जाती है सड़क से गालियां बकते हुए।
कौन सुनता है किस की इस रेल-पेल में!
मगर मैं हो जाता हूं स्तब्ध
मानो समस्याओं का ठेकेदार मैं ही हूं।
ज्यों-ज्यों करता हूं प्रयास
इन से छुटकारा पाने का
इन का जोर पकड़ता जाता है हमला।
जाड़े में भी उष्णता बढती जाती है और
हृदय जलने लगता है अन्तर्द्वन्द्वों से।
कविता का श्रोत सूखता जाता है
और लौट आता हूं घर को।
यही क्रम नित्य चलता रहता है –
चलता रहता है और
नहीं लिख पाता हूं कविता मैं।
नित्य की इस कविता में
स्वयं जो कविता हो गया हूं मैं।
क्या यह मेरा जीवन कविता नहीं है ?
ललित बाबू
प्रयास करता हूं भुला देने का जितना भी
तुम्हारे भिन्न-भिन्न चित्र
स्मृति-पटल पर उभरते जाते हैं।
तुम्हारा खिला हुआ चेहरा
बीच से थोड़ा रिक्त अग्रिम दन्तपंक्ति की चमक
उन्नत ललाट और
ओठों पर खेलती हुई मुस्कुराहट याद आ जाती है।
कोसी की कल-कल निनाद करती हुई धारायें
वीरान इलाकों में उगी फसलों की झुकी बालें
धुआं उगलता हुआ
दूर-दूर तक फैले रेलपथों पर दौड़ता हुआ इंजिन
जर्जर स्टेशनों पर नवनिर्मित मकान
याद दिला देते हैं बरबस तुम्हारी।
गीतों में, छ्न्दों में, कविताओं में बांध कर
रखने का प्रयास किया जा रहा है तुम्हें
जा रहे हैं बनाये स्मारक तुम्हारे
और हो रहा है नाम पर तुम्हारे
नयी-नयी संस्थाओं का निर्माण।
मगर तुम उड़ चुके हो छोड़ कर हमें।
पीठ पीछे के यशोगान मुझे भुला सकेंगे क्या ?
अब फिर न सकेगी मिल कभी पीठ पर
प्यार भरी वे थपकियां तुम्हारी
तुम्हारी मधुर वाणी और
स्नेहमयी फटकार फिर सुनायी न देगी कभी
क्योंकि तुम लौट कर न आओगे
न आओगे।
चले गये हो रूठ कर तुम न!
चले गये हो उस पार
जहां बिखर गया होगा एक नया प्रकाश।
ओ धरती के इंजीनियर!
तुम ने प्रारम्भ कर दिया होगा वहां भी नवनिर्माण
चुप बैठने वाले पुरुष जो न थे तुम।
मगर रखना खयाल एक बात का –
मत भेजवाना अपने जैसा किसी को भी
यहां भूल कर के
कृतघ्नों की जमात में उस का सम्मान न होगा।
चलता ही रहता है यहां
आत्मघातियों का षड्यंत्र।
साकार की नहीं होती है पूजा यहां
मूर्तिपूजक हैं न हम!
यहां सब्जियां तौली जाती हैं हीरे से
सूर्य के उपर फेंका जाता है धूल
समझा जाता है जनद्रोही ईसा और गांधी को।
कंटीली झाड़ियों में खिले गुलाब को
किसी ने तोड़ लिया।
अच्छा हुआ तुम चले गये!
प्रयास करता हूं तुम्हें भुला देने का
फिर भी तुम्हारे अनेक चित्र
सामने आ जाते हैं
और अनायास ही लुढक जाती है
आंसू की दो बुन्दें
और समझ लेता हूं
ललित उसी को मैं!
घिसा हुआ सिक्का
मैं घिसा हुआ एक सिक्का हूं।
अल्मूनियम का नहीं टला
पीतल का भी हूं नहीं ढला
छः गुणा अधिक है दाम बढा
ऐसा चांदी का पक्का हूं।
हूं एक जात भारतवासी
जैसा मक्का वैसा कासी
हूं मैं इस्लामाबाद नहीं
बंगाल देश का ढक्का हूं।
मैं नहीं किसी का बना दास
जो रखता मुझ को सदा पास
अनवरत चला, इस लिये घिसा
कि खाते रहता धक्का हूं।
धनियों का नम्बरी नोट नहीं
जो खोजा करता ओट कहीं
खून-पसीने की कमाई
मैं तो गरीब का टक्का हूं।
बढता जाता है वर्तमान
ले कर भविष्य का नव-बिहान
जिस रथ पर, उस का मैं भी
एक मजबूत पुराना चक्का हूं।
खोटा तो नहीं, छोटा भी नहीं
चलनी का मैं टोटा भी नहीं
सच पूछो तो मैं इसी लिये
बहुतों का अब भी कक्का हूं।
सेलटैक्स इन्सपेक्टर आया
जंगल से ज्यों भूल-भटक कर
या सर्कस से हाथ झटक कर
या उपर से स्वयं लटक कर
किसी किसी को उठा-पटक कर
किसी गांव में शेर समाया
सेलटैक्स इन्सपेक्टर आया।
नानी गयी सिधार किसी की
बीबी पड़ी बीमार किसी की
घर से आया तार किसी को
गया है लकवा मार किसी को
आज अचानक व्यापारी घर
लाख रोग का लश्कर आया।
कहा किसी ने नाना आया
धूम मची कि मामा आया
पड़ी कहीं से मुझे सुनाई
है मेरी जोरू का भाई
गली-गली में शोर हुआ कि
विजिनेश डाइरेक्टर आया।
जो व्यापारी तगड़े-मोटे
या जिन को मिलते हैं कोटे
पहन रहे वे आज लंगोटे
छिपा-छिपा कर नमरी नोटे
जैसे आज यहूदी घर में
हर-हिटलर डिक्टेटर आया।
बन्द हुई घर की कीवारें
कितने फांद गये दीवारें
ग्राहक जिम्मे पैसे छूटे
इस भगदड़ में कितने लूटे
घुसे सेठ घर ज्यों अपने बिल
में बिल्ली डर मूस समाया।
गांधी या पटेल मर जाये
पर जो कभी न शोक मनाये
उन के मानो बाप पधारे
या दादा हैं स्वर्ग सिधारे
उन के भी सब काम बन्द हैं
देख तमाशा कवि शरमाया।
तोंद से गिरती धोती पकड़े
सेठ बने हैं बलि के बकरे
दीमक चाटी रोकड़-खाते
साथ मुनीम उलटते जाते
जैसे सरकारी दफ्तर में
कोई नया आडीटर आया।
गिटपिट करते हैं व्यापारी
आया जमीन्दार सरकारी
किनी बाप ने यह जमीन्दारी
जिन की चाहिये मालगुजारी
मरे जमीन्दारों के शव पर
नवयुग मनी कलेक्टर आया।
चाहे कोइ ग्राहक को लूटे
या दिन भर अपना सर कूटे
ये सट जायेंगे यों छिप के
कम्बल ज्यों बाबा से चिपके
पैत्रिक हिस्सा लेने सब से
यह दफ्तरी पार्टनर आया।
देखो हाल सिनेमाघर का
घूंट रहा दम प्रोपराइटर का
मुफ्तखोर दर्शक की नानी
मरी आज, उतरा यों पानी
गिनती होगी आज हौल में
कह गर्दन दे हाथ भगाया।
ज्यों कर में ले कर मालायें
परिछे दूल्हे को बालायें
आगे पीछे घेरा डाले
सर्कस और तमाशे वाले
नये बने कांग्रेसी के बिच
जैसे कोइ मिनिस्टर आया।
हो जैसे खातिर दूल्हे की
सूरत हो चाहे चुलहे की
होती वैसी इस जुलहे की
हड्डी टूटेगी कुलहे की
अगर नहीं नैवेद्य चढायें
व्यापारी लो ‘घनचर’ आया।
चलो, उठो, झट करो तैयारी
सजा थाल में पान-सुपारी
स्वर्ण शुभम कुछ रखो रुपल्ली
कम से कम कागज की छल्ली
रे, सुराज के युग का ईसा,
मूसा, अल्ला, इश्वर आया।
जय हे जय इन्सपेक्टर देवा
करहुं कृपा अब खाबहुं मेवा
लेहु जिते मन चाहिय तेरे
मो सम तुमरो भक्त घनेरे
आज रकम की इस दुनियां में
तेरा ही ला आर्डर छाया।
नाथ, दूत आर्डरली तेरो
चतुर बड़ो स्वामी से चेरो
मोट रकम तू लो इक बारा
वह पावत है बार हजारा
क्योंकि तेरे शुभागमन की
वही खबर हर बार जताया।
करना दया हमारे उपर
अगर उपस्थित हों कोई अफसर
या उन के कोई सगा सहाई
मैंने जिन की आरती गायी
करने को व्यापार शहर में
कवि ने भी काठघर बनाया।
(03-02-1957)
किरानी
मैं दफ्तर का एक किरानी।
चढे पहर भर दिन मैं उठता
पहले दम बीड़ी पर कसता
टट्टी जाता लोटा मलता
कुछ खा कर दफ्तर को चलता
जो है मेरा पटना रांची
गर्मी जाड़े की राजधानी।
तीन मील दूरी पर दफ्तर
दम लेता मैं वहां पहुंच कर
मिलता रिक्शावान राह पर
झुकता मुझे सलाम बजा कर
हंस कर है आगे बढ जाता
समझो है इस के क्या मानी।
जभी पहुंचता हूं मैं दफ्तर
जम कर बैठे रहते अफसर
मैं सलाम करता हूं झुक कर
वे मुंह बाते लेट समझ कर
उन की त्यौरी चढी देख कर
मैं हो जाता पानी-पानी।
मेरी कुर्सी की क्या ब्यूटी
बांह एक उस की है टूटी
उस पर बैठ बजाता ड्यूटी
कलम हूं दिन भर घिसता ठूठी
तीस रुपये महीने पर घिसती
रहती मेरी चढी जवानी।
जिसे काम है मुझ से रहता
बड़ा किरानी बाबू कहता
हाथ जोड़ता पैर पकड़ता
लाला, भैया, मुंशी कहता
उस क्षण है क्या कोई जंचता
मुझ सा बढ कर जग का प्राणी।
औ जब कोई नेता आ जाता
मेरी कुर्सी पर जम जाता
अपनी कुल फरमाइश सुनाता
देर हुई बस आंख दिखाता
लहू घूंट पी रह जाता हूं
देख उतरता अपना पानी।
पांच बजे जब फुर्सत पाता
दौड़ा फिर निज घर को आता
साहु झमेली को घर पाता
हूं जिस का उधार मैं खाता
सुन कर उस का नया तकाजा
मानो मर जाती है नानी।
पत्नी मेरी तभी मचलती
साड़ी-साया लाने कहती
मैं कहता पैसे की सख्ती
सिर अपना धुनने वह लगती
खट-पट हो जाता दोनों में
मुश्किल होता खाना-पानी।
गुस्से में घर से चल देता
दो पैसे का चखना लेता
संग ले दोस्तों को बन नेता
मधुशाला को मैं चल देता
पीता हूं छक कर जब प्याला
मिट जाती दुख दर्द निशानी।
बड़ी रात को जाता हूं घर
दे कर इधर-उधर का चक्कर
छाती पर रख कर मैं पत्थर
सुनता हूं बीबी का कटु स्वर
उठते भाव अनेकों मन में
किन्तु मूक रहती है वाणी।
तभी सोचता हूं मैं मन में
आग लगे मेरे इस तन में
क्यों न भाग्य को पलटूं क्षण में
होगा क्या ईमान में प्रण में
धूल झोंक सब की आंखों में
खुल कर काटूंगा मैं चानी।
कांय-कांय बच्चे हैं करते
कभी खिलौना देख मचलते
उन्हें चूम कर डरते-डरते
बहलाता कुछ कहते-कहते
पहली तारीख का वादा कर
उन्हें सुनाता कोई कहानी।
नहीं मुझे है अपना भी घर
फिर भी बच्चे हैं दर्जन भर
करते रहते हैं सब झर-झर
रात बिताता हूं मैं जग कर
शादी करने योग्य हो गयी
बेटी मेरी तीन सयानी।
भर दिन रहता फाइल उलटता
हूं अविराम कलम मैं घिसता
फल जिस का अफसर को मिलता
इज्जत मिलती वेतन बढता
चाटूंगा क्या ले इमान को
बड़े-बड़े करते बेइमानी।
बेहतर मैं कांग्रेसी होता
यही न कि पहले कुछ खोता
पीछे चल एमएलए होता
सुखसागर में खाता गोता
कभी न रोता सुख में सोता
होती क्यों कोई परेशानी।
ये विचार उठते रह-रह कर
तभी देखता फाइल उलट कर
उलट रहे पन्ने हैं फर-फर
बीत रही है रजनी सर-सर
पर न बीतती मेरे जीवन की
यह अविचल अमिट कहानी।
विटप से --
यदपि तिहारो हौं ढलने की वेला तक
‘ना’ हीं कछु काम कियो ‘ना’ हीं करबाओगे
सारा सुवास पास निज ही तक सीमित है
दास ‘ना’ ही काहु को हास ही कराओगे
‘ना’ ही कोउ तोड़ि सका ‘विप्लव’ इन डारिन सौं
मुरझा कर नाहक ही धूल में गिराओगे
खिलेंगे नवीन पुष्प विटपवर, अनेक किन्तु
सदा के लिये बिछुड़े को लख कर पछताओगे
(अनीस द्वारा रचित ‘सुनिये विटपवर पुहुप तो
तिहारो हौं’ को पढ कर उस के बाद फूलों द्वारा
विटप को मैंने इस प्रकार कहलवाया है।)
(01 जनवरी, 1977)
प्राब्लेम्स
समझता हूं कि दुश्मन बन खड़े होंगे पुराने दोस्त भी अब
फंसाने के लिये मुझ को कोई षड्यन्त्र होगा।
मगर कुर्बानियां होंगी तभी तो तड़प कर के
उठेंगे शेर गर्जन कर, सबल गणतन्त्र होगा।
चुन-चुन कर जलाना चाहता हूं राह में कांटे बिछे जो
शोला हूं न शबनम हूं, धधकता फ्लेम्स हूं मैं।
समस्यायें बहुत हैं, क्या उन्हें सुलझा सकूंगा
खुद भी जमाने के लिये प्राब्लेम्स हूं मैं।
( लघु-पत्रिका ‘प्राब्लेम्स’ के प्रकाशन के अवसर पर)
मस्तानी (मोटी) नायिका
गोरी सी छोरी गाल गुलगुल पकोरी सी
छाती धड़काती मदमाती इठलाती है।
बैलून सी बैगन सी बोतल अरु बेलन सी
बत्तीसी चमकाती ‘विप्लव’ व्याकुल बनाती है।
कद्दू सी ककड़ी सी कटहल अरु मकड़ी सी
लस्से लगाती पुनि जाल यों बनाती है
हस्तिनी मस्तिनी सी पीन-स्तनी बाला की
मन्थर मिसाल चाल हृदय वेध जाती है।
(07-12-1957)
एक कहानी :
परिवर्तन
आज छब्बीस जनवरी का प्रभात था। शहर के कोने-कोने में स्वतन्त्रता दिवस मनाने की जोरदार तैयारी हो रही थी। क्या धनी, क्या गरीब, सभी हाथों में झण्डा लिये प्रभात फेरी में निकल पड़े। मालूम होता था, सारा शहर जैसे उमड़ पड़ा हो। छात्र भी किसी से पीछे नहीं थे। कालेज के छात्रावास में काफी सरगर्मी थी। दो घंटा रात रहे कई छात्र जग गये थे और सोतों को उठा रहे थे।
राजेन्द्र ने पूछा – ‘शम्भू, शशि नहीं उठा क्या ? उसे उठा दो न भाई।‘
‘ अरे! शशि? उसे तुम नहीं पहचान सके हो, राजू। वह अमीर आफिसर का लड़का है न। वह इस स्वतन्त्रता दिवस में सम्मिलित हो, यह तो गैर-मुमकिन है।‘
‘कैसा तुच्छ विचार है तुम्हारा! उसे जा कर उठाओ, देखो वह हमारे साथ चलता है या नही।‘
‘ना भाई, मैं उसे जगाने न जाऊंगा। मैं उस की नस-नस पहचानता हूं। अभी उस दिन जब हम लोगों ने प्रिन्स आफ वेल्स के विरुद्ध कालेज पर झण्डा फहराया था तो वह हम सब लोगों को अनुशासन तथा गुरूभक्ति की दुहाई दे रहा था। उस से उम्मीद करते हो कि वह आज के समारोह में हमारा साथ देगा?’
राजेन्द्र चुप हो गया और उस ने फिर शम्भू से अधिक बात न की।
सभी लड़के कालेज के कम्पाउण्ड में इकट्ठे हो गये थे। सबों के हाथ में राष्ट्रीय झण्डा लहरा रहा था। और एक अभूतपूर्व उत्साह था उन के चेहरों पर। नारा लगाते हुए वे कम्पाउण्ड के बाहर हुये और शहर की ओर रवाना हो गये।
सूर्य की किरणें मुंह पर पड़ने से शशि की नींद टूटी। अलसाता हुआ वह अपनी कोठरी से बाहर निकला, लेकिन किसी साथी छात्र की आहट तक न मिली। सभी कोठरियों में ताले लगे हुए थे। पथ की ओर से नारों का शब्द आ रहा था और तब उस की समझ में सारी बातें आ गयी। शायद होस्टल का नौकर मोती या खाना बनाने वाला पण्डित रसोई बना रहा हो, यह सोच कर वह रसोईघर की ओर चला। नजदीक जा कर उसने पण्डित और नौकर को बात करते सुना। उसे अपना नाम सुन कर आश्चर्य हुआ और वह आड़ में छिप कर उन की बातें सुनने लगा।
‘शशि एक अमीर का लड़का है, मोती। तुम उसे जानते नहीं। उस का पिता डिप्टी कलट्टर है। वह सुराज वालों का साथ कैसे देगा ?’ – पण्डित ने मोती से कहा।
‘अमीर लोगों और बड़े-बड़े अफसरों को सुराज होने से नुकसान होगा क्या ?’ – मोती ने अनभिज्ञता प्रगट करते हुए पूछा।
‘ अंग्रेजों के जाने से गरीबों की पूछ होगी। देखते हो, महात्मा गांधी क्या कहते हैं। इसीलिये अमीर लोग सुराज नहीं चाहते।‘
‘ ठीक कहते हो, दादा। शशि बाबू का पिता डिप्टी कलट्टर है न। इसीलिये वह जुलूस में नहीं गया।‘ – कह कर मोती चुप हो गया और पास ही पड़े सिल्ले पर मसाला पीसने लगा।
शशि उल्टा पांव वहां से भागा और अपनी कोठरी में बिछौने पर औंधे मुंह आ कर पड़ गया। उस के मस्तिष्क में जैसे तूफान उठ रहा था। आत्मग्लानि से वह मरा जा रहा था। उसे झुंझलाहट आ रही थी अपनी अमीरी पर। उस के दिमाग में पण्डित और मोती की बातें चक्कर मार रही थीं। वह सोच रहा था, क्या अमीरों और आफिसरों में देशभक्त नहीं? वह अमीर का और एक डिप्टी कलक्टर का लड़का है, इसी लिये लोग उसे देशद्रोही समझते हैं। इसी लिये तो लड़कों ने उसे आज के प्रदर्शन में सम्मिलित होने के लिये कहा तक भी नहीं।
होस्टल का नौकर आया और कहा – ‘बाबूजी, पहर भर दिन चढ आया। उठिये न।‘
लेकिन वह एक बार उस की ओर देख कर रह गया। उसे उठने की इच्छा ही न होती थी।
लड़कों का दल शहर से लौट कर आ गया। और तब वह अलसाता हुआ उदासचित्त हाथ में लोटा ले कर कोठरी से बाहर निकला। उसे मालूम हो रहा था, सभी लड़के उसे घूर रहे हैं। वह बिना किसी ओर देखे लज्या से सिमटता हुआ पैखाने की ओर चला गया।
सन 1942 का अगस्त ! देश के कोने-कोने से धधकती हुई लपटें।
देश के कर्णधार नेता जेल के सींकचों में डाल दिये गये थे और कितनों के हाथों में जंजीरें खनखना रही थीं। आजादी के मतवालों के खून से पृथ्वी लाल हो रही थी, फिर भी वे रुकने का, थमने का नाम तक न लेते थे।
आजादी के दीवानें नौजवानों की टोली जीवन और मरण दो घाटों के बीच संघर्ष करती हुइ बाहर निकली। उन की धमनियों में गर्म-गर्म रक्त प्रवाहित हो रहा था। सिर पर गांधी टोपी, शरीर पर सफेद खादी का कुर्ता और हाथ में तिरंगा झण्डा लहरा रहा था। वे उमड़ते चले जा रहे थे बल खाती हुई बरसाती नदी की तरह उस महासागर की ओर, जहां सभी मिल कर एकाकार हो जाते हैं। ‘इन्कलाब -- जिन्दाबाद’ का नारा लगाते हुए नौजवान आगे बढे – रामपुर थाने की ओर, जहां नौकरशाही अपनी बन्दूकों और संगीनों को ताने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दम तोड़ती हुई लाश को मकरध्वज दे कर जिलाने का व्यर्थ प्रयत्न कर रही थी।
पन्द्रह वर्ष की नैजवानी की मस्ती में इठलाता हुआ शशि, जो कालेज से अभी-अभी चार ही दिन हुए घर लौटा था, उस टोली का नेतृत्व कर रहा था। सभी चल रहे थे उस के पीछे-पीछे कदम से कदम मिला कर पागलों की तरह, मानो गाड़ी के डब्बे को कोई शक्तिशाली इंजिन खींचती हुई अपने लक्ष्य की ओर भागी चली जा रही हो। ‘इन्कलाब – जिन्दाबाद’, ‘अंग्रेजों, भारत छोड़ दो’ का नारा लगा और टोली थाने के गेट पर पहुंच चुकी थी।
‘ भाग जाओ यहां से, वरना गोलियों से भून दिये जाओगे।‘ – बन्दूक की नली को उन की ओर चमकाते हुए यहां के थानेदार ने कड़क कर कहा।
‘पुलिस हमारे भाई हैं।‘ की आवाज से आकाश गूंज उठा और नौजवानों की टोली आगे बढती ही गयी।
‘ मैं फिर सोचने का मौका देता हूं। भाग जाओ यहां से। क्यों व्यर्थ में जान देने को तैयार हो ?’
‘ हम थाने पर कब्जा करेंगे। आप भी तो हमारे ही भाई हैं, इसे छोड़ क्यों नहीं देते ? ‘ – शशि ने आगे बढ कर जवाब दिया।
‘ हुः, भाई हैं! फायर करो जी, ये गुण्डे वैसे टलने वाले नहीं।‘ – थानेदार ने सिपाहियों को आज्ञा दी।
धांय ! धांय ! धांय !
और दूसरे ही क्षण शशि के साथ ही तीन और लाशें झण्डे को छाती से चिपकाये जमीन पर छटपटा रही थीं।
लेकिन नौजवानों की टोली ने हिम्मत न हारी, बढते ही गये थाने की ओर – धुआंधार गोली की वर्षा में। थानेदार की हिम्मत पस्त हो गयी और वह अपने साथी सिपाहियों को ले कर थाने के पिछवाड़े से निकल कर नौ-दो-ग्यारह हो गया।
सबों ने देखा – थाने पर राष्ट्रीय झण्डा फहरा रहा था – फर्र ! फर्र ! फर्र !
पद्य (मैथिली) :
आत्म परिचय
सूर सूर तुलसी शशि उडुगण केशव दास
‘विप्लव’ कवि डिबिया भेला, अपनहि घरक प्रकाश
अपनहि घरक प्रकाश, तेल अछि एके चौठी
माटिक डिबिया फुटल, अल्हुक अछि कतरल मुंहठी
‘विप्लव’ जी घिघियाथि वाह रे माटिक डिबिया
बिनु तेलक सुसुंआथि जेना बांसुरी बिनु जिभिया
पुनः बहैत अछि जोर सौं कनिको यदि बसात
फकफकाइत छी वेग सौं थरथराइत अछि गात
थरथराइत अछि गात, प्राण हम कोना बचाबी
एकहि टा अछि आस, शरण आंचर तर पाबी
‘विप्लव’ लेथि उसांस नुका कुच युग गिरि कन्दर
छी हम कवि विख्यात परम निज घरहिक अन्दर
मनाउनि
आजुक दिवस सुहावन मास भेल सावन हे
भेल दहिन भगवान घेरल घन पावन हे।
गोर लागौं तोरा इनरदेव मन मोरा आतुर हे
जल लै जगत बेहाल तो भरह भुवनपुर हे।
बरसत रिमझिम मेघ सुखल भूमि पटतइ हे
हर लै जाएब खेत, हमर धनी जलखइ हे।
नहु नहु जोतब खेत, जुड़ाएत धरती हे
झमझम रोपब धान, बिहैन देत घरनी हे।
देखब धानक शीश जखन हम अगुरब हे
ओतहि गंबाएब रैनि खोपड़ि बीच विहरब हे।
जहिना हमर धनी केश पवन दोल झुलतइ हे
शीशक संग मोर तंग विकल मन भुलतइ हे।
काटि बान्हब हम बोझ दुलकि धनी उघतइ हे
लचकैत अंग निहारि कतेक जन जरतइ हे।
सब टा अपन होइत धान न एमकी महाजन हे
चानीक हंसुली गढाएब अहां लै साजनि हे।
छोड़लक बादल बुन्न दामिनी आब दमकइ हे
‘विप्लव’ हंसु तजि मान अन्हार घर चमकइ हे।
गीत
( तर्ज – समदाउन )
रैनि गंवावल रस पीबि मधुकर प्रातहि उड़ि चलि देल
एकसरि व्याकुल चित्त कुमुदनि ठाढे हरइत रहि गेल
सांझ पलटि पुनि आवत भंवरा कुमुदनि उर बड़ आस
हेरइत पंथ दिवस भरि थाकल मधुकर कैल परवास
अरुणक उदय भेल ‘विप्लव’ सम हृदय दगध कय गेल
नेह लगावल निशि निशिकर सौं दिनकर बैरी भेल
नवयुग के निर्माण होइत अछि
1-
करनी-धरनी साढे बाइस
बनताह परसिडेन्टे भाइस
आइ-काल्हि के युवक लोकनि कैं
एहने त अरमान होइत अछि।
2-
युवक छात्र जे लीडर भारी
सब कैं आइ पढैतछि गारी
पबितहिं नीक नौकरी तिनका
घूसे-टा जलपान होइत अछि।
3-
मारे माछ न उपछे खत्ता
तिन्हका नहिं बीतो भरि लत्ता
भत्ता जे अफसर नित टानथि
तिनकर उच्च स्थान होइत अछि।
4-
शुद्ध मातृभाषा नहिं जानथि
सेक्सपियर अपना कैं मानथि
एहनो बुड़ि अंगरेजिया सब कैं
जनता मे सम्मान होइत अछि।
5-
सुद्धाक मुंह कुक्कुर चाटैतछि
कमौनिहार कैं सब डांटैतछि
अनकर खाए कटकी खड़खड़बै
तिनकर मुंशी नाम होइत अछि।
6-
जे घर-घर मे करबथि दंगा
खन पटना छथि खन दरभंगा
एहन मुकदमाबाज समाजक
काबिल चतुर सयान होइत अछि।
7-
जे सब छथि बड़का खुरलुच्ची
बाटहिं पर खुनै छथि घुच्ची
बिना बजौनहि ओ घर-घर के
परम पूज्य मेहमान होइत अछि।
8-
मुंह देखै मे छनि चटगर सन
वेसो यद्यपि छन्हि ढरकल सन
नित नेताक दरबार करथि जे
से महिला लिडरान होइत अछि।
9-
काबिल घास किएक नहिं गढताह
पण्डित गुणी किएक नहिं मरताह
कवि जोगीड़ा गीत रचै छथि
काग जखन यजमान होइत अछि।
10-
किये बनत क्यो काबिल-काजू
उपरहिं अल्हुआ लाउ तराजू
सेर, असेरा, पौआ, अधपै,
कनबा तक गणमान होइत अछि।
देश-दुनियां
मूस बिलाड़िक मीत बनल अछि
सुनल चीन स पाक जुड़ल अछि
हिन्दक नेनो भुटका चीनी पाक लड्डू नित खाइतछि
चाउ-माउ सब ढोल बजाबथि
चुट्टी बुझि गज कैं ललकारथि
भरल पेट पर नित्य हिन्द मे चीनीक शरबत पान होइतछि
शान खान अय्यूब बघारथि
चाउ एन लाइयो आंखि गुराड़थि
संकरातिक दिन बड़ा चाव स एहन लाइ जलपान होइतछि
चाउ माउ मे खाउ समैला
तीनू मिलि गिरगिट लग एला
बख्शीजीक बक्सीस मिलत ता अब्दुल्ला के पाक बनैतछि
नाकबला विलाएत वासी
मूड़ मुड़ाए भेल सन्यासी
मुदा आइ निमुछिया चाउ नाकक तर मे हाथ फेरैतछि
पहिने पिन्हल कोइड़लाक माला
पुनि कंठी तुलसी मृगछाला
बनि वैष्णव राजा महेन्द्र जी भारत मे टोहकी लगबैतछि
दिल्ली नहि थिक तिबतक लस्सा
जै पर चाउ लगौलन्हि रस्सा
दिल्लीक लड्डू तीत होइतछि जहन चाऊ सन मीत होइतछि
बानरो भालू गेल छल लंका
राकस मारि बजौलक डंका
(अपूर्ण)
हम कांगरेसिया राज करै छी
हम कांगरेसिया राज करै छी
बुड़िबक सब ताकै छथि टकटक
पुण्य-पाप जिन्हकर जेहन छन्हि
भाग्य भोग तिन्हकर तेहन छन्हि
बहुत गोटा दिन राइत कमाबथि
पेटो भरि दाना नहिं पाबथि
जखन तखन पेटक छन्हि चिन्ता
सदखन करैत रहै छथि डकडक
हौ बुड़ि, हमर भाग्य के देखह
एकरा जुनि अपने सन लेखह
जहिया सं कंगरेसिया भेलहु
कहियो नै कमबै ले गेलहु
तैयो फोकटक चीज मिलै अछि
रसगुल्ला हलुआ के जकथक
खद्धर के कुरता जे हमरा
आ ई टोपी जे अछि उजरा
इआह टा थिक जादू के लकड़ी
सांग जकां ई पिन्हैत धकड़ी
कानिस्टिबुल दरोगा के थिक
कलस्टरौक छाती करै धकधक
जखनै खदरक धोती अंगा
के थिक महाराज दरिभंगा
सब क्यो हमरा शीश नवाबथि
हवा गांड़ि सं नित्य बजाबथि
सदखन पाटी दैत रहै छथि
खाइते पेट करै अछि नकसक
हौ बाबू, तोरा के पुछतौह
बड़का की बैसौले कहतौह
अहिना जी ललचाइते रहतौह
सब दिन मोन पछताइते रहतौह
हमरा देखि सिहाइते रहबह
अहिना करबह लकपक सकपक
एके टा ते परमिट मिलल
दुख कतबो जैयो हम झेलल
छोआ छल पन्द्रह हजार मन
तैं तों सब कै रहलह कनकन
हौ बुड़ि सोशलिस्ट किछु सोचह
व्यर्थ करै छह टें-टें बक-बक
कमबै छी हम अपनहिं ढंगे
जा नेपाल कपारक संगे
जयप्रकाश ते ओतहु गेलथुन्ह
दुख के छोड़ि सुक्ख की पेलथुन्ह
जहलक ए कीलास के तजि के
भूखक मारल केलथुन्ह फक-फक
छौह कपार मे तोरा लिखल
अहिना करबह सदखन कलकल
हमरा देखि फटै छौह छाती
कनिएक टा नै छह तों घाती
दोसरक सुख सं देखि जरै छह
करैत रहै छह सदखन भक-भक
हम नै छी तोरा सन धर्कट
पालनिहारक संगे खटखट
धनिकक धन जौं भोग करै छी
हुनको किछु उपकार करै छी
ई बेईमानी तोंही सीखह
हम सब रहबौह अहिना दक-दक
हौ बाबू छह बड़ खुरलुच्ची
बाटहि पर खुनै छह घुच्ची
जौं रहितौह अपना एको धुर
कहियो नै करितह ई खुरखुर
बिकतौह की चौमासक गेहुम
अनका धन पर करबह रक-रक
जौं पटेल जी बांचल रहताह
आ मामा चेट्टी जौं जीताह
कतबो बांय-बांय तों करबह
तैयो नै एको धुर पेबह
बेंग जकां टर्राइते रहबह
आखिर करबह अपनै फक-फक
सब दिन छोटका छोटके रहताह
भगबा से धोती नहिं पिन्हताह
करमक लिखल कतह के देबहुन्ह
दैबक डांग बांइट की लेबहुन्ह
कतबो सोशलिस्ट सब झकबह
ई सब करतुन्ह अहिना लकपक
व्यर्थ करै छह ई सब झंझट
जाइन माइन उठबै छह संकट
राइत केकर आ दिन केकर थिक
जे किछु केलक मौज तेकर थिक
आबह किछु तोंहू सब लै जा
कियै करै छह बकबक-बकबक
आबह कांगरेस मे आबह
बड़का सब से हाथ मिलाबह
आब बहुत जुनि बात बनाबह
किछु अपनौ ले ईहो कमाबह
भज कलदारं भज कलदारं
भज कलदारं चकमक चकमक
(26-01-1950)
जे सब बेसी केलथुन्ह टें-टें
से सब आब करै छह फें-फें
ब्यालीस मे लाखो किछु केलथुन्ह
हर्जा मे कैंचो नै पेलथुन्ह
हौ अलबोकक टोड़ी, सोचह
की भेलौह कैनें ई बकबक
आ जौं तों कंगरेसिया रहितह
जगुआ से जगजीवन होइतह
आ जौं किछु त्यागो नै रहितह
हर्जाना मिलबे टा करितह
पांच साल हजारोक टाका
पैबे करितह चकचक चकचक
गीत
काव्य रसिक बेर-बेर कहै छथि कवि तों एकटा गीत सुनाबह
गाबि-गाबि के अमर गीत कवि अहि पृथ्वी पर स्वर्ग बनाबह
किन्तु हृदय अछि हमर प्रकम्पित भय लागल अछि हमरा मन मे
गीत हमर की नीक भै सकत जखन ताप अछि हमरा तन मे
जैखन कवि घर सौं बहराइ छथि आर्त्तनाद जग सुनि पड़ै छन्हि
सुभग कल्पना आ भावुकता क्षण मे कवि के मेटै लगै छन्हि
की हम जग के गीत सुनाएब, कर अछि बद्ध, रुद्ध अछि वाणी
आगि लगल अछि सबहक घर मे, तोड़ि रहल दम रसहि जवानी
वृद्धक अछि कोन बात तरुण कैं देखि फटै अछि कवि के छाती
पेट पीठ अछि एक तरुण के नेह बिना की दीपक बाती
अर्द्धनग्न तरुणीबाला कैं तन पर नहिं बीतो भरी अंचल
लाज छोड़ि घर सं बहराइ छथि आंखि सौ नोर बहै अछि छलछल
निकसै छथि जौं घर सं बाहर लै कपार पर दुखक मटकी
कृषक सुन्दरी सौं बाटहि मे धन के पूत चलाबथि चुटकी
बिलखै अछि नेना बिन दूधक माय-बाप लगही बैसल अछि
एक दिस कुक्कुर दूध छोड़ि कं तोसक पर जा क बैसल अछि
जेठ मास कृषकक शरीर सौं लहू घाम भै के निकलै अछि
गट-गट गीड़ि रहल अछि रोटी बिना नोन, चहुं दिशा तकै अछि
किन्तु दोसर दिस किछु बाबू सब शिमला शैलवटी बिहरै छथि
मन्द-मन्द शीतल वायू सौं अपन हृदय कं शिक्त करै छथि
माघ मास एहि कृषक लोकनि के गात कंपै अछि थरथर क्षण-क्षण
घूर जारि जौं निशा बिताबथि तैयो हाथ-पैर अछि कनकन
रातुक थाकल आंखि मजूरक जौं भिनुसरबा मे लागि जाइ अछि
‘साला, एतेक बेर के ऐले’ – ई कहि के मालिक गुरड़ै अछि
जमीन्दार बाबूक सिपाही हाथ रखै अछि चट गरदनि पर –
‘चल पाजी, की एतेक तकै छै, हाथ राख हर के लागनि पर’
ओ मजूर भूखल अछि एतेक पीबि रहल अछि नोर नयन के
कुकुरक मुंह मे ठूसि रहल अछि ओम्हर बाबू खीर रान्हि के
की हम जग के गीत सुनाएब, बनल मजूरक लहू सियाही
कलम थीक हड्डी मजूर के आ विशेष की जग के चाही
छटपट प्राण करैतछि कवि के, की दुनियां के इआह रीति थिक
किछु दुख-सुख पर अवशि विचारु, कवि के सुन्दर इआह गीत थिक
मोह-भंग
गोधिया-गोधिया खेलि कै गोधिया झोरा लै कै पार भेल
किशुन कंस के चरित देखैलक तेहन कलयुगी यार भेल
एतौका केहन ई कठखेल
गाछ कै खेलक परजीवी बेल
मधुपक गान तोष नहिं दैतछि, निरस अमर-रस आ परिहास
हमर भाव-भूमि के पटल पर फूल उपटि चतरल अछि घास
माया मे आनन्द नै भेल
राजकमल थालहिं मे गेल
सब संचारी-भाव फूसि आ सहित-भाव मे अहित नुकाएल
लुच्चा सबहक बानर-दल संग प्रतिक्रियावादी अगराएल
भगजोगनी मे धक्कमपेल
तैं यात्री नागार्जुन भेल
‘विप्लव’ ऊर्जा ओज रहित कुण्ठा संत्रास बनल छी
किरण के आग्रह मानि आइ अन्हारक ग्रास बनल छी
सब उपकार पाइन मे गेल
संगतिया दुर्मतिया भेल
कुछ अपनी, कुछ दुनिया की
( संस्मरण, विचार, आत्मकथ्य)
[ विप्लव जी की निम्नलिखित टिप्पणियां एक डायरी पर बिना किसी शीर्षक और तिथियों के उल्लेख किये लिखी गयी हैं। तब रोशनाई वाले पेन से लिखने का चलन था। रोशनाई के अलग रंगों से अनुमान किया जा सकता है कि ये टिप्पणियां अलग अलग दिन लिखे गये थे। विषय संभवतः पहले से तय नहीं थे और जिस दिन जो बात मन में आयी, जो विषय या विचार उभरे, उसे उकेरते गये थे। कुछ स्थलों पर रोशनाई के धुंधला हो जाने के कारण शब्द अस्पष्ट हो गये हैं। ऐसे कुछ स्थलों पर सम्पादक ने अपने अनुमान से शब्द रख दिये हैं और जहां भ्रम की स्थिति बन सकने की आशंका थी, वहां अनावश्यक अनुमान लगाने की बजाय धूमिल शब्द के स्थान पर ब्रैकेट में ‘अस्पष्ट’ लिख दिया गया है। कुछ लेख अपूर्ण रह गये हैं। ऐसा लगता है कि लिखने के क्रम में कोई तात्कालिक व्यवधान आ जाने के कारण इसे अधूरा छोड़ दिया गया और बाद में उन्हें इसे पूर्ण करने का अवसर नहीं मिल पाया या उसे पूरा करने का काम उन की स्मृति से उतर गया। लेखों, विचारों के इस संकलन का मुख्य शीर्षक सम्पादक द्वारा दिया गया है।-- सम्पादक ]
पार्टी नेता के चुनाव में जब दोनों नेताओं में समझौता न हो सका तो श्री जवाहरलाल नेहरू ने एक तीसरे नेता को चुनने की राय दी। श्री श्रीबाबू की ओर से श्री कृष्णवल्लभ सहाय का नाम आया, जबकि श्री अनुग्रह बाबू की ओर से सर्वश्री दीप नारायण सिंह, प्रभुनाथ सिंह, शिवनन्दन मण्डल, सुधांशु वगैरह के नाम आये। अन्त में सहाय जी के पक्ष में ही अधिक लोगों को देख कर श्री अनुग्रह बाबू ने आत्म समर्पण कर दिया और श्री श्रीबाबू को नेता मान लिया। श्री श्रीकृष्ण सिंह की महानता का एक नमूना इस सिलसिले में लोगों को दिखलाइ पड़ा। वह यह था कि जब इनकी ओर से किसी व्यक्ति को चुनने का समय आया तो कई लोगों ने यह मन्तव्य प्रगट किया कि वे ही इस पद के लिये चुने ( अस्पष्ट) सुनने में आया कि श्री रामचरित्र बाबू भी इस के लिये आगे आये किन्तु श्री श्रीकृष्ण सिंह ने यह कह कर उन्हें रोक दिया कि वे श्री कृष्णवल्लभ सहाय को ही अपनी ओर से पार्टी नेता चुनवाना चाहते हैं क्योंकि उनके नाम पर ही चिढ कर दूसरे पक्ष के लोग अलग (अस्पष्ट) रहे हैं। श्री बाबू ने यह भी कहा कि उनके सभी समर्थकों का यह कर्तव्य है कि वे लोग श्री सहाय को ही नेता चुनने को तैयार हों और इस के लिये ही प्रयत्न करें। श्री बाबू की इस महानता से लोग बहुत प्रभावित हुए, क्योंकि अपनी जाति के साथियों को नहीं चुन कर वे एक अन्य जाति के साथी को अधिक पसन्द कर रहे थे। यह उनके हृदय की विशालता का परिचायक था, जबकि दूसरे पक्ष के नेता अपनी जाति के लोगों के पीछे जान दे रहे थे।
उनके अधिकांश समर्थक प्राप्त हो जाने का एक कारण और भी था। श्री अनुग्रह बाबू की सहायता के लिये श्री कामाख्या नारायण सिंह (रामगढ) ने अपने सारे साधनों का उपयोग किया था। उन की कई मोटरें पटने की सड़कों पर दौड़-धूप कर रही थीं। श्री अनुग्रह बाबू के समर्थक उन मोटरों पर हवा खाते फिरते थे और सदस्यों के वासे-वासे जा कर उन्हें अपने पक्ष में मिलाने का प्रयत्न करते थे। जहाज घाट एवं स्टेशन पर उन की मोटरें रहती थीं सदस्यों को लाने के निमित्त। इस काम से बहुत से सदस्य चिढ भी गये और उन्होंने साफ-साफ जवाब दिया कि वे पैदल जाना पसन्द करेंगे किन्तु किसी पूंजीपति की मोटरों पर नहीं। इन कामों से चिढ कर श्री अनुग्रह बाबू के जो समर्थक थे, उन्होंने भी श्री श्रीबाबू को ही अच्छा समझा और उन्हें ही पार्टी नेता बनाया। इस विजय को श्री श्रीकृष्ण सिंह की महानता की विजय कही जायेगी।
*
सुपौल थाना कांग्रेस कमिटी के सभापति के चुनाव के सम्बन्ध में तरह-तरह की अटकलबाजियां लगायी जाने लगी किन्तु मैंने अपने को बहुत दिनों तक इस से अलग ही रखा। इस बीच में बहुत से सदस्य मेरे पास आ कर मुझ से अनुरोध करते रहे कि आप इस चुनाव में सभापति पद के लिये उमीदवार अवश्य ही हों और मैं भी उन्हें यह उत्तर देता रहा कि यदि लोग मुझे चाहेंगे तो मैं अवश्य ही उक्त पद के लिये उमीदवार होऊंगा। मेरी आन्तरिक इच्छा भी यही थी कि यदि अधिकांश सदस्य मुझे सभापति बनाना चाहेंगे तो मैं उक्त पद का भार ले कर कुछ काम कर दिखलाने का भरसक प्रयत्न करूंगा। मैं ऐसा इस लिये चाहता था कि जब मैं चार-पांच वर्ष पहले एक बार थाना कांग्रेस कमिटी का मन्त्री हुआ था तो अपनी योग्यता और कर्मठता का कुछ अच्छा सा परिचय नहीं दे पाया था। इस के भी कई कारण थे। एक कारण तो यह था कि उन दिनों मुझे राजनैतिक दाव-पेंचों के अनुभव बिल्कुल ही नहीं थे और दूसरा यह भी था कि मैं कुछ संकोचशील होने के कारण अन्य लोगों से राय भी नहीं ले सकता था। साथ ही कुछ आरामपसन्द व्यक्ति होने के कारण भी मैं खूब जी-तोड़ परिश्रम कर नहीं सकता था। किन्तु मेरे उस मन्त्रित्व काल में जो अनुभव मुझे हुए, उस से मैं अब लाभ अवश्य ही उठा सकता हूं, ऐसा मेरा विश्वास है और एक कारण यह भी है, इसी लिये इस बार मेरे थाना कांग्रेस कमिटी के सभापति पद के लिये उमीदवार बनने का मन था।
मैंने उस बार मन्त्री पद को त्याग कर सोशलिस्ट पार्टी को अपना सब कुछ दे दिया था, क्योंकि मैंने कांग्रेस के भीतर बहुत से बुरे काम होते भी देखे थे जो मुझे पसन्द नहीं थे। और कांग्रेस छोड़ते समय मैंने यह सोचा था कि सोशलिस्ट पार्टी के कार्यक्रम अवश्य ही कांग्रेस से अच्छे होंगे और तभी तो ये तपे-तपाये लोग कांग्रेस से निकल रहे हैं। मैंने उन दिनों में कुछ क्षण के लिये भी यह नहीं सोचा था कि ये ही कांग्रेस के लोग तो सोशलिस्ट पार्टी में जा रहे हैं। अस्तु भावावेश में ही मैंने कांग्रेस छोड़ दिया था और सर्वश्री शैलेश (मिश्र), चन्द्रकिशोर (पाठक) तथा अन्य साथियों के साथ सोशलिस्ट पार्टी की सुपौल में स्थापना की थी।
लगातार तीन-चार बरसों तक मैंने पार्टी में समय दे कर काम किया था। कुछ दिनों तक सुपौल सोशलिस्ट पार्टी का जेनरल सेक्रेटरी भी रहा और उन दिनों में अपने रुपये दे कर मैंने आफिस के सभी कागजात एवं रेकर्ड ठीक किये। उस से पहले हिसाब लिखने के लिये भी अच्छी बही नहीं थी। किन्तु मैंने सभी आवश्यक रेकर्ड अपने पैसे दे कर खरीद दिये। प्रारम्भ में मैंने सोचा था कि अपने जेब के पैसे मुझे पुनः वापस मिल जायेंगे किन्तु रुपयों का प्रबन्ध नहीं होने के कारण मुझे वे रुपये नहीं ही मिले। इस के अतिरिक्त मैंने अपने आसपास के गांवों में सभी जगह प्रचार कर सोशलिस्ट पार्टी का काफी प्रभाव बढा लिया। मेरे निजी प्रभाव के कारण भी पार्टी का प्रभाव आसपास में तो कम से कम बहुत अधिक बढ गया था। कई कार्यकर्ता भी नौजवानों में से पार्टी के सदस्य बने थे। जिन्हें पार्टी से रुचि थी, उन के शुल्क भी मैंने स्वयं ही दे दिये थे और तभी बहुत से कार्यकर्ता पार्टी में दिलचस्पी लेने लग गये थे।
किन्तु पीछे मुझे अपनी भूल मालूम होने लगी, जब मैंने देखा कि सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता कांग्रेस के कार्यकर्ताओं से भिन्न कोई अस्तित्व नहीं रखते। कम से कम पार्टी के नीचे स्तर के कार्यकर्ताओं को देखने से तो ऐसा ही पता चला कि वे अपने स्तर के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से बहुत ही बातों में दबे हुए ही हैं। मैं अपने अनुभव की बात अगर सच-सच कहूं तो यह कहना ही पड़ेगा कि पार्टी में कम से कम अनुशासन का बड़ा ही अभाव था और दिखावटी रूप ही उस का लुभावना था। केवल लुभावने नारे और लम्बे-लम्बे वक्तृत्व के ही बल पर समाजवाद लाना बिल्कुल असम्भव है। इस के लिये तो बाहर और भीतर दोनों ओर से समाजवादी कार्यकर्ताओं को सच्चा समाजवादी होना चाहिये। किन्तु इस के विपरीत अपनी धाक जमाने के लिये या अगले चुनाव में एसेम्बली या डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सदस्य बनने के लिये ही अधिकांश कार्यकर्ता कांग्रेस की निन्दा किया करते थे। प्रायः सभी कार्यकर्ताओं को एक ही धुन सवार रहती थी कि कांग्रेस की निन्दा कर या उस के कार्यकर्ताओं की व्यक्तिगत रूप से शिकायत कर जनता की नजरों से उन्हें नीचे गिराया जाय और उन के स्थान उन्हें स्वयं प्राप्त हों। स्वयं मैं भी कांग्रेस की शिकायत करता था किन्तु जहां तक उचित समझता था, वहां तक ही। जहां मैंने कांग्रेस में गुण देखे थे, वहां मैंने उन की प्रशंसा भी की। ऐसी मेरी नीति अब भी है और यही कारण था कि एक बार एलेक्शन के दिनों में जब मैं अन्दौली में भाषण कर रहा था तो सोशलिस्ट पार्टी के शैलेश (मिश्र) की कुछ प्रशंसा मेरे मुंह से सुन कर मेरे कई कार्यकर्ता चिढ से गये थे। मेरा इस तरह विरोधी उम्मीदवार की प्रशंसा में कुछ कहना उन के खयाल से उचित नहीं था। खैर, यह तो अपना-अपना विचार है।
उपर्युक्त कारणों से सोशलिस्ट पार्टी में मेरा जी नहीं लगता था। साथ ही मेरी प्रकृति भी भिन्न थी इन लोगों से, जैसा कि कई व्यक्तिओं ने समय-समय पर मुझ से कहा भी था। एक बार जब मुझे किसी विषय को ले कर श्री चन्द्रकिशोर पाठक जी से बातें हो रही थी तो उस ने बहस का रूप धारण कर लिया और तब श्री किशोर जी चिल्ला-चिल्ला कर बोलने लगे। यहां तक कि उनकी आवाज सड़क पर पहुंच रही थी क्योंकि पार्टी आफिस भी सड़क के किनारे ही थी न। शायद तब मैं भी जोर से बोलने लगा था। ठीक उस समय श्री लखन चौधरी जी सड़क पर साइकिल के सहारे खड़े हमारी बातें ध्यान से सुन रहे थे। क्योंकि जब मैं आफिस से घर चला तो मैंने उक्त अवस्था में उन्हें सड़क पर देखा और उस के बाद हम दोनों गप करते हुए घर आये। यह नौ-दस बजे रात की घटना है। उस समय श्री लखन चौधरी जी ने मुझ से कहा था कि मेरी प्रकृति (सोशलिस्ट) पार्टी वालों से बिल्कुल भिन्न है और मेरी कभी भी उन से नहीं पट सकती। अन्त में उन्होंने राय दी थी कि मैं पार्टी से इस्तीफा दे कर यदि कांग्रेस में लौट आऊं तो अच्छा हो। एक तटस्थ व्यक्ति के नाते उन की यह राय थी। इसी प्रकार कई अन्य व्यक्तिओं ने भी ( जो किसी पार्टी के नहीं थे) मुझे समय-समय पर अपनी राय इस प्रकार दी थी किन्तु मैं उन्हें अनसुनी कर दिया करता था। खास कर मैं पार्टी को इस लिये नहीं छोड़ता था कि कहीं लोगों की धारणा मेरे प्रति बुरी न हो जाय और लोग मुझे स्वार्थी न समझने लगें। जो कुछ भी हो, गलती तो मेरी ही थी कि मैंने बिना अच्छी तरह विचार किये ही कांग्रेस को छोड़ दिया था और जिस का पश्चाताप मुझे बार-बार हो रहा था। किन्तु राजनीति में बार-बार प्लेटफार्म बदलना ठीक नहीं होता है, यही सोच कर मैं लाचार हो जाया करता था।
किन्तु अन्त में कई ऐसी घटनायें हो गयीं कि मुझे सोशलिस्ट पार्टी से अलग हो जाना पड़ा। उन घटनाओं के उल्लेख से दूसरों के उपर छींटाकशी हो सकती है, अतः उसे नहीं लिखना ही अच्छा है। फिर भी इस की चर्चा कर देना अनुचित नहीं है कि भूख सत्याग्रह, जो सोशलिस्ट पार्टी द्वारा 1950 में जिले के कई स्थानों में चलाये गये थे, मेरी समझ से उचित नहीं थे क्योंकि वह सत्याग्रह उस मौके से लाभ उठाने के खयाल से ही किया गया था, जबकि सबों को ज्ञात था कि सरकार द्वारा अकाल की परिस्थिति का सामना करने के लिये अनाज का प्रबन्ध हो रहा है और कई तरह के अनाज तथा अन्य खाद्य-पदार्थ इस क्षेत्र के लिये बाहर से आने ही वाले हैं। इसी सिलसिले में भुक्खड़ मार्च भी जगह-जगह हुए थे जिन में देहात की जनता को कहीं-कहीं यह कह कर ललचाया गया था कि उन के मार्च करने पर तुरत ही कपड़े तथा खाने सहायता के तौर पर उन्हें प्राप्त हो जायेंगे। इसी लालच में बहुत से लोग सम्मिलित भी हुए किन्तु जब उन्हें कुछ न मिला तो वे निराश हो कर अपने घरों को लौट गये। मैंने इस के प्रमाण प्राप्त किये कि बाद में लोगों ने पार्टी के ऐसे ठग कार्यकर्ताओं को गालियां भी दी। किन्तु इन बातों के होते हुए भी उन दिनों में पार्टी से हट जाना अच्छा नहीं था क्योंकि सत्याग्रह हो रहा था और इसी लिये उस समय के हटने वाले को डरपोक कहा जा सकता था। इसी लिये मैंने सबसे पहला दिन ही सत्याग्रह करना उचित समझा और किया भी, किन्तु किसी प्रकार की सजा मुझे तथा मेरे साथियों को न मिली। इस प्रकार अपने को दोषमुक्त कर मैं जलवायु परिवर्तन के लिये बाहर चला गया था और सभी साथियों से कह गया था कि सत्याग्रह के सिलसिले में जिस समय किसी प्रकार की सजा किसी कार्यकर्ता को दी जाय तो वे मुझे तुरत बुला लें जिस से मैं भी उस में हिस्सा ले सकूं। किन्तु ऐसा नहीं हुआ। और जब मैं दो महीनों के बाद घर वापस आया तो मेरा पार्टी में रहना मुझे अच्छा नहीं जंचा और तभी कुछ दिनों के बाद मैंने पार्टी को अपना त्यागपत्र भेज दिया था।
कांग्रेस एवं सोशलिस्ट पार्टी दोनों दलों में रह कर मैंने अच्छी तरह से अनुभव कर लिया था कि राजनीति में कोई कूटनीतिज्ञ ही आगे बढ सकता है। इसी लिये राजनीति से मुझे कभी-कभी घृणा सी होती रही है किन्तु आदमी अपने स्वभाव से लाचार जो होता है। यदि मनुष्य अपनी आदतों पर विजय प्राप्त कर सकता तो कैसा अच्छा होता ! मेरी इच्छा होती थी कि मैं भी राजनीति से अलग रहूं और जहां तक बन पड़े, अपने स्थान से ही जनता की कुछ सेवा यथासाध्य करता रहूं किन्तु ऐसा नहीं हो सका। सर्वश्री लहटन चौधरी जी एवं हीरा लाल भगत जी की बातों को मैं नहीं टाल सका। कई तटस्थ व्यक्तिओं एवं मेरे मित्रों ने भी मुझे राय दी कि मैं कांग्रेस में फिर से सम्मिलित हो जाऊं और अन्त में मैंने तद्नुसार कांग्रेस में ही अपना समय देने का निर्णय किया।
हां, तो थाना कांग्रेस कमिटी के सभापति पद के लिये मैंने अपना नाम उमीदवार में घोषित कर दिया। श्रीयुत लहटन चौधरी जी ने उमीदवारों की चर्चा होने पर एक बार मुझ से कहा था कि वे श्री वासुदेव सिंह जी या मुझे ही सभापति चुने जाते हुए देखना चाहते हैं, किसी अन्य व्यक्ति को नहीं। जब उन्होंने श्री वासुदेव सिंह जी का भी नाम लिया तो मुझे शंका अवश्य हुई किन्तु मुझे यह विश्वास नही हुआ कि श्री चौधरी जी मेरा विरोध भी कर सकते हैं। यदि श्री चौधरी जी उन दिनों में स्पष्ट रूप में मुझे कह दिये होते कि वे श्री वासुदेव सिंह जी को ही सभापति बनाना चाहते हैं, किसी अन्य को नहीं, तो सम्भव था कि मैं अपनी उमीदवारी वापस कर लेता। किन्तु उन्होंने बिल्कुल प्रगट रूप से तो नहीं किन्तु थोड़ा सा प्रगट हो कर भी श्री वासुदेव जी का ही समर्थन किया। यद्यपि वे मुझे भी जिला कांग्रेस कमिटी का सदस्य बनाना चाहते थे और पीछे चल कर जिला कांग्रेस कमिटी का मन्त्री भी, क्योंकि उन्होंने एक बार इस तरह की चर्चा की भी थी। ऐसा वे कर भी सकते थे क्योंकि जिला कांग्रेस कमिटी के सभापति भी वे ही थे। चुनाव के समय ही मुझे ऐसा पता चला कि वे श्री वासुदेव का समर्थन एवं उन के लिये प्रयत्न भी कर रहे हैं। उस समय मुझे समय भी नहीं रहा था कि मैं अपनी उमीदवारी वापस ले लेता। अन्त में श्री चौधरी जी के प्रभाव के कारण श्री वासुदेव को 50 वोट प्राप्त हुए और मुझे केवल 28 ही और इस तरह से बहुमत से थाना कांग्रेस कमिटी के सभापति निर्वाचित हुए। मैं आज भी उस विजय को श्री वासुदेव सिंह जी की विजय नहीं बल्कि श्री लहटन चौधरी जी की विजय मानता हूं। यदि वे अपने प्रभाव को व्यवहृत न किये होते तो शायद मैं पराजित नहीं होता।
श्री लहटन चौधरी जी से मैं बराबर श्रद्धा करता आया हूं। जिन दिनों में अगस्त क्रान्ति हुई थी और श्री चौधरी ने अपनी बहादुरी का एक मिसाल पेश किया था, मैं उनके कार्यों को याद कर रोमांचित हो जाया करता था। आज तक मैं उन को उसी दृष्टि से देखता आया हूं किन्तु साथ ही यह भी देखता आया हूं कि वे राजनीति के दाव-पेंचों से अपने को अलग नहीं रख सके। गुटबन्दी आदि के आधार पर एक दूसरे को पछाड़ आगे बढने की जो मनोवृति राजनीतिज्ञों में होती है, उस में वे भी फंस ही गये और यही कारण था कि शायद उन्होंने मुझ से अधिक श्री वासुदेव सिंह जी को अपनी सहानुभूति एवं सहायता दी। किन्तु मैं अब भी श्री चौधरी जी को उन की इस सूझ एवं नीति के लिये धन्यवाद दिये बिना नहीं रह सकता।
चुनाव के बाद जब श्री चौधरी से मैंने पूछा कि क्यों नहीं उन्होंने पहले ही स्पष्ट रूप से कह दिया था कि वे श्री वासुदेव सिंह जी का पक्षपात करेंगे ; तो उन्होंने उत्तर दिया कि वे इस लिये श्री वासुदेव को सभापति चुनना अधिक पसन्द करते थे कि वे (श्री वासुदेव) इधर तीन महीनों से (स्वर्गीय शत्रुघ्न बाबू की असामयिक मृत्यु के बाद से) थाना कांग्रेस कमिटी के इन्चार्ज रह चुके थे और केवल तीन-चार महीनों के लिये ही उन्हें हटा देना अच्छा नहीं था। फिर मैंने जब कहा कि यही बात उन्होंने मुझे पहले क्यों नहीं बतला दी थी तो वे चुप रह गये और इस गलती को स्वीकार किया। साथ ही वे यह भी कहते रहे कि जिला के लिये वे एकमात्र मुझे ही पसन्द करते थे और उन्होंने अपना वोट भी मुझे दिया था। किन्तु जिला के लिये तो सिर्फ मेरा नामिनेशन ही पड़ा था। मैंने उस जगह के लिये तो इच्छा ही प्रगट नहीं की थी। समय नहीं प्राप्त होने के कारण से मैं अपना नामिनेशन वापस नहीं ले सका था। इस चुनाव में बहुत से सदस्यों ने जो मुझे पहले ही वचन दे दिया था, अन्त में पिछड़ गये और श्री वासुदेव जी को ही अपना मत दिया। मुझे दुख खास कर इसी बात के लिये हुआ था, अपनी हार के लिये थोड़ा सा भी नहीं। मैं अभी तक भी नहीं समझ पाता हूं कि लोग इस तरह के धोखेबाज क्यों होते हैं? मेरी समझ से तो किसी को वचन दे कर मुकर जाना नैतिक पतन की पराकाष्ठा है।
श्री वासुदेव सिंह जी के विरोध में मेरे उमीदवार होने का एक कारण और भी था। वे (श्री वासुदेव सिंह) शायद उन दिनों कांग्रेस में आये, जब हम सोशलिस्ट पार्टी में आये थे। यह घटना शायद 1947-48 की है। श्री चौधरी के विचार से श्री वासुदेव सिंह जी तथा मैं राजनीति में लगभग समकालीन ही थे। किन्तु मेरी समझ से श्री चौधरी का यह कहना भी अन्याय था। यद्यपि मैंने कभी जेल की चहारदिवारी का दर्शन नहीं किया था, किन्तु राष्ट्रीय उत्थान के कार्यों में मैंने 1938 ईस्वी से ही दिलचस्पी ली थी और समय दे कर भी जब-तब काम किया था। मैं उन दिनों में ही खादी पहना करता था, जब बाजार में तरह-तरह की डिजायनों के कपड़े मिला करते थे और मेरे पहनने के शौक के दिन भी थे। आज तो खादी पहनने का कोई महत्व नहीं रह गया किन्तु उन दिनों में खादी पहनने पर मैंने गौरव का अनुभव किया था और ऐसा भी विचार हृदय में उठा करता था कि मैंने खादी धारण कर थोड़ा सा त्याग (शौक का ही सही) तो अवश्य ही किया था। यह बात 1938 ईस्वी की ही है जब श्री ललित नारायण मिश्र जी एम ए (वर्त्तमान एम पी) और मैं सहपाठी थे – सुपौल (विलियम्स) हाई स्कूल में ही। हम दोनों ही एकमात्र खादीधारी एवं राष्ट्रीय विचारों के प्रचारक उन दिनों में विद्यार्थियों के बीच थे। उस के बाद 1940 ईस्वी में जब रामगढ में अखिल भारतीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था तो मैं भी वहां जाने को तैयार था किन्तु मैट्रिक में सेन्ट अप होने के कारण मैं वहां नही जा सका था। थाना कांग्रेस कमिटी की सदस्यता के लिये उन दिनों मैंने भी नामिनेशन दिया था किन्तु कई कारणों से चुनाव ही रुक गया था और मैं सदस्य नहीं बन पाया था।
1940 ईस्वी में ही मेरे पिता की मृत्यु हो गयी थी और घर का सारा झंझट मेरे सर पर आ पड़ा था। फिर भी मैं स्वराज आन्दोलनों से स्वयं को दूर नहीं रख सका। इसी वर्ष चले असहयोग आन्दोलन में नमक कानून भंग करने एवं कलाली पर पिकेटिंग करते हुए मैंने पुलिस की लाठियां खायी थी। 1942 के अगस्त क्रांति में तो मैंने जान हथेली पर ले कर भाग लिया था। वह देश के नौजवानों की दीवानगी का दौर था और उस में एक दीवाना मैं भी था। सुपौल रेलवे स्टेशन का कागजात जलाना, रेल पटरी को क्षतिग्रस्त करना एवं साथियों को ले कर सुपौल कोर्ट पर झण्डा फहराना आज भले इतिहास हो, किन्तु तब के सभी स्वराजी इसके साक्षी रहे हों, न रहे हों, उनकी जानकारी में सभी घटनायें तो रही ही हैं। इन्हीं कारणों से ब्रिटिश सरकार ने डी आई आर के अन्तर्गत मुझे उद्घोषित अपराधी घोषित कर दिया था। मेरी फरारी के बाद पुलिस ने कई बार मेरे घर पर छापा मारा था, परिवारजनों के साथ बदसलूकी की थी और एक बार तो घर में आग भी लगा दी थी। फरारी के उन दिनों में मैं पूर्व से परिचित क्रान्तिकारियों श्री चित्रनारायण शर्मा जी (सुलिन्दाबाद, सहरसा), श्री वेदानन्द झा जी (गोसाइगांव, भागलपुर) के साथ-साथ सर्वश्री शिवनन्दन झा, जटाशंकर चौधरी जी, अम्बिका सिंह ‘दादा’, लखन लाल मिश्र जी, लहटन चौधरी जी, चन्द्रकिशोर पाठक जी, शैलेश मिश्र जी आदि अनेक स्वराजियों के सम्पर्क में रहा था। इस क्रम में सौभाग्यवश श्री जयप्रकाश नारायण जी और श्री राम मनोहर लोहिया जी से भी साक्षात्कार हुआ। अपने जीवन में ही किम्वदन्ती बन गये महान स्वतन्त्रता सेनानी श्री चित्र नारायण शर्मा जी उन दिनों आजाद दस्ता के जिला प्रभारी थे। वे मेरे संबंधी तो थे ही, साथ ही स्वराज आन्दोलन में मेरे मार्गदर्शक की भूमिका में भी थे। एक बार तो मैं उन के साथ नेपाल भी चला गया था जहां आजाद दस्ता का मुख्यालय एवं बेतार केन्द्र था। करिहो महंथ जी के यहां से श्री राममनोहर लोहिया जी को परसरमा होते हुए कलकत्ता भेजने के काम में डाक्टर शुक्ला जी की मदद करने के मेरे सफल प्रयास की कहानी भी सुराजियों से छिपी नहीं रही है। एक बार तो श्री शैलेश (मिश्र) और मैंने, स्वयं श्री लहटन चौधरी के परिवारवालों को भी खाने के लिये कुछ सहायता, चन्दा करने के बाद पहुंचायी थी, जबकि उनके गांववाले उनके परिवार के सम्पर्क में आने से भी डरते थे। और आज ये ही चौधरी जी हैं जिन्होंने मुझे श्री वासुदेव सिंह का समकालीन राजनीति में ठहराया।
भागलपुर के सुप्रसिद्ध अगस्त-क्रान्ति-संचालक श्री सियाराम सिंह जी छिप कर सरकार के विरुद्ध काम किया करते थे और कई तरह के पर्चे भी निकालते थे। श्री जयप्रकाश नारायण भी हजारीबाग जेल से भाग कर छिप-छिप कर काम करते थे और पर्चे द्वारा प्रचार करते थे। मैं उन पर्चों को छिप-छिप कर जनता में बांटा करता था और श्री शैलेश मुझे वे पर्चे पहुंचा जाया करते थे।
जब बहुत से कांग्रेसी नेता जेल से छूट कर आये तो रचनात्मक समिति बना कर काम करना प्रारम्भ किया था क्योंकि कांग्रेस को सरकार ने अवैधानिक करार दिया था। मैंने भी उस समिति में काम किया था और अपने गांव में रात्रि-पाठशाला द्वारा लोगों को शिक्षा बहुत दिनों तक दी थी। उस समय मैं पूरा तैयार होकर देश के कार्यों के लिये निकल पड़ा था और मैं सभी तरह की यातनाओं को सहने के लिये भी हिचकने वाला नहीं था। उन दिनों कांग्रेसी सरकार नहीं बन पायी थी और बड़े-बड़े नेता लोग कहा करते थे कि एक बहुत बड़ी क्रान्ति पुनः देश में होगी, तब कहीं स्वराज होगा। मैं उस क्रान्ति में सम्मिलित हो कर अपना कर्तव्य पालन करने की बात सोचा करता था। अफसोस कि उस क्रान्ति में तन-मन से समर्पित हो कर भी मुझे जेल जाने का सार्टिफिकेट नहीं मिल सका जिस के बल पर मैं भविष्य में कुछ कर सकता था। फिर भी पुराने कार्यकर्ता होने एवं अनुभव इत्यादि के आधार पर भी मुझे श्री वासुदेव सिंह जी से अधिक अधिकार था कि मैं ही थाना कांग्रेस कमिटी का सभापति चुना जाऊं। और इसी लिये कई पुराने और उत्तरदायी कार्यकर्ताओं के कहने पर ही मैं उक्त पद के लिये उमीदवार हुआ था ; अन्यथा मैं उस दशा में कभी भी उमीदवार नहीं होता जब मुझ से भी पुराने, योग्य एवं त्यागी कार्यकर्त्ता इस पद के लिये अपनी उमीदवारी घोषित करते।
थाना कांग्रेस कमिटी के सभापति का चुनाव सम्पन्न हुआ और इस के साथ ही इस की सरगर्मी भी समाप्त हो गयी। नये प्रकार से प्रारम्भिक सदस्य बनाने का काम प्रारम्भ करना था क्योंकि इस बार पुनः चौअनियां सदस्य का ही विधान कलकत्ता कांग्रेस में बना था। सभी कार्यकर्त्ता अपने-अपने काम में जुट गये। मैंने भी नये प्रकार से काम करने का विचार किया। सम्प्रति सदस्य बनाने का ही काम था किन्तु यह काम अकेले तो अच्छी तरह से हो नहीं सकता था, अतः मैंने संगठित रूप से काम करने का निर्णय किया। सुपौल शहर की जनसंख्यां काफी अधिक रहने के कारण यहां अधिक संख्यां मे सदस्य भी बनाये जा सकते थे किन्तु किसी कार्यकर्त्ता की दिलचस्पी इधर नहीं के बराबर ही थी। स्थानीय कार्यकर्त्ताओं में अकर्मठता इतनी बढ गयी थी कि उन्हें सक्रिय बनाने के लिये परिश्रम की आवश्यकता तो थी ही, साथ ही बुद्धिमानी की भी। मैंने भरसक प्रयत्न करने का विचार किया और तद्नुसार कार्यारम्भ भी कर दिया क्योंकि बिना इधर पूरा ध्यान दिये काम को आगे बढाना नित्तान्त असम्भव था।
शहर कांग्रेस कमिटी की स्थापना : बरसों से मेरी इच्छा रही थी कि शहर में एक कांग्रेस कमिटी की स्थापना हो। एक बार 1945-46 में मैंने इस की स्थापना भी की थी जो कुछ दिनो तक चली थी किन्तु उस के बाद थाना कांग्रेस कमिटी का मन्त्री चुने जाने के बाद से मैंने उधर ध्यान देना छोड़ सा दिया था और इसीलिये अन्य कार्यकर्त्ताओं की ढिलाई से वह कमिटी भंग हो गयी थी। अब तो सुपौल शहर में बहुत से कांग्रेसी कार्यकर्त्ता भी हो गये हैं, यही सोच कर मैंने एक बैठक कार्यकर्त्ताओं एवं कांग्रेस से सहानुभूति रखने वाले उत्साही लोगों की बुलायी। 12 अप्रिल को सर्वसम्मति से एक कांग्रेस एडहाक कमिटी शहर के लिये बनायी गयी जिस में सभापति एवं मन्त्री सर्वश्री जगदीश प्रसाद संथालिया एवं हनुमान मल बोथरा जी हुये। उन्हें इस ओर आकर्षित कर सक्रिय बनाने के खयाल से मैंने उन्हें ये पद कमिटी में प्रस्ताव कर प्रदान करवाये थे क्योंकि पद का उत्तरदायित्व सिर पर आ जाने के कारण ही उन्हें कार्यों में दिलचस्पी होती, ऐसा मैंने निर्णय किया था। मैंने यह भी विचार लिया था कि उन के बदले बराबर मैं उन का काम कर दिया करूंगा। इस चुनाव में सहानुभूति रखने वाले लोग भी पदाधिकारी इस लिये चुने गये कि कलकत्ता कांग्रेस में इसी बार यह निर्णय हुआ था कि विधान परिषद आदि के चुनाव में सक्रिय रूप से कांग्रेस को सहायता पहुंचाने वाले लोगों को ले कर कांग्रेस के समानान्तर कामचलाऊ कांग्रेस कमिटियां जगह-जगह बनाई जा सकती हैं। यह विधान शायद इस लिये बना था कि नये-नये लोग कांग्रेस में सम्मिलित हो सकें और पण्डित जवाहर लाल जी बहुत दिनों से उत्साही एवं योग्य लोगों को कांग्रेस में लाने की इच्छा प्रगट करते आये थे। और जब मैंने विधान में इस प्रकार का संशोधन देखा तो मैंने झट ऐसी कमिटी बना लेने का निर्णय किया जिस से कांग्रेस के कार्यों को अगे बढाने में काफी सहायता मिल सके।
सर्वश्री शिबशंकर लाल दास एवं जगदीश ठाकुर जी को इस कमिटी का सहायक मन्त्री बनाय गया था। साथ ही कपलेश्वर झा जी आफिस मन्त्री सर्वसम्मति से बनाये गये थे। मैंने श्री उदयचन्द्र अग्रवाल जी से अनुरोध कर धर्मशाले की एक कोठरी इस कमिटी के आफिस के लिये दिला दी। स्वयं अपने पैसे के रजिस्टर तथा आवश्यक फाइलें मैंने खरीद दीं और सभी सामान आफिस मन्त्री श्री कपलेश्वर झा जी के सुपुर्द कर दिये। थाना कांग्रेस कमिटी की कार्यसमिति में भी पीछे चल कर इस तरह की कमिटी बनाने पर जोर दिया गया। और सुपौल शहर की इस कमिटी की लोगों ने सराहना की। बाद में चल कर प्रारम्भिक सदस्य बनाने पर जोर दिया गया और मैंने फार्म 10 रुपये अपने पास से दे कर मंगवा दिया जिस से सदस्य बनाने के काम में शिथिलता न आ सके। वे फार्म कार्यकर्त्ताओं में बांट दिये गये और मैंने सबों को बराबर याद दिलाया कि उन्हें काफी संख्यां में सदस्य बनाना है।
कांग्रेस के कार्यकर्त्ताओं में जो लगन स्वतन्त्रता प्राप्त होने के पहले थी, वह अब बिल्कुल ही नहीं रही। सत्तारूढ हो जाने के कारण आराम करने और रोब गांठने की प्रवृत्ति कांग्रेसजनों में हो गयी है। नये लोग जो आते हैं, वे भी इस खयाल से नहीं कि उन्हें देश का काम करना है या जनता की सेवा में अपने समय को लगाना है, बल्कि जनता में अपनी कुछ धाक जमाने के लिये ही। बहुत से लोग तो रोब और धाक के प्रभाव से कुछ आर्थिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति से आते हैं। किन्तु जिन्हें आर्थिक लाभ उठाना नहीं है, वे भी नाम और यश पैदा करने के खयाल से तो अवश्य ही आते हैं। और जब ऐसे लोग कांग्रेस में आये हैं तो कहां तक कांग्रेस रचनात्मक कार्यों में आगे बढ सकेगी, यह तो सहज ही में अनुमान किया जा सकता है।
अब रही पुराने कार्यकर्त्ताओं की बात। इन में भी अधिकांश अपने त्याग और तपस्या को अब हुण्डी की तरह भुनाना चाहते हैं। वे अब सोचा करते हैं कि उन की सेवा के दिन बीत चले और अब उन्हें अपनी तपस्या के पुरस्कार में मिले स्वतन्त्रता के ये दिन आराम से बिताने हैं। इस तरह के कांग्रेसी अब एसेम्बली या डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की सीटों के लिये जमीन आसमान को एक कर देते हैं और यदि सौभाग्यवश उन्हें ये जगहें प्राप्त हो गयीं तो वे अपने अधिकारों का दुरुपयोग करना प्रारम्भ कर देते हैं। बड़े से बड़े लोगों तक आज इसी कारण पैरवी पहुंच सकती है और सच्चे अपराधी निर्दोष साबित हो जाते हैं। जिन का सम्बन्ध ऐसे कांग्रेसजनों से है, वे खुल कर अत्याचार कर सकते हैं और उन्हें कोई रोकनेवाला नहीं। पुलिस और हुक्कामों का साहस नहीं होता कि वे ऐसे कांग्रेसजनों या उन के मित्रों के विरुद्ध कोई भी कानूनी कार्रवाई कर सकें। यदि किसी आफिसर ने ऐसा करने का साहस किया तो ऐसे कांग्रेसजन उन के उपर हजारों इल्जाम ले आते हैं और मन्त्रियों से कह कर या अन्य उपायों से उन की बदली करबा देते हैं।
आज जिस भ्रष्टाचार और घुसखोरी की चर्चा जहां-तहां की जाती है, उसका उत्तरदायित्व आज ऐसे कांग्रेसजनों पर भी है। जो कांग्रेसी अपने आप को ईमानदार कहते हैं या सचमुच वे कुछ ईमानदार हैं, भी इन पतित कांग्रेसजनों के दूषित विचारों से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकते। यदि ईमानदार कार्यकर्त्ता इन भ्रष्ट कार्यकर्त्ताओं की बातों को न मानें या उनकी पैरवी इत्यादि न कर दें तो वह आगे नहीं बढ सकता। ये स्वार्थी कार्यकर्त्ता उसे आगे बढने का मौका ही न देंगे, क्योंकि आखिर ऐसे लोगों के वोट से ही तो वे थाना, जिला या प्रान्तीय कमिटियों के सभापति या मन्त्री हो सकते हैं अथवा एसेम्बली या डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सदस्य हो सकते हैं। और यही कारण है कि बहुत से अच्छे कार्यकर्त्ता, जो सचमुच ईमानदार हैं, आगे नहीं बढ पाते। अतः आज गुटबन्दी की आवश्यकता पड़ती है जिसके लिये अधिक से अधिक कार्यकर्त्ताओं को अपने पक्ष मे मिला कर रखना पड़ता है जो समय पर काम आ सके। बिना इस प्रकार की गुटबन्दी किये आज राजनीति में सफलता प्राप्त करने का कोई दूसरा चारा नहीं। इस तरह की गुटबन्दी जात-पात के नाम पर या पिछड़े वर्ग के नाम पर ही होती है। काश! इस गुटबन्दी का आधार आर्थिक हो पाता।
आज जात-पात के नाम पर गुटबन्दी करना एक साधारण सी बात राजनैतिक दलों में हो गयी है। मैंने तो सोशलिस्ट पार्टी में भी इसका बीज देखा था। आज ज्यों-ज्यों इस तरह की जातीयता आदि को दूर करने की कोशिश की जा रही है और राजनैतिक नेता इससे दूर भागने का प्रयत्न कर रहे हैं, फांसी की रस्सी की तरह यह और जोर से ही उनके गले में बैठती जा रही है। हुक्का-पानी में भले ही जातीयता की बू राजनैतिक कार्यकर्त्ताओं में नहीं पायी जाय किन्तु वोट के दिनों में तो एकमात्र यही अस्त्र एक-दूसरे को पराजित करने के लिये उनके पास होता है। मेरा तो ऐसा खयाल है कि इसे मिटानेवाले व्यक्ति स्वयं इसके शिकार हो रहे हैं और यदि निस्वार्थ भाव से राजनैतिक दलों में कार्यकर्त्ताओं ने काम नहीं किया तो कहा नहीं जा सकता कि इसका फलाफल आगे चल कर क्या होगा ! हो सकता है कि भविष्य में – ईश्वर न करे ऐसा हो – भारत के पतन का एकमात्र यही कारण हो। ऐसा इस लिये सोचना पड़ता है कि आज भी एक दल जब सत्तारूढ हो जाता है तो दूसरा दल उसे सहयोग देने के विपरीत उसके पांव पकड़ कर पीछे की ओर खींचता है कि वह अपने काम में सफल न हो सके और इस प्रकार असहयोग करनेवाले दल को उसका स्थान मिल सके। आज यद्यपि यह बात थाना, जिला या प्रान्त तक ही सीमित है, लेकिन कौन कह सकता है कि इसका अखिल भारतीय रूप नहीं हो सकता है। और इसका कुछ-कुछ आभास तो प्रान्तीयता आदि की भावना से ही प्राप्त हो जाता है, जैसा कि समय-समय पर देखा गया है।
जातीयता की यह भावना खास कर उन लोगों में पायी जाती है जो अपनी योग्यता के बल पर आगे नहीं बढ पाते या जिन्हें अन्य कार्यकर्त्ताओं के इसी प्रकार की युक्तियों के बल पर विरोध का सामना करना पड़ता है। जिन की जाति के लोगों की जनसंख्यां उनके राजनैतिक क्षेत्र में अधिक होती है, वे कार्यकर्त्ता अपनी उन्नति के लिये इसी युक्ति का सहारा लेते हैं। हमारे इलाके में यादव, केवट या अन्य कुछ जातियों की जनसंख्यां अधिक होने के कारण इस वर्ग के बहुत से कार्यकर्त्ता (सभी नहीं) इसी बल पर आगे बढने का दावा करते हैं और अच्छे-अच्छे कार्यकर्त्ता भी भरसक प्रयत्न करते हैं कि उन्हें मिला कर रखा जाय कि वे भी उन के साथ ही वैतरणी पार कर जांय। और इस तरह के कार्यकर्त्ता बाहर से इतना ढोंग करते हैं कि देख कर आश्चर्य होता है। वे समाज में ईमानदारी, पक्षपात-हीनता और सच्चा होने का दावा करते रहते हैं और भोली-भाली जनता उन की बाहरी सूरत पर ही उन की बातों में भूल जाती है।
उपरोक्त कारणों से ही आज कांग्रेस, जिस का इतिहास त्याग, बलिदान एवं देशभक्ति से भरा हुआ है, दिनोदिन ह्रासावस्था की ओर जा रही है। कांग्रेस से लोग असन्तुष्ट हो कर बाहर निकल अपनी अलग-अलग खिचड़ी पका रहे हैं। किसान मजदूर प्रजा पार्टी तथा समाजवादी पार्टी आदि पहले कांग्रेस में ही तो थी और आज भी कांग्रेस तथा उन के सिद्धान्तों में कोई विशेष अन्तर नहीं मालूम होता। किन्तु हमारे दुर्भाग्यवश आज हमारे साथी हम से अलग हो रहे हैं। इस का कारण क्या हमारी भूल नहीं है ? भले ही आज कांग्रेस के आगे उन दलों की कोई खास हस्ती न हो और कांग्रेस एलेक्शनों में बहुमत भले ही प्राप्त कर ले, लेकिन क्या कांग्रेस उसी प्रकार जनता का विश्वास एवं श्रद्धा प्राप्त कर रही है जैसा कि आज से सात साल पहले वह प्राप्त कर रही थी ? जनमत का ही जहां तक प्रश्न है, क्या कांग्रेस से अधिक बहुमत और दलों के लोग भारत भर में प्राप्त नहीं कर सके हैं ? सारे भारत के मतों में से अधिकांश तो शायद स्वतन्त्र या अन्य दलों के उमीदवारों को ही प्राप्त हुये हैं। और आज जो भी मत कांग्रेस को मिले हैं, वे उस के पिछले त्याग के कारण ही। इस का प्रमाण तो हमें तब मिला जब हम गांवों में मत मांगने के लिये लोगों के पास गये और जब उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यद्यपि कांग्रेस के काम अच्छे नहीं हैं, फिर भी उस के त्याग को याद कर वे एक बार और इस को अपना मत देंगे। “एक बार और कांग्रेस को वोट दे कर देख लो” – यह विचार क्या यह प्रमाणित नहीं करता कि लोगों के हृदय में अब वह श्रद्धा कांग्रेस के प्रति बिल्कुल ही नहीं रह गयी है और फिर एक बार उसे सम्हलने का अवसर लोगों ने दिया है। और यदि इस बार कांग्रेस नहीं सम्हली तो ? तो क्या होगा, इस बात पर विचार करने वाले आज कितने कांग्रेसजन हैं और वे इस के लिये क्या प्रयत्न कर रहे हैं?
आज आवश्यकता थी कि कांग्रेसजन जनता में फिर से घुल-मिल जाते, उन की सुनते और अपनी सेवाओं के बल पर उन्हें आकर्षित करते। किन्तु अफसोस, इधर ध्यान किसी का भी नहीं है। केवल डींग मारने के लिये बहुत से कार्यकर्त्ता हैं, काम करने के लिये नहीं। श्री नेहरू ने बार-बार इधर इशारा किया है, कांग्रेसजनों को ललकारा है और उन्हें जुट कर ईमानदारी से काम करने को कहा है किन्तु उन का यह अरण्यरोदन कौन सुनेगा? अपनी-अपनी डफली ले कर आज सभी मस्त हो रहे हैं ; जहन्नुम में जाय कांग्रेस, त्याग, सेवा और देशभक्ति !
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राजनीति की यही दुर्गति देख कर समय-समय पर भिन्न-भिन्न प्रकार के विचार मन में आते रहते हैं। कभी इच्छा होती है कि क्यों न राजनीति को छोड़ कर अन्य प्रकार के कार्यों में समय व्यतीत करना चाहिये। राजनीति के अतिरिक्त साहित्य है – खास कर हिन्दी साहित्य जो अभी भी बहुत पीछे पड़ा हुआ है। अन्य भाषाओं की अपेक्षा यह एक गरीब भाषा ही कही जायेगी क्योंकि अब तक जो प्रयत्न इसे समृद्धशाली बनाने के निमित्त हुये हैं, वे बहुत थोड़े ही हैं। इसे भारत की राष्ट्रभाषा बनाने के लिये भी काफी प्रयत्न करना पड़ा है, वरना हो सकता था कि यह राष्ट्रभाषा का भी स्थान नहीं ग्रहण कर सकती। खैर, किसी प्रकार वह स्थान तो इसे मिला किन्तु अब इस की व्यापकता पर विचार करना आवश्यक है। यदि इस ओर ध्यान न दिया गया और यह संकुचित वातावरण में ही पलती रही तो न जाने भविष्य में इस का क्या होगा।
अत्यन्त ही दुख की बात है कि हम में से विद्वान कहे जाने वाले और कालेज की ऊंची-ऊंची डिग्रियां प्राप्त लोग भी शुद्ध-शुद्ध हिन्दी न बोल सकते हैं और न लिख ही सकते हैं। बचपन से हिन्दी भाषा में बोलते-चालते भी जो व्यक्ति प्रौढ होने पर उस की गहराई तक नहीं पहुंच सके, उसे क्या कहा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति बड़े नाज से कहते हैं कि वे अंग्रेजी तो शौक से लिख-पढ सकते हैं किन्तु हिन्दी का अभ्यास ही नहीं है उन्हें। अजी जनाब, हिन्दी का अभ्यास तो आप तभी से कर रहे हैं जब से आप पैदा हुये। कहिये न कि यह एक ढोंग है और अपने को अंग्रेजीदां प्रमाणित करने के लिये ही आप इस तरह कहा करते हैं। सच तो यह है कि जब जीवन भर के अभ्यास से आप हिन्दी न सीख सके तो दस-बारह वर्ष की स्कूली शिक्षा से आप अंग्रेजी कहां तक सीख सके होंगे। अंग्रेजी साहित्य का तो आप को रत्ती भर ज्ञान नहीं है किन्तु बात यह है कि अन्धे के गांव में काना राजा और इसी लिये अयोग्य व्यक्तियों के बीच आप अपनी झूठी शान बघारते हैं। खैर, अब तो जो हुआ सो हुआ – जिन के कारण आप अंग्रेजी सीखने में सर खपा देते थे, वे भी गये – अब तो उस फादरी जुबान से काम नहीं चलेगा और मादरी जुबान सीखनी ही होगी। तो आइये न हम और आप मिल कर विचार करें कि क्यों आप को हिन्दी सीखने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है किन्तु अंग्रेजी को आप गपागप निगलते चले जाते हैं।
बहुत से लोग कहा करते हैं कि हिन्दी में लिंग का विचार बहुत ही कठिन है और इस के लिये अंग्रेजी इत्यादि भाषाओं की तरह कोई नियम नहीं। वास्तव में बात मार्के की है। यह कठिनाई अखरने वाली अवश्य ही है। लिंग-भेद में शब्दों के लिये यदि कुछ नियम हैं भी तो अपवादों की भी कोई कमी नहीं और हमारे ये नये हिन्दी-प्रेमी लोग इस से घबड़ा जाते ही हैं। घबड़ाने की बात भी है क्योंकि लिंग सम्बन्धी भूलों से बड़े-बड़े विद्वान लोग भी नहीं बचे हैं और कहीं-कहीं तो उन की हेंकड़ी बन्द हो जाती है। तो क्या आज हम उस के लिये नियम नहीं बना सकते हैं? यदि सरकार इस के लिये हिन्दी के उच्च कोटि के विद्वानों की एक समिति बना दे और उन्हें यह भार दे कि वे इस पर शीघ्र ही विचार कर अन्तिम निर्णय दें तो यह काम आसानी से हो सकता है। किन्तु सरकार को डाक्टर रघुवीर जैसे व्यक्तियों के हाथों में यह काम नहीं सौंपना चाहिये , नहीं तो अर्थ का अनर्थ हो जायेगा। क्योंकि जैसा कि पता चला है, उन्होंने हाल में जो हिन्दी शब्दों की रचना की है, वे इतने दुर्बोध हैं कि बड़े-बड़े विद्वान भी उन्हें नहीं समझ पाते, तो साधारण लोगों का क्या पूछना है। हो सकता है कि वे शब्द डाक्टर रघुवीर तक ही न रह जांय।
आज आवश्यकता है हिन्दी भाषा को जनता की बोलचाल की भाषा बनाने की। नदियां उपर की ओर नहीं बहा करती बल्कि नीचे की ओर ही बहती है। आज सरलता की आवश्यकता हर दिशा में है। संसार का इतिहास बतलाता है कि मानव समाज हर दिशा में सरलता की खोज करता रहा है और वह आगे भी खोज करता जायेगा, जब तक कि उसे इस की प्राप्ति होती रहेगी। तो हम क्यों न हिन्दी में भी सरल, सुबोध एवं बोलचाल के शब्दों का प्रयोग करें। हमें संस्कृत की परिधि से निकाल कर हिन्दी को बाहर खड़ा करना पड़ेगा और उस में यह शक्ति लानी होगी कि अन्य भाषाओं के शब्दों को हजम कर सके, वरना संकुचित वातावरण के पृष्ठपोषक हिन्दू समाज की जो अवस्था आज हो रही है, वही हिन्दी की भी होगी।
मेरे उपरोक्त कथन का यह अभिप्राय कदापि नहीं है कि मैं हिन्दी को हिन्दुस्तानी का रूप देना पसन्द करता हूं। मैं तो सदा से ही हिन्दुस्तानी का एक जबरदस्त विरोधी रहा हूं। मैं देख चुका हूं कि हिन्दुस्तानी प्रचार समिति या ऐसे ही संघों की हिन्दुस्तानी को कि वह कितनी सुबोध या दुर्बोध होती है। मेरी समझ से वह भाषा न हिन्दुओं के लिये और न मुसलमानों के लिये ही लाभदायक है, बल्कि दोनों के लिये अहितकर। क्योंकि न हिन्दू ही बिना उर्दू का ज्ञान प्राप्त किये उसे समझ सकता है और न मुसलमान भाई ही, जिन की सुविधा के लिये या यों कहिये कि जिन्हें प्रसन्न करने के लिये यह नवीन-खिचड़ी भाषा रची गयी है।
अतः डाक्टर रघुवीर की हिन्दी से काम चलने का नहीं । यदि सरकार ऐसे व्यक्तियों के हाथ में हिन्दी का भविष्य सौंप दे तो हिन्दी प्रेमियों को इस का विरोध करना चाहिये और सरकार पर दबाव डालना चाहिये कि वह ऐसे हिन्दी के प्रतिनिधियों की समिति बना कर हिन्दी का भविष्य उन के हाथों में सौंपे जो वास्तव में हिन्दी को फलती-फूलती हुई देखना चाहता हो। बड़े-बड़े साहित्यिकों की तो बात हम छोड़ दें, हम हिन्दी प्रेमियों को इस ओर कदम बढाना चाहिये और इस के लिये संगठन बना कर आन्दोलन करना चाहिये। साथ ही छोटे-छोटे लेखों द्वारा अपने विचार भी समय-समय पर पत्रों में प्रकाशित करवाना चाहिये, भले ही हमारे विचार निम्न स्तर के ही क्यों न हों। और इस काम के लिये भी समय दे कर काम करनेवाले हिन्दी-प्रेमियों की आवश्यकता है। आर्थिक कठिनाइयों का तो जबरदस्त सामना करना ही पड़ेगा इस काम के लिये, किन्तु लगन से काम लेने पर ही उस में सफलता प्राप्त हो सकेगी। और इस प्रकार जुट पड़ने से क्या हिन्दी को वह सौभाग्य नहीं प्राप्त हो सकता है जो आज अंग्रेजी को है! ऐसा नहीं करने से तो अंग्रेजी मालूम नहीं कितने वर्षों से हमारे उपर लादी जाती रहेगी। काश, हिन्दी भी अंग्रेजी का टक्कर ले सकती!
हां, तो मैं साहित्य की चर्चा कर रहा था। यों तो हर व्यक्ति इस लिये साहित्यिक होता है कि सृष्टि की आदि से ही साहित्य की आवश्यकता मानव समाज को हुई। आदिम अवस्था में ही नदियों, जंगलों, फल-फूलों, पहाड़ों और झरनों के सौन्दर्य से प्रभावित हो कर मानव के हृदय से उन की प्रशंसा में वाणी फूट पड़ी और धीरे-धीरे उसी ने साहित्य और भाषा का रूप धारण किया तो उस की सन्तान आज के मानव क्यों न साहित्यिक हों! यद्यपि किसी मजदूर और साधारण कोटि के व्यक्तियों को पढने-लिखने का ज्ञान नहीं होता, फिर भी सावन की रिमझिम में या शरत्पूर्णिमा की अमल धवल चान्दनी में उस के मन-मयूर नाच उठते हैं और अनायास ही उस की वाणी से विरहा की तान या अन्य प्रकार के ग्राम्य गीत-संगीत प्रस्फुटित हो उठते हैं। क्या इतना ही यह समझने के लिये पर्याप्त नहीं है कि हर व्यक्ति को साहित्य से अभिरुचि है। तो प्रश्न उठेगा कि क्यों नहीं हर व्यक्ति लेखक या कवि हो जाता है? मेरी समझ से वह लेखक या कवि हो सकता है किन्तु इस के लिये अटूट लगन और मन की एकाग्रता दरकार है। आज के स्कूली विद्यार्थियों की तरह केवल उपनाम रख लेने से काम नहीं चलेगा। यह तो शौक मात्र ही है। यदि उपनाम रख लेने से कोई कवि हो जाता या तुकबन्दी कर देने से, तो आज के स्कूल और कालेजों से निकले 90 प्रतिशत ऐसे ही होते।
हर व्यक्ति में कवि तो होता है किन्तु वह जाग्रतावस्था में नहीं रहता। और जिस का कवि जाग्रतावस्था में है, वही कवि होता है। वह संसार की हर वस्तु में कविता को देखता है और अपनी कल्पना और अनुभूति के सहारे कविता की सृष्टि करता है। और यही दशा लेखक की भी है। तो लेखक या कवि हो कर कोई संसार को क्या लाभ पहुंचा सकता है, यह विचारणीय है।
चुंकि कविता, कहानी और लेखादि साहित्य के ही अंग हैं, हमें साहित्य के सम्बन्ध में ही मोटे तौर पर सोचना है, बारिकी से नहीं। आज बिनोवा जी के शब्दों में लोग फायदावादी भी बन गये हैं। उन्हें हर काम से फायदे क्या है, इसी से फायदा है। तो क्यों न पूछा जाय कि साहित्य-साहित्य की रट लगाने से क्या फायदे हैं?
यह निर्विवाद सत्य प्रमाणित हो चुका है कि विश्व में साहित्य का स्थान बहुत ही ऊंचा है। आज कोई भी देश या राष्ट्र जिसे अपना साहित्य नहीं है, उन्नति नहीं कर सकता। आज अंग्रेजों की चलती इसी लिये सब से अधिक इस संसार में है कि उसका साहित्य काफी समृद्धशाली है और संसार के कोने-कोने में उस का प्रचार है। आज अंग्रेजी संस्कृति एवं सभ्यता के कायल सभी देश के लोग हो रहे हैं और इस का श्रेय अंग्रेजी साहित्य को ही है। साहित्य के महत्व को जानने के कारण ही अंग्रेजों ने संसार में इस के प्रचार के निमित्त मिशनरियों का जाल सा बिछा दिया। यही कारण है कि हमारा भारत स्वतन्त्र होने पर भी अंग्रेजी को छोड़ने से हिचकता है और यदि हम अंग्रेजी को बिल्कुल ही छोड़ दें तो हमारा सम्बन्ध सारे संसार से टूट जायेगा।
विज्ञान और राजनीति आदि भी साहित्य के ही बल पर पनपते हैं। यदि साहित्य न होता तो इन्हें कौन जान सकता? इतना ही नहीं, बल्कि सच तो यह है कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में बिना साहित्य की सहायता से हम कुछ नहीं कर सकते। सभी विधाओं का केन्द्र-बिन्दु साहित्य ही तो है। रूस में यदि मैक्सिम गोर्की जैसा साहित्यिक नहीं होता तो कौन साम्यवाद के सन्देश को भोली-भाली जनता तक पहुंचा सकता? भारत में ही यदि मैथिलीशरण गुप्त और रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आदि जैसे राष्ट्रीय कवि नहीं होते तो क्या राष्ट्रीयता की लहर इतना शीघ्र भारत में फैल पाती? नेताओं के ओजस्वी भाषणों में हृदय को फड़का देने वाली शक्ति साहित्य की ही एक शैली है। कवितायें सुन कर भुजायें फड़क उठती हैं और कहानियां पढ कर आंखों से अश्रुपात होने लगते हैं और मनुष्य के हृदय में हास्य-रूदन और प्रतिशोध आदि की भावनायें उठने लगती हैं जो उसे कर्त्तव्यपथ पर बढने के लिये प्रेरित करती हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि साहित्य मुर्दों में जान फूंक सकता है, कायरों को बहादुर बना सकता है, नेताओं को राजनीतिज्ञ बना सकता है, विचारकों को दार्शनिक और अन्वेषकों को अणुबम का आविष्कारक बना सकता है। साहित्य की व्यापक सत्ता से विश्व का अणु-अणु अनुप्राणित है, इस में शक की कोई गुंजाइश नहीं।
और जब साहित्य की यह महत्ता है तो उस की अभिवृद्धि में क्यों न जुट कर लगा जाय। इस की सेवा क्या देश की या विश्व की सेवा नहीं है? राजनीति में या इसी प्रकार के अन्य क्षेत्रों में रह कर जनता की सेवा करना तो एकांगी सेवा ही हो सकती है, किन्तु साहित्य की सेवा से तो वह व्यापक सेवा होती है जिस का अन्त नहीं है।
ये विचार तो आते हैं किन्तु राजनीति से भाग कर निकल जाना मुश्किल सा लगता है। किसी ने एक बार कहा था कि एक बार राजनीति के चक्कर में पड़ जाने पर उस से बाहर निकल जाना मनुष्य के लिये असम्भव है, यह बात सच मालूम होती है।
राजनीति में कूटनीति है और इसी लिये इस का अर्थ होता है – झूठ, फरेब, दाव-पेंच तथा कपट। तो क्यों न यह मनुष्य को आकर्षित करे? अच्छी बातों की ओर तो आकर्षित होना सदा से मुश्किल रहा है न!
अपना कार्यक्षेत्र छोटा बना कर काम करना भी अच्छा ही होता है। बहुत बड़े क्षेत्र को ले कर काम करना तो बड़े लोगों के लिये ठीक है किन्तु हमारे जैसे कार्यकर्त्ताओं के लिये नहीं। जिस प्रकार समुद्र में छोटी नावों का डूब जाना साधारण सी बात है, उसी प्रकार विस्तृत कार्यक्षेत्र में छोटे कार्यकर्त्ताओं का कुछ भी महत्व नही रहता। उन्हें कभी ऐसा मौका नहीं मिलेगा कि वे अपने कार्यों को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित कर सकें, भले ही वे दिन-रात क्यों न खट रहे हों।
इस लिये यह आवश्यक है कि छोटे कार्यकर्त्ता अपने गांव को ही अपना कार्यक्षेत्र मान कर काम करें। इस से गांव को आगे बढने में काफी सहायता प्राप्त हो सकेगी। गांव हर प्रकार से स्वतन्त्र हो सकेगा। आज जिन मामलों में गांववालों को दूसरों का मुंह देखना पड़ रहा है, वह नहीं होगा। लोग खाद्य, कपड़ा तथा अन्य आवश्यक चीजों के लिये स्वतन्त्र हो जायेंगे। साथ ही थानों तथा जिलों के अधिकारियों का काम भी हल्का हो जायेगा। आज तो ऐसे अधिकारियों को इसी लिये सफलता नहीं मिल रही है कि गांव के कार्यकर्त्ता उन के उपर ही निर्भर रह कर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। यदि ये कार्यकर्त्ता अपने-अपने गांव के उत्थान के कार्यों में जुट गये होते तो कैसा अच्छा होता।
राजनैतिक या सामाजिक जो भी कार्यकर्त्ता आज हैं, वे सोचा करते हैं कि गांव में करने के लिये उन के सामने काम ही क्या है! किन्तु उन्होंने काफी सूझबूझ से काम नहीं लिया है। उन्हें समझना चाहिये कि भारत की इकाई आखिर गांव ही तो है। इसी के उत्थान से सारे देश का उत्थान होगा। यदि हमारे गांव पीछे रहेंगे तो देश क्या उठ सकेगा। हमारे नेता, विद्वान, दार्शनिक और वैज्ञानिक सबों की उत्पत्ति तो इन गांवों से ही हुई है। आज भी हमारे गांवों में लाखों ऐसे गुदड़ी के लाल हैं जिन्हें यदि हर प्रकार की सुविधा प्राप्त हो तो वे गांधी, नेहरू, रवीन्द्रनाथ या राधाकृष्णन हो सकते हैं। आज तो ऐसे लालों का पालन ऐसे गन्दे वातावरण में होता है कि उन की प्रतिभा उन तक ही सीमित रह जाती है – उसे फैलने का कभी समय ही नहीं आता। यदि कोई उन में से आगे बढ जाते हैं तो उसे सौभाग्य ही समझिये वरना ऐसी व्यवस्था तो हमारे गांवों में नहीं।
सरकार के भरोसे हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहने की आदत आज हम में हो गयी है। साधारण कार्य के लिये भी हम मंत्रियों तक दौड़ लगाते हैं। हमारे गांव में यदि एक पाठशाला नहीं है, सड़क नहीं है, कुआं नहीं है, बांध नहीं है या पुस्तकालय नहीं है तो यह सरकार का ही दोष है, ऐसा हम सोचा करते हैं, किन्तु इन साधारण कामों को हम स्वयं नहीं कर सकते।
यदि गांव की बिखरी हुई शक्ति को हम एकत्रित करने का प्रयत्न करें तो ये काम आसान ही नहीं होंगे, बिल्कुल मामूली परिश्रम से भी हो सकेंगे। आज तो सरकार की ओर से भी को-आपरेटिव सोसाइटी को हर प्रकार से सहायता दी जा रही है। इस का एक अलग विभाग सरकार ने खोल दिया है। इस के अफसर हर गांव में जा कर वहां सोसाइटी की स्थापना में सहायता देने को सदैव प्रस्तुत रहते हैं। किन्तु हम स्वयं तो क्या करेंगे, इन से सहायता ले कर भी कुछ नहीं कर सकते। यदि कुछ करने को हम तैयार होते हैं और कुछ करते हैं भी तो वह सफल नहीं हो पाता, यह मेरा निजी अनुभव है। हम क्यों इस काम में असफल होते हैं, इस सम्बन्ध में मेरा ठोस अनुभव यह है कि हम एक काम में दत्तचित्त हो कर नहीं लगते। अपने गांव का यदि कोई काम प्रारम्भ करते हैं तो थाना और जिला के कार्यों को भी हम अपने सिर पर उठा लेते हैं। जिस का फल यह होता है कि हम किसी भी काम में सफल नहीं हो पाते। थाने और जिला के काम अपने सिर पर नहीं ले कर हमें अपने गांव तक ही सीमित रह कर काम में जुटना चाहिये। तभी हम कुछ कर सकेंगे वरना हम कुछ भी नहीं कर सकेंगे। हम जिला, थाना या गांव, इस बड़े क्षेत्र में स्वयं ही खो जायेंगे।
आज यदि हम गांव के लोगों को समझा-बुझा कर सहयोग-समितियों का निर्माण करें तो गांव के सभी काम आसानी से होते रहेंगे। प्रारम्भ में कठिनाइयां तो अवश्य ही गांवों में होती है। गांव के लोग अधिकांश अपढ ही हैं। वे समझ नहीं सकते कि इन समितियों से कुछ होगा। उन्हें इन कार्यों में सन्देह होने लगता है। वे समझते हैं कि कुछ ठगने के निमित्त ही ये कार्यकर्त्ता कुछ-कुछ बहाने बना रहे हैं। उन का सन्देह ठीक भी है क्योंकि हम ने बराबर उन से पैसे लिये हैं किन्तु स्वराज दिलाने के अतिरिक्त उन के लाभ के कौन से काम कर दिये हैं ! किन्तु यदि हम ईमानदारी से काम में लग कर इन समितियों के द्वारा उन्हें लाभ पहुंचाने लगेंगे तो ये स्वयं हम से आगे बढ कर काम में जुट पड़ेंगे। अतः ये कठिनाइयां थोड़े ही दिनों के लिये हो सकती है। प्रारम्भ में हमें विरोध का सामना करना पड़ेगा, लोगों की गालियां भी सुननी पड़ेगी, लोग ताने भी कसेंगे और ऐसा होना स्वाभाविक है –होता है। ऐसे अवसर पर हमारे धैर्य की परीक्षा ही होती है। घबड़ा कर या क्रोध में आ कर हमें अलग तो नहीं ही होना चाहिये।
हमारे गांवों की तरह-तरह की समस्यायें हैं। खेती-गृहस्थी, पशुपालन, वस्त्र-स्वाबलम्बन, ग्राम सफाई तथा प्रौढ शिक्षा आदि कार्य में अभी सैकड़ों परिवर्त्तन की आवश्यकता है जिन्हें हम अपने परिश्रम के बल पर सहयोग-समितियों द्वारा पूरा कर सकते हैं।
गांव के किसान खेती तो अवश्य ही करते हैं किन्तु उन्हें खेती-सम्बन्धी ज्ञान नहीं है। एक मुद्दत से जिस प्रकार के तरीके इस के लिये प्रचलित हैं, वे अब मौजू नहीं। भारत के बाहर अन्य देशों में तरह-तरह के परिवर्त्तन खेती में किये गये हैं। परिश्रम को कम करने के लिये नयी मशीनों से काम लिया जाता है। जोतने, कोड़ने, बोने और काटने तक में भी मशीनों की सहायता रहती है। यद्यपि हमारा देश इस के योग्य नहीं कि वह इस तरह की मशीनों से काम ले सके और ऐसा कर के हमें लोगों को बेकार भी नहीं कर देना है , फिर भी आवश्यकतानुसार तो कभी-कभी इन तरीकों से काम लेना ही पड़ेगा। जैसे अपने यहां की कोशी क्षेत्र के जंगल कोड़ने की समस्या तो बिना ट्रैक्टर की सहायता से हल ही नहीं हो सकती। यहां तो मशीनों का उपयोग करना ही होगा। बीज के सम्बन्ध में भी हमारे किसान भूल ही करते हैं। बीज किस प्रकार रखना चाहिये और किस समय उसे खेत में गिराना चाहिये, इस का ज्ञान उन्हें बहुत कम ही रहता है। खाद के सम्बन्ध में तो यह कहा जा सकता है कि गांव के किसान इस सम्बन्ध में बिल्कुल नादानी करते रहे हैं। मवेशियों के गोबर को यों ही वे बर्बाद करते हैं। बहुत कम ही किसान ऐसे हैं जो उसे अपने खेतों में डालते हैं। और यदि कोई डालता भी है तो यों ही। कम्पोस्ट के द्वारा खाद बनाने की रीति उन्हें मालूम नहीं। आज यदि कोई उन्हें ऐसा करने के लिये कहते हैं तो वे बात ही नहीं सुनते। मैंने तो अपने गांव में देखा है कि खेती विभाग के कर्मचारियों के दबाव देने पर लोग बौखला से गये और उन्हें फटकार दिया। बेचारे बेबकूफ बन कर चले गये किन्तु यदि गांव के कार्यकर्त्ता ऐसा स्वयं कर उन्हें इस के लाभ दिखलाते तो क्यों न वे भी देखा-देखी कम्पोस्ट आदि बनाने लगते?
आज काफी उपज नहीं हो पाती। किसान परिश्रम जी-जान से करते हैं किन्तु उस का फल उन्हें नहीं मिलता। यदि सहयोगी खेती की व्यवस्था हो तो मेरा अनुमान है कि काफी लाभ किसानों को हो। खास कर इस कोशी क्षेत्र में तो काफी नुकसानी इस लिये ही किसानों को होती है कि उन के खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में दूर-दूर पर हैं। जब वे एक जगह खेत की निगरानी कर फसल को जंगली सूअरों और हिरणों आदि से बचा लेते हैं तो दूसरी जगह उन की फसल उजड़ जाती है। यदि सहयोगी खेती लोग करते तो क्या ऐसा हो पाता? सबों को अलग-अलग अपने खेतों की निगरानी करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। और इस का फल यह होता कि सभी खेतों में उपज होती ही, वह जंगली जानवरों से बच कर घर भी चली आती।
पशु गांववालों की सब से बड़ी सम्पत्ति है। खेती और पशुपालन ही तो खास व्यवसाय गांववालों के हैं। खेती भी बिना सुन्दर-स्वस्थ्य पशु के होना मुश्किल है। पशुपालन पर भी खेती निर्भर है। किन्तु दुख है कि इस काम में भी हमारे ग्रामीण भाई काफी होशियार नहीं। आज भारत के पशु-धन का नाश हो रहा है। जहां कभी दूध की नदियां बहती थी, आज पथ्य के लिये भी दूध मयस्सर नहीं होता। इस का क्या कारण है? एकमात्र पशुपालन के ज्ञान का अभाव और इस ओर से अन्यमनस्कता। लोग झूठे आडम्बर में अपने इस प्रमुख काम को भूल गये हैं। ग्वाले लोग अभी भी गाय-भैंस पालते हैं तो लोग उन लोगों को देहाती और अपढ कह कर चिढाते हैं। किन्तु मेरी समझ से तो ये ग्वाले ही एकमात्र ऐसे लोग रह गये हैं जिन पर भारत का पशु-धन अभी भी कुछ अंश में सुरक्षित है।
अब तो देहात के लोग भी पशुपालन से घृणा तक करने लगे हैं। इसे वे एक नीच काम समझ कर छोड़ रहे हैं। जिन लोगों ने आवश्यकतानुसार कुछ पशु पाल भी रखे हैं, उन के खाने-पीने और रहने की व्यवस्था पर ध्यान नहीं देते। सड़ी-गली चीजें एवं सूखी घासों पर वे किसी तरह उन्हें जीवित भर रख कर अपना काम निकाला करते हैं। कड़ी धूप, बरसा और अन्य कुसमयों में भी बैलों आदि से कड़ी मेहनत का काम लिया जाता है। किन्तु उस के पालन में सावधानी नहीं रखी जाती। फल होता है कि अकाल में ही कितने पशु काल के गाल में चले जाते हैं। उन्हें ऐसे स्थानों में रखा जाता है जिसे शायद ही कभी-कभी साफ किया जाता हो। इस प्रकार गन्दे स्थान में रहने के कारण भी हजारों पशु असमय ही मरते हैं।
देहात में पशु की बीमारियों का ज्ञान भी लोगों को नहीं के बराबर ही है। बीमार पड़ने पर झाड़-फूंक से काम लिया जाता है। भाग्यवश यदि वह बच गया तो ठीक, नहीं तो इस के लिये अन्य उपाय नहीं। गांव के लोग देवी-देवता का आवाहन भी करते हैं अपने शरीर में। ये ठग ऐसे धूर्त्त होते हैं कि इन पर गांववालों की अगाध श्रद्धा होती है। इन के द्वारा भी पशुओं तथा मनुष्यों का इलाज करवाया जाता है। भला ऐसी परिस्थिति में पशु-धन का ह्रास हो रहा है तो कौन सी आश्चर्य की बात है?
गांव में सफाई पर भी ध्यान नहीं दिया जाता। लोग जब स्वयं अपने शरीर की सफाई नहीं कर सकते तो गांव की सफाई क्या करेंगे? सड़कों पर मल-मूत्र गिराये जाते हैं ; गली-कूचों में घर-आंगन की बेकार सड़ी-गली चीजें तथा बुहारन आदि फेंक दिये जाते हैं। बड़े-बड़े गढ्ढे घर के आसपास ही रहते हैं जिन में गन्दा पानी भरा रहता है। गांव के एक ही पोखरा में लोग स्नान करते, मवेशी को बैठाते और कपड़े साफ करते हैं। साथ ही यही पानी पीने के काम में भी लाया जाता है।
बरसात के दिनों में तो गांवों में चलना मुश्किल हो जाता है। सड़कों और रास्तों पर बरसा का पानी इस प्रकार जमा हो जाता है कि उसे निकलने का कोई उपाय नहीं रहता। फलतः कीचड़ हो जाना स्वाभाविक है और इस कीचड़मय राहों पर चलने से घुटना तक उस में फंस जाता है। दिन-रात लोग उस में चलते हैं किन्तु किसी को चिन्ता नहीं रहती कि इस का कोई प्रबन्ध किया जाय।
जीवन के लिये जिस प्रकार भोजन की आवश्यकता है, उसी प्रकार उस के बाद ही वस्त्र का दूसरा नम्बर आता है। बल्कि सच कहा जाय तो यह कहा जा सकता है कि बिना भोजन के तो दो-चार रोज तक लोग जीवित भी रह सकते हैं, किन्तु बिना वस्त्र वे नहीं रह सकते ; जी भले सकते हैं। तो क्यों न यह माना जाय कि आज के युग में भोजन से भी आवश्यक वस्त्र है जिस के बिना लोग क्षण भर भी नहीं रह सकते।
किन्तु आज के जमाने में लोग वस्त्र के लिये सरकार के भरोसे ही रहते हैं। मीलों दौड़ कर वे शहर में कपड़ों के लिये जायेंगे, वहां से खाली हाथ लौटेंगे, फिर दौड़-धूप करेंगे ; किन्तु इस के लिये कोई प्रयत्न न कर सकेंगे कि किसी प्रकार की दौड़-धूप और खुशामद के बिना वे अपने घर में वस्त्र तैयार कर लें। एक जमाना था कि लोग स्वयं ही वस्त्र तैयार कर लेते थे। सारा भारत वस्त्र के सिलसिले में स्वाबलम्बी था। किन्तु कितने बड़े दुख की बात है कि पूज्य गांधी जी के बार-बार जोर देने पर भी लोगों ने इस ओर ध्यान तक नहीं दिया। वे आज भी मील के बने कपड़ों पर ही निर्भर करते हैं, स्वयं कुछ करना नहीं चाहते। गांव के लोगों के लिये यह बिल्कुल आसान काम है कि वे कपास की खेती कर रूई तैयार करें, स्वयं औटाई-धुनाई और कताई कर सूत तैयार कर लें और फिर कपड़े। किन्तु किस को इस का ध्यान है?
इन सभी कुव्यवस्थाओं के मूल में गांव की अशिक्षा का बड़ा हाथ है। इन कार्यों की ओर लोग ध्यान नहीं देते। इस का खास कारण है कि वे इस का महत्त्व ही नहीं समझते। यदि हमारे कार्यकर्त्ता रात्रि पाठशाला या पुस्तकालय आदि की स्थापना कर उन की अशिक्षा दूर करने का प्रयत्न करें तो थोड़े ही दिनों में ये कठिनाइयां दूर हो जायेंगी।
आवश्यकता आज इस बात की है कि हम राजनैतिक या सामाजिक कार्यकर्त्ता उन की अशिक्षा को दूर करने में दत्तचित्त हो कर लग जांय। सुबोध पत्र-पत्रिकाओं के द्वारा उन्हें (गांववाले अशिक्षितों को) आज की दुनियां की सभी बातों का ज्ञान प्राप्त करावें। स्वयं पढ कर और समझा कर उन्हें नयी-नयी बातों की शिक्षा दें। प्रारम्भ में कठिनाइयों का सामना तो करना ही होगा। अतः हम रेडियो तथा अन्य मनोरंजन के साधनों से भी काम ले सकते हैं, जिन से मनोरंजन के साथ ही शिक्षा भी प्राप्त हो सके। यदि इस प्रकार, भारत की इकाई, गांव में हम जुट पड़ें तो कुछ ही दिनों में हम कहां से कहां चले जा सकते हैं।
इस विषय की ओर मेरा ध्यान सदा से रहता आया है। भले ही मैं कर्मठता के अभाव में इन कार्यों में सफल न हो सका हूं किन्तु प्रयत्न तो मेरा इस दिशा में रहा ही है। आज तो कुछ समझने भी लगा हूं ; जिन दिनों मेरा विद्यार्थी जीवन था, उन दिनों भी इस दिशा में मेरे प्रयत्न हुये थे।
उदाहरण स्वरूप मेरे गांव के पुस्तकालय की स्थापना सन 1936 ई में ही हुई थी, जब कि मैं दशमें वर्ग का विद्यार्थी था। आम के बगीचे की रखवाली करता हुआ मेरे दिमाग में एकाएक यह बात आयी थी कि मैं अपने गांव में एक नवयुवक संघ की स्थापना करूं। मैंने गांव के हम उम्र लड़कों को एक सूचना दे कर बगीचे में ही बुलाया था। आनेवालों में थे – सर्वश्री लक्ष्मण चौधरी, मार्कण्डेय मिश्र (अब स्वर्गीय), सूर्यनारायण ठाकुर, नवलकिशोर मल्लिक, राम अनुग्रह मिश्र, रामेश्वर मिश्र एवं गुणेश्वर ठाकुर उर्फ छूतो ठाकुर जी। हमारी बैठक हुई थी और हमने ‘नवयुवक संस्था’ नाम की एक संस्था का वहीं जन्म दिया था।
बाद में गांव के बड़े-बूढों को बुला कर हमने सहायता मांगी थी और उन का पूर्ण सहयोग भी हमें मिला था। उन के सहयोग से एक फूस का घर भी हम ने बना लिया था और पुस्तकालय की भी स्थापना कर ली थी। काफी चल चुका था यह पुस्तकालय, किन्तु हमारे बचपन ने हमे धोखा दिया और गलती से यह बर्बाद हो गयी।
कुछ व्यक्ति उन दिनों पुराने विचार के मेरे साथियों में से थे और कुछ नये विचार के सुधारवादी भी। मैं स्वयं सुधारवादी में था, अतः हर विषय में नया दृष्टिकोण रखता था। इन्हीं विषयों पर कुछ मतभेद मेरे और अन्य लोगों के बीच हो गया और मैं पुस्तकालय तथा संस्था से इस्तीफा दे कर निकल गया। मैं दावा नहीं करता कि केवल मेरे निकल जाने से ही संस्था टूट गयी, किन्तु हां, कुछ-कुछ ऐसी बात भी थी। क्योंकि मेरे निकल जाने के कुछ दिनों बाद ही फूस का वह घर बेच लिया लोगों ने और सारे सामान लोअर स्कूल में उठा कर ले गये। बाद में वह संस्था नियमित रूप से चालू नहीं रह सकी और पुस्तकालय के सारे सामान लोग जहां-तहां ले गये।
आज जब उन दिनों की याद आती है तो कलेजे में दर्द सा उठ जाता है कि कितनी नादानी थी हमारी और खासकर मेरी कि अपनी बनायी हुई चीज के विनाश का कारण मैं ही बना था। यदि मैंने उन दिनों साहस एवं दृढता से काम लिया होता तो क्या मैं वहां से भागता और क्या तब वह संस्था यों नष्ट हो पाती?
उन दिनों पुस्तकालयों की काफी कमी इस इलाके में थी। इस आसपास में भी शायद सुपौल की पब्लिक लाइब्रेरी मात्र ही ऐसी संस्था थी। हमारे उस पुस्तकालय में तीन सौ से उपर पुस्तकों की संख्यां पहुंच गयी थी। कैरेम, ताश, लूडो तथा अन्यान्य खेल के सामान थे। अपनी लाइट भी थी। कुर्सी-बेंच वगैरह भी थी। किन्तु सब एक छोटी सी गलती के कारण ही समाप्त हो गये। पुस्तकालय में उन दिनों भी 15-20 लोगों की उपस्थिति रहती थी, जो शायद आज भी किसी-किसी पुस्तकालय में ही हो। बचपन में लोग कितनी बड़ी-बड़ी भूलें कर बैठते हैं! किन्तु वह पीछे पछताता भी कितना है!
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इस साल जिला कांग्रेस कमिटी के सभापति पद के चुनाव में काफी सरगर्मी रही। पहले से श्रीयुत लहटन चौधरी जी जिला कांग्रेस कमिटी के सभापति थे। किन्तु कलकत्ता कांग्रेस के बाद जब सभी जिला कमिटियों का चुनाव (साथ ही प्रान्तादि का भी) पुनः होने का निश्चय हुआ तो यहां भी चुनाव की तैयारियां होने लगीं। कई उमीदवार सामने आये। स्वयं श्री लहटन चौधरी जी तो थे ही, अन्य उमीदवारों में पंडित श्री राजेन्द्र मिश्र जी भी थे। कहा जाता है कि वे नहीं चाहते थे कि वे इस चुनाव में भाग लें किन्तु उन के मित्रों ने उन पर काफी दबाव डाला कि वे भी इस में घसीटे जांय। लोगों का कहना था कि अब श्री मिश्र जी राजनीति से संन्यास ले कर चुंकि अपने घर बैठ गये हैं, अतः उन्हें खींच कर जिला कमिटी के सभापति पद पर बैठाना अत्यावश्यक है।
बात भी कुछ ऐसी ही थी क्योंकि बिहार में एकमात्र वही पुराने एम एल ए थे जिन्होंने इस बार बिहार विधायिका की सदस्यता के लिये अपना पर्चा नहीं दाखिल किया था और न कांग्रेस में ही उन्होंने इस के लिये कोई कोशिश की थी। बल्कि सुनने में आया था कि कई नेताओं के अनुरोध करने पर भी उन्होंने अपनी स्वीकृति नहीं दी थी। बात में कुछ सत्यता अवश्य थी, क्योंकि उन की पहुंच इतनी दूर तक थी कि यदि वे चाहते तो उन्हें बिना परिश्रम ही सफलता मिल जाती। बहुत से लोगों का कहना है कि वे इस लिये इस बार चुनाव में खड़ा होना नहीं चाहते थे कि उन्हें हार जाने का भय था। किन्तु इस में भी सत्यता नहीं मालूम होती जबकि हमने देखा है कि कांग्रेस के साधारण से साधारण उमीदवार भी सफल इस बार के चुनाव में हुए ही हैं। और वे तो पुराने और योग्य कांग्रेसी कार्यकर्त्ता ही थे। जो कुछ भी हो, उन्होंने चुंकि इस बार एसेम्बली की सदस्यता के लिये अपना नाम वापस लिया था, इस लिये लोगों की इच्छा थी कि उन्हें कम से कम कांग्रेस के किसी पद पर अवश्य ही बैठाना चाहिये।
श्री लहटन चौधरी जी को श्री शिवनन्दन मंडल जी का समर्थन प्राप्त था। कहा जाता है कि सर्वश्री राजेन्द्र मिश्र और शिवनन्दन मंडल जी में लीडरशीप का पुराना झगड़ा बहुत दिनों से चला आता है और वे एक-दूसरे को दबाने का प्रयत्न करते रहे हैं। इस बार जब पं राजेन्द्र मिश्र जी का नाम आया तो श्री चौधरी का समर्थन करना इस लिहाज से उन के लिये आवश्यक था। -------
( अपूर्ण)
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धर्म की उत्पत्ति और विकास –
समाज के अधिकांश लोगों का यह खयाल है कि धर्म ही संसार के लोगों का एकमात्र अवलम्ब है और बिना धर्म के समाज का अस्तित्व कठिन है। धर्म को ईश्वर द्वारा निर्मित कहा जाता है, लेकिन कोरी कल्पना से काम न ले कर इस के ऐतिहासिक कारणों की खोज करें तो यह स्पष्ट मालूम हो जायेगा कि इस का मौलिक कारण कुछ और ही है। अगर एक ईश्वर पर भी विश्वास किया जाये तो भी यह सिद्धान्त गलत साबित होगा। अगर ईश्वर एक ही है तो संसार में अनेकानेक धर्म क्यों हैं? अगर अनेकानेक धर्म हैं भी तो इन के नियम क्यों नहीं आपस में मेल खाते हैं? जिस काम को एक धार्मिक समाज उचित कहता है, दूसरा ठीक इस के विपरीत बतलाता है ! हिन्दुओं का कहना है कि गो-हत्या पाप है और मुसलमान उसे पुण्य समझते हैं। हिन्दू कहते हैं कि मूर्ति-पूजा जायज है और मुसलमान कहते हैं नाजायज। संसार में अगर एक ही ईश्वर का भी अस्तित्व माना जाये तो ये परस्पर विरोधी बातें क्यों होती हैं? और खूबी यह है कि सब के सब अपने-अपने धर्म की प्रत्येक कायदे को सत्य और जायज ही मानते हैं। इस से तो यह साफ सिद्ध है कि ईश्वर कोई चीज है ही नहीं और धर्म देववाणी नहीं, प्रत्युत नरवाणी है।
वास्तव में धर्म हमारे समाज के बुद्धिजीवी वर्ग के मस्तिष्क की उपज है। इसी स्वार्थी वर्ग ने अपने स्वार्थ के हित ---------
( अपूर्ण )