विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-६

कल्पना झा · 2026-07-15 · अंक 446 · पृष्ठ 99–104

निर्भीक पत्रकार 'विद्यालंकार'
पत्रकारिता/मीडिया के लोकतन्त्रक चारिम स्तम्भ कहल जाइत अछि। लोकतन्त्र मे सरकार आ जनताक बीच 'संवाद'क संवाहक कही, जनताक निगरानी कही, ताहि तरहक जवाबदेही बला काज अछि पत्रकारिता।
लोकतन्त्रक अन्य तीन स्तम्भ अछि : विधायिका, कार्यपालिका आ न्यायपालिका। उक्त तीनू स्तम्भक गतिविधि के उचित दिशा देब, मजबूती प्रदान करब काज छै चारिम स्तम्भ पत्रकारिताक। आ से काज जिम्मेदारीपूर्वक करैत रहलाह पत्रकार 'विद्यालंकार' जी। पहिनहु कहने छी, 'धाकड़' पत्रकार छलाह 'विद्यालंकार'। तेहन 'धाकड़' जे तत्कालीन मुख्यमन्त्री पर्यन्त हिनकर पत्रकारिताक 'कायल' छलाह। सरकारक हाथक कठपुतरी नहि बनलाह कहियो ओ। बरु इएह सरकार पर दबाव बनएबाक माद्दा राखैत छलाह। आबक मीडियाकर्मी जकाँ बिकाउ नहि छलाह। सही के सही आ गलत के गलत कहबाक साहस छलनि पत्रकार 'विद्यालंकार'क भीतर। एखनुक अधिकांश पत्रकार "पत्रकार"क पद के कलंकिते करबा पर उतारू भेल छथि। एखनुक 'विकट'/ 'विचित्र' सन पत्रकारिता पर एम्हरे दू-तीन दिन पहिने हितनाथ झाक एकटा छोट-सन पोस्ट अभरल छलए फेसबुक पर, से उद्धृत कऽ रहल छी। हितनाथ झा लिखैत छथि-
आमिर पर घंटा भरि चर्चा, 'नेशनल मीडिया' केर ई भेष।
साधू-सन्यासी मौलाना, योग-गुरुक आख्यान अशेष ।।
अध:पतनपर आइ हमर ई, भारत देशक चारिम खम्भा।
पत्रकारिता कत' जा रहल, 'टी.आर.पी.'क कतेक टिटिम्भा ।।
से ठीके, आब बस 'टी.आर.पी.'क खेल रहि गेल अछि पत्रकारिता। 'टी.आर.पी.' लेल आमिर खानक तेसर विवाह नेशनल न्यूज बनल रहल दू दिन धरि। ओहि निरर्थक मुद्दा पर घमासान मचल रहल देशक प्रमुख न्यूज चैनल सभ पर। पत्रकारिता की होइत छै, से सीखल जा सकैत अछि 'विद्यालंकार'क व्यक्तित्व ओ कृतित्वक अवलोकन कऽ कऽ।
श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' पर सुरेश्वर झा द्वारा लिखल मोनोग्राफ (साहित्य अकादमी सँ प्रकाशित) पढ़िए पत्रकारिता-धर्मक पालन करब सिखबाक चाही, पत्रकारिता मे रुचि रखनिहार केँ। पत्रकारिता मे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'क योगदानक चर्चा करैत लेखक कहलनि अछि (पृष्ठ संख्या - 20), "ई तँ निर्विवाद रूप सँ कहल जा सकैत अछि जे पत्रकारिता आओर श्रीकान्त ठाकुर विद्यालंकार, ई दुनू शब्द एक दोसरक पर्यायवाची जकाँ बनि चुकल अछि। हुनक लगभग सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रभाषा हिन्दीक पत्रकारिताक प्रारम्भ, विकास, प्रचार ओ प्रसार मे लागल रहलनि। हिन्दी पत्रकारिताक क्षेत्र मे ओ एक गोट अग्रणी व्यक्तित्व छलाह। ओ पत्र सबहि केँ सजौलनि, अलंकृत कएलनि तथा ओकर प्रतिष्ठा केँ बढ़ौलनि। ओ हिन्दी पत्र केँ लोकप्रिय बनेबा मे सफलता प्राप्त कएलनि तथा आजादी पूर्वहि ओकरा अंग्रेजी पत्रक समकक्ष अनबाक स्तुत्य-प्रयास कएलनि। अम्बिका प्रसाद बाजपेयीक बादक समय मे श्रीकान्त ठाकुर हिन्दी पत्रकारिता मे आधुनिकताक समुचित समावेशक संग ओकरा उजागर करबा मे सक्षम भेलाह। श्रीकान्त ठाकुर हिन्दी पत्रकारिता मे प्राचीनता आ नवीनताक बीचक कड़ी छलाह। भारतीय हिन्दी पत्रकारिताक इतिहास मे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' एक गोट स्वर्णिम अध्याय जोड़ने छथि।"
'विद्यालंकार' पत्रकारिताक मूलभूत सिद्धान्तक पालन करैत आगाँ बढ़लाह। कहियो ककरो दबाव मे रहि कऽ काज नहि कएलनि। सत्यता, निष्पक्षता, नैतिकता आ स्वतन्त्रता संग कोनो समझौता नहि कएलनि। अपन जवाबदेही (पत्रकारिताक) बुझैत छलाह, सार्वजनिक हित सर्वोपरि रहलनि हुनका लेल। निजताक सम्मान करब जनैत छलाह।
एखनुक पत्रकारिता दर्शक/श्रोता/पाठक केँ क्षुब्ध करैत छनि। सत्य आ सटीक सूचना प्रकाशित कएल जाए, तकर ध्यान नहि राखए से केहन पत्रकार भेल। आइ-काल्हि बस सनसनीखेज समाचारक खोज मे रहैत छथि पत्रकार सभ। सत्यता/सटीकता गेल तेल लेबए। निष्पक्षता सेहो बिलाइए गेल अछि। कोनो राजनीतिक, धार्मिक वा निजी पक्षपात सँ बचबाक चाही एकटा पत्रकार केँ, सेहो बिसरि रहल छथि आजुक 'टी.आर.पी.'क मारल/हारल पत्रकार सभ। जँ कोनो संस्थान, कोनो पत्रकार केँ स्वतंत्रता नहि दऽ रहल छनि, तँ ओहिठाम काज करब स्वीकार्य नहि होएबाक चाही एकटा सुच्चा पत्रकार केँ। दबाव, लाभ वा प्रभावक चपेट मे रिपोर्टिंग करब स्वीकार्य नहि करब वास्तविक पत्रकारिता कहल जाएत। आ एही तरहक सुच्चा पत्रकार छलाह 'विद्यालंकार'। अपन जवाबदेही बूझब आवश्यक छै पत्रकार केँ। कोनो तरहक गलती भेला पर स्वीकार करब, सुधार करब आ पाठक/दर्शकक समक्ष पारदर्शिताक संग कोनो तथ्य प्रस्तुत करब पत्रकारक जवाबदेही छै। ओहि जवाबदेहीक बखूबी निर्वहन करैत काज कएलनि 'विद्यालंकार' जी। निजताक ध्यान राखब, माने पीड़ित आ कमजोर व्यक्तिक पहचान/छविक प्रकाशन मे सावधानी बरतब सेहो पत्रकारिता-धर्म छै। आ सभ सँ महत्वपूर्ण अछि 'जनहित' लेल काज करबाक अछि, से सदिखन स्मरण राखब। उक्त सभटा नियम/धर्मक पालन करैत 'विद्यालंकार' पत्रकार रूप मे अपार सम्मान अर्जित कएलनि।
'विद्यालंकार'क पत्रकारिता मात्र समाचार-संप्रेषण धरि सीमित नहि छलनि। हुनकर सम्पादकीय समाज, संस्कृति आ चेतना सँ संबद्ध रहैत छलनि। हुनकर लेखनीक मूल स्वर संवेदनशील, निर्भीक आ विचारशील मानल जाइत छलए। श्रीकान्त ठाकुरक पत्रकारिताक मुख्य विषय मे सामाजिक प्रश्न, अन्याय-विरोध, मानवीय मूल्य, साहित्यिक चेतना आ भारतीय अस्मिता सम्मिलित छलए। हुनकर लेखनी मे सत्ता-समालोचना, समाजक दबल, सुविधा सँ वञ्चित वर्गक चिन्ता आ भाषा-संस्कृति सँ जुड़ल संवेदनशीलता देखाइत छल। 'विद्यालंकार' पत्रकारिता केँ साहित्यिक संवेदना, सामाजिक सरोकार आ मानवीय मूल्य सँ जोड़लनि। जाहि मे नैतिक प्रतिबद्धता सेहो सम्मिलित छलए। ई हुनकर विशेष आ महत्वपूर्ण योगदान मानल जाइत छनि।
श्रीकान्त ठाकुर ‘विद्यालंकार’क पत्रकारिताक एकटा विशेषता इहो रहलनि जे ओ मात्र समाचार-प्रेषण धरि सीमित नहि रखलनि अपन पत्रकारिता केँ। हुनकर पत्रकारिता-काल मे शोषण, अन्याय आ देशक समस्या पर निर्भीक बहसक परम्परा कायम भेल। संगहि पत्रकारिता मे साहित्यिक रंग केँ स्थान देल गेल। मुदा साहित्यिक तथा गैर-साहित्यिक दुनू तरहक पत्रकारिता मे समान रूप सँ सक्रिय भूमिका निभाबैत रहलाह ओ। ओ एहन निर्भीक पत्रकारक रूप मे पहचान बनौलनि, जनिकर लेखनी मे सामाजिक अन्याय आ शोषणक विरुद्ध स्पष्ट प्रतिरोध देखाइत छलनि पाठक केँ। हुनकर पत्रकारिताक सरोकार भारतीय अस्मिता, भारतीय चेतना आ भाषा-संप्रेषण सँ जुड़ल छलए। ओ पत्रकारिता मे मानवीय मूल्य केँ प्राथमिकता देलनि आ सत्ताक राजनीति सँ स्वयं केँ अलग राखैत पत्रकारिताक क्षेत्र मे अपन एकटा विशिष्ट स्थान बनौलनि।
जनता आ सरकारक बीच 'संवाद'क काज करैत रहल अछि एकटा पत्रकार। से पत्रकार रूप मे जनताक भलाइ लेल, समाजक उत्थान लेल सदति तत्पर रहलाह 'विद्यालंकार'। लोकक समस्या, समाजक बेगरता तत्कालीन सरकार धरि पहुँचएबाक काज, मात्र खानापूर्ति लेल नहि, समस्या-निवारण लेल करैत छलाह ओ। समस्याक निवारण नहि होएत, तकर गुंजाइशे नहि छोड़ैत छलाह। ततेक वजन छलनि पत्रकार 'विद्यालंकार'क व्यक्तित्व मे। सरकारक सोझाँ कोनो प्रस्ताव रखलनि आ ओ 'पास' नहि होएत, से असम्भव छलए। कारण हुनका द्वारा देल गेल प्रस्ताव मे ओहि स्तरक विश्वसनीयता रहैत छलनि जे निश्चित लोकहित लेल हेतनि हुनकर प्रस्ताव। उदाहरण स्वरूप बिहार सरकार द्वारा 'मैथिली अकादमी'क स्थापना आ चेतना समिति, पटना लेल राजेन्द्र नगर मे जमीन आवंटन, ई दुनू काज 'विद्यालंकार' जीक प्रभावेक परिणाम अछि।
"मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' एवं हुनक परिवारक योगदान" सिरीजक पछिला अंक मे कहल एकटा बात सायास दोहरा रहल छी जे "गाँधी जी द्वारा स्थापित विद्यापीठ मे विद्याध्ययन सम्पन्न कऽ राजेन्द्र बाबूक प्रेरणा तथा जगतनारायणक प्रोत्साहन सँ श्रीकान्त ठाकुर 1926 ई.क जनवरी सँ "महावीर" नामक हिन्दी साप्ताहिक मे कार्य आरम्भ कएलनि। आ से 1926 सँ लऽ कऽ 1977 ई. धरि पत्रकारिता सँ जुड़ल रहलाह 'विद्यालंकार'।" ई अंक पत्रकार 'विद्यालंकार' पर केन्द्रित अछि, तैं उपरोक्त प्रसंगक पुनरावृत्ति कएलहुँ अछि।
अस्तु, 1926 सँ लऽ कऽ 1977 ई. धरिक पत्रकारिताक यात्रा मे कइअक टा दैनिक, साप्ताहिक पत्र सँ जुड़लाह श्रीकान्त ठाकुर मुदा आर्यावर्त सँ पूर्व कोनो दोसर पत्र मे अधिक दिन तक नहि टिकलाह। कारण पत्रक मालिक द्वारा सम्पादन-कार्य मे हस्तक्षेप ओ कहियो स्वीकार नहि कएलनि। दरभंगा महाराज द्वारा समाचार संकलन एवं अग्रलेख किंवा अन्य आलेख मे व्यक्त विचारक संप्रेषण मे पूर्णरूपेण स्वतंत्रता रहलाक कारणेँ श्रीकान्त ठाकुर आर्यावर्त मे जे कार्य आरम्भ कएलनि से अवकाश प्राप्त करबा काल धरि ओतए टिकल रहलाह। बीस वर्ष सेवा देलनि ओतए। देशक कतेको हिन्दी दैनिकक मालिक द्वारा देल जा रहल लुभावना शर्तहु हुनका डिगा नहि सकलनि एहि बीस वर्षक अभ्यन्तर। इएह कारण छल जे श्रीकान्त ठाकुर हिन्दी दैनिकक सम्पादक रूप मे जे यश ओ प्रतिष्ठा पौलनि से दोसर ककरो नसीब नहि भेलनि।
श्रीकान्त ठाकुर ‘विद्यालंकार’ आर्यावर्त अखबारक प्रमुख संपादक छलाह। हुनका ब्रजनन्दन आजाद के बाद एहि पत्रक संपादकीय दायित्व देल गेल छलनि, जकर निर्वहन ओ लगभग 20 वर्ष धरि कएलनि। हुनका कार्यकाल मे आर्यावर्त राष्ट्रवादी विचारधारा, साहित्यिक गरिमा आ भाषिक अनुशासन बला पत्र बनल रहल। हुनकर संपादकीय भूमिका मात्र समाचार-संपादन धरि सीमित नहि छलए, ओ विचारक चयन, संपादकीय दिशानिर्देश आ सार्वजनिक चेतनाक निर्माण मे सेहो सक्रिय रहलाह। समग्रता मे कहल जा सकैछ जे श्रीकान्त ठाकुर ‘विद्यालंकार’ आर्यावर्त दैनिक पत्रक दीर्घकालिक संपादक, राष्ट्रवादी पत्रकारिताक समर्थक, साहित्यिक रंग मे रंगल संवेदनायुक्त संपादकीय परम्पराक वाहक छलाह।
श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' समाचार पत्र सम्पादक सम्मेलनक स्थायी-समितिक निरन्तर सदस्य रहलाह तथा एहि संस्थाक 1962-63क अधिवेशनक स्वागत समितिक अध्यक्ष बनाओल गेल रहथि। 1968 ई. मे आर्यावर्त सँ अवकाश प्राप्त कएलाक उपरान्त लगातार 1977 ई. धरि ओ आर्यावर्त मे "का वार्ता ? किमाश्चर्यम् " शीर्षक सँ स्तम्भ लिखैत रहलाह। 'विद्यालंकार' द्वारा लिखल ई स्तम्भ बेस लोकप्रिय भेल छलए।
अन्त मे पुनः पूर्व मे कहल एकटा बात दोहराएब हम, "एहन प्रभावी पत्रकार छलाह 'विद्यालंकार' जी, जनिका सोझाँ तत्कालीन मुख्यमंत्री संग आरो बड़का-बड़का कद्दावर नेता सभ नतमस्तक रहैत छलाह। मुख्यमंत्री अपन कुर्सी पर सँ उठि कऽ ठाढ़ भऽ जाइत छलाह आ हुनका बैसबाक आग्रह करैत छलाह।" एहन पत्रकार भेटि सकैत अछि आजुक समय मे?
संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-5
विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि-
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10
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मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-24
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-25

Suggested citation: कल्पना झा. “मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-६.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 446, pp. 99–104, 2026-07-15. https://www.videha.co.in/research/2026/446/मैथिली-साहित्यमे-श्रीकान्त-ठाकुर-विद्यालंकार-एवं-हुनक-परिव-1122725a7f.htm

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