शोध-निर्देशक
डा. अमिताभ चक्रवर्ती
विभागाध्यक्ष, मैथिली विभाग
तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर
शोधार्थी
अभिनंदिनी कुमारी
मैथिली विभाग
तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर
सारांश
विजेन्द्र कुमार मिश्र द्वारा रचित मैथिली उपन्यास 'पथिक पिआसल' एक टा सामाजिक उपन्यास अछि। एहि उपन्यासमे विवाहसँ संबंधित समस्याक संग ओकर परिणाम केँ देखाओल गेल अछि। किछु चित्रण एहि प्रकारक अछि जकरा आजुक बैज्ञानिक लोकनि नहि मानैत छथि मुदा मारतीय समाजमे एहि प्रकारक चित्रणकेँ सभ दिनसँ मान्यता प्राप्त छै। एहि उपन्यासमे पात्रक मृत्युक बाद ओकर प्रेतक रूपमे चित्रण विलक्षण अछि।
कुंजी-शब्द
एकैसम शताब्दी, मैथिली उपन्यास, तात्विक विश्लेषण, पथिक पिआसल, विजेन्द्र कुमार मिश्र।
कथासार
एहि उपन्यासक आरम्भ “रेलवे कातक छोटछिन जंगलाहा गाम - ललित लक्ष्मीपुरा। क्षण भरि लेल गाड़ी ठहरैत अछि... सेहो पसिंजरे टा। जौं हाल्ट नहिं बनल रहतै त' ई गाम एनाइयो समस्यामे भ' जाईत।"1सँ भेल अछि अर्थात एहि उपन्यासक पहिल तत्वक रुपमे परिवेश/वातावरणकेँ राखल गेल अछि।
महाकान्त बाबूकेँ भगवान एकटा बेटी आ एकटा बेटा देने छथिन। नियारने रहथिन्ह जे पहिने बेटीक विवाह करायब जँ कोनो नीक घर-वर भेटि जाइत। वर खोजबाक भार अपन जेठका सार साहेबकें देने छलथिन्ह।
महाकान्त बाबूक बेटी 17 वर्षक रहैत छनि आ मैट्रिक पास भेल रछै। राजनगरमे आगूक पढ़ाइक लेल नाम लिखा देल गेल छलै मुदा कहियो कॉलेज नहि जाइत छलै। परीक्षे काल जेतै।
अपनो एकटा बेटी छन्हि, माधवीसँ वयसमे एक सालक छोट। एहि साल भगिनीमे बियाह करबा क' अगिला साल फेर अपन जमाय लेल घुमता। साल भरिमे व्यवस्थाक लेल टाका केनाइ जुटा लेता… दरमाहासँ… पैंच-उधारसँ… नहि त' खेत छन्हि… भरना कि केवाला… देखल जेतै।"2
माधवी अपना वरकें भवेशसँ तुलना करैत छै तऽ पाबैत छै जे ई झूस छै। भवेशकें देखने रहैत छै। गीत गबैत सुनने रहैत छै। सभ बात मोनमे चलैत रहैत छै। देखल जाय उपन्यासकारक शब्दें-
“माधवी के केहनो सन नहि लागि रहल छलैन। रहि-रहि क’ एतबे सोच, जे आई जदी बाबू जीबैत रहितथि…! मामा केनाहूँ हमरा स' पिण्ड छोड़ा लेला। माधवी अमर के भवेशक मापदण्ड स' नपैत छथि। अमर ओछ भ जाइत छथि भवेशक आगू। भवेश के बटखारा बना अमर के तौलल जेतनि त डण्डी सोझ कोना रहत? अमर साधारण व्यक्ति छथि। हुनकर पयर जमीन पर छैन। कनहा पर घर-गृहस्थी के बोझ छनि, सोझ लोक छथि, नीक लोक छथि। चहल-पहल स' फराक अपन काजमे व्यस्त रहैत छथि। अपना पर ठाढ़ छथि, किनको खुशामत नहि छैन। गीत-नादमे विशेष रुचि नहि छनि। मंच पर कहियो चढ़लो नहि छथि। अमरक लाचारी माधवीक नजरिमे दुर्गुण बनि गेल। अमरले ओहने होयबाक चाह़ैत छलैन, जेहने भवेश छथि जेहने माधवी के चाहियनि। ओना माधवी किछु बाजैत नहि छथि मुदा मने-मन धुलैत रहैत छथि।"3
भवेशक विवाहमे माधवी सेहो आयल रहैत छै आ विवाहमे गीत-नाद सेहो गाबैत छै जाहिसँ चर्चाक केन्द्रमे माधवी आबि जाइत छै। "भवेश मंजु स’ चतुर्थी रातिक पहिल प्रश्न कयलनि- "ओ के छथि, जे खूब गीत-नाद आ खूब गोर सेहो छथि।"
मंजु- अमर के बेटी! अपने पिसियोत बहीन अछि माधवी।
भवेश- अहाँ के कयक टा दीदी छथि?… एकटा त' लक्ष्मीपुर… से त' हमरा बुझल अछि…।
मंजु - एक्कहि टा! अहाँ के कोना बूझल अछि जे...।
भवेश- कयक टा पिसियौत बहीन छथि अहाँ के?
मंजु – एक्कहि टा। माधवी… से किऐक?"4
एहि वार्तालापक क्रममे ई बात भऽ जाइत छैक जे भवेशक ससुर भवेश आ ओकर बापसँ झूठ बजने रहैत छथिन। मंजु सब बात सच-सच बता दैत छै। आब “भवेशक आँखिमे निम्न कतय? ओ बिसरि गेला जे आई चतुर्थीक राति छै, कनियाँ लगेमे छथि! रहि-रहि क दाँत पिसैत भवेश सोचैत छथि हमरा संगे ऐना कियैक भेल? हमरा कियैक धोखा देल गेल? की दण्ड देबाक चाही एहेन फरेबी सब के? हमहूँ दोषी छी। हमरा निर्णय करबाक क्षमता नहि अछि। की हम खुलि क' बाबूक विरोध नहि क' सकैत छलहुँ? की क’ लितैथ हमर! बच्चे बनल रहि गेलहुँ हमहूँ! आत्मग्लानिक नोरसँ आँखि भीज गेलैन।
भेर भिन्नमे सुतलि मंजु के मुँह निहारैत छथि भवेश। बेचारी के कोन दोष? सबटा बात सत्त-सत्त कहि देलनि। बाप वला दुर्गण नहि छन्हि हिनकामे। कतेक झुट्टा छधि हमर ससुर! कहलनि जे अई साल कुटमैती नहि हेतै आओर अपने विवाह-दान करबा क' आयल रहथि। चालबाजीसँ भगिन जमाय के अपन जमाय बना लेलनि जे बेटी सुख करत। आबि क' देखथु ने केहन सुख क' रहल छनि बेटी। राति केनाहुँ बीतय, भोरे हम नहि छोड़बैन, देखार क' क' राखि देबैन। समाजो त’ बुझतै हिनकर किरदानी! बड़ बहादुर बनल फिरैत छथि… नीच… पापी…
भवेश भरि राति जगले रहलाह। कोहबर घरक लालटेम भरि राति ओहिना जरैत रहल।"5
माधवी ओहि सत्यकें सुनि कनियो मुह मलान नहि करैत छै। उनटे भवेश केँ समझाबैत कहैत छै-
“देखू ओझा जी, मंजू हमर छोट बहिन अछि। अहाँ हमर बहिनोई नहि जमाय भेलहुँ। आब अहाँसँ एक सीढ़ी हमही ऊपर भ' गेलहुँ माने अहीं त'र हमही उप्पर"- मुस्किया दैत छथि माधवी, तें हमर आदेश अछि जे अहाँ सब किछु बिसरि केँ मंजूमे रमि जाउ। हमहूँ हुनका संग' नीक जकाँ रमि गेल छी।”6
भवेश आ माधवीक संग भेल वार्तासँ माधवीक नानी बुझि जाइत छथिन जे झूठ बाजि कऽ बेटा पोतीक विवाह कराओल अछि।
“हमही कहियो ओरिया क' कहबै। साहेब त’ काल्हि चलि जेता मुदा अखन रहबौ। हमरा जीबैत तू सब निश्चिंत रह। मामा-मामीक बात जाय दही…। हमर मुँह चुप नहि रहि सकैत अछि…”7
एहि घटनाक समाचार चारु कात पसरि जाइत छै जाहिसँ देखयबालाक तांता लागि जाइत छै। एकटामेला जकाँ दृश्य बनि जाइत छै।
एम्हर मंजू सेहो एक बेरमे बेसी दवाइ खा कऽ आत्महत्या कऽ लैत छै आ साहेब अपन समधि आ जमायपर केस कऽ दैत छै। बादमे भवेश फरार चलैत रहैत छैआ ओकिल सभसँ सलाह लैत छै। अन्तमे दोष अपना उपर लऽ लैत छै आ मृत्युदण्डक सजा सुनाओल जाइत छै।
उपन्यासक अंतमे उपन्यासकार एहि सभ पात्रकेँ भूतक रुपमे समारोहक मंचक पाछू अन्हारमे ठाढ़ करबैत छथि। सभ एक-दोसरासँ संवाद करैत अछि आ उपन्यास समाप्त भऽ जाइत छै।
परिवेश
एहि उपन्यासक परिवेश मिश्रित अछि। पहिने ग्रामक चित्रण देखबामे आबैत अछि आ बादमे भवेश आ अमर पात्रकें उपस्थित कऽ नगरक चित्रण कयलाह अछि। एहि उपन्यासमे एक संग ग्रामीण आ नगरीय चित्रण कयलासँ एकर परिवेश मिश्रित भेल अछि।
शैली
एहि उपन्यासक शैली सेहो मिश्रित अछि। पहिने सरपट शैलीक संग वार्तालाप शैली, पूर्वदीप्ति शैली, एकालाप शैली, मनोविश्लेषणात्मक शैली, एक कथामे एकसँ बेसी कथाक नियोजन शैलीक समावेश देखबामे आबैत अछि।
पात्र
एहि उपन्यासमे सबसँ पहिल पात्र - महाकान्त बाबू छथि आ सबसँ अन्तिम पात्र मुन्नू जी जे अमरकेँ गाम लऽ जाय आबैत अछि। एहि दूनू पात्रक बीचमे कुल 24 गोट पात्र आओर अछि जे मुख्य पात्र आ गौण पात्रक भूमिकामे देखबामे आबैत अछि। उपन्यासकार आवश्यकतानुसार चरित्रक निर्माण आ चित्रण करबामे पूर्णतः सफल भेल छथि। एहि उपन्यासक जे पात्र सभ अछि तकर सूची अग्र रूपे प्रस्तुत अछि -
1. महाकान्त बाबू - गामक प्रतिष्ठित धनिक लोक।
2. महाकान्त बाबूक बेटी – माधवी, 17 वर्षक।
3. महाकान्त बाबूक बेटा – मनोज, 10 वर्षक।
4. महाकान्त बाबूक जेठ सार - साहेब उर्फ सोमनाथ चौधरी।
5. साहेबक बेटी – मंजु, 16 वर्षक।
6. जवाहर झा - आकाशवाणी कलाकार- (गौण पात्र)
7. रवीन्द्र जी - ” " "
8. महेन्द्र - ” " "
9. हेमकान्त - ” " "
10. अवनीन्द्र - ” " "
11. वीरेन्द्र - ” " "
12. भवेश - कथानायक
13. दयानन्द बाबू - महाकान्त बाबूक ग्रामीण, पाँच गोट बेटाक बाप,
14. राजी बाबू - निःसंतान दाम्पत्य
15. चन्द्रकान्त बाबू - भवेशक पिता
16. मुखिया जी - गौण पात्र
17. जिबछा मुसहर - महाकान्त बाबूक जन
18. झमेलिया चमार – महाकान्त बाबूक दोसर जन
19. बलहावाली - गौरी बाबूक पत्नी
20. अमर बाबू - माधवीक वर
21. साहेबक कनिया - नागदह बाली
22. देबन भाइ- चन्द्रकान्त बाबूक ग्रामीण – गौण पात्र
23. राजू - " " "
24. मुन्ना जी – अमरक भाय,
25. साहेबक माय,
26. अमरक माय।
भाषा
एहि उपन्यासक भाषा सरल, सुबोध ओ बोधगम्य अछि संगहि विभिन्न प्रकारक सौन्दर्यसँ आओर सुस्पष्ट देखबामे आबैत अछि।
‘पथिक पियासल’मे युग्म शब्दक प्रयोग बेर-बेर देखबामे आबैत अछि। जेना- बाप-दादा, जन-बोनिहार, लागल-भीरल, बेरा-बेरी, धोती-कुर्ता, धीरे-धीरे, नीक-बेजाय, बात-व्यवस्था, आगू-पाछू, दर्शक-श्रोता, धीरे-धीरे, ठीक-ठाक आदि।
‘पथिक पियासल’मे अरबी-फारसी-उर्दू शब्दक प्रयोग सेहो ठाम-ठाम देखबामे अबैत अछि। जेना- अंदाज, शान, मजलिस, तरह, चीज, इलाज, तमाशा, साहेब, जरूर, शमियाना, जर्दा, शोर, शरबत, आस्ते, जनानी, तकिया, जमीन, हर्ज, इशारा, जल्दी, आदमी, लाश, माफ, खून, शोर, जरूर, खराब आदि।
‘पथिक पियासल’ उपन्यासमे काव्यात्मक भाषाक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. “समय-समय पर चैताबर, कजरी आ फागुसँ गुंजैत रहैत अछि दलान।”8
2. “दाँत, जीह, लोल-ठोर के पेरने रहैत छथि साहेब।”9
3. “गामे लग कोनो सरकारी स्कूलमे मास्टर छथि चटपटिया।”10
4. “गरदा उड़बैत जीप बिदा भेल दरभंगा दीस…।”11
5. “एनाही कुर्सी रहतै बरियातीक लेल।”12
6. “चाह-पानक दोकान सेहो लागि गेलै बाटक कातमे।”13
7. “खूब ठाठ-बाट छनि गाम पर।”14
8. “यौ फटलका जुत्ता पहिर क’ आबि गेलौं धोखा सँ, निकहा राखले अछि गाम पर।”15
9. “उठि क’ पड़ा गेली माधवी कल वाला बाड़ी दीस।”16
10. “कसि क’ मुँह बन्न क’ लेली माधवी।”17
11. “अखन त’ कोनो चर्च वर्ष नहि छै विवाहक”18
12. “माथ पर चमकैत पसीनाक बुन्न मोती जकाँ चमकैत छलनि।”19
13. “औ जी, चन्द्रकांत बाबू खानदानी कुटुम कयलहुँ अछि अहाँ।”20
14. “माधवीक प्रसन्नता भेलैन मंजु कें देखि क'।”21
15. “वयसमे माधवी सँ एक साल छोट छथि मंजु।”22
16. “विध-व्यवहार बुझय वाली शांत स्वभावक छथि मंजु।”23
17. “खिलखिला क हँसि पड़ैत छथि दुनू बहीन”24
18. “बड़का मामा सेहो बड़ हरान भेला घटकैतीमे।”25
19. “की भ' गेलैन हुनका?26
20. “की निर्दय छधि विधाता? देखल कोना जाईत छनि ई सब! के नहि कानि रहल अछि आई!”27
‘पथिक पियासल’ उपन्यासमे अलंकृत भाषाक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. “किछु गोटे जिनकर धोती-कुर्ता बर्फ सन झलकैत छैन ओ कुर्सीपर बैसल छथि, पीयर सन मटियायल गंजी-धोतीबला व्यक्ति सभ चौकी पर पलथा मारने बैसल।”28
2. “अपने गीत गाबैत नहि छथि; मुदा राग-भास नीक जकाँ बुझैत छथि।”29
3. “टाका लेल त' कोनो गप्प नहि मुदा जमाय अपने सन चास-वास बला तकैत छथि से नहि भेटैत छनि।”30
4. “बातमे विभेद भेला पर ज्वालामुखी जकाँ फूटि पड़ैत छथि।”31
5. “जरैल सन गामक रहितहुँ साहेब के लाठी-भाला चलेबाक लूरि नहि छैन।”32
6. “पुलकित होईत माधवी सोचय लगली- बाबू के कते नीक जकाँ व्यवस्था करय आबैत छनि।”33
7. “कम त’ कम्मे जकाँ होइत छै।”34
8. “च्यवन ऋषि जकाँ बुढ़ारीक बाद फेर सँ जुआनी आबि गेल।”35
9. “देखैत-सुनैत माधवी सन सुन्नरि त’ नहि मुदा बड़ बढ़ियाँ मनुक्ख सन।”36
10. “हम कि जाने ने गेलियै, हमहूँ त' तोरे जकाँ छी।”37
‘पथिक पियासल’ उपन्यासमे मुहाबराक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. “दीप ल’ क’ ताकए पड़तै।”38
2. “कन्ना-रोहट आ हाहाकारक स्वर सँ सबहक करेज पानि भ’ गेल।”39
3. “एक-डेढ़ लाख टाका स' पचहत्तरि हजार पर एलहुँ, आब ओहो भेटाई पहाड़ भ’ गेल।”40
4. “चन्द्रकांत बाबू संभरि क' तीर छोड़ला।”41
‘पथिक पियासल’मे लेखकक अनुभवी वचन सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. “मनुक्ख सोचैत अछि किछु, होईत छैक किछु।”42
2. “मरण-हरण त’ कोनो अपना हाथमे नहि छै।”43
3. “मनुक्खक सोचने की होईत छैक?”44
4. “भगवान जे करैत छथि नीके करैत छथि।”45
5. “समाज आब कमजोरहे लेल छैक।”46
6. “मिथिलामे कन्याक भाग्य विधाता नहि, समाजक पाँच गोटे मिल क’ लिखैत छथि।”47
7. “यज्ञक मालिक जगदीश होईत छथि।”48
8. “जे कपारमे रहतै, सैह ने हेतै?”49
9. “बात-बाप एककहि टा होईत छैक।”50
10. “पहिल बेर त’ केहनो भव्य मुँह-कान वला वर विपटे जकाँ लगैत छै।”51
‘पथिल पियासल’मे कहबीक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. “घरमे धाधर पापे वृद्धि”52
2. “ने ओ देवी आ ने ओ कड़ाह।”53
3. “अहाँ अनेरे बिना फीसक ओकील जकाँ चरचरा रहल छी।”54
4. “लक्ष्मीपुरक रामा-खटोलामे कतेक दिन ओझरायल रहता।”55
5. “अपनहि जालमे अपने ओझरा गेला।”56
6. “सुमरने मरी बिसरने जीबी।”57
7. “साँप-छुछुनरिक पईर भ' गेलैन।”58
8. “जखन उक्खैरमे मुड़ी द' देने छथि तखन समाठक कोन डर।”59
9. “बहुक मारल छथि, अप्पन हारल छथि।”60
10. “भैया सँ नहि जीति त' भौजी के…!”61
11. “खेत खाय गदाहा मारि खाय जोलहा”62
12. “मंजुए पर छजैत छनि, आन छौड़ी रहितनि त' एतेक काल नचनी नाच देने रहितनि।”63
13. “आँखिक ओट पहाड़”64
14. “चन्द्रकान्त बाबू गड़ल मुर्दा उखाड़’ पर लागल छथि”65
15. “हम सब दिन अन्हारेमे रहलहुँ।”66
16. “… बुड़य वंश कबीर के।”67
17. “सपना त’ सपने भ' गेलनि।”68
18. “जखन विधाता बाम होइत छथिन्ह त' एहिना होइत छैक।”69
19. “झगड़ामे कतहुँ अमृत बरसैत छैक।”70
20. “जायब नेपाल कपार जायत संगे।”71
‘पथिक पियासल’मे गारिक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना-
1. “देखियो केहन बात बाजि क' चलि गेल खचराहा।”72
2. “तोरा जकां चोरि-छिनरपन त' नहि करैत छी। पपियाहा नहितन।”73
3. “सबटा हरमाद गौरी क' रहल छै। सरधुआ कतेक नोन खयने अछि एहि घरक, कोना पचतै? दिनकर-दिनानाथ कुष्ट फुटा देथिन।”74
4. “बज्र खसौ शितलहरी के।”75
5. “पूरा रामायण बादमे कहबौ, अखन एतबे बुझही जे तोहर बेटी छिनारि छौ।”76
6. “बज्र खसौ मस्टरबा के जे अपन बहकल भगिनी के हमर नेन्नाक गरामे बान्हि देलक।”77
‘पथिक पियासल’ उपन्यासमे विशेषण शब्दक प्रयोग देखबामे आबैत अछि। जेना- जंगलाहा गाम, बड़ नीक, पुरना, नवका, बड़का, बड़ गुण, भोथहा, नीक, बीच दुपहरिया, लिखलाहा, प्रतिष्ठित, नीक लोक, बड़ लोभी, सरकारी नोकरी, समाज, कमजोरहे, फिफरी पड़ल ठोर, सहज मुद्रा, उज्जर धोती-कुर्ता, पढ़ल-लिखल आदि।
‘पथिक पियासल’ उपन्यासमे अंग्रेजी शब्दक प्रयोग सेहो देखबामे आबैत अछि। जेना- रेलवे, पसिंजर, हाल्ट,मेस, स्कूल, मास्टर, जेनरेटर, माइक, भैकम, फास्ट, ट्यूबलाइट, हार्न, सुट, बूट, बी. ए., आई. ए० एस०, फर्स्ट डिवीजन, टेबुल, विडियो, ट्रे, नम्बर, फाईनल, फ्री, कैंसर, आपरेशन, इंग्लैण्ड, फीस, पेट्रोमेक्स, रजिस्टर, मजिस्ट्रेट, सेपरेट क्वाटर, ट्रांजिस्टर, शॉल, क्लास, प्राइवेट, स्टोव, पैडिल, ब्रेक, टी. बी., केस आदि।
संदर्भ सूची
1. मिश्र, बिजेन्द्र कुमार, वर्ष: 2001, पथिक पियासल, प्रगति इंटरप्राइजेज, लालबाग, दरभंगा, पृष्ठ सं०—5 (अघोषित).
2. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-7.
3. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-46-47.
4. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-61.
5. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-63.
6. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-65.
7. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-67.
8. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-6.
9. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-7.
10. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-7.
11. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-9.
12. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-10.
13. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-10.
14. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-13.
15. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-14.
16. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-15.
17. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-15.
18. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-16.
19. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-20.
20. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-21.
21. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23.
22. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23.
23. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23.
24. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23.
25. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-25.
26. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-26.
27. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-5
28. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-6
29. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-6.
30. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-7.
31. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-7.
32. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-10.
33. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-20.
34. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23.
35. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23.
36. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-23.
37. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-7.
38. उपरोक्त, पृष्ठ सं०—25.
39. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-28.
40. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-29.
41. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-26.
42. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-27.
43. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-27.
44. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-29.
45. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-29.
46. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-45.
47. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-46.
48. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-51.
49. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-54.
50. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-60.
51. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-122.
52. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-26.
53. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-33.
54. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-41.
55. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-45.
56. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-69.
57. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-82.
58. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-100.
59. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-103.
60. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-104.
61. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-104.
62. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-104.
63. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-104.
64. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-107.
65. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-116.
66. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-117.
67. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-118.
68. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-124.
69. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-126.
70. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-126.
71. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-127.
72. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-129.
73. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-136.
74. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-38.
75. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-42.
76. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-43.
77. उपरोक्त, पृष्ठ सं०-80.