डॉ. अमरेन्द्रक ‘अंगिका बाल-साहित्य’
लोकस्मृतिसँ आधुनिक बाल-सृजन धरि : चतुर्आयामी समग्र समीक्षा
(मैथिली–ठेठी-अंगिका समानान्तर अनुशीलन)
समीक्ष्य पोथी: अंगिका बाल-साहित्य · लेखक: डॉ. अमरेन्द्र · समीक्षा प्रकाशन, दिल्ली/मुजफ्फरपुर · प्रथम संस्करण: २०२२
पृष्ठ: ११२ · मूल्य: दू सय टाका
1. प्रस्तावना: बाल-साहित्यक इतिहास नहि, सांस्कृतिक वंशावली
ठेठी-अंगिका: 1. प्रस्तावना: बाल-साहित्य के इतिहास नै, सांस्कृतिक वंशावली
मैथिली — डॉ. अमरेन्द्रक ‘अंगिका बाल-साहित्य’ सामान्य अर्थमे बाल-पोथीसभक सूची, रचनाकार-परिचय अथवा कालक्रम-मात्र नहि अछि। एकर पैघ प्रयत्न ई बुझब अछि जे अंगिका भाषिक समाजमे बालक साहित्यसँ पहिल परिचय कतऽ आ कोना करैत अछि, आ ओहि आरम्भिक मौखिक-सांस्कृतिक अनुभवसँ आधुनिक मुद्रित बाल-साहित्य धरि कोन निरन्तरता बनैत अछि। एहि कारण ई पोथी इतिहास लिखबाक संगहि एक प्रकारक सांस्कृतिक वंशावली तैयार करैत अछि: मातृक कण्ठक लोरी, शिशु-ध्वनि, पहेली, खेलगीत, लोककथा, परिवार आ आँगनक सामूहिक अनुभवसँ आधुनिक कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबन्ध आ जीवनी धरि।
ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र के ‘अंगिका बाल-साहित्य’ सामान्य अर्थ में बाल-पोथी सिनी के सूची, रचनाकार-परिचय अथवा कालक्रम-मात्र नै छै। एकर बड़का प्रयत्न ई बुझब छै जे अंगिका भाषिक समाज में बालक के साहित्य सें पहिल परिचय कहाँ आरो केना करै छै, आरो ओही आरम्भिक मौखिक-सांस्कृतिक अनुभव सें आधुनिक मुद्रित बाल-साहित्य तक कोन निरन्तरता बनै छै। ई कारण ई पोथी इतिहास लिखै के संगें एक प्रकार के सांस्कृतिक वंशावली तैयार करै छै: माय के कण्ठ के लोरी, शिशु-ध्वनि, पहेली, खेलगीत, लोककथा, परिवार आरो आँगन के सामूहिक अनुभव सें आधुनिक कविता, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबन्ध आरो जीवनी तक।
मैथिली — ग्रन्थक विषय-क्रम स्वयं एहि दृष्टिक पुष्टि करैत अछि। पहिल भाग ‘अंगिका-बाल-लोकसाहित्य’ पृष्ठ 8–42 धरि पसरल अछि, जखन दोसर, बहुत पैघ भाग ‘आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य’ पृष्ठ 43–112 धरि। अन्तिम पृष्ठसभ सन्दर्भ आ पत्रिका-सूची लेल अछि। एहि स्थापत्यक अर्थ ई अछि जे लेखक आधुनिक लिखित बाल-साहित्यकेँ शून्यमे जन्मल उपलब्धि नहि मानैत छथि; ओकर भाषिक लय, कथात्मक ढाँचा, खेलधर्मिता, मनोरञ्जन आ सामुदायिक स्मृतिक मूल लोकपरम्परामे देखैत छथि।
ठेठी-अंगिका — ग्रन्थ के विषय-क्रम अपने ई दृष्टि के पुष्टि करै छै। पहिल भाग ‘अंगिका-बाल-लोकसाहित्य’ पृष्ठ 8–42 तक पसरलों छै, जबें दोसर, बहुत बड़का भाग ‘आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य’ पृष्ठ 43–112 तक। अन्तिम पृष्ठ सिनी सन्दर्भ आरो पत्रिका-सूची लेली छै। ई स्थापत्य के अर्थ ई छै जे लेखक आधुनिक लिखित बाल-साहित्य कें शून्य में जन्मलों उपलब्धि नै मानै छै; ओकर भाषिक लय, कथात्मक ढाँचा, खेलधर्मिता, मनोरञ्जन आरो सामतरकियिक स्मृति के मूल लोकपरम्परा में देखै छै।
मैथिली — आधुनिक बाल-साहित्य-अध्ययनक व्यापक परिप्रेक्ष्यमे सेहो ई स्थापना अर्थवान अछि। Kimberley Reynolds प्रत्येक नब पीढ़ीक साहित्यिक परम्परामे प्रवेशमे मौखिक रूपेँ चलि आबि रहल कथा-संसारक महत्त्व चिन्हित करैत छथि। एहि तुलनात्मक आलोकमे डॉ. अमरेन्द्रक लोकसाहित्यसँ आधुनिक सृजन धरि बनाओल क्रम स्थानीय सामग्रीसँ उपजल स्वतंत्र आलोचनात्मक सूझ प्रतीत होइत अछि। पोथीक स्थायी महत्त्व एहि बातमे अछि जे ई बाल-साहित्यक इतिहास लिखैत काल बालकक वास्तविक सांस्कृतिक जीवनकेँ केन्द्र बनबैत अछि; घर, माँ, दादी, खेलक साथी, पशु-पक्षी, खेत-पथार, वर्षा, नदी, भोजन, नींद, भय, हँसी, तुक आ शरीरक गति साहित्यिक इतिहासक वैध सामग्री बनि जाइत अछि।
ठेठी-अंगिका — आधुनिक बाल-साहित्य-अध्ययन के व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी ई स्थापना अर्थवान छै। Kimberley Reynolds प्रत्येक नब पीढ़ी के साहित्यिक परम्परा में प्रवेश में मौखिक रूपेँ चलि आबि रहल कथा-संसार के महत्त्व चिन्हित करै छै। ई तुलनात्मक आलोक में डॉ. अमरेन्द्र के लोकसाहित्य सें आधुनिक सृजन तक बनावलों क्रम स्थानीय सामग्री सें उपजलों स्वतंत्र आलोचनात्मक सूझ प्रतीत होय छै। पोथी के स्थायी महत्त्व ई बात में छै जे ई बाल-साहित्य के इतिहास लिखै काल बालक के वास्तविक सांस्कृतिक जीवन कें केन्द्र बनावै छै; घर, माँ, दादी, खेल के साथी, पशु-पक्षी, खेत-पथार, वर्षा, नदी, भोजन, नींद, भय, हँसी, तुक आरो शरीर के गति साहित्यिक इतिहास के वैध सामग्री बनि जाय छै।
आमुख: चारि प्रकाश-कोण
ठेठी-अंगिका: आमुख : चार रौशनी-कोन
मैथिली — विदेह जाहि समान्तर-साहित्य-दृष्टिक वाहक थिक, ताहिमे कोनो भाषाक बाल-साहित्य ‘लघु’ नहि होइत—जे परम्परा संस्थागत इतिहासक हाशिया पर धकेलल गेल, ओकरे प्रति समान समीक्षकीय गम्भीरता एहि आन्दोलनक मूल प्रतिज्ञा थिक। एहि दृष्टिएँ डॉ. अमरेन्द्रक ‘अंगिका बाल-साहित्य’ केँ हम चारि आयाम—रस-ध्वनि-वक्रोक्तिमूलक भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त, नव्य-न्यायमूलक ज्ञानमीमांसा, आ विदेह समान्तर-इतिहास-प्रारूप—सँ जाँचि रहल छी। ई चारू दृष्टि एक-दोसरक विरोधी नहि, अपितु एके पाठक चारि प्रकाश-कोण थिक, जे मिलिकए ओकर पूर्ण रूप उघारैत अछि।
ठेठी-अंगिका — विदेह जे समान्तर-साहित्य के नजर के वाहक छै, ओकरा में कोय भाषा के बाल-साहित्य ‘छोटका’ नै होय छै—जे परम्परा के संस्थागत इतिहास हाशिया पर ढकेली देलकै, वहीं के प्रति ओतने समीक्षकीय गम्भीरता ई आन्दोलन के मूल परन छै। एहि नजर सें डॉ. अमरेन्द्र के ‘अंगिका बाल-साहित्य’ के हम चार आयाम—रस-ध्वनि-वक्रोक्ति वाला भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त, नव्य-न्याय वाला ज्ञानमीमांसा, आरो विदेह समान्तर-इतिहास-प्रारूप—सें जाँची रहलों छी। ई चारू नजर एक-दोसरा के दुश्मन नै, बल्कि एके पाठ के चार रौशनी-कोन छै, जे मिली कें ओकर पूरा रूप उघारी दै छै।
परिचय आ पृष्ठभूमि
ठेठी-अंगिका: परिचय आरो पिछुलका बात
मैथिली — डॉ. अमरेन्द्रक ई पोथी अंगिका बाल-साहित्यक एकटा समग्र सर्वेक्षण थिक, जकर विशेषता एहिमे अछि जे ई विधाक लोक-मूल आ आधुनिक—दुनू छोर केँ एके सूत्रमे बान्हि कए देखबाक प्रयास करैत अछि। लेखक स्वयं “आत्मकथन”मे नम्रतापूर्वक स्वीकार कएने छथि जे ई कोनो स्वतंत्र रूपसँ लिखल पोथी नहि, अपितु डॉ. सुरेश गौतम आ डॉ. वीणा गौतमक संपादनमे प्रकाशित “भारतीय बाल-लोकसाहित्य कोश” आ “भारतीय लोरी-साहित्य कोश” लेल समय-समय पर लिखल आलेख-सभक संग्रह थिक। एहि आत्म-स्वीकृतिक अन्तमे लेखकक ई मान्यता समीक्षा-दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण अछि जे जे कमी एहिमे रहि गेल अछि, इएह कमी आगाँ अंगिका बाल-साहित्य पर बेसी लिखबाक मार्ग खोलत। एहि विनम्र स्वीकृतिमे पोथीक वास्तविक प्रकृति—एकटा प्रारम्भ-बिन्दु, न कि अन्तिम शब्द—पहिनहिं स्पष्ट भ’ जाइत अछि।
ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र के ई पोथी अंगिका बाल-साहित्य के एगो पूरा सर्वेक्षण छै, जेकर खासियत ई छै कि ई विधा के लोक-मूल आरो आधुनिक—दुन्नु छोर के एके सूत्र में बान्ही कें देखै के कोसिस करै छै। लेखक अपने “आत्मकथन” में नरमी सें मानी लै छै कि ई कोय अलगे सें लिखलों पोथी नै छै, बल्कि डॉ. सुरेश गौतम आरो डॉ. वीणा गौतम के संपादन में छपलों “भारतीय बाल-लोकसाहित्य कोश” आरो “भारतीय लोरी-साहित्य कोश” लेली समय-समय पर लिखलों आलेख सिनी के संग्रह छै। ई स्वीकृति के आखिर में लेखक के ई मानब समीक्षा के नजर सें जरूरी छै कि जे कमी एकरा में रही गेलै, वहै कमी आगू अंगिका बाल-साहित्य पर बेसी लिखै के रास्ता खोलतै। ई नरम स्वीकृति में पोथी के असली रूप—एगो सुरू के बिन्दु, नै कि आखिरी बात—पहिनहिं साफ होय जाय छै।
मैथिली — साहित्य कोनो समाजक, भाषिक समुदायक आ ओकर सांस्कृतिक धरोहरक जीवन्त दर्पण होइत अछि। जखन बात बाल-साहित्यक होइत अछि, तँ ई मात्र किछु कथा आ गप-शपक सङ्ग्रह नहि रहि जाइत अछि, अपितु ई नव पीढ़िक मनोवैज्ञानिक, सामाजिक आ चारित्रिक निर्माणक एकटा सशक्त आधारशिला बनि जाइत अछि। प्रस्तुत समीक्षात्मक आलेखमे अंगिका भाषाक मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. अमरेन्द्र द्वारा रचित आ सम्पादित ग्रन्थ 'अंगिका बाल-साहित्य' क विस्तृत साहित्यिक, भाषिक आ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कएल गेल अछि। समीक्षा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर/दिल्ली द्वारा प्रकाशित ई पोथी अंगिका बाल-साहित्यक विकास-यात्रा, ओकर लोक-परम्परा आ आधुनिक प्रवृत्तिकेँ बुझबाक लेल एकटा विश्वकोश जकाँ अछि।
ठेठी-अंगिका — साहित्य कोनो समाज के, भाषिक समुदाय के आरो ओकर सांस्कृतिक धरोहर के जीवन्त दर्पण होय छै। जबें बात बाल-साहित्य के होय छै, तें ई मात्र कुछु कथा आरो गप-शपक सङ्ग्रह नै रहि जाय छै, बल्कि ई नया पीढ़ी के मनोवैज्ञानिक, सामाजिक आरो चारित्रिक निर्माण के एगो सशक्त आधारशिला बनि जाय छै। प्रस्तुत समीक्षात्मक आलेख में अंगिका भाषा के मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. अमरेन्द्र द्वारा रचित आरो सम्पादित ग्रन्थ 'अंगिका बाल-साहित्य' के विस्तृत साहित्यिक, भाषिक आरो मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करलों गेलों छै। समीक्षा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर/दिल्ली द्वारा प्रकाशित ई पोथी अंगिका बाल-साहित्य के विकास-यात्रा, ओकर लोक-परम्परा आरो आधुनिक प्रवृत्तिकेँ बुझै लेली एगो विश्वकोश जेना छै।
अंगिका आ मैथिलीक भाषिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध आ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
ठेठी-अंगिका: अंगिका आरो मैथिली के भाषिक-सांस्कृतिक सम्बन्ध आरो ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मैथिली — अंगिका आ मैथिलीक बीचक सम्बन्ध अत्यन्त प्रगाढ़ आ ऐतिहासिक रहल अछि। भाषाविद् जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन अपन 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया' (१९०३) मे अंगिका (जकरा ओ 'छिका-छिकी' कहलन्हि) केँ मैथिलीक एकटा उपबोलीक रूपमे वर्गीकृत केने छलाह। मुदा पण्डित राहुल सांकृत्यायन आ बादक भाषा-आन्दोलनकारी लोकनि एकरा एकटा स्वतन्त्र भाषाक दर्जा देलन्हि। डॉ. शोभा कुमारीक 'अंगिका साहित्य का इतिहास' सेहो एकरा एकटा समृद्ध परम्पराक भाषा मानैत अछि। एहि भाषाक प्राचीनतम साहित्यिक प्रमाण ७म शताब्दीक बौद्ध सिद्ध (लुइपा, भुसुकुपा, कान्हपा) द्वारा रचित 'चर्यापद' मे भेटैत अछि। भारतक २६ जिला (बिहार, झारखण्ड, आ पश्चिम बङ्गाल) मे लगभग ६ करोड़ लोक द्वारा बाजल जाए वला एहि भाषाक लोक-साहित्य अत्यन्त समृद्ध अछि। एहि कारणेँ एकटा अंगिका पोथीक मैथिलीमे समीक्षा करब दुनू सहोदर भाषिक परम्पराकेँ आ समीप लाबब अछि।
ठेठी-अंगिका — अंगिका आरो मैथिली के बीचक सम्बन्ध बहुत प्रगाढ़ आरो ऐतिहासिक रहल छै। भाषाविद् जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन अपन 'लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया' (१९०३) में अंगिका (जेकरा ऊ 'छिका-छिकी' कहलकै) कें मैथिली के एगो उपबोली के रूप में वर्गीकृत केने छेलै। मतरकि पण्डित राहुल सांकृत्यायन आरो बादक भाषा-आन्दोलनकारी लोग सिनी एकरा एगो स्वतन्त्र भाषा के दर्जा देलकै। डॉ. शोभा कुमारीक 'अंगिका साहित्य का इतिहास' भी एकरा एगो समृद्ध परम्परा के भाषा मानै छै। ई भाषा के सभसें पुरान साहित्यिक प्रमाण ७म शताब्दीक बौद्ध सिद्ध (लुइपा, भुसुकुपा, कान्हपा) द्वारा रचित 'चर्यापद' में मिलै छै। भारतक २६ जिला (बिहार, झारखण्ड, आरो पश्चिम बङ्गाल) में लगभग ६ करोड़ लोक द्वारा बाजल जाए वाला ई भाषा के लोक-साहित्य बहुत समृद्ध छै। ई कारणेँ एगो अंगिका पोथी के मैथिली में समीक्षा करब दूनो सहोदर भाषिक परम्परा कें आरो समीप लाबै के काम करै छै।
पृष्ठ १–११४ : अन्तर्वस्तु-समीक्षा सार
ठेठी-अंगिका: पृष्ठ १–११४ : अन्तर्वस्तु-समीक्षा सार
मैथिली — क्रम · पृष्ठ · खण्ड/विधा · मूल ग्रन्थमे सामग्री · परीक्षण/प्रश्न · निष्कर्ष
ठेठी-अंगिका — क्रम · पृष्ठ · खण्ड/विधा · मूल ग्रन्थ में सामग्री · परीक्षण/सवाल · निष्कर्ष
मैथिली — १. पृष्ठ १–४ — मुखपृष्ठ/प्रकाशन। मूल सामग्री: शीर्षक, लेखक, प्रथम संस्करण २०२२ आ प्रकाशक। परीक्षण: भारतवाणीक २०२२ प्रविष्टिमे लेखक अमरेन्द्र, भाषा हिन्दी/अंगिका आ प्रकाशक समीक्षा प्रकाशनक स्वतंत्र पुष्टि भेटैत अछि। निष्कर्ष: प्रकाशन-तथ्य पुष्ट अछि।
ठेठी-अंगिका — १. पृष्ठ १–४ — मुखपृष्ठ/प्रकाशन। मूल सामग्री: शीर्षक, लेखक, प्रथम संस्करण २०२२ आरो प्रकाशक। परीक्षण: भारतवाणी के २०२२ प्रविष्टि में लेखक अमरेन्द्र, भाषा हिन्दी/अंगिका आरो प्रकाशक समीक्षा प्रकाशन के स्वतंत्र पुष्टि मिलै छै। निष्कर्ष: प्रकाशन-तथ्य पुष्ट छै।
मैथिली — २. पृष्ठ ५–६ — समर्पण/आत्मकथन। मूल सामग्री: पूर्व प्रकाशित वा सम्पादित आलेखसभक संशोधित-संयोजित रूप; सम्भावित कमी स्वीकारल गेल अछि। परीक्षण: संकलनात्मक निर्माण सामग्री बढ़बैत अछि, मुदा पुनरावृत्ति सेहो अनैत अछि। निष्कर्ष: निर्माण-पद्धति शक्ति आ सीमा दुनू अछि।
ठेठी-अंगिका — २. पृष्ठ ५–६ — समर्पण/आत्मकथन। मूल सामग्री: पहिने प्रकाशित वा सम्पादित आलेख सिनी के संशोधित-संयोजित रूप; सम्भावित कमी स्वीकारल गेल छै। परीक्षण: संकलनात्मक निर्माण सामग्री बढ़ावै छै, मतरकि पुनरावृत्ति भी अनै छै। निष्कर्ष: निर्माण-पद्धति शक्ति आरो सीमा दूनो छै।
मैथिली — ३. पृष्ठ ७ — विषय-क्रम। मूल सामग्री: दू भाग—बाल-लोकसाहित्य पृष्ठ ८–४२ आ आधुनिक बाल-साहित्य पृष्ठ ४३–११२। परीक्षण: मौखिक परम्परासँ आधुनिक मुद्रित साहित्य धरि विकास-रेखा बनैत अछि। निष्कर्ष: सांस्कृतिक वंशावली ग्रन्थक मूल संरचना अछि।
ठेठी-अंगिका — ३. पृष्ठ ७ — विषय-क्रम। मूल सामग्री: दू भाग—बाल-लोकसाहित्य पृष्ठ ८–४२ आरो आधुनिक बाल-साहित्य पृष्ठ ४३–११२। परीक्षण: मौखिक परम्परा सें आधुनिक मुद्रित साहित्य तक विकास-रेखा बनै छै। निष्कर्ष: सांस्कृतिक वंशावली ग्रन्थ के मूल संरचना छै।
मैथिली — ४. पृष्ठ ८–९ — बाल-मन/लोरी। मूल सामग्री: कल्पना, तर्क, जिद, खेल, चित्र-संगीत; प्रत्यक्ष उपदेश गौण। परीक्षण: एवर्स आ रेनॉल्ड्सक बाल-केन्द्रित दृष्टिसँ तुलनात्मक संवाद सम्भव अछि। निष्कर्ष: बाल-मन पोथीक केन्द्रीय कसौटी अछि।
ठेठी-अंगिका — ४. पृष्ठ ८–९ — बाल-मन/लोरी। मूल सामग्री: कल्पना, तर्क, जिद, खेल, चित्र-संगीत; प्रत्यक्ष उपदेश गौण। परीक्षण: एवर्स आरो रेनॉल्ड्स के बाल-केन्द्रित दृष्टि सें तुलनात्मक संवाद सम्भव छै। निष्कर्ष: बाल-मन पोथी के केन्द्रीय कसौटी छै।
मैथिली — ५. पृष्ठ १०–११ — पहेली। मूल सामग्री: एकपदीसँ चतुष्पदी; बौद्धिक खेल, किशोर धरि ग्रहण। परीक्षण: वर्गीकरण समृद्ध, मुदा सूक्ष्म पाठालोचन सीमित। निष्कर्ष: भाषा-कौशल, स्मृति आ खेलक संगम।
ठेठी-अंगिका — ५. पृष्ठ १०–११ — पहेली। मूल सामग्री: एकपदी सें चतुष्पदी; बौद्धिक खेल, किशोर तक ग्रहण। परीक्षण: वर्गीकरण समृद्ध, मतरकि सूक्ष्म पाठालोचन सीमित। निष्कर्ष: भाषा-कौशल, स्मृति आरो खेल के संगम।
मैथिली — ६. पृष्ठ १२–१४ — तुक्तक/शिशु-काव्य। मूल सामग्री: अर्थक अपेक्षा ध्वनि, तुक आ उच्चारण-आनन्द प्रमुख। परीक्षण: कविता कोश आ अंगिका.कॉम पर ‘तुक्तक-मुक्तक’क स्वतंत्र उपस्थिति दर्ज अछि। निष्कर्ष: ध्वनि स्वयं बाल-सौन्दर्यक मूल तत्त्व अछि।
ठेठी-अंगिका — ६. पृष्ठ १२–१४ — तुक्तक/शिशु-काव्य। मूल सामग्री: अर्थ के अपेक्षा ध्वनि, तुक आरो उच्चारण-आनन्द प्रमुख। परीक्षण: कविता कोश आरो अंगिका.कॉम पर ‘तुक्तक-मुक्तक’ के स्वतंत्र उपस्थिति दर्ज छै। निष्कर्ष: ध्वनि अपने बाल-सौन्दर्य के मूल तत्त्व छै।
मैथिली — ७. पृष्ठ १५–२४ — खेलगीत। मूल सामग्री: ऐच्छिक, प्रतिस्पर्धात्मक आ बौद्धिक खेलगीत; सामूहिक प्रस्तुति। परीक्षण: शब्द सुरक्षित अछि, मुदा धुन, देह-चाल, खेल-नियम आदि सहायक विवरण कम अछि। निष्कर्ष: भविष्यक लेल दृश्य-श्रव्य अभिलेख आवश्यक।
ठेठी-अंगिका — ७. पृष्ठ १५–२४ — खेलगीत। मूल सामग्री: ऐच्छिक, प्रतिस्पर्धात्मक आरो बौद्धिक खेलगीत; सामूहिक प्रस्तुति। परीक्षण: शब्द सुरक्षित छै, मतरकि धुन, देह-चाल, खेल-नियम आदि सहायक विवरण कम छै। निष्कर्ष: आगू लेल दृश्य-श्रव्य अभिलेख जरूरी छै।
मैथिली — ८. पृष्ठ २५–३७ — बाल-लोककथा। मूल सामग्री: मौखिक संचरण, रूप-परिवर्तन, पशु-पक्षी, नीति आ चमत्कार। परीक्षण: एक निश्चित मूल-पाठक बदला पाठान्तर महत्त्वपूर्ण अछि। निष्कर्ष: पोथी एकटा पाठ-संग्रह बनबैत अछि; कथाविज्ञान आगाँक काज अछि।
ठेठी-अंगिका — ८. पृष्ठ २५–३७ — बाल-लोककथा। मूल सामग्री: मौखिक संचरण, रूप-परिवर्तन, पशु-पक्षी, नीति आरो चमत्कार। परीक्षण: एक निश्चित मूल-पाठ के बदला पाठान्तर महत्त्वपूर्ण छै। निष्कर्ष: पोथी एगो पाठ-संग्रह बनावै छै; कथाविज्ञान आगू के काज छै।
मैथिली — ९. पृष्ठ ३८–४२ — अन्तरभाषिक लोककथा। मूल सामग्री: अन्य भारतीय भाषासँ अनुवाद/रूपान्तरण; पर्यावरणीय प्रसंग। परीक्षण: अनुवाद भाषा-विस्तारक साधन अछि, मुदा स्रोत-पाठ आ लक्ष्य-पाठक तुलना कम अछि। निष्कर्ष: अनुवाद साहित्यिक क्षेत्र-विस्तारक प्रक्रिया अछि।
ठेठी-अंगिका — ९. पृष्ठ ३८–४२ — अन्तरभाषिक लोककथा। मूल सामग्री: आन भारतीय भाषा सें अनुवाद/रूपान्तरण; पर्यावरणीय प्रसंग। परीक्षण: अनुवाद भाषा-विस्तारक साधन छै, मतरकि स्रोत-पाठ आरो लक्ष्य-पाठ के तुलना कम छै। निष्कर्ष: अनुवाद साहित्यिक क्षेत्र-विस्तारक प्रक्रिया छै।
मैथिली — १०. पृष्ठ ४३ — आधुनिक खण्डक भूमिका। मूल सामग्री: आधुनिक श्रेष्ठ बाल-साहित्यक जड़ लोकक रूप, रस आ गतिमे। परीक्षण: रेनॉल्ड्सक मौखिकसँ लिखित साहित्यक संक्रमण सम्बन्धी दृष्टिसँ तुलनात्मक साम्य। निष्कर्ष: लोक आ आधुनिकता रूपान्तरित निरन्तरता अछि।
ठेठी-अंगिका — १०. पृष्ठ ४३ — आधुनिक खण्ड के भूमिका। मूल सामग्री: आधुनिक श्रेष्ठ बाल-साहित्य के जड़ लोक के रूप, रस आरो गति में। परीक्षण: रेनॉल्ड्स के मौखिक सें लिखित साहित्य के संक्रमण वाली दृष्टि सें तुलनात्मक साम्य। निष्कर्ष: लोक आरो आधुनिकता रूपान्तरित निरन्तरता छै।
मैथिली — ११. पृष्ठ ४४–५० — अनुवादित बाल-कथा। मूल सामग्री: संस्कृत, जातक, बाइबिल आदि कथा-परम्पराक चर्चा। परीक्षण: ऐतिहासिक सूची समृद्ध; तुलनात्मक अनुवाद-विश्लेषण अपेक्षित। निष्कर्ष: आधुनिक लिखित बाल-गद्यक निर्माणमे अनुवाद महत्त्वपूर्ण।
ठेठी-अंगिका — ११. पृष्ठ ४४–५० — अनुवादित बाल-कथा। मूल सामग्री: संस्कृत, जातक, बाइबिल आदि कथा-परम्परा के चर्चा। परीक्षण: ऐतिहासिक सूची समृद्ध; तुलनात्मक अनुवाद-विश्लेषण अपेक्षित। निष्कर्ष: आधुनिक लिखित बाल-गद्य के निर्माण में अनुवाद महत्त्वपूर्ण।
मैथिली — १२. पृष्ठ ५१–६० — बाल-उपन्यास। मूल सामग्री: ‘बण्टा’; विद्यालय, परिवार, सामाजिक आ पर्यावरणीय अनुभव। परीक्षण: गद्य कोश पर ‘बण्टा’क अंगिका पाठक डिजिटल उपस्थिति अछि। निष्कर्ष: उपन्यास बालकक विस्तृत सामाजिक संसार खोलैत अछि।
ठेठी-अंगिका — १२. पृष्ठ ५१–६० — बाल-उपन्यास। मूल सामग्री: ‘बण्टा’; विद्यालय, परिवार, सामाजिक आरो पर्यावरणीय अनुभव। परीक्षण: गद्य कोश पर ‘बण्टा’ के अंगिका पाठ के डिजिटल उपस्थिति छै। निष्कर्ष: उपन्यास बालक के विस्तृत सामाजिक संसार खोलै छै।
मैथिली — १३. पृष्ठ ६१–७० — आधुनिक बालगीत। मूल सामग्री: खेलगीत, तुक-लय, अनेक कवि आ संग्रह। परीक्षण: अंगिका.कॉम अमरेन्द्रक पाँच संग्रह आ आन कविसभक उपस्थिति पुष्ट करैत अछि। निष्कर्ष: बाल-काव्य सर्वाधिक विकसित क्षेत्र।
ठेठी-अंगिका — १३. पृष्ठ ६१–७० — आधुनिक बालगीत। मूल सामग्री: खेलगीत, तुक-लय, अनेक कवि आरो संग्रह। परीक्षण: अंगिका.कॉम अमरेन्द्र के पाँच संग्रह आरो आन कवि सिनी के उपस्थिति पुष्ट करै छै। निष्कर्ष: बाल-काव्य सभसें विकसित क्षेत्र।
मैथिली — १४. पृष्ठ ७१–८० — प्रकृति/समाज/राष्ट्र। मूल सामग्री: प्रकृति, ऋतु, जीव-जगत, सामाजिकता, राष्ट्रबोध आ ज्ञान। परीक्षण: आधुनिक विषय-विस्तार स्पष्ट। निष्कर्ष: लोक-बिम्ब आ आधुनिक विषयक संयोग।
ठेठी-अंगिका — १४. पृष्ठ ७१–८० — प्रकृति/समाज/राष्ट्र। मूल सामग्री: प्रकृति, ऋतु, जीव-जगत, सामाजिकता, राष्ट्रबोध आरो ज्ञान। परीक्षण: आधुनिक विषय-विस्तार साफ छै। निष्कर्ष: लोक-बिम्ब आरो आधुनिक विषय के संयोग।
मैथिली — १५. पृष्ठ ८१–९१ — पर्यावरण/खण्डकाव्य। मूल सामग्री: पर्यावरण-शिक्षा, व्यक्तित्व, ज्ञान, नैतिकता आ खण्डकाव्य। परीक्षण: आरम्भिक प्रत्यक्ष उपदेश-विरोधी कसौटी आ बादक शिक्षामूलक प्रशंसाक बीच तनाव। निष्कर्ष: आनन्द बनाम शिक्षा मुख्य आलोचनात्मक प्रश्न।
ठेठी-अंगिका — १५. पृष्ठ ८१–९१ — पर्यावरण/खण्डकाव्य। मूल सामग्री: पर्यावरण-शिक्षा, व्यक्तित्व, ज्ञान, नैतिकता आरो खण्डकाव्य। परीक्षण: आरम्भिक प्रत्यक्ष उपदेश-विरोधी कसौटी आरो बाद के शिक्षामूलक प्रशंसा के बीच तनाव। निष्कर्ष: आनन्द बनाम शिक्षा मुख्य आलोचनात्मक सवाल।
मैथिली — १६. पृष्ठ ९२–९३ — ‘पंचामृत’/बाल-गजल। मूल सामग्री: पाँच बाल-काव्यरूप; बाल-गजल; अमरेन्द्र आ दिनेश बाबा। परीक्षण: विधागत प्रयोग लेल अलग शिल्प-कसौटी आवश्यक। निष्कर्ष: प्रौढ़ विधाक बालोपयोगी पुनर्संस्कार।
ठेठी-अंगिका — १६. पृष्ठ ९२–९३ — ‘पंचामृत’/बाल-गजल। मूल सामग्री: पाँच बाल-काव्यरूप; बाल-गजल; अमरेन्द्र आरो दिनेश बाबा। परीक्षण: विधागत प्रयोग लेल अलग शिल्प-कसौटी जरूरी। निष्कर्ष: प्रौढ़ विधा के बालोपयोगी पुनर्संस्कार।
मैथिली — १७. पृष्ठ ९४–९७ — बाल-कहानी। मूल सामग्री: काव्यक तुलनामे कम विकास; विविध कथा; अभावक स्पष्ट स्वीकार। परीक्षण: लेखकक आत्मालोचना इतिहासक विश्वसनीयता बढ़बैत अछि। निष्कर्ष: बाल-कहानी निर्माणाधीन क्षेत्र।
ठेठी-अंगिका — १७. पृष्ठ ९४–९७ — बाल-कहानी। मूल सामग्री: काव्य के तुलना में कम विकास; विविध कथा; अभाव के स्पष्ट स्वीकार। परीक्षण: लेखक के आत्मालोचना इतिहास के विश्वसनीयता बढ़ावै छै। निष्कर्ष: बाल-कहानी निर्माणाधीन क्षेत्र।
मैथिली — १८. पृष्ठ ९८–१०५ — बाल-नाटक/‘पंचगव्य’। मूल सामग्री: एकांकी, सामाजिक समस्या, विज्ञान, बालिका-शिक्षा, चरित्र, संवाद आ व्यंग्य। परीक्षण: पुनर्पाठसँ नाटक अपेक्षाकृत विस्तृत सिद्ध होइत अछि। निष्कर्ष: बाल-नाटक नव संस्करणमे प्रमुख खण्ड।
ठेठी-अंगिका — १८. पृष्ठ ९८–१०५ — बाल-नाटक/‘पंचगव्य’। मूल सामग्री: एकांकी, सामाजिक समस्या, विज्ञान, बालिका-शिक्षा, चरित्र, संवाद आरो व्यंग्य। परीक्षण: पुनर्पाठ सें नाटक अपेक्षाकृत विस्तृत सिद्ध होय छै। निष्कर्ष: बाल-नाटक नब संस्करण में प्रमुख खण्ड।
मैथिली — १९. पृष्ठ १०६–१०९ — ‘निभुहान’/अन्य नाटक। मूल सामग्री: ध्वनि-प्रदूषण, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, रेडियो/गीतिनाट्य; पृष्ठ १०९ पर अन्य बाल-साहित्य। परीक्षण: आधुनिक जनजीवन नाटकक विषय बनैत अछि। निष्कर्ष: सामाजिक ज्ञान आ मंचीयताक संगम।
ठेठी-अंगिका — १९. पृष्ठ १०६–१०९ — ‘निभुहान’/आन नाटक। मूल सामग्री: ध्वनि-प्रदूषण, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, रेडियो/गीतिनाट्य; पृष्ठ १०९ पर आन बाल-साहित्य। परीक्षण: आधुनिक जनजीवन नाटक के विषय बनै छै। निष्कर्ष: सामाजिक ज्ञान आरो मंचीयता के संगम।
मैथिली — २०. पृष्ठ ११०–१११ — निबन्ध/इतिहास/जीवनी। मूल सामग्री: नगर, महापुरुष, स्वतंत्रता-संग्राम, बुद्ध आदि बालोपयोगी गद्य। परीक्षण: ज्ञान-साहित्य लेल तथ्य, भाषा, चित्र आ जिज्ञासा अलग कसौटी माँगैत अछि। निष्कर्ष: बाल-साहित्यक परिधि सांस्कृतिक ज्ञान धरि विस्तार पबैत अछि।
ठेठी-अंगिका — २०. पृष्ठ ११०–१११ — निबन्ध/इतिहास/जीवनी। मूल सामग्री: नगर, महापुरुष, स्वतंत्रता-संग्राम, बुद्ध आदि बालोपयोगी गद्य। परीक्षण: ज्ञान-साहित्य लेल तथ्य, भाषा, चित्र आरो जिज्ञासा अलग कसौटी माँगै छै। निष्कर्ष: बाल-साहित्य के परिधि सांस्कृतिक ज्ञान तक विस्तार पावै छै।
मैथिली — २१. पृष्ठ ११२–११४ — सन्दर्भ/पत्रिका। मूल सामग्री: लगभग ५२ क्रमांकित स्रोत आ १० पत्रिका। परीक्षण: अभिलेखीय मानचित्रण उपयोगी, मुदा ग्रन्थसूचीगत विवरण असमान। निष्कर्ष: मानकीकृत ग्रन्थ-सूची आ अनुक्रमणिका भविष्यक प्राथमिक सुधार।
ठेठी-अंगिका — २१. पृष्ठ ११२–११४ — सन्दर्भ/पत्रिका। मूल सामग्री: लगभग ५२ क्रमांकित स्रोत आरो १० पत्रिका। परीक्षण: अभिलेखीय मानचित्रण उपयोगी, मतरकि ग्रन्थसूचीगत विवरण असमान। निष्कर्ष: मानकीकृत ग्रन्थ-सूची आरो अनुक्रमणिका आगू के प्राथमिक सुधार।
मैथिली — २२. सम्पूर्ण ग्रन्थ — लेखक-सर्जक। मूल सामग्री: लेखक स्वयं प्रमुख कवि, नाटककार आ उपन्यासकार; अपन कृतिसभ व्यापक। परीक्षण: भारतवाणीमे २०२१ क श्वेता रानीक अध्ययन आ बालगीत-ग्रंथावली सेहो उपलब्ध। निष्कर्ष: भीतरक साक्ष्य लाभकारी, मुदा चयन-संतुलन स्वतंत्र शोधसँ जाँचनीय।
ठेठी-अंगिका — २२. सम्पूर्ण ग्रन्थ — लेखक-सर्जक। मूल सामग्री: लेखक अपने प्रमुख कवि, नाटककार आरो उपन्यासकार; अपन कृति सिनी व्यापक। परीक्षण: भारतवाणी में २०२१ के श्वेता रानी के अध्ययन आरो बालगीत-ग्रंथावली भी उपलब्ध। निष्कर्ष: भीतर के साक्ष्य लाभकारी, मतरकि चयन-संतुलन स्वतंत्र शोध सें जाँचै लायक छै।
मैथिली — २३. सम्पूर्ण ग्रन्थ — भाषा/शैली। मूल सामग्री: रचनात्मक सामग्री अंगिका, आलोचनात्मक व्याख्या प्रायः हिन्दी। परीक्षण: पहुँच बढ़ैत अछि, मुदा अंगिका आलोचना-भाषाक स्वायत्तताक प्रश्न उठैत अछि। निष्कर्ष: भाषा सरल आ स्रोत-समृद्ध, पर सूक्ष्म पाठालोचन असमान।
ठेठी-अंगिका — २३. सम्पूर्ण ग्रन्थ — भाषा/शैली। मूल सामग्री: रचनात्मक सामग्री अंगिका, आलोचनात्मक व्याख्या प्रायः हिन्दी। परीक्षण: पहुँच बढ़ै छै, मतरकि अंगिका आलोचना-भाषा के स्वायत्तता के सवाल उठै छै। निष्कर्ष: भाषा सरल आरो स्रोत-समृद्ध, पर सूक्ष्म पाठालोचन असमान।
मैथिली — २४. सम्पूर्ण ग्रन्थ — समग्र मूल्य। मूल सामग्री: लोक-स्मृति, विधा-विस्तार आ स्रोत-सूची। परीक्षण: सहायक स्रोत मूल निष्कर्षकेँ पर्याप्त समर्थन दैत अछि। निष्कर्ष: ई अन्तिम इतिहास नहि, बल्कि आधार-ग्रन्थ अछि।
ठेठी-अंगिका — २४. सम्पूर्ण ग्रन्थ — समग्र मूल्य। मूल सामग्री: लोक-स्मृति, विधा-विस्तार आरो स्रोत-सूची। परीक्षण: सहायक स्रोत मूल निष्कर्ष कें पर्याप्त समर्थन दै छै। निष्कर्ष: ई आखिरी इतिहास नै, बल्कि आधार-ग्रन्थ छै।
2. ग्रन्थक निर्माण-प्रकृति: संकलित अनुभवक शक्ति आ संरचनात्मक सीमा
ठेठी-अंगिका: 2. ग्रन्थ के निर्माण-प्रकृति: संकलित अनुभव के शक्ति आरो संरचनात्मक सीमा
मैथिली — आत्मकथनमे लेखक स्पष्ट करैत छथि जे ई पोथी आरम्भसँ एकहि योजनाक अन्तर्गत लिखल अखण्ड ग्रन्थ नहि छल। समय-समयपर सम्पादित बाल-साहित्य आ लोरी-साहित्य सम्बन्धी कोश/ग्रन्थ लेल लिखल आलेख, पहिने प्रकाशित अंगिका भाषा तथा लोकसाहित्य सम्बन्धी सामग्री, आ बादमे जोड़ल नव सूचना—एहि सभकेँ संशोधित-संयोजित कऽ वर्तमान रूप देल गेल। लेखक स्वयं सम्भावित कमीकेँ स्वीकार करैत छथि। (मूल पोथी, पृ. 6)
ठेठी-अंगिका — आत्मकथन में लेखक स्पष्ट करै छै जे ई पोथी आरम्भ सें एकहि योजना के अन्तर्गत लिखलों अखण्ड ग्रन्थ नै छेलै। समय-समयपर सम्पादित बाल-साहित्य आरो लोरी-साहित्य सम्बन्धी कोश/ग्रन्थ लेल लिखलों आलेख, पहिने प्रकाशित अंगिका भाषा तथा लोकसाहित्य सम्बन्धी सामग्री, आरो बाद में जोड़लों नव सूचना—ई सब कें संशोधित-संयोजित करी कें वर्तमान रूप देलों गेलों। लेखक अपने सम्भावित कमी कें स्वीकार करै छै। (मूल पोथी, पृ. 6)
मैथिली — एहि निर्माण-पद्धतिक दू विपरीत परिणाम अछि। पहिल, दीर्घ समयक अध्ययन, संकलन, स्मृति, निजी पुस्तक-संग्रह आ पत्र-पत्रिकासँ प्राप्त सामग्री एकठाम जमा भऽ गेल अछि। छोट भाषिक साहित्यिक क्षेत्रक इतिहास लेल ई बहुमूल्य स्थिति अछि, कारण अनेक स्रोत अल्पप्रचलित प्रकाशनमे छितरायल रहैत अछि। दोसर, स्वतन्त्र आलेखसभक मूल संरचना बचल रहबाक कारण पुनरावृत्ति, सूचीप्रधानता, विषयान्तर, असमान विस्तार आ आलोचनात्मक गहराइक अन्तर देखाइत अछि।
ठेठी-अंगिका — ई निर्माण-पद्धति के दू विपरीत परिणाम छै। पहिल, दीर्घ समय के अध्ययन, संकलन, स्मृति, निजी पुस्तक-संग्रह आरो पत्र-पत्रिका सें प्राप्त सामग्री एके जगह जमा होय गेलों छै। छोट भाषिक साहित्यिक क्षेत्र के इतिहास लेल ई बहुमूल्य स्थिति छै, कारण अनेक स्रोत अल्पप्रचलित प्रकाशन में छितरायलों रहै छै। दोसर, स्वतन्त्र आलेख सिनी के मूल संरचना बचलों रहै के कारण पुनरावृत्ति, सूचीप्रधानता, विषयान्तर, असमान विस्तार आरो आलोचनात्मक गहराइ के अन्तर देखाय छै।
मैथिली — एहि कारण पोथीकेँ ‘एक रेखीय इतिहास’ मात्र नहि, बल्कि साहित्यिक अभिलेख, आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह आ विधागत सर्वेक्षणक संयुक्त रूप मानब उचित अछि। भविष्यक संशोधित संस्करणमे अध्याय-अन्त निष्कर्ष, कालक्रम, लेखक-सूची, विधागत सारणी आ पुनरावृत्ति-सम्पादन जोड़ल जाए तँ एहि सम्पदाक उपयोग बहुत बढ़ि सकैत अछि। संकलनात्मक शक्ति आ संरचनात्मक असमानता—दुनू ग्रन्थक निर्माण-इतिहाससँ निकलैत अछि; असमानताक मूल कारण लेखकक विषय-ज्ञान नहि, बल्कि अलग-अलग समयमे तैयार सामग्रीक संयोजन अछि।
ठेठी-अंगिका — ई कारण पोथी कें ‘एक रेखीय इतिहास’ मात्र नै, बल्कि साहित्यिक अभिलेख, आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह आरो विधागत सर्वेक्षण के संयुक्त रूप मानब उचित छै। आगू के संस्करण में अध्याय-अन्त निष्कर्ष, कालक्रम, लेखक-सूची, विधागत सारणी आरो पुनरावृत्ति-सम्पादन जोड़लों जाए तें ई सम्पदा के उपयोग बहुत बढ़ि सकै छै। संकलनात्मक शक्ति आरो संरचनात्मक असमानता—दूनो ग्रन्थ के निर्माण-इतिहास सें निकलै छै; असमानता के मूल कारण लेखक के विषय-ज्ञान नै, बल्कि अलग-अलग समय में तैयार सामग्री के संयोजन छै।
संरचना
ठेठी-अंगिका: बनावट / ढाँचा
मैथिली — समग्र सामग्री दू अध्यायमे विभक्त अछि। पहिल अध्याय “अंगिका-बाल-लोकसाहित्य” मौखिक परम्पराक अध्ययन थिक, आ दोसर “आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य” शिष्ट अर्थात् लिखित परम्पराक। ई विभाजन अपने-आपमे लेखकक मूल स्थापना केँ ढाँचा दैत अछि—जे आधुनिक बाल-साहित्यमे जे किछु श्रेष्ठ अछि, से लोक-साहित्यक भूमि पर ठाढ़ होएबाक कारणें अछि।
ठेठी-अंगिका — सब्भे सामग्री दू अध्याय में बँटलों छै। पहिलों अध्याय “अंगिका-बाल-लोकसाहित्य” मुँहजबानी परम्परा के अध्ययन छै, आरो दोसरका “आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य” सिस्ट यानी लिखलों परम्परा के। ई बँटवारा अपने-आप में लेखक के मूल बात के ढाँचा दै छै—कि आधुनिक बाल-साहित्य में जे कुछ बढ़िया छै, से लोक-साहित्य के जमीन पर ठाढ़ होय के कारणें छै।
रचनाकार: डॉ. अमरेन्द्रक साहित्यिक यात्रा आ अवदान
ठेठी-अंगिका: रचनाकार: डॉ. अमरेन्द्र के साहित्यिक यात्रा आरो अवदान
मैथिली — डॉ. अमरेन्द्र अंगिका आ हिन्दीक एकटा एहन बहुआयामी साहित्यकार छथि, जिनका अंगिकाकेँ साहित्यिक गरिमा देबाक श्रेय देल जाइत अछि। ५ जनवरी १९४९ केँ बांका जिलाक रूपसार ग्राममे जन्मल डॉ. अमरेन्द्र अपन साहित्य-साधना सँ महाकाव्य, खण्डकाव्य, बाल-साहित्य, आ आलोचनाक क्षेत्रमे प्रतिमान स्थापित केलन्हि अछि।
ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र अंगिका आरो हिन्दीक एगो एहन बहुआयामी साहित्यकार छै, जिनका अंगिकाकेँ साहित्यिक गरिमा दै के श्रेय देलों जाय छै। ५ जनवरी १९४९ कें बांका जिला के रूपसार ग्राम में जन्मल डॉ. अमरेन्द्र अपन साहित्य-साधना सें महाकाव्य, खण्डकाव्य, बाल-साहित्य, आरो आलोचना के क्षेत्र में प्रतिमान स्थापित करलकै छै।
जीवन-परिचय आ साहित्यिक अवदान
ठेठी-अंगिका: जीवन-परिचय आरो साहित्यिक अवदान
मैथिली — पूरा नाम: डॉ. अमरेन्द्र कुमार सिन्हा
ठेठी-अंगिका — पूरा नाम: डॉ. अमरेन्द्र कुमार सिन्हा
मैथिली — जन्म तिथि आ स्थान: ५ जनवरी १९४९, ग्राम- रूपसार, बांका, बिहार
ठेठी-अंगिका — जन्म तिथि आरो स्थान: ५ जनवरी १९४९, ग्राम- रूपसार, बांका, बिहार
मैथिली — माता-पिता: स्व. पँचा रानी सिन्हा आ स्व. नरसिंह प्रसाद सिन्हा
ठेठी-अंगिका — माता-पिता: स्व. पँचा रानी सिन्हा आरो स्व. नरसिंह प्रसाद सिन्हा
मैथिली — प्रमुख अंगिका रचना (बाल-साहित्य): ढोल बजै छै ढम्मक ढम, बुतरू के तुतरू, एक छड़ी पर अंडा नाचै, बाजै बीन बजावै तीन, बण्टा (उपन्यास)
ठेठी-अंगिका — प्रमुख अंगिका रचना (बाल-साहित्य): ढोल बजै छै ढम्मक ढम, बुतरू के तुतरू, एक छड़ी पर अंडा नाचै, बाजै बीन बजावै तीन, बण्टा (उपन्यास)
मैथिली — प्रमुख अंगिका रचना (अन्य): पंचगव्य (महाकाव्य), अंगदेव, जटायु, कर्ण (महाकाव्य), ऋष्यशृंग
ठेठी-अंगिका — प्रमुख अंगिका रचना (अन्य): पंचगव्य (महाकाव्य), अंगदेव, जटायु, कर्ण (महाकाव्य), ऋष्यशृंग
मैथिली — प्रमुख सम्मान/पुरस्कार: भवप्रीतानन्द पुरस्कार, राष्ट्रभाषा पुरस्कार, नन्द पुरस्कार, कर्ण पुरस्कार, सच्चिदानन्द धूमकेतु पुरस्कार
ठेठी-अंगिका — प्रमुख सम्मान/पुरस्कार: भवप्रीतानन्द पुरस्कार, राष्ट्रभाषा पुरस्कार, नन्द पुरस्कार, कर्ण पुरस्कार, सच्चिदानन्द धूमकेतु पुरस्कार
मैथिली — डॉ. अमरेन्द्रक 'अंगिका बाल-साहित्य' पोथी दू मुख्य खण्डमे विभक्त अछि: 'अंगिका बाल-लोकसाहित्य' आ 'आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य'। ई पोथी मूलतः 'भारतीय बाल-साहित्य कोश' लेल लिखल गेल आलेखक विस्तार अछि, जकरा पाछाँ वएह छूटल वा अप्रकाशित सामग्रीकेँ सहेजि कऽ राखबाक गम्भीर उद्देश्य अछि।
ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र के 'अंगिका बाल-साहित्य' पोथी दू मुख्य खण्ड में विभक्त छै: 'अंगिका बाल-लोकसाहित्य' आरो 'आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य'। ई पोथी मूलतः 'भारतीय बाल-साहित्य कोश' लेली लिखलों गेलों आलेखक विस्तार छै, जेकरा पाछाँ वएह छूटल वा अप्रकाशित सामग्री कें सहेजि कऽ राखबाक गम्भीर उद्देश्य छै।
3. बाल-मनक सौन्दर्यशास्त्र: ग्रन्थक केन्द्रीय स्थापना
ठेठी-अंगिका: 3. बाल-मन के सौन्दर्यशास्त्र: ग्रन्थ के केन्द्रीय स्थापना
मैथिली — पृष्ठ 8 पर लेखक बाल-साहित्यक जे कसौटी प्रस्तुत करैत छथि, से सम्पूर्ण पोथीक मूल्याङ्कन लेल मूल चाबी अछि। बालक द्वारा रचल हो वा वयस्क द्वारा बालक लेल—रचनामे बाल-मनक अभिव्यक्ति सर्वप्रथम आवश्यक अछि। वस्तु देखबाक बालकीय तरीका, सोच, कल्पना-शक्ति, तर्क, जिद, माँग मनबेबाक ढङ्ग, चित्र आ संगीतक आकर्षण साहित्यक रूप-निर्धारक तत्त्व मानल गेल अछि। प्रत्यक्ष शिक्षण वा संदेश-वाचनकेँ लेखक पीछे राखैत छथि; संदेश हो तँ व्यञ्जना, संकेत, कथा, खेल वा रसक भीतरसँ उभरय। (मूल पोथी, पृ. 8–9)
ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 8 पर लेखक बाल-साहित्य के जे कसौटी प्रस्तुत करै छै, से सम्पूर्ण पोथी के मूल्याङ्कन लेल मूल चाबी छै। बालक द्वारा रचलों हो वा वयस्क द्वारा बालक लेल—रचना में बाल-मन के अभिव्यक्ति सर्वप्रथम आवश्यक छै। वस्तु देखै के बालकीय तरीका, सोच, कल्पना-शक्ति, तर्क, जिद, माँग मनावै के ढङ्ग, चित्र आरो संगीत के आकर्षण साहित्य के रूप-निर्धारक तत्त्व मानलों गेलों छै। प्रत्यक्ष शिक्षण वा संदेश-वाचन कें लेखक पीछे राखै छै; संदेश हो तें व्यञ्जना, संकेत, कथा, खेल वा रस के भीतर सें उभरै। (मूल पोथी, पृ. 8–9)
मैथिली — एहि विचारक विशेष महत्त्व अछि, कारण बाल-साहित्य प्रायः उपदेश देबाक सरल माध्यम मानि लेल जाइत अछि। डॉ. अमरेन्द्र एहि प्रवृत्तिक विरुद्ध बालकक अनुभव-जगतकेँ साहित्यिक स्वायत्तता दैत छथि। Hans-Heino Ewers बालोपयुक्तता सम्बन्धी अध्ययनमे पूछैत छथि जे साहित्य बालकक आवश्यकता, इच्छा आ मूल्यक अनुरूप कोना बनैत अछि। एहि व्यापक अवधारणासँ तुलना करैत ‘अंगिका बाल-साहित्य’क बाल-मन केन्द्रित कसौटी एक स्थानीय, सहज आ व्यवहारिक समकक्ष ठहरैत अछि।
ठेठी-अंगिका — ई विचार के विशेष महत्त्व छै, कारण बाल-साहित्य प्रायः उपदेश दै के सरल माध्यम मान कें लेल जाय छै। डॉ. अमरेन्द्र ई प्रवृत्ति के विरुद्ध बालक के अनुभव-जगत कें साहित्यिक स्वायत्तता दै छै। Hans-Heino Ewers बालोपयुक्तता सम्बन्धी अध्ययन में पूछै जे जे साहित्य बालक के आवश्यकता, इच्छा आरो मूल्य के अनुरूप केना बनै छै। ई व्यापक अवधारणा सें तुलना करै ‘अंगिका बाल-साहित्य’ के बाल-मन केन्द्रित कसौटी एक स्थानीय, सहज आरो व्यवहारिक समकक्ष ठहरै छै।
मैथिली — मुदा एहि सिद्धान्तक भीतर एक रोचक तनाव सेहो अछि। ग्रन्थक बादक भागमे नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-शिक्षा, राष्ट्रबोध, जीवनी, स्वास्थ्य, अन्धविश्वास-विरोध आदि शिक्षामूलक साहित्यक प्रशंसा बहुत अछि। अर्थात आरम्भमे प्रत्यक्ष उपदेश गौण, मुदा साहित्येतिहास लिखैत समय शिक्षाप्रद गुण फेर महत्त्वपूर्ण। ई साधारण विरोधाभास नहि; बाल-साहित्यक ऐतिहासिक द्वैध अछि—आनन्द आ संस्कार, खेल आ शिक्षा, स्वायत्त बाल-दृष्टि आ समाजक अपेक्षा। पोथीक मूल सौन्दर्यशास्त्रक सर्वोत्तम रूप तखन देखाइत अछि जखन शिक्षामूलक कथ्य बालकक क्रिया, संवाद, लय, हास्य, कल्पना वा कथा-तनावमे घुलि जाइत अछि।
ठेठी-अंगिका — मतरकि ई सिद्धान्त के भीतर एक रोचक तनाव भी छै। ग्रन्थ के बाद के भाग में नैतिक शिक्षा, पर्यावरण-शिक्षा, राष्ट्रबोध, जीवनी, स्वास्थ्य, अन्धविश्वास-विरोध आदि शिक्षामूलक साहित्य के प्रशंसा बहुत छै। अर्थात आरम्भ में प्रत्यक्ष उपदेश गौण, मतरकि साहित्येतिहास लिखै समय शिक्षाप्रद गुण फेनू महत्त्वपूर्ण। ई साधारण विरोधाभास नै; बाल-साहित्य के ऐतिहासिक द्वैध छै—आनन्द आरो संस्कार, खेल आरो शिक्षा, स्वायत्त बाल-दृष्टि आरो समाज के अपेक्षा। पोथी के मूल सौन्दर्यशास्त्र के सर्वोत्तम रूप तबें देखाय छै जबें शिक्षामूलक कथ्य बालक के क्रिया, संवाद, लय, हास्य, कल्पना वा कथा-तनाव में घुलि जाय छै।
4. बाल-लोकसाहित्य: आधारभूमि आ जीवित अभिलेख
ठेठी-अंगिका: 4. बाल-लोकसाहित्य: आधारभूमि आरो जीवित अभिलेख
मैथिली — पहिल खण्ड अंगिका बाल-लोकसाहित्यक विस्तृत संसार खोलैत अछि। एतय साहित्य पुस्तकक पृष्ठपर नहि, जीवनक क्रियामे बसल अछि। बच्चाकेँ सुतबैत काल लोरी, तेल-मालिश वा भोजनक समय गायल पद, खेलमे बोलल तुक, समूहक प्रतिस्पर्धात्मक गीत, पहेली, हास्य, पशु-पक्षी आ लोककथा—सभ साहित्यक अंग बनैत अछि। लेखक एहि सामग्रीकेँ अस्पष्ट ‘लोक-संस्कृति’क श्रेणीमे छोड़ैत नहि, बल्कि उमेर, प्रयोजन, लय, खेलक प्रकार आ कथात्मक प्रकृतिक आधारपर उपरूप पहिचानबाक प्रयास करैत छथि।
ठेठी-अंगिका — पहिल खण्ड अंगिका बाल-लोकसाहित्य के विस्तृत संसार खोलै छै। एतै साहित्य पुस्तक के पृष्ठपर नै, जीवन के क्रिया में बसलों छै। बच्चा कें सुतावै काल लोरी, तेल-मालिश वा भोजन के समय गायलों पद, खेल में बोललों तुक, समूह के प्रतिस्पर्धात्मक गीत, पहेली, हास्य, पशु-पक्षी आरो लोककथा— सिनी साहित्य के अंग बनै छै। लेखक ई सामग्री कें अस्पष्ट ‘लोक-संस्कृति’ के श्रेणी में छोड़ै नै, बल्कि उमेर, प्रयोजन, लय, खेल के प्रकार आरो कथात्मक प्रकृति के आधारपर उपरूप पहिचानै के प्रयास करै छै।
मैथिली — ई खण्डक पहिल महत्त्व दस्तावेजीकरण अछि। मौखिक सामग्रीक अस्तित्व स्मृति आ जीवित गायनपर निर्भर रहैत अछि; पीढ़ी बदलला पर शब्द, धुन, प्रसंग आ खेलक नियम बदलि सकैत अछि। लेखक उपलब्ध संग्रह, अध्ययन आ मुद्रित स्रोतक सहारे एक पाठ्य-अभिलेख तैयार करैत छथि। Angika.com क स्वतंत्र साहित्यिक सर्वेक्षण सेहो अंगिका बाल-लोककाव्यक विविधता आ विपुलता तथा ओकर बहुत अंश लोककण्ठमे सुरक्षित रहबाक बात कहैत, नरेश पाण्डेय चकोर आ चन्द्रप्रकाश जगप्रियक संकलनकार्यकेँ महत्त्वपूर्ण मानैत अछि। एहि बाहरी साक्ष्यसँ मूल पोथीक अभिलेखन-भूमिका पुष्ट होइत अछि।
ठेठी-अंगिका — ई खण्ड के पहिल महत्त्व दस्तावेजीकरण छै। मौखिक सामग्री के अस्तित्व स्मृति आरो जीवित गायनपर निर्भर रहै छै; पीढ़ी बदलला पर शब्द, धुन, प्रसंग आरो खेल के नियम बदलि सकै छै। लेखक उपलब्ध संग्रह, अध्ययन आरो मुद्रित स्रोत के सहारे एक पाठ्य-अभिलेख तैयार करै छै। Angika.com के स्वतंत्र साहित्यिक सर्वेक्षण भी अंगिका बाल-लोककाव्य के विविधता आरो विपुलता तथा ओकर बहुत अंश लोककण्ठ में सुरक्षित रहै के बात कहै, नरेश पाण्डेय चकोर आरो चन्द्रप्रकाश जगप्रिय के संकलनकार्य कें महत्त्वपूर्ण मानै छै। ई बाहरी साक्ष्य सें मूल पोथी के अभिलेखन-भूमिका पुष्ट होय छै।
मैथिली — दोसर महत्त्व ई जे लोकसाहित्य आधुनिक साहित्यक ‘कच्चा माल’ मात्र नहि। लोरीक अपन लय-संगीत, पहेलीक बौद्धिक खेल, तुक्तकक ध्वनि-आनन्द, खेलगीतक सामूहिक प्रदर्शन, लोककथाक परिवर्तनशील कथा-जीवन—ई सभ अपने पूर्ण सौन्दर्य-व्यवस्था अछि। तथापि पोथीक संरचना कखनो लोककेँ आधुनिक लिखित साहित्यक पूर्वपीठिका बना देबाक जोखिम लैत अछि। समीक्षात्मक रूपेँ लोकसाहित्यक स्वायत्तता सेहो मानल जाए।
ठेठी-अंगिका — दोसर महत्त्व ई जे लोकसाहित्य आधुनिक साहित्य के ‘कच्चा माल’ मात्र नै। लोरी के आपनों लय-संगीत, पहेली के बौद्धिक खेल, तुक्तक के ध्वनि-आनन्द, खेलगीत के सामूहिक प्रदर्शन, लोककथा के परिवर्तनशील कथा-जीवन—ई सिनी अपने पूर्ण सौन्दर्य-व्यवस्था छै। तथापि पोथी के संरचना कखनियों लोक कें आधुनिक लिखित साहित्य के पूर्वपीठिका बना दै के जोखिम लै छै। समीक्षात्मक रूपेँ लोकसाहित्य के स्वायत्तता भी मानलों जाए।
मैथिली — लिखित संरक्षणक स्वाभाविक सीमा सेहो ध्यान योग्य अछि। खेलगीतक शब्द लिखि लेलासँ धुन, ताल, देहक गति, खेलक नियम, उमेर-समूहक सहभागिता, ऋतु, स्थान आ प्रदर्शनक परिस्थिति नहि बचैत अछि। भविष्यक शोधक अगिला चरण ऑडियो-वीडियो लोक-अभिलेख, गायक/कथावाचकक परिचय, स्थान, तिथि, प्रसंग आ variant पाठक दस्तावेजीकरण होएत। एहि दृष्टिसँ पोथी समाप्त परियोजना नहि, field archive क प्रारम्भिक नक्शा अछि।
ठेठी-अंगिका — लिखित संरक्षण के स्वाभाविक सीमा भी ध्यान योग्य छै। खेलगीत के शब्द लिख कें लेला सें धुन, ताल, देह के गति, खेल के नियम, उमेर-समूह के सहभागिता, ऋतु, स्थान आरो प्रदर्शन के परिस्थिति नै बचै छै। आगू के शोध के आगू के चरण ऑडियो-वीडियो लोक-अभिलेख, गायक/कथावाचक के परिचय, स्थान, तिथि, प्रसंग आरो variant पाठक दस्तावेजीकरण होतै। ई दृष्टि सें पोथी समाप्त परियोजना नै, field archive के प्रारम्भिक नक्शा छै।
पाठ-सर्वेक्षण: प्रथम अध्याय — लोक-मूलक अन्वेषण
ठेठी-अंगिका: पाठ-सर्वेक्षण : पहिलों अध्याय — लोक-मूल के खोज
मैथिली — पहिल अध्यायक सभसँ सबल पक्ष अछि ओकर प्रामाणिक प्राथमिक सामग्री। लेखक शिशु-कालसँ किशोर-काल धरिक जीवन-प्रसंग—डेग धरनाइ, तेल-मालिश, खान-पान आ निन्न पाड़नाइ—सभक संग जुड़ल लोरी आ बाल-गीत केँ प्रसंगानुसार सजा कए राखैत छथि। दृष्टान्तस्वरूप, तेल-मालिशक ई सरल-सुन्दर गीत अंग-धूलिकासँ उद्धृत अछि—
ठेठी-अंगिका — पहिलों अध्याय के सबसें मजबूत पक्ष छै ओकर सच्चा प्राथमिक सामग्री। लेखक नान्हपन सें किशोरपन तक के जिनगी-परसंग—डेग धरना, तेल-मालिश, खाना-पीना आरो सुताना—सब्भे सें जुड़लों लोरी आरो बाल-गीत के परसंग के हिसाब सें सजा कें राखै छै। जइसन कि, तेल-मालिश के ई सोझ-सुन्नर गीत अंग-धूलिका सें लेलों छै—
मैथिली — तेल दे टडुवा, नूनु रे बढुवा
ठेठी-अंगिका — तेल दे टडुवा, नूनु रे बढुवा
मैथिली — तेली केँ तेलाय जाय, नुनू मोटाय जाय
ठेठी-अंगिका — तेली कें तेलाय जाय, नुनू मोटाय जाय
मैथिली — तेल करैं चप-चप, नुनू बढ़ौं लप-लप।
ठेठी-अंगिका — तेल करैं चप-चप, नुनू बढ़ौं लप-लप।
मैथिली — (अंग-धूलिका, पृ. ८)
ठेठी-अंगिका — (अंग-धूलिका, पृ. ८)
मैथिली — एहन पदमे लेखक ठीके देखबैत छथि जे बाल-साहित्यक प्राण अर्थ (अभिधा)मे नहि, बल्कि ध्वनि आ लयक व्यंजनामे बसैत अछि—संदेश व्यंजनामे उभरैत अछि, अभिधामे नहि। इएह दृष्टि तुक्तक-काव्यक विवेचनमे परिपक्व होइत अछि, जतय ओ शिशु-गीतक निरर्थक-प्रतीत शब्द-संयोजन केँ ध्वन्यात्मकता आ संगीत-प्रधानताक आधार पर सार्थक सिद्ध करैत छथि।
ठेठी-अंगिका — एहन पद में लेखक ठीके देखाबै छै कि बाल-साहित्य के परान अरथ (अभिधा) में नै, बल्कि धुन आरो लय के व्यंजना में बसै छै—संदेस व्यंजना में उभरै छै, अभिधा में नै। इहे नजर तुक्तक-काव्य के विवेचन में आरो पाकल होय जाय छै, जहाँ ऊ सिसु-गीत के बेमतलब जइसन लागै वाला सबद-संयोजन के ध्वन्यात्मकता आरो संगीत-परधानता के आधार पर सारथक साबित करी दै छै।
खण्ड १: अंगिका बाल-लोकसाहित्यक तात्विक आ मनोवैज्ञानिक विवेचन
ठेठी-अंगिका: खण्ड १: अंगिका बाल-लोकसाहित्य के तात्विक आरो मनोवैज्ञानिक विवेचन
मैथिली — लोकसाहित्य कोनो भाषाक अघोषित इतिहास आ लोक-मनोविज्ञानक साक्षात् दर्पण होइत अछि। डॉ. अमरेन्द्र अपन ग्रन्थक प्रथम अध्यायमे बाल-लोकसाहित्यक मनोवैज्ञानिक आ वैज्ञानिक आधारकेँ स्पष्ट करैत छथि। हुनकर तर्क अछि जे वैज्ञानिक दृष्टिसँ शिशु अपन गर्भावस्थासँ हे एक विशेष प्रकारक सङ्गीत सँ नीन्द्रावस्थामे रहैत अछि। माए द्वारा गाओल जाए वला लोरीमे ओही सङ्गीतक गुञ्जन होइत अछि।
ठेठी-अंगिका — लोकसाहित्य कोनो भाषा के अघोषित इतिहास आरो लोक-मनोविज्ञान के साक्षात् दर्पण होय छै। डॉ. अमरेन्द्र अपन ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में बाल-लोकसाहित्य के मनोवैज्ञानिक आरो वैज्ञानिक आधारकेँ स्पष्ट करै छै। हुनकर तर्क छै जे वैज्ञानिक दृष्टि सें शिशु अपन गर्भावस्था सें ही एक विशेष प्रकारक सङ्गीत सें नीन्द्रावस्था में रहै छै। माए द्वारा गाओल जाए वला लोरी में ओही सङ्गीत के गुञ्जन होय छै।
5. लोरी, शिशु-काव्य आ मातृस्वर: साहित्यक पहिल देहरी
ठेठी-अंगिका: 5. लोरी, शिशु-काव्य आरो मातृस्वर: साहित्य के पहिल देहरी
मैथिली — पोथी लोरीकेँ बाल-साहित्यक आदि रूपसभमे राखैत अछि। शिशु, संगीत, नींद आ मातृक स्वरक सम्बन्धसँ चर्चा आरम्भ भऽ लोरी शिशु-जीवनक पहिल साहित्यिक-संगीतात्मक अनुभव बनि उठैत अछि। आलोचनात्मक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण बात ई अछि जे लोरी एतय पाठ नहि, सम्बन्ध अछि—माँक स्वर, शिशुक देह, लय, स्पर्श आ नींदक संयुक्त अनुभव।
ठेठी-अंगिका — पोथी लोरी कें बाल-साहित्य के आदि रूप सिनी में राखै छै। शिशु, संगीत, नींद आरो माय के स्वर के सम्बन्ध सें चर्चा आरम्भ होय कें लोरी शिशु-जीवन के पहिल साहित्यिक-संगीतात्मक अनुभव बनी उठै छै। आलोचनात्मक दृष्टि सें महत्त्वपूर्ण बात ई छै जे लोरी एतै पाठ नै, सम्बन्ध छै—माय के स्वर, शिशु के देह, लय, स्पर्श आरो नींद के संयुक्त अनुभव।
मैथिली — मुद्रित पुस्तक पढ़बाक पहिने बच्चा ध्वनि ग्रहण करैत अछि; अर्थ बुझबाक पहिने पुनरावृत्ति, स्वराघात आ तालक प्रतिक्रिया करैत अछि। एहि कारण लोरी आ तुक्तक साहित्यिक विकासक निम्न स्तर नहि, भाषा-अनुभवक मूल रूप अछि। पोथीक उदाहरणसभ परिवार, भोजन, तेल-मालिश, नींद आ दैनिक क्रियाकेँ काव्यक सामग्री बनबैत अछि। बाल-साहित्यक आरम्भ भव्य कल्पनासँ नहि, परिचित देह-जगतसँ होइत अछि।
ठेठी-अंगिका — मुद्रित पुस्तक पढ़ै के पहिने बच्चा ध्वनि ग्रहण करै छै; अर्थ बुझै के पहिने पुनरावृत्ति, स्वराघात आरो ताल के प्रतिक्रिया करै छै। ई कारण लोरी आरो तुक्तक साहित्यिक विकास के निम्न स्तर नै, भाषा-अनुभव के मूल रूप छै। पोथी के उदाहरण सिनी परिवार, भोजन, तेल-मालिश, नींद आरो दैनिक क्रिया कें काव्य के सामग्री बनावै छै। बाल-साहित्य के आरम्भ भव्य कल्पना सें नै, परिचित देह-जगत सें होय छै।
मैथिली — मातृस्वरक केन्द्रता संग एक आलोचनात्मक प्रश्न सेहो उठैत अछि: लोक-पालन-पोषणमे पिता, दादी-दादा, भाई-बहिन, पड़ोस आ अन्य देखभालकर्ता सभक भूमिका कतेक अछि? भविष्यक field study बालगीतक पूरा घरेलू-सामुदायिक नेटवर्क देखबैत ग्रन्थक मातृकेन्द्रित सामग्रीकेँ अधिक विस्तृत सामाजिक परिप्रेक्ष्य दऽ सकैत अछि। साहित्यिक दृष्टिसँ लोरीक मुख्य गुण सरलता नहि, श्रवणीयता अछि; ध्वनि-साम्य, पुनरावृत्ति, लघु पद, परिचित शब्द आ लय शिशुक ग्रहणशीलताक अनुसार भाषा बनबैत अछि।
ठेठी-अंगिका — मातृस्वर के केन्द्रता संग एक आलोचनात्मक प्रश्न भी उठै छै: लोक-पालन-पोषण में पिता, दादी-दादा, भाई-बहिन, पड़ोस आरो अन्य देखभालकर्ता सिनी के भूमिका कत्तें छै? आगू के field study बालगीत के पूरा घरेलू-सामतरकियिक नेटवर्क देखावै ग्रन्थ के मातृकेन्द्रित सामग्री कें अधिक विस्तृत सामाजिक परिप्रेक्ष्य दै कें सकै छै। साहित्यिक दृष्टि सें लोरी के मुख्य गुण सरलता नै, श्रवणीयता छै; ध्वनि-साम्य, पुनरावृत्ति, लघु पद, परिचित शब्द आरो लय शिशु के ग्रहणशीलता के अनुसार भाषा बनावै छै।
लोरी: वात्सल्य, सङ्गीत आ ध्वन्यात्मकताक अद्भुत सङ्गम
ठेठी-अंगिका: लोरी: वात्सल्य, सङ्गीत आरो ध्वन्यात्मकताक अद्भुत सङ्गम
मैथिली — बाल-साहित्यक सबसँ प्राचीनतम रूप लोरी अछि। लोरी मात्र बच्चाकेँ सुतेबाक साधन नहि अछि, ई भाषाक प्राथमिक लय आ ध्वनिक ज्ञान बच्चाकेँ दैत अछि। अंगिका लोक-साहित्यमे जे लोरी उपलब्ध अछि, ओहिमे प्रकृति, पशुपक्षी आ पारिवारिक स्नेहक अतीव सुन्दर चित्रण अछि। पोथीसँ एकटा विशुद्ध उद्धरण द्रष्टव्य अछि:
ठेठी-अंगिका — बाल-साहित्य के सब सें सभसें पुरान रूप लोरी छै। लोरी मात्र बच्चा केेँ सुतावै के साधन नै छै, ई भाषा के प्राथमिक लय आरो ध्वनि के ज्ञान बच्चा केेँ दै छै। अंगिका लोक-साहित्य में जे लोरी उपलब्ध छै, ओहि में प्रकृति, पशुपक्षी आरो पारिवारिक स्नेह के अतीव सुन्दर चित्रण छै। पोथी सें एगो विशुद्ध उद्धरण द्रष्टव्य छै:
मैथिली — घना मंजुर, घना मंजूर कहा पे छिपलै घना मंजूर बाइस बीघा के वनो मे तोहरा लेबौ खोजी जहाँ भी छिपलै घना मंजूर चुप्पा चुप, कुकरू-कूं नूनु करै छौ तोरा सँ प्रीत आवी सुताय जो गावी के गीत।
ठेठी-अंगिका — घना मंजुर, घना मंजूर कहा पे छिपलै घना मंजूर बाइस बीघा के वनो मे तोहरा लेबौ खोजी जहाँ भी छिपलै घना मंजूर चुप्पा चुप, कुकरू-कूं नूनु करै छौ तोरा सँ प्रीत आवी सुताय जो गावी के गीत।
मैथिली — एहि लोरीक साहित्यिक समीक्षा करितें ई स्पष्ट होइत अछि जे एहिमे ध्वन्यात्मकता ('चुप्पा चुप, कुकरू-कूं') आ लयात्मकता ('मंजूर', 'खोजी', 'गीत') क जे सङ्गम अछि, ओ शिशु-मनकेँ तुरन्त अपन दिस आकृष्ट करैत अछि। डॉ. अमरेन्द्र ई सेहो स्पष्ट करैत छथि जे लोरीक विषय-वस्तु बच्चाकेँ पूर्णतया समझमे आबए ई आवश्यक नहि, अपितु ओकर सुर आ सङ्गीतक जादू शिशु-मस्तिष्क पर प्रभाव डालैत अछि। 'बाइस बीघा के वनो मे' जकाँ पङ्क्तिमे अतिशयोक्ति अलङ्कारक जे सहज प्रयोग अछि, ओ बच्चाक कल्पनाशक्तीकेँ विस्तृत करैत अछि।
ठेठी-अंगिका — ई लोरी के साहित्यिक समीक्षा करितें ई साफ होय छै जे ई में ध्वन्यात्मकता ('चुप्पा चुप, कुकरू-कूं') आरो लयात्मकता ('मंजूर', 'खोजी', 'गीत') के जे सङ्गम छै, ऊ शिशु-मनकेँ तुरन्त अपन दिस अपन दिस खींचै छै। डॉ. अमरेन्द्र ई भी साफ करै छै जे लोरी के विषय-वस्तु बच्चा केेँ पूर्णतया समझ में आवै ई आवश्यक नै छै, बल्कि ओकर सुर आरो सङ्गीत के जादू शिशु-मस्तिष्क पर प्रभाव डालै छै। 'बाइस बीघा के वनो मे' जेना पङ्क्ति में अतिशयोक्ति अलङ्कारक जे सहज प्रयोग छै, ऊ बच्चा के कल्पनाशक्तीकेँ विस्तृत करै छै।
6. पहेली आ तुक्तक: अर्थसँ पूर्व ध्वनि, ज्ञानसँ पूर्व खेल
ठेठी-अंगिका: 6. पहेली आरो तुक्तक: अर्थ सें पूर्व ध्वनि, ज्ञान सें पूर्व खेल
मैथिली — पृष्ठ 10–14 क सामग्री पहेली आ तुक्तक-काव्यकेँ दू भिन्न, मुदा परस्पर पूरक बाल-विधाक रूपमे सामने अनैत अछि। पहेली अर्थक गुप्त खेल अछि: बच्चा संकेत जोड़ैत अछि, अनुमान करैत अछि, गलत उत्तरसँ हँसैत अछि, फेर प्रयास करैत अछि। एकपदीसँ चतुष्पदी रूपक उल्लेख देखबैत अछि जे पहेली छोट भाषिक ढाँचामे बौद्धिक सक्रियता पैदा करैत अछि। लेखक शिशु आ किशोरक ग्रहण-क्षमता बीच भेदक संकेत सेहो करैत छथि।
ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 10–14 के सामग्री पहेली आरो तुक्तक-काव्य कें दू भिन्न, मतरकि परस्पर पूरक बाल-विधा के रूप में सामने अनै छै। पहेली अर्थ के गुप्त खेल छै: बच्चा संकेत जोड़ै छै, अनुमान करै छै, गलत उत्तर सें हँसै छै, फेनू प्रयास करै छै। एकपदी सें चतुष्पदी रूपक उल्लेख देखावै छै जे पहेली छोट भाषिक ढाँचा में बौद्धिक सक्रियता पैदा करै छै। लेखक शिशु आरो किशोर के ग्रहण-क्षमता बीच भेद के संकेत भी करै छै।
मैथिली — तुक्तक-काव्यमे अर्थ पूर्ण स्पष्ट होएब आवश्यक नहि; ध्वनि, तुक, शब्दक खेल, दोहराव आ उच्चारणक आनन्द अग्रभूमिमे अछि। बच्चा भाषाकेँ अर्थ-संकेतक प्रणाली मात्र नहि, आवाजक खिलौना सेहो मानैत अछि। निरर्थकता एतय दोष नहि; ध्वनि-सौन्दर्य, स्मृति आ सहभागिताक साधन अछि।
ठेठी-अंगिका — तुक्तक-काव्य में अर्थ पूर्ण स्पष्ट होब आवश्यक नै; ध्वनि, तुक, शब्द के खेल, दोहराव आरो उच्चारण के आनन्द अग्रभूमि में छै। बच्चा भाषा कें अर्थ-संकेतक प्रणाली मात्र नै, आवाज के खिलौना भी मानै छै। निरर्थकता एतै दोष नै; ध्वनि-सौन्दर्य, स्मृति आरो सहभागिता के साधन छै।
मैथिली — बाहरी साहित्यिक सूची एहि क्षेत्रक मुद्रित विस्तारक पुष्टि करैत अछि। Angika.com अमरेन्द्रक ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’ केँ बाल-मनोविज्ञान ध्यानमे राखि रचल पहेली-संग्रह आ ‘तुक्तक-मुक्तक’ केँ कम उमेरक बालक लेल रचल कविता-संग्रहक रूपमे दर्ज करैत अछि; Kavita Kosh सेहो ‘तुक्तक मुक्तक’ केँ बाल-कविता/ई-पुस्तक श्रेणीमे राखैत अछि। ग्रन्थक सीमा ई जे उदाहरण बहुत अछि, मुदा ध्वनिविज्ञान, स्मृति-रचना, हास्य वा भाषिक विचलनक विस्तृत close reading कम अछि। भविष्यक शोध एहि corpus पर तुक-योजना, ध्वनि-पुनरावृत्ति, शब्द-निर्माण आ बाल-प्रतिक्रियाक अध्ययन कऽ सकैत अछि।
ठेठी-अंगिका — बाहरी साहित्यिक सूची ई क्षेत्र के मुद्रित विस्तार के पुष्टि करै छै। Angika.com अमरेन्द्र के ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’ कें बाल-मनोविज्ञान ध्यान में राख कें रचलों पहेली-संग्रह आरो ‘तुक्तक-मुक्तक’ कें कम उमेर के बालक लेल रचलों कविता-संग्रह के रूप में दर्ज करै छै; Kavita Kosh भी ‘तुक्तक-मुक्तक’ कें बाल-कविता/ई-पुस्तक श्रेणी में राखै छै। ग्रन्थ के सीमा ई जे उदाहरण बहुत छै, मतरकि ध्वनिविज्ञान, स्मृति-रचना, हास्य वा भाषिक विचलन के विस्तृत close reading कम छै। आगू के शोध ई corpus पर तुक-योजना, ध्वनि-पुनरावृत्ति, शब्द-निर्माण आरो बाल-प्रतिक्रिया के अध्ययन करी कें सकै छै।
बुझौवल-परम्परा: एक गहन विवेचन
ठेठी-अंगिका: बुझौवल-परम्परा : एगो गहरा विवेचन
मैथिली — अंगिका बुझौवल (पहेली)क विवेचन एहि पोथीक सभसँ मौलिक अंश थिक, आ एतहि लेखकक वर्गीकरण-कौशल विशेष रूपें उघरैत अछि। ओ बुझौवल केँ पद-संख्याक आधार पर एकपदीसँ चतुष्पदी धरि चारि श्रेणीमे बाँटैत छथि। ई वर्गीकरण मात्र गणनात्मक नहि—ओकरामे एकटा काव्यशास्त्रीय क्रमविकास नुकाएल अछि। एकपदी बुझौवलमे समस्त प्रहेलिका एके बिम्बमे संकुचित भ’ जाइत अछि—
ठेठी-अंगिका — अंगिका बुझौवल (पहेली) के विवेचन ई पोथी के सबसें मौलिक हिस्सा छै, आरो एहिजा लेखक के वर्गीकरण के हुनर खास तौर पर उभरै छै। ऊ बुझौवल के पद-गिनती के आधार पर एकपदी सें चतुष्पदी तक चार सरेनी में बाँटै छै। ई बँटवारा खाली गिनती वाला नै छै—ओकरा में एगो काव्यशास्त्रीय क्रम-विकास छिपलों छै। एकपदी बुझौवल में पूरा पहेली एके बिम्ब में सिमटी जाय छै—
मैथिली — फरैं नै फूलै, ढकमोरै गाछ। (पान)
ठेठी-अंगिका — फरैं नै फूलै, ढकमोरै गाछ। (पान)
मैथिली — एतय “फल नहि, फूल नहि, तैयो गाछ केँ लपेटि लै”क विरोधाभास बालक केँ निषेध-द्वारा-परिभाषा सिखबैत अछि; ई अन्यापदेश आ लक्षणाक प्रारम्भिक पाठ थिक। जेना-जेना पद बढ़ैत अछि, बुझौवलमे नाट्यात्मकता प्रवेश करैत अछि। त्रिपदी बुझौवलमे सादृश्य आ द्वन्द्व दुनू अबैत अछि—
ठेठी-अंगिका — एहिजा “फल नै, फूल नै, तइयो गाछ के लपेटी लै”—ई विरोधाभास बुतरू के नाकारा-सें-पहचान (निषेध सें परिभाषा) सिखाबै छै; ई अन्योक्ति आरो लक्षणा के पहिलका पाठ छै। जइसन-जइसन पद बढ़ै छै, बुझौवल में नाटकीयता घुसै छै। त्रिपदी बुझौवल में सादृश्य आरो जोड़ी—दुन्नु आबै छै—
मैथिली — एक सङ दू साथी रहै
ठेठी-अंगिका — एक सङ दू साथी रहै
मैथिली — एक चललै, एक सूती रहलै
ठेठी-अंगिका — एक चललै, एक सूती रहलै
मैथिली — तैयो ओकरों साथ नै छुटलै। (चक्की के दोनों पट्टा)
ठेठी-अंगिका — तैयो ओकरों साथ नै छुटलै। (चक्की के दोनों पट्टा)
मैथिली — आ चतुष्पदीमे तँ बुझौवल एकटा स्वगत-कथन बनि जाइत अछि, जतय बुझबाक वस्तु स्वयं बजैत अछि—
ठेठी-अंगिका — आरो चतुष्पदी में तें बुझौवल एगो अपने-आप-कहनी (स्वगत-कथन) बनी जाय छै, जहाँ बुझै वाला चीज अपने बोलै छै—
मैथिली — जबें हम छेलाँ काँच कुमारी
ठेठी-अंगिका — जबें हम छेलाँ काँच कुमारी
मैथिली — तब तक सहलाँ मार
ठेठी-अंगिका — तब तक सहलाँ मार
मैथिली — अब हम पहनला लाल घंघरिया
ठेठी-अंगिका — अब हम पहनला लाल घंघरिया
मैथिली — अब नै सहबौ मार। (हड़िया)
ठेठी-अंगिका — अब नै सहबौ मार। (हड़िया)
मैथिली — एतय माटिक हाँड़ी अपन जीवन-वृत्तान्त—काँच कुमारीसँ आगिमे पाकि लाल घघरी पहिरब धरि—प्रथम पुरुषमे कहैत अछि। ई बुझौवलक सभसँ परिष्कृत रूप थिक, जतय प्रहेलिका आत्म-कथा आ रूपकक स्तर धरि उठि जाइत अछि। एहि क्रमसँ लेखक (चाहे अनकहने) ई देखा दैत छथि जे अंगिका बुझौवल केवल बुद्धि-विनोद नहि, अपितु उपमा-रूपक-अन्योक्तिक एकटा लघु पाठशाला थिक।
ठेठी-अंगिका — एहिजा माटी के हाँड़ी अपन जिनगी के कहानी—काँच कुमारी सें लै कें आगि में पाकी लाल घघरी पहिरै तक—अपने मुँह सें कहै छै। ई बुझौवल के सबसें सुथरा रूप छै, जहाँ पहेली आत्म-कथा आरो रूपक के दरजा तक चढ़ी जाय छै। ई तरहें लेखक (चाहे बिन कहनहिं) ई देखाय दै छै कि अंगिका बुझौवल खाली बुद्धि-विनोद नै, बल्कि उपमा-रूपक-अन्योक्ति के एगो नान्हकी पाठसाला छै।
मैथिली — लेखकक सभसँ तीक्ष्ण समीक्षकीय हस्तक्षेप ओतय अछि जतय ओ “पंडित द्वारा पंडित केँ बुद्धिमे पछाड़बा” लेल गढ़ल जटिल बुझौवल केँ बाल-साहित्यक सीमासँ बाहर घोषित करैत छथि। ई निर्णय एकटा कसौटी दैत अछि—बुझौवलक प्रामाणिकता ओकर रूपमे नहि, बाल-बोधक अनुकूलतामे अछि। अर्थात् लेखक बुझौवल केँ लोकसंग्रहक दृष्टिसँ नहि, बाल-मनोविज्ञानक दृष्टिसँ पढ़ैत छथि—इएह हुनकर पद्धतिगत विशिष्टता थिक। ज्ञानशास्त्रीय दृष्टिएँ देखी तँ बुझौवल एकटा लघु प्रमाण-क्रीड़ा थिक: प्रमेय (उत्तर) केँ सादृश्यक ओहार-तर नुकाकए बालक केँ व्याप्ति-ग्रहणक अभ्यास करबैत अछि। मुदा एतहि पोथीक सीमा सेहो प्रकट होइत अछि—लेखक बुझौवल केँ वर्गीकृत करैत छथि, मुदा ओकर आन्तरिक संरचना (ओहार-आ-उत्तरक व्याकरण), ओकर कहन-प्रसंग आ मैथिली-बज्जिका बुझौवलक संग ओकर तुलनात्मक स्थिति—ई सभ अछूता रहि जाइत अछि। वर्गीकरण भेल, मुदा बुझौवलक काव्यशास्त्र लिखबाक प्रतीक्षा एखनहुँ अछि।
ठेठी-अंगिका — लेखक के सबसें तेज समीक्षकीय दखल वहाँ छै जहाँ ऊ “पंडित के हाथें पंडित के बुद्धि में पछाड़ै” लेली गढ़लों जटिल बुझौवल के बाल-साहित्य के सीमा सें बाहर के चीज कही दै छै। ई फैसला एगो कसौटी दै छै—बुझौवल के सच्चाई ओकर रूप में नै, बाल-बोध के अनुकूलता में छै। मतलब, लेखक बुझौवल के लोकसंग्रह के नजर सें नै, बाल-मनोविज्ञान के नजर सें पढ़ै छै—इहे हुनकर पद्धति के खासियत छै। ज्ञान के नजर सें देखी तें बुझौवल एगो नान्हकी परमाण-खेल छै : परमेय (जबाब) के सादृश्य के ओहार-तर छिपा कें बुतरू के व्याप्ति-ग्रहण के अभ्यास कराबै छै। मतरकि एहिजे पोथी के सीमा भी खुलै छै—लेखक बुझौवल के बाँटै छै, मतरकि ओकर भीतरी बनावट (ओहार-आरो-जबाब के व्याकरण), ओकर कहै के मौका, आरो मैथिली-बज्जिका बुझौवल के संग ओकर तुलना—ई सब अनछुआ रही जाय छै। बँटवारा भेलै, मतरकि बुझौवल के काव्यशास्त्र लिखै के काम अखनी बाँकिये छै।
पहेली वा बुझौवल: संज्ञानात्मक विकासक साधन
ठेठी-अंगिका: पहेली वा बुझौवल: संज्ञानात्मक विकास के साधन
मैथिली — बालक जखन किशोरावस्थाक दिस अग्रसर होइत अछि, तखन ओकर तार्किक क्षमताक विकास लेल लोक-साहित्यमे पहेलीक विशेष स्थान रहल अछि। बाल-साहित्यमे पहेली बौद्धिक व्यायाम अछि। डॉ. अमरेन्द्र अंगिका पहेलीकेँ एकपदी, द्विपदी, त्रिपदी आ चतुष्पदी रूपमे वर्गीकृत केने छथि। चन्द्रप्रकाश जगप्रिय द्वारा सम्पादित 'अंगिका लोकोक्ति, फेकड़ा आरो बुझौवल' सँ लेखक बहुत रास पहेलीक सन्दर्भ देने छथि।
ठेठी-अंगिका — बालक जबें किशोरावस्था के दिस अग्रसर होय छै, तबें ओकर तार्किक क्षमता के विकास लेली लोक-साहित्य में पहेली के विशेष स्थान रहल छै। बाल-साहित्य में पहेली बौद्धिक व्यायाम छै। डॉ. अमरेन्द्र अंगिका पहेलीकेँ एकपदी, द्विपदी, त्रिपदी आरो चतुष्पदी रूप में वर्गीकृत केने छै। चन्द्रप्रकाश जगप्रिय द्वारा सम्पादित 'अंगिका लोकोक्ति, फेकड़ा आरो बुझौवल' सें लेखक बहुत रास पहेली के सन्दर्भ देने छै।
पहेली-वर्गीकरण आ उद्धरण
ठेठी-अंगिका: पहेली-वर्गीकरण आरो उद्धरण
पहेलीक प्रकार · अंगिका पहेली (विशुद्ध उद्धरण) · मैथिली अर्थ (समाधान)
ठेठी-अंगिका: पहेली के प्रकार · अंगिका पहेली (मूल उद्धरण) · मैथिली अर्थ (समाधान)
मैथिली — एकपदी — मूल अंगिका पहेली: फरै नै फूलै, ढकमोरै गाछ। — मैथिली अर्थ/समाधान: पानक पत्ता
ठेठी-अंगिका — एकपदी — मूल अंगिका पहेली: फरै नै फूलै, ढकमोरै गाछ। — मैथिली अर्थ/समाधान: पानक पत्ता
मैथिली — एकपदी — मूल अंगिका पहेली: जड़ नै पत्ता, की छेकौ? — मैथिली अर्थ/समाधान: अमरबेल (अमरलत्ता)
ठेठी-अंगिका — एकपदी — मूल अंगिका पहेली: जड़ नै पत्ता, की छेकौ? — मैथिली अर्थ/समाधान: अमरबेल (अमरलत्ता)
मैथिली — द्विपदी — मूल अंगिका पहेली: सुइया एन्हों सोज्झो / डाँड़ा पर बोज्झो। — मैथिली अर्थ/समाधान: मकईक गाछ
ठेठी-अंगिका — द्विपदी — मूल अंगिका पहेली: सुइया एन्हों सोज्झो / डाँड़ा पर बोज्झो। — मैथिली अर्थ/समाधान: मकईक गाछ
मैथिली — त्रिपदी — मूल अंगिका पहेली: एक सँ दू साथी रहै / एक चललै, एक सूती रहलै / तैयो ओकरो साथ नै छुटलै। — मैथिली अर्थ/समाधान: जाँतक दुनू पट्टा (चक्की)
ठेठी-अंगिका — त्रिपदी — मूल अंगिका पहेली: एक सें दू साथी रहै / एक चललै, एक सूती रहलै / तैयो ओकरो साथ नै छुटलै। — मैथिली अर्थ/समाधान: जाँतक दूनो पट्टा (चक्की)
मैथिली — चतुष्पदी — मूल अंगिका पहेली: जबे हम छेलौं काँच कुआरी / तब तक सहलौं मार / अब हम पहनला लाल घंघरिया / अब नै सहबौ मार। — मैथिली अर्थ/समाधान: मरिच (मिरचाय)
ठेठी-अंगिका — चतुष्पदी — मूल अंगिका पहेली: जबे हम छेलौं काँच कुआरी / तब तक सहलौं मार / अब हम पहनला लाल घंघरिया / अब नै सहबौ मार। — मैथिली अर्थ/समाधान: मरिच (मिरचाय)
मैथिली — एहि पहेली सभक समीक्षा सँ ई स्पष्ट होइत अछि जे एहिमे रूपक आ उपमाक प्रयोग बड्ड सहजता सँ कएल गेल अछि। 'काँच कुआरी' आ 'लाल घंघरिया' सन मानवीकरण (Personification) मरिचकेँ बाल-कौतूहलक केन्द्र बना दैत अछि। ई बाल-साहित्यक उत्कृष्ट उदाहरण अछि जतय प्रकृति आ मानव-जीवनक बीच तादात्म्य स्थापित कएल गेल अछि। 'सुइया एन्हों सोज्झो' मे दृष्टान्त अलङ्कारक छटा बाल-मनकेँ आकर्षित करैत अछि।
ठेठी-अंगिका — ई पहेली सिनी के समीक्षा सें ई साफ होय छै जे ई में रूपक आरो उपमा के प्रयोग बहुत सहजता सें करलों गेलों छै। 'काँच कुआरी' आरो 'लाल घंघरिया' जइसन मानवीकरण (Personification) मरिचकेँ बाल-कौतूहल के केन्द्र बना दै छै। ई बाल-साहित्य के उत्कृष्ट उदाहरण छै जहाँ प्रकृति आरो मानव-जीवन के बीच तादात्म्य स्थापित करलों गेलों छै। 'सुइया एन्हों सोज्झो' में दृष्टान्त अलङ्कारक छटा बाल-मनकेँ आकर्षित करै छै।
तुक्तक आ शिशु-काव्य (Nonsense Rhymes)
ठेठी-अंगिका: तुक्तक आरो शिशु-काव्य (Nonsense Rhymes)
मैथिली — शिशु-काव्यक एकटा पैघ हिस्सा ध्वन्यात्मक वा 'तुक्तक' होइत अछि। एहिमे अर्थसँ अधिक ध्वनिक लय पर जेर देल जाइत अछि। अङ्ग्रेजी साहित्यमे जकरा 'Nonsense Rhymes' कहल जाइत अछि, अंगिका बाल-साहित्यमे ओकरो पर्याप्त भण्डार अछि। पोथीमे लेखक विशुद्ध तुक्तक आ अर्द्ध-तुक्तकक भेदन केने छथि। विशुद्ध तुक्तकक एकटा उत्कृष्ट उदाहरण:
ठेठी-अंगिका — शिशु-काव्य के एगो बड़का हिस्सा ध्वन्यात्मक वा 'तुक्तक' होय छै। ई में अर्थ सें अधिक ध्वनि के लय पर जेर देलों जाय छै। अङ्ग्रेजी साहित्य में जेकरा 'Nonsense Rhymes' कहल जाय छै, अंगिका बाल-साहित्य में ओकरो पर्याप्त भण्डार छै। पोथी में लेखक विशुद्ध तुक्तक आरो अर्द्ध-तुक्तक के भेदन केने छै। विशुद्ध तुक्तक के एगो उत्कृष्ट उदाहरण:
मैथिली — ओ रे रे नुनु ओर बटना माय-बाप गेलौ छौ चिचोर कटना बाप जिमिदरवा छोड़बा पर माय जिमिदरनी डोलबा पर पैला में चूड़ा मचक मारै छै । सीका पर दही हिलोड़ पारै छै ।
ठेठी-अंगिका — ओ रे रे नुनु ओर बटना माय-बाप गेलौ छौ चिचोर कटना बाप जिमिदरवा छोड़बा पर माय जिमिदरनी डोलबा पर पैला में चूड़ा मचक मारै छै । सीका पर दही हिलोड़ पारै छै ।
मैथिली — उक्त पंक्तियक विश्लेषण करैत डॉ. अमरेन्द्र लिखैत छथि जे 'ओर बटना', 'चिचोर कटना' सन पद-समूहक कोनो अर्थ-सङ्गति नहि अछि, मुदा ई बालक-मनकेँ गुदगुदाबए लेल पूर्णतः सक्षम अछि। अर्द्ध-तुक्तक ओ होइत अछि जाहिमे किछु दूर धरि अर्थ-सङ्गति भेटैत अछि आ फेर अकारण निरर्थक पद आबि जाइत अछि। एकर सेहो एकटा गजबक उदाहरण पोथीमे उपलब्ध अछि:
ठेठी-अंगिका — ई पंक्ति के विश्लेषण करै डॉ. अमरेन्द्र लिखै छै जे 'ओर बटना', 'चिचोर कटना' जइसन पद-समूह के कोनो अर्थ-सङ्गति नै छै, मतरकि ई बालक-मनकेँ गुदगुदाबए लेली पूरा तरह सें सक्षम छै। अर्द्ध-तुक्तक ऊ होय छै जेकरा में कुछु दूर तक अर्थ-सङ्गति मिलै छै आरो फेर अकारण निरर्थक पद आबि जाय छै। एकर भी एगो गजबक उदाहरण पोथी में उपलब्ध छै:
मैथिली — एक मटर पैलै छी, एड़िया तर नूकैलै छी सातो गोतनी पीसै छै; एक गोतनी रूसली केकरा ले ? बुढ़बा ले। बुढ़बा गेलौ छै बारी; कौआ नोचै छै दाढ़ी
ठेठी-अंगिका — एक मटर पैलै छी, एड़िया तर नूकैलै छी सातो गोतनी पीसै छै; एक गोतनी रूसली केकरा ले ? बुढ़बा ले। बुढ़बा गेलौ छै बारी; कौआ नोचै छै दाढ़ी
मैथिली — एहिठाम 'बुढ़बा गेलौ छै बारी' आ 'कौआ नोचै छै दाढ़ी' मे जे हास्य (Humour) उत्पन्न कएल गेल अछि, ओ बच्चाक फंतासी संसारक एकदम समीप अछि। बाल-संवेदना एहि प्रकारक तुक्तक सँ सर्वाधिक प्रफुल्लित होइत अछि।
ठेठी-अंगिका — एतै 'बुढ़बा गेलौ छै बारी' आरो 'कौआ नोचै छै दाढ़ी' में जे हास्य (Humour) उत्पन्न करलों गेलों छै, ऊ बच्चा के फंतासी संसार के एकदम समीप छै। बाल-संवेदना ई प्रकारक तुक्तक सें सभसें बेसी प्रफुल्लित होय छै।
7. खेलगीत: पाठ, देह आ समुदाय
ठेठी-अंगिका: 7. खेलगीत: पाठ, देह आरो समुदाय
मैथिली — खेलगीत सम्बन्धी पृष्ठसभ पोथीक सर्वाधिक जीवित अंशसभमे अछि। बच्चा खेलैत-खेलैत गाबैत अछि; गीत खेलक बाहरी सजावट नहि, खेलक क्रियाक अंग अछि। ऐच्छिक खेल, प्रतिस्पर्धात्मक खेल, बौद्धिक खेल आदि रूपसभक चर्चा देखबैत अछि जे बाल-साहित्यक पाठकीयता चुपचाप पढ़नाइ मात्र नहि। बच्चा बोलैत, दौड़ैत, गिनैत, चुनैत, हारैत-जितैत, हँसैत आ सामूहिक नियम बनबैत साहित्यकेँ जीवित करैत अछि।
ठेठी-अंगिका — खेलगीत सम्बन्धी पृष्ठ सिनी पोथी के सर्वाधिक जीवित अंश सिनी में छै। बच्चा खेलै-खेलै गावै छै; गीत खेल के बाहरी सजावट नै, खेल के क्रिया के अंग छै। ऐच्छिक खेल, प्रतिस्पर्धात्मक खेल, बौद्धिक खेल आदि रूप सिनी के चर्चा देखावै छै जे बाल-साहित्य के पाठकीयता चुपचाप पढ़नाइ मात्र नै। बच्चा बोलै, दौड़ै, गिनै, चुनै, हारै-जीतै, हँसै आरो सामूहिक नियम बनावै साहित्य कें जीवित करै छै।
मैथिली — एहि ठाम पोथी performance सम्बन्धी एक उपयोगी प्रश्न खोलैत अछि: साहित्य कहाँ समाप्त होइत अछि आ खेल कहाँ आरम्भ? खेलगीतमे शब्द, देह-चाल, समूह-संरचना, ताल, स्थान आ परिस्थिति अलग नहि कएल जा सकैत। शब्दमात्र लिखि लेब एक पाठ बचबैत अछि, पूरा प्रस्तुति नहि। एहि कारण पोथीक दस्तावेजीकरण अमूल्य होइतहुँ अपूर्ण अछि—आ ई अपूर्णता लेखकक व्यक्तिगत कमी नहि, लिखित माध्यमक सीमा अछि।
ठेठी-अंगिका — ई जगह पोथी performance सम्बन्धी एक उपयोगी प्रश्न खोलै छै: साहित्य कहाँ समाप्त होय छै आरो खेल कहाँ आरम्भ? खेलगीत में शब्द, देह-चाल, समूह-संरचना, ताल, स्थान आरो परिस्थिति अलग नै करलों जाय सकै। शब्दमात्र लिख कें लेब एक पाठ बचावै छै, पूरा प्रस्तुति नै। ई कारण पोथी के दस्तावेजीकरण अमूल्य होतो भी अपूर्ण छै—आरो ई अपूर्णता लेखक के व्यक्तिगत कमी नै, लिखित माध्यम के सीमा छै।
मैथिली — खेलगीत सामाजिक सीखक माध्यम सेहो अछि। संख्या, क्रम, चुनाउ, नियम, बारी, प्रतियोगिता, सहयोग, परिहास, भूमिका-विनिमय—ई सभ बिना औपचारिक पाठशालाक बच्चा सीखैत अछि। भविष्यक शोधमे लिंग-आधारित खेल, उमेर-वर्ग, ग्राम-नगर भेद, मौसम, विद्यालय आ आँगनक अन्तरक अध्ययन कएल जाए तँ अंगिका बाल-संस्कृतिक अधिक सूक्ष्म नक्शा बनि सकैत अछि। लोकसाहित्यक दस्तावेजीकरणक महत्त्व खेलगीतक सन्दर्भमे आरो स्पष्ट होइत अछि: लेखक सामग्री बचौने छथि; अगिला पीढ़ीक शोधक काज ओकर धुन, देह, स्थान आ सामाजिक परिस्थिति बचेनाइ अछि।
ठेठी-अंगिका — खेलगीत सामाजिक सीख के माध्यम भी छै। संख्या, क्रम, चुनाउ, नियम, बारी, प्रतियोगिता, सहयोग, परिहास, भूमिका-विनिमय—ई सिनी बिना औपचारिक पाठशाला के बच्चा सीखै छै। आगू के शोध में लिंग-आधारित खेल, उमेर-वर्ग, ग्राम-नगर भेद, मौसम, विद्यालय आरो आँगन के अन्तर के अध्ययन करलों जाए तें अंगिका बाल-संस्कृति के अधिक सूक्ष्म नक्शा बनी सकै छै। लोकसाहित्य के दस्तावेजीकरण के महत्त्व खेलगीत के सन्दर्भ में आरो साफ होय छै: लेखक सामग्री बचाय कें रखलों छै; आगू के पीढ़ी के शोध के काज ओकर धुन, देह, स्थान आरो सामाजिक परिस्थिति बचाय कें रखब छै।
खेलगीत: शारीरिक, मानसिक आ सामाजिक विकासक माध्यम
ठेठी-अंगिका: खेलगीत: शारीरिक, मानसिक आरो सामाजिक विकास के माध्यम
मैथिली — मनोवैज्ञानिक कार्ल ग्रूस (Karl Groos) केँ उद्धृत करैत लेखक अंगिका बाल-खेलगीतकेँ विभिन्न श्रेणीमे बाँटने छथि: गतिशील खेलक गीत, बैसि कऽ खेलबाक गीत, उछल-कूदक गीत, आ बौद्धिक खेलगीत।
ठेठी-अंगिका — मनोवैज्ञानिक कार्ल ग्रूस (Karl Groos) कें उद्धृत करै लेखक अंगिका बाल-खेलगीतकेँ विभिन्न श्रेणी में बाँटने छै: गतिशील खेल के गीत, बैसि कऽ खेलै के गीत, उछल-कूद के गीत, आरो बौद्धिक खेलगीत।
मैथिली — गतिशील खेलक गीतक एकटा उदाहरण जतय बच्चा एक-दोसराकेँ गुदगुदी लगबैत अछि:
ठेठी-अंगिका — गतिशील खेल के गीत के एगो उदाहरण जहाँ बच्चा एक-दोसराकेँ गुदगुदी लगबैत छै:
मैथिली — अठ्ठा-पठ्ठा नुनु के सात बेटा राजा, पाता, सीत, वसन्त, कुतवा अरगड़ मारौं, बड़गड़ मारौं पानी पीएं पोखरिऐ जाऊँ नुनुवाँ कहै कांखी तर जाऊँ ।
ठेठी-अंगिका — अठ्ठा-पठ्ठा नुनु के सात बेटा राजा, पाता, सीत, वसन्त, कुतवा अरगड़ मारौं, बड़गड़ मारौं पानी पीएं पोखरिऐ जाऊँ नुनुवाँ कहै कांखी तर जाऊँ ।
मैथिली — खेलक समय जे प्रतिस्पर्धा आ सामूहिक सहभागिताक भावना बच्चा सभमे पनपैत अछि, ई गीत ओकर साक्षात् प्रमाण अछि। अंगिकाक 'कवड्डी' खेलक गीतमे सेहो ई प्रतिस्पर्धाक भाव भेटैत अछि:
ठेठी-अंगिका — खेल के समय जे प्रतिस्पर्धा आरो सामूहिक सहभागिता के भावना बच्चा सभमे पनपैत छै, ई गीत ओकर साक्षात् प्रमाण छै। अंगिका के 'कवड्डी' खेल के गीत में भी ई प्रतिस्पर्धाक भाव मिलै छै:
मैथिली — दुश्मन गोड़ा हो तैयार सरपट दौड़बौ तारो पार
ठेठी-अंगिका — दुश्मन गोड़ा हो तैयार सरपट दौड़बौ तारो पार
मैथिली — एहि प्रकारक गीत बालकमे सामाजिकता, समूहमे रहबाक प्रवृत्ति, आ हार-जीतकेँ सहजता सँ स्वीकार करबाक मनोविज्ञानक विकास करैत अछि।
ठेठी-अंगिका — ई प्रकारक गीत बालक में सामाजिकता, समूह में रहै के प्रवृत्ति, आरो हार-जीतकेँ सहजता सें स्वीकार करै के मनोविज्ञान के विकास करै छै।
8. बाल-लोककथा: मौखिक रूपान्तरण, कथा-आनन्द आ नीति
ठेठी-अंगिका: 8. बाल-लोककथा: मौखिक रूपान्तरण, कथा-आनन्द आरो नीति
मैथिली — पृष्ठ 25 सँ आरम्भ बाल-लोककथा-विवेचन ग्रन्थक कथात्मक आधार खोलैत अछि। लेखक मौखिक लोककथाक परिवर्तनशीलता स्वीकार करैत छथि: कण्ठसँ कण्ठ, पीढ़ीसँ पीढ़ी, स्थानसँ स्थान कथा रूप बदलि सकैत अछि। पशु-पक्षी, राजकुमार-राजकुमारी, चतुराई, भय, चमत्कार, नीति आ हास्य बालकथाक पारम्परिक सामग्रीक रूपमे उपस्थित अछि।
ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 25 सें आरम्भ बाल-लोककथा-विवेचन ग्रन्थ के कथात्मक आधार खोलै छै। लेखक मौखिक लोककथा के परिवर्तनशीलता स्वीकार करै छै: कण्ठ सें कण्ठ, पीढ़ी सें पीढ़ी, स्थान सें स्थान कथा रूप बदलि सकै छै। पशु-पक्षी, राजकुमार-राजकुमारी, चतुराई, भय, चमत्कार, नीति आरो हास्य बालकथा के पारम्परिक सामग्री के रूप में उपस्थित छै।
मैथिली — एहि अंशक महत्त्व ई जे बाल-साहित्यक लेखक अवधारणा लोकपरम्परामे बदलि जाइत अछि। लिखित आधुनिक कहानीमे लेखकत्व स्पष्ट रहैत अछि; लोककथामे सामूहिक पुनर्कथन स्वयं सृजन अछि। अतः ‘मूल पाठ’ खोजबाक अपेक्षा variant, प्रसंग आ कथावाचकक भूमिका महत्त्वपूर्ण बनैत अछि। पोथी एहि दिशामे पर्याप्त सामग्री दैत अछि, यद्यपि कथानक-प्रकार, motif, कथा-संरचना, पात्र-रूपान्तरण वा कथावाचकीय शैलीक व्यवस्थित विश्लेषण नहि करैत।
ठेठी-अंगिका — ई अंश के महत्त्व ई जे बाल-साहित्य के लेखक अवधारणा लोकपरम्परा में बदलि जाय छै। लिखित आधुनिक कहानी में लेखकत्व स्पष्ट रहै छै; लोककथा में सामूहिक पुनर्कथन अपने सृजन छै। अतः ‘मूल पाठ’ खोजै के अपेक्षा variant, प्रसंग आरो कथावाचक के भूमिका महत्त्वपूर्ण बनै छै। पोथी ई दिशा में पर्याप्त सामग्री दै छै, यद्यपि कथानक-प्रकार, motif, कथा-संरचना, पात्र-रूपान्तरण वा कथावाचकीय शैली के व्यवस्थित विश्लेषण नै करै।
मैथिली — नीति/शिक्षाक प्रश्न एतय फेर अबैत अछि। लोककथा व्यवहारिक बुद्धि, सावधानी, सदाचार वा परिणामक संकेत दऽ सकैत अछि, मुदा ओकर लोकप्रियता केवल उपदेशक कारण नहि। तनाव, पुनरावृत्ति, बुद्धि-विनोद, असम्भव घटना, चमत्कार, छल, उलटफेर आ कथाक सामूहिक प्रदर्शन आनन्द पैदा करैत अछि। लेखकक आरम्भिक बाल-मन सिद्धान्त लागू कएल जाए तँ उत्तम लोककथा ओ अछि जाहिमे शिक्षा कथाक रसक भीतर समाहित हो। वर्तमान पोथी मूल रूपेँ corpus-builder अछि—ओ कथा-संसारक अस्तित्व, प्रकार आ स्रोत बचबैत अछि; विस्तृत कथावैज्ञानिक आलोचना अगिला शोधक काज अछि।
ठेठी-अंगिका — नीति/शिक्षा के प्रश्न एतै फेनू आवै छै। लोककथा व्यवहारिक बुद्धि, सावधानी, सदाचार वा परिणाम के संकेत दै कें सकै छै, मतरकि ओकर लोकप्रियता केवल उपदेश के कारण नै। तनाव, पुनरावृत्ति, बुद्धि-विनोद, असम्भव घटना, चमत्कार, छेलै, उलटफेर आरो कथा के सामूहिक प्रदर्शन आनन्द पैदा करै छै। लेखक के आरम्भिक बाल-मन सिद्धान्त लागू करलों जाए तें उत्तम लोककथा ओ छै जेकरा में शिक्षा कथा के रस के भीतर समाहित हो। वर्तमान पोथी मूल रूपेँ corpus-builder छै—ओ कथा-संसार के अस्तित्व, प्रकार आरो स्रोत बचावै छै; विस्तृत कथावैज्ञानिक आलोचना आगू के शोध के काज छै।
बाल-लोककथा: यथार्थ आ कल्पनाक मिश्रण
ठेठी-अंगिका: बाल-लोककथा: यथार्थ आरो कल्पनाक मिश्रण
मैथिली — बाल-लोककथा बिना कोनो बाल-साहित्यक समीक्षा अधूरी रहत। डॉ. अमरेन्द्र ई स्थापित करैत छथि जे लोककथा वस्तुतः बाल-साहित्य हे अछि, किएक तँ एहिमे जे कौशल आ फंतासी (Fantasy) अछि, ओ बच्चाक मनोविज्ञानकेँ सन्तुष्ट करैत अछि। पोथीमे अंग प्रदेशक ऐतिहासिकता पर गम्भीर विमर्श कएल गेल अछि। आचार्य चतुरसेन आ रामधारी सिंह दिनकरक सन्दर्भ दैत लेखक बतबैत छथि जे प्राचीन कालमे अंग प्रदेशक निवासी 'चम्पा' (भागलपुर) सँ हिन्द-चीन (वियतनाम, कम्बोडिया) धरि अपन उपनिवेश स्थापित केने छलाह, जकर कारणेँ अंगिका लोककथाक प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशियाक साहित्यमे सेहो भेटैत अछि। फाहियान आ विक्रमशिला विश्वविद्यालयक सन्दर्भ एहि ऐतिहासिकताकेँ प्रमाणित करैत अछि।
ठेठी-अंगिका — बाल-लोककथा बिना कोनो बाल-साहित्य के समीक्षा अधूरी रहत। डॉ. अमरेन्द्र ई स्थापित करै छै जे लोककथा असल में बाल-साहित्य हे छै, काहेकि तें ई में जे कौशल आरो फंतासी (Fantasy) छै, ऊ बच्चा के मनोविज्ञान केेँ सन्तुष्ट करै छै। पोथी में अंग प्रदेश के ऐतिहासिकता पर गम्भीर विमर्श करलों गेलों छै। आचार्य चतुरसेन आरो रामधारी सिंह दिनकरक सन्दर्भ दै लेखक बतावै छै जे प्राचीन काल में अंग प्रदेश के निवासी 'चम्पा' (भागलपुर) सें हिन्द-चीन (वियतनाम, कम्बोडिया) तक अपन उपनिवेश स्थापित केने छेलै, जकर कारणेँ अंगिका लोककथा के प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशियाक साहित्य में भी मिलै छै। फाहियान आरो विक्रमशिला विश्वविद्यालयक सन्दर्भ ई ऐतिहासिकताकेँ प्रमाणित करै छै।
मैथिली — मीना तिवारी द्वारा सम्पादित 'चलौ खिस्सा के गाँव' आ वाञ्छा भट्ट अंजनक 'फुलझामर' सन लोककथा सङ्ग्रहक पोथीमे चर्चा अछि। एकटा प्रसिद्ध अंगिका बाल-लोककथा 'टेंगटा' क पूर्ण उद्धरण पोथीमे देल गेल अछि:
ठेठी-अंगिका — मीना तिवारी द्वारा सम्पादित 'चलौ खिस्सा के गाँव' आरो वाञ्छा भट्ट अंजनक 'फुलझामर' जइसन लोककथा सङ्ग्रह के पोथी में चर्चा छै। एगो प्रसिद्ध अंगिका बाल-लोककथा 'टेंगटा' के पूर्ण उद्धरण पोथी में देलों गेलों छै:
मैथिली — एकटा किसान छेलै, वें एक दिन हटिया सँ मछली किनी के आनलगै। किसैनी मछली रांन्है ले बैठली। जहीना मछलीवाला पोटली खोललकी कि एकटा टेंगटा वैमे सँ निकली के कोठी तरो मे नुकाय गेलै ।... "माय! माय आजू सँ तों हमरी माय, हम्में तोरो बेटा। दे, हम्में कलौवो लेके बाबू लग जैबै।"
ठेठी-अंगिका — एकटा किसान छेलै, वें एक दिन हटिया सँ मछली किनी के आनलगै। किसैनी मछली रांन्है ले बैठली। जहीना मछलीवाला पोटली खोललकी कि एकटा टेंगटा वैमे सँ निकली के कोठी तरो मे नुकाय गेलै ।... "माय! माय आजू सँ तों हमरी माय, हम्में तोरो बेटा। दे, हम्में कलौवो लेके बाबू लग जैबै।"
मैथिली — 'टेंगटा' कथाक समीक्षा: ई कथा एकटा टेंगटा (माछक एकटा प्रजाति) आ किसानक बीचक सम्बन्धकेँ देखबैत अछि। बच्चा सभकेँ पशुपक्षी आ जलीय जीव-जन्तुसँ गप करबाक जे फैंटेसी होइत अछि, ओ एहि कथाक प्राण अछि। टेंगटा जखन एकटा बालकक रूप लऽ कऽ किसानक काज करैत अछि, अपन तीक्ष्ण बुद्धिसँ (चूहा, बाघ, आ आगिक मददि सँ) राजाकेँ सबक सिखबैत अछि, आ अन्ततः किसानकेँ सुखी करैत अछि। ई कथा बाल-मनकेँ ई सन्देश दैत अछि जे छोट सँ छोट जीवमे सेहो अदम्य साहस आ सामर्थ्य भऽ सकैत अछि। नीतिक ई सन्देश बिना कोनो उपदेशात्मक बोझक बच्चाकेँ देल गेल अछि।
ठेठी-अंगिका — 'टेंगटा' कथा के समीक्षा: ई कथा एगो टेंगटा (माछक एगो प्रजाति) आरो किसानक बीचक सम्बन्धकेँ देखावै छै। बच्चा सभकेँ पशुपक्षी आरो जलीय जीव-जन्तु सें गप करै के जे फैंटेसी होय छै, ऊ ई कथा के प्राण छै। टेंगटा जबें एगो बालक के रूप लऽ कऽ किसानक काज करै छै, अपन तीक्ष्ण बुद्धि सें (चूहा, बाघ, आरो आगि के मददि सँ) राजाकेँ सबक सिखावै छै, आरो अन्ततः किसानकेँ सुखी करै छै। ई कथा बाल-मनकेँ ई सन्देश दै छै जे छोट सें छोट जीव में भी अदम्य साहस आरो सामर्थ्य होय कें सकै छै। नीति के ई सन्देश बिना कोनो उपदेशात्मक बोझक बच्चा केेँ देलों गेलों छै।
9. अनुवाद: बाल-साहित्यक विस्तार आ भाषा-निर्माण
ठेठी-अंगिका: 9. अनुवाद: बाल-साहित्य के विस्तार आरो भाषा-निर्माण
मैथिली — आधुनिक अंगिका बाल-साहित्यक इतिहासमे अनुवादकेँ पोथी उल्लेखनीय स्थान दैत अछि। पृष्ठ 44 सँ लेखक अन्य भाषाक बालोपयोगी कथा, संस्कृतक कथा-परम्परा, जातक-कथा, बाइबिल-सम्बद्ध कथा आदि रूपान्तरणक चर्चा करैत छथि। ई सामग्री एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तर्क सामने अनैत अछि: आधुनिक लिखित बाल-गद्यक आरम्भ केवल मौलिक रचनासँ नहि, अनुवाद आ पुनर्कथनसँ सेहो होइत अछि।
ठेठी-अंगिका — आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य के इतिहास में अनुवाद कें पोथी उल्लेखनीय स्थान दै छै। पृष्ठ 44 सें लेखक अन्य भाषा के बालोपयोगी कथा, संस्कृत के कथा-परम्परा, जातक-कथा, बाइबिल-सम्बद्ध कथा आदि रूपान्तरण के चर्चा करै छै। ई सामग्री एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तर्क सामने अनै छै: आधुनिक लिखित बाल-गद्य के आरम्भ केवल मौलिक रचना सें नै, अनुवाद आरो पुनर्कथन सें भी होय छै।
मैथिली — सीमित संस्थागत संसाधनवला भाषिक साहित्य लेल अनुवाद द्वितीयक कर्म नहि। अनुवाद नब विधा परिचित करबैत अछि, बालक लेल उपलब्ध पाठक संख्या बढ़बैत अछि, लिखित गद्यक शब्दावली विकसित करैत अछि, विश्वकथाकेँ स्थानीय भाषिक अनुभवमे आनैत अछि। एहि अर्थमे पोथीक अनुवाद-अध्याय भाषा-निर्माणक इतिहास सेहो अछि।
ठेठी-अंगिका — सीमित संस्थागत संसाधनवला भाषिक साहित्य लेल अनुवाद द्वितीयक कर्म नै। अनुवाद नब विधा परिचित करावै छै, बालक लेल उपलब्ध पाठक संख्या बढ़ावै छै, लिखित गद्य के शब्दावली विकसित करै छै, विश्वकथा कें स्थानीय भाषिक अनुभव में अनै छै। ई अर्थ में पोथी के अनुवाद-अध्याय भाषा-निर्माण के इतिहास भी छै।
मैथिली — मुदा ई खण्ड भविष्यक गहन शोधक निमंत्रण दैत अछि। पोथी प्रायः कौन कथा अनूदित भेल, के अनुवाद केलनि, कोन परम्परासँ आयल—एहि स्तर धरि रहैत अछि। स्रोत-पाठ आ अंगिका लक्ष्य-पाठक तुलनात्मक विश्लेषण कम अछि। बालक लेल रूपान्तरणमे कथानक घटाओल-बढ़ाओल गेल कि नहि? कठिन सांस्कृतिक संकेत स्थानीय बनाओल गेल कि नहि? नाम, भोजन, धर्म, हास्य, संवाद, लय आ नैतिक निष्कर्ष कोना बदलल? ई सभ प्रश्न अनुवाद-अध्ययनक अगिला चरण अछि।
ठेठी-अंगिका — मतरकि ई खण्ड आगू के गहन शोध के निमंत्रण दै छै। पोथी प्रायः कौन कथा अनूदित होलै, के अनुवाद केलकै, कोन परम्परा सें आयलों—ई स्तर तक रहै छै। स्रोत-पाठ आरो अंगिका लक्ष्य-पाठक तुलनात्मक विश्लेषण कम छै। बालक लेल रूपान्तरण में कथानक घटावलों-बढ़ावलों गेलों कि नै? कठिन सांस्कृतिक संकेत स्थानीय बनावलों गेलों कि नै? नाम, भोजन, धर्म, हास्य, संवाद, लय आरो नैतिक निष्कर्ष केना बदलों? ई सिनी प्रश्न अनुवाद-अध्ययन के आगू के चरण छै।
मैथिली — Reynolds मौखिक आ मुद्रित परम्पराक पीढ़ीगत रूपान्तरणक चर्चा करैत छथि। एहि आलोकमे अंगिका बाल-साहित्यक अनुवाद-इतिहासकेँ भाषा-बीच यात्रा मात्र नहि, माध्यम-बीच यात्राक रूपमे सेहो विस्तार देल जा सकैत अछि—कथा सँ चित्र-पोथी, रेडियो, नाटक, ऑडियो वा डिजिटल रूप धरि। मूल पोथी एहि सम्भावनाक ऐतिहासिक आधार देइत अछि।
ठेठी-अंगिका — Reynolds मौखिक आरो मुद्रित परम्परा के पीढ़ीगत रूपान्तरण के चर्चा करै छै। ई आलोक में अंगिका बाल-साहित्य के अनुवाद-इतिहास कें भाषा-बीच यात्रा मात्र नै, माध्यम-बीच यात्रा के रूप में भी विस्तार देलों जाय सकै छै—कथा सें चित्र-पोथी, रेडियो, नाटक, ऑडियो वा डिजिटल रूप तक। मूल पोथी ई सम्भावना के ऐतिहासिक आधार दै छै।
पाठ-सर्वेक्षण: दोसर अध्याय — आधुनिक परम्परा
ठेठी-अंगिका: पाठ-सर्वेक्षण : दोसरका अध्याय — आधुनिक परम्परा
मैथिली — दोसर अध्याय ऐतिहासिक गहराइक कारणें मूल्यवान अछि। लेखक अनुवादित बाल-लोककथाक इतिहास ठेठ अठारहम शताब्दीक ईसाई पादरी (फादर अण्टो नियोकूर)क बाइबिल-कथानुवादसँ प्रारम्भ कए, ग्रियर्सनक “लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया” आ डॉ. माहेश्वरी सिंह महेशक ग्रन्थ धरि पहुँचैत छथि; एहि क्रममे “अंगिका कथा-सरोवर” (२००६)क अठारह संस्कृत-मूलक कथा आ श्रीउमेशक योगदानक चर्चा अछि। आधुनिक मौलिक बाल-कवितामे ओ विषयगत वर्गीकरण—यथा गतिशील प्रकृतिक काव्य—लगबैत छथि आ डॉ. मृदुला शुक्ला (सोन चिरैया), सान्त्वना साह, दिनेश बाबा, अनिरुद्ध प्रसाद विमल, चन्द्रप्रकाश जगप्रिय आदि कविक चर्चा करैत छथि।
ठेठी-अंगिका — दोसरका अध्याय अपन ऐतिहासिक गहराई के कारणें कीमती छै। लेखक अनुवादित बाल-लोककथा के इतिहास ठेठ अठारहवीं सदी के ईसाई पादरी (फादर अण्टो नियोकूर) के बाइबिल-कथा-अनुवाद सें सुरू करी कें, ग्रियर्सन के “लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इण्डिया” आरो डॉ. माहेश्वरी सिंह महेश के ग्रन्थ तक पहुँचै छै; एहि क्रम में “अंगिका कथा-सरोवर” (२००६) के अठारह गो संस्कृत-मूल के कथा आरो श्रीउमेश के योगदान के चर्चा छै। आधुनिक मौलिक बाल-कविता में ऊ विषय के आधार पर वर्गीकरण—जइसन गतिशील परकृति के काव्य—लगाबै छै आरो डॉ. मृदुला शुक्ला (सोन चिरैया), सान्त्वना साह, दिनेश बाबा, अनिरुद्ध प्रसाद विमल, चन्द्रप्रकाश जगप्रिय आदि कवि के चर्चा करै छै।
अनुवाद-मीमांसा: एक गहन विवेचन
ठेठी-अंगिका: अनुवाद-मीमांसा : एगो गहरा विवेचन
मैथिली — अनुवाद-प्रसंग एहि पोथीक दोसर मौलिक योगदान थिक, आ एतय एकटा पूरा अनुवाद-इतिहासक रूपरेखा भेटैत अछि। ध्यान देबाक बात ई जे अंगिकाक सभसँ पुरान उपलब्ध “अनुवाद”—ग्रियर्सनक सर्वेमे संकलित उड़ाहा-पुत्रक (Prodigal Son) दृष्टान्त—मूलतः एकटा मिशनरी आ औपनिवेशिक भाषा-नमूना थिक, कोनो देशज साहित्यिक कर्म नहि। एहिसँ एकटा पैघ प्रश्न ठाढ़ होइत अछि: अनुवाद भाषा-प्रलेखन थिक, आकि साहित्य? पोथीक अन्तर्निहित उत्तर स्पष्ट अछि—ओ अंगिका अनुवाद-परम्परा केँ भाषाविदक नमूना-शीशीसँ निकालि, जीवन्त बाल-साहित्यक कोठलीमे राखि दैत अछि। ई स्थानान्तरण सांस्कृतिक दृष्टिएँ महत्त्वपूर्ण थिक।
ठेठी-अंगिका — अनुवाद के परसंग ई पोथी के दोसरका मौलिक देन छै, आरो एहिजा एगो पूरा अनुवाद-इतिहास के रूपरेखा मिलै छै। गौर करै के बात ई छै कि अंगिका के सबसें पुरान उपलब्ध “अनुवाद”—ग्रियर्सन के सर्वे में संकलित उड़ाहा-बेटा (Prodigal Son) के दृष्टान्त—मूल रूप सें एगो मिशनरी आरो औपनिवेशिक भाषा-नमूना छै, कोय देसज साहित्यिक काम नै। एहिसें एगो बड़का सवाल ठाढ़ होय छै : अनुवाद भाषा-प्रलेखन छै, आकि साहित्य? पोथी के भीतरी जबाब साफ छै—ऊ अंगिका के अनुवाद-परम्परा के भाषाविद के नमूना-सीसी सें निकाली कें, जीता-जागता बाल-साहित्य के कोठली में राखी दै छै। ई अदला-बदली सांस्कृतिक नजर सें बड़ा जरूरी छै।
मैथिली — एहि अध्यायक सभसँ आत्म-प्रकाशक अंश ओ थिक जतय लेखक अपन कएल तीनू उर्दू बाल-उपन्यास-अनुवाद—जंगल रों पहचान, शिकार आरो शिकारी आ फैसल रों जासूसी—पर विचार करैत छथि। एतय ओ अपन अनुवाद-सिद्धान्त केँ अभ्याससँ गढ़ैत छथि। ओ स्रोत-निष्ठ नहि, लक्ष्य-निष्ठ अनुवादक छथि: मूलक क्रूर दृश्य केँ ओ जानि-बूझि कए एहन रूपमे बदलि दैत छथि जाहिसँ बाल-मन भयभीत नहि होअय, आ ‘शिकार आरो शिकारी’मे पर्यावरण-रक्षाक नव भाव धरि जोड़ि दैत छथि; पात्रक नाम धरि बदलि दैत छथि। ई अनुवाद वस्तुतः अनुसृजन (भावानुवाद) थिक, जकर कसौटी समतुल्यता नहि, प्रयोजन (बाल-उपयुक्तता) अछि। बाल-साहित्यक अनुवाद स्वभावतः रूपान्तर बनि जाइत अछि—इएह बात लेखक अपन कर्मसँ सिद्ध करैत छथि।
ठेठी-अंगिका — एहि अध्याय के सबसें अपने-के-खोलै वाला हिस्सा ऊ छै जहाँ लेखक अपन कैलों तीनू उर्दू बाल-उपन्यास-अनुवाद—जंगल रों पहचान, शिकार आरो शिकारी आरो फैसल रों जासूसी—पर विचार करै छै। एहिजा ऊ अपन अनुवाद-सिद्धान्त के अभ्यास सें गढ़ै छै। ऊ स्रोत-निष्ठ नै, लक्ष्य-निष्ठ अनुवादक छै : मूल के करूर दृश्य के ऊ जानी-बूझी कें एहन रूप में बदली दै छै जेकरा सें बाल-मन डेराय नै, आरो ‘शिकार आरो शिकारी’ में पर्यावरण-रक्षा के नया भाव तक जोड़ी दै छै; पात्र के नाम तक बदली दै छै। ई अनुवाद असल में अनुसृजन (भावानुवाद) छै, जेकर कसौटी बरोबरी नै, परयोजन (बाल-उपयुक्तता) छै। बाल-साहित्य के अनुवाद अपने-आप रूपान्तर बनी जाय छै—इहे बात लेखक अपन काम सें साबित करी दै छै।
मैथिली — एहि प्रसंगमे लेखकक सभसँ पैघ मीमांसा-दृष्टि ओतय अछि जतय ओ लक्ष्य करैत छथि जे “अंगिका कथा-सरोवर”क किछु कथा (चाणक्य आरो नंदवंश, पंडितराज जगन्नाथ आदि)मे मूल संस्कृत श्लोक केँ कथाक बीच राखि देबासँ जनसामान्यक कथारस टूटि जाइत अछि। ई अत्यन्त सूक्ष्म निरीक्षण थिक—अनुवादक केँ शास्त्रीय प्रामाणिकता (श्लोक बचाकए राखब) आ रसात्मक सम्प्रेषण (प्रवाह) दुनूमे सँ एकटा चुनए पड़ैत अछि; आ बाल तथा जनसामान्य पाठक लेल रसक पक्ष भारी पड़ैत अछि। लेखक स्पष्टतः रस-सम्प्रेषणक पक्षमे ठाढ़ छथि। तथापि, समीक्षकीय सन्तुलनक तकाजा अछि जे किछु सीमा सेहो कहल जाय। एक तँ, अनुवादक स्वयं समीक्षक होएबाक कारणें ई मीमांसा कतहु-कतहु रचना-प्रक्रियाक आत्म-भाष्य बनि जाइत अछि, तटस्थ अनुवाद-आलोचना नहि। दोसर, पोथी अनुकूलनक लाभ (बाल-रक्षा) तँ गनबैत अछि, मुदा ओकर मूल्य (क्षति) नहि तौलैत अछि—जातक-कथाक नैतिक कठोरता आकि लोककथाक ओ भय, जे शिक्षणक दृष्टिएँ सार्थक होइत अछि, अनुकूलनमे कतेक हेरा जाइत अछि, ताहि पर विचार नहि भेल। पूर्ण अनुवाद-मीमांसा अनुकूलनक लाभ आ हानि—दुनू केँ तराजू पर चढ़बितए।
ठेठी-अंगिका — एहि परसंग में लेखक के सबसें बड़का मीमांसा-नजर ऊ छै जहाँ ऊ लख करै छै कि “अंगिका कथा-सरोवर” के कुछ कथा (चाणक्य आरो नंदवंश, पंडितराज जगन्नाथ आदि) में मूल संस्कृत श्लोक के कथा के बीच में राखी देला सें जनसामान्य के कथारस टूटी जाय छै। ई बड़ा बारीक निरीक्षण छै—अनुवादक के शास्त्रीय परमाणिकता (श्लोक बचा कें राखब) आरो रसात्मक सम्प्रेषण (बहाव) दुन्नु में सें एक के चुनै पड़ै छै; आरो बाल आरो जनसामान्य पाठक लेली रस के पलड़ा भारी पड़ै छै। लेखक साफ तौर पर रस-सम्प्रेषण के पक्ष में ठाढ़ छै। तइयो, समीक्षा के संतुलन के तकाजा छै कि कुछ सीमा भी कहलों जाय। एक तें, अनुवादक अपने समीक्षक होय के कारणें ई मीमांसा कहीं-कहीं रचना-परक्रिया के अपने-भाष्य बनी जाय छै, तटस्थ अनुवाद-आलोचना नै। दोसर, पोथी अनुकूलन के फायदा (बाल-रक्षा) तें गिनाबै छै, मतरकि ओकर दाम (नुकसान) नै तौलै छै—जातक-कथा के नैतिक कठोरता आकि लोककथा के ऊ डर, जे सिखाबै के नजर सें सारथक होय छै, अनुकूलन में कतेक हेराय जाय छै, ओकरा पर विचार नै भेलै। पूरा अनुवाद-मीमांसा अनुकूलन के फायदा आरो नुकसान—दुन्नु के तराजू पर चढ़ाबितै।
खण्ड २: आधुनिक अंगिका बाल-साहित्यक उद्भव आ विकास
ठेठी-अंगिका: खण्ड २: आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य के उद्भव आरो विकास
मैथिली — ग्रन्थक दोसर खण्डमे अंगिका बाल-साहित्यक आधुनिक युगक प्रवृत्तिक सूक्ष्म विश्लेषण कएल गेल अछि। आधुनिक कालमे साहित्यकार लोकनि अनुवाद सँ लऽ कऽ मौलिक रचना धरि, बाल-साहित्यकेँ नव दिशा प्रदान केलन्हि।
ठेठी-अंगिका — ग्रन्थ के दोसर खण्ड में अंगिका बाल-साहित्य के आधुनिक युग के प्रवृत्ति के सूक्ष्म विश्लेषण करलों गेलों छै। आधुनिक काल में साहित्यकार लोग सिनी अनुवाद सें लऽ कऽ मौलिक रचना तक, बाल-साहित्य केेँ नव दिशा प्रदान करलकै।
अनुवादित साहित्य आ वैश्वीकरणक प्रभाव
ठेठी-अंगिका: अनुवादित साहित्य आरो वैश्वीकरणक प्रभाव
मैथिली — डॉ. अमरेन्द्र अपन पोथीमे बतबैत छथि जे अंगिका बाल-साहित्यक आधुनिक यात्रा विदेशी आ अन्य भारतीय भाषाक कथा सभक अनुवाद सँ भेल। एहि क्रममे ईसाइ पादरी सभ द्वारा बाइबिलक कथा सभक अनुवाद ('मुक्ति के मार्ग', 'सच्चा जीवन के मार्ग', 'यीशू मसीह के कहानी') सँ लऽ कऽ आधुनिक कालमे नन्दलाल यादव 'सारस्वत' द्वारा चीनी लोककथाक अनुवाद धरि उल्लेखनीय अछि।
ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र अपन पोथी में बतावै छै जे अंगिका बाल-साहित्य के आधुनिक यात्रा विदेशी आरो अन्य भारतीय भाषा के कथा सिनी के अनुवाद सें भेल। ई क्रम में ईसाइ पादरी सिनी द्वारा बाइबिल के कथा सिनी के अनुवाद ('मुक्ति के मार्ग', 'सच्चा जीवन के मार्ग', 'यीशू मसीह के कहानी') सें लऽ कऽ आधुनिक काल में नन्दलाल यादव 'सारस्वत' द्वारा चीनी लोककथा के अनुवाद तक उल्लेखनीय छै।
मैथिली — चीनी लोककथा 'बाढ़ि पर हेना के कब्जा पेलकै चीन देश के महान यू' क अंगिका अनुवादक महत्ता: पोथीमे चीनक 'येलो रिवर' (Yellow River) वा बाढ़िक विभीषिका सँ जुड़ल एकटा कथाक अंगिका रूपान्तरण देल गेल अछि। ई कथा पर्यावरण-संरक्षण आ जल-प्रबन्धनक दृष्टिकोण सँ बड्ड महत्त्वपूर्ण अछि।
ठेठी-अंगिका — चीनी लोककथा 'बाढ़ि पर हेना के कब्जा पेलकै चीन देश के महान यू' के अंगिका अनुवाद के महत्ता: पोथी में चीन के 'येलो रिवर' (Yellow River) वा बाढ़ि के विभीषिका सें जुड़ल एगो कथा के अंगिका रूपान्तरण देलों गेलों छै। ई कथा पर्यावरण-संरक्षण आरो जल-प्रबन्धनक दृष्टिकोण सें बहुत महत्त्वपूर्ण छै।
मैथिली — "बाढ़ि रोकै के उपाय सोचै लागलै। वें सोचलगै कि जों गामो के बाहर बाँध बनाय देलो जाय, ते बोहो पर कब्जा पालो जावै सकै छै।"
ठेठी-अंगिका — "बाढ़ि रोकै के उपाय सोचै लागलै। वें सोचलगै कि जों गामो के बाहर बाँध बनाय देलो जाय, ते बोहो पर कब्जा पालो जावै सकै छै।"
मैथिली — समीक्षात्मक दृष्टिसँ, अंग प्रदेश (जे स्वयं कोशी आ गङ्गाक बाढ़ि सँ त्रस्त रहैत अछि) क बच्चा लेल चीनक बाढ़ि प्रबन्धनक ई कथा मात्र फंतासी नहि, अपितु एकटा वैज्ञानिक जागरूकताक पाठ अछि। बाल-साहित्यक माध्यम सँ वैश्विक समस्या (बाढ़ि आ पर्यावरण) केँ स्थानीय भाषा (अंगिका) मे प्रस्तुत करब अनुवादकक आ एहि पोथीक लेखकक एकटा क्रान्तिकारी कदम अछि। एकर अतिरिक्त डॉ. अमरेन्द्र स्वयं संस्कृतक पञ्चतन्त्र आ जातक कथाक अंगिका अनुवाद 'अंगिका कथा-सरोवर' नामक पोथीमे केलन्हि अछि।
ठेठी-अंगिका — समीक्षात्मक दृष्टि सें, अंग प्रदेश (जे अपने कोशी आरो गङ्गाक बाढ़ि सें त्रस्त रहै छै) के बच्चा लेली चीन के बाढ़ि प्रबन्धन के ई कथा मात्र फंतासी नै छै, बल्कि एगो वैज्ञानिक जागरूकता के पाठ छै। बाल-साहित्य के माध्यम सें वैश्विक समस्या (बाढ़ि आरो पर्यावरण) कें स्थानीय भाषा (अंगिका) में प्रस्तुत करब अनुवादक के आरो ई पोथी के लेखक के एगो क्रान्तिकारी कदम छै। एकर अतिरिक्त डॉ. अमरेन्द्र अपने संस्कृतक पञ्चतन्त्र आरो जातक कथा के अंगिका अनुवाद 'अंगिका कथा-सरोवर' नामक पोथी में करलकै छै।
10. बाल-उपन्यास: विस्तृत सामाजिक संसारक प्रवेश
ठेठी-अंगिका: 10. बाल-उपन्यास: विस्तृत सामाजिक संसार के प्रवेश
मैथिली — पृष्ठ 51 पर ‘बाल-उपन्यास’ शीर्षकसँ चर्चा आधुनिक बाल-गद्यक एक महत्त्वपूर्ण विस्तार अछि। डॉ. अमरेन्द्रक ‘बण्टा’ केँ अंगिका बाल-उपन्यासक रूपमे विवेचित कएल गेल अछि। पोथीक अनुसार कथा बालकक जीवन, विद्यालय, शिक्षक, सामाजिक परिस्थिति आ पर्यावरणसँ जुड़ल अनुभवक विस्तृत रूप प्रस्तुत करैत अछि।
ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 51 पर ‘बाल-उपन्यास’ शीर्षक सें चर्चा आधुनिक बाल-गद्य के एक महत्त्वपूर्ण विस्तार छै। डॉ. अमरेन्द्र के ‘बण्टा’ कें अंगिका बाल-उपन्यास के रूप में विवेचित करलों गेलों छै। पोथी के अनुसार कथा बालक के जीवन, विद्यालय, शिक्षक, सामाजिक परिस्थिति आरो पर्यावरण सें जुड़लों अनुभव के विस्तृत रूप प्रस्तुत करै छै।
मैथिली — उपन्यासक महत्त्व बाल-कहानीसँ केवल आकारक अन्तर नहि। लम्बा कथानक बाल-पात्रकेँ समयक भीतर विकसित होएबाक अवसर दैत अछि; परिवार, विद्यालय, साथी, समाज, नैतिक दुविधा आ परिवेशक बीच सम्बन्ध क्रमिक बनैत अछि। एहि कारण बाल-उपन्यास भाषाक कथात्मक क्षमता सेहो जाँचैत अछि। ‘बण्टा’क स्वतंत्र डिजिटल पाठ Gadya Kosh पर उपलब्ध होएब एहि कृतिक बाहरी अस्तित्वक उपयोगी पुष्टि अछि। बाहरी अंगिका लेखक-सूची सेहो ‘बण्टा’ केँ उपन्यासक रूपमे दर्ज करैत अछि।
ठेठी-अंगिका — उपन्यास के महत्त्व बाल-कहानी सें केवल आकार के अन्तर नै। लम्बा कथानक बाल-पात्र कें समय के भीतर विकसित होय के अवसर दै छै; परिवार, विद्यालय, साथी, समाज, नैतिक दुविधा आरो परिवेश के बीच सम्बन्ध क्रमिक बनै छै। ई कारण बाल-उपन्यास भाषा के कथात्मक क्षमता भी जाँचै छै। ‘बण्टा’ के स्वतंत्र डिजिटल पाठ Gadya Kosh पर उपलब्ध होब ई कृति के बाहरी अस्तित्व के उपयोगी पुष्टि छै। बाहरी अंगिका लेखक-सूची भी ‘बण्टा’ कें उपन्यास के रूप में दर्ज करै छै।
मैथिली — बाल-उपन्यासक चर्चा पूर्ववर्ती खण्डसभक तुलनामे कम विस्तार पबैत अछि, मुदा समग्र सामग्रीसँ स्पष्ट अछि जे आधुनिक अंगिका बाल-साहित्यक विकास-रेखामे उपन्यासक स्थान उल्लेखनीय अछि, भले corpus कविता तुलनामे छोट हो। एहि विधापर भविष्यक शोध पात्र-विकास, विद्यालयीय अनुभव, ग्रामीणता, बाल-स्वायत्तता, कथावाचक, भाषा-स्तर आ आयुवर्गक पाठकीयता जाँचि सकैत अछि।
ठेठी-अंगिका — बाल-उपन्यास के चर्चा पहिलका खण्ड सिनी के तुलना में कम विस्तार पावै छै, मतरकि समग्र सामग्री सें साफ छै जे आधुनिक अंगिका बाल-साहित्य के विकास-रेखा में उपन्यास के स्थान उल्लेखनीय छै, भले corpus कविता तुलना में छोट हो। ई विधापर आगू के शोध पात्र-विकास, विद्यालयीय अनुभव, ग्रामीणता, बाल-स्वायत्तता, कथावाचक, भाषा-स्तर आरो आयुवर्ग के पाठकीयता जाँच कें सकै छै।
बाल-उपन्यास: 'बण्टा' क वैचारिक आख्यान
ठेठी-अंगिका: बाल-उपन्यास: 'बण्टा' के वैचारिक आख्यान
मैथिली — अंगिका भाषाक एकमात्र बाल-उपन्यास 'बण्टा' (रचनाकार: डॉ. अमरेन्द्र) क समीक्षा एहि पोथीमे कएल गेल अछि। ई उपन्यास कोनो जादुई वा तिलस्मी कथा नहि अछि, बरु ई बाल-मनोविज्ञान, बच्चाक शिक्षाक प्रति उदासीनता, शिक्षकक अमानवीय व्यवहार (शिक्षक जमुआर) आ आदर्श शिक्षा-पद्धति (शिक्षक इकबाल) पर केन्द्रित अछि।
ठेठी-अंगिका — अंगिका भाषा के एकमात्र बाल-उपन्यास 'बण्टा' (रचनाकार: डॉ. अमरेन्द्र) के समीक्षा ई पोथी में करलों गेलों छै। ई उपन्यास कोनो जादुई वा तिलस्मी कथा नै छै, बरु ई बाल-मनोविज्ञान, बच्चा के शिक्षा के प्रति उदासीनता, शिक्षक के अमानवीय व्यवहार (शिक्षक जमुआर) आरो आदर्श शिक्षा-पद्धति (शिक्षक इकबाल) पर केन्द्रित छै।
मैथिली — एहि उपन्यासक सबसँ पैघ विशेषता ई अछि जे एहिमे भारतक पूर्व राष्ट्रपति आ मिसाइल मैन डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा बच्चा लेल देल गेल दस (१०) आचार-सिद्धान्तकेँ बाल-नायक 'बण्टा' क जीवन-दर्शनक रूपमे प्रस्तुत कएल गेल अछि।
ठेठी-अंगिका — ई उपन्यास के सब सें बड़का विशेषता ई छै जे ई में भारतक पूर्व राष्ट्रपति आरो मिसाइल मैन डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम द्वारा बच्चा लेली देलों गेलों दस (१०) आचार-सिद्धान्तकेँ बाल-नायक 'बण्टा' के जीवन-दर्शनक रूप में प्रस्तुत करलों गेलों छै।
डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलामक आचार-सिद्धान्त (अंगिका बाल-उपन्यास 'बण्टा' सँ उद्धृत)
ठेठी-अंगिका: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलामक आचार-सिद्धान्त (अंगिका बाल-उपन्यास 'बण्टा' सें उद्धृत)
मैथिली — मूल अंगिका उद्धरण: पहिलो मंत्र छेकै: हम्में आपनो पढ़ाय आरो कार्य भीतरी मनो सँ करबै आरो महान बनबै।
ठेठी-अंगिका — मूल अंगिका उद्धरण: पहिलो मंत्र छेकै: हम्में आपनो पढ़ाय आरो कार्य भीतरी मनो सँ करबै आरो महान बनबै।
मैथिली — मूल अंगिका उद्धरण: दूसरो छेकै: आबे सँ हम्में कम-से-कम दस अनपढ़ लोगो के पढ़बौ-लिखबौ सिखैबै।
ठेठी-अंगिका — मूल अंगिका उद्धरण: दूसरो छेकै: आबे सँ हम्में कम-से-कम दस अनपढ़ लोगो के पढ़बौ-लिखबौ सिखैबै।
मैथिली — मूल अंगिका उद्धरण: तेसरो मंत्र छेकै: हम्में कम-से-कम दस गाछ लगैबै आरो ओकरो अच्छा नाँखी देखभाल करबै।
ठेठी-अंगिका — मूल अंगिका उद्धरण: तेसरो मंत्र छेकै: हम्में कम-से-कम दस गाछ लगैबै आरो ओकरो अच्छा नाँखी देखभाल करबै।
मैथिली — मूल अंगिका उद्धरण: चौथो मंत्र छेकै: हम्में शहर-गाँव जाय के कम-से-कम पांचो लोगो के नशाखोरी आरो जुआ खेलै के आदत सँ मुक्ति दिलैबै।
ठेठी-अंगिका — मूल अंगिका उद्धरण: चौथो मंत्र छेकै: हम्में शहर-गाँव जाय के कम-से-कम पांचो लोगो के नशाखोरी आरो जुआ खेलै के आदत सँ मुक्ति दिलैबै।
मैथिली — मूल अंगिका उद्धरण: नौमो मंत्र छेकै: हम्में मंद बुद्धि आरो शारीरिक रूप सँ कमजोर लोगो साथें दोस्ताना व्यवहार करबै।
ठेठी-अंगिका — मूल अंगिका उद्धरण: नौमो मंत्र छेकै: हम्में मंद बुद्धि आरो शारीरिक रूप सँ कमजोर लोगो साथें दोस्ताना व्यवहार करबै।
मैथिली — मूल अंगिका उद्धरण: दशमो मंत्र छेकै: हम्में आपनो देशवासी आरो देश के सफलता पर गौरव करबै।
ठेठी-अंगिका — मूल अंगिका उद्धरण: दशमो मंत्र छेकै: हम्में आपनो देशवासी आरो देश के सफलता पर गौरव करबै।
मैथिली — 'बण्टा' बाल-साहित्यक एकटा आदर्श मानक स्थापित करैत अछि। बाल-साहित्यक उद्देश्य मात्र मनोरञ्जन नहि, अपितु चारित्रिक निर्माण (Character Building) सेहो होइत अछि। कलाम साहबक सिद्धान्तकेँ एकटा ग्रामीण अंगिका-भाषी बच्चाक माध्यम सँ स्थापित करब डॉ. अमरेन्द्रक प्रगतिशील आ राष्ट्रवादी दृष्टिकेँ दर्शाबइत अछि। उपन्यासमे भाषाक प्रवाहमयता आ संवादक चुस्ती बच्चाकेँ अन्त धरि बान्हि कऽ रखबामे सक्षम अछि।
ठेठी-अंगिका — 'बण्टा' बाल-साहित्य के एगो आदर्श मानक स्थापित करै छै। बाल-साहित्य के उद्देश्य मात्र मनोरञ्जन नै छै, बल्कि चारित्रिक निर्माण (Character Building) भी होय छै। कलाम साहबक सिद्धान्तकेँ एगो ग्रामीण अंगिका-भाषी बच्चा के माध्यम सें स्थापित करब डॉ. अमरेन्द्र के प्रगतिशील आरो राष्ट्रवादी दृष्टिकेँ दर्शाबइत छै। उपन्यासमे भाषा के प्रवाहमयता आरो संवाद के चुस्ती बच्चा केेँ अन्त तक बान्हि कऽ रखबा में सक्षम छै।
11. आधुनिक बाल-काव्य: ग्रन्थक सर्वाधिक समृद्ध क्षेत्र
ठेठी-अंगिका: 11. आधुनिक बाल-काव्य: ग्रन्थ के सर्वाधिक समृद्ध क्षेत्र
मैथिली — आधुनिक अंगिका बाल-काव्यक विवेचन पोथीक सर्वाधिक विस्तृत, विविध आ आत्मविश्वासी भाग अछि। पृष्ठ 61 सँ खेलगीत, प्रकृति, बाल-व्यक्तित्व, सामाजिक जीवन, राष्ट्रबोध, पर्यावरण, ज्ञान, तुक-लय, हास्य, कथा-आधारित गीत, गजल, खण्डकाव्य आदि अनेक रूप सामने अबैत अछि। लेखक केवल कृति-सूची नहि दैत छथि; बालोपयोगिता, शब्द-संगीत, विषय, कल्पना आ कखनो-कखनो रचनात्मक कमजोरीपर टिप्पणी सेहो करैत छथि।
ठेठी-अंगिका — आधुनिक अंगिका बाल-काव्य के विवेचन पोथी के सर्वाधिक विस्तृत, विविध आरो आत्मविश्वासी भाग छै। पृष्ठ 61 सें खेलगीत, प्रकृति, बाल-व्यक्तित्व, सामाजिक जीवन, राष्ट्रबोध, पर्यावरण, ज्ञान, तुक-लय, हास्य, कथा-आधारित गीत, गजल, खण्डकाव्य आदि अनेक रूप सामने आवै छै। लेखक केवल कृति-सूची नै दै छै; बालोपयोगिता, शब्द-संगीत, विषय, कल्पना आरो कखनियों-कखनियों रचनात्मक कमजोरीपर टिप्पणी भी करै छै।
मैथिली — बाहरी साहित्यिक सर्वेक्षण एहि निष्कर्षक स्वतंत्र समर्थन दैत अछि। Angika.com अंगिका बाल-लोककाव्यक विपुलता बतबैत अमरेन्द्रक पाँच बालगीत-संग्रह—‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’, ‘बुतरू के तुतरू’, ‘बाजै बीन बजावै तीन’, ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’, ‘तुक्तक-मुक्तक’—क उल्लेख करैत अछि; संगहि सान्त्वना साह, दिनेश बाबा, डॉ. मृदुला शुक्ला तथा ‘अंगिका बालगीत’क आन कविसभक चर्चा करैत अछि। भारतवाणी 2021 क ‘डॉ. अमरेन्द्र ग्रंथावली (खण्ड-1): अंगिका बालगीत समग्र’ केँ सेहो सूचीबद्ध करैत अछि। एतय मूल पोथीक लेखक-केंद्रित सामग्रीकेँ स्वतंत्र प्रकाशन-साक्ष्य भेटैत अछि।
ठेठी-अंगिका — बाहरी साहित्यिक सर्वेक्षण ई निष्कर्ष के स्वतंत्र समर्थन दै छै। Angika.com अंगिका बाल-लोककाव्य के विपुलता बतावै अमरेन्द्र के पाँच बालगीत-संग्रह—‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’, ‘बुतरू के तुतरू’, ‘बाजै बीन बजावै तीन’, ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’, ‘तुक्तक-मुक्तक’—के उल्लेख करै छै; संगें सान्त्वना साह, दिनेश बाबा, डॉ. मृदुला शुक्ला तथा ‘अंगिका बालगीत’ के आन कवि सिनी के चर्चा करै छै। भारतवाणी 2021 के ‘डॉ. अमरेन्द्र ग्रंथावली (खण्ड-1): अंगिका बालगीत समग्र’ कें भी सूचीबद्ध करै छै। एतै मूल पोथी के लेखक-केंद्रित सामग्री कें स्वतंत्र प्रकाशन-साक्ष्य भेटै छै।
मैथिली — काव्यक समृद्धि केवल पुस्तक-संख्यामे नहि। पोथी देखबैत अछि जे बालगीत छोट बालकक ध्वनि-आनन्दसँ किशोरक सामाजिक ज्ञान धरि, प्रकृतिसँ विज्ञान धरि, खेलसँ राष्ट्रक कल्पना धरि पसरैत अछि। एहि विस्तारक कारण बाल-काव्य अंगिका आधुनिक साहित्यक प्रयोगशाला बनि जाइत अछि—जतय लोकलय, आधुनिक विषय, प्रौढ़ विधा आ बाल-मनक मेल निरन्तर जाँचल जाइत अछि।
ठेठी-अंगिका — काव्य के समृद्धि केवल पुस्तक-संख्या में नै। पोथी देखावै छै जे बालगीत छोट बालक के ध्वनि-आनन्द सें किशोर के सामाजिक ज्ञान तक, प्रकृति सें विज्ञान तक, खेल सें राष्ट्र के कल्पना तक पसरै छै। ई विस्तार के कारण बाल-काव्य अंगिका आधुनिक साहित्य के प्रयोगशाला बनि जाय छै—जेतै लोकलय, आधुनिक विषय, प्रौढ़ विधा आरो बाल-मन के मेल निरन्तर जाँचलों जाय छै।
मैथिली — मुदा आलोचनात्मक चयनक प्रश्न एतय सर्वाधिक तीक्ष्ण अछि। लेखक स्वयं आधुनिक अंगिका बाल-काव्यक प्रमुख सर्जक छथि, तें हुनक अपन कृतिसभ स्वाभाविक रूपेँ अधिक उपस्थित अछि। एकर लाभ भीतरक साक्ष्य आ प्रकाशन-इतिहासक निकटता; जोखिम अन्य कविसभक तुलनात्मक स्थानक असमानता। भविष्यक साहित्येतिहासमे समान corpus-based कसौटी उपयोगी होएत।
ठेठी-अंगिका — मतरकि आलोचनात्मक चयन के प्रश्न एतै सर्वाधिक तीक्ष्ण छै। लेखक अपने आधुनिक अंगिका बाल-काव्य के प्रमुख सर्जक छै, तें हुनकर आपनों कृति सिनी स्वाभाविक रूपेँ अधिक उपस्थित छै। एकर लाभ भीतर के साक्ष्य आरो प्रकाशन-इतिहास के निकटता; जोखिम अन्य कवि सिनी के तुलनात्मक स्थान के असमानता। आगू के साहित्येतिहास में समान corpus-based कसौटी उपयोगी होतै।
पाठ-सर्वेक्षण: आधुनिक बाल-कविताक विषयगत वर्गीकरण
ठेठी-अंगिका: पाठ-सर्वेक्षण : आधुनिक बाल-कविता के विषयगत वर्गीकरण
मैथिली — दोसर अध्यायक तेसर स्तम्भ थिक आधुनिक मौलिक बाल-कविताक विषयगत वर्गीकरण, जतय लेखक अंगिका बाल-कविता केँ विषयक आधार पर किछु भेदमे बाँटैत छथि। मुख्य भेद अछि—गतिशील प्रकृतिक काव्य (चलैत-फिरैत प्रकृति आ जीव-जन्तु; यथा ‘जाड़’, ‘डायनासोर’, ‘कोसी मैया’, आ जीव-जन्तुक बोली-काव्य ‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’); आंचलिक परिवेशक बाल-काव्य (अंग-महाजनपदक भूगोल, वाद्य आ विशिष्ट मिठाई-गट्टा सन खाद्य; अंजनी कुमार सुमन आदि); राष्ट्रीयताक वाहक बाल-गीत (राष्ट्रीय पुरुष आ पर्व—भारत माय, तिरंगा, गांधी बाबा, अब्दुल कलाम; सान्त्वना साह आ राहुल शिवायक ‘माँटी हिन्दुस्तान के’); ज्ञान-शिक्षामूलक बाल-काव्य (गणित आ नैतिक शिक्षा—‘लालच रों फोल’क अक्कड़-बक्कड़ गणना-गीत, सुधीर कुमार प्रोग्रामरक ‘लूर’); पर्यावरण-शिक्षाक कार्यशाला; आ हास्य-व्यंग्य (‘पियक्कड़ मामा’, शंभुनाथ मिस्त्रीक हास्य-गीत)। रूप-दृष्टिएँ ओ नाट्यकाव्य आ कथागीत (डॉ. आभा पूर्वेक ‘खयाली पुलाव’) केँ सेहो अलग रेखांकित करैत छथि।
ठेठी-अंगिका — दोसरका अध्याय के तेसरका खम्भा छै आधुनिक मौलिक बाल-कविता के विषयगत वर्गीकरण, जहाँ लेखक अंगिका बाल-कविता के विषय के आधार पर कुछ भेद में बाँटै छै। मुख्य भेद ई छै—गतिशील परकृति के काव्य (चलै-फिरै वाला परकृति आरो जीव-जन्तु; जइसन ‘जाड़’, ‘डायनासोर’, ‘कोसी मैया’, आरो जीव-जन्तु के बोली-काव्य ‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’); आंचलिक परिवेश के बाल-काव्य (अंग-महाजनपद के भूगोल, वाद्य आरो खास मिठाई-गट्टा जइसन खाद्य; अंजनी कुमार सुमन आदि); राष्ट्रीयता के वाहक बाल-गीत (राष्ट्रीय पुरुष आरो परब—भारत माय, तिरंगा, गांधी बाबा, अब्दुल कलाम; सान्त्वना साह आरो राहुल शिवाय के ‘माँटी हिन्दुस्तान के’); ज्ञान-शिक्षा वाला बाल-काव्य (गणित आरो नैतिक शिक्षा—‘लालच रों फोल’ के अक्कड़-बक्कड़ गिनती-गीत, सुधीर कुमार प्रोग्रामर के ‘लूर’); पर्यावरण-शिक्षा के कार्यशाला; आरो हास्य-व्यंग्य (‘पियक्कड़ मामा’, शंभुनाथ मिस्त्री के हास्य-गीत)। रूप के नजर सें ऊ नाट्यकाव्य आरो कथागीत (डॉ. आभा पूर्वे के ‘खयाली पुलाव’) के भी अलग रेखांकित करै छै।
आधुनिक अंगिका बाल-कविता: एकटा नव विहान
ठेठी-अंगिका: आधुनिक अंगिका बाल-कविता: एगो नव विहान
मैथिली — डॉ. अमरेन्द्रक 'ढोल बजै छै ढम्मक ढम', 'बुतरू के तुतरू', 'बाजै बीन बजावै तीन' सन कविता सङ्ग्रह आधुनिक अंगिका बाल-कविताक प्रस्थान-बिन्दु अछि। एहि सङ्ग्रह सभमे पशुपक्षीक संसार सँ लऽ कऽ विज्ञानक चमत्कार धरि सब किछु अछि।
ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र के 'ढोल बजै छै ढम्मक ढम', 'बुतरू के तुतरू', 'बाजै बीन बजावै तीन' जइसन कविता सङ्ग्रह आधुनिक अंगिका बाल-कविता के प्रस्थान-बिन्दु छै। ई सङ्ग्रह सभमे पशुपक्षी के संसार सें लऽ कऽ विज्ञान के चमत्कार तक सब कुछु छै।
मैथिली — 'ढोल बजै छै ढम्मक ढम' क एकटा कविता 'बोली' मे विभिन्न जीव-जन्तुक ध्वनिक जे चित्रण अछि, ओ बच्चाकेँ ध्वन्यात्मक विज्ञान सँ परिचित करबैत अछि:
ठेठी-अंगिका — 'ढोल बजै छै ढम्मक ढम' के एगो कविता 'बोली' में विभिन्न जीव-जन्तुक ध्वनि के जे चित्रण छै, ऊ बच्चा केेँ ध्वन्यात्मक विज्ञान सें परिचित करबैत छै:
मैथिली — उल्लू ते घुघुआवै छै, मुर्गा बांग लगावै छै हिनहिनावै घोड़ा छै, गड़-गड़-गड़-गड़ सौंढा छै मूसा करै छै चू-चू-चू, कुत्ता भूकै भू-भू-भू
ठेठी-अंगिका — उल्लू ते घुघुआवै छै, मुर्गा बांग लगावै छै हिनैनावै घोड़ा छै, गड़-गड़-गड़-गड़ सौंढा छै मूसा करै छै चू-चू-चू, कुत्ता भूकै भू-भू-भू
मैथिली — सांत्वना साहक 'बाजै छै बीन', दिनेश बाबाक 'हँसी बिहनकी धूप', आ डॉ. मृदुला शुक्लाक 'सोन चिरैया' अंगिका बाल-कविताक नव-आयाम अछि। डॉ. मृदुला शुक्लाक 'सोन चिरैया' मे प्रकृतिकेँ जे आह्वान कएल गेल अछि, ओ द्रष्टव्य अछि:
ठेठी-अंगिका — सांत्वना साहक 'बाजै छै बीन', दिनेश बाबाक 'हँसी बिहनकी धूप', आरो डॉ. मृदुला शुक्लाक 'सोन चिरैया' अंगिका बाल-कविता के नव-आयाम छै। डॉ. मृदुला शुक्लाक 'सोन चिरैया' में प्रकृतिकेँ जे आह्वान करलों गेलों छै, ऊ द्रष्टव्य छै:
मैथिली — सुखलो धरती, भुखलो खेत सुखलो नद्दी, पत्थल रेत उमड़ी-घुमड़ी बरसै मेघ भरलै सब ठो ताल-तलैया सोन चिरैया, सोन चिरैया !
ठेठी-अंगिका — सुखलो धरती, भुखलो खेत सुखलो नद्दी, पत्थल रेत उमड़ी-घुमड़ी बरसै मेघ भरलै सब ठो ताल-तलैया सोन चिरैया, सोन चिरैया !
मैथिली — सुधीर कुमार प्रोग्रामरक कवितामे विज्ञानक चमत्कारकेँ बाल-सुलभ ढङ्ग सँ प्रस्तुत कएल गेल अछि। 'टेलिस्कोप' आ 'रडार' पर हुनकर कविता:
ठेठी-अंगिका — सुधीर कुमार प्रोग्रामरक कविता में विज्ञान के चमत्कारकेँ बाल-सुलभ ढङ्ग सें प्रस्तुत करलों गेलों छै। 'टेलिस्कोप' आरो 'रडार' पर हुनकर कविता:
मैथिली — वाह-वाह टेलिस्कोप दूर के देखौ बाइस्कोप, सीमा पर दुश्मन के टेबी बरसावै गरदौवा तोप।
ठेठी-अंगिका — वाह-वाह टेलिस्कोप दूर के देखौ बाइस्कोप, सीमा पर दुश्मन के टेबी बरसावै गरदौवा तोप।
मैथिली — ई कविता सभ प्रमाणित करैत अछि जे अंगिका बाल-साहित्य मात्र गाम-देहातक सीमामे बान्हल नहि अछि; ई आधुनिक विज्ञान, रडार, आ टेलिस्कोप जकाँ विषयकेँ सेहो अपन कविताक विषय बना रहल अछि। ई बाल-साहित्यक वैचारिक परिपक्वता (Ideological Maturity) क द्योतक अछि।
ठेठी-अंगिका — ई कविता सिनी प्रमाणित करै छै जे अंगिका बाल-साहित्य मात्र गाम-देहातक सीमा में बान्हल नै छै; ई आधुनिक विज्ञान, रडार, आरो टेलिस्कोप जेना विषयकेँ भी अपन कविता के विषय बना रहल छै। ई बाल-साहित्य के वैचारिक परिपक्वता (Ideological Maturity) के द्योतक छै।
राष्ट्रीय भावना आ देश-प्रेम
ठेठी-अंगिका: राष्ट्रीय भावना आरो देश-प्रेम
मैथिली — बाल-साहित्यमे राष्ट्रीयताक सञ्चार एकटा महत्त्वपूर्ण पहलू अछि। राहुल शिवाय रचित 'माटी हिन्दुस्तान के' सङ्ग्रह विशुद्ध रूपेँ देशभक्तिक बाल-गीतक सङ्ग्रह अछि। एहिमे भारतक महान विभूति—बुद्ध, महावीर, शिवाजी, सुभाष चन्द्र बोसक सङ्ग-सङ्ग अंग प्रदेशक शहीद तिलकामांझीक सेहो गान कएल गेल अछि। तिरङ्गा पर रचित ई गीत हृदयस्पर्शी अछि:
ठेठी-अंगिका — बाल-साहित्य में राष्ट्रीयता के सञ्चार एगो महत्त्वपूर्ण पहलू छै। राहुल शिवाय रचित 'माटी हिन्दुस्तान के' सङ्ग्रह विशुद्ध रूपेँ देशभक्ति के बाल-गीतक सङ्ग्रह छै। ई में भारतक महान विभूति—बुद्ध, महावीर, शिवाजी, सुभाष चन्द्र बोसक सङ्ग-सङ्ग अंग प्रदेश के शहीद तिलकामांझीक भी गान करलों गेलों छै। तिरङ्गा पर रचित ई गीत हृदयस्पर्शी छै:
मैथिली — भारत के छै शान तिरंगा लहर-लहर लहराबै। सबसे ऊपर छै केसरिया भोरे-भोर के लाली; वीर शहीदो के वासन्ती गरिमा गाबै वाली;
ठेठी-अंगिका — भारत के छै शान तिरंगा लहर-लहर लहराबै। सबसे ऊपर छै केसरिया भोरे-भोर के लाली; वीर शहीदो के वासन्ती गरिमा गाबै वाली;
मैथिली — चन्द्रप्रकाश जगप्रिय आ अंजनी कुमार सुमन सन कवि लोकनि अपन बाल-गीतमे मातृभाषा आ राष्ट्रभाषाक महत्ता पर सेहो प्रकाश डललन्हि अछि। अंगिका बाल-साहित्यमे देशक माटि सँ जुड़ल जे ई सुगन्ध अछि, ओ बच्चाकेँ अपन संस्कृति आ राष्ट्रक प्रति गर्वक अनुभव करबैत अछि।
ठेठी-अंगिका — चन्द्रप्रकाश जगप्रिय आरो अंजनी कुमार सुमन जइसन कवि लोग सिनी अपन बाल-गीत में मातृभाषा आरो राष्ट्रभाषाक महत्ता पर भी प्रकाश डललन्हि छै। अंगिका बाल-साहित्य में देशक माटि सें जुड़ल जे ई सुगन्ध छै, ऊ बच्चा केेँ अपन संस्कृति आरो राष्ट्र के प्रति गर्वक अनुभव करावै छै।
12. प्रकृति, पर्यावरण आ आधुनिक ज्ञान: विषय-विस्तारक शक्ति
ठेठी-अंगिका: 12. प्रकृति, पर्यावरण आरो आधुनिक ज्ञान: विषय-विस्तार के शक्ति
मैथिली — पृष्ठ 71 आसपास प्रकृति-कविताक विवेचन, आ पृष्ठ 81 पर पर्यावरण-शिक्षा सम्बन्धी प्रसंग, पोथीक आधुनिकता-बोधक विशेष पक्ष देखबैत अछि। प्रकृति एतय केवल फूल-पात, वर्षा, पक्षी वा ऋतु-सौन्दर्य नहि; पर्यावरणीय संकट, मनुष्यक व्यवहार, शिक्षा आ बालकक जिम्मेदारीक क्षेत्र सेहो बनैत अछि। एहि कारण लोकपरम्परासँ आयल प्रकृति-बिम्ब आधुनिक पर्यावरण-चेतनामे रूपान्तरित होइत अछि।
ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 71 आसपास प्रकृति-कविता के विवेचन, आरो पृष्ठ 81 पर पर्यावरण-शिक्षा सम्बन्धी प्रसंग, पोथी के आधुनिकता-बोध के विशेष पक्ष देखावै छै। प्रकृति एतै केवल फूल-पात, वर्षा, पक्षी वा ऋतु-सौन्दर्य नै; पर्यावरणीय संकट, मनुष्य के व्यवहार, शिक्षा आरो बालक के जिम्मेदारी के क्षेत्र भी बनै छै। ई कारण लोकपरम्परा सें आयलों प्रकृति-बिम्ब आधुनिक पर्यावरण-चेतना में रूपान्तरित होय छै।
मैथिली — लोकगीतमे प्रकृति जीवनक अभिन्न परिवेश अछि; आधुनिक बाल-काव्यमे प्रकृति कखनो सचेत विषय बनैत अछि—रक्षा करबाक, बुझबाक, वैज्ञानिक कारण जानबाक। साहित्य अनुभवक संग ज्ञानक सेतु बनैत अछि। मुदा लेखकक आरम्भिक कसौटी याद राखब जरूरी अछि: पर्यावरण-संदेश मात्र कविता नहि; बाल-मनक अनुरूप बिम्ब, लय, हास्य, प्रश्न, कथा वा नाटकीयता तकर साहित्यिक मूल्य निर्धारित करत।
ठेठी-अंगिका — लोकगीत में प्रकृति जीवन के अभिन्न परिवेश छै; आधुनिक बाल-काव्य में प्रकृति कखनियों सचेत विषय बनै छै—रक्षा करै के, बुझै के, वैज्ञानिक कारण जानै के। साहित्य अनुभव के संग ज्ञान के सेतु बनै छै। मतरकि लेखक के आरम्भिक कसौटी याद राखब जरूरी छै: पर्यावरण-संदेश मात्र कविता नै; बाल-मन के अनुरूप बिम्ब, लय, हास्य, प्रश्न, कथा वा नाटकीयता तकर साहित्यिक मूल्य निर्धारित करत।
मैथिली — ग्रन्थ पृष्ठ 95–96 क कथा-विवेचनमे आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण/टावर आ पक्षीजीवनक संकट जकाँ विषय अनैत अछि। बादक बाल-नाटकसभमे ध्वनि-प्रदूषण, जंगल, शिक्षा आ स्वास्थ्यक प्रश्न एहि आधुनिक विषय-विस्तारकेँ आरो पुष्ट करैत अछि। Reynolds बाल-साहित्यकेँ समाजक मूल्यसभमे दीक्षित करबाक संग वैकल्पिक भविष्यक कल्पना जगाबयवला साहित्य मानैत छथि; अंगिका उदाहरणसभमे पर्यावरण-विषय एही द्वैतक स्थानीय रूप देखबैत अछि।
ठेठी-अंगिका — ग्रन्थ पृष्ठ 95–96 के कथा-विवेचन में आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण/टावर आरो पक्षीजीवन के संकट जेना विषय अनै छै। बाद के बाल-नाटक सिनी में ध्वनि-प्रदूषण, जंगल, शिक्षा आरो स्वास्थ्य के प्रश्न ई आधुनिक विषय-विस्तार कें आरो पुष्ट करै छै। Reynolds बाल-साहित्य कें समाज के मूल्य सिनी में दीक्षित करै के संग वैकल्पिक आगू के कल्पना जगावै वाला साहित्य मानै छै; अंगिका उदाहरण सिनी में पर्यावरण-विषय एही द्वैत के स्थानीय रूप देखावै छै।
पर्यावरण, विज्ञान आ राष्ट्रीय चेतना: युगानुरूप साहित्य
ठेठी-अंगिका: पर्यावरण, विज्ञान आरो राष्ट्रीय चेतना: युगानुरूप साहित्य
मैथिली — बाल-साहित्यक सार्थकता तखन धरि पूर्ण नहि मानल जा सकैत अछि जखन धरि ओ नव पीढ़िकेँ आधुनिक युगक ज्वलन्त समस्या सँ परिचित नहि करबय। अंगिका बाल-साहित्य एहि निकष पर पूर्णतः खरा उतरैत अछि।
ठेठी-अंगिका — बाल-साहित्य के सार्थकता तबें तक पूर्ण नै मानल जा सकै छै जबें तक ऊ नव पीढ़िकेँ आधुनिक युग के ज्वलन्त समस्या सें परिचित नै करबय। अंगिका बाल-साहित्य ई निकष पर पूरा तरह सें खरा उतरैत छै।
मैथिली — पर्यावरण-संरक्षण: डॉ. अमरेन्द्रक 'बुतरू के तुतरू' मे सङ्कलित 'बादल आरो बुतरू' सन कविता होउ वा 'तौहरो घोर' सन कविता जाहिमे मच्छर सँ होमय वला मलेरिया आ गन्दगी पर ध्यान देल गेल अछि, एहि सभक केन्द्रमे स्वच्छता आ पर्यावरण अछि।
ठेठी-अंगिका — पर्यावरण-संरक्षण: डॉ. अमरेन्द्र के 'बुतरू के तुतरू' में सङ्कलित 'बादल आरो बुतरू' जइसन कविता होउ वा 'तौहरो घोर' जइसन कविता जाहि में मच्छर सें होमय वला मलेरिया आरो गन्दगी पर ध्यान देलों गेलों छै, ई सिनी के केन्द्र में स्वच्छता आरो पर्यावरण छै।
मैथिली — केहनो तोरो ई घर छौ/मच्छर छौ भाय, मच्छर छौ । की सिखले छैं धंधा तोंय/नाली रखभैं गंदा तोंय दलदल एंगनो-बाहर छौ/मच्छर छौ भाय, मच्छर छौ ।
ठेठी-अंगिका — केहनो तोरो ई घर छौ/मच्छर छौ भाय, मच्छर छौ । की सिखले छैं धंधा तोंय/नाली रखभैं गंदा तोंय दलदल एंगनो-बाहर छौ/मच्छर छौ भाय, मच्छर छौ ।
मैथिली — जल संरक्षण पर सेहो 'धरती के फूल' (सुधीर कुमार प्रोग्रामर) मे लिखल गेल अछि जे 'मत फेको जानी के पानी / राखो खुच्चा खांही-खंही'।
ठेठी-अंगिका — जल संरक्षण पर भी 'धरती के फूल' (सुधीर कुमार प्रोग्रामर) में लिखलों गेलों छै जे 'मत फेको जानी के पानी / राखो खुच्चा खांही-खंही'।
मैथिली — शहरीकरण आ रेडिएशनक खतरा: डॉ. आभा पूर्वेक बाल-कथा 'गौरैया-माय के डोर' मे मोबाइल टावरक रेडिएशन सँ पक्षी (विशेषतः गौरैया) क मृत्यु आ लुप्त होबय वला प्रजातिक दर्दकेँ रेखाङ्कित कएल गेल अछि। जखन गौरैया माय अपन बच्चा सँ कहैत अछि:
ठेठी-अंगिका — शहरीकरण आरो रेडिएशनक खतरा: डॉ. आभा पूर्वेक बाल-कथा 'गौरैया-माय के डोर' में मोबाइल टावरक रेडिएशन सें पक्षी (विशेषतः गौरैया) के मृत्यु आरो लुप्त होबय वला प्रजाति के दर्दकेँ रेखाङ्कित करलों गेलों छै। जबें गौरैया माय अपन बच्चा सें कहैत छै:
मैथिली — "आबे तोरा की बतयौ बेटा, हमरा सिनी के शरीर के, खास करी के दिमाग के बनावटे हेनो छै, कि टावर आरो मोबाइल सँ निकलै वाला तरंग सँ हमरो दिमाग पर बुरा असर पड़ै लागै छै।"
ठेठी-अंगिका — "आबे तोरा की बतयौ बेटा, हमरा सिनी के शरीर के, खास करी के दिमाग के बनावटे हेनो छै, कि टावर आरो मोबाइल सँ निकलै वाला तरंग सँ हमरो दिमाग पर बुरा असर पड़ै लागै छै।"
मैथिली — ई संवाद मात्र एकटा कथा नहि, अपितु इको-सिस्टम (Ecosystem) क असन्तुलनक एकटा गम्भीर वैज्ञानिक चेतावनी अछि जे बाल-साहित्यक माध्यम सँ नव पीढ़िक मस्तिष्कमे रोपबाक प्रयास कएल गेल अछि।
ठेठी-अंगिका — ई संवाद मात्र एगो कथा नै छै, बल्कि इको-सिस्टम (Ecosystem) के असन्तुलन के एगो गम्भीर वैज्ञानिक चेतावनी छै जे बाल-साहित्य के माध्यम सें नया पीढ़ी के मस्तिष्क में रोपबाक प्रयास करलों गेलों छै।
13. ‘पंचामृत’, बाल-गजल आ खण्डकाव्य: विधागत प्रयोगशीलता
ठेठी-अंगिका: 13. ‘पंचामृत’, बाल-गजल आरो खण्डकाव्य: विधागत प्रयोगशीलता
मैथिली — पृष्ठ 92 पर ‘पंचामृत’ पाँच बाल-काव्यरूपक समूहक रूपमे विवेचित अछि। तकर बाद बाल-गजलपर चर्चा अछि, जतय गजलक प्रौढ़ साहित्यिक परम्पराकेँ बाल-जगतक अनुकूल करबाक प्रयासक उल्लेख भेटैत अछि; अमरेन्द्र आ दिनेश बाबा आदि नाम प्रमुख रूपेँ सामने अबैत अछि। पृष्ठ 91 आसपास खण्डकाव्य-प्रवृत्ति सेहो चर्चा मे अछि।
ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 92 पर ‘पंचामृत’ पाँच बाल-काव्यरूप के समूह के रूप में विवेचित छै। तकर बाद बाल-गजलपर चर्चा छै, जेतै गजल के प्रौढ़ साहित्यिक परम्परा कें बाल-जगत के अनुकूल करै के प्रयास के उल्लेख भेटै छै; अमरेन्द्र आरो दिनेश बाबा आदि नाम प्रमुख रूपेँ सामने आवै छै। पृष्ठ 91 आसपास खण्डकाव्य-प्रवृत्ति भी चर्चा में छै।
मैथिली — एहि सभ प्रयोगक महत्त्व ई अछि जे बाल-कविताक अर्थ केवल छोट तुकबन्दी नहि रहैत। गजल, कथात्मक काव्य, खण्डकाव्य, नाट्यरूप—प्रौढ़ साहित्यक स्थापित विधासभकेँ बालक लेल नब रूप देल जा सकैत अछि। मुदा रूपान्तरण सफल तखने होएत जखन विधाक बाहरी ढाँचा बालकक ग्रहणक्षमता, विषय, लय आ अनुभवक संग मेल खाए।
ठेठी-अंगिका — ई सब प्रयोग के महत्त्व ई छै जे बाल-कविता के अर्थ केवल छोट तुकबन्दी नै रहै। गजल, कथात्मक काव्य, खण्डकाव्य, नाट्यरूप—प्रौढ़ साहित्य के स्थापित विधा सिनी कें बालक लेल नब रूप देलों जाय सकै छै। मतरकि रूपान्तरण सफल तबें ही होतै जबें विधा के बाहरी ढाँचा बालक के ग्रहणक्षमता, विषय, लय आरो अनुभव के संग मेल खाए।
मैथिली — पोथी कखनो शिल्पक तकनीकी प्रश्न उठबैत अछि, मुदा एकरूप कसौटी सदिखन स्पष्ट नहि। गजल लेल बहर/काफिया/रदीफक शुद्धता, बाल-काव्य लेल आयु-उपयुक्त शब्दावली, खण्डकाव्य लेल कथा-गति—ई सभ अलग कसौटी माँगैत अछि। भविष्यक संस्करणमे विधा-विशेषक कसौटी आरम्भे देल जाए तँ मूल्याङ्कन अधिक पारदर्शी होएत। तथापि ऐतिहासिक अर्थ स्पष्ट अछि: अंगिका बाल-काव्य प्रयोगशील अछि, आ ‘बाल’ विशेषण विधाकेँ छोट नहि करैत; स्थापित रूपकेँ नब पाठक लेल पुनः गढ़बाक चुनौती दैत अछि।
ठेठी-अंगिका — पोथी कखनियों शिल्प के तकनीकी प्रश्न उठावै छै, मतरकि एकरूप कसौटी सभे बेर स्पष्ट नै। गजल लेल बहर/काफिया/रदीफ के शुद्धता, बाल-काव्य लेल आयु-उपयुक्त शब्दावली, खण्डकाव्य लेल कथा-गति—ई सिनी अलग कसौटी माँगै छै। आगू के संस्करण में विधा-विशेष के कसौटी आरम्भे देलों जाए तें मूल्याङ्कन अधिक पारदर्शी होतै। तथापि ऐतिहासिक अर्थ स्पष्ट छै: अंगिका बाल-काव्य प्रयोगशील छै, आरो ‘बाल’ विशेषण विधा कें छोट नै करै; स्थापित रूप कें नब पाठक लेल पुनः गढ़ै के चुनौती दै छै।
खण्ड ३: बाल-नाटक, खण्डकाव्य आ गजल-शिल्प
ठेठी-अंगिका: खण्ड ३: बाल-नाटक, खण्डकाव्य आरो गजल-शिल्प
मैथिली — पोथीक अन्तिम चरणमे डॉ. अमरेन्द्र अंगिका बाल-साहित्यक किछु अति विशिष्ट आ अभिनव प्रयोगक चर्चा करैत छथि। बाल-नाटक आ बाल-खण्डकाव्य एहन विधा अछि जतय भाषा आ शिल्पक कौशलक कठिन परीक्षा होइत अछि।
ठेठी-अंगिका — पोथी के अन्तिम चरण में डॉ. अमरेन्द्र अंगिका बाल-साहित्य के कुछु अति विशिष्ट आरो अभिनव प्रयोगक चर्चा करै छै। बाल-नाटक आरो बाल-खण्डकाव्य एहन विधा छै जहाँ भाषा आरो शिल्प के कौशलक कठिन परीक्षा होय छै।
बाल-खण्डकाव्य: 'घटोत्कच' आ 'पंचामृत'
ठेठी-अंगिका: बाल-खण्डकाव्य: 'घटोत्कच' आरो 'पंचामृत'
मैथिली — डॉ. अमरेन्द्र स्वयं एकटा सिद्धहस्त नाटककार आ खण्डकाव्य रचयिता छथि। हुनकर खण्डकाव्य 'घटोत्कच' महाभारतक वनपर्व पर आधारित अछि। बच्चा सभमे जादुई आ अलौकिक शक्ति (Supernatural powers) वला पात्रक प्रति जे स्वाभाविक आकर्षण होइत अछि, ओकरा लेखक एहि खण्डकाव्यमे पकड़बाक प्रयास केने छथि। 'घटोत्कच' क तीन सर्ग—प्रत्यक्ष, संघर्ष, आ पतन—मे युद्धक आ भीमक पुत्र घटोत्कचक जे भयानक मुदा बाल-आकर्षक रूपक चित्रण अछि, ओ अद्भुत अछि:
ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र अपने-आप में एगो सिद्धहस्त नाटककार आरो खण्डकाव्य रचयिता छै। हुनकर खण्डकाव्य 'घटोत्कच' महाभारत के वनपर्व पर आधारित छै। बच्चा सभमे जादुई आरो अलौकिक शक्ति (Supernatural powers) वला पात्र के प्रति जे स्वाभाविक आकर्षण होय छै, ओकरा लेखक ई खण्डकाव्य में पकड़बाक प्रयास केने छै। 'घटोत्कच' के तीन सर्ग—प्रत्यक्ष, संघर्ष, आरो पतन— में युद्धक आरो भीमक पुत्र घटोत्कचक जे भयानक मतरकि बाल-आकर्षक रूपक चित्रण छै, ऊ अद्भुत छै:
मैथिली — धरती के सब धूल उड़ैले, बोड़ गाछ के तोड़ लगैले; ताड़ गिरैने, नदी उठैले, पर्वत, पानी जकां बहैले; सोनो के बादल रंग करिया, भादो केरो रात अन्हरिया,
ठेठी-अंगिका — धरती के सब धूल उड़ैले, बोड़ गाछ के तोड़ लगैले; ताड़ गिरैने, नदी उठैले, पर्वत, पानी जकां बहैले; सोनो के बादल रंग करिया, भादो केरो रात अन्हरिया,
मैथिली — एहिमे 'पानी जकां बहैले' आ 'भादो केरो रात अन्हरिया' सन उपमा बाल-मनमे एकटा चित्र (Visual Imagery) प्रस्तुत करैत अछि। ई खण्डकाव्य प्रमाणित करैत अछि जे बाल-साहित्य मात्र हल्लुक विषयक वस्तु नहि अछि; एहिमे महाकाव्यात्मक विस्तारक सेहो क्षमता अछि।
ठेठी-अंगिका — ई में 'पानी जकां बहैले' आरो 'भादो केरो रात अन्हरिया' जइसन उपमा बाल-मन में एगो चित्र (Visual Imagery) प्रस्तुत करै छै। ई खण्डकाव्य प्रमाणित करै छै जे बाल-साहित्य मात्र हल्लुक विषय के वस्तु नै छै; ई में महाकाव्यात्मक विस्तार के भी क्षमता छै।
मैथिली — 'पंचामृत' पाँच बाल-काव्य रूपकक सङ्ग्रह अछि, जाहिमे 'चोकर के हलुआ', 'अतिथि सेवा', 'आत्मसमर्पण', 'विशाखा', आ 'बुद्धं शरणं गच्छामि' शामिल अछि। ई रूपक सभ बच्चाकेँ नैतिक आ आध्यात्मिक बल प्रदान करबाक लेल रचित अछि।
ठेठी-अंगिका — 'पंचामृत' पाँच बाल-काव्य रूपक के सङ्ग्रह छै, जाहि में 'चोकर के हलुआ', 'अतिथि सेवा', 'आत्मसमर्पण', 'विशाखा', आरो 'बुद्धं शरणं गच्छामि' शामिल छै। ई रूपक सिनी बच्चा केेँ नैतिक आरो आध्यात्मिक बल प्रदान करै के लेली रचित छै।
बाल-गजलक नवोन्मेष
ठेठी-अंगिका: बाल-गजलक नवोन्मेष
मैथिली — गजल जकाँ विधा, जे मूलतः फारसी-उर्दू परम्परा सँ आयल अछि आ जकर मिजाज प्रणय आ दर्शनक होइत अछि, ओकरा बाल-साहित्यक साँचामे ढारब एकटा भगीरथ प्रयास अछि। डॉ. अमरेन्द्र आ दिनेश बाबा सन कवि ई असम्भव काज कऽ देखने छथि। दिनेश बाबाक बाल-गजलक एकटा शे'र दृष्टव्य अछि जतय बच्चाक विविध क्रीड़ा आ समाजक विडम्बनाकेँ एकटा धागामे पिरोबल गेल अछि:
ठेठी-अंगिका — गजल जेना विधा, जे मूलतः फारसी-उर्दू परम्परा सें आयल छै आरो जकर मिजाज प्रणय आरो दर्शन के होय छै, ओकरा बाल-साहित्य के साँचा में ढारब एगो भगीरथ प्रयास छै। डॉ. अमरेन्द्र आरो दिनेश बाबा जइसन कवि ई असम्भव काज कऽ देखने छै। दिनेश बाबाक बाल-गजलक एगो शे'र दृष्टव्य छै जहाँ बच्चा के विविध क्रीड़ा आरो समाज के विडम्बनाकेँ एगो धागा में पिरोबल गेल छै:
मैथिली — गाय गेलै गोसल्ला मे, पानी पी पनसल्ला मे। आँख बन्द, मन चंचल छै, हाथ फेरावै मल्ला मे।
ठेठी-अंगिका — गाय गेलै गोसल्ला मे, पानी पी पनसल्ला मे। आँख बन्द, मन चंचल छै, हाथ फेरावै मल्ला मे।
मैथिली — एहि बाल-गजलमे ध्वनिक जे तालमेल (Rhyme scheme) अछि—'गोसल्ला', 'पनसल्ला', 'मल्ला'—ओ बाल-मनकेँ अनायास हे अपन सङ्गीतमे डुबा लेबाक क्षमता रखैत अछि।
ठेठी-अंगिका — ई बाल-गजल में ध्वनि के जे तालमेल (Rhyme scheme) छै—'गोसल्ला', 'पनसल्ला', 'मल्ला'—ओ बाल-मनकेँ अनायास हे अपन सङ्गीत में डुबा लेबाक क्षमता रखै छै।
14. आधुनिक बाल-कहानी: अभावक ईमानदार इतिहास
ठेठी-अंगिका: 14. आधुनिक बाल-कहानी: अभाव के ईमानदार इतिहास
मैथिली — पृष्ठ 94 सँ ‘आधुनिक अंगिका बाल-गद्य साहित्य — बाल-कहानी’क चर्चा आरम्भ होइत अछि। एतय लेखकक आलोचनात्मक ईमानदारी विशेष ध्यान खींचैत अछि। आधुनिक बाल-काव्यक विकासक तुलनामे बाल-कहानी पर्याप्त समृद्ध नहि—ई बात पोथी स्वयं स्वीकार करैत अछि। किछु प्रतिष्ठित कथाकार सामान्य कथा-साहित्यमे प्रसिद्ध रहितहुँ बालक लेल नियमित अंगिका कहानीक परम्परा नहि बना सकलाह। लेखक ‘अंगिका बाल-कहानी’ सन संकलनकेँ एहि विधाक व्यवस्थित आरम्भक महत्त्वपूर्ण बिन्दु मानैत छथि।
ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 94 सें ‘आधुनिक अंगिका बाल-गद्य साहित्य — बाल-कहानी’ के चर्चा आरम्भ होय छै। एतै लेखक के आलोचनात्मक ईमानदारी विशेष ध्यान खींचै छै। आधुनिक बाल-काव्य के विकास के तुलना में बाल-कहानी पर्याप्त समृद्ध नै—ई बात पोथी अपने स्वीकार करै छै। कुछु प्रतिष्ठित कथाकार सामान्य कथा-साहित्य में प्रसिद्ध रहला पर भी बालक लेल नियमित अंगिका कहानी के परम्परा नै बना सकलै। लेखक ‘अंगिका बाल-कहानी’ सन संकलन कें ई विधा के व्यवस्थित आरम्भ के महत्त्वपूर्ण बिन्दु मानै छै।
मैथिली — पृष्ठ 97 पर स्पष्ट भाव ई अछि जे सात-आठ कहानी मात्रसँ पूरा बाल-कथा साहित्य समृद्ध नहि भऽ जाइत। ई आत्मालोचना उल्लेखनीय अछि, कारण साहित्येतिहास प्रायः अपन विषयक उपलब्धि बढ़ा-चढ़ा कऽ देखबैत अछि। एतय लेखक कमीकेँ भविष्यक सृजनक चुनौती बनबैत छथि। एहि कारण पोथीक विश्वसनीयता बढ़ैत अछि।
ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 97 पर स्पष्ट भाव ई छै जे सात-आठ कहानी मात्र सें पूरा बाल-कथा साहित्य समृद्ध नै होय जाय। ई आत्मालोचना उल्लेखनीय छै, कारण साहित्येतिहास प्रायः आपनों विषय के उपलब्धि बढ़ा-चढ़ा करी कें देखावै छै। एतै लेखक कमी कें आगू के सृजन के चुनौती बनावै छै। ई कारण पोथी के विश्वसनीयता बढ़ै छै।
मैथिली — उपलब्ध कहानिसभक विषय-विविधता महत्वपूर्ण अछि: बालकक चतुराई, लोककथाक रूपान्तरण, संस्मरण, सामाजिक शिक्षा, विज्ञान, पर्यावरण, पशु-पक्षी आ आधुनिक जीवन। किछु कहानीक अन्त शिक्षाप्रद निष्कर्ष दिस झुकैत अछि; एतय फेर आरम्भिक बाल-मनक कसौटी लागू करबाक आवश्यकता अछि—कथा अपन पात्र, घटना आ तनावसँ जीबैत अछि कि अन्तिम संदेशसँ?
ठेठी-अंगिका — उपलब्ध कहानि सिनी के विषय-विविधता महत्वपूर्ण छै: बालक के चतुराई, लोककथा के रूपान्तरण, संस्मरण, सामाजिक शिक्षा, विज्ञान, पर्यावरण, पशु-पक्षी आरो आधुनिक जीवन। कुछु कहानी के अन्त शिक्षाप्रद निष्कर्ष दिस झुकै छै; एतै फेनू आरम्भिक बाल-मन के कसौटी लागू करै के आवश्यकता छै—कथा आपनों पात्र, घटना आरो तनाव सें जीवै छै कि अन्तिम संदेश सें?
मैथिली — एहि खण्डक आत्मालोचनात्मक निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण अछि। साथहि स्पष्ट अछि जे कहानीक कमजोरीकेँ मात्र रचनाकारक अभावसँ नहि, प्रकाशन-संरचना, बाल-पत्रिका, पाठक-बाजार, विद्यालयीय ग्रहण, चित्र-पुस्तक संस्कृति आ सम्पादन-परम्पराक प्रश्नसँ सेहो जोड़ि देखबाक चाही। साहित्यिक विधा लेखक मात्रसँ नहि, पूरा संस्थागत पारिस्थितिकीसँ विकसित होइत अछि।
ठेठी-अंगिका — ई खण्ड के आत्मालोचनात्मक निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण छै। संगें साफ छै जे कहानी के कमजोरी कें मात्र रचनाकार के अभाव सें नै, प्रकाशन-संरचना, बाल-पत्रिका, पाठक-बाजार, विद्यालयीय ग्रहण, चित्र-पुस्तक संस्कृति आरो सम्पादन-परम्परा के प्रश्न सें भी जोड़ कें देखै के चाही। साहित्यिक विधा लेखक मात्र सें नै, पूरा संस्थागत पारिस्थितिकी सें विकसित होय छै।
15. बाल-नाटक: पुनर्पाठसँ उभरल अधिक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र
ठेठी-अंगिका: 15. बाल-नाटक: पुनर्पाठ सें उभरलों अधिक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र
मैथिली — नाटक, निबन्ध आ जीवनीक क्षेत्रकेँ सूक्ष्मतासँ देखला पर पृष्ठ 98–109 क सामग्री स्पष्ट करैत अछि जे निबन्ध-जीवनी निश्चय छोट अन्तिम खण्ड अछि, मुदा बाल-नाटकपर चर्चा पर्याप्त विस्तृत आ आलोचनात्मक अछि। अतः बाल-नाटककेँ स्वतंत्र प्रमुख उपलब्धिक रूपमे स्थान देब आवश्यक अछि।
ठेठी-अंगिका — नाटक, निबन्ध आरो जीवनी के क्षेत्र कें सूक्ष्मता सें देखला पर पृष्ठ 98–109 के सामग्री साफ करै छै जे निबन्ध-जीवनी निश्चय छोट अन्तिम खण्ड छै, मतरकि बाल-नाटकपर चर्चा पर्याप्त विस्तृत आरो आलोचनात्मक छै। अतः बाल-नाटक कें स्वतंत्र प्रमुख उपलब्धि के रूप में स्थान दै के जरूरी छै।
मैथिली — पृष्ठ 98 सँ बाल-नाटकक उमेर-प्रश्न, शिशु/बाल/किशोर साहित्यक सीमा आ एकांकीक उपयुक्ततापर विचार अछि। लेखकक तर्क व्यवहारिक अछि: बच्चा छोट आकार, गतिशील घटना, संवाद आ मंचीय क्रियासँ सहज जुड़ैत अछि; लम्बा नाटकक अपेक्षा एकांकी विद्यालयीय वा बालमंचपर अधिक उपयोगी भऽ सकैत अछि।
ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 98 सें बाल-नाटक के उमेर-प्रश्न, शिशु/बाल/किशोर साहित्य के सीमा आरो एकांकी के उपयुक्ततापर विचार छै। लेखक के तर्क व्यवहारिक छै: बच्चा छोट आकार, गतिशील घटना, संवाद आरो मंचीय क्रिया सें सहज जुड़ै छै; लम्बा नाटक के अपेक्षा एकांकी विद्यालयीय वा बालमंचपर अधिक उपयोगी होय कें सकै छै।
मैथिली — ‘पंचगव्य’क पाँच एकांकीक विवेचन पृष्ठ 101–105 मे विशेष महत्त्वपूर्ण अछि। सामाजिक परिवर्तन, पुलिस-प्रशासन, अन्धविश्वास-विरोध, वैज्ञानिक दृष्टि, बालिका-शिक्षा, विवाह, ग्रामीण जीवन आदि विषय नाटकीय घटनामे रूपान्तरित कएल गेल अछि। पृष्ठ 105 पर लेखक चरित्रक जीवितपन, विविध आयुवर्ग, ग्रामीण परिवेश, संवाद आ व्यंग्य-विनोदकेँ सफलता मानैत छथि। ई आलोचना केवल कथ्य-सूची नहि; नाटकक शिल्प—पात्र, संवाद, वातावरण—पर वास्तविक ध्यान अछि।
ठेठी-अंगिका — ‘पंचगव्य’ के पाँच एकांकी के विवेचन पृष्ठ 101–105 में विशेष महत्त्वपूर्ण छै। सामाजिक परिवर्तन, पुलिस-प्रशासन, अन्धविश्वास-विरोध, वैज्ञानिक दृष्टि, बालिका-शिक्षा, विवाह, ग्रामीण जीवन आदि विषय नाटकीय घटना में रूपान्तरित करलों गेलों छै। पृष्ठ 105 पर लेखक चरित्र के जीवितपन, विविध आयुवर्ग, ग्रामीण परिवेश, संवाद आरो व्यंग्य-विनोद कें सफलता मानै छै। ई आलोचना केवल कथ्य-सूची नै; नाटक के शिल्प—पात्र, संवाद, वातावरण—पर वास्तविक ध्यान छै।
मैथिली — पृष्ठ 106 पर ‘निभुहान’क तीन खण्ड-नाटकक चर्चा ध्वनि-प्रदूषण, किशोर मानसिकता, पर्यावरण आ शिक्षा सन विषय सामने अनैत अछि। पृष्ठ 109 धरि रेडियो, गीतिनाट्य आ स्वास्थ्य-सन्दर्भक चर्चा आधुनिक माध्यमक उपस्थिति देखबैत अछि। एहि कारण बाल-नाटक अंगिका बाल-साहित्यक भीतर सामाजिक ज्ञान, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण आ मंचीय मनोरञ्जनक संगम बनैत अछि। आगाँक अध्ययनक दू विशेष दिशा होएत—मुद्रित नाटकक वास्तविक मंचन-इतिहास आ पाठ/प्रदर्शनक अन्तर।
ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 106 पर ‘निभुहान’ के तीन खण्ड-नाटक के चर्चा ध्वनि-प्रदूषण, किशोर मानसिकता, पर्यावरण आरो शिक्षा सन विषय सामने अनै छै। पृष्ठ 109 तक रेडियो, गीतिनाट्य आरो स्वास्थ्य-सन्दर्भ के चर्चा आधुनिक माध्यम के उपस्थिति देखावै छै। ई कारण बाल-नाटक अंगिका बाल-साहित्य के भीतर सामाजिक ज्ञान, सार्वजनिक स्वास्थ्य, पर्यावरण आरो मंचीय मनोरञ्जन के संगम बनै छै। आगू के शोध के दू विशेष दिशा होतै—मुद्रित नाटक के वास्तविक मंचन-इतिहास आरो पाठ/प्रदर्शन के अन्तर।
बाल-नाटक आ एकांकी
ठेठी-अंगिका: बाल-नाटक आरो एकांकी
मैथिली — किशोर अवस्थाक बच्चाकेँ केन्द्रमे राखि कऽ जे नाटक आ एकांकी रचित भेल अछि, ओ समाजक कुरीति, अन्धविश्वास आ शिक्षाक समस्या पर चोट करैत अछि। डॉ. अमरेन्द्रक 'पंचगव्य' सङ्ग्रहमे पाँचटा बाल-एकांकी अछि:
ठेठी-अंगिका — किशोर अवस्थाक बच्चा केेँ केन्द्र में राखि कऽ जे नाटक आरो एकांकी लिखलों गेलों छै, ऊ समाज के कुरीति, अन्धविश्वास आरो शिक्षा के समस्या पर चोट करै छै। डॉ. अमरेन्द्र के 'पंचगव्य' सङ्ग्रह में पाँचटा बाल-एकांकी छै:
एकांकी आ सामाजिक/नैतिक विषय-वस्तु
ठेठी-अंगिका: एकांकी आरो सामाजिक/नैतिक विषय-वस्तु
मैथिली — १. करनी-भरनी साथे-साथ — गामक बदलैत मानसिकता आ राजनीतिक स्वार्थ पर व्यंग्य
ठेठी-अंगिका — १. करनी-भरनी साथे-साथ — गामक बदलैत मानसिकता आरो राजनीतिक स्वार्थ पर व्यंग्य
मैथिली — २. कलयुग रो सत्ता — दहेज प्रथाक विरोध आ नारी सशक्तीकरण
ठेठी-अंगिका — २. कलयुग रो सत्ता — दहेज प्रथाक विरोध आरो नारी सशक्तीकरण
मैथिली — ३. पुरानो भूत-नया इलाज — अन्धविश्वास आ तन्त्र-मन्त्रक स्थान पर वैज्ञानिक सोच
ठेठी-अंगिका — ३. पुरानो भूत-नया इलाज — अन्धविश्वास आरो तन्त्र-मन्त्रक स्थान पर वैज्ञानिक सोच
मैथिली — ४. सा विद्या या विमुक्तये — शिक्षाक अभावमे अपराध (डकैती) क बढब आ विद्याक महत्त्व
ठेठी-अंगिका — ४. सा विद्या या विमुक्तये — शिक्षा के अभाव में अपराध (डकैती) के बढब आरो विद्याक महत्त्व
मैथिली — ५. मुट्ठी मे धूप — नारी-शिक्षा आ बालिकाकेँ स्वावलम्बी बनबाक प्रेरणा
ठेठी-अंगिका — ५. मुट्ठी में धूप — नारी-शिक्षा आरो बालिकाकेँ स्वावलम्बी बनै के प्रेरणा
मैथिली — समीक्षाक दृष्टिसँ, ई एकांकी सभ बाल-मनकेँ सामाजिक यथार्थ (Social Realism) सँ परिचित करबैत अछि। 'कलयुग रो सत्ता' मे दहेज प्रथा सन सामाजिक व्याधि पर जे प्रहार अछि—जाहिमे नायिका स्वयं विवाह-मण्डप पर अपन दहेज-लोभी होबए वला पतिकेँ हथकड़ी पहिराबइत अछि—ओ किशोरावस्थामे क्रान्तिकारी चेतना (Revolutionary consciousness) जगाबए लेल अतीव समर्थ अछि।
ठेठी-अंगिका — समीक्षा के दृष्टि सें, ई एकांकी सिनी बाल-मनकेँ सामाजिक यथार्थ (Social Realism) सें परिचित करावै छै। 'कलयुग रो सत्ता' में दहेज प्रथा जइसन सामाजिक व्याधि पर जे प्रहार छै—जाहि में नायिका अपने विवाह-मण्डप पर अपन दहेज-लोभी होय वला पतिकेँ हथकड़ी पहिराबइत छै—ओ किशोरावस्था में क्रान्तिकारी चेतना (Revolutionary consciousness) जगाबए लेली अतीव समर्थ छै।
मैथिली — तेहने, चन्द्रप्रकाश जगप्रियक 'विटामिन सभा' (रेडियो नाटक) आ 'चतुरन के चतुराई' बाल-नाट्य-काव्यक उत्कृष्ट उदाहरण अछि। 'विटामिन सभा' मे बाबा साहेब अम्बेडकरक जीवन पर रचित रूपक, आ 'गुजरैठा' (Centipede) क आत्मकथ्य बच्चाकेँ मनोरंजनक सङ्ग-सङ्ग प्राणिविज्ञानक सूक्ष्म जानकारी सेहो दैत अछि:
ठेठी-अंगिका — तेहने, चन्द्रप्रकाश जगप्रियक 'विटामिन सभा' (रेडियो नाटक) आरो 'चतुरन के चतुराई' बाल-नाट्य-काव्यक उत्कृष्ट उदाहरण छै। 'विटामिन सभा' में बाबा साहेब अम्बेडकरक जीवन पर रचित रूपक, आरो 'गुजरैठा' (Centipede) के आत्मकथ्य बच्चा केेँ मनोरंजनक सङ्ग-सङ्ग प्राणिविज्ञानक सूक्ष्म जानकारी भी दै छै:
मैथिली — "देखत्है डरी गेलो नी।... अभी ते हमरा सौ गो टांग ही छै, जरा आरो बढ़ें दौ नी, हमरा मे ३८० टांग तक निकली ऐतै..."
ठेठी-अंगिका — "देखत्है डरी गेलो नी।... अभी ते हमरा सौ गो टांग ही छै, जरा आरो बढ़ें दौ नी, हमरा मे ३८० टांग तक निकली ऐतै..."
मैथिली — एकटा गुजरैठा (Centipede) क संवादक माध्यम सँ ओकर शारीरिक संरचना (३८० टांग धरि) आ ओकर पारिस्थितिकी तंत्रमे महत्वकेँ स्पष्ट करब—ई आधुनिक बाल-नाटकक सबसँ पैघ उपलब्धि अछि।
ठेठी-अंगिका — एगो गुजरैठा (Centipede) के संवाद के माध्यम सें ओकर शारीरिक संरचना (३८० टांग तक) आरो ओकर पारिस्थितिकी तंत्र में महत्त्व कें स्पष्ट करब—ई आधुनिक बाल-नाटक के सभसें बड़का उपलब्धि छै।
16. अन्य बाल-साहित्य: निबन्ध, इतिहास, महापुरुष आ जीवनी
ठेठी-अंगिका: 16. अन्य बाल-साहित्य: निबन्ध, इतिहास, महापुरुष आरो जीवनी
मैथिली — पृष्ठ 109 पर स्पष्ट शीर्षक ‘अन्य बाल-साहित्य (निबंध और जीवनी साहित्य)’ सँ पोथी बाल-साहित्यक परिधि कविता-कथा-नाटकसँ बाहर लऽ जाइत अछि। पृष्ठ 109–111 मे अंगप्रदेशक प्रमुख नगर, महापुरुष, स्वतंत्रता-संग्रामक व्यक्तित्व, भारतक महापुरुष, बुद्ध आदि विषयक बालोपयोगी गद्यक चर्चा अछि। लेखक इतिहास-सांस्कृतिक ज्ञानकेँ बाल-पाठक धरि पहुँचाबयवला साहित्यक रूपमे देखैत छथि।
ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 109 पर स्पष्ट शीर्षक ‘अन्य बाल-साहित्य (निबंध और जीवनी साहित्य)’ सें पोथी बाल-साहित्य के परिधि कविता-कथा-नाटक सें बाहर लै कें जाय छै। पृष्ठ 109–111 में अंगप्रदेश के प्रमुख नगर, महापुरुष, स्वतंत्रता-संग्राम के व्यक्तित्व, भारत के महापुरुष, बुद्ध आदि विषय के बालोपयोगी गद्य के चर्चा छै। लेखक इतिहास-सांस्कृतिक ज्ञान कें बाल-पाठक तक पहुँचावै वाला साहित्य के रूप में देखै छै।
मैथिली — एहि सामग्रीक मूल्याङ्कन लेल कथा वा कविता जकाँ कसौटी पर्याप्त नहि। ज्ञान-साहित्यमे तथ्यक विश्वसनीयता, चयन, भाषा-सरलता, सन्दर्भ, चित्र, कालक्रम आ जिज्ञासा जगाबयक क्षमता महत्त्वपूर्ण अछि। पोथी विशेष रूपेँ चित्र/व्यक्तित्व-परिचयक बाल-रुचि बढ़ाबयवला भूमिकापर ध्यान दैत अछि। एहि अर्थमे ई खण्ड बाल-साहित्य आ बाल-शिक्षाक सीमा-प्रदेशमे अछि।
ठेठी-अंगिका — ई सामग्री के मूल्याङ्कन लेल कथा वा कविता जेना कसौटी पर्याप्त नै। ज्ञान-साहित्य में तथ्य के विश्वसनीयता, चयन, भाषा-सरलता, सन्दर्भ, चित्र, कालक्रम आरो जिज्ञासा जगावै के क्षमता महत्त्वपूर्ण छै। पोथी विशेष रूपेँ चित्र/व्यक्तित्व-परिचय के बाल-रुचि बढ़ावै वाला भूमिकापर ध्यान दै छै। ई अर्थ में ई खण्ड बाल-साहित्य आरो बाल-शिक्षा के सीमा-प्रदेश में छै।
मैथिली — एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तिक प्रश्न उठैत अछि: की बालक लेल लिखल प्रत्येक इतिहास वा जीवनी बाल-साहित्य अछि? केवल बालक लक्ष्य पाठक होएब पर्याप्त नहि; भाषा, संरचना, कथा-गति, दृश्य सामग्री, प्रश्न-जिज्ञासा, आयु-स्तर आ साहित्यिक प्रस्तुति निर्णायक बनैत अछि। पोथी एहि प्रश्नकेँ पूर्ण सिद्धान्तक रूपमे विकसित नहि करैत, मुदा सामग्री उपलब्ध करबैत अछि। निबन्ध-जीवनीक ई विधागत विस्तार स्थानीय सांस्कृतिक ज्ञानक पाठ्य-विश्वकेँ अधिक स्पष्ट करैत अछि।
ठेठी-अंगिका — एगो महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तिक प्रश्न उठै छै: की बालक लेल लिखलों प्रत्येक इतिहास वा जीवनी बाल-साहित्य छै? केवल बालक लक्ष्य पाठक होब पर्याप्त नै; भाषा, संरचना, कथा-गति, दृश्य सामग्री, प्रश्न-जिज्ञासा, आयु-स्तर आरो साहित्यिक प्रस्तुति निर्णायक बनै छै। पोथी ई प्रश्न कें पूर्ण सिद्धान्त के रूप में विकसित नै करै, मतरकि सामग्री उपलब्ध करावै छै। निबन्ध-जीवनी के ई विधागत विस्तार स्थानीय सांस्कृतिक ज्ञान के पाठ्य-विश्व कें अधिक साफ करै छै।
17. भाषा आ आलोचनात्मक शैली: अंगिका सामग्री, हिन्दी विवेचन
ठेठी-अंगिका: 17. भाषा आरो आलोचनात्मक शैली: अंगिका सामग्री, हिन्दी विवेचन
मैथिली — ग्रन्थक एक विशिष्ट भाषिक संरचना अछि: रचनात्मक उदाहरण, शीर्षक, गीत, कथा-संवाद आ मूल साहित्यिक संसार अंगिकामे अछि, जखन आलोचनात्मक व्याख्या प्रायः हिन्दी गद्यक माध्यमेँ चलैत अछि। एहि कारण पोथी एक प्रकारक द्विभाषिक आलोचनात्मक दस्तावेज बनैत अछि।
ठेठी-अंगिका — ग्रन्थ के एक विशिष्ट भाषिक संरचना छै: रचनात्मक उदाहरण, शीर्षक, गीत, कथा-संवाद आरो मूल साहित्यिक संसार अंगिका में छै, जबें आलोचनात्मक व्याख्या प्रायः हिन्दी गद्य के माध्यम सें चलै छै। ई कारण पोथी एक प्रकार के द्विभाषिक आलोचनात्मक दस्तावेज बनै छै।
मैथिली — एहि व्यवस्थाक लाभ अछि। हिन्दी माध्यमेँ व्यापक पाठक, विश्वविद्यालयीय शोधक वा अंगिका पूर्ण रूपेँ नहि पढ़यवला व्यक्ति सेहो साहित्यिक इतिहासक रूपरेखा बुझि सकैत अछि। मुदा एक सांस्कृतिक प्रश्न सेहो अछि: जँ सृजनक भाषा अंगिका अछि, तखन ओकर सौन्दर्यशास्त्र, आलोचनात्मक शब्दावली आ साहित्येतिहासक भाषा स्वयं अंगिकामे कतेक विकसित हो? भविष्यक अंगिका संस्करण स्थानीय आलोचना-भाषाक स्वायत्तता बढ़ा सकैत अछि।
ठेठी-अंगिका — ई व्यवस्था के लाभ छै। हिन्दी माध्यम सें व्यापक पाठक, विश्वविद्यालयीय शोध के वा अंगिका पूर्ण रूपेँ नै पढ़ै वाला व्यक्ति भी साहित्यिक इतिहास के रूपरेखा बुझ कें सकै छै। मतरकि एक सांस्कृतिक प्रश्न भी छै: जों सृजन के भाषा अंगिका छै, तबें ओकर सौन्दर्यशास्त्र, आलोचनात्मक शब्दावली आरो साहित्येतिहास के भाषा अपने अंगिका में कत्तें विकसित हो? आगू के अंगिका संस्करण स्थानीय आलोचना-भाषा के स्वायत्तता बढ़ा सकै छै।
मैथिली — शैली सामान्यतः सरल, परिचयात्मक आ उदाहरण-समृद्ध अछि। सिद्धान्तक भारी शब्दावली नहि; एहि कारण सामान्य पाठक लेल पहुँच सहज। मुदा शोधक दृष्टिसँ कतेको ठाम कृति/लेखक/विषयक विवरण अधिक, गहन पाठालोचन कम। छन्द, बिम्ब, कथानक, कथावाचक, पात्र-विकास, हास्य, पाठकीय प्रतिक्रिया, आयु-उपयुक्तता, लिंग-वर्गीय प्रतिनिधित्व, चित्र-पाठ सम्बन्ध—एहि सभक समान पद्धतिसँ विश्लेषण कएल जाए तँ आलोचना आरो गहन होएत।
ठेठी-अंगिका — शैली सामान्यतः सरल, परिचयात्मक आरो उदाहरण-समृद्ध छै। सिद्धान्त के भारी शब्दावली नै; ई कारण सामान्य पाठक लेल पहुँच सहज। मतरकि शोध के दृष्टि सें कईगो जगह कृति/लेखक/विषय के विवरण अधिक, गहन पाठालोचन कम। छन्द, बिम्ब, कथानक, कथावाचक, पात्र-विकास, हास्य, पाठकीय प्रतिक्रिया, आयु-उपयुक्तता, लिंग-वर्गीय प्रतिनिधित्व, चित्र-पाठ सम्बन्ध—ई सब के एके पद्धति सें विश्लेषण करलों जाए तें आलोचना आरो गहन होतै।
मैथिली — एहि सीमाकेँ लेखकक विद्वत्ताक अभाव न मानि ग्रन्थक उद्देश्यक प्रकाशमे देखबाक चाही। ई पोथी पहिले क्षेत्रक नक्शा तैयार करैत अछि; प्रत्येक कृतिक सम्पूर्ण सौन्दर्यशास्त्रीय विश्लेषण ओकर एकल उद्देश्य नहि। तें एहि पर अगिला आलोचकक दायित्व बनैत अछि जे लेखकक संकलित corpus पर विभिन्न आधुनिक पद्धति लागू करय।
ठेठी-अंगिका — ई सीमा कें लेखक के विद्वत्ता के अभाव न मान कें ग्रन्थ के उद्देश्य के प्रकाश में देखै के चाही। ई पोथी पहिले क्षेत्र के नक्शा तैयार करै छै; प्रत्येक कृति के सम्पूर्ण सौन्दर्यशास्त्रीय विश्लेषण ओकर एकल उद्देश्य नै। तें ई पर आगू के आलोचक के दायित्व बनै छै जे लेखक के संकलित corpus पर विभिन्न आधुनिक पद्धति लागू करै।
18. सन्दर्भ-सूची आ पत्रिका-संसार: पोथी एक साहित्यिक अभिलेख
ठेठी-अंगिका: 18. सन्दर्भ-सूची आरो पत्रिका-संसार: पोथी एक साहित्यिक अभिलेख
मैथिली — पृष्ठ 112–114 क सन्दर्भ-खण्ड ग्रन्थक मूल्य बुझबाक लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। लगभग 52 क्रमांकित पुस्तक/स्रोतक सूची तथा दसक आसपास पत्रिकाक नाम—बालगीत, पहेली, कथा, उपन्यास, नाटक, अनुवाद, जीवनी, आलोचना आ पत्रिका—मिलि एक पूरा साहित्यिक परिसंचरण देखबैत अछि। ‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’, ‘बुतरू के तुतरू’, ‘बाजै बीन बजावै तीन’, ‘तुक्तक-मुक्तक’, ‘पंचगव्य’, ‘बण्टा’, ‘अंगिका बालगीत’, ‘अंगिका बालकहानी’ आदि अनेक कृति एहि bibliographic संसारक हिस्सा अछि।
ठेठी-अंगिका — पृष्ठ 112–114 के सन्दर्भ-खण्ड ग्रन्थ के मूल्य बुझै के लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण छै। लगभग 52 क्रमांकित पुस्तक/स्रोत के सूची तथा दस के आसपास पत्रिका के नाम—बालगीत, पहेली, कथा, उपन्यास, नाटक, अनुवाद, जीवनी, आलोचना आरो पत्रिका—मिली कें एक पूरा साहित्यिक परिसंचरण देखावै छै। ‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’, ‘बुतरू के तुतरू’, ‘बाजै बीन बजावै तीन’, ‘तुक्तक-मुक्तक’, ‘पंचगव्य’, ‘बण्टा’, ‘अंगिका बालगीत’, ‘अंगिका बालकहानी’ आदि अनेक कृति ई bibliographic संसार के हिस्सा छै।
मैथिली — ई सूची पोथीकेँ निजी स्मरण वा आत्मप्रशंसा-मात्र होएबसँ रोकैत अछि। पाठक देख सकैत अछि जे इतिहास अनेक पुस्तक, संकलन, अनुवाद, पत्रिका आ लेखकक जालपर आधारित अछि। छोट भाषिक साहित्यक अध्ययनमे एहि प्रकारक bibliography स्वयं शोध-उपकरण अछि, कारण कतेको स्रोत सामान्य राष्ट्रीय पुस्तक-सूचिमे सहज नहि भेटैत।
ठेठी-अंगिका — ई सूची पोथी कें निजी स्मरण वा आत्मप्रशंसा-मात्र होएब सें रोकै छै। पाठक देख सकै छै जे इतिहास अनेक पुस्तक, संकलन, अनुवाद, पत्रिका आरो लेखक के जालपर आधारित छै। छोट भाषिक साहित्य के अध्ययन में ई प्रकार के bibliography अपने शोध-उपकरण छै, कारण कईगो स्रोत सामान्य राष्ट्रीय पुस्तक-सूचि में सहज नै भेटै।
मैथिली — तथापि bibliographic मानकीकरण आवश्यक अछि। सभ प्रविष्टिमे प्रकाशन-वर्ष, संस्करण, पृष्ठ-संख्या, प्रकाशन-स्थान, ISBN वा सम्पादक-भूमिका समान रूपेँ नहि देल गेल अछि। अगिला संस्करणमे एक मानक शैलीक अनुसार पूर्ण सन्दर्भ, साथे लेखक-सूची, शीर्षक-सूची, विधा-सूची आ वर्ष-क्रम देल जाए तँ पोथी शोधक लेल बहुत अधिक सक्षम होएत।
ठेठी-अंगिका — तथापि bibliographic मानकीकरण आवश्यक छै। सिनी प्रविष्टि में प्रकाशन-वर्ष, संस्करण, पृष्ठ-संख्या, प्रकाशन-स्थान, ISBN वा सम्पादक-भूमिका समान रूपेँ नै देलों गेलों छै। आगू के संस्करण में एक मानक शैली के अनुसार पूर्ण सन्दर्भ, साथे लेखक-सूची, शीर्षक-सूची, विधा-सूची आरो वर्ष-क्रम देलों जाए तें पोथी शोध के लेल बहुत अधिक सक्षम होतै।
मैथिली — भारतवाणी पर मूल ‘अंगिका बाल-साहित्य’ (2022) संग 2021 क श्वेता रानीक ‘डॉ. अमरेन्द्र का अंगिका बाल साहित्य’ आ अभिनन्दन-संपादित ‘डॉ. अमरेन्द्र ग्रंथावली (खण्ड-1): अंगिका बालगीत समग्र’ सूचीबद्ध अछि। एहि सन्निकट प्रकाशन-समूहसँ स्पष्ट अछि जे 2021–22 धरि अमरेन्द्रक बाल-साहित्य स्वयं आलोचना, सम्पादन आ इतिहास-लेखनक एक केन्द्र बनि चुकल छल।
ठेठी-अंगिका — भारतवाणी पर मूल ‘अंगिका बाल-साहित्य’ (2022) संग 2021 के श्वेता रानी के ‘डॉ. अमरेन्द्र का अंगिका बाल साहित्य’ आरो अभिनन्दन-संपादित ‘डॉ. अमरेन्द्र ग्रंथावली (खण्ड-1): अंगिका बालगीत समग्र’ सूचीबद्ध छै। ई सन्निकट प्रकाशन-समूह सें स्पष्ट छै जे 2021–22 तक अमरेन्द्र के बाल-साहित्य अपने आलोचना, सम्पादन आरो इतिहास-लेखन के एक केन्द्र बनी चुकलों छेलै।
19. लेखक स्वयं रचनाकार: भीतरक साक्ष्य आ चयनक प्रश्न
ठेठी-अंगिका: 19. लेखक अपने रचनाकार: भीतर के साक्ष्य आरो चयन के प्रश्न
मैथिली — डॉ. अमरेन्द्र एहि इतिहासक बाहरी निरीक्षक नहि; ओ स्वयं कवि, बालगीतकार, उपन्यासकार, नाटककार, आलोचक आ सांस्कृतिक कार्यकर्ता छथि। बाहरी लेखक-सूची हुनक ‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’, ‘पंचगव्य’, ‘बुतरू के तुतरू’, ‘बाजै बीन बजावै तीन’, ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’, ‘बण्टा’ आदि कृतिसभक स्वतंत्र प्रकाशन-उपस्थिति दर्ज करैत अछि। एहि कारण पोथी इतिहासकारक किताब आ सर्जकक आत्म-साक्ष्य—दुनू अछि।
ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र ई इतिहास के बाहरी निरीक्षक नै; ओ अपने कवि, बालगीतकार, उपन्यासकार, नाटककार, आलोचक आरो सांस्कृतिक कार्यकर्ता छै। बाहरी लेखक-सूची हुनकर ‘ढोल बजै छै ढम्मक ढम’, ‘पंचगव्य’, ‘बुतरू के तुतरू’, ‘बाजै बीन बजावै तीन’, ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’, ‘बण्टा’ आदि कृति सिनी के स्वतंत्र प्रकाशन-उपस्थिति दर्ज करै छै। ई कारण पोथी इतिहासकार के किताब आरो सर्जक के आत्म-साक्ष्य—दुनू छै।
मैथिली — भीतरक साक्ष्यक लाभ बहुत अछि। लेखककेँ दुर्लभ पुस्तक, पत्रिका, प्रकाशन-परिस्थिति, समकालीन लेखक आ साहित्यिक संस्थासभक सीधा ज्ञान अछि। अनेक अल्पप्रचलित कृतिक नाम शायद एहन भीतरक नेटवर्क बिना इतिहासमे नहि अबैत। मुदा साक्षी स्वयं घटनाक सहभागी अछि, तें दृष्टिकोणक स्थान सेहो पहिचानल जाए।
ठेठी-अंगिका — भीतर के साक्ष्य के लाभ बहुत छै। लेखक कें दुर्लभ पुस्तक, पत्रिका, प्रकाशन-परिस्थिति, समकालीन लेखक आरो साहित्यिक संस्था सिनी के सीधा ज्ञान छै। अनेक अल्पप्रचलित कृति के नाम शायद एहन भीतर के नेटवर्क बिना इतिहास में नै आवै। मतरकि साक्षी अपने घटना के सहभागी छै, तें दृष्टिकोण के स्थान भी पहिचानल जाए।
मैथिली — लेखकक अपन कृतिसभक संख्या आ विस्तार अधिक होएब आवश्यक रूपेँ अनुचित नहि—जँ वास्तविक corpus मे हुनक योगदान पैघ अछि। बाहरी स्रोत आधुनिक अंगिका बाल-काव्यमे हुनक बहु-कृति उपस्थितिक पुष्टि करैत अछि। तथापि भविष्यक स्वतंत्र इतिहासकेँ सभ प्रमुख रचनाकार लेल समान प्रश्न पूछबाक चाही: कुल कृति, प्रकाशन-वर्ष, पाठक-ग्रहण, पुनर्मुद्रण, विधागत नवाचार, भाषा, शिल्प आ बाल-पाठकीयता। अतः निष्कर्ष आरोप नहि, पद्धतिगत सावधानी अछि: आत्मसाक्ष्यक लाभ स्वीकार करू, संगहि स्वतंत्र bibliographic verification आ comparative corpus तैयार करू।
ठेठी-अंगिका — लेखक के आपनों कृति सिनी के संख्या आरो विस्तार अधिक होब आवश्यक रूपेँ अनुचित नै—जों वास्तविक corpus में हुनकर योगदान बड़का छै। बाहरी स्रोत आधुनिक अंगिका बाल-काव्य में हुनकर बहु-कृति उपस्थिति के पुष्टि करै छै। तथापि आगू के स्वतंत्र इतिहास कें सिनी प्रमुख रचनाकार लेल समान प्रश्न पूछै के चाही: कुल कृति, प्रकाशन-वर्ष, पाठक-ग्रहण, पुनर्मुद्रण, विधागत नवाचार, भाषा, शिल्प आरो बाल-पाठकीयता। अतः निष्कर्ष आरोप नै, पद्धतिगत सावधानी छै: आत्मसाक्ष्य के लाभ स्वीकार करू, संगें स्वतंत्र bibliographic verification आरो comparative corpus तैयार करू।
20. पुस्तक, पत्रिका, संग्रह आ डिजिटल पुनरुपस्थिति: संस्थागत पारिस्थितिकी
ठेठी-अंगिका: 20. पुस्तक, पत्रिका, संग्रह आरो डिजिटल पुनरुपस्थिति: संस्थागत पारिस्थितिकी
मैथिली — पोथी पढ़ैत स्पष्ट होइत अछि जे साहित्य केवल लेखक लिखलनि आ पाठक पढ़लनि—ई दू-बिन्दु व्यवस्था नहि। पत्रिका, सम्पादित संकलन, साहित्यिक संस्था, प्रकाशक, अनुवादक, विद्यालयीय उपयोग, रेडियो/मंच आ बादमे डिजिटल भण्डार—ई सभ मिलि बाल-साहित्यक पारिस्थितिकी बनबैत अछि। पृष्ठ 112–114 क पुस्तक/पत्रिका सूची एहि नेटवर्कक ठोस प्रमाण अछि।
ठेठी-अंगिका — पोथी पढ़ै स्पष्ट होय छै जे साहित्य केवल लेखक लिखै छै आरो पाठक पढ़ै छै—ई दू-बिन्दु व्यवस्था नै। पत्रिका, सम्पादित संकलन, साहित्यिक संस्था, प्रकाशक, अनुवादक, विद्यालयीय उपयोग, रेडियो/मंच आरो बाद में डिजिटल भण्डार—ई सिनी मिली कें बाल-साहित्य के पारिस्थितिकी बनावै छै। पृष्ठ 112–114 के पुस्तक/पत्रिका सूची ई नेटवर्क के ठोस प्रमाण छै।
मैथिली — उपलब्ध बाहरी स्रोत एहि परिसंचरणक आधुनिक रूप देखबैत अछि। भारतवाणी मूल पोथी तथा सम्बन्धित अध्ययन/ग्रंथावलीकेँ सरकारी भाषा-ज्ञान पोर्टलपर सूचीबद्ध करैत अछि। Kavita Kosh ‘तुक्तक मुक्तक’ केँ ई-पुस्तक/बाल-कविता वर्गमे राखैत अछि, Gadya Kosh पर ‘बण्टा’क अंगिका पाठक भाग उपलब्ध अछि। ई डिजिटल पुनरुपस्थिति देखबैत अछि जे मुद्रित अंगिका बाल-साहित्य नब पाठकीय माध्यममे प्रवेश करि रहल अछि।
ठेठी-अंगिका — उपलब्ध बाहरी स्रोत ई परिसंचरण के आधुनिक रूप देखावै छै। भारतवाणी मूल पोथी तथा सम्बन्धित अध्ययन/ग्रंथावली कें सरकारी भाषा-ज्ञान पोर्टलपर सूचीबद्ध करै छै। Kavita Kosh ‘तुक्तक-मुक्तक’ कें ई-पुस्तक/बाल-कविता वर्ग में राखै छै, Gadya Kosh पर ‘बण्टा’ के अंगिका पाठक भाग उपलब्ध छै। ई डिजिटल पुनरुपस्थिति देखावै छै जे मुद्रित अंगिका बाल-साहित्य नब पाठकीय माध्यम में प्रवेश करी कें रहल छै।
मैथिली — ग्रन्थ 2022 धरि इतिहास लिखैत अछि; डिजिटल अध्ययनक क्षेत्र तकर बाद आरो बढ़ि सकैत अछि। आगाँक अध्ययनमे ई प्रश्न उठाओल जा सकैत अछि: कोन कृति digitize भेल? कोन audio रूपमे अछि? विद्यालय/घरमे के पढ़ैत अछि? बालक मोबाइल पर मातृभाषा सामग्री कोना ग्रहण करैत अछि? पुरान खेलगीत डिजिटल वीडियोमे बदलला पर प्रदर्शन-परम्परा बचैत अछि कि नब रूप लैत अछि? एहि अर्थमे ‘अंगिका बाल-साहित्य’ अतीतक catalogue मात्र नहि, 2022 बादक परिवर्तन मापबाक baseline सेहो अछि।
ठेठी-अंगिका — ग्रन्थ 2022 तक इतिहास लिखै छै; डिजिटल अध्ययन के क्षेत्र तकर बाद आरो बढ़ि सकै छै। नब शोध कें पूछै के चाही: कोन कृति digitize होलै? कोन audio रूप में छै? विद्यालय/घर में के पढ़ै छै? बालक मोबाइल पर मातृभाषा सामग्री केना ग्रहण करै छै? पुरान खेलगीत डिजिटल वीडियो में बदलला पर प्रदर्शन-परम्परा बचै छै कि नब रूप लै छै? ई अर्थ में ‘अंगिका बाल-साहित्य’ अतीत के catalogue मात्र नै, 2022 बाद के परिवर्तन मापै के baseline भी छै।
21. भारतीय आ अन्तरराष्ट्रीय बाल-साहित्य-अध्ययनसँ तुलनात्मक संवाद
ठेठी-अंगिका: 21. भारतीय आरो अन्तरराष्ट्रीय बाल-साहित्य-अध्ययन सें तुलनात्मक संवाद
मैथिली — डॉ. अमरेन्द्रक पोथी पश्चिमी सिद्धान्तक अनुकरण करबाक उद्देश्यसँ नहि लिखल गेल अछि, आ ओकर मूल्य ताहिमे नहि खोजल जाए। तथापि तुलनात्मक अध्ययनसँ ओकर मौलिक बिन्दु स्पष्ट होइत अछि। Hans-Heino Ewers बाल-साहित्यक वर्गीकरण, बालोपयुक्तता, पाठकक आवश्यकता आ मूल्यक अनुकूलनक प्रश्न उठबैत छथि। मूल पोथीक पृष्ठ 8–9 बाल-मन, कल्पना, तर्क, जिद, लय, चित्र आ अप्रत्यक्ष संदेशकेँ जे महत्त्व दैत अछि, से एहि child-oriented दृष्टिसँ सहज संवाद करैत अछि।
ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र के पोथी पश्चिमी सिद्धान्त के अनुकरण करै के उद्देश्य सें नै लिखलों गेलों छै, आरो ओकर मूल्य ताहि में नै खोजल जाए। तथापि तुलनात्मक अध्ययन सें ओकर मौलिक बिन्दु स्पष्ट होय छै। Hans-Heino Ewers बाल-साहित्य के वर्गीकरण, बालोपयुक्तता, पाठक के आवश्यकता आरो मूल्य के अनुकूलन के प्रश्न उठावै छै। मूल पोथी के पृष्ठ 8–9 बाल-मन, कल्पना, तर्क, जिद, लय, चित्र आरो अप्रत्यक्ष संदेश कें जे महत्त्व दै छै, से ई child-oriented दृष्टि सें सहज संवाद करै छै।
मैथिली — Kimberley Reynolds बाल-साहित्यक इतिहासमे शिक्षामूलक आरम्भ, बादमे विविध विधा, मौखिक परम्परासँ पीढ़ीक साहित्यिक दीक्षा, आ समाजक मूल्य/भविष्यक कल्पनासँ सम्बन्धक चर्चा करैत छथि। अंगिका सामग्रीमे सेहो लोरी-तुक्तक-खेलगीतसँ नैतिक कथा, प्रकृति, विज्ञान, पर्यावरण, स्वास्थ्य आ सामाजिक विषय धरि विस्तार भेटैत अछि। ई समानता ई सिद्ध नहि करैत जे अंगिका विकास कोनो बाहरी मॉडल अनुसरण करैत अछि; मात्र ई देखबैत अछि जे बाल-साहित्यक किछु मूल प्रश्न—आनन्द बनाम शिक्षा, बालक बनाम वयस्क मध्यस्थ, मौखिकता बनाम मुद्रण, उपयुक्तता बनाम साहित्यिक स्वतन्त्रता—अनेक भाषिक संस्कृतिमे पुनः प्रकट होइत अछि।
ठेठी-अंगिका — Kimberley Reynolds बाल-साहित्य के इतिहास में शिक्षामूलक आरम्भ, बाद में विविध विधा, मौखिक परम्परा सें पीढ़ी के साहित्यिक दीक्षा, आरो समाज के मूल्य/आगू के कल्पना सें सम्बन्ध के चर्चा करै छै। अंगिका सामग्री में भी लोरी-तुक्तक-खेलगीत सें नैतिक कथा, प्रकृति, विज्ञान, पर्यावरण, स्वास्थ्य आरो सामाजिक विषय तक विस्तार भेटै छै। ई समानता ई सिद्ध नै करै जे अंगिका विकास कोनो बाहरी मॉडल अनुसरण करै छै; मात्र ई देखावै छै जे बाल-साहित्य के कुछु मूल प्रश्न—आनन्द बनाम शिक्षा, बालक बनाम वयस्क मध्यस्थ, मौखिकता बनाम मुद्रण, उपयुक्तता बनाम साहित्यिक स्वतन्त्रता—अनेक भाषिक संस्कृति में पुनः प्रकट होय छै।
मैथिली — भारतीय भाषिक तुलना लेल मैथिली, हिन्दी, बंगला, भोजपुरी, मगही आदि बाल-परम्परासँ समान विधागत प्रश्न उठाओल जा सकैत अछि, मुदा बिना समर्पित corpus तुलनात्मक श्रेष्ठता वा प्रभावक दावा उचित नहि। आगाँक तुलनात्मक अध्ययनक सही पद्धति होएत—एके विधा, जइसे लोरी, पहेली, खेलगीत वा बालकथा, लेल समान कालखंड आ समान कसौटी पर समांतर भाषिक corpus बनब। छोट भाषा वा सहभाषाक साहित्यक मूल्य साबित करबाक नामपर अतिरंजना इतिहासक सेवा नहि करैत; ‘अंगिका बाल-साहित्य’क वास्तविक स्रोत-सम्पदा स्वयं पर्याप्त अछि।
ठेठी-अंगिका — भारतीय भाषिक तुलना लेल मैथिली, हिन्दी, बंगला, भोजपुरी, मगही आदि बाल-परम्परा सें समान विधागत प्रश्न उठावलों जाय सकै छै, मतरकि बिना समर्पित corpus तुलनात्मक श्रेष्ठता वा प्रभाव के दावा उचित नै। आगू के शोध के सही पद्धति होतै—एके विधा, जइसे लोरी, पहेली, खेलगीत वा बालकथा, लेल समान कालखंड आरो समान कसौटी पर समांतर भाषिक corpus बनब। छोट भाषा वा सहभाषा के साहित्य के मूल्य साबित करै के नामपर अतिरंजना इतिहास के सेवा नै करै; ‘अंगिका बाल-साहित्य’ के वास्तविक स्रोत-सम्पदा अपने पर्याप्त छै।
चतुर्आयामी समीक्षा : रस-ध्वनि-वक्रोक्ति, पाश्चात्य सिद्धान्त, नव्य-न्याय आ समान्तर-इतिहास
ठेठी-अंगिका: चतुर्आयामी समीक्षा
प्रथम आयाम: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति (भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि)
ठेठी-अंगिका: पहिलों आयाम : रस-ध्वनि-वक्रोक्ति (भारतीय काव्यशास्त्र के नजर)
मैथिली — रस-विचार: बाल-साहित्यक अधिष्ठातृ रस वात्सल्य थिक। तेल-मालिश आ खान-पानक गीतमे शिशु आलम्बन-विभाव, माताक स्पर्श-चेष्टा उद्दीपन-विभाव, आ ‘नुनू मोटाय जाय’, ‘बढ़ौं लप-लप’ सन पद अनुभाव-रूपें वात्सल्यक परिपाक करैत अछि। लेखक (चाहे शास्त्रीय पारिभाषिकता बिना) एहि रस-व्यवस्था केँ प्रसंगानुसार सजाकए अनजानहिं रस-सिद्धान्तक व्यावहारिक प्रयोग करैत छथि।
ठेठी-अंगिका — रस के नजर सें : बाल-साहित्य के मुखिया रस वात्सल्य छै। तेल-मालिश आरो खाना-पीना के गीत में सिसु आलम्बन-विभाव, माय के छू-छू-चेष्टा उद्दीपन-विभाव, आरो ‘नुनू मोटाय जाय’, ‘बढ़ौं लप-लप’ जइसन पद अनुभाव के रूप में वात्सल्य के पकाबै छै। लेखक (चाहे शास्त्रीय पारिभाषिकता बिना) एहि रस-व्यवस्था के परसंग के हिसाब सें सजा कें अनजानहिं रस-सिद्धान्त के व्यवहार करी दै छै।
मैथिली — ध्वनि-विचार: लेखकक ई कथन जे ‘संदेश व्यंजनामे उभरैत अछि, अभिधामे नहि’—ई आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक ठेठ अंगिका-रूपान्तर थिक। तुक्तक-काव्यक निरर्थक-प्रतीत शब्द वस्तुतः शब्द-शक्तिमूलक ध्वनि—अर्थक अपेक्षा नाद-सौन्दर्यक व्यंजना। बुझौवलमे अर्थ-ध्वनि (उत्तर व्यंग्य रूपमे स्फुरित होइत अछि), आ ‘सोन चिरैया’क वर्षा-आनयनकारी सोन-पक्षीमे वस्तु-ध्वनि (सूखल जीवनमे आशा आ नवजीवनक व्यंजना) प्रकट होइत अछि।
ठेठी-अंगिका — ध्वनि के नजर सें : लेखक के ई बात कि ‘संदेस व्यंजना में उभरै छै, अभिधा में नै’—ई आनन्दवर्धन के ध्वनि-सिद्धान्त के ठेठ अंगिका-रूपान्तर छै। तुक्तक-काव्य के बेमतलब जइसन लागै वाला सबद असल में सबद-सक्ति वाला ध्वनि छै—अरथ सें बेसी नाद के सुन्नरता के व्यंजना। बुझौवल में अर्थ-ध्वनि (जबाब व्यंग्य के रूप में फुरै छै), आरो ‘सोन चिरैया’ के बरखा-लानै वाला सोन-पंछी में वस्तु-ध्वनि (सुखलों जिनगी में आस आरो नया-जीवन के व्यंजना) उभरै छै।
मैथिली — वक्रोक्ति-विचार: बुझौवल कुन्तकक वक्रोक्तिक शुद्धतम रूप थिक। ‘फरैं नै फूलै’ सन निषेध-मुखी पहेली पद-वक्रता (शब्द-स्तरीय वैचित्र्य) थिक; ‘एक सङ दू साथी’ वाक्य-वक्रता; आ हड़ियाक स्वगत-कथन प्रकरण-प्रबन्ध-वक्रता, जतय समस्त कथन-भंगिमा वक्र भ’ आत्म-कथा बनि जाइत अछि। एतय भारतीय वक्रोक्ति स्वयंसिद्ध रूपें अंगिका लोक-प्रतिभामे मूर्त अछि।
ठेठी-अंगिका — वक्रोक्ति के नजर सें : बुझौवल कुन्तक के वक्रोक्ति के सबसें सुथरा रूप छै। ‘फरैं नै फूलै’ जइसन निषेध-मुँहका पहेली पद-वक्रता (सबद-स्तर के वैचित्र्य) छै; ‘एक सङ दू साथी’ वाक्य-वक्रता; आरो हड़िया के स्वगत-कथन प्रकरण-प्रबन्ध-वक्रता, जहाँ पूरा कहै के भंगिमा वक्र होय कें आत्म-कथा बनी जाय छै। एहिजा भारतीय वक्रोक्ति अपने-आप अंगिका लोक-परतिभा में मूरत छै।
मैथिली — वक्रोक्ति-विस्तार: कुन्तकक ‘वक्रोक्तिजीवित’मे छह प्रकारक वक्रता (वक्रता-वैचित्र्य) मानल गेल अछि, आ ओ छहो एहि लोक-सामग्रीमे स्तर-स्तर पर साक्षात् भेटैत अछि। (१) वर्ण-विन्यास-वक्रता—वर्ण-योजनाक चारुता, जे ‘चप-चप’, ‘लप-लप’, ‘टूमुक ठुमुक’ सन अनुप्रास-मय नाद-सौन्दर्यमे प्रकट; इएह तुक्तक-काव्यक प्राण थिक। (२) पद-पूर्वार्ध-वक्रता—पदक मूल (प्रातिपदिक)क चयनमे वैचित्र्य, जे ‘नूनु’, ‘बुतरू’, ‘गट्टा’ सन देशज-वात्सल्यमय रूढ़ि-शब्दक चयनमे आ वात्सल्य-द्योतक लघुता-प्रत्ययमे। (३) पद-पराद्ध अर्थात् प्रत्यय-वक्रता—विभक्ति, काल, पुरुष, संख्या आदिक चारुता, जे हड़िया-बुझौवलमे प्रत्यक्ष: ‘छेलाँ...पहनला...सहबौ’मे काल-वक्रता आ प्रथम-पुरुष प्रयोगमे पुरुष-वक्रता। (४) वाक्य-वक्रता—समग्र वाक्यक भंगिमा, जे ‘फरैं नै फूलै, ढकमोरै गाछ’ सन विरोधाभास-वाक्यमे उत्तर केँ व्यंग्य-रूपें सुझबैत अछि। (५) प्रकरण-वक्रता—प्रसंग-रचनाक वक्रता, जे हड़ियाक स्वगत-कथन सन लघु-नाट्य-प्रसंगमे आ जीव-जन्तुक संवाद-गीतमे। (६) प्रबन्ध-वक्रता—समस्त कृतिक संरचनात्मक वक्रता, जे ‘सोन चिरैया’ सन गीतक ध्रुव-आवर्तनक स्थापत्यमे। एहि षड्विध विश्लेषणसँ स्पष्ट अछि जे अंगिका लोक-बाल-काव्य कुन्तकक वक्रोक्तिक जीवन्त, परत-दर-परत मूर्त उदाहरण थिक।
ठेठी-अंगिका — वक्रोक्ति-विस्तार : कुन्तक के ‘वक्रोक्तिजीवित’ में छह किसिम के वक्रता (वक्रता-वैचित्र्य) मानलों छै, आरो ऊ छहो एहि लोक-सामग्री में परत-दर-परत साक्षात् मिलै छै। (१) वर्ण-विन्यास-वक्रता—वर्ण-जोड़ के चारुता, जे ‘चप-चप’, ‘लप-लप’, ‘टूमुक ठुमुक’ जइसन अनुप्रास वाला नाद-सुन्नरता में दिखै छै; इहे तुक्तक-काव्य के परान छै। (२) पद-पूर्वार्ध-वक्रता—पद के मूल (प्रातिपदिक) के चुनाव के वैचित्र्य, जे ‘नूनु’, ‘बुतरू’, ‘गट्टा’ जइसन देसज-वात्सल्य वाला रूढ़ि-सबद के चुनाव में आरो लाड़ वाला छोटकाइ-परत्यय में। (३) पद-पराद्ध यानी प्रत्यय-वक्रता—विभक्ति, काल, पुरुष, संख्या आदि के चारुता, जे हड़िया-बुझौवल में सोझे : ‘छेलाँ...पहनला...सहबौ’ में काल-वक्रता आरो पहिलों-पुरुष के परयोग में पुरुष-वक्रता। (४) वाक्य-वक्रता—पूरा वाक्य के भंगिमा, जे ‘फरैं नै फूलै, ढकमोरै गाछ’ जइसन विरोधाभास-वाक्य में जबाब के व्यंग्य के रूप में सुझाबै छै। (५) प्रकरण-वक्रता—परसंग-रचना के वक्रता, जे हड़िया के स्वगत-कथन जइसन नान्हकी-नाट्य-परसंग में आरो जीव-जन्तु के संवाद-गीत में। (६) प्रबन्ध-वक्रता—पूरा कृति के बनावट के वक्रता, जे ‘सोन चिरैया’ जइसन गीत के ध्रुव-लौटान के स्थापत्य में। एहि छह-किसिम विश्लेषण सें साफ छै कि अंगिका लोक-बाल-काव्य कुन्तक के वक्रोक्ति के जिन्दा, परत-दर-परत मूरत उदाहरण छै।
दोसर आयाम: पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त
ठेठी-अंगिका: दोसरका आयाम : पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त
मैथिली — अनुवाद-सिद्धान्त: अमरेन्द्रक बाल-रक्षक रूपान्तर स्कोपोस-सिद्धान्त (फेर्मेयर)क उदाहरण थिक—अनुवादक ‘प्रयोजन’ (बाल-उपयुक्तता) लक्ष्यपाठ केँ निर्धारित करैत अछि, स्रोत-समतुल्यता नहि। ई लक्ष्य-संस्कृति-अभिमुख (टूरी) आ ‘देशीकरण’ (डोमेस्टिकेशन—वेनुती) अनुवाद थिक; जखन कि कथाक बीच संस्कृत श्लोक राखब ‘विदेशीकरण’क अवशेष, जे प्रवाह तोड़ैत अछि—लेखक इएह विदेशीकरण-दोष केँ लक्षित करैत छथि।
ठेठी-अंगिका — अनुवाद-सिद्धान्त के नजर सें : अमरेन्द्र के बाल-रक्षक रूपान्तर स्कोपोस-सिद्धान्त (फेर्मेयर) के उदाहरण छै—अनुवाद के ‘परयोजन’ (बाल-उपयुक्तता) लक्ष्य-पाठ के तय करै छै, स्रोत के बरोबरी नै। ई लक्ष्य-संस्कृति-मुँहका (टूरी) आरो ‘देसीकरण’ (वेनुती) वाला अनुवाद छै; जबकि कथा के बीच संस्कृत श्लोक राखब ‘विदेसीकरण’ के बचलों-खुचलों अंस छै, जे बहाव के तोड़ी दै छै—लेखक इहे विदेसीकरण-दोष के पकड़ी लै छै।
मैथिली — पाठक-प्रतिक्रिया: बाल-साहित्य ‘अन्तर्निहित पाठक’ (इज़र)क सिद्धान्तक जीवन्त क्षेत्र थिक—एतय अन्तर्निहित पाठक शिशु थिक, आ अनुवादक ओही अन्तर्निहित बालक केँ ध्यानमे राखि क्रूर-दृश्य बदलैत अछि। रूपवाद-दृष्टिएँ बुझौवल श्क्लोव्स्कीक ‘विच्छित्ति’ (defamiliarization)क उदाहरण थिक—पान, चक्की आ हाँड़ी सन परिचित वस्तु केँ अपरिचित बनाकए पुनः-दर्शन करबैत अछि। ई पाश्चात्य विच्छित्ति आ भारतीय वक्रोक्तिक अद्भुत संगम-बिन्दु थिक। लोकसाहित्य-दृष्टिएँ लोरीक पुनरावृत्त पद (‘नूनु... नूनु...’) पैरी-लॉर्डक मौखिक-सूत्रात्मक (oral-formulaic) रचना-विधिक साक्ष्य थिक।
ठेठी-अंगिका — पाठक-परतिक्रिया के नजर सें : बाल-साहित्य ‘अन्तर्निहित पाठक’ (इज़र) के सिद्धान्त के जीता-जागता खेत छै—एहिजा अन्तर्निहित पाठक सिसु छै, आरो अनुवाद ओकरे ध्यान में राखी कें करूर-दृश्य बदली दै छै। रूपवाद के नजर सें बुझौवल श्क्लोव्स्की के ‘विच्छित्ति’ (defamiliarization) के उदाहरण छै—पान, चक्की, हाँड़ी जइसन जानल-चिन्हल चीज के अनजान बना कें फेर सें देखाबै छै। ई पाश्चात्य विच्छित्ति आरो भारतीय वक्रोक्ति के अजगुत संगम-बिन्दु छै। लोकसाहित्य के नजर सें लोरी के दोहराइलों पद (‘नूनु... नूनु...’) पैरी-लॉर्ड के मौखिक-सूत्रात्मक रचना-विधि के सबूत छै।
तेसर आयाम: नव्य-न्यायमूलक ज्ञानमीमांसा
ठेठी-अंगिका: तेसरका आयाम : नव्य-न्याय वाला ज्ञानमीमांसा
मैथिली — बुझौवल एकटा प्रमाण-क्रीड़ा थिक: उत्तर प्रमेय थिक, जे सादृश्यक ओहार-तर नुकाएल; ओकर बोध उपमानसँ प्रेरित अनुमिति थिक, जकर मूल व्याप्ति-ग्रहण अछि। बालक ‘गाछ केँ लपेटैत, फल-फूल-रहित’ लक्षण देखि, ओहि लक्षणसँ ‘पान’ प्रमेयक अनुमिति करैत अछि। ‘फरैं नै फूलै’ सन निषेध-मुखी पहेली व्यतिरेकी अनुमानक अभ्यास थिक—जे-जे नहि, ताहि केँ हटाकए शेषसँ निर्णय; ई अभावक ज्ञान (अनुपलब्धि-प्रमाण)क बाल-पाठ थिक।
ठेठी-अंगिका — बुझौवल एगो परमाण-खेल छै : जबाब परमेय छै, जे सादृश्य के ओहार-तर छिपलों; ओकर बोध उपमान सें उपजलों अनुमिति छै, जेकर जड़ में व्याप्ति-ग्रहण छै। बुतरू ‘गाछ के लपेटै वाला, फल-फूल-हीन’ लच्छन देखी कें, वहै लच्छन सें ‘पान’ परमेय के अनुमान करी लै छै। ‘फरैं नै फूलै’ जइसन निषेध-मुँहका पहेली व्यतिरेकी अनुमान के अभ्यास छै—जे-जे नै, ओकरा हटा कें बाँकी सें फैसला; ई अभाव के ज्ञान (अनुपलब्धि) के बाल-पाठ छै।
मैथिली — बुझौवल आ लोरी शब्दक अभिधा-लक्षणा-व्यञ्जना—तीनू वृत्तिक क्रीड़ास्थल थिक; लेखकक ‘अभिधा बनाम व्यंजना’क भेद प्रकारान्तरे शब्द-शक्ति-मीमांसा थिक। एतबहि नहि, बुझौवल जानि-बूझि विपर्यय (भ्रम) उत्पन्न करैत अछि, जकर निवृत्तिमे प्रमा (यथार्थ ज्ञान) उपजैत अछि—एहि अर्थें बुझौवल ख्याति-विवाद (भ्रमक स्वरूप)क लघु प्रयोगशाला थिक। अनुवादक दिशिमे देखी तँ भावानुवाद पदार्थ (शब्द-अर्थ) केँ नहि, तात्पर्य (वक्तृ-अभिप्रेत) केँ संरक्षित करैत अछि—ई मीमांसक-नैयायिक तात्पर्य-वृत्तिक अनुप्रयोग थिक; अमरेन्द्रक अनुवाद-निर्णय एही सिद्धान्त पर टिकल अछि।
ठेठी-अंगिका — बुझौवल आरो लोरी सबद के अभिधा-लक्षणा-व्यञ्जना—तीनू वृत्ति के खेल-मैदान छै; लेखक के ‘अभिधा बनाम व्यंजना’ के फरक असल में सबद-सक्ति-मीमांसा छै। एतने नै, बुझौवल जानी-बूझी कें विपर्यय (भ्रम) पैदा करै छै, जेकर निवृत्ति में प्रमा (सच्चा ज्ञान) उपजै छै—एहि अरथ में बुझौवल ख्याति-विवाद (भ्रम के सरूप) के नान्हकी परयोगशाला छै। अनुवादक के दिसाय देखी तें भावानुवाद पदार्थ (सबद-अरथ) के नै, तात्पर्य (कहै वाला के मनसा) के बचाबै छै—ई मीमांसक-नैयायिक तात्पर्य-वृत्ति के परयोग छै; अमरेन्द्र के अनुवाद-फैसला इहे सिद्धान्त पर टिकलों छै।
मैथिली — एहि बुझौवल-अनुमितिक शास्त्रीय आधार गङ्गेश उपाध्यायक ‘तत्त्वचिन्तामणि’क व्याप्तिवादमे भेटैत अछि। ओतय व्याप्तिक पाँच पूर्वपक्षी लक्षण—‘व्याप्ति-पञ्चक’ अर्थात् पञ्चलक्षणी—क परीक्षा आ खण्डनक बाद गङ्गेश अपन सिद्धान्त-लक्षण ‘साध्याभाववदवृत्तित्व’ (जे साध्यक अभावयुक्त अधिकरणमे नहि रहैत, से) प्रस्तुत करैत छथि। बुझौवल-समाधानमे बालक अनजानहिं इएह व्याप्ति-ग्रहण करैत अछि—‘गाछ केँ लपेटैत, फल-फूल-रहित’ लक्षण जतय-जतय, ओतय-ओतय ‘पान’—एहि नियत-साहचर्य (अविनाभाव) केँ पकड़िकए ओ हेतुसँ साध्यक अनुमिति करैत अछि। एहि अर्थें प्रत्येक बुझौवल ओहि शास्त्रीय प्रश्नक—‘व्याप्ति की थिक’—एकटा लघु, लोकोन्मुख अभ्यास थिक।
ठेठी-अंगिका — ई बुझौवल-अनुमिति के शास्त्रीय आधार गङ्गेश उपाध्याय के ‘तत्त्वचिन्तामणि’ के व्याप्तिवाद में मिलै छै। ओहिजा व्याप्ति के पाँच पूर्वपक्षी लच्छन—‘व्याप्ति-पञ्चक’ यानी पञ्चलक्षणी—के परीक्षा आरो खण्डन के बाद गङ्गेश अपन सिद्धान्त-लच्छन ‘साध्याभाववदवृत्तित्व’ (जे साध्य के अभाव वाला अधिकरण में नै रहै, से) दै छै। बुझौवल के हल में बुतरू अनजानहिं इहे व्याप्ति-ग्रहण करै छै—‘गाछ के लपेटै वाला, फल-फूल-हीन’ लच्छन जहाँ-जहाँ, ओहिजा-ओहिजा ‘पान’—ई नियत-साहचर्य (अविनाभाव) के पकड़ी कें ऊ हेतु सें साध्य के अनुमान करी लै छै। एहि अरथ में हरेक बुझौवल ओहि शास्त्रीय सवाल—‘व्याप्ति की छै’—के एगो नान्हकी, लोक-मुँहका अभ्यास छै।
मैथिली — एहि व्याप्ति-पञ्चक (सिंहव्याघ्र-लक्षण)क पाँचू लक्षणक नामवार परीक्षा बुझौवल पर सोझे लागैत अछि, कारण उत्तम बुझौवल ठीक ओही दोष-सभसँ बचैत अछि, जाहिसँ उत्तम व्याप्ति-लक्षण बचैत अछि—
ठेठी-अंगिका — ई व्याप्ति-पञ्चक (सिंहव्याघ्र-लच्छन) के पाँचू लच्छन के नामवार परीक्षा बुझौवल पर सीधे लागै छै, कैलेकि बढ़िया बुझौवल ठीक ओहि दोष सें बचै छै, जेकरा सें बढ़िया व्याप्ति-लच्छन बचै छै—
मैथिली — (१) व्यभिचाराभाव-लक्षण: व्याप्ति = हेतुक व्यभिचाराभाव। दोष—अन्योन्याश्रय/आत्माश्रय, कारण ‘व्यभिचार’ स्वयं ‘व्याप्त्यभाव’सँ परिभाषित होइत अछि। (जे बुझौवल उत्तर-ज्ञान केँ पहिनहिं मानिकए चलैत अछि, से चक्रक-दोषग्रस्त।) (२) साध्याभाववदवृत्तित्व-लक्षण (सरल रूप): हेतुक साध्याभावाधिकरणमे अवृत्ति। दोष—अप्रसिद्धि, कारण केवलान्वयी साध्य (यथा ज्ञेयत्व, वाच्यत्व)मे साध्याभाव कतहु अप्रसिद्ध। (जकर अभाव-पक्ष नहि, तकर बुझौवल बालक केँ विरोध-वर्ग नहि दैत, तेँ अनुत्तरणीय।) (३) सामानाधिकरण्य-लक्षण: हेतु-साध्यक एके अधिकरणमे सह-अवस्थान। दोष—अतिव्याप्ति, कारण मात्र सह-अवस्थान व्यभिचारी हेतुमे सेहो सम्भव। (जे बुझौवल केवल एकटा साझा-धर्म दैत अछि—‘हरियर आ बढ़ैत’—से अनेक उत्तरमे लागि जाइत, तेँ द्व्यर्थक।) (४) साध्यवद्-अन्य-अवृत्तित्व-लक्षण: साध्यवान्सँ भिन्न सभमे हेतुक अवृत्ति। दोष—अन्योन्याभाव-जटिलता आ भागासिद्धि। (उत्तम बुझौवल इएह करैत अछि—सभ अन्य-उत्तर केँ बहिष्कृत क’ एके दिशि सङ्केत: ‘फल नहि, फूल नहि, गाछ केँ लपेटैत’ सभ आन गाछ केँ हटा ‘पान’ धरि पहुँचबैत अछि।) (५) सिद्धान्त-लक्षण (परिष्कृत): ‘प्रतियोगि-असमानाधिकरण-यत्-समानाधिकरण-अत्यन्ताभाव-अप्रतियोगि-साध्य-सामानाधिकरण्यम्’, संक्षेपमे परिष्कृत साध्याभाववदवृत्तित्व, जे सभ दोष-निवृत्त। (पूर्ण-निर्धारक बुझौवल—यथा हड़ियाक आत्म-कथन, जे लक्षण-समूहसँ अन्य सभ उत्तर केँ अत्यन्त-अभाव-रूपें हटा एके उत्तर छोड़ैत अछि—एही सिद्धान्त-लक्षणक काव्य-प्रतिरूप थिक।)
ठेठी-अंगिका — (१) व्यभिचाराभाव-लच्छन : व्याप्ति = हेतु के व्यभिचाराभाव। दोष—अन्योन्याश्रय/आत्माश्रय, कैलेकि ‘व्यभिचार’ अपने ‘व्याप्त्यभाव’ सें परिभाषित होय छै। (जे बुझौवल जबाब के पहिनहिं मानी कें चलै छै, से चक्रक-दोष वाला।) (२) साध्याभाववदवृत्तित्व-लच्छन (सरल रूप) : हेतु के साध्याभाव-अधिकरण में अवृत्ति। दोष—अप्रसिद्धि, कैलेकि केवलान्वयी साध्य (जइसन ज्ञेयत्व, वाच्यत्व) में साध्याभाव कहीं अप्रसिद्ध। (जेकर अभाव-पक्ष नै, ओकर बुझौवल बुतरू के विरोध-वर्ग नै दै, तें अनुत्तरणीय।) (३) सामानाधिकरण्य-लच्छन : हेतु-साध्य के एके अधिकरण में सह-अवस्थान। दोष—अतिव्याप्ति, कैलेकि खाली सह-अवस्थान व्यभिचारी हेतु में भी सम्भव। (जे बुझौवल खाली एगो साझा-धरम दै छै—‘हरियर आरो बढ़ै वाला’—से कई जबाब में लागी जाय छै, तें द्व्यर्थक।) (४) साध्यवद्-अन्य-अवृत्तित्व-लच्छन : साध्यवान् सें भिन्न सब में हेतु के अवृत्ति। दोष—अन्योन्याभाव-जटिलता आरो भागासिद्धि। (बढ़िया बुझौवल इहे करै छै—सब दोसरका जबाब के हटा कें एके ओर संकेत : ‘फल नै, फूल नै, गाछ के लपेटै वाला’ सब आन गाछ के हटा कें ‘पान’ तक पहुँचाबै छै।) (५) सिद्धान्त-लच्छन (परिष्कृत) : ‘प्रतियोगि-असमानाधिकरण-यत्-समानाधिकरण-अत्यन्ताभाव-अप्रतियोगि-साध्य-सामानाधिकरण्यम्’, संच्छेप में परिष्कृत साध्याभाववदवृत्तित्व, जे सब दोष सें मुक्त। (पूरा-निर्धारक बुझौवल—जइसन हड़िया के आत्म-कथन, जे लच्छन-समूह सें दोसरका सब जबाब के अत्यन्त-अभाव के रूप में हटा कें एके जबाब छोड़ै छै—इहे सिद्धान्त-लच्छन के काव्य-रूप छै।)
मैथिली — एहि तुलनासँ एकटा नियम उभरैत अछि: जेना अतिव्याप्ति आ अव्याप्ति व्याप्ति-लक्षण केँ दूषित करैत अछि, तहिना द्व्यर्थकता (अतिव्याप्ति) आ अनुत्तरणीयता (अव्याप्ति) बुझौवल केँ दूषित करैत अछि। उत्तम बुझौवल एकटा निर्दोष व्याप्ति-लक्षण जकाँ ‘असंदिग्ध-एकोत्तर’ होइत अछि—इएह अंगिका बुझौवल-परम्पराक अलिखित तर्कशास्त्र थिक।
ठेठी-अंगिका — एहि तुलना सें एगो नियम उभरै छै : जइसन अतिव्याप्ति आरो अव्याप्ति व्याप्ति-लच्छन के दूषित करै छै, ओइसने द्व्यर्थकता (अतिव्याप्ति) आरो अनुत्तरणीयता (अव्याप्ति) बुझौवल के दूषित करै छै। बढ़िया बुझौवल एगो निर्दोष व्याप्ति-लच्छन जइसन ‘असंदिग्ध-एके-जबाब वाला’ होय छै—इहे अंगिका बुझौवल-परम्परा के बिन-लिखलों तर्कशास्त्र छै।
मैथिली — अनुवाद-प्रसंगमे तात्पर्य-वृत्तिक सिद्धान्त प्रासंगिक थिक। शाब्दबोधक चारि हेतु—आकाङ्क्षा, योग्यता, सन्निधि (आसत्ति) आ तात्पर्य—मे तात्पर्य (वक्तृ-विवक्षा) अर्थ-निर्णायक होइत अछि; जतय मुख्यार्थमे बाध होइत अछि आ तात्पर्य असंगत भ’ जाइत अछि, ओतय लक्षणा प्रवृत्त होइत अछि। भावानुवाद इएह करैत अछि—ओ पदार्थ (पद-वाच्य अर्थ) केँ छोड़ि तात्पर्य (अभिप्रेत भाव) केँ लक्ष्य-भाषामे उतारैत अछि। अमरेन्द्रक बाल-रक्षक रूपान्तर एही तात्पर्य-प्राधान्यक व्यावहारिक रूप थिक—शब्दक दास नहि, तात्पर्यक सेवक।
ठेठी-अंगिका — अनुवाद के परसंग में तात्पर्य-वृत्ति के सिद्धान्त कामें के छै। शाब्दबोध के चार हेतु—आकाङ्क्षा, योग्यता, सन्निधि (आसत्ति) आरो तात्पर्य—में तात्पर्य (कहै वाला के विवक्षा) अरथ के तय करै छै; जहाँ मुख्यार्थ में बाध होय छै आरो तात्पर्य बेमेल होय जाय छै, ओहिजा लक्षणा चलै छै। भावानुवाद इहे करै छै—ऊ पदार्थ (पद के वाच्य अरथ) के छोड़ी कें तात्पर्य (मन के भाव) के लक्ष्य-भाषा में उतारै छै। अमरेन्द्र के बाल-रक्षक रूपान्तर इहे तात्पर्य-परधानता के व्यवहार-रूप छै—सबद के गुलाम नै, तात्पर्य के सेवक।
चतुर्थ आयाम: विदेह समान्तर-इतिहास-प्रारूप
ठेठी-अंगिका: चौथका आयाम : विदेह समान्तर-इतिहास-प्रारूप
मैथिली — प्रति-कैनन पाठ: अंगिका बाल-साहित्य—लोक, स्त्री, दलित आ ग्रामीण स्वरक भण्डार—साहित्य-अकादमीक हिन्दी-केन्द्रित संस्थागत इतिहासमे प्रायः अनुपस्थित। एहि सामग्रीक प्रलेखन स्वयं एकटा समान्तर-ऐतिहासिक पुनरुद्धार थिक। स्त्री-कर्तृत्वक उद्घाटन एहि दृष्टिक मर्म थिक: लोरी-सभ मूलतः माताक रचना थिक—एकटा नुकाएल स्त्री-साहित्य-परम्परा। आत्मकथनमे लेखक अपन पुत्री वसुंधराक संकलन-श्रम केँ स्वीकारैत छथि; समान्तर-इतिहास एही मातृ-कर्तृत्व आ स्त्री-श्रम केँ अग्रभूमिमे आनैत अछि, जे ‘लोक’ नामक अनामी कोठलीमे विलीन भ’ गेल छल।
ठेठी-अंगिका — प्रति-कैनन पाठ : अंगिका बाल-साहित्य—लोक, स्त्री, दलित आरो गँवई सुर के भण्डार—साहित्य-अकादमी के हिन्दी-केन्द्रित संस्थागत इतिहास में अकसर गायब छै। एहि सामग्री के प्रलेखन अपने-आप में एगो समान्तर-ऐतिहासिक पुनरुद्धार छै। स्त्री-कर्तृत्व के उघारब एहि नजर के मरम छै : लोरी सिनी मूल रूप सें माय के रचना छै—एगो छिपलों स्त्री-साहित्य-परम्परा। आत्मकथन में लेखक अपन बेटी वसुंधरा के संकलन-मेहनत के मानी लै छै; समान्तर-इतिहास वहै माय-कर्तृत्व आरो स्त्री-मेहनत के आगू आनी दै छै, जे ‘लोक’ नाम के बेनाम कोठली में बिलाय गेलों छेलै।
मैथिली — औपनिवेशिक प्रलेखनक पुनर्ग्रहण: ईसाई पादरी आ ग्रियर्सनक अनुवाद औपनिवेशिक भाषा-प्रलेखन थिक; पोथी ओकरा भाषाविदक शीशीसँ निकालि जीवन्त बाल-साहित्यमे बदलि दैत अछि—ई पुनर्ग्रहण समान्तर-इतिहासक केन्द्रीय कर्म थिक। मुदा एहि प्रारूपक सभसँ तीक्ष्ण फल स्वयं एहि पोथी पर घूरैत अछि: जे पोथी प्रति-कैनन रचैत अछि, से हिन्दीमे लिखल अछि, मुख्यधारा-प्रकाशनसँ आबैत अछि, आ ओकर ‘सन्दर्भ’ प्रायः लेखकक अपन कृति-सभ थिक। तखन प्रश्न ई जे एहि सर्वेक्षणमे के-के छुटल? अनामी लोक-गायिका, मंच-कलाकार, आ ओ माता, जनिक लोरी ‘लोक’ कहि अनाम राखल गेल। समान्तर-इतिहास प्रति-कैननकेँ सेहो प्रति-प्रश्न करैत अछि—इएह ओकर इमानदारी थिक।
ठेठी-अंगिका — औपनिवेशिक प्रलेखन के फेर-हासिल करब : ईसाई पादरी आरो ग्रियर्सन के अनुवाद औपनिवेशिक भाषा-प्रलेखन छै; पोथी ओकरा भाषाविद के सीसी सें निकाली कें जीता-जागता बाल-साहित्य में बदली दै छै—ई फेर-हासिल समान्तर-इतिहास के केन्द्रीय काम छै। मतरकि एहि प्रारूप के सबसें तेज फल अपने एहि पोथी पर घूमी जाय छै : जे पोथी प्रति-कैनन बनाबै छै, से हिन्दी में लिखलों छै, मुख्यधारा-परकाशन सें आबै छै, आरो ओकर ‘संदर्भ’ अकसर लेखक के अपने कृति सिनी छै। तें सवाल ई कि एहि सर्वेक्षण में के-के छुटी गेलै? बेनाम लोक-गायिका, मंच-कलाकार, आरो ऊ माय, जेकर लोरी ‘लोक’ कही कें बेनाम राखी देलों गेलै। समान्तर-इतिहास प्रति-कैनन के भी प्रति-सवाल करै छै—इहे ओकर इमानदारी छै।
आधुनिक बाल-कविता: चतुर्आयामी पुनःपाठ
ठेठी-अंगिका: आधुनिक बाल-कविता : चतुर्आयामी पुनःपाठ
रस-ध्वनि-वक्रोक्ति
ठेठी-अंगिका: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति
मैथिली — विषय-वैविध्यसँ रस-वैविध्य उपजैत अछि—प्रकृति-काव्यमे अद्भुत आ शान्त, हास्य-गीतमे हास्य, राष्ट्रीय-गीतमे वीर आ मातृभूमि-वात्सल्य। मुदा अधिष्ठातृ रस एखनहुँ वात्सल्ये रहैत अछि, कारण सभ रस बाल-आस्वादक हेतु मृदूकृत भ’ अबैत अछि। ध्वनि-दृष्टिएँ ‘गतिशील प्रकृति’ स्वयं ध्वनि-प्रधान थिक: चलैत बिम्ब (स्थिर चाँद-तारा नहि, अपितु उछलैत कौआ आ बहैत नदी) बाल-मन केँ गति-चित्रक व्यंजना दैत अछि—लेखकक ई सूक्ष्म निरीक्षण जे बालक स्थिर चाँदसँ बेसी उछलैत कौआसँ बन्हाइत अछि, वस्तुतः ध्वनि-सिद्धान्तक बाल-मनोवैज्ञानिक रूपान्तर थिक। वक्रोक्ति-दृष्टिएँ एतय एकटा कसौटी उघरैत अछि: राष्ट्रीय आ उपदेश-गीतमे अभिधा (सीधा संदेश) बढ़ैत अछि आ वक्रता घटैत अछि, जखन कि हास्य-व्यंग्य आ गतिशील-प्रकृति-काव्यमे वक्रता आ वैचित्र्य सुरक्षित रहैत अछि।
ठेठी-अंगिका — विषय के भाँति-भाँति सें रस के भी भाँति-भाँति उपजै छै—परकृति-काव्य में अद्भुत आरो शान्त, हास्य-गीत में हास्य, राष्ट्रीय-गीत में वीर आरो मातृभूमि-वात्सल्य। मतरकि मुखिया रस अखनी वात्सल्ये रहै छै, कैलेकि सब रस बाल-आस्वाद लेली नरम बनी कें आबै छै। ध्वनि के नजर सें ‘गतिशील परकृति’ अपने ध्वनि-परधान छै : चलै वाला बिम्ब (थिर चाँद-तारा नै, बल्कि उछलै वाला कौआ आरो बहै वाला नदी) बाल-मन के गति-चित्र के व्यंजना दै छै—लेखक के ई बारीक निरीक्षण कि बुतरू थिर चाँद सें बेसी उछलै वाला कौआ सें बन्हाय छै, असल में ध्वनि-सिद्धान्त के बाल-मनोवैज्ञानिक रूपान्तर छै। वक्रोक्ति के नजर सें एहिजा एगो कसौटी उभरै छै : राष्ट्रीय आरो उपदेश-गीत में अभिधा (सीधा संदेस) बढ़ै छै आरो वक्रता घटै छै, जबकि हास्य-व्यंग्य आरो गतिशील-परकृति-काव्य में वक्रता आरो वैचित्र्य बचलों रहै छै।
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त
ठेठी-अंगिका: पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त
मैथिली — गतिशील-प्रकृति-काव्य बाल-अनुभववाद (पियाजे-सम्मत) केँ प्रतिध्वनित करैत अछि—बालक इन्द्रिय-गति-क्रियासँ जगत् बुझैत अछि, तेँ ‘स्थिरता’सँ ‘गति’क प्राथमिकता बाल-विकास-मनोविज्ञानसँ मेल खाइत अछि। राष्ट्रीय आ शिक्षा-गीतमे ‘उपदेशात्मकता’ (didacticism) प्रबल होइत अछि—एतय बाल-साहित्यक ओ शाश्वत तनाव प्रकट होइत अछि जे ‘शिक्षा’ आ ‘आनन्द’क बीच अछि (रूसो-मूलक उपदेशवाद बनाम आनन्दवादी परम्परा); लेखक अनकहने आनन्दक पक्षमे झुकैत छथि। हास्य-व्यंग्य-गीत (मामा-मामीक विपरीत-चित्र) बख्तिनक ‘कार्निवल’ आ भूमिका-विपर्ययक लोक-रूप थिक, जतय सामाजिक क्रम उनटि-पुनटि हास्य रचैत अछि। आ आंचलिक-काव्य क्षेत्रीय-भाषिक अस्मिताक साक्ष्य थिक—वैश्विक बनाम स्थानीयक समकालीन बहसक बाल-संस्करण।
ठेठी-अंगिका — गतिशील-परकृति-काव्य बाल-अनुभववाद (पियाजे-सम्मत) के गूँज छै—बुतरू इन्द्रिय-गति-किरिया सें जगत बुझै छै, तें ‘थिरता’ सें ‘गति’ के पहिलौती बाल-विकास-मनोविज्ञान सें मेल खाय छै। राष्ट्रीय आरो शिक्षा-गीत में ‘उपदेशात्मकता’ (didacticism) जोर पकड़ै छै—एहिजा बाल-साहित्य के ऊ पुरनका तनाव उभरै छै जे ‘शिक्षा’ आरो ‘आनन्द’ के बीच छै (रूसो-वाला उपदेशवाद बनाम आनन्दवादी परम्परा); लेखक बिन कहनहिं आनन्द के पक्ष में झुकै छै। हास्य-व्यंग्य-गीत (मामा-मामी के उलटा-चित्र) बख्तिन के ‘कार्निवल’ आरो भूमिका-विपर्यय के लोक-रूप छै, जहाँ समाजी क्रम उलटी-पुलटी कें हास्य बनाबै छै। आरो आंचलिक-काव्य क्षेत्रीय-भाषिक अस्मिता के सबूत छै—वैश्विक बनाम स्थानीय के आजुक बहस के बाल-रूप।
नव्य-न्यायमूलक ज्ञानमीमांसा
ठेठी-अंगिका: नव्य-न्याय वाला ज्ञानमीमांसा
मैथिली — गणित-गीत (‘लालच रों फोल’क अक्कड़-बक्कड़ गणना) प्रत्यक्षतः संख्या-प्रत्यक्ष आ गणना-अनुमिति सिखबैत अछि—ई प्रमाण-प्रशिक्षणक बाल-रूप थिक। राष्ट्रीय-गीतमे संदेश अभिधा-वृत्तिएँ सोझे अबैत अछि; एतय शब्द-शक्तिमे अभिधाक प्राधान्य आ व्यंजनाक अल्पता काव्यत्व केँ क्षीण करैत अछि—इएह लेखकक ‘अभिधा-दोष’-चेतनाक अनुरूप। गतिशील-प्रकृति-बिम्ब बालक केँ ‘गतिमान्’ धर्मसँ द्रव्यक प्रत्यभिज्ञा करबैत अछि—धर्म-धर्मी-भाव आ क्रिया-आश्रयक बाल-बोध, जे नव्य-न्यायक विशेषण-विशेष्य-विश्लेषणक सहज बीज थिक।
ठेठी-अंगिका — गणित-गीत (‘लालच रों फोल’ के अक्कड़-बक्कड़ गिनती) सोझे संख्या-प्रत्यक्ष आरो गिनती-अनुमिति सिखाबै छै—ई परमाण-परसिच्छन के बाल-रूप छै। राष्ट्रीय-गीत में संदेस अभिधा-वृत्ति सें सीधे आबै छै; एहिजा सबद-सक्ति में अभिधा के परधानता आरो व्यंजना के कमी काव्यत्व के घटा दै छै—इहे लेखक के ‘अभिधा-दोष’-चेतना के हिसाब सें छै। गतिशील-परकृति-बिम्ब बुतरू के ‘गतिमान्’ धरम सें दरब के पहचान कराबै छै—धरम-धरमी-भाव आरो किरिया-आश्रय के बाल-बोध, जे नव्य-न्याय के विशेषण-विशेष्य-विश्लेषण के सहज बीज छै।
विदेह समान्तर-इतिहास-प्रारूप
ठेठी-अंगिका: विदेह समान्तर-इतिहास-प्रारूप
मैथिली — आंचलिक-परिवेश-काव्य अंग-अस्मिताक प्रति-कैनन घोषणा थिक—हिन्दी-राष्ट्रभाषा-वर्चस्वक विरुद्ध क्षेत्रीय भाषिक गौरवक स्वर। मुदा एतहि एकटा दुइ-मुखी विरोधाभास प्रकट होइत अछि: राष्ट्रीयता-गीत (भारत माय, तिरंगा) मुख्यधारा-राष्ट्रवादक अनुकरण करैत अछि, आ एतय अंगिका अपन प्रति-कैनन स्वर छोड़ि केन्द्रक स्वरमे गाबय लगैत अछि। एक दिशि आंचलिक आत्म-पुष्टि, दोसर दिशि राष्ट्रीय आत्म-विलय—समान्तर-इतिहास एही द्वैतकेँ लक्षित करैत अछि। आगाँ, स्कूल-गीत (‘इस्कूल चल’, हिन्दी-इंग्लिश-स्कूलक कविता) भाषिक-वर्ग-राजनीति उघारैत अछि—अंग्रेजी-स्कूलक आकांक्षा आ मातृभाषाक चिन्ता; ई सबाल्टर्न शिक्षा-द्वन्द्वक एकटा अनमोल बाल-दस्तावेज़ थिक।
ठेठी-अंगिका — आंचलिक-परिवेश-काव्य अंग-अस्मिता के प्रति-कैनन घोषणा छै—हिन्दी-राष्ट्रभाषा-वर्चस्व के खिलाफ क्षेत्रीय भाषिक गौरव के सुर। मतरकि एहिजे एगो दुइ-मुँहका विरोधाभास उभरै छै : राष्ट्रीयता-गीत (भारत माय, तिरंगा) मुख्यधारा-राष्ट्रवाद के नकल करै छै, आरो एहिजा अंगिका अपन प्रति-कैनन सुर छोड़ी कें केन्द्र के सुर में गाबै लागै छै। एक ओर आंचलिक आत्म-पुष्टि, दोसर ओर राष्ट्रीय आत्म-विलय—समान्तर-इतिहास इहे दुहरापन के पकड़ै छै। आगू, स्कूल-गीत (‘इस्कूल चल’, हिन्दी-इंग्लिश-स्कूल के कविता) भाषिक-वर्ग-राजनीति के उघारै छै—अंग्रेजी-स्कूल के आस आरो मातृभाषा के चिन्ता; ई सबाल्टर्न शिक्षा-द्वन्द्व के एगो अनमोल बाल-दस्तावेज छै।
समवाय: चारू आयामक संगम
ठेठी-अंगिका: समवाय : चारू आयाम के संगम
मैथिली — चारू दृष्टि एके बिन्दु पर मिलैत अछि। बुझौवलक वक्रोक्ति (भारतीय), विच्छित्ति (पाश्चात्य), भ्रम-निवृत्ति-जन्य प्रमा (नव्य-न्याय) आ लोक-कर्तृत्वक पुनरुद्धार (समान्तर-इतिहास)—चारू एके सत्य केँ चारि भाषामे कहैत अछि: जे परिचित केँ अपरिचित बना, बोधक क्षण केँ आनन्द बना दैत अछि, आ ओहि आनन्दक स्रष्टा ओ अनाम लोक थिक, जकरा इतिहास बिसरि गेल। इएह अंगिका बाल-साहित्यक मर्म थिक, आ इएह एहि पोथीक—आंशिक—उपलब्धि आ—आंशिक—चूक, दुनू। आ आधुनिक बाल-कवितामे इएह संगम एकटा नव विभाजन-रेखा उघारैत अछि: जतय काव्य आंचलिक, गतिशील आ हास्य दिशि जाइत अछि, ओतय वक्रोक्ति, विच्छित्ति, व्यंजना आ प्रति-कैनन—चारू सजीव रहैत अछि; जतय राष्ट्रीय-उपदेश दिशि झुकैत अछि, ओतय चारू क्षीण भ’ जाइत अछि। इएह आधुनिक अंगिका बाल-कविताक आन्तरिक कसौटी थिक।
ठेठी-अंगिका — चारू नजर एके बिन्दु पर मिलै छै। बुझौवल के वक्रोक्ति (भारतीय), विच्छित्ति (पाश्चात्य), भ्रम-निवृत्ति सें उपजलों प्रमा (नव्य-न्याय) आरो लोक-कर्तृत्व के पुनरुद्धार (समान्तर-इतिहास)—चारू एके सच्चाई के चार भाषा में कहै छै : जे जानल-चिन्हल के अनजान बना कें, बोध के छन के आनन्द बना दै छै, आरो ओहि आनन्द के रचनहार ऊ बेनाम लोक छै, जेकरा इतिहास बिसरी गेलै। इहे अंगिका बाल-साहित्य के मरम छै, आरो इहे एहि पोथी के—कुछ हद तक—उपलब्धि आरो—कुछ हद तक—चूक, दुन्नु। आरो आधुनिक बाल-कविता में इहे संगम एगो नया बँटवारा-रेखा उघारै छै : जहाँ काव्य आंचलिक, गतिशील आरो हास्य ओर जाय छै, ओहिजा वक्रोक्ति, विच्छित्ति, व्यंजना आरो प्रति-कैनन—चारू जिन्दा रहै छै; जहाँ राष्ट्रीय-उपदेश ओर झुकै छै, ओहिजा चारू मद्धिम होय जाय छै। इहे आधुनिक अंगिका बाल-कविता के भीतरी कसौटी छै।
22. सामाजिक, लैङ्गिक आ पाठकीय प्रश्न: पोथीसँ आगाँक आलोचनात्मक क्षेत्र
ठेठी-अंगिका: 22. सामाजिक, लैङ्गिक आरो पाठकीय प्रश्न: पोथी सें आगाँ के आलोचनात्मक क्षेत्र
मैथिली — ग्रन्थ परिवार, माँ-बालक सम्बन्ध, ग्रामीण समाज, विद्यालय, बालिका-शिक्षा, अन्धविश्वास, प्रशासन, पर्यावरण, स्वास्थ्य आदि विषय छूैत अछि। एहि सामग्रीक आधारपर आधुनिक आलोचना किछु नब प्रश्न पूछि सकैत अछि। बालकक रूप एकरूप नहि—उमेर, लिंग, वर्ग, जाति, ग्रामीण/शहरी परिवेश, विद्यालय पहुँच, परिवारक ढाँचा, दिव्यांगता, भाषिक मिश्रण आदिसँ बाल-अनुभव बदलैत अछि। पोथी एहि सभ आयामकेँ व्यवस्थित analytical framework रूपमे नहि अपनबैत, मुदा कतेको सामग्री तकर सम्भावना खोलैत अछि।
ठेठी-अंगिका — ग्रन्थ परिवार, माँ-बालक सम्बन्ध, ग्रामीण समाज, विद्यालय, बालिका-शिक्षा, अन्धविश्वास, प्रशासन, पर्यावरण, स्वास्थ्य आदि विषय छूवै छै। ई सामग्री के आधारपर आधुनिक आलोचना कुछु नब प्रश्न पूछ सकै छै। बालक के रूप एकरूप नै—उमेर, लिंग, वर्ग, जाति, ग्रामीण/शहरी परिवेश, विद्यालय पहुँच, परिवार के ढाँचा, दिव्यांगता, भाषिक मिश्रण आदि सें बाल-अनुभव बदलै छै। पोथी ई सब आयाम कें व्यवस्थित analytical framework रूप में नै अपनावै, मतरकि कईगो सामग्री तकर सम्भावना खोलै छै।
मैथिली — बालिका-शिक्षा नाटकमे सामाजिक प्रश्न बनैत अछि; मातृस्वर लोकबाल-साहित्यक केन्द्र अछि; ग्रामीण परिवेश अनेक गीत-कथा-नाटकक आधार। आगाँक अध्ययन पूछि सकैत अछि—बालिकाक सक्रियता कोना चित्रित अछि? श्रम करयवला बच्चा, गरीब परिवार, अलग सामाजिक समुदाय वा शहरी बालकक प्रतिनिधित्व कतेक? नैतिक आदर्श बालक आ वास्तविक शरारती/जिद्दी बाल-चरित्रक अनुपात की? बालक स्वयं बोलैत अछि कि वयस्क कथावाचक ओकर behalf पर बोलैत अछि?
ठेठी-अंगिका — बालिका-शिक्षा नाटक में सामाजिक प्रश्न बनै छै; मातृस्वर लोकबाल-साहित्य के केन्द्र छै; ग्रामीण परिवेश अनेक गीत-कथा-नाटक के आधार। आगू के शोध पूछ सकै छै—बालिका के सक्रियता केना चित्रित छै? श्रम करै वाला बच्चा, गरीब परिवार, अलग सामाजिक समुदाय वा शहरी बालक के प्रतिनिधित्व कत्तें? नैतिक आदर्श बालक आरो वास्तविक शरारती/जिद्दी बाल-चरित्र के अनुपात की? बालक अपने बोलै छै कि वयस्क कथावाचक ओकर behalf पर बोलै छै?
मैथिली — पाठकीय शोधक अभाव सेहो महत्त्वपूर्ण अछि। पोथी प्रायः पाठकक सम्भावित प्रतिक्रिया आलोचकक अनुमानसँ बतबैत अछि। आगाँक पाठकीय अध्ययन—विद्यालयमे पाठ-सत्र, समूह-पठन, बालकक प्रतिक्रिया, पसन्द, स्मृति, चित्र-प्रतिक्रिया, audio बनाम print—साहित्यिक आलोचनाकेँ नब प्रमाण देत। पोथीकेँ आधुनिक सिद्धान्तक कसौटीपर कम साबित करब लक्ष्य नहि; ओकर संकलित सामग्रीकेँ नब शोध-प्रश्नक आधार बनब लक्ष्य अछि। एही अर्थमे ई आधार-ग्रन्थ अछि।
ठेठी-अंगिका — पाठकीय शोध के अभाव भी महत्त्वपूर्ण छै। पोथी प्रायः पाठक के सम्भावित प्रतिक्रिया आलोचक के अनुमान सें बतावै छै। आगू के empirical study—विद्यालय में पाठ-सत्र, समूह-पठन, बालक के प्रतिक्रिया, पसन्द, स्मृति, चित्र-प्रतिक्रिया, audio बनाम print—साहित्यिक आलोचना कें नब प्रमाण देत। पोथी कें आधुनिक सिद्धान्त के कसौटीपर कम साबित करब लक्ष्य नै; ओकर संकलित सामग्री कें नब शोध-प्रश्न के आधार बनब लक्ष्य छै। एही अर्थ में ई आधार-ग्रन्थ छै।
23. प्रमुख उपलब्धि: संरक्षण, इतिहास-निर्माण आ विधागत नक्शा
ठेठी-अंगिका: 23. प्रमुख उपलब्धि: संरक्षण, इतिहास-निर्माण आरो विधागत नक्शा
मैथिली — समग्र अध्ययनक बाद पोथीक पहिल पैघ उपलब्धि संरक्षण अछि। लोरी, पहेली, तुक्तक, खेलगीत, लोककथा, अनुवाद, बालगीत, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबन्ध, जीवनी—एहि सभकेँ एकहि आलोचनात्मक छतरीक नीचाँ आनल गेल अछि। छोट पत्रिका, सीमित संस्करण, मौखिक परम्परा आ निजी स्मृतिमे छितरायल सामग्रीक नाम इतिहासमे दर्ज भेल। एहन दस्तावेजीकरण बिना अगिला पीढ़ीक आलोचना अनेक स्रोतसँ वंचित रहि सकैत छल।
ठेठी-अंगिका — समग्र अध्ययन के बाद पोथी के पहिल बड़का उपलब्धि संरक्षण छै। लोरी, पहेली, तुक्तक, खेलगीत, लोककथा, अनुवाद, बालगीत, उपन्यास, कहानी, नाटक, निबन्ध, जीवनी—ई सब कें एकहि आलोचनात्मक छतरी के नीचाँ अनलों गेलों छै। छोट पत्रिका, सीमित संस्करण, मौखिक परम्परा आरो निजी स्मृति में छितरायलों सामग्री के नाम इतिहास में दर्ज होलै। एहन दस्तावेजीकरण बिना आगू के पीढ़ी के आलोचना अनेक स्रोत सें वंचित रहि सकै छेलै।
मैथिली — दोसर उपलब्धि इतिहास-निर्माण अछि। लेखक बाल-साहित्यक आरम्भ आधुनिक मुद्रणसँ नहि करैत छथि; लोक-शिशु संस्कृति धरि पाछाँ जाइत छथि। तेसर उपलब्धि बाल-मन केन्द्रित कसौटी अछि। साहित्य बच्चाकेँ शिक्षा देबाक माध्यम मात्र नहि; बच्चाक कल्पना, खेल, तर्क, जिद, लय आ अनुभवक अभिव्यक्ति अछि। चारिम उपलब्धि विधागत नक्शा अछि—पहेली, तुक्तक, खेलगीत, गजल, खण्डकाव्य; उपन्यास, कहानी, अनुवाद; एकांकी, खण्ड-नाटक, रेडियो/गीतिनाट्य; इतिहास-जीवनी।
ठेठी-अंगिका — दोसर उपलब्धि इतिहास-निर्माण छै। लेखक बाल-साहित्य के आरम्भ आधुनिक मुद्रण सें नै करै छै; लोक-शिशु संस्कृति तक पाछाँ जाय छै। तेसर उपलब्धि बाल-मन केन्द्रित कसौटी छै। साहित्य बच्चा कें शिक्षा दै के माध्यम मात्र नै; बच्चा के कल्पना, खेल, तर्क, जिद, लय आरो अनुभव के अभिव्यक्ति छै। चारिम उपलब्धि विधागत नक्शा छै—पहेली, तुक्तक, खेलगीत, गजल, खण्डकाव्य; उपन्यास, कहानी, अनुवाद; एकांकी, खण्ड-नाटक, रेडियो/गीतिनाट्य; इतिहास-जीवनी।
मैथिली — पाँचम उपलब्धि आत्मालोचना अछि। बाल-कहानीक अपर्याप्त विकास मानब, किछु क्षेत्रक कमी स्वीकार करब आ स्रोतक अभावक संकेत देब इतिहासकारक विश्वसनीयता बढ़बैत अछि। छठम उपलब्धि bibliographic memory अछि। अन्तिम सन्दर्भ-सूची आ पत्रिका-सूची पोथीकेँ institutional memory बनबैत अछि। एहि कारण ‘अंगिका बाल-साहित्य’ केवल साहित्यिक समीक्षा नहि, शोध-साधन सेहो अछि।
ठेठी-अंगिका — पाँचम उपलब्धि आत्मालोचना छै। बाल-कहानी के अपर्याप्त विकास मानब, कुछु क्षेत्र के कमी स्वीकार करब आरो स्रोत के अभाव के संकेत देब इतिहासकार के विश्वसनीयता बढ़ावै छै। छठम उपलब्धि bibliographic memory छै। अन्तिम सन्दर्भ-सूची आरो पत्रिका-सूची पोथी कें institutional memory बनावै छै। ई कारण ‘अंगिका बाल-साहित्य’ केवल साहित्यिक समीक्षा नै, शोध-साधन भी छै।
गुण
ठेठी-अंगिका: गुन / खूबी
मैथिली — पोथीक सभसँ पैघ उपलब्धि अछि—एकटा उपेक्षित आ छिड़िआयल परम्पराक व्यवस्थित प्रलेखन। जे सामग्री एतय-ओतय बाँटल छल, तकरा एक ठाम आनि, वर्गीकृत कए, स्रोत-सहित प्रस्तुत करब स्वयं एकटा शोध-कर्म थिक। दोसर बलिष्ठ पक्ष अछि लेखकक द्वैध भूमिका—ओ अंगिका बाल-गीतक स्वयं प्रमुख रचयिता छथि, तेँ हुनकर विवेचनमे भीतरी अन्तर्दृष्टि अछि जे बाहरी समीक्षकमे विरल होइत अछि। तेसर, बाल-मनोविज्ञान आ व्यंजना-केन्द्रित काव्य-दृष्टि पोथी केँ मात्र सूची-संकलनसँ ऊपर उठा दैत अछि।
ठेठी-अंगिका — पोथी के सबसें बड़का उपलब्धि छै—एगो उपेक्षित आरो छितराइलों परम्परा के सिलसिलेवार प्रलेखन। जे सामग्री एहिठाम-ओहिठाम बिखरलों छेलै, ओकरा एक ठाम आनी, बाँटी कें, स्रोत के संग परस्तुत करब अपने-आप में एगो सोध-काम छै। दोसरका मजबूत पक्ष छै लेखक के दुहरा भूमिका—ऊ अंगिका बाल-गीत के अपने बड़का रचयिता छै, तें हुनकर विवेचन में भीतरी अन्तर्दृष्टि छै, जे बाहरी समीक्षक में कम्मे मिलै छै। तेसर, बाल-मनोविज्ञान आरो व्यंजना-केन्द्रित काव्य-नजर पोथी के खाली सूची-संग्रह सें ऊपर उठाय दै छै।
समग्र मूल्याङ्कन आ साहित्यिक महत्ता
ठेठी-अंगिका: समग्र मूल्याङ्कन आरो साहित्यिक महत्ता
मैथिली — डॉ. अमरेन्द्रक 'अंगिका बाल-साहित्य' कोनो साधारण पोथी नहि अछि। ई एकटा युगान्तकारी शोध-ग्रन्थ अछि जे अंगिका भाषाकेँ एकटा समृद्ध साहित्यिक भाषाक रूपमे स्थापित करैत अछि। मैथिलीक आलोचकक दृष्टिसँ, जँ हम एहि ग्रन्थकेँ देखैत छी, तँ हमरा ई बोध होइत अछि जे मैथिली आ अंगिका दुनूक बाल-साहित्यक जड़ि एक समान अछि। दुनूकेँ लोक-कथा, लोरी, आ बुझौवलमे जे माटिक गन्ध अछि, ओ एक हे अछि।
ठेठी-अंगिका — डॉ. अमरेन्द्र के 'अंगिका बाल-साहित्य' कोनो साधारण पोथी नै छै। ई एगो युगान्तकारी शोध-ग्रन्थ छै जे अंगिका भाषाकेँ एगो समृद्ध साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित करै छै। मैथिली के आलोचकक दृष्टि सें, जँ हम ई ग्रन्थकेँ देखैत छी, तें हमरा ई बोध होय छै जे मैथिली आरो अंगिका दुनूक बाल-साहित्य के जड़ि एक समान छै। दुनूकेँ लोक-कथा, लोरी, आरो बुझौवल में जे माटि के गन्ध छै, ऊ एक हे छै।
मैथिली — पोथीक प्रमुख उपलब्धि सभ: १. ऐतिहासिक प्रलेखन (Historical Documentation): मौखिक परम्परामे बिलाइत जा रहल लोरी, पहेली आ खेलगीतकेँ एकट्ठा कऽ कऽ डॉ. अमरेन्द्र अंगिकाक एकटा अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरकेँ सहेजि लेलन्हि अछि। २. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: बाल-साहित्यक मात्र सङ्ग्रह नहि, अपितु ओकर वैज्ञानिक आ मनोवैज्ञानिक प्रभावक जे विश्लेषण लेखक केने छथि, ओ एहि पोथीकेँ शोध-ग्रन्थक दर्जा दैत अछि। कार्ल ग्रूसक खेल-सिद्धान्तसँ लऽ कऽ शिशु-काव्यक ध्वन्यात्मक सिद्धान्त धरि, लेखकक दृष्टि बड्ड पैना अछि। ३. विस्तार आ वैविध्य: पोथीमे लोककथा सँ लऽ कऽ आधुनिक विज्ञान, मिसाइल मैन कलाम, गजल, रडार, पर्यावरण, आ बाढ़ि प्रबन्धन जकाँ विषयक समावेशन ई सिद्ध करैत अछि जे अंगिका बाल-साहित्य विश्व-साहित्यक सङ्ग कदम मिला कऽ चलि रहल अछि। ४. भाषागत शुद्धता आ प्रवाहमयता: लेखक द्वारा देल गेल समग्र उद्धरण पूर्णतया अंगिका भाषाक ठेठी-देशिल स्वरूपकेँ सुरक्षित रखैत अछि। 'टेंगटा' कथा होउ वा 'बण्टा' उपन्यासक संवाद, भाषाक मिठास आ ओकर आंचलिकता जीबन्त अछि।
ठेठी-अंगिका — पोथी के प्रमुख उपलब्धि सिनी: १. ऐतिहासिक प्रलेखन (Historical Documentation): मौखिक परम्परा में बिलाइत जा रहल लोरी, पहेली आरो खेलगीतकेँ एकट्ठा कऽ कऽ डॉ. अमरेन्द्र अंगिका के एगो अमूल्य सांस्कृतिक धरोहरकेँ सहेजि लेलन्हि छै। २. मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: बाल-साहित्य के मात्र सङ्ग्रह नै छै, बल्कि ओकर वैज्ञानिक आरो मनोवैज्ञानिक प्रभावक जे विश्लेषण लेखक केने छै, ऊ ई पोथी कें शोध-ग्रन्थक दर्जा दै छै। कार्ल ग्रूसक खेल-सिद्धान्त सें लऽ कऽ शिशु-काव्य के ध्वन्यात्मक सिद्धान्त तक, लेखक के दृष्टि बहुत पैना छै। ३. विस्तार आरो वैविध्य: पोथी में लोककथा सें लऽ कऽ आधुनिक विज्ञान, मिसाइल मैन कलाम, गजल, रडार, पर्यावरण, आरो बाढ़ि प्रबन्धन जेना विषय के समावेशन ई सिद्ध करै छै जे अंगिका बाल-साहित्य विश्व-साहित्यक सङ्ग कदम मिला कऽ चलि रहल छै। ४. भाषागत शुद्धता आरो प्रवाहमयता: लेखक द्वारा देलों गेलों समग्र उद्धरण पूर्णतया अंगिका भाषा के ठेठी-देशिल स्वरूपकेँ सुरक्षित रखै छै। 'टेंगटा' कथा होउ वा 'बण्टा' उपन्यास के संवाद, भाषा के मिठास आरो ओकर आंचलिकता जीबन्त छै।
24. सीमा: सूचीप्रधानता, असमान पाठालोचन, सन्दर्भ-पद्धति आ चयन
ठेठी-अंगिका: 24. सीमा: सूचीप्रधानता, असमान पाठालोचन, सन्दर्भ-पद्धति आरो चयन
मैथिली — कृतिक महत्त्व स्वीकार करैत ओकर सीमा स्पष्ट कहब आवश्यक अछि। पहिल सीमा संरचनात्मक पुनरावृत्ति अछि, जे संकलित आलेखसभक इतिहाससँ जुड़ल। समान विचार अलग खण्डमे फेर अबैत अछि; किछु क्रम अचानक बदलैत अछि; कतेको ठाम सूची आलोचनापर भारी पड़ैत अछि।
ठेठी-अंगिका — कृति के महत्त्व स्वीकार करै ओकर सीमा स्पष्ट कहब आवश्यक छै। पहिल सीमा संरचनात्मक पुनरावृत्ति छै, जे संकलित आलेख सिनी के इतिहास सें जुड़लों। समान विचार अलग खण्ड में फेनू आवै छै; कुछु क्रम अचानक बदलै छै; कईगो जगह सूची आलोचनापर भारी पड़ै छै।
मैथिली — दोसर सीमा गहन पाठालोचनक असमानता अछि। नाटकक ‘पंचगव्य’ खण्डमे पात्र, संवाद, व्यंग्य, सामाजिक परिवेशपर पर्याप्त आलोचनात्मक दृष्टि अछि, मुदा अनेक गीत/कथा केवल उदाहरण वा संक्षिप्त टिप्पणी धरि सीमित। यदि प्रत्येक विधा लेल समान विश्लेषण-सूत्र—विषय, भाषा, लय/कथानक, बाल-दृष्टि, आयु-उपयुक्तता, शिल्प, सामाजिक अर्थ—राखल जाए तँ तुलनात्मक निष्कर्ष मजबूत होएत।
ठेठी-अंगिका — दोसर सीमा गहन पाठालोचन के असमानता छै। नाटक के ‘पंचगव्य’ खण्ड में पात्र, संवाद, व्यंग्य, सामाजिक परिवेशपर पर्याप्त आलोचनात्मक दृष्टि छै, मतरकि अनेक गीत/कथा केवल उदाहरण वा संक्षिप्त टिप्पणी तक सीमित। यदि प्रत्येक विधा लेल समान विश्लेषण-सूत्र—विषय, भाषा, लय/कथानक, बाल-दृष्टि, आयु-उपयुक्तता, शिल्प, सामाजिक अर्थ—राखलों जाए तें तुलनात्मक निष्कर्ष मजबूत होतै।
मैथिली — तेसर सीमा bibliographic मानकीकरण अछि। पृष्ठ 112–114 क स्रोत-सम्पदा बहुमूल्य अछि, मुदा पूर्ण प्रकाशन-वर्ष, संस्करण, पृष्ठ, प्रकाशन-स्थान, ISBN, सम्पादक/अनुवादकक भूमिका सभ ठाम एकरूप नहि। चारिम सीमा लेखक-केंद्रित corpus क सम्भावना अछि; बाहरी स्रोत अमरेन्द्रक वास्तविक व्यापक योगदानक पुष्टि करैत अछि, तथापि स्वतंत्र इतिहास लेल अन्य कवि-कथाकारसभक समान coverage आवश्यक अछि।
ठेठी-अंगिका — तेसर सीमा bibliographic मानकीकरण छै। पृष्ठ 112–114 के स्रोत-सम्पदा बहुमूल्य छै, मतरकि पूर्ण प्रकाशन-वर्ष, संस्करण, पृष्ठ, प्रकाशन-स्थान, ISBN, सम्पादक/अनुवादक के भूमिका सिनी जगह एकरूप नै। चारिम सीमा लेखक-केंद्रित corpus के सम्भावना छै; बाहरी स्रोत अमरेन्द्र के वास्तविक व्यापक योगदान के पुष्टि करै छै, तथापि स्वतंत्र इतिहास लेल अन्य कवि-कथाकार सिनी के समान coverage आवश्यक छै।
मैथिली — पाँचम सीमा मौखिक सामग्रीक performance metadata अभाव अछि। गीतक शब्द अछि, मुदा धुन, ताल, गायक, स्थान, तिथि, खेल-प्रक्रिया पर्याप्त व्यवस्थित नहि। छठम सीमा पाठकीय अध्ययनक अभाव अछि। बालोपयोगिताक निष्कर्ष प्रायः आलोचकक अनुभवपर आधारित अछि; बाल-पाठकक प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया वा readership data उपलब्ध नहि। ई सीमासभ पोथीक ऐतिहासिक महत्त्व घटबैत नहि; उलटे आगाँक शोधक कार्यक्रम बनबैत अछि।
ठेठी-अंगिका — पाँचम सीमा मौखिक सामग्री के performance metadata अभाव छै। गीत के शब्द छै, मतरकि धुन, ताल, गायक, स्थान, तिथि, खेल-प्रक्रिया पर्याप्त व्यवस्थित नै। छठम सीमा पाठकीय अध्ययन के अभाव छै। बालोपयोगिता के निष्कर्ष प्रायः आलोचक के अनुभवपर आधारित छै; बाल-पाठक के प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया वा readership data उपलब्ध नै। ई सीमा सिनी पोथी के ऐतिहासिक महत्त्व घटावै नै; उलटे आगाँ के शोध के कार्यक्रम बनावै छै।
सीमा
ठेठी-अंगिका: सीमा
मैथिली — समीक्षकीय इमानदारीक तकाजा अछि जे किछु सीमा रेखांकित होअय। पहिल आ सभसँ विचारणीय विरोधाभास ई जे “अंगिका बाल-साहित्य” नामक, अंगिका विषयक ई पोथी स्वयं हिन्दीमे लिखल अछि—समीक्षा-भाषा हिन्दी, आ अंगिका केवल उद्धरणमे उपस्थित। जाहि भाषाक साहित्यक वकालत होइत अछि, तकरे विवेचन ओहि भाषामे नहि होएब एकटा पद्धतिगत प्रश्न ठाढ़ करैत अछि। दोसर, “संदर्भ”-सूची लेखकक अपने बाल-गीत-संग्रह सभसँ बेसी भरल अछि—एहिसँ आधार-सामग्री आ समीक्षकीय दूरीक बीच अन्तर किछु धूमिल भ’ जाइत अछि। तेसर, आत्म-स्वीकृत रूपेँ ई आलेख-संग्रह थिक, तेँ एहिमे कतहु-कतहु विश्लेषणक गहराइक ठाम वर्णनात्मक सूचीकरण बेसी भ’ गेल अछि।
ठेठी-अंगिका — समीक्षा के इमानदारी के तकाजा छै कि कुछ सीमा भी उजागर होय। पहिलों आरो सबसें सोचै वाला विरोधाभास ई छै कि “अंगिका बाल-साहित्य” नाम के, अंगिका विषय के ई पोथी अपने हिन्दी में लिखलों छै—समीक्षा के भाषा हिन्दी, आरो अंगिका खाली उद्धरण में हाजिर। जे भाषा के साहित्य के वकालत होय छै, वहै भाषा में ओकर विवेचन नै होना एगो पद्धति के सवाल ठाढ़ करी दै छै। दोसर, “संदर्भ”-सूची लेखक के अपने बाल-गीत-संग्रह सिनी सें बेसी भरलों छै—एहिसें आधार-सामग्री आरो समीक्षा के दूरी के बीच के फरक कुछ धुंधला होय जाय छै। तेसर, अपने माननहिं ई आलेख-संग्रह छै, तें एकरा में कहीं-कहीं विवेचन के गहराई के जगह वर्णन के सूचीकरण बेसी होय गेलै।
मैथिली — किछु सीमाक सन्दर्भ: पोथी अपन आपमे पूर्ण अछि, तथापि, समीक्षाक धर्म अछि जे समग्र दृष्टिसँ विचार कएल जाय। लेखक स्वयं स्वीकार केने छथि जे अंगिकामे बाल-कहानी आ बाल-पत्रिकायन (Children's magazines) क भारी अभाव अछि। 'अंगिका बाल-कहानी' सङ्ग्रहक अतिरिक्त कोनो गम्भीर कथा-परम्परा नहि विकसित भऽ सकल अछि। जेकाँ फणीश्वर नाथ 'रेणु' अपन साहित्यमे लोककथाक उपयोग केलन्हि, ताहि प्रकारक नव प्रयोग बाल-कथा साहित्यमे अखनो अपेक्षित अछि। 'अजोला बहिन' जकाँ बाल-पत्रिकाक प्रकाशन आर्थिक अभावमे बन्द भऽ जाएब अंगिका बाल-साहित्य लेल एकटा चिन्ताक विषय अछि।
ठेठी-अंगिका — कुछु सीमा के सन्दर्भ: पोथी अपन आप में पूर्ण छै, तथापि समीक्षा के धर्म छै जे समग्र दृष्टि सें विचार करलों जाय। लेखक अपने स्वीकार केने छै जे अंगिका में बाल-कहानी आरो बाल-पत्रिकायन (Children's magazines) के भारी अभाव छै। 'अंगिका बाल-कहानी' सङ्ग्रह के अतिरिक्त कोनो गम्भीर कथा-परम्परा विकसित नै होय सकल छै। जइसन फणीश्वर नाथ 'रेणु' अपन साहित्य में लोककथा के उपयोग करलकै, ओइसन नया प्रयोग बाल-कथा साहित्य में अखनो अपेक्षित छै। 'अजोला बहिन' जइसन बाल-पत्रिका के प्रकाशन आर्थिक अभाव में बन्द होय जायब अंगिका बाल-साहित्य लेली एगो चिन्ता के विषय छै।
25. आगाँक संस्करण लेल ठोस सम्पादकीय प्रस्ताव
ठेठी-अंगिका: 25. आगू के संस्करण लेल ठोस प्रस्ताव
मैथिली — यदि ‘अंगिका बाल-साहित्य’क विस्तारित आलोचनात्मक संस्करण तैयार हो, तँ मूल सामग्री हटे बिना किछु संरचनात्मक सुधार एकरा मानक सन्दर्भग्रन्थ बना सकैत अछि। पहिल, 8–42 आ 43–112 क वर्तमान दू-खंडी ढाँचा बचैत उप-अध्याय क्रमांकित हो: लोरी, पहेली, तुक्तक, खेलगीत, लोककथा, अनुवाद, उपन्यास, गीत-कविता, गजल/खण्डकाव्य, कहानी, नाटक, निबन्ध-जीवनी।
ठेठी-अंगिका — यदि ‘अंगिका बाल-साहित्य’ के नब, विस्तारित आलोचनात्मक संस्करण तैयार हो, तें मूल सामग्री हटे बिना कुछु संरचनात्मक सुधार एकरा मानक सन्दर्भग्रन्थ बना सकै छै। पहिल, 8–42 आरो 43–112 के वर्तमान दू-खंडी ढाँचा बचै उप-अध्याय क्रमांकित हो: लोरी, पहेली, तुक्तक, खेलगीत, लोककथा, अनुवाद, उपन्यास, गीत-कविता, गजल/खण्डकाव्य, कहानी, नाटक, निबन्ध-जीवनी।
मैथिली — दोसर, प्रत्येक अध्यायक आरम्भमे परिभाषा आ मूल्याङ्कन-कसौटी, अन्तमे संक्षिप्त निष्कर्ष। तेसर, कालक्रम—कृति, लेखक, वर्ष, विधा, प्रकाशक—एक परिशिष्ट रूपमे। चारिम, 52+ स्रोतक मानकीकृत bibliography; पत्रिका सूचीमे प्रकाशन-स्थान, सम्पादक, उपलब्ध वर्ष। पाँचम, लेखक-सूची आ शीर्षक-सूची। छठम, मौखिक सामग्री लेल field metadata: संग्रहकर्ता, कथावाचक/गायक, स्थान, तिथि, प्रसंग, variant।
ठेठी-अंगिका — दोसर, प्रत्येक अध्याय के आरम्भ में परिभाषा आरो मूल्याङ्कन-कसौटी, अन्त में संक्षिप्त निष्कर्ष। तेसर, कालक्रम—कृति, लेखक, वर्ष, विधा, प्रकाशक—एक परिशिष्ट रूपमे। चारिम, 52+ स्रोत के मानकीकृत bibliography; पत्रिका सूची में प्रकाशन-स्थान, सम्पादक, उपलब्ध वर्ष। पाँचम, लेखक-सूची आरो शीर्षक-सूची। छठम, मौखिक सामग्री लेल field metadata: संग्रहकर्ता, कथावाचक/गायक, स्थान, तिथि, प्रसंग, variant।
मैथिली — सातम, प्रतिनिधि रचनाक गहन पाठालोचन। आठम, अनुवादक अध्यायमे source–target तुलना। नवम, बालकक उमेर-वर्ग स्पष्ट: शिशु, आरम्भिक बालक, मध्य बाल्य, किशोर। दशम, चित्र, ऑडियो QR अथवा digital archive क लिंक—विशेषतः लोरी, खेलगीत, नाटक लेल। एगारहम, बाल-पाठकक वास्तविक प्रतिक्रिया/विद्यालयीय उपयोगपर सर्वेक्षण। बारहम, रचनाकारसभक समान परिचय-ढाँचा। तेरहम, हिन्दी आलोचनात्मक पाठक संग एक पूर्ण अंगिका संस्करण, जाहिसँ अंगिका आलोचना-भाषा स्वयं विकसित हो। ई प्रस्ताव वर्तमान पोथीक बदला नहि; तकर उपलब्ध सामग्रीक अधिक वैज्ञानिक उपयोगक दिशा अछि।
ठेठी-अंगिका — सातम, प्रतिनिधि रचना के गहन पाठालोचन। आठम, अनुवादक अध्याय में source–target तुलना। नवम, बालक के उमेर-वर्ग स्पष्ट: शिशु, आरम्भिक बालक, मध्य बाल्य, किशोर। दशम, चित्र, ऑडियो QR अथवा digital archive के लिंक—विशेषतः लोरी, खेलगीत, नाटक लेल। एगारहम, बाल-पाठक के वास्तविक प्रतिक्रिया/विद्यालयीय उपयोगपर सर्वेक्षण। बारहम, रचनाकार सिनी के समान परिचय-ढाँचा। तेरहम, हिन्दी आलोचनात्मक पाठक संग एक पूर्ण अंगिका संस्करण, जाहि सें अंगिका आलोचना-भाषा अपने विकसित हो। ई प्रस्ताव वर्तमान पोथी के बदला नै; तकर उपलब्ध सामग्री के अधिक वैज्ञानिक उपयोग के दिशा छै।
26. समग्र मूल्याङ्कन: आधार-ग्रन्थक रूपमे स्थान
ठेठी-अंगिका: 26. समग्र मूल्याङ्कन: आधार-ग्रन्थ के रूप में स्थान
मैथिली — ‘अंगिका बाल-साहित्य’क सर्वोच्च उपलब्धि ओकर संरक्षणकारी आ इतिहास-निर्माणकारी भूमिका अछि। जकर बहुत अंश लोककण्ठ, छोट पत्र-पत्रिका, सीमित संस्करणक पुस्तक, अनुवाद, निजी संग्रह वा साहित्यिक स्मृतिमे छितरायल रहि सकैत छल, ओकरा एक आलोचनात्मक छतरीक नीचाँ आनबाक ई महत्त्वपूर्ण प्रयत्न अछि। एहि कारण पोथी डॉ. अमरेन्द्रक व्यक्तिगत आलोचनात्मक कृति रहि नहि जाइत; अंगिका बाल-साहित्यक संस्थागत स्मृति बनबाक क्षमता प्राप्त करैत अछि।
ठेठी-अंगिका — ‘अंगिका बाल-साहित्य’ के सर्वोच्च उपलब्धि ओकर संरक्षणकारी आरो इतिहास-निर्माणकारी भूमिका छै। जकर बहुत अंश लोककण्ठ, छोट पत्र-पत्रिका, सीमित संस्करण के पुस्तक, अनुवाद, निजी संग्रह वा साहित्यिक स्मृति में छितरायलों रहि सकै छेलै, ओकरा एक आलोचनात्मक छतरी के नीचाँ अनै के ई महत्त्वपूर्ण प्रयत्न छै। ई कारण पोथी डॉ. अमरेन्द्र के व्यक्तिगत आलोचनात्मक कृति रही नै जाय; अंगिका बाल-साहित्य के संस्थागत स्मृति बनै के क्षमता प्राप्त करै छै।
मैथिली — एकर दोसर महत्त्व ई स्थापना अछि जे बाल-साहित्यक जीवन-रस बालकक अपन संसारसँ अबैत अछि—लय, खेल, कल्पना, जिज्ञासा, हास्य, प्रकृति, परिवार, साथी, प्रश्न आ अनुभवसँ। साहित्य बच्चाकेँ ऊपरसँ शिक्षा देबाक साधन मात्र नहि; बच्चाक दृष्टिसँ संसार देखबाक कला अछि। यद्यपि पोथीक बादक अंशमे शिक्षामूलकता मजबूत अछि, मूल child-centred कसौटी सम्पूर्ण अध्ययन लेल आलोचनात्मक आधार दैत अछि।
ठेठी-अंगिका — एकर दोसर महत्त्व ई स्थापना छै जे बाल-साहित्य के जीवन-रस बालक के आपनों संसार सें आवै छै—लय, खेल, कल्पना, जिज्ञासा, हास्य, प्रकृति, परिवार, साथी, प्रश्न आरो अनुभव सें। साहित्य बच्चा कें ऊपर सें शिक्षा दै के साधन मात्र नै; बच्चा के दृष्टि सें संसार देखै के कला छै। यद्यपि पोथी के बाद के अंश में शिक्षामूलकता मजबूत छै, मूल child-centred कसौटी सम्पूर्ण अध्ययन लेल आलोचनात्मक आधार दै छै।
मैथिली — तेसर, लोकपरम्परा आ आधुनिकताकेँ विरोधी मानबाक बदला पोथी रूपान्तरक सम्बन्ध देखबैत अछि। लोरीक लय आधुनिक गीतमे, लोककथाक कथात्मक संसाधन आधुनिक कहानी/नाटकमे, मौखिक हास्य आ संवाद आधुनिक बालमंचमे, प्रकृतिक परिचित जगत पर्यावरण-चेतनामे—एहन निरन्तरता ग्रन्थक मूल इतिहास-दृष्टि अछि। चारिम, सूक्ष्म पाठालोचन बाल-नाटकक महत्त्वक विशेष पुनर्मूल्याङ्कन करैत अछि। पृष्ठ 98–109 बाल-नाटककेँ आधुनिक सामाजिक समस्या, विज्ञान, शिक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य, संवाद आ मंचीयताक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनबैत अछि।
ठेठी-अंगिका — तेसर, लोकपरम्परा आरो आधुनिकता कें विरोधी मानै के बदला पोथी रूपान्तर के सम्बन्ध देखावै छै। लोरी के लय आधुनिक गीत में, लोककथा के कथात्मक संसाधन आधुनिक कहानी/नाटक में, मौखिक हास्य आरो संवाद आधुनिक बालमंच में, प्रकृति के परिचित जगत पर्यावरण-चेतना में—एहन निरन्तरता ग्रन्थ के मूल इतिहास-दृष्टि छै। चारिम, गहन पुनर्पाठ बाल-नाटक के महत्त्व के विशेष पुनर्मूल्याङ्कन करै छै। पृष्ठ 98–109 बाल-नाटक कें आधुनिक सामाजिक समस्या, विज्ञान, शिक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य, संवाद आरो मंचीयता के महत्वपूर्ण क्षेत्र बनावै छै।
मैथिली — उपलब्ध बाहरी स्रोत मूल पोथीक प्रमुख प्रकाशन-तथ्य आ कृतिसभक अस्तित्वक पर्याप्त पुष्टि करैत अछि। भारतवाणी मूल पोथीकेँ 2022 क Children’s Literature रूपमे सूचीबद्ध करैत अछि; 2021 क अमरेन्द्र-केंद्रित अध्ययन आ बालगीत-ग्रंथावली सक्रिय आलोचनात्मक प्रकाशन-परिसरक संकेत दैत अछि। Angika.com, Kavita Kosh आ Gadya Kosh जकाँ सहायक स्रोत प्रमुख कृतिसभक डिजिटल/साहित्यिक उपस्थितिक साक्ष्य दैत अछि।
ठेठी-अंगिका — उपलब्ध बाहरी स्रोत मूल पोथी के प्रमुख प्रकाशन-तथ्य आरो कृति सिनी के अस्तित्व के पर्याप्त पुष्टि करै छै। भारतवाणी मूल पोथी कें 2022 के Children’s Literature रूप में सूचीबद्ध करै छै; 2021 के अमरेन्द्र-केंद्रित अध्ययन आरो बालगीत-ग्रंथावली सक्रिय आलोचनात्मक प्रकाशन-परिसर के संकेत दै छै। Angika.com, Kavita Kosh आरो Gadya Kosh जेना सहायक स्रोत प्रमुख कृति सिनी के डिजिटल/साहित्यिक उपस्थिति के साक्ष्य दै छै।
मैथिली — सीमासभ वास्तविक अछि—संकलनात्मक पुनरावृत्ति, सूचीप्रधानता, असमान पाठालोचन, bibliographic असंगति, author-centred selection क सम्भावना, performance data आ reader-response क अभाव। मुदा ई सीमा एहि पोथीकेँ अप्रासंगिक नहि बनबैत; ई बतबैत अछि जे अगिला शोध कतऽ सँ आरम्भ हो।
ठेठी-अंगिका — सीमा सिनी वास्तविक छै—संकलनात्मक पुनरावृत्ति, सूचीप्रधानता, असमान पाठालोचन, bibliographic असंगति, author-centred selection के सम्भावना, performance data आरो reader-response के अभाव। मतरकि ई सीमा ई पोथी कें अप्रासंगिक नै बनावै; ई बतावै छै जे आगू के शोध कहाँ सें आरम्भ हो।
मैथिली — अन्ततः ‘अंगिका बाल-साहित्य’केँ केवल बाल-रचनाक परिचय-पोथी कहब ओकर महत्त्व घटायब होएत। ई लोक-स्मृति, भाषिक अस्मिता, बाल-मन, साहित्यिक आधुनिकता, अनुवाद, विधा-विस्तार आ दस्तावेजीकरणक संगमपर ठाढ़ कृति अछि। एकर सर्वश्रेष्ठ अंश ओ अछि जतय लोरीसँ आधुनिक कविता धरि, खेलसँ नाटक धरि, लोककथासँ पर्यावरणीय/वैज्ञानिक कथा धरि एक सांस्कृतिक निरन्तरता देखाइत अछि। ई पोथी बन्द, अन्तिम इतिहास नहि; अंगिका बाल-साहित्यक विस्तृत इतिहास, पाठ-समीक्षा, प्रदर्शन-अभिलेख, अनुवाद-अध्ययन आ बाल-पाठकीय शोध लेल आधार-ग्रन्थ अछि।
ठेठी-अंगिका — अन्ततः ‘अंगिका बाल-साहित्य’कें केवल बाल-रचना के परिचय-पोथी कहब ओकर महत्त्व घटायब होतै। ई लोक-स्मृति, भाषिक अस्मिता, बाल-मन, साहित्यिक आधुनिकता, अनुवाद, विधा-विस्तार आरो दस्तावेजीकरण के संगमपर ठाढ़ कृति छै। एकर सर्वश्रेष्ठ अंश ओ छै जेतै लोरी सें आधुनिक कविता तक, खेल सें नाटक तक, लोककथा सें पर्यावरणीय/वैज्ञानिक कथा तक एक सांस्कृतिक निरन्तरता देखाय छै। ई पोथी बन्द, अन्तिम इतिहास नै; अंगिका बाल-साहित्य के विस्तृत इतिहास, पाठ-समीक्षा, प्रदर्शन-अभिलेख, अनुवाद-अध्ययन आरो बाल-पाठकीय शोध लेल आधार-ग्रन्थ छै।
मैथिली — एहि अर्थमे बाल-साहित्य भाषा-परम्पराक छोट कोना नहि। बच्चा जखन अपन मातृभाषामे खेलैत, गाबैत, कथा सुनैत, प्रश्न करैत, पढ़ैत आ अभिनय करैत अछि, तखन ओ भाषा अगिला पीढ़ीमे केवल जीवित नहि रहैत—ओ नब रूपमे सृजित होइत अछि। डॉ. अमरेन्द्रक पोथीक स्थायी साहित्यिक सन्देश एही गहींर बिन्दुपर स्थित अछि।
ठेठी-अंगिका — ई अर्थ में बाल-साहित्य भाषा-परम्परा के छोट केना नै। बच्चा जबें आपनों मातृभाषा में खेलै, गावै, कथा सुनै, प्रश्न करै, पढ़ै आरो अभिनय करै छै, तबें ओ भाषा आगू के पीढ़ी में केवल जीवित नै रहै—ओ नब रूप में सृजित होय छै। डॉ. अमरेन्द्र के पोथी के स्थायी साहित्यिक सन्देश एही गहींर बिन्दुपर स्थित छै।
सम्पादकीय अभिमत (निष्कर्ष)
ठेठी-अंगिका: सम्पादकीय अभिमत (निष्कर्ष)
मैथिली — एतेक कहलाक बादो ई पोथी अपन घोषित उद्देश्य—अंगिका बाल-साहित्य पर आगाँ लिखबाक मार्ग खोलब—मे सफल अछि। ओकर स्थायी मूल्य विश्लेषणक नवीनतामे कम, आ प्रलेखनक विश्वसनीयतामे बेसी अछि। विशेषतः पहिल अध्यायक लोक-सामग्री—लोरी, तेल-गीत, डेग-गीत आ बुझौवल—भविष्यक शोधार्थी लेल एकटा प्रामाणिक कोष थिक। डॉ. अमरेन्द्र स्वयं जे विनम्रतासँ एकरा अन्तिम शब्द नहि, प्रारम्भ कहने छथि, समीक्षकक निर्णय सेहो ओही दिशामे जाइत अछि—ई अंगिका बाल-साहित्यक आलोचना-भवनक आधारशिला थिक, शिखर नहि; आ नीक आधारशिलाक इएह गुण होइत अछि जे ओ अपनासँ ऊपर बहुत किछु ठाढ़ होएबाक सम्भावना केँ सम्हारि लैत अछि। विदेह-दृष्टिएँ ई पोथी अंगिका बाल-साहित्य केँ भाषाविदक नमूनासँ जीवन्त परम्परामे बदलबाक ओ पहिल डेग थिक, जकरा आगाँ बढ़ाएब आब समीक्षक-समाजक दायित्व अछि।
ठेठी-अंगिका — एतना कहला के बादो ई पोथी अपन घोषित मकसद—अंगिका बाल-साहित्य पर आगू लिखै के रास्ता खोलब—में कामयाब छै। ओकर टिकाऊ कीमत विवेचन के नयापन में कम, आरो प्रलेखन के भरोसा में बेसी छै। खास कें पहिलों अध्याय के लोक-सामग्री—लोरी, तेल-गीत, डेग-गीत आरो बुझौवल—आगू के सोधकर्ता लेली एगो सच्चा खजाना छै। डॉ. अमरेन्द्र अपने जे नरमी सें एकरा आखिरी बात नै, सुरुआत कहलकै, समीक्षक के फैसला भी वहै दिसाय जाय छै—ई अंगिका बाल-साहित्य के आलोचना-घर के नींव छै, चोटी नै; आरो बढ़िया नींव के इहे गुन होय छै कि ऊ अपने सें ऊपर बहुत कुछ ठाढ़ होय के सम्भावना के सम्हारी लै छै। विदेह के नजर सें ई पोथी अंगिका बाल-साहित्य के भाषाविद के नमूना सें जीता-जागता परम्परा में बदलै के पहिलों डेग छै, जेकरा आगू बढ़ाना अब समीक्षक-समाज के जिम्मेवारी छै।
निष्कर्ष
ठेठी-अंगिका: निष्कर्ष
मैथिली — अन्ततः, डॉ. अमरेन्द्र द्वारा लिखित 'अंगिका बाल-साहित्य' अंगिका आ वृहत्तर बिहारी साहित्य-परम्पराक लेल एकटा 'माइल-स्टोन' (Milestone) अछि। बाल-साहित्यकेँ साहित्यक परिधिमे नीचाँ कऽ कऽ देखबाक जे एकटा कुत्सित परम्परा अकादमिक जगतमे रहल अछि, डॉ. अमरेन्द्र अपन एहि शोधपूर्ण ग्रन्थ सँ ओहि भ्रान्तटीकेँ तोड़ैत छथि। ओ प्रमाणित करैत छथि जे बाल-साहित्य समाजक नव-निर्माणक 'फैक्ट्री' अछि।
ठेठी-अंगिका — अन्ततः, डॉ. अमरेन्द्र द्वारा लिखित 'अंगिका बाल-साहित्य' अंगिका आरो वृहत्तर बिहारी साहित्य-परम्पराक लेली एगो 'माइल-स्टोन' (Milestone) छै। बाल-साहित्य केेँ साहित्य के परिधि में नीचाँ कऽ कऽ देखै के जे एगो कुत्सित परम्परा अकादमिक जगत में रहल छै, डॉ. अमरेन्द्र अपन ई शोधपूर्ण ग्रन्थ सें वही भ्रान्तटीकेँ तोड़ैत छै। ऊ प्रमाणित करै छै जे बाल-साहित्य समाज के नव-निर्माणक 'फैक्ट्री' छै।
मैथिली — मैथिली साहित्यकेँ सेहो अंगिकाक एहि बाल-साहित्यिक आन्दोलन सँ प्रेरणा लेबाक आवश्यकता अछि। भाषाक शुद्धता, लोक-परम्पराक वैज्ञानिक संरक्षण, आ आधुनिकताक सङ्ग कदम सँ कदम मिला कऽ चलबाक जे सन्देश ई पोथी दैत अछि, ओ समस्त क्षेत्रीय भाषाक साहित्यकार लेल अनुकरणीय अछि। डॉ. अमरेन्द्रक ई भगीरथ प्रयास अंगिका साहित्यक इतिहासमे स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत, आ ई पोथी शोधार्थी, साहित्यकार, आ शिक्षाविद् सभक लेल एकटा आधार-ग्रन्थक रूपमे सदैव मार्गदर्शित करैत रहत।
ठेठी-अंगिका — मैथिली साहित्यकेँ भी अंगिका के ई बाल-साहित्यिक आन्दोलन सें प्रेरणा लेबाक आवश्यकता छै। भाषा के शुद्धता, लोक-परम्पराक वैज्ञानिक संरक्षण, आरो आधुनिकताक सङ्ग कदम सें कदम मिला कऽ चलबाक जे सन्देश ई पोथी दै छै, ऊ समस्त क्षेत्रीय भाषा के साहित्यकार लेली अनुकरणीय छै। डॉ. अमरेन्द्र के ई भगीरथ प्रयास अंगिका साहित्य के इतिहासमे स्वर्णाक्षर में लिखलों जाएत, आरो ई पोथी शोधार्थी, साहित्यकार, आरो शिक्षाविद् सिनी के लेली एगो आधार-ग्रन्थक रूप में सदैव मार्गदर्शित करै रहत।
27. समग्र निष्कर्षक संक्षिप्त सार
ठेठी-अंगिका: 27. समग्र निष्कर्ष के संक्षिप्त सार
मैथिली — समग्र पोथीक पाठसँ स्पष्ट अछि जे पोथीक विषय-विस्तार प्रारम्भिक प्रकाशन-तथ्य आ आत्मकथनसँ लऽ सन्दर्भ-पत्रिका सूची धरि एक समग्र बाल-साहित्यिक क्षेत्रक नक्शा बनबैत अछि। लोकसाहित्य खण्डक मुख्य उपविधा लोरी/शिशु गीत, पहेली, तुक्तक, खेलगीत, लोककथा आ अन्तरभाषिक कथा अछि। आधुनिक खण्डक मुख्य उपविधा अनुवादित बाल-कथा, बाल-उपन्यास, बालगीत/कविता, प्रकृति-पर्यावरण/ज्ञान-विषय, गजल/खण्डकाव्य, बाल-कहानी, एकांकी/बाल-नाटक, निबन्ध-इतिहास-जीवनी अछि।
ठेठी-अंगिका — सम्पूर्ण 114 पृष्ठ के पुनर्पाठ सें स्पष्ट छै जे पोथी के विषय-विस्तार प्रारम्भिक प्रकाशन-तथ्य आरो आत्मकथन सें लै कें सन्दर्भ-पत्रिका सूची तक एक समग्र बाल-साहित्यिक क्षेत्र के नक्शा बनावै छै। लोकसाहित्य खण्ड के मुख्य उपविधा लोरी/शिशु गीत, पहेली, तुक्तक, खेलगीत, लोककथा आरो अन्तरभाषिक कथा छै। आधुनिक खण्ड के मुख्य उपविधा अनुवादित बाल-कथा, बाल-उपन्यास, बालगीत/कविता, प्रकृति-पर्यावरण/ज्ञान-विषय, गजल/खण्डकाव्य, बाल-कहानी, एकांकी/बाल-नाटक, निबन्ध-इतिहास-जीवनी छै।
मैथिली — समग्र विवेचनक मुख्य तर्क—सांस्कृतिक वंशावली, संकलनात्मक निर्माण, बाल-मन, दस्तावेजीकरण, लोक-आधुनिक सेतु, अनुवाद, काव्यक समृद्धि, बाल-कहानीक कमी, नाटक/अन्य विधा, भाषा, उपलब्धि, सीमा आ आधार-ग्रन्थक मूल्य—एहि आलेखमे सुरक्षित अछि। विशेष विस्तार बाल-नाटकक पुनर्मूल्याङ्कन, पृष्ठ 112–114 क bibliography/पत्रिका-संसारक archival विश्लेषण, लेखक-इतिहासकारक दोहरी भूमिकाक पद्धतिगत विवेचन, बाहरी प्रकाशन-सत्यापन, बालोपयुक्तता/मौखिक परम्परा/समाजीकरणक तुलनात्मक सिद्धान्त, तथा performance archive, reader-response आ standard bibliography लेल भविष्यक कार्यक्रम अछि।
ठेठी-अंगिका — समग्र विवेचन के मुख्य तर्क—सांस्कृतिक वंशावली, संकलनात्मक निर्माण, बाल-मन, दस्तावेजीकरण, लोक-आधुनिक सेतु, अनुवाद, काव्य के समृद्धि, बाल-कहानी के कमी, नाटक/अन्य विधा, भाषा, उपलब्धि, सीमा आरो आधार-ग्रन्थ के मूल्य—ई आलेख में सुरक्षित छै। विशेष विस्तार बाल-नाटक के पुनर्मूल्याङ्कन, पृष्ठ 112–114 के bibliography/पत्रिका-संसार के archival विश्लेषण, लेखक-इतिहासकार के दोहरी भूमिका के पद्धतिगत विवेचन, बाहरी प्रकाशन-सत्यापन, बालोपयुक्तता/मौखिक परम्परा/समाजीकरण के तुलनात्मक सिद्धान्त, तथा performance archive, reader-response आरो standard bibliography लेल आगू के कार्यक्रम में छै।
विस्तृत ग्रन्थ-सूची
ई ग्रन्थ-सूचीमे केवल पुस्तक, ग्रन्थ, कोश, संग्रह आ पुस्तकाकार साहित्यिक कृतिसभ राखल गेल अछि। जतय प्रकाशन-वर्ष वा प्रकाशकक स्पष्ट विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे उपलब्ध नहि अछि, ओतय अनुमान नहि जोड़ल गेल अछि।
क. समीक्ष्य ग्रन्थ आ डॉ. अमरेन्द्रक बाल-साहित्यिक कृतिसभ
१. अमरेन्द्र, डॉ. — अंगिका बाल-साहित्य। समीक्षा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर/दिल्ली; प्रथम संस्करण, २०२२। ई प्रस्तुत समीक्षाक मुख्य आधार-ग्रन्थ अछि। पृष्ठ: ११२। मूल्य: दू सय टाका।
२. अभिनन्दन (सम्पादक) — डॉ. अमरेन्द्र ग्रंथावली, खण्ड १ : अंगिका बालगीत समग्र। समीक्षा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, २०२१। डॉ. अमरेन्द्रक बालगीत-सृजनक पुस्तकाकार समेकित संकलन।
३. रानी, श्वेता — डॉ. अमरेन्द्र का अंगिका बाल साहित्य। समीक्षा प्रकाशन, मुजफ्फरपुर, २०२१। डॉ. अमरेन्द्रक अंगिका बाल-साहित्यपर केन्द्रित आलोचनात्मक अध्ययन।
४. अमरेन्द्र, डॉ. — ढोल बजै छै ढम्मक ढम। बालगीत-संग्रह। प्रकाशन-वर्ष आ प्रकाशकक स्पष्ट विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे उपलब्ध नहि अछि।
५. अमरेन्द्र, डॉ. — बुतरू के तुतरू। बालगीत-संग्रह। प्रकाशन-वर्ष आ प्रकाशकक स्पष्ट विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे उपलब्ध नहि अछि।
६. अमरेन्द्र, डॉ. — बाजै बीन बजावै तीन। बालगीत-संग्रह। प्रकाशन-वर्ष आ प्रकाशकक स्पष्ट विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे उपलब्ध नहि अछि।
७. अमरेन्द्र, डॉ. — एक छड़ी पर अंडा नाचै। बालकक पहेली, क्रीड़ा आ भाषिक कौतूहलसँ सम्बद्ध पुस्तकाकार कृति। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे नहि देल गेल अछि।
८. अमरेन्द्र, डॉ. — तुक्तक-मुक्तक। शिशु आ लघु आयुवर्गक ध्वनि-प्रधान बाल-कविताक संग्रह। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे उपलब्ध नहि अछि।
९. अमरेन्द्र, डॉ. — बण्टा। अंगिका बाल-उपन्यास। विद्यालय, शिक्षक, बाल-मन, सामाजिक परिस्थिति आ पर्यावरणक विस्तृत कथात्मक संसारपर केन्द्रित कृति। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि।
१०. अमरेन्द्र, डॉ. — अंगिका कथा-सरोवर। २००६। संस्कृत-मूलक कथा, पञ्चतन्त्र-जातक परम्परा आ बालोपयोगी रूपान्तरसँ सम्बद्ध पुस्तक। प्रकाशकक विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि।
११. अमरेन्द्र, डॉ. — घटोत्कच। बाल-खण्डकाव्य; महाभारतक वनपर्वपर आधारित तीन सर्गक कृति। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि।
१२. अमरेन्द्र, डॉ. — पंचामृत। पाँच बाल-काव्य-रूपकक संग्रह; एहिमे चोकर के हलुआ, अतिथि सेवा, आत्मसमर्पण, विशाखा आ बुद्धं शरणं गच्छामि सम्मिलित अछि। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि।
१३. अमरेन्द्र, डॉ. — पंचगव्य। पाँच बाल-एकांकीक संग्रह; सामाजिक यथार्थ, अन्धविश्वास-विरोध, शिक्षा आ किशोर-चेतनाक प्रसंगसभपर केन्द्रित। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि।
१४. अमरेन्द्र, डॉ. (अनुवादक) — जंगल रों पहचान। उर्दू बाल-उपन्यासक अंगिका रूपान्तर। मूल लेखक, प्रकाशन-वर्ष आ प्रकाशकक विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि।
१५. अमरेन्द्र, डॉ. (अनुवादक) — शिकार आरो शिकारी। उर्दू बाल-उपन्यासक अंगिका रूपान्तर; बालोपयुक्तता आ पर्यावरण-चेतनाक अनुकूलनक उदाहरण। मूल लेखक आ प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि।
१६. अमरेन्द्र, डॉ. (अनुवादक) — फैसल रों जासूसी। उर्दू बाल-उपन्यासक अंगिका रूपान्तर। मूल लेखक आ प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि।
ख. अंगिका लोकसाहित्य, साहित्येतिहास आ सहायक ग्रन्थ
१७. गौतम, डॉ. सुरेश; गौतम, डॉ. वीणा (सम्पादक) — भारतीय बाल-लोकसाहित्य कोश। विभिन्न भारतीय भाषाक बाल-लोकपरम्परासँ सम्बद्ध सम्पादित कोश; डॉ. अमरेन्द्रक किछु आलेखक पूर्व-प्रकाशन-सन्दर्भ एहि कोशसँ जुड़ल अछि। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे पूर्ण रूपेँ उपलब्ध नहि अछि।
१८. गौतम, डॉ. सुरेश; गौतम, डॉ. वीणा (सम्पादक) — भारतीय लोरी-साहित्य कोश। भारतीय लोरी-परम्पराक सम्पादित कोश। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे पूर्ण रूपेँ उपलब्ध नहि अछि।
१९. जगप्रिय, चन्द्रप्रकाश (सम्पादक) — अंगिका लोकोक्ति, फेकड़ा आरो बुझौवल। अंगिका लोकोक्ति, फेकड़ा आ पहेली-बुझौवलक संकलन; समीक्ष्य ग्रन्थक पहेली-विवेचनमे महत्त्वपूर्ण स्रोत। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि।
२०. तिवारी, मीना (सम्पादक) — चलौ खिस्सा के गाँव। अंगिका लोककथा-संग्रह। प्रकाशन-वर्ष आ प्रकाशकक विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि।
२१. भट्ट, वाञ्छा अंजन — फुलझामर। अंगिका लोककथा-संग्रह। प्रकाशन-वर्ष आ प्रकाशकक विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि।
२२. कुमारी, डॉ. शोभा — अंगिका साहित्य का इतिहास। अंगिका भाषाक साहित्यिक विकास आ परम्परापर केन्द्रित इतिहास-ग्रन्थ। प्रकाशन-विवरण समीक्ष्य सामग्रीमे स्पष्ट नहि अछि।
२३. ग्रियर्सन, जॉर्ज अब्राहम — भारतक भाषिक सर्वेक्षण। १९०३ सँ प्रकाशित भाषावैज्ञानिक सर्वेक्षण-परियोजनाक अन्तर्गत अंगिका/छिका-छिकी सम्बन्धी वर्गीकरणक स्रोत। प्रस्तुत ग्रन्थ-सूचीमे शीर्षक मैथिली रूपमे देल गेल अछि।
२४. सिद्धाचार्यसभ — चर्यापद। बौद्ध सिद्धपरम्पराक प्राचीन पद-संग्रह; अंगिका-मैथिली सहित पूर्वी भारतीय आरम्भिक भाषिक-साहित्यिक परम्पराक चर्चामे सन्दर्भित कृति।
ग. भारतीय काव्यशास्त्र आ ज्ञानमीमांसाक आधार-ग्रन्थ
२५. आनन्दवर्धन — ध्वन्यालोक। ध्वनि, व्यंजना आ काव्यार्थक सिद्धान्तक मूल संस्कृत ग्रन्थ; आलेखमे बालगीत आ बुझौवलक ध्वन्यात्मक तथा व्यंजनात्मक विश्लेषणक सैद्धान्तिक आधार।
२६. कुन्तक — वक्रोक्तिजीवित। वक्रोक्ति, वर्ण-विन्यास, पद, वाक्य, प्रकरण आ प्रबन्ध-वक्रताक सिद्धान्तक मूल संस्कृत ग्रन्थ; अंगिका बुझौवल आ बाल-काव्यक वक्र अभिव्यक्तिक विवेचनमे प्रयुक्त।
२७. गङ्गेश उपाध्याय — तत्त्वचिन्तामणि। नव्य-न्यायक प्रमुख ज्ञानमीमांसात्मक ग्रन्थ; प्रमाण, अनुमान, व्याप्ति आ ज्ञान-प्रक्रियासँ सम्बद्ध विश्लेषणक दार्शनिक आधार।
घ. बाल-साहित्य-अध्ययनक पाश्चात्य आधार-ग्रन्थ — मैथिली शीर्षक-रूपमे
२८. रेनॉल्ड्स, किम्बर्ली — बाल-साहित्य : एक अत्यन्त संक्षिप्त परिचय। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस, २०११। मौखिक परम्परा, पीढ़ीगत सांस्कृतिक दीक्षा, बाल-साहित्यक इतिहास आ समाजीकरणक प्रश्नसभपर केन्द्रित परिचयात्मक ग्रन्थ।
२९. एवर्स, हान्स-हाइनो — बाल-साहित्य-अनुसन्धानक मूलभूत अवधारणासभ। रूटलेज प्रकाशन, २००९। बालोपयुक्तता, वर्गीकरण, साहित्यिक संप्रेषण आ बाल-साहित्य-अध्ययनक आधारभूत अवधारणासभपर केन्द्रित ग्रन्थ।