विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

नाट्य-नवग्रह

गजेन्द्र ठाकुर · 2026-08-01 · अंक 447 · पृष्ठ 657–699

गजेन्द्र ठाकुर- नाट्य-नवग्रह
नअ मैथिली नाटकक अन्तर्सम्बन्धित समीक्षा
कमलाक भगता · दानवीर दधीची · अपाला आत्रेयी · भऽ जाएब छू · जलोदीप
संकर्षण · गंगा ब्रिज · मचण्ड · उल्कामुख
नाटककार
गजेन्द्र ठाकुर
सम्पादक, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका (since 2000) | ISSN 2229-547X
विषय-सूची
भूमिका : नअ नाटक, एकटा रंग-चिन्तन
१. कमलाक भगता : निशान, परम्परा आ अन्धानुकरणक हास्य-शल्यक्रिया
२. दानवीर दधीची : हड्डीक दन्तकथासँ ज्ञान-दान धरि
३. अपाला आत्रेयी : देहक दाग, दृष्टिक रोग आ ऋचाक जन्म
४. भऽ जाएब छू : मैथिलीक पहिल जलवायु-चेतना चौबटिया नाटकक पाठ
५. जलोदीप : बाढ़ि, बच्चा आ पानिक बाटक नाट्यशास्त्र
६. संकर्षण : चोटकेँ सत्कार कहबाक रोग आ आत्मबोधक जुत्ता
७. गंगा ब्रिज : विकासक बलिवेदीपर इतिहासक ठक-ठुक
८. मचण्ड : भाषा, न्याय आ आतंकक त्रिकोणमे मनुक्ख
९. उल्कामुख : स्मृति-विस्मृतिक महासंग्राम — नाट्य-शृंखलाक शिखर
उपसंहार : नअ नाटक, एक नाट्य-दर्शन
भूमिका : नअ नाटक, एकटा रंग-चिन्तन
प्रस्तुत पोथीमे गजेन्द्र ठाकुरक नअ टा मैथिली नाटकक समीक्षा एकत्र कएल गेल अछि — कमलाक भगता, दानवीर दधीची, अपाला आत्रेयी, भऽ जाएब छू, जलोदीप, संकर्षण, गंगा ब्रिज, मचण्ड आ उल्कामुख। पहिल पाँचटा रचना बाल-नाटकक कोटिमे अबैत अछि आ शेष चारिटा प्रौढ़ दर्शक लेल लिखल गेल अछि। मुदा ई विभाजन प्रशासनिक मात्र अछि; नअटा नाटक मिलि कऽ एकटा अखण्ड रंग-चिन्तन प्रस्तुत करैत अछि, जकर एक छोरपर कमलाक भगताक सूत्रधारक सोझ सीख अछि — पूछू, बुझू, फेर करू — आ दोसर छोरपर उल्कामुखक आचार्य सिंहक गूढ़ सूत्र — अपूर्ण पाठक विस्मरण नै भऽ सकैए, विस्मरण होइए मात्र पूर्ण पाठ। एक बाल-दर्शककेँ प्रश्न करब सिखबैत अछि, दोसर प्रौढ़ दर्शककेँ स्मरणक राजनीति बुझबैत अछि; दुनूक बीच सात टा सीढ़ी अछि आ प्रत्येक सीढ़ी अपनासँ पहिलुका आ बदुका सीढ़ीकेँ अरघबैत अछि।
एहि पोथीक पद्धति द्विस्तरीय अछि। पहिल स्तरपर प्रत्येक नाटकक स्वतंत्र समीक्षा अछि — कथा-संरचना, मंच-विधान, रस-योजना आ वैचारिक अन्तर्वस्तुक विवेचन। दोसर स्तरपर प्रत्येक समीक्षा शेष आठ नाटकसँ अपन सम्बन्ध-सूत्र जोड़ैत अछि, जकरा जूलिया क्रिस्तेवा अन्तर्पाठीयता कहैत छथि — कोनो पाठ असगर नहि जनमैत अछि, ओ आन पाठ सभक उद्धरण, प्रतिध्वनि आ रूपान्तरणक ताना-बानासँ बुनल जाइत अछि। ई नअ नाटक एक्के नाटककारक कलमसँ निकलल अछि, तेँ एतऽ अन्तर्पाठीयता आकस्मिक नहि, सायास अछि: दधीची आ जलोदीप दुनूक अन्तमे एक्के फुसफुसाहटि सुनाइ दैत अछि — ई असल बात अछि; भऽ जाएब छूक किशोर बुच्चीक नाम अपाला अछि, जे अपाला आत्रेयीक नायिकाक स्मरण करबैत अछि; संकर्षण आ उल्कामुख दुनू अंकक बदला कल्लोलमे बँटल अछि; गंगा ब्रिजक डंका आ उल्कामुखक लोकगीत दुनू लिखित इतिहासक समानान्तर लोक-स्मृतिक वाहक अछि। ई सभ सूत्र पकड़लापर नअ नाटक नअ टा फराक पोथी नहि, एकटा नाट्य-नवग्रह बुझाइत अछि।
सैद्धान्तिक उपकरणक चुनाव विषयानुसार कएल गेल अछि। भारतीय पक्षमे भरतक नाट्यशास्त्रक रस-व्यवस्था, नाट्यधर्मी-लोकधर्मी भेद, सूत्रधार-परम्परा आ रंगमंचक अंग-विभाजन; अभिनवगुप्तक साधारणीकरण; आनन्दवर्धनक ध्वनि; कुन्तकक वक्रोक्ति; क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचार; आ मैथिलीक अपन कीर्तनियाँ तथा लोकगाथा-परम्पराक कसौटी प्रयुक्त भेल अछि। पाश्चात्य पक्षमे अरस्तूक काव्यशास्त्र, बर्गसाँक हास्य-विवेचन, ब्रेष्टक महाकाव्यात्मक रंगमंच आ शिक्षा-नाटक, पिस्काटरक दस्तावेजी रंगमंच, बादल सरकारक तेसर रंगमंच, सफदर हाशमीक नुक्कड़-परम्परा, आगुस्तो बोआलक दमित लोकक रंगमंच, टी.आइ.ई. (थिएटर इन एजुकेशन) आन्दोलन, पीटर स्लेडक बाल-नाट्य सिद्धान्त, ब्रायन वे आ डोरोथी हीथकोटक शिक्षा-नाट्य पद्धति, ब्रूनो बेटेलहाइमक लोककथा-मनोविज्ञान, लेव भाइगोत्स्कीक खेल-सिद्धान्त, अर्विंग गॉफमनक कलंक-विमर्श, काफ्का आ पिरान्देलोक आधुनिकतावादी दृष्टि, वाल्टर बेन्यामिनक इतिहास-दर्शन आ यान असमानक सांस्कृतिक स्मृति-सिद्धान्त सहायक भेल अछि। कोनो सिद्धान्त नाटकपर बाहरसँ लादल नहि गेल अछि; जतऽ पाठ स्वयं जाहि कसौटीक माँग करैत अछि, ओतहि ओ कसौटी लगाओल गेल अछि।
बाल-नाट्य आ प्रौढ़-नाट्यक सिद्धान्त-भेदपर एकटा गप एतहि स्पष्ट कऽ देब उचित। पीटर स्लेड बाल-नाटककेँ प्रौढ़ रंगमंचक छोट संस्करण नहि, एकटा स्वतंत्र कला-रूप मानैत छथि, जकर प्राण अछि खेल, सहभागिता आ वृत्ताकार स्थान; डोरोथी हीथकोट बच्चाकेँ विशेषज्ञक चोगा (मैंटल ऑफ द एक्सपर्ट) पहिरा कऽ ज्ञानक भीतरसँ सोचब सिखबैत छथि। एहि पोथीक पाँचू बाल-नाटक एहि कसौटीपर परखल गेल अछि — ओ सभ बच्चाकेँ उपदेश सुननिहार नहि, प्रश्न पुछनिहार, खेल खेलनिहार आ प्रतिज्ञा केनिहार बनबैत अछि। प्रौढ़ नाटक सभमे ठीक उनटा दिशा अछि — ओतऽ दर्शकक सहज विश्वास तोड़ल जाइत अछि, ब्रेष्टक भाषामे परिचितकेँ अपरिचित बनाओल जाइत अछि, जाहिसँ दर्शक भावुक बहावमे नहि भँसिया कऽ विचार करथि। एक दिस बच्चाकेँ संसारसँ जोड़बाक कला, दोसर दिस प्रौढ़केँ संसारसँ टोकबाक कला — दुनूक बीच जे सेतु अछि, सएह ई नअ नाटक।
समीक्षाक क्रम एहि पोथीमे पठन-यात्राक क्रम अछि: पहिने पाँच बाल-नाटक — लोककथा (कमलाक भगता), वैदिक आख्यान (दानवीर दधीची, अपाला आत्रेयी), आ समकालीन संकट (भऽ जाएब छू, जलोदीप); तकर बाद चारि प्रौढ़ नाटक — व्यक्तिक दंभ (संकर्षण), व्यवस्थाक हिंसा (गंगा ब्रिज), राज्य आ आतंकक द्वन्द्व (मचण्ड) आ अन्तमे स्मृतिक महासंग्राम (उल्कामुख), जे शेष आठूकेँ अपनामे समेटि लैत अछि। पाठक चाहथि तँ कोनो एकटा समीक्षा फराक पढ़ि सकैत छथि, मुदा अन्तर्पाठीय सूत्र सभक असल स्वाद क्रमसँ पढ़लापर भेटत।
१. कमलाक भगता : निशान, परम्परा आ अन्धानुकरणक हास्य-शल्यक्रिया
कमलाक भगता एहि नाट्य-शृंखलाक सभसँ छोट रचना अछि आ सम्भवतः सभसँ चोटगर सेहो। उपशीर्षक स्वयं घोषणा करैत अछि — अन्धानुकरणपर एकटा चोटगर हास्य-शिक्षाप्रद बाल-नाटक — आ सूत्रधार आरम्भहिमे कहि दैत छथि जे कथा संस्कृत साहित्यक प्रसिद्ध कथापर आधारित अछि। कथा-वस्तु सरल अछि: एकटा भिखमंगा बरखक बचाओल पाइक चुकड़ी लऽ कऽ कमला-स्नान करऽ अबैत अछि, जनकपुर जा कऽ कमलाक भगता बनबाक सपना लेने। चोरीक डरे ओ चुकड़ी बालुमे गाड़ि दैत अछि आ चिन्हबाक हेतु ओहिपर पएरसँ बालु चढ़ा कऽ शिवलिंग बना दैत अछि। तकर बाद जे होइत अछि से एहि नाटकक असल नाट्य-घटना अछि: एक-एक कऽ अबैत स्नानार्थी ओहि शिवलिंगकेँ स्थानीय विधान बुझि अपन-अपन शिवलिंग बनबऽ लगैत छथि, मंच हर-हर महादेवक अनघोलसँ भरि जाइत अछि, आ नहा कऽ घुरल भिखमंगा शिवलिंगक समुद्रमे अपन निशान हेरा दैत अछि। सूत्रधारक निष्कर्ष-वाक्य एहि नाटकक बीज-मंत्र अछि — चिन्ह अपना लेल बनल छल, परम्परा सभ लेल बनि गेल।
भरतक रस-व्यवस्थामे हास्यक स्थायी भाव हास अछि, आ भरत हासक दू भेद करैत छथि — आत्मस्थ, जाहिमे पात्र स्वयं हँसैत अछि, आ परस्थ, जाहिमे पात्रक चेष्टा देखि आन हँसैत अछि। कमलाक भगताक हास्य विशुद्ध परस्थ अछि: मंचपर कियो नहि हँसैत अछि — भिखमंगा गम्भीर अछि, स्नानार्थी सभ श्रद्धालु छथि — मुदा दर्शक-दीर्घामे हँसीक लहरि उठैत अछि, कारण दर्शक ओ जनैत छथि जे पात्र नहि जनैत अछि। नाट्य-समीक्षाक भाषामे ई विडम्बनाजन्य हास्य (ड्रामेटिक आइरनी) अछि आ बाल-दर्शक लेल एकर विशेष महत्व अछि: बच्चा एतऽ पात्रसँ बेसी जननिहार स्थितिमे राखल जाइत अछि, जे ओकर आत्मविश्वास बढ़बैत अछि आ सीखकेँ उपदेश नहि, अपन खोज बुझबैत अछि। आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धान्तक कसौटीपर सूत्रधारक अन्तिम वाक्य उल्लेखनीय अछि — वाच्यार्थ एकटा घाटक घटनाक वर्णन अछि, मुदा व्यंग्यार्थ समस्त कर्मकाण्ड, सामाजिक रीति आ भेँड़ियाधसान संस्कृतिपर पसरि जाइत अछि। क्षेमेन्द्रक औचित्य-दृष्टिसँ सेहो रचना खरा अछि: बाल-दर्शक लेल दण्ड-विधान हिंसक नहि अछि — भिखमंगाकेँ मारि नहि पड़ैत अछि, ओकर धन मात्र ओकरे बनाओल निशानक भीड़मे हेरा जाइत अछि, माने दण्ड कथाक तर्कसँ उपजैत अछि, बाहरसँ नहि आबैत अछि।
पाश्चात्य कसौटीपर ई रचना ब्रेष्टक शिक्षा-नाटक (लेयरश्ट्यूक) क निकट अछि — एहन नाटक जकर उद्देश्य दर्शककेँ आनन्दक संग एकटा विश्लेषण-क्षमता देब अछि। अन्तमे सभ पात्र मिलि कऽ दर्शक दिस उन्मुख भऽ जे सामूहिक वाक्य बजैत छथि — पूछू, बुझू, फेर करू। आँखि मूनि कऽ नकल नहि करू — से ब्रेष्टक प्रत्यक्ष सम्बोधन (डाइरेक्ट एड्रेस) क तकनीक अछि, जे चारिम देवाल तोड़ि दर्शककेँ निर्णायक बनबैत अछि। ब्रूनो बेटेलहाइम लोककथाक मनोवैज्ञानिक कार्य ई बतबैत छथि जे ओ बच्चाक भीतरक डर — एतऽ सम्पत्ति हेरेबाक डर — केँ सुरक्षित काल्पनिक ढाँचामे प्रकट कऽ ओकर निष्पत्ति करैत अछि; भिखमंगाक क्षति बच्चाकेँ डरबैत नहि अछि, सावधान करैत अछि, कारण कथाक अन्तमे समुदाय बालु समेटबाक सामूहिक अभिनय करैत अछि — क्षतिक बाद मरोम्मतिक छवि।
अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ कमलाक भगता एहि शृंखलाक बीज-नाटक अछि। एकर केन्द्रीय रोग — बिनु कारण बुझने क्रिया दोहराएब — प्रौढ़ रूपमे संकर्षणमे घुरि कऽ अबैत अछि: ओतऽ तीनटा कारी कुकुर बेरा-बेरी मधुर-दोकानपर चोट खाइत अछि आ प्रत्येक अपन चोटकेँ सत्कार कहि दोसराकेँ ओही बाटे पठबैत अछि — माने कमलाक भगताक स्नानार्थी-भीड़ ओतऽ तीन पात्रमे घनीभूत भऽ गेल अछि, आ अनुकरणक रोगमे आत्म-प्रवंचनाक नव परत जुड़ि गेल अछि। दोसर दिस जलोदीप आ भऽ जाएब छू एकर प्रतिषेध (एंटीडोट) प्रस्तुत करैत अछि — ओतऽ बच्चा सभ भीड़क विपरीत प्रश्न पुछनिहार अछि; कमलाक भगता जाहि व्याधिक निदान करैत अछि, ओ दुनू नाटक ओकर चिकित्सा-पद्धति सिखबैत अछि। आ उल्कामुखमे यएह रोग अपन सभसँ भयावह रूपमे प्रकट होइत अछि — आचार्य सरभक रटन्त विद्या, जतऽ बिनु बुझने पाठ यादि कराओल जाइत अछि; शिवलिंगक नकलसँ शास्त्रक नकल धरिक ई यात्रा एहि नाट्य-संसारक एकटा सुसंगत चिन्ता-रेखा अछि।
सीमाक चर्च करी तँ नाटकक संरचना एक्के घटना आ एक्के व्यंग्यपर टिकल अछि, तेँ मंचनमे गति आ ध्वनि-विधानक अनुशासन अनिवार्य अछि — पाठमे देल ध्वनि-संकेत (भिक्षाक स्वर, सिक्का खनखन, कमलाक धार, बालु कोड़बाक सरसराहटि, भीड़क अनघोल आ अन्तक चुप्पी) एकटा पूरा श्रव्य-वास्तु रचैत अछि आ चुप्पीक ओ अन्तिम क्षण, जखन भीड़ बुझि जाइत अछि जे विधान बतौनिहारकेँ कारण नहि बुझल छल, एहि छोट नाटकक सभसँ पैघ रंग-क्षण अछि। छोट कलेवरमे एतेक परिपूर्ण वृत्त बहुत कम बाल-नाटकमे भेटैत अछि।
२. दानवीर दधीची : हड्डीक दन्तकथासँ ज्ञान-दान धरि
दानवीर दधीचीक सभसँ साहसिक निर्णय ओकर उपशीर्षकहिमे अछि — ज्ञान, प्रतिज्ञा आ सत्यक रक्षाक वैदिक नाट्य-गाथा — आ मंच-निर्देशहिमे स्पष्ट कएल गेल अछि जे सुधारल पाठमे दधीचीक दानकेँ हड्डी-दंतकथा नहि, बल्कि ज्ञान, प्रतिज्ञा, पात्रता आ सत्यक रक्षा रूपमे प्रस्तुत कएल गेल अछि। नाटकक अन्तमे सूत्रधार एहि पुनर्पाठकेँ घोषित करैत छथि: दधीची अपन देह नहि, ज्ञान, प्रतिज्ञा आ सत्यक रक्षा दान केलन्हि; हड्डीसँ वज्र बनएबाक कथा पछाति पौराणिक लोकनिक अनर्थ अछि। ई कोनो मनगढ़न्त संशोधन नहि — वैदिक वाङ्मयमे दध्यङ् आथर्वणक कथा मधुविद्या आ अश्व-मस्तकसँ जुड़ल अछि, जकर संकेत ऋग्वेदक अश्विनौ-सूक्त आ शतपथ ब्राह्मणक मधु-काण्ड धरि जाइत अछि; हड्डी-वज्रक प्रचलित रूप परवर्ती पौराणिक विकास अछि। रोलाँ बार्थ मिथककेँ एहन वाणी कहैत छथि जे इतिहासकेँ प्रकृति बना दैत अछि — जे बात कहियो कोनो विशेष अर्थमे कहल गेल छल, ओ मिथक बनि सर्वकालिक आ निर्विवाद बुझाए लगैत अछि। ई नाटक ठीक उनटा क्रिया करैत अछि: जमल मिथककेँ फेरसँ इतिहास आ अर्थमे घोरैत अछि, आ बाल-दर्शककेँ अन्तिम पाँतीमे सोझे कहि दैत अछि — कथा बदलि सकैए, मुदा सत्यक खोज बन्न नहि हेबाक चाही। बाल-नाटकमे स्रोत-समीक्षाक ई पाठ अनूठा अछि।
रस-योजनाक दृष्टिसँ नाटकक शीर्षक स्वयं सिद्धान्त-सङ्केत अछि। संस्कृत काव्यशास्त्रमे वीर रसक तीन भेद मानल गेल अछि — युद्धवीर, धर्मवीर आ दानवीर; दानवीर दधीची शीर्षकहिसँ घोषणा करैत अछि जे एतऽ वीर रसक आलम्बन युद्ध नहि, दान अछि, आ ओहो दान भौतिक वस्तुक नहि, विद्याक। इन्द्रक बज्र-प्रहारक क्षणमे भयानक आ अश्विनौक शल्य-चमत्कारमे अद्भुतक स्पर्श अछि, मुदा समग्र रस-परिपाक शान्त दिस झुकल अछि — महर्षिक ओ वाक्य जे ई शरीर तँ अछि क्षणभंगुर... ताहि डरसँ हम ब्रह्म विद्याक लोप नहि होए देबैक, शान्त रसक स्थायी भाव निर्वेद (शम) क विशुद्ध अभिव्यक्ति अछि। भरतक नाट्यशास्त्र मंचपर वधक प्रत्यक्ष प्रदर्शनकेँ अनुचित मानैत अछि, आ ई नाटक ओहि मर्यादाक रचनात्मक पालन करैत अछि: गरदनि कटबाक दुनू क्षण परदाक अधखसल-अधउठल खेलमे, प्रकाश आ ध्वनिक संकेतसँ निष्पन्न होइत अछि — मंच-निर्देश स्पष्ट कहैत अछि, ध्वनि आ प्रकाशसँ भय, हिंसा नहि। नाट्यधर्मी शैलीक ई प्रयोग — परदाक बेर-बेर उठब-खसब, जे शल्यक्रियाक कालखण्डकेँ छाँटि दैत अछि — बाल-रंगमंच लेल हिंसा-चित्रणक एकटा अनुकरणीय समाधान अछि।
पात्र-रचनामे अरस्तूक काव्यशास्त्रक दूटा केन्द्रीय युक्ति सक्रिय अछि — पेरिपेटिया (भाग्य-पलट) आ एनाग्नोरिसिस (आत्म-पहचान), आ दुनू दधीचीमे नहि, इन्द्रमे घटित होइत अछि। जे इन्द्र पहिल दृश्यमे आश्वासन पहिने लिअ, प्रश्न बादमे — क कूट-नीतिसँ विद्या झटकैत छथि आ ज्ञान पर पहरा हमर रहत कहि धमकी दऽ जाइत छथि, वएह तेसर चरणमे काँपैत हाथे बज्र लेने क्षमा माँगैत छथि — हम ज्ञानक रक्षा करबाक नाम पर ज्ञानक हत्या करऽ गेल रही। खलनायकक ई आन्तरिक यात्रा नाटककेँ सपाट नीति-कथासँ ऊपर उठबैत अछि; प्रतिपक्षमे अश्विनौक पात्रता-तर्क — सेवा हमरा पात्र बनेलक, पद नहि — दानक शास्त्रीय शर्त (पात्रे दानम्) केँ आधुनिक, श्रम-सम्मानक अर्थ दैत अछि। ध्यान देबा जोग अछि जे च्यवन-प्रसंग आ सोमपीथी बनबाक कथा-सूत्र वैदिक-पौराणिक परम्परासँ प्रामाणिक रूपेँ आनल गेल अछि।
अन्तर्पाठीय जालमे दानवीर दधीचीक सभसँ गहींर सूत्र उल्कामुखसँ जुड़ैत अछि। इन्द्रक धमकी — ई मधु-विद्या ककरो देलहुँ तँ माथ खसत — आ उल्कामुखक चौपाड़िक ओ व्यवस्था, जतऽ बाहरक विद्यार्थीकेँ तत्वचिन्तामणिक प्रतिलिपि आ सार-संक्षेप धरिक अनुमति नहि छल, एक्के अपराधक दू युग अछि: ज्ञानपर पहरा। दधीची ओहि पहराक उत्तर अपन देहक जोखिमसँ दैत छथि, गंगेश-वल्लभा गीतक माध्यमे — मुदा दुनू ठाम नाटककारक पक्ष एक्के अछि, जकरा दधीचीक वाक्यमे कहल गेल अछि: ज्ञान रोकेनिहारसँ पैघ अपराधी कियो नहि। दोसर सूत्र अपाला आत्रेयीसँ अछि — दुनू वैदिक बाल-नाटक अछि, दुनूमे गुरुकुल-जीवनक विस्तृत आ प्रामाणिक चित्रण अछि, आ दुनूमे विद्या अन्ततः देहक सीमासँ पैघ सिद्ध होइत अछि: ओतऽ अपालाक ऋचा त्वचाक दागसँ, एतऽ दधीचीक मधुविद्या गरदनिक कटानसँ। आ तेसर सूत्र कमलाक भगतासँ — ओतुका बिनु कारण बुझने नकल एतऽ इन्द्रक आरम्भिक रूपमे झलकैत अछि, जे ज्ञान चाहैत छथि प्रतिष्ठा लेल, बुझबा लेल नहि। नाटकक अन्तिम फुसफुसाहटि — ई असल बात अछि — शब्दशः जलोदीपक समापनमे घुरि कऽ अबैत अछि; ई नाटककारक हस्ताक्षर-ध्वनि अछि, जकर चर्च उपसंहारमे हएत।
मंचन-दृष्टिसँ तीन लोकक भाव-विभाजन — आश्रममे स्वर्णिम शान्ति, इन्द्रक प्रवेशमे तीख उजास, युद्धस्थलमे धुआँमय लालिमा — प्रकाश-परिकल्पनाकेँ अर्थ-वाहक बनबैत अछि, आ शर्यणा जलाशय तथा शस्त्र-निर्माणक सूची (त्रिसंधि व्रज, सूचीमुख, विकंकतीमुख आदि) वैदिक सन्दर्भक गन्ध बचौने रखैत अछि। अन्तिम चेतावनी — शस्त्रक धर्म रक्षा अछि, दंभ नहि — नाटककेँ युद्धोन्मादसँ बचा कऽ ओकर शान्त-रसीय समापन सुरक्षित करैत अछि।
३. अपाला आत्रेयी : देहक दाग, दृष्टिक रोग आ ऋचाक जन्म
अपाला आत्रेयी एहि शृंखलाक तेसर वैदिक-स्रोत रचना अछि आ सम्भवतः सभसँ साहसी, कारण एकर नायिका ऋग्वेदक ओ विरल स्त्री-द्रष्टा अछि जिनक सूक्त संहितामे सुरक्षित अछि। नाटक सात दृश्यमे अपालाक जीवन-वृत्त रचैत अछि: आश्रमक जिज्ञासु बालिका, कन्या आ कुमार दुनूक उपनयन आ शिक्षा, त्वक्-रोग (श्वेत कुष्ठ) क आगमन, कृशाश्वसँ विवाह, पतिक क्रमिक उदासीनता, आत्मसम्मानक संग पितृ-तपोवन प्रत्यावर्तन, सोम थकुचैत इन्द्र-स्तुति, रोग-मुक्ति आ ब्रह्मोदय सभामे अपन ऋचाक ऋक्-प्रवेश। सोम-दृश्यक सामग्री — छोट खुट्टीक सोम, दाँतसँ थकुचल, तीन ठामक उत्पत्तिक प्रार्थना (पिताक मस्तक, खेत आ उदर), रथ आ युगक छिद्रसँ शुद्धि, सूर्यसमान त्वचा — ऋग्वैदिक अपाला-सूक्तक प्रामाणिक प्रतिध्वनि अछि; नाटककार श्रुतिक बिम्ब-सामग्रीकेँ मंच-क्रियामे बदलैत छथि, ओकरा तोड़ैत-मरोड़ैत नहि छथि। मंच-सज्जामे साही, गोहि आ गिरगिटक उपस्थिति सेहो सूक्तक त्वचा-रूपान्तरण-प्रतीकसँ आएल अछि।
एहि नाटकक वैचारिक केन्द्र एकटा सूक्ष्म व्युत्क्रम अछि, जे अपालाक वाक्यमे धारदार भऽ कऽ बहराइत अछि — दाग देहपर अछि, दृष्टि अहाँक बीमार भेल अछि। अर्विंग गॉफमनक कलंक-सिद्धान्त (स्टिग्मा) कहैत अछि जे कलंक देहक गुण नहि, समाजक दृष्टिक सम्बन्ध अछि — कलंकित व्यक्तिक पहचान ओकर समग्रतासँ काटि कऽ एक्के चिन्हपर सीमित कऽ देल जाइत अछि। नाटक एहि सिद्धान्तकेँ जेना पूर्वहिसँ जनैत अछि: अत्रि आरम्भहिमे चिन्तित छथि जे रोग देहपर अछि, मुदा समाज एकरा आत्मापर आरोप बना दै छै, आ कृशाश्वक स्वीकारोक्ति — हमरा भीतर संघर्ष अछि प्रेम आ वासनाक... हम अपन दुर्बलता कहि रहल छी, ओकरा धर्मक नाम नहि दऽ सकै छी — खलनायकत्वक जगह मानवीय दुर्बलताक ईमानदार चित्र अछि। ई ईमानदारी नाटककेँ मेलोड्रामासँ बचबैत अछि: कृशाश्व दुष्ट नहि छथि, हुनक दृष्टि रोगग्रस्त अछि, आ नाटकक करुणा दुनू दिस बँटैत अछि। मुदा समापनमे नाटक करुण रसक अश्रु-मार्ग नहि पकड़ैत अछि — अपाला घुरल कृशाश्वक पश्चात्तापकेँ स्वीकारो नहि करैत छथि, अस्वीकारो नहि; ओ मात्र अपन नव पहचान घोषित करैत छथि: हम अपाला आत्रेयी छी — ककरो दया नहि, अपन ऋचाक दृष्टा। करुणसँ वीरमे रसक ई संक्रमण — जकरा आत्मगौरवक वीर कहल जा सकैत अछि — एहि नाटकक शास्त्रीय उपलब्धि अछि, आ अन्तिम प्रकाश-निर्देश (अपाला दिस वेदीक प्रकाश बढ़ैत, कृशाश्व दिस मद्धिम) ओकर मंचीय मुहर।
स्त्री-विमर्शक कसौटीपर नाटकक सभसँ मूल्यवान पक्ष ई अछि जे ओ अपालाकेँ पीड़िता-कथासँ निकालि स्रष्टा-कथामे स्थापित करैत अछि। ब्रह्मोदय सभाक ऋषिगण जखन कहैत छथि — सम्मिलित करबाक आ नहि करबाक तँ प्रश्ने नहि अछि। ई तँ आइसँ ऋकक भाग भेल। अपालाक नाम मंत्रसँ अलग नहि कएल जाए — तखन नाटक स्त्री-रचनाकारक नाम-सहित स्वीकृतिक ओ आदर्श रचैत अछि जकर ठीक विलोम उल्कामुखमे देखाओल गेल अछि, जतऽ वल्लभाक गीत नाम कटा कऽ बँसबिट्टीक भुतहा गीत बनि भटकैत अछि आ आचार्य सिंह-व्याघ्र नाम-लोपसँ प्रतीक बनि जाइत छथि। दुनू नाटक मिलि कऽ स्मृति-राजनीतिक दू ध्रुव देखबैत अछि: नाम-सहित स्मरण (अपाला) आ नाम-रहित विस्मरण (वल्लभा)। सूत्रधारक समापन-वाक्य — देहक घाव भरि सकैए, दृष्टिक घाव विद्यासँ भरैए — एहि शृंखलाक विद्या-केन्द्रित दर्शनकेँ दधीचीक ज्ञान-दानसँ जोड़ैत अछि; ओतऽ विद्या मृत्युसँ पैघ छल, एतऽ कलंकसँ।
बाल-नाट्य सिद्धान्तक दृष्टिसँ किछु बारीक निर्णय प्रशंसनीय अछि। रोगक दृश्य-संकेत हलुक उज्जर कपड़ा आ प्रकाशसँ, उपहाससँ नहि — ई निर्देश क्षेमेन्द्रक औचित्य आ आधुनिक समावेशी शिक्षा-दृष्टि दुनूक संगम अछि: बाल-दर्शक रोगकेँ देखथि, मुदा घृणा वा हास्यक वस्तु नहि बनए। उपनयन-दृश्यमे अत्रिक घोषणा — एतय कन्या आ कुमार दुनूकेँ प्रश्न करबाक अधिकार अछि; प्रश्ने विद्याक पहिल सीढ़ी अछि — भऽ जाएब छू आ जलोदीपक प्रश्न-संस्कृतिक वैदिक पूर्वज अछि, आ आश्रम-नियमक विवरण (वनक प्राणी अवध्य, अकृष्टपच्य अन्नक प्रयोग, हरिणकेँ निर्विघ्न टहलबाक अनुमति) भऽ जाएब छूक पारिस्थितिकी-चेतनाकेँ प्राचीन आधार दैत अछि — विद्या ओ प्रकृति, दुनू पर अधिकार नहि, सेवा करबाक अछि। स्मरणीय जे भऽ जाएब छूक किशोर बुच्चीक नाम अपाला आ किशोर बौआक जोड़ीदार जयन्त अछि — नाटककार अपन बाल-पात्रकेँ अपनहि नाट्य-संसारक पूर्वजक नाम दऽ कऽ एकटा भीतरी स्मृति-शृंखला चलबैत छथि, जे एहि पोथीक अन्तर्पाठीय पद्धतिकेँ स्वयं नाटककारक अभिप्राय सिद्ध करैत अछि।
सीमा-पक्षमे दृश्य दूक शिक्षा-सूची (वर्ण, मात्रा, बलाघात, साम-गान आदि) मंचनमे स्थैतिक भऽ सकैत अछि, मुदा पाठ स्वयं एकर उत्तर दैत अछि — अपालाक बीच-बीचक प्रश्न (जँ उच्चारणमे दोष होइ तँ अर्थ बदलि जाइ छै; जँ दृष्टिमे दोष होइ तँ मनुक्ख बदलि जाइ छै) सूचनाकेँ संवादमे गूँथि दैत अछि। समग्रतः अपाला आत्रेयी बाल-नाटकक चोगामे एकटा परिपक्व स्त्री-गौरव-नाट्य अछि, जे करुणाक जगह सम्मान माँगैत अछि।
४. भऽ जाएब छू : मैथिलीक पहिल जलवायु-चेतना चौबटिया नाटकक पाठ
भऽ जाएब छू अपन उपशीर्षकमे दूटा दाबी करैत अछि — मैथिलीक पहिल जलवायु-चेतना (क्लाइमेट फिक्शन) नाटक, आ बाल चौबटिया-सड़क नाटक — आ दुनू दाबीक निर्वाह रचना-विधानमे स्पष्ट अछि। एतऽ ने मंच अछि, ने परदा; सूत्रधार भीड़केँ हाक दैत छथि — घेराबा बना लिअ — आ निर्देश दर्शकहुकेँ कहैत अछि जे गोल घेरा बना कऽ हबाक रास्ता खाली राखथि। ई वृत्ताकार, उपकरण-मुक्त, दर्शक-वेष्टित स्थान बादल सरकारक तेसर रंगमंचक मूल-मंत्र अछि — एहन रंगमंच जे प्रेक्षागृहक अर्थतंत्रसँ मुक्त भऽ लोकक बीच चलि जाए — आ सफदर हाशमीक नुक्कड़-परम्पराक सेहो, जतऽ नाटक दर्शक लग जाइत अछि, दर्शक नाटक लग नहि। सूत्रधार आ भीड़सँ निकलल कलाकारक आरम्भिक नोक-झोंक (नाटक देखलासँ भोजन चलतौ रौ?) नुक्कड़-शैलीक प्रामाणिक उद्घाटन अछि, आ सूत्रधारक उत्तर — पेटक भूख, मोनक भूख, बोलीक भूख आ हबाक भूख — नाटकक विषयकेँ रोजी-रोटीक प्रश्नसँ जोड़ि कऽ जलवायु-विमर्शक ओहि आलोचनाक उत्तर पहिनहि दऽ दैत अछि जे एकरा सम्पन्न लोकक विलास कहैत अछि।
संरचना तीन भागमे अछि — सृष्टिक पात्र सभ, विज्ञान आ कल्पना, आ प्रतिज्ञा — आ पात्र-योजना पीटर स्लेडक बाल-नाट्य सिद्धान्तक पाठ्य-पुस्तकीय उदाहरण अछि। आठ कलाकार आठ भूमिका उठबैत छथि: चिड़ै-भगजोगनी (ओम, आस्था), गाछ-बृच्छ (जयन्त, अपाला), सूर्य-तरेगण आ चन्द्र (विजय, विजया), भूत-प्रेत बनल असफल वैज्ञानिक नेकलाल आ स्वप्न-कल्पना बनलि रामवती। स्लेड कहैत छथि जे बच्चाक खेलमे वस्तु आ प्राणी बनि जेबाक क्षमता (प्रोजेक्टेड आ पर्सनल प्ले) ओकर सहज कला अछि; ई नाटक ओही क्षमताकेँ रंग-विधान बना लैत अछि — मनुष्येतर संसार मंचपर बाजैत अछि, आ जलवायु-संकट अमूर्त आँकड़ा नहि रहि पात्रक जीवन-मरणक प्रश्न बनि जाइत अछि। विज्ञान-सम्प्रेषणक स्तरपर नाटक अद्भुत रूपेँ ठोस अछि: भगजोगनीक शीतल प्रकाश (जैव-दीप्ति) आ नेकलालक सोलह आनामे पन्द्रह आना गर्मी बला अकुशल प्रकाशक तुलना ऊर्जा-दक्षताक पूरा पाठ एक बिम्बमे दऽ दैत अछि; यूकेलिप्टस-प्रसंग (जे गाछ माटिक प्यास नै बुझै, ओकरा रोपलासँ जंगल नहि बनै छै) देसी प्रजातिक पारिस्थितिकी-तर्क अछि; आ बीया महीसक केसमे फँसि दूर देश जेबाक गीत बीज-प्रकीर्णनक विज्ञानकेँ लोकगीतक लयमे बान्हि दैत अछि। कल्पना (रामवती) आ विज्ञान (नेकलाल) क नोक-झोंक एहि नाटकक दार्शनिक धुरी अछि — बुझलो गप जँ व्यवहारमे नहि उतरल तँ विज्ञानो अधूरा — जे ज्ञान आ आचरणक ओही खाधिकेँ चिन्हैत अछि जकरा कमलाक भगता नकलक रूपमे आ संकर्षण दंभक रूपमे देखबैत अछि।
आगुस्तो बोआलक दमित लोकक रंगमंचक केन्द्रीय अवधारणा अछि प्रेक्षक-कर्ता (स्पेक्ट-एक्टर) — दर्शक जे देखिते-देखिते कर्ता बनि जाए। भऽ जाएब छूक तेसर भाग ठीक यएह करैत अछि: आठू पात्र अपन-अपन प्रतिज्ञा बजैत छथि (हम जतेक काटब, ताहिसँ बेसी रोपब; हम देसी गाछ चिन्हब, बीया बचाएब; हम पुरान गलती मानब...) आ तखन दर्शक दिस हाथ पसारि पुछैत छथि — कहू, अहाँ सभ सेहो? — आ निर्देश अछि जे कलाकार दर्शकसँ हँ कहाबथि। बोआल रंगमंचकेँ क्रान्तिक पूर्वाभ्यास कहैत छथि; एतऽ ओ पूर्वाभ्यास प्रतिज्ञाक सामूहिक उच्चारण अछि। खोंखीक प्रयोग नाटकक सभसँ मार्मिक ध्वनि-युक्ति अछि — गाछक मरणक गीतक बाद सभ पात्र खोंखी करैत छथि आ ओ खोंखी धीरे-धीरे तालमे बदलि जाइत अछि: प्रदूषणक देह-चिन्ह कलाक लयमे रूपान्तरित भऽ प्रतिरोधक ऊर्जा बनि जाइत अछि। शीर्षक-सूत्र स्वयं ध्वनि-सिद्धान्तक चमत्कार अछि — भऽ जाएब छू बाल-खेल (छू-मन्तर) क निर्दोष शब्दमे विलुप्तिक आतंक भरि दैत अछि, आ अन्तिम पंक्ति ओकर प्रतिषेध रचैत अछि: जड़ि बचत तँ भऽ जाएब छू नहि; जड़ि बचत तँ बचि जाएब छी।
अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ ई नाटक जलोदीपक जोड़ीदार अछि — दुनू समकालीन पर्यावरण-संकटक बाल-नाटक अछि, एकमे हबा बीमार अछि, दोसरमे पानि बाट माँगैत अछि; दुनूक अन्त सामूहिक प्रतिज्ञासँ होइत अछि आ दुनूमे संकटक मूल कारण प्रकृति नहि, मनुक्खक अ-कल्पनाशील व्यवहार अछि। कमलाक भगतासँ एकर सम्बन्ध विलोमक अछि: ओतऽ भीड़ बिनु प्रश्नक नकल करैत अछि, एतऽ घेरामे ठाढ़ भीड़सँ प्रश्न पुछल जाइत अछि आ उत्तर (हँ) कहाओल जाइत अछि — भीड़सँ समुदाय बनेबाक ई प्रक्रिया एहि दुनू नाटककेँ एक्के सिक्काक दू पिठ बनबैत अछि। आ नेकलालक आत्म-स्वीकृति — असफल वैज्ञानिक छी हम... हम नै कऽ सकलौं कल्पना — संकर्षणक अन्तिम आत्मबोध (ठकान जुत्तामे नहि, हमर घमण्डमे लगल) क बाल-संस्करण अछि: दुनू ठाम नाटकक नैतिक शिखर आत्म-दोष-स्वीकार अछि, दोसरापर दोषारोपण नहि।
मंचन-सम्भावनाक दृष्टिसँ लेजर-लाइटसँ भगजोगनीक संकेत, चद्दरिक अढ़, फोटो-पट्टी सन सस्त-सुलभ उपकरण चौबटिया प्रदर्शनक व्यावहारिकता सिद्ध करैत अछि। सीमा एतबे जे आठ पात्रक समानान्तर विकासमे किछु स्वर (विजय-विजया) अपेक्षाकृत कम विकसित रहि जाइत अछि; मुदा सड़क-नाटकक द्रुत लयमे ई सन्तुलन क्षम्य अछि। समग्रतः ई रचना मैथिली बाल-रंगमंचकेँ एकटा नव विधा — जलवायु-नाट्य — क द्वार खोलि दैत अछि।
५. जलोदीप : बाढ़ि, बच्चा आ पानिक बाटक नाट्यशास्त्र
जलोदीप बाढ़ि-सुरक्षा आ जल-निकासीक सामाजिक बाल-नाटक अछि आ एहि शृंखलामे समकालीन यथार्थक सभसँ लग ठाढ़ रचना। पूर्वदृश्यमे चारू कात जलामय अछि, एकटा बच्चा बाढ़िसँ निकलि हाथ बढ़बैत अछि आ ओकर वाक्य — हम तँ ठीके छी। मुदा हम्मर... — पूरा हेबासँ पहिनहि अन्हार पसरि जाइत अछि; ई अधूरा वाक्य पूरा नाटकक करुण-बीज अछि, कारण बादमे बुझल जाइत अछि जे घरक दीवार बाँचि गेल, घरक हँसी पानिमे चलि गेल। पाँच अंकक यात्रा एहि शोकसँ शुरू भऽ सामूहिक संकल्पपर खतम होइत अछि, आ बीचमे ओ दृश्य अछि जे एहि नाटककेँ बाल-रंगमंचक सिद्धान्त-ग्रन्थमे जगह दिया सकैत अछि — पहाड़क खेल।
चौकीपर बैसल चारि बच्चा कटोरी, लोटा, भीजल कपड़ा, माटिक ढेला, काठी आ उलटल थारीसँ अपन इलाकाक नक्शा बनबैत अछि: लकीर नदी, ढेला गाम, काठी बान्ह, आ उलटल थारी राजमार्ग — नाम सड़क, काम दीवार। चारिम बच्चा लोटासँ पानि ढारैत अछि आ पानि सड़कक ओहि पार अटकि जाइत अछि — बाढ़िक समस्त अभियांत्रिकी एक खेलमे प्रत्यक्ष भऽ जाइत अछि। डोरोथी हीथकोटक प्रसिद्ध पद्धति अछि विशेषज्ञक चोगा (मैंटल ऑफ द एक्सपर्ट): बच्चाकेँ ओहि विशेषज्ञक भूमिका दऽ देल जाए जकर ज्ञान ओकरा सिखेबाक अछि, तखन ओ ज्ञान भीतरसँ, दायित्वक संग अर्जित होइत अछि। एतऽ बच्चा सभ खेलहिमे अभियन्ता बनि जाइत अछि — पहिल लोक स्वयं कहैत छथि, देखू, बच्चा सभ सेहो अभियंता बनि गेल — आ हुनक खेल-निष्कर्ष (पुल गाड़ी लेल बनल छै। पानि लेल की बनल छै?) प्रौढ़ सभक आँखि खोलैत अछि। लेव भाइगोत्स्कीक खेल-सिद्धान्त कहैत अछि जे खेलमे बच्चा अपन वास्तविक उमेरसँ माथ भरि ऊँच भऽ जाइत अछि; जलोदीपक नाट्य-युक्ति यएह अछि — ज्ञानक दिशा उनटा दैत अछि, बच्चासँ प्रौढ़ दिस।
नाटकक दोसर बल ओकर तथ्य-अनुशासन अछि। बान्ह काटल जेबाक चर्च अफवाहक रूपमे अबैत अछि आ तुरत टोकल जाइत अछि — सुनै छिऐ से सत्य नहियो भऽ सकै छै — ई ज्ञान-मीमांसीय सावधानी बाल-नाटकमे विरल अछि। ठेकेदारक बचाव-वाक्य — प्रकृतिक प्रकोप छल... एहन बाढ़ि शताब्दीमे एक बेर अबैत अछि — केँ लोक आँकड़ासँ काटैत अछि: पछिला पाँच बरखमे तीन बेर हमर आँगन डुमल। आ अभियंताक विश्लेषण बाढ़िकेँ एक खलनायकपर नहि, कारण-जालपर टाँगैत अछि: नदीक पुरान बाट बन्द, पोखरि भरल, निचला जमीनपर बस्ती, ऊँच सड़क, छोट कलभर्ट — सभ मिलि कऽ बाढ़िक जाल बनल। टी.आइ.ई. (थिएटर इन एजुकेशन) आन्दोलनक आदर्श संरचना यएह मानल जाइत अछि — कथा-संवेदना, तथ्य-विश्लेषण आ कार्य-सूत्र तीनूक संयोग — आ जलोदीपक चारिम-पाँचम अंक ओकर पूर्ण निर्वाह करैत अछि: राहत, गामक जल-पथ नक्शा, कलभर्ट-निरीक्षण, मरम्मतिक खुल्लमखुल्ला हिसाब, बच्चाकेँ तैरनाइक शिक्षा, नालामे प्लास्टिक-निषेध, बरखा-पूर्व सफाइ आ पानिक बाट बला विकास — आठ सूत्र, जे मंचसँ उतरि कऽ कोनो गामक पंचायत-प्रस्ताव बनि सकैत अछि। बोआलक मंच (फोरम) रंगमंचमे दर्शक समाधान प्रस्तावित करैत छथि; एतऽ ओ काज पात्र-समुदाय करैत अछि, मुदा प्रक्रियाक लोकतांत्रिक बनावट — मुखिया, लोक, अभियंता, बच्चा सभक क्रमशः एक-एक सूत्र — फोरमक भावनाकेँ भीतरसँ जीबैत अछि।
शीर्षक-प्रतीक जलोदीप नाटकक काव्य-शिखर अछि: बाढ़िक रातिमे बच्चा सभ पात आ कटोरीपर दीप तैरबैत अछि — बाढ़िमे दीप? पानि बुझा देत। — तैं तऽ नाव चाही। दीपकेँ पानिपर तैराउ। जलमे दीप। जलोदीप। जे पानि घर लऽ गेल, ओही पानिपर स्मृति आ आशाक दीप — विरोधाभासक ई बिम्ब आनन्दवर्धनक ध्वनि-कसौटीपर खरा अछि, कारण दीप एतऽ वस्तु नहि, व्यंजना अछि: ई दीप हमर बाबू लेल... आब ई दीप बुझत नहि, जँ हम सभ बात याद राखब। स्मृति-दीपक ई अर्थ नाटककेँ उल्कामुखक स्मरण-दर्शनसँ जोड़ैत अछि — ओतऽ विस्मरणक विरुद्ध गीत अछि, एतऽ दीप; आ समापनक फुसफुसाहटि — ई असल बात अछि — शब्दशः दानवीर दधीचीक अन्तिम ध्वनि अछि, जे दुनू नाटककेँ एक्के सत्य-मुद्रासँ मोहरबन्द करैत अछि।
गंगा ब्रिजसँ एकर सम्बन्ध एहि पोथीक सभसँ शिक्षाप्रद युग्म अछि। दुनू नाटक एक्के विषय — जल, अधोसंरचना, भ्रष्टाचार — पर अछि, मुदा बाल आ प्रौढ़ संस्करणक भेद स्पष्ट अछि: जलोदीपमे ठेकेदार अन्ततः झुकैत अछि (हम... हम सूची देब) आ गाम जागि जाइत अछि; गंगा ब्रिजमे व्यवस्था ईमानदार अभियन्ताकेँ रोलरक नीचाँ पिचड़ा दैत अछि। बाल-नाटकक आशावाद कृत्रिम नहि अछि — ओ बोआल आ हीथकोट दुनूक शिक्षाशास्त्रीय सिद्धान्तसँ निकलल अछि जे बच्चाकेँ कर्तृत्वक अनुभव (एजेंसी) देब ओकर नागरिक-निर्माणक पहिल शर्त अछि — मुदा दुनू नाटककेँ आमने-सामने राखि पढ़ला उत्तर बुझाइत अछि जे नाटककार एक्के प्रश्नक दू उत्तर नहि, दू उमेरक दू दायित्व देखा रहल छथि: बच्चाकेँ सम्भावना, प्रौढ़केँ चेतावनी। चारिम बच्चाक अन्तिम सूत्र-वाक्य — पानि शत्रु नहि, रोकेल बाट शत्रु अछि। विकास शत्रु नहि, अन्हा विकास शत्रु अछि — एहि युग्मक साझा घोषणा-पत्र अछि।
६. संकर्षण : चोटकेँ सत्कार कहबाक रोग आ आत्मबोधक जुत्ता
संकर्षण एहि शृंखलाक पहिल प्रौढ़ नाटक अछि आ एकर उपशीर्षक — दंभ, झूठ-सत्कार आ आत्मबोधक पाँच-कल्लोलक मैथिली नाटक — तीनू शब्दमे पूरा वृत्त बान्हि दैत अछि। उपक्रममे नाटककार अपन नायक-खलनायकक परिचय दैत छथि: असल अन्हार ओकर दंभ, डर आ झूठक चमकमे अछि, आ घोषणा करैत छथि जे दिल्लीक चोर-बजारसँ ठकाओल एकटा जुत्ता ओकरा वैह आइना देखा देत जे भरि जिनगी ओ आनकेँ देखबैत रहल। पाँच कल्लोल — प्रतिष्ठाक बीआ, झूठ जड़ि पकड़ैत अछि, बियाह आ बड़ाइक बजार, शहरक आइना, आ आत्मबोधक जुत्ता — दंभक अंकुरण, विस्तार, सामाजिक-पारिवारिक प्रसार, टकराव आ विसर्जनक क्रमबद्ध वनस्पति-शास्त्र अछि; कल्लोल शब्द (लहरि) संरचनाकेँ अंकक यांत्रिक विभाजनसँ मुक्त कऽ भावक उठान-गिरानक संकेत बनि जाइत अछि — ई इकाई उल्कामुखमे सेहो प्रयुक्त अछि, मुदा ओतऽ लहरि स्मृतिक अछि, एतऽ दंभक; एक्के छन्दमे दू राग।
हास्य-विवेचनमे आँरी बर्गसाँक सूत्र अछि जे हास्य जीवितपर चढ़ल यांत्रिकतासँ उपजैत अछि — जखन मनुक्ख परिस्थिति बदललोपर एक्के जड़ चेष्टा दोहरबैत अछि, तखन ओ हास्यास्पद भऽ जाइत अछि। संकर्षणक समस्त प्रहसन एहि यांत्रिकताक प्रदर्शनी अछि: कलक्टरसँ दबाड़ खा कऽ स्टेनोक कक्षमे बैसब आ गाममे कहब जे कलक्टर साहेब रोकि लेलन्हि; पंचैतीक दण्डक बाद कंठी लेब आ भोरहिमे रोहुपर कोदारि चलाएब; जगन्नाथ-यात्रामे फल छोड़बाक विधानमे कुसियार छोड़ब, जाहिसँ गुरक चाह मना कऽ चुकन्दरक रसियन चीनी बला चाह पीबि सकी। भाष्करक सुनाओल तीन टा कारी कुकुरक खिस्सा एहि यांत्रिकताक कथा-भीतर-कथा (उपाख्यान) अछि आ बर्गसाँक दोसर युक्ति — पुनरावृत्ति आ हिमगोलक (स्नोबॉल) — क आदर्श उदाहरण: पहिल कुकुर बटखराक चोटकेँ बटखरासँ जोखि कऽ जिलेबी कहैत अछि, दोसर धीपल पानिकेँ गरमागरम जिलेबी, तेसर बन्द सटर आ लाठीक पिटानकेँ आबैये नहि दैत रहथि, कहैत रहथि आर खाऊ — प्रत्येक झूठ अगिला कुकुरकेँ चोट दिस पठबैत अछि। भाष्करक टिप्पणी खिस्साक मर्म खोलि दैत अछि: ई खिस्सा सत्कारक नहि, चोटकेँ सत्कार कहबाक रोगक अछि। एतहि कमलाक भगतासँ एकर नाभि-नाल जुड़ैत अछि — ओतऽ भीड़ बिनु कारण बुझने आनक क्रिया दोहरबैत अछि, एतऽ व्यक्ति अपन क्षतिकेँ प्रतिष्ठा कहि दोहराबऽ योग्य बनबैत अछि; अन्धानुकरण आ आत्म-प्रवंचना एक्के ज्ञान-रोगक बहिरंग आ अन्तरंग रूप अछि।
मुदा नाटक केवल प्रहसन नहि अछि; एकर भीतर व्यंग्यक धार निरन्तर सामाजिक आलोचनामे बदलैत रहैत अछि। संकर्षणक बोली दोसराक जीवनमे जहर घोरैत अछि — पसीझक काँटक रस बला जुल्मी दबाइ ननकिड़बाक प्राण लऽ सकैत छल, जँ नित्या काका नहि टोकितथि (जे नहि बुझै, ओकर चुप रहबो दवा होइत छैक); टेलीफोन डायरी बला निराधार डरसँ गोनर भाइ अपन डायरी फाड़ि दैत छथि। कुन्तकक वक्रोक्ति-सिद्धान्त — कथनक वक्रता स्वयं काव्यत्व अछि — संकर्षणक भाषामे उनटल रूपमे सक्रिय अछि: ओकर हरेक वक्र-वाक्य (बूढ़ीकेँ सीट माँगलापर माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ; कनियाँक प्रशंसामे मुदा रंग कनेक हमरासँ डीप छन्हि) आत्म-श्रेष्ठताक अलंकार अछि, आ नाटककार देखबैत छथि जे वक्रोक्ति जखन सत्यसँ कटि जाइत अछि तखन ओ कला नहि, व्याधि बनि जाइत अछि। नेपथ्यसँ आएल पत्नीक एक्के वाक्य — दुलारू नहि छी तें घर चलैए। जे दिन दुलारू भऽ जाएब, से दिन अहाँक दंभक गोबर के काढ़त? — एहि नाटकक स्त्री-स्वर अछि: मंचपर बिनु अएने, एक वाक्यमे, ओ संकर्षणक समस्त पुरुष-दंभक अर्थशास्त्र खोलि दैत छथि।
चारिम-पाँचम कल्लोलमे नाटक अरस्तूक कसौटीपर चढ़ैत अछि। अलीगढ़मे पुलिस खेसारीक बिड़ियाकेँ गाजा कहि बीस टाका छोड़ि सभटा पाइ लऽ लैत अछि — जे बोली गाममे सभकेँ डरबैत छल, से शहरमे स्वयं डरक शिकार भऽ जाइत अछि; ई पेरिपेटिया (दशा-पलट) अछि। आ चोर-बजारमे पड़ोसीक नामपर ठकाएल जुत्ताक सोल जहिया करेज जेकाँ बाहर आबि जाइत अछि, तहिया एनाग्नोरिसिस (पहचान) घटित होइत अछि — मुदा अरस्तूक नायक-सन नियतिक नहि, अपन चरित्रक पहचान: साँच कहू गोनर, ठकान जुत्तामे नहि, हमर घमण्डमे लगल। सूत्रधार उपसंहारमे ठीक कहैत छथि जे एहि एक्के वाक्यमे ओतेक साहस अछि, जतेक भरि नाटकमे कतहु नहि — हास्य रसक ई विसर्जन शान्तमे होइत अछि, अट्टहासमे नहि, आ अन्तिम मंच-निर्देश (गोनर हँसैत नहि — ई आब हँसबाक क्षण नहि, बुझबाक क्षण अछि) रस-संक्रमणकेँ मंचीय अनुशासन दैत अछि। अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ अलीगढ़-प्रकरण मचण्डक पूर्वाभास अछि — निर्दोषक झोरामे राज्य अपराध ताकि लैत अछि, ओतऽ बिड़िया गाजा बनैत अछि, एतऽ प्रेशर कुकर नशाक खेप; आ सूत्रधारक अन्तिम प्रश्न — हमरा सभक भीतरो कतौ कोनो संकर्षण नुकाएल त' नहि अछि? — दर्शक-सम्बोधनक वएह ब्रेष्टीय युक्ति अछि जे कमलाक भगता आ भऽ जाएब छूमे बाल-रूपेँ प्रयुक्त भेल अछि।
संरचनात्मक सीमा ई अछि जे प्रसंग-मालाक (एपिसोडिक) बनावटमे किछु अंक — यथा गुरक चाह — स्वतंत्र लतीफा जकाँ बुझा सकैत अछि; मुदा ध्यानसँ देखला उत्तर प्रत्येक प्रसंग दंभक कोनो ने कोनो नव क्षेत्र (प्रशासन, धर्म, वैद्यक, विवाह, रूप, भोजन, भूगोल) जोड़ैत अछि, आ बेटाक पलायन बला अंक — जेकरा सभकेँ सिखबैत फिरलहुँ, अपन घरक बाट ओकरा नहि सिखा सकलहुँ — प्रहसनक भीतर करुणक ओ सुरंग खोलि दैत अछि जाहि बाटे नाटक अपन गम्भीर समापन धरि पहुँचैत अछि।
७. गंगा ब्रिज : विकासक बलिवेदीपर इतिहासक ठक-ठुक
गंगा ब्रिज विकास, भ्रष्टाचार आ बलिदानपर एकटा मार्मिक नाटक अछि, मुदा एकर असल विषय पुल नहि, इतिहास-लेखन अछि — के मरैत अछि, के लिखैत अछि, आ लिखल इतिहासमे मरनिहारक की बचैत अछि। नाटक पाँच भाग आ आठ पल्लवमे पसरल अछि आ एकर काल-विस्तार असाधारण अछि: १५ अगस्त १९४७ क स्कूली झण्डोत्सवसँ लऽ कऽ ओहि दिन धरि, जखन रिटायर मुख्य अभियन्ता अपन लिखल पोथी गंगा ब्रिजक लोकार्पण करबैत छथि आ नबका मुख्यमंत्री जर्जर पुलक बगलमे दोसर पुलक घोषणा कऽ चुकल छथि। एहि ऐतिहासिक फलकपर बर्टोल्ट ब्रेष्टक महाकाव्यात्मक रंगमंचक लगभग समस्त उपकरण सक्रिय अछि: ढोलहो देनहारक बेर-बेर घुरैत उद्घोष (सुनै जाउ, सुनै जाउ... मजदूर चाही) दृश्य-शृंखलाकेँ काटैत-जोड़ैत गीत-पट्टी अछि; डंका बजबैत दूटा लोक कोरस अछि, जे घटनाकेँ टिप्पणीसँ ठंढा करैत अछि (सरकार ककरा कहै छिहीं? — बहस, जे लोकतंत्रक नागरिक-शास्त्र ठेठ मैथिलीमे पढ़ा दैत अछि); आ मजदूर सभक फ्रीज भऽ जाएब — जखन अभियन्ता आ ठिकेदारक आभासी संवाद चलैत अछि — दूरीकरण (फेरफ्रेमडुंग) क प्रत्यक्ष मंच-विधि अछि: दर्शक घटनामे बहि नहि सकैत छथि, हुनका देखाओल जाइत अछि जे ई देखाओल जा रहल अछि।
एर्विन पिस्काटरक दस्तावेजी रंगमंचक परम्परामे नाटक आँकड़ा आ संस्थागत ब्योरासँ नहि डराइत अछि: पछिला मास तीस टा मजदूर मरि गेल। एक सालमे तीन सए मजदूर मरि गेल। मात्र दस गोटेक परिवारकेँ अनुकम्पाक अनुशंसा भेलै; रामधनीक मशीनमे फँसल हाथपर पट्टीक बदला बोरा; टेण्डरक भीतरी रास्ता; कमीशनक शृंखला — नेता, दोसर इन्जीनियर, गुण्डा। ठिकेदारक लम्बा स्वीकारोक्ति एहि नाटकक सभसँ जटिल नैतिक दस्तावेज अछि: ओ अभियन्ताक बालु-चालब बला विधि मानि कमीशन बन्द केलक, अभियन्ताक बदली भऽ गेल, आ ठिकेदार घुरि कऽ पुरान रास्तापर आबि गेल — हम अपन बच्चाक नाम स्कूलसँ नै कटबा सकै छी। एतऽ खलनायक व्यवस्था अछि, व्यक्ति नहि; ठिकेदार धरि ओकर बन्धक अछि। एहि व्यवस्था-चित्रणक शिखर मुख्यमंत्री-मुख्य अभियन्ताक ओ संवाद अछि जतऽ ईमानदार अभियन्ताकेँ खपेबाक विकल्प सभ एक-एक कऽ खारिज होइत अछि — गोली मारब (भगत सिंह बनि जाएत), करप्शन-चार्ज (छापामे खाट टा भेटत), आत्महत्या (आत्महत्या करैबला जीब नै अछि) — आ अन्ततः निर्णय होइत अछि: ओ दुर्घटना लगतै। रोलरक नीचाँ देल गेल ई मृत्यु आ ओकरापर ओछाओल दुर्घटनाक चादरि राज्यक कथा-निर्माण-यंत्रक नग्न प्रदर्शन अछि।
अन्तिम पल्लव — पोथी-लोकार्पण — एहि नाटककेँ इतिहास-दर्शनक ऊँचाइ दैत अछि। मुख्य अभियन्ताक वाक्य — इतिहासक काम घाव खोलब नहि, पट्टी बाँधब अछि — चाहे भीतर मवाद रहि जाए — आ मुख्यमंत्रीक प्रशस्ति (जे आवाज बीचमे उठल, से विकासक धूलि छल; जे खून गिरल, से बलिदानक रंग छल) सुनैत काल वाल्टर बेन्यामिनक ओ प्रसिद्ध सूत्र मोन पड़ैत अछि जे सभ्यताक एहन कोनो दस्तावेज नहि, जे संगहि बर्बरताक दस्तावेज नहि होअए, आ ईहो जे इतिहास विजेताक सहानुभूतिमे लिखल जाइत अछि। नाटक एहि लिखित इतिहासक समानान्तर एकटा श्रव्य प्रति-इतिहास ठाढ़ करैत अछि: मजदूरक ठक-ठुक, जकरा अन्तमे डंका-वादक कहैत अछि — ई ठक-ठुक पुलक नहि, इतिहासक हड्डीक आवाज छिऐ। लिखितम् बनाम ध्वनि — ई द्वन्द्व उल्कामुखक केन्द्रीय द्वन्द्वक (पोथीमे नाम कटत, गीतमे साँस बचत) प्रौढ़-राजनीतिक संस्करण अछि; ओतऽ चौपाड़ि गीतकेँ बँसबिट्टीमे धकेलैत अछि, एतऽ सत्ता प्रत्यक्षदर्शीक स्मृतिकेँ धन्यवाद, धन्यवाद, धन्यवादक यांत्रिक मुस्कीसँ ढाकि दैत अछि — ई दोहराओल धन्यवाद ब्रेष्टक गेस्टुस (सामाजिक सम्बन्धकेँ देह-मुद्रामे जमा देनिहार क्रिया) क चमकैत उदाहरण अछि।
रस-योजनामे नाटक करुण आ रौद्रक बीच वीभत्स-स्पर्शी व्यंग्य चलबैत अछि, मुदा भरतक रस-मिश्रण-विधानक कुशल पालनक संग: बतही माए आ इन्जीनियरक विधवाक विलाप (आब कागज कतऽ अछि? ई बच्चा सभक आँखि बाजत) शुद्ध करुण अछि; एम.एल.ए.क नीलगाय-भाषण आ चारि अढ़ैया चिन्नीक होड़ हास्यक ओ लोकधर्मी छिट्टा अछि जे शोक-कथाकेँ जीवन-रससँ सिक्त रखैत अछि; आ बच्चा ३ क त्रि-आयामी यात्रा — बकड़ी तकैत स्कूल-भगोड़ा, ठेलाबला, आ भदोहीक बन्धुआ मजदूरीसँ भागल श्रमिक — राष्ट्रीय विकास-गाथाक ओ पाताल देखबैत अछि जतऽ स्वतंत्र देश। स्वतंत्र स्कूल। स्वतंत्र कॉलेजक व्यंग्य-मंत्र कानमे गूँजैत रहि जाइत अछि। अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ जलोदीप एकर बाल-प्रतिबिम्ब अछि (कलभर्ट, बान्ह, कागज बनाम जमीन — ओतऽ समुदाय जीतैत अछि, एतऽ हारैत अछि), मचण्ड एकर अगिला डेग (व्यवस्थाक हिंसा प्रक्रियागत रूप धरैत अछि), आ अभियन्ताक अन्तिम आश्वासन-वाक्य — आशा देनिहारकेँ कुचलि देल जेतै तँ आशा मरत नै; ओकर आवाज डंकामे, हथौड़ामे, पुलक दरारिमे बसि जेतै — उल्कामुखक स्मृति-सिद्धान्तक गंगातटीय घोषणा अछि।
मंचन-चुनौती स्पष्ट अछि — विशाल पात्र-संख्या, चालीस बरखसँ ऊपरक काल-छलाँग, आ पल्लव-संरचनाक तीव्र दृश्यान्तर — मुदा ढोलहो-डंकाक ध्वनि-चौखट एहि सभकेँ बान्हि लैत अछि: जहिया-जहिया दृश्य बदलैत अछि, वएह उद्घोष घुरैत अछि, आ दर्शक बुझि जाइत छथि जे पुल जतऽ छल ततहि अछि — हिलैत, चिप्पी माँगैत। नाटकक अन्तिम विडम्बना यएह अछि जे परदा खसैत काल सेहो ढोलहो देनहार मजदूर माँगि रहल अछि; वृत्त पूरा भेल, मरोम्मति नहि।
८. मचण्ड : भाषा, न्याय आ आतंकक त्रिकोणमे मनुक्ख
मचण्ड एहि शृंखलाक सभसँ तीक्ष्ण समकालीन रचना अछि आ एकर केन्द्रमे एकटा एहन मनुक्ख अछि जकरा लग भाषा नहि अछि — माने अपन भाषा अछि, मुदा ओकरा बुझनिहार कियो नहि। मुतालिफ तमिल-भाषी युवा अछि, दिल्लीक अदालत-हाजतमे बन्द, आ भाषा अनुवादक (बा अनुवादिका) आरम्भहिमे ओकर स्थिति एक वाक्यमे कहि दैत छथि: जे शहर ओकरा अपराधी कहैए, से ओकर नामो ठीकसँ नहि बजा पबैए। फ्रान्ज़ काफ्काक द ट्रायलक योज़ेफ के.केँ ओकर अपराध नहि बुझल छै; मुतालिफक स्थिति ओहूसँ आगाँ अछि — ओकरा अभियोगक भाषे नहि बुझल छै। खुफिया अधिकारीक वाक्य — न्याय जँ भाषा नै बुझत तँ न्याय नहि, प्रक्रिया मात्र रहि जाएत — एहि नाटकक विधिशास्त्रीय थीसिस अछि, आ पात्र-सूचीमे अनुवादकक परिचय (शब्दक पुल, मुदा पुलो कखनो-कखनो अधूरा रहि जाइत अछि) ओकर काव्य-सूत्र। मैथिली सन हाशियाक भाषामे एकटा तमिल-भाषीक भाषिक निर्वासनक कथा कहब अपनहिमे एकटा राजनीतिक वक्तव्य अछि — जे भाषा स्वयं केन्द्रसँ अनसुनल अछि, वएह दोसर अनसुनल भाषाक पक्ष लऽ रहल अछि।
नाटकक सभसँ सूक्ष्म रंग-युक्ति भोजनक पैकेट अछि। पहिल अंकमे खुफिया अधिकारी हाजतमे मुतालिफकेँ रतुका भोजनक पैकेट पठबैत छथि; मुतालिफ हाथ जोड़ि हिचुकि-हिचुकि कानऽ लगैत अछि — ओकर रुदनमे धन्यवाद आ भय दुनू अछि — आ अन्तिम मंच-निर्देशमे अन्हारमे केवल भोजनक खाली पैकेटपर प्रकाश रहि जाइत अछि, संगहि खुफिया अधिकारीक ओ अनुगूँज जे एकटा भोजनक पैकेट कखनो-कखनो अदालतसँ पैघ गवाही दैए। ब्रेष्टक गेस्टुस-सिद्धान्तमे कोनो एकटा ठोस क्रिया समग्र सामाजिक सम्बन्धकेँ देह दऽ दैत अछि; एतऽ भोजन-दान ओ क्रिया अछि जे राज्य आ अभियुक्तक बीच अभियोग-पत्रसँ बाहरक एकटा मनुष्य-सम्बन्ध रचैत अछि, आ पूरा नाटक एही सम्बन्धक परीक्षा अछि। बाबाधाम बला लम्बा प्रसंग — लुल्हा जे बीस बरखसँ पाँव-पैदल जाइत अछि आ महीसे चराबैत अछि, पीअर बच्चा जे हवागाड़ीसँ जाइत अछि आ कोठापर कोठा उठबैत अछि — पहिल दृष्टिमे विषयान्तर बुझाइत अछि, मुदा वस्तुतः ई नाटकक रूपक-कोष अछि: खुफिया अधिकारीक निष्कर्ष (पाँव-पैदल बा शतरंजक सिपाही। राजा-रानी नै छी देश। देश छी मुतालिफ। देश छी लुल्हा) शतरंजक ओही गोटी-बिम्बकेँ राष्ट्र-परिभाषामे बदलि दैत अछि जाहिसँ ओ मुतालिफकेँ चिन्हने छला — ई तँ शतरंजक गोटी अछि, पाँव-पैदल सिपाही। जे हाथ गोटी चलबैए, से हाथ कतऽ अछि?
दोसर अंकक खुफिया अधिकारी–आतंकी लीडर संवाद एहि नाटकक बौद्धिक रीढ़ अछि, आ एकर विन्यास ध्यान देबा जोग: बीचमे टेबुल नहि, जेना एक अदृश्य खाई अछि; बहस बढ़ला पर दुनूक छाया एक-दोसरामे पैसए लागए — मंच-निर्देश स्वयं थीसिस अछि। संवादक भीतर लालडेंगा-प्रसंग पिस्काटर-शैलीक दस्तावेजी अन्तर्वेश अछि — मिज़ोरम-समझौताक वास्तविक इतिहास एतऽ शान्तिक पक्षमे तर्क बनि कऽ आएल अछि (महान नेता अपन जनताकेँ बीच मझधारमे नै छोड़ै छै) — आ प्रतिपक्षमे आतंकी लीडरक आक्षेप-शृंखला (अहाँ फैक्ट्री खोलि देबै तँ ओ दरबान बनि जाएत... अहाँक दया सेहो अहाँक विरुद्ध गवाही दैए। दया, अधिकारी साहेब, सत्तासँ बेसी खतरनाक हथियार अछि) राज्यक विकास-प्रतिश्रुतिक ओही खोखलपनकेँ छूबैत अछि जकरा गंगा ब्रिज बलिदानक बयानबाजीमे देखौने छल। शीर्षक-शब्द मचण्ड एहि बहसक धुरीपर दुनू दिस घूमि जाइत अछि: पहिने खुफिया अधिकारी आतंकी सभकेँ कहैत छथि — बेरोजगारीक खाली कटोरामे अहाँ बारूद भरै छी। मचण्ड छी अहाँ सभ — आ उत्तरमे गरदनि पकड़ल आतंकी लीडर हाँफैत बजैत अछि: अहूँ मचण्ड छी, सरकारी मचण्ड... फर्क एतबे जे अहाँ वर्दीमे छी, हम जंगलमे। एक्के विशेषणक ई अदला-बदली नाटकक दर्पण-संरचना अछि — दुनू पक्ष एक-दोसराकेँ अपन प्रतिबिम्ब देखैत अछि, आ दर्शक कोनो सुविधाजनक पक्ष नहि पबैत छथि।
तेसर अंक पेरिपेटिया अछि: बेल पाबि निकलल मुतालिफ आब भयक जगह एक अजीब स्थिरता लेने घुरैत अछि, आ अनुवादकक माध्यमे कहबैत अछि जे ओ जेलसँ एलाक बाद अहाँ जकाँ बनऽ चाहलक मुदा पुलिस थाना, पत्रकार, गामक बेरोजगारी आ नामपर लागल दाग ओकरा से नै करऽ देलकै — जेकरा समाज निर्दोष मानि नहि सकै, ओकरा अपराधी बनबामे देर नहि लगै छै। पीड़ित आ कर्ताक ई स्थान-परिवर्तन ओकर पहिल अंकक हिचुकीसँ नापल जाए तँ नाटकक करुणा बुझाइत अछि: व्यवस्था अपने हाथे अपन विरोधी गढ़ैत अछि। चारिम अंकक आत्म-चिन्तनमे नाटक मेटा-रंगमंचीय भऽ जाइत अछि — खुफिया अधिकारीकेँ मोन पड़ैत छन्हि जे मुतालिफ कहैत छल, हम कथा लिखै छी... ऐ यात्रामे एकटा कथाक प्लॉटे भेट गेल... ओइ कथाक नायक मुतालिफ रहत — माने जाहि कथाकेँ दर्शक देखि रहल छथि, से भीतरहिसँ लिखा रहल अछि, आ नायकत्वक दावेदारी ओकरा लग अछि जकरा लग भाषा नहि छल। मुदा नायक बनब आ बचि जाएब, दुनू अलग बात अछि — ई वाक्य समापनकेँ कोनो समाधानसँ वंचित राखि खुला छोड़ि दैत अछि; बादल सरकार-परम्पराक ई अ-समापन दर्शककेँ उत्तरदायित्व सौंपब अछि, राहत नहि।
अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ मचण्ड गंगा ब्रिज आ उल्कामुखक बीचक कड़ी अछि: गंगा ब्रिजमे राज्य असहमतकेँ रोलरसँ पिचड़ा दैत अछि, मचण्डमे ओकरा प्रक्रियामे ओझरा दैत अछि — हिंसाक ई विकास-क्रम (देह-दमनसँ तंत्र-दमन धरि) दुनूकेँ संगे पढ़लापर देखार होइत अछि; आ मुतालिफक इशारा-भाषा उल्कामुखक हीरूक गीत-भाषाक समानधर्मा अछि — दुनू ओ स्वर अछि जकरा सत्ताक कान नहि सुनैत अछि, आ दुनू नाटकमे वएह स्वर अन्ततः कथाक केन्द्र बनि जाइत अछि। संकर्षणक अलीगढ़-प्रकरणसँ एकर पूर्व-सम्बन्धक चर्च ओतुका समीक्षामे भऽ चुकल अछि — बिड़िया आ प्रेशर कुकर, दुनू ठाम राज्यक आँखि निर्दोष वस्तुमे अपराध पढ़ैत अछि। ध्वनि-विधान (कोर्टक कोलाहल, हथकड़ीक खनखन, अनुवादकक रुकि-रुकि बाजल स्वर, आ अन्तमे दूरक अजान-घंटीक मिश्रित नगर-ध्वनि) भाषा आ सत्ताक दूरीकेँ श्रव्य बनौने रहैत अछि; समग्रतः मचण्ड मैथिली रंगमंचपर राजनीतिक थ्रिलरक कलेवरमे न्याय-दर्शनक नाटक अछि।
९. उल्कामुख : स्मृति-विस्मृतिक महासंग्राम — नाट्य-शृंखलाक शिखर
उल्कामुख एहि नअ नाटकक वट-वृक्ष अछि — विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे बेचन ठाकुरक निर्देशनमे मंचित, आ पाठक अनुसार मंच-परिकल्पना भरत नाट्यशास्त्रक अनुरूप। ई दाबी अलंकार नहि अछि: मंच-निर्देशमे रंगपीठ, रंगशीर्ष आ मत्तवारणीक शास्त्रीय अंग-विभाजनक क्रियात्मक प्रयोग भेल अछि — पात्र मत्तवारणीसँ रंगपीठ अबैत छथि, प्रकाश रंगशीर्षपर केन्द्रित होइत अछि — जे आधुनिक भारतीय रंगमंचहुमे विरल अछि। संरचना कल्लोलमे अछि (संकर्षण जकाँ, मुदा एतऽ लहरि स्मृतिक अछि), आ केन्द्रीय मंच-प्रतीकक रूपान्तरण नाटकक अर्थ-यात्राक नक्शा अछि: पहिलसँ चारिम कल्लोल धरि मंचपर शतरंजक डिजाइन बनाओल घन राखल रहैत अछि — भूत आ कल्पनाक प्रतीक — आ पाँचम कल्लोलसँ ओकर जगह गोला लऽ लैत अछि, वास्तविकताक प्रतीक; पाठक शब्दमे, घनक कोना मेटि गेल; आब वृत्त अछि, जे स्मरणकेँ घुमा कऽ फेर सोझाँ आनत। संकेतसँ वास्तव, कल्पनासँ सत्य — ई ज्यामितीय रूपक (कोनसँ वृत्त) एहि नाटकक समूचा दर्शन एक वस्तुमे गूँथि दैत अछि।
पूर्वार्द्धक विषय ऐतिहासिक अछि: तत्त्वचिन्तामणिकार गंगेश उपाध्याय, जे श्रीहर्षक खण्डन-प्रहारसँ न्यायकेँ बचा नव्य-न्यायक स्थापना केलन्हि, आ जिनक विषयमे परम्परा पितृ परोक्षे पञ्च वर्ष व्यतीते गंगेशोत्पत्ति सन विलक्षण किंवदन्ती आ चर्मकारिणीसँ विवाहक कथा रखने अछि — नाटक एहि परम्परा-सूत्र सभकेँ (पुत्र वर्द्धमानक सुकविकैरवकाननेन्दुः बला कवि-प्रशस्ति सहित) नाट्य-वस्तु बनबैत अछि आ हुनक प्रेमिका-पत्नीकेँ वल्लभा नाम दऽ ओहि प्रेमक कथा रचैत अछि जकर चर्च शास्त्र-परम्परा नहि करैत अछि। एतहि नाटकक मूल प्रश्न जनमैत अछि: तत्त्वचिन्तामणिपर भाष्यपर भाष्य, टीकापर टीका लिखाइत रहल, मुदा गंगेशक कविता भऽ गेल उल्कामुख — माने हेरा गेल, नाम-मात्र बनि गेल। आचार्य व्याघ्र आ आचार्य सिंह — जिनक चर्च गंगेश ग्रन्थमे बिनु असल नामक केने छथि — मंचपर भूत बनि कऽ अबैत छथि आ अपन दशाक व्याख्या स्वयं करैत छथि: नाम नुकेलासँ मनुक्ख धीरे-धीरे प्रतीक बनैए, प्रतीकसँ कथा, आ कथासँ दोष। यान असमानक सांस्कृतिक स्मृति-सिद्धान्त एतऽ प्रत्यक्ष मंचित बुझाइत अछि — संस्थागत, लिखित, अभिलेखीय स्मृति (चौपाड़ि, टीका-परम्परा) आ जीवित, वाचिक, गीत-वाहित स्मृतिक द्वन्द्व; वल्लभाक घोषणा एहि द्वन्द्वक अमर सूत्र अछि: जँ पोथीमे नाम कटत, गीतमे साँस बचत। आ जे प्रेम सात सए बर्ख इन्तजार कऽ सकै छै, ओकरा बँसबिट्टी रोकि नै सकत।
विस्मरणक तंत्र-पक्ष आचार्य सरभ आ हुनक शिष्य (खिखिर, शाही, नढ़िया, बिज्जी) क प्रसंगमे अछि — रटन्त विद्या, जतऽ बिनु बुझने पाठ यादि कराओल जाइत अछि जइसँ सभ बिसरि जाथि गंगेश आ वल्लभाकेँ, आ प्रश्न पुछनिहार शिष्य मारल जाइत अछि (आब रटन्त विद्या बचत, प्रश्न मरत)। एकर प्रतिरोध-शस्त्र अछि संकेत: आचार्य सिंहक सूत्र — अपूर्ण पाठक विस्मरण नै भऽ सकैए, विस्मरण होइए मात्र पूर्ण पाठ — एहि नाटकक ज्ञान-मीमांसीय हीरा अछि; जे बात अधूरी, बिम्ब-रूप, गीत-रूप बचल रहैत अछि, से दिमागमे काँट जकाँ गड़ल रहैत अछि आ कहियो ने कहियो पूरा हएबाक माँग करैत अछि — उल्कामुख वएह संकेत अछि। एहि पूर्वार्द्धक मेटा-नाट्यीयता चकित करैत अछि: पात्र सभ जनैत छथि जे ओ कल्पना छथि (हम पूर्ण कल्पना छी शिष्य खिखिर? — आचार्य, अहाँ कल्पना छी आ हम सभ कल्पना बनैबला छी), आ पिरान्देलोक सिक्स कैरेक्टर्स इन सर्च ऑफ एन ऑथरक स्मृति दिअबैत छथि — मुदा एतऽ पात्र लेखक नहि, स्मरण ताकि रहल छथि। संगहि लोकगाथाक पूरा कोष मंचपर उतरैत अछि — दीना-भदरिक गाथा (जकरा वल्लभा आ गंगेश बेरा-बेरी गाबि कऽ खेलैत छथि), गोरिल-बालगोरैय्या, सलहेस-फोटरा गीदर, विषहरि आ गोसाउनिक गीत — आ कीर्तनियाँ-परम्परा बला गीत-प्रधान मैथिल रंग-स्मृति एहि नाटकक देह बनि जाइत अछि; नाराशंसी (जन-प्रशस्ति गाथा) शब्दक बेर-बेर प्रयोग सूचित करैत अछि जे नाटककार लोकगाथाकेँ अलंकरण नहि, इतिहास-लेखनक वैकल्पिक विधा मानैत छथि।
पाँचम कल्लोलसँ नाटक सात सए बरखक छलाँग लगबैत अछि आ सभ पात्र नव जन्म लैत छथि — गंगेश गंगाधर बनैत छथि, वल्लभा कुमरसुता, भगता जटा, आचार्य सरभ राजा कीर्ति सिंह (नाम स्वयं मिथिलाक ओइनवार राज-स्मृति जगबैत अछि)। गंगाधरक कथा — यज्ञोपवीतक अस्वीकार, दलित गायक हीरू आ ऋषि जटाकेँ गुरु मानब, सप्तरीक बोनक पाठशाला, दरबारमे एकसँ सए धरिक जोड़केँ जोड़ा-विधिसँ पाँच हजार पचास निकालि देखाएब, कुमरसुतासँ विवाह, आ अनुभव मण्डलक स्थापना जइमे ने कोनो जातिक भेद छै आ ने स्त्री-पुरुषक भेद — एकटा भिन्न ऐतिहासिक स्रोतसँ ऊर्जा लैत अछि, आ नाटक ई स्रोत नुकबैत नहि अछि: जटाक शिष्य स्पष्ट कहैत अछि जे गुरु दक्षिण दिशासँ बासवेश्वरक खिस्सा सुनि कऽ आएल छथि आ कहै छथि जे मिथिलामे सेहो हेतै ई सभ। कल्याणक शरण-आन्दोलन, अनुभव मंटप, आ अन्तर्जातीय विवाहपर राजदण्डक ओ इतिहास एतऽ मैथिल भूगोलमे रोपल गेल अछि — मेधा (ब्राह्मण सेनापतिक बेटी) आ जीवे (चर्मकारक बेटा) क प्रतिलोम विवाहपर राजा आँखि निकालि हाथीसँ पिचड़ेबाक आदेश दैत अछि, आ ओकर वाक्य — जे प्रेम जातिक पार देखलक, ओकर आँखि राजसिंहासन सहि नै सकैए — पूर्वार्द्धक ओहि निषेधकेँ (प्रेम जँ जातिक देवालपर चढ़ि जाए तँ देवालक रखवार सभकेँ आगि लागि जाइ छै) राज-हिंसामे परिणत कऽ दैत अछि। तकर बाद माधवक गुप्त प्रतिशोध-अभियान, रुद्रमतिक भात-दृश्यक लोकनाट्यीय कठोरता, राजवध आ माधवक आत्महत्या — आ अन्तमे मरणासन्न गंगाधरक ओ आत्मालोचन जे एहि नाटककेँ प्रचार-नाट्यसँ सर्वथा अलग कऽ दैत अछि: यएह टा डर अछि जे बदलाक भावक ई आगि अनुभवमण्डलकेँ एकटा उल्कामुखी जाति नै बना दै... जे दरबज्जा हम खोललौं, ओ हमरा गेलाक बाद फेर बन्द नै होउ। आन्दोलन अपनहि प्रति-पहचानमे नव जाति बनि जेबाक जोखिम — ई आत्म-सजगता ब्रेष्टक ऐतिहासीकरणक सार्थकता अछि: चौदहम शताब्दीक कथा वर्तमानक हरेक आन्दोलनसँ प्रश्न पुछैत अछि।
रस-दृष्टिसँ उल्कामुख अद्भुत (भुतहा बँसबिट्टी, उड़ियाइत पात्र, ताबीज), करुण (मेधा-जीवे, गंगाधरक मृत्यु) आ शान्तक संकर अछि, आ ओकर श्रव्य-समापन — घनक खरखराहटि आ गोलाक घरघराहटि एक संग, फेर दूरसँ घुरैत लोकगीतक एक पंक्ति, जेना विस्मरण फेर हारि रहल हो — ध्वनि-नाट्यक दुर्लभ उपलब्धि अछि। अन्तर्पाठीय दृष्टिसँ ई नाटक शेष आठूक संगम अछि: दधीचीक ज्ञान-पहरा एतऽ चौपाड़िक प्रतिलिपि-निषेध बनल अछि; अपालाक नाम-सहित स्वीकृतिक ठीक विलोम वल्लभाक नाम-लोप अछि; कमलाक भगताक बिनु-बुझल नकल एतऽ रटन्त विद्याक संस्था बनि गेल अछि; बाल-नाटक सभक प्रश्न-संस्कृति (प्रश्ने विद्याक पहिल सीढ़ी) एतऽ अनुभव मण्डल बनि फड़ैत अछि; गंगा ब्रिजक लिखित-इतिहास बनाम डंका एतऽ पोथी बनाम गीत अछि; आ मचण्डक अनसुनल भाषा एतऽ हीरूक गीत बनि सत्ताक कान धरि पहुँचबाक बाट ताकैत अछि। जँ एहि नअ नाटकक कोनो एकटा वाक्यकेँ समूचा शृंखलाक ध्येय-वाक्य बनाबी, तँ ओ वल्लभाक अछि — नाम काटू, गीत काटू, देह काटू, मुदा प्रेमक ध्वनि कतऽ काटब?
उपसंहार : नअ नाटक, एक नाट्य-दर्शन
नअ समीक्षाक बाद आब ओ सूत्र-जाल समेटल जाए जे एहि रचना-समूहकेँ पोथी बनबैत अछि। पहिल सूत्र सूत्रधार-परम्परा अछि: कमलाक भगता, दानवीर दधीची, भऽ जाएब छू, अपाला आत्रेयी, संकर्षण आ उल्कामुख — छह टा नाटकमे सूत्रधार उपस्थित छथि, कतहु हाक देनिहार, कतहु व्याख्याकार, कतहु दर्शकसँ प्रश्न पुछनिहार। भरतक पूर्वरंग-विधानसँ चलल ई पात्र एतऽ आधुनिक कथावाचक (नैरेटर) आ ब्रेष्टीय टिप्पणीकारक बीचक सेतु अछि, आ जतऽ सूत्रधार नहि छथि (जलोदीप, गंगा ब्रिज, मचण्ड) ओतऽ ओकर काज कोनो ध्वनि-यंत्र करैत अछि — ढोलहो-डंका, हेलिकॉप्टरक घरघराहटि, अनुवादकक स्वर। दोसर सूत्र ओ हस्ताक्षर-ध्वनि अछि जकर चर्च बेर-बेर भेल — ई असल बात अछि — जे दानवीर दधीचीक अन्तमे फुसफुसाहटि बनि आ जलोदीपक अन्तमे सामूहिक धुन बनि अबैत अछि: सत्यक ई मुहर नाटककारक अपन शैली-चिन्ह अछि, जेना चित्रकार कोनमे अपन संकेताक्षर छोड़ि जाइत छथि।
तेसर सूत्र देह-ध्वनिक अछि। भऽ जाएब छूमे गाछक मरणक बाद पात्र सभक खोंखी तालमे बदलैत अछि; उल्कामुखमे भगता आ ऋषि जटाक उकासी दृश्य-सन्धिक घण्टी अछि आ गंगाधरक अन्तिम खोंखीक संग नाटक प्राण त्यागैत अछि। खोंखी — देहक ओ अनैच्छिक स्वर जे ने भाषा अछि ने गीत — एहि नाट्य-संसारमे संकटक सभसँ ईमानदार सूचक अछि: पर्यावरणक संकट, देहक संकट, स्मृतिक संकट। चारिम सूत्र जलक अछि: कमलाक धारसँ (कमलाक भगता) गंगा धरि (गंगा ब्रिज), बाढ़िक जलप्रलयसँ (जलोदीप) शर्यणा जलाशय धरि (दानवीर दधीची) — जल एतऽ कतहु साक्षी अछि, कतहु न्यायाधीश (प्रमाण पानि अछि), कतहु बलि माँगनिहार भ्रमक आवरण (ई गंगा... खून चाही एकरा — जे वस्तुतः सत्ताक अपन भूख छल)। आ पाँचम सूत्र ज्ञानक अछि, जे एहि पोथीक समीक्षा सभमे डेग-डेगपर देखार भेल: बिनु कारण बुझने नकल (कमलाक भगता) → ज्ञानपर पहरा (दानवीर दधीची) → प्रश्नक अधिकार (अपाला आत्रेयी) → कल्पना आ व्यवहारक संयोग (भऽ जाएब छू) → बच्चाक विशेषज्ञता (जलोदीप) → आत्म-प्रवंचना (संकर्षण) → इतिहासक पट्टी-बन्हाइ (गंगा ब्रिज) → भाषाहीनक न्याय (मचण्ड) → रटन्त बनाम बुझन्त आ स्मृतिक रक्षा (उल्कामुख)। ई कोनो बिखरल विषय-सूची नहि, एकटा क्रमबद्ध ज्ञान-मीमांसा अछि — प्रश्नसँ स्मरण धरि।
बाल आ प्रौढ़ नाट्यक सिद्धान्त-भेदपर एहि शृंखलाक अपन उत्तर सेहो आब स्पष्ट कहल जा सकैत अछि। पाँचू बाल-नाटक स्लेड-हीथकोट-बोआल परम्पराक अनुरूप बच्चाकेँ कर्ता बनबैत अछि आ सभक अन्त आशा वा प्रतिज्ञापर होइत अछि; चारू प्रौढ़ नाटक ब्रेष्ट-पिस्काटर-सरकार परम्पराक अनुरूप दर्शकक सुविधा तोड़ैत अछि आ तीनटाक अन्त अ-समाधानपर (संकर्षण एकमात्र अपवाद अछि, जतऽ आत्मबोध भेटैत अछि — मुदा ओहो हँसीक नहि, बुझबाक क्षणपर)। तथापि दुनू धारा एक्के नदीक अछि: बाल-नाटकक प्रतिज्ञा (पूछू, बुझू, फेर करू) जँ निमहल जाए तँ प्रौढ़ नाटकक त्रासदी — रोलरक नीचाँक अभियन्ता, जेलक मुतालिफ, हाथीक पएर तरक मेधा-जीवे — टारल जा सकैत अछि; प्रौढ़ नाटक ओही भविष्यक चित्र अछि जे प्रश्न नहि पुछनिहार बच्चाक प्रतीक्षा करैत अछि। एहि अर्थमे नअ नाटकक ई समुच्चय एकटा पूर्ण रंग-शिक्षाक्रम अछि — कमला घाटक बालुसँ उल्कामुखी ताबीज धरि — जकरा विद्यालय, गाम-मंच आ नगर-प्रेक्षागृह तीनू ठाम, क्रमसँ वा फराक-फराक, खेलाएल जा सकैत अछि।
अन्तमे एकटा प्रस्ताव: जँ ककरो एहि नअमे सँ मात्र दूटा नाटक पढ़बाक वा खेलेबाक अवसर होनि, तँ ओ कमलाक भगता आ उल्कामुख चुनथि — शृंखलाक सभसँ छोट आ सभसँ पैघ रचना। पहिल सिखबैत अछि जे बिनु बुझने केलहा काज केहन विधान बनि जाइत अछि, दोसर देखबैत अछि जे बिनु बुझने रटलहा विद्या केहन विस्मरण बनि जाइत अछि — आ दुनूक बीचक सात नाटक ओही दू ध्रुवक बीच मनुक्खक, समाजक आ स्मृतिक यात्रा अछि। नाटककार अपन सूत्रधारक मुँहे जे कहौने छथि, से एहि पोथीक अन्तिम पाँती बनए योग्य अछि: कथा बदलि सकैए, मुदा सत्यक खोज बन्न नहि हेबाक चाही।

Suggested citation: गजेन्द्र ठाकुर. “नाट्य-नवग्रह.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 447, pp. 657–699, 2026-08-01. https://www.videha.co.in/research/2026/447/नाट्य-नवग्रह.htm

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