‘बज्जिका गीत-संगीत’ : समेकित द्विभाषिक बहुआयामी साहित्यिक समीक्षा
डॉ. रामेश्वर प्रसादक कृतिक मैथिली–बज्जिका समानान्तर अनुशीलन
समीक्ष्य कृति : ‘बज्जिका गीत-संगीत’ · किशोर प्रकाशन, मुजफ्फरपुर · प्रथम संस्करण, २०००
खण्ड १ : चतुर्आयामी आलोचनात्मक अनुशीलन
१. सम्पादकीय प्रवेश
विदेह अपन आरम्भहिसँ ओहि साहित्यिक न्यायक पक्षधर रहल अछि, जे स्थापित-संस्थागत आलोचना-परम्परासँ छूटल, हाशिया पर ठेलल आ अनसुनल स्वर सभकेँ केन्द्रमे अनैत अछि। समान्तर साहित्य आन्दोलनक मूल प्रतिज्ञा इएह थिक — लोक, स्त्री, दलित, श्रमजीवी आ उपेक्षित समुदायक ओ वाणी, जकरा साहित्य अकादमी-सन संस्थागत साहित्येतिहास प्रायः नामलेवा नहि करैत, तकरा प्रामाणिक आलोचकीय गरिमा देब।
विदेह अपन शुरुआते से ओही साहित्यिक न्याय के पक्ष में रहल हय, जे स्थापित-संस्थागत आलोचना-परम्परा से छूटल, हाशिया पर ठेलल आ अनसुनल स्वर सब के केन्द्र में ले आवत हय। समान्तर साहित्य आन्दोलन के मूल परन इहे हय — लोक, स्त्री, दलित, श्रमजीवी आ उपेक्षित समुदाय के ऊ वाणी, जेकरा साहित्य अकादमी-जइसन संस्थागत साहित्येतिहास प्रायः नामलेवा न करे, ओकरा प्रामाणिक आलोचकीय गरिमा देब।
एहि दृष्टिएँ, एक मैथिली पत्रिकामे बज्जिका गीत-संग्रहक समीक्षा कोनो विजातीय काज नहि, अपितु सहोदर लोक-वाणी-प्रति एक स्वाभाविक सौहार्द थिक। मैथिली स्वयं हिन्दी-पट्टीक भीतर अपन स्वतन्त्र साहित्यिक अस्मिताक लेल दीर्घ संघर्ष कएने अछि; बज्जिका-सन एक अनुसूची-बाह्य, दोहरा-अधीनस्थ भाषाक साहित्यिक प्रयासकेँ बुझबामे ओ संघर्ष हमरा एक विशेष सहानुभूति दैत अछि।
ए नजर से, एगो मैथिली पत्रिका में बज्जिका गीत-संग्रह के समीक्षा कोनो पराया काम न हय, बल्कि सहोदर लोक-वाणी ला एगो स्वाभाविक सौहार्द हय। मैथिली खुद हिन्दी-पट्टी के भीतर अपन अलग साहित्यिक पहचान ला लम्बा संघर्ष कयेलक हय; बज्जिका-जइसन एगो अनुसूची-बाहर, दुहरा-अधीनस्थ भाषा के साहित्यिक प्रयास के समझे में ऊ संघर्ष हमरा एगो खास हमदर्दी देत हय।
प्रस्तुत अनुशीलनमे कृतिकेँ चारि आयामसँ जाँचल गेल अछि — (क) भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति; (ख) पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्त: मार्क्सवाद, संरचनावाद-रूपवाद, उत्तर-औपनिवेशिक ओ अधीनस्थ-विमर्श, संवाद-सिद्धान्त, मौखिकता-प्रदर्शन आ स्त्रीवादी संकेत; (ग) नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा; आ (घ) विदेह समान्तर-इतिहास-रूपरेखा। एहि चारू दृष्टिक समन्वयसँ एक लोकगीत-संग्रहक बहुस्तरीय पाठ सम्भव भेल अछि।
ए अनुशीलन में कृति के चार आयाम से जाँचल गेल हय — (क) भारतीय काव्यशास्त्रीय नजर: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति; (ख) पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्त: मार्क्सवाद, संरचनावाद-रूपवाद, उत्तर-औपनिवेशिक आ अधीनस्थ-विमर्श, संवाद-सिद्धान्त, मौखिकता-प्रदर्शन आ स्त्रीवादी संकेत; (ग) नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा; आ (घ) विदेह समान्तर-इतिहास-रूपरेखा। ए चारू नजर के मेल से एगो लोकगीत-संग्रह के बहुस्तरीय पाठ सम्भव भेल हय।
२. कृति-परिचय
‘बज्जिका गीत-संगीत’ डॉ० रामेश्वर प्रसादक ओ गीत-संग्रह थिक, जे किशोर प्रकाशन, मुजफ्फरपुरसँ सन् २००० मे प्रथम बेर प्रकाशित भेल। लेखक बी०पी०सी० कॉलेज, लालगंज (वैशाली) क प्राचार्य रहलाह आ हिनक लेखनी बज्जिका ओ खड़ी बोली — दुनू भाषामे समान रूपेँ चलैत रहल। ‘कुन्ती के बेटा’ (बज्जिका खण्ड-काव्य), ‘बज्जिका लोकगीत’, ‘हम कहाँ हती’ (बज्जिका ललित निबन्ध), ‘ऐ लाश! सुनो’ आ ‘कहीं विपिन में मधुशाला’ (खड़ी बोली काव्य) — एहि विविध कृति-परम्परामे प्रस्तुत संग्रह हिनक बज्जिका-गीत-साधनाक एक महत्त्वपूर्ण कड़ी थिक।
‘बज्जिका गीत-संगीत’ डॉ० रामेश्वर प्रसाद के ऊ गीत-संग्रह हय, जे किशोर प्रकाशन, मुजफ्फरपुर से सन् २००० में पहिल बेर प्रकाशित भेल। लेखक बी०पी०सी० कॉलेज, लालगंज (वैशाली) के प्राचार्य रहलन आ हुनकर कलम बज्जिका आ खड़ी बोली — दुनू भाषा में बराबर चलल। ‘कुन्ती के बेटा’ (बज्जिका खण्ड-काव्य), ‘बज्जिका लोकगीत’, ‘हम कहाँ हती’ (बज्जिका ललित निबन्ध), ‘ऐ लाश! सुनो’ आ ‘कहीं विपिन में मधुशाला’ (खड़ी बोली काव्य) — एतना रचना के बीच ई संग्रह हुनकर बज्जिका-गीत-साधना के एगो जरूरी कड़ी हय।
पोथी ज्येष्ठ पुत्र गोपाल जी किशोरकेँ समर्पित अछि आ एकर भूमिका (परिचय-लेख) राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानक आचार्य शम्भुनाथ मिश्र लिखने छथि, जे लेखकक कविताईमे ‘दिनकर-सन प्रखरता’ लक्षित करैत छथि। संग्रहमे कुल एक सय पाँच गीत छथि, जे नौ विषय-वर्गमे विभाजित अछि। एहि गीत सभक विशेषता ई थिक जे ओ केवल पाठ्य नहि, अपितु गेय रचना थिक — लेखकक स्पष्ट अभिप्राय रहलनि जे बज्जिका-भाषी गायक एकरा राग-रागिनीमे बान्हि गाबि सकथि।
पोथी ज्येष्ठ पुत्र गोपाल जी किशोर के समर्पित हय आ एकर भूमिका राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के आचार्य शम्भुनाथ मिश्र लिखलन, जे लेखक के कविताई में ‘दिनकर-जइसन प्रखरता’ देखलन। संग्रह में कुल एक सय पाँच गो गीत हय, जे नौ गो विषय-वर्ग में बँटल हय। ए गीत सब के खासियत ई हय कि ऊ खाली पढ़े वला न हय, बल्कि गावे वला रचना हय — लेखक के साफ मंशा रहल कि बज्जिका-भाषी गायक एकरा राग-रागिनी में बान्ह के गा सकस।
३. ‘आत्म-कथन’ आ बज्जिका-भाषा-प्रश्न
पोथीक ‘आत्म-कथन’ केवल विनम्र आत्म-निवेदन नहि, अपितु एक भाषिक-सांस्कृतिक घोषणा-पत्र सेहो थिक। लेखक बतबैत छथि जे १९७१ सँ ओ लालगंजमे बज्जिका कवि-गोष्ठीक आयोजन आरम्भ कएलनि, नुक्कड़-सभामे लोकगीत गओलनि, आ १९७६ मे ‘डाक्टर साहेब के बज्जिका लोकगीत’ के नामसँ ओकर एक प्रकाशन कएलनि। मुदा हुनका ई अनुभव भेलनि जे स्वयं गीत-रचनाक अभाव अछि, जाहिसँ गायक लोकनि गाबि सकथि — एहि अभावक पूर्ति करबाक संकल्पसँ प्रस्तुत संग्रह जन्म लेलक।
पोथी के ‘आत्म-कथन’ खाली नम्र आत्म-निवेदन न हय, बल्कि एगो भाषिक-सांस्कृतिक घोषणा-पत्र भी हय। लेखक बतवलन कि १९७१ से ऊ लालगंज में बज्जिका कवि-गोष्ठी के आयोजन करे लगलन, नुक्कड़-सभा में लोकगीत गवलन, आ १९७६ में ‘डाक्टर साहेब के बज्जिका लोकगीत’ के नाम से ओकर एगो प्रकाशन कयेलन। लेकिन हुनका ई अनुभव भेल कि खुद गीत-रचना के कमी हय, जेकरा से गायक लोग गा सकस — एही कमी के पूरा करे के संकल्प से ई संग्रह जनम लेलक।
एहि निबन्धमे लेखक बज्जिकाक स्वतन्त्र भाषिक अस्तित्वक पक्ष जोर दए राखने छथि। ओ देखबैत छथि जे बज्जिकाक क्रिया-पद क्षेत्र-अनुसार बदलैत अछि — गण्डकक पूर्वी भागमे ‘बा’, दरभंगा-समस्तीपुरमे ‘छी’, मुजफ्फरपुर-हाजीपुरमे ‘हती’ आ शिवहरक तरफ ‘हथ’ — मुदा एतबे विविधतासँ भाषाक एकता नहि टूटैत।
ए निबन्ध में लेखक बज्जिका के अलग भाषिक अस्तित्व के पक्ष जोर देके रखलन। ऊ देखवलन कि बज्जिका के क्रिया-पद क्षेत्र-अनुसार बदलत हय — गण्डक के पूरबी भाग में ‘बा’, दरभंगा-समस्तीपुर में ‘छी’, मुजफ्फरपुर-हाजीपुर में ‘हती’ आ शिवहर के तरफ ‘हथ’ — लेकिन एतना बिबिधता से भाषा के एकता न टूटे।
एहि सन्दर्भमे ओ लोकोक्ति उद्धृत करैत छथि — “चार कोस पर पानी बदले, आठ कोस पर बानी”। आगाँ बढ़ि ओ ई आग्रह करैत छथि जे बज्जिका पालिसँ विकसित प्राचीन भाषा थिक आ मैथिली-भोजपुरी एकरासँ प्रभावित भेल, न कि एकर विपरीत।
एही सन्दर्भ में ऊ लोकोक्ति उठवलन — “चार कोस पर पानी बदले, आठ कोस पर बानी”। आगे बढ़ के ऊ ई दावा कयेलन कि बज्जिका पालि से बिकसित प्राचीन भाषा हय आ मैथिली-भोजपुरी एकरा से प्रभावित भेल, न कि एकर उल्टा।
समीक्षकीय दृष्टिएँ ई भाषिक दावा प्रमाण-सिद्ध कम आ आग्रह-मूलक अधिक बुझाइत अछि; आधुनिक भाषा-विज्ञान मैथिली, मगही, भोजपुरी आ बज्जिकाकेँ प्रायः पूर्वी (बिहारी) आर्य-समूहक सहोदर भाषा मानैत अछि, आ एहिमे कोनो एकटाकेँ शेषक जननी सिद्ध करब सरल नहि। किन्तु मूल प्रेरणा — एक उपेक्षित लोक-वाणीकेँ अपन साहित्यिक-गेय पहचान देब — नितान्त सच्चा अछि। लेखक स्वयं ई स्वीकार करैत छथि जे साहित्य-क्षेत्रमे जातीय-प्रतिबद्धता आ साम्प्रदायिक मानसिकतासँ ऊपर उठि ‘साहित्य-सेवा’ हेबाक चाही — ई उदार दृष्टि हिनक भूमिकाक सबसँ स्वस्थ पक्ष थिक। भूमिकामे उद्धृत जगदीश चन्द्र माथुर (वैशाली-महोत्सवक प्रवर्तक) क १९७७ ई० क पत्रक ई परामर्श — जे उत्सवमे लोक (मछुआ) लेल नव गीत बनए के चाही आ ‘धरतीक ओर मुड़ी’ — एहि गीत-रचनाक पाछाँक लोकोन्मुख प्रेरणाकेँ स्पष्ट करैत अछि।
समीक्षा के नजर से ई भाषिक दावा प्रमाण-सिद्ध कम आ आग्रह वला जादे लागत हय; आधुनिक भाषा-बिज्ञान मैथिली, मगही, भोजपुरी आ बज्जिका के प्रायः पूरबी (बिहारी) आर्य-समूह के सहोदर भाषा माने हय, आ एहिमें कोनो एक के दोसर के जननी साबित कइल आसान न हय। लेकिन मूल प्रेरणा — एगो उपेक्षित लोक-वाणी के अपन साहित्यिक, गावे वला पहचान देब — एकदम सच्चा हय। लेखक खुद ई मानलन कि साहित्य-क्षेत्र में जातीय-प्रतिबद्धता आ साम्प्रदायिक मानसिकता से ऊपर उठ के ‘साहित्य-सेवा’ होए के चाहीं — ई उदार सोच हुनकर भूमिका के सबसे स्वस्थ पक्ष हय। भूमिका में उठावल जगदीश चन्द्र माथुर (वैशाली-महोत्सव के प्रवर्तक) के १९७७ ई० के पत्र के ई सलाह — कि उत्सव में लोक (मछुआ) ला नया गीत बने के चाहीं आ ‘धरती के ओर मुड़ के’ — ए गीत-रचना के पाछे के लोकोन्मुख प्रेरणा के साफ करत हय।
४. संकलनक संरचना ओ अन्तर्वस्तु-सर्वेक्षण · ४. संग्रह के बनावट आ अन्तर्वस्तु-सर्वेक्षण
गीत सभ नौ वर्गमे सजाओल गेल अछि — (क) कृष्ण (१–२०), (ख) श्रृंगार (२१–४२), (ग) नायिका-व्यथा (४३–५२), (घ) प्रकृति (५३–६०), (ङ) मानव-प्रकृति (६१–७८), (च) देश-दशा (७९–८४), (छ) गरीबी (८५–९५), (ज) कृषि (९६–१०३), आ (झ) वसन्त (१०४–१०५)। एहि क्रममे एक स्वाभाविक भाव-यात्रा अछि — भक्ति ओ श्रृंगारसँ आरम्भ भए, प्रकृति होइत, सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ धरि पहुँचि, अन्तमे कृषि-श्रम ओ वसन्तक लयात्मक मधुरतामे विश्राम। लेखकक कहब जे एहिमे तीनू धरातलक गीत — शास्त्रीय गीत, सुगम संगीत आ लोकगीत — समाहित अछि।
गीत सब नौ गो वर्ग में सजल हय — (क) कृष्ण (१–२०), (ख) श्रृंगार (२१–४२), (ग) नायिका-व्यथा (४३–५२), (घ) प्रकृति (५३–६०), (ङ) मानव-प्रकृति (६१–७८), (च) देश-दशा (७९–८४), (छ) गरीबी (८५–९५), (ज) कृषि (९६–१०३), आ (झ) वसन्त (१०४–१०५)। ए क्रम में एगो स्वाभाविक भाव-यात्रा हय — भक्ति आ श्रृंगार से शुरू होके, प्रकृति होइत, सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ तक पहुँच के, आखिर में कृषि-श्रम आ वसन्त के लयदार मिठास में विश्राम। लेखक कहलन कि एहिमें तीनू धरातल के गीत — शास्त्रीय गीत, सुगम संगीत आ लोकगीत — समाहित हय।
(क) कृष्ण-पदावली
कृष्ण-खण्डक बीस गीत विद्यापति-सूरदास परम्पराक फुहार थिक, मुदा बज्जिकाक ठेठ ग्राम्य मुहावरामे ढालल। एतय कृष्ण ‘छलिया’ छथि आ राधाक मन विरह, मान आ उलाहनासँ भरल। प्रथम गीतक टेक — “अब हम कइसे चलूँ डगरिया, लोगवा नजर लगावे ना” — मे लोक-लाजक बीच स्थित प्रेमिकाक द्विविधा ध्वनित अछि; दोसर गीत — “कान्हा चलावे नजरिया, ई कान्हा छलिया” — मे कृष्णक चंचल छलनाक ग्राम्य चित्र। एहि खण्डक सबसँ सशक्त रचना ओतय अछि जतय नाट्य-तत्त्व आबि जाइत अछि — ननदि-भौजाईक संवाद-गीतमे, जतय पनघटक घटनाकेँ लए रस-भरल प्रश्नोत्तर चलैत अछि। कुबजाक उल्लेखसँ राधाक ईर्ष्या-भाव आ अन्यायक बोध मुखर अछि। ‘खेले-खेले कन्हाई’ सन गीतमे वात्सल्य-रसक कोमल स्पर्श सेहो अछि।
कृष्ण-खण्ड के बीस गीत विद्यापति-सूरदास परम्परा के फुहार हय, लेकिन बज्जिका के ठेठ गाँव-घर वला मुहावरा में ढालल। इहाँ कृष्ण ‘छलिया’ हथ आ राधा के मन विरह, मान आ उलाहना से भरल। पहिल गीत के टेक — “अब हम कइसे चलूँ डगरिया, लोगवा नजर लगावे ना” — में लोक-लाज के बीच खड़ी प्रेमिका के दुविधा झलकत हय; दोसर गीत — “कान्हा चलावे नजरिया, ई कान्हा छलिया” — में कृष्ण के चंचल छलनी के गाँव-घर वला चित्र। ए खण्ड के सबसे सशक्त रचना ओहिजा हय जहाँ नाट्य-तत्त्व आ जात हय — ननदि-भौजाई के संवाद-गीत में, जहाँ पनघट के घटना के लेके रस-भरल प्रश्नोत्तर चलत हय। कुबजा के जिक्र से राधा के ईर्ष्या-भाव आ अन्याय के बोध मुखर। ‘खेले-खेले कन्हाई’ जइसन गीत में वात्सल्य-रस के कोमल परस भी हय।
(ख) श्रृंगार
श्रृंगार-खण्ड (२१–४२) मे प्रायः प्रभात, भिनुसार, ऑंख आ अँगनाक बिहारक चित्र आबैत अछि। “ऑंख अलसायेल, बिहँस उठल कंगना” सन पाँतिमे नायिकाक प्रातःकालीन शृंगार-चेष्टाक सजीव आलेखन अछि। एतयक शृंगार देह-प्रधान होइतो लोक-मर्यादाक भीतर रहैत अछि — इच्छा आ संकोचक बीचक तनाव एहि गीत सभक प्राण थिक।
श्रृंगार-खण्ड (२१–४२) में प्रायः भोर, भिनुसार, आँख आ अँगना के बिहान के चित्र आवत हय। “आँख अलसायेल, बिहँस उठल कंगना” जइसन पाँति में नायिका के भोर वला सिंगार-चेष्टा के जिन्दा चित्रण हय। इहाँ के श्रृंगार देह-प्रधान होइतो लोक-मर्यादा के भीतर रहत हय — इच्छा आ लाज के बीच के तनाव ए गीत सब के प्राण हय।
(ग) नायिका-व्यथा
एहि संग्रहक सबसँ मौलिक ओ मार्मिक स्वर एतय मुखर अछि, जतय परम्परागत विरह-काव्य एक जीवन्त सामाजिक दस्तावेज बनि जाइत अछि। एतयक ‘परदेशी’ पति काल्पनिक नहि, अपितु बिहारक श्रम-प्रवासक कठोर यथार्थ थिक — जे रोजी-रोटीक खोजमे ‘कलकतवा’ चलि जाइत छथि। “कि खोजे चललिन बालम के हो कलकतवा” — एहि पाँति एहि प्रवास-वेदनाकेँ लोक-कण्ठ दैत अछि। आगाँ “पिया परदेशिया के कौनो न ठेकान बा” सन गीतमे ओ पति, जे परदेसमे कमाइक अहंकारमे दारू पीबि घर उपेक्षित छोड़ि दैत छथि — नायिकाक व्यथा एतय व्यक्तिगत विरहसँ आगाँ पारिवारिक-सामाजिक टूटनक बोध बनि जाइत अछि।
ए संग्रह के सबसे मौलिक आ मरम वला स्वर इहाँ मुखर हय, जहाँ परम्परागत विरह-काव्य एगो जिन्दा सामाजिक दस्तावेज बन जात हय। इहाँ के ‘परदेशी’ पति कल्पना न हय, बल्कि बिहार के श्रम-प्रवास के कठोर यथार्थ हय — जे रोजी-रोटी के खोज में ‘कलकतवा’ चल जात हथ। “कि खोजे चललिन बालम के हो कलकतवा” — ई पाँति ए परदेस-वेदना के लोक-कण्ठ देत हय। आगे “पिया परदेशिया के कौनो न ठेकान बा” जइसन गीत में ऊ पति, जे परदेस में कमाई के घमण्ड में दारू पी के घर उपेक्षित छोड़ देत हथ — नायिका के व्यथा इहाँ निजी विरह से आगे पारिवारिक-सामाजिक टूट के बोध बन जात हय।
(घ) प्रकृति
प्रकृति-खण्ड (५३–६०) मे कोइलिया, पपीहा, महुआ, फागुन आ चन्दाक ग्राम्य छवि पसरल अछि। “काली रे कोइलिया के साम–साम अँखिया राम, साम लागे ना” सन पाँतिमे ‘साम’ शब्दक श्लेष (साँवर आ श्याम) सँ प्रकृति ओ भक्ति एकठाम बान्हल गेल अछि। ‘कुहुकी-कुहुकी’, ‘टह-टह’, ‘लह-लह’ सन ध्वनि-अलंकारसँ प्रकृतिक ध्वनि-सौन्दर्य गीतमे उतरि आबैत अछि।
प्रकृति-खण्ड (५३–६०) में कोइलिया, पपीहा, महुआ, फागुन आ चन्दा के गाँव-घर वला छवि पसरल हय। “काली रे कोइलिया के साम–साम अँखिया राम, साम लागे ना” जइसन पाँति में ‘साम’ शब्द के श्लेष (साँवर आ श्याम) से प्रकृति आ भक्ति एक ठाम बन्हल गेल हय। ‘कुहुकी-कुहुकी’, ‘टह-टह’, ‘लह-लह’ जइसन ध्वनि-अलंकार से प्रकृति के ध्वनि-सुन्दरता गीत में उतर आवत हय।
(ङ-च-छ) मानव-प्रकृति, देश-दशा ओ गरीबी · (ङ-च-छ) मानव-प्रकृति, देश-दशा आ गरीबी
एहि तीनू खण्डमे कवि सबसँ प्रखर आ प्रतिबद्ध थिक। व्यंग्यक धार तीव्र, लक्ष्य स्पष्ट — कुर्सी, भ्रष्टाचार, नेता आ घूस। “कुर्सी जग के नाच नचयेलक” मे सत्ताक विकृति, आ “हम तऽ एक नम्बर के धरमी, लोगवा भ्रष्टी कहे ना” मे भ्रष्ट व्यक्तिक आत्म-प्रवंचनाक तीखा उपहास अछि। पौराणिक प्रतीकसँ व्यंग्य आर पैघ — “सोचऽ के चलऽ तुलसी आ गेल जमाना गड़बड” मे राम-भरत-रावण-दशरथक कथाकेँ आधुनिक राजनीतिक विद्रूप पर लगाओल गेल। गरीबी-खण्ड (८५–९५) मे महँगाई, करजा, बेटीक दहेज आ दीन-दुखियाक विवशता — “गरीब के समइया राम बिपतिये बाँट जाले” सन पाँतिमे गरीबक विपत्ति-चक्र मुखर अछि। एहि स्वरमे नागार्जुन-सन प्रगतिशील लोक-कविताक प्रतिध्वनि अछि।
ए तीनू खण्ड में कवि सबसे प्रखर आ प्रतिबद्ध हय। व्यंग्य के धार तेज, निशाना साफ — कुर्सी, भ्रष्टाचार, नेता आ घूस। “कुर्सी जग के नाच नचयेलक” में सत्ता के विकृति, आ “हम तऽ एक नम्बर के धरमी, लोगवा भ्रष्टी कहे ना” में भ्रष्ट आदमी के आत्म-प्रवंचना के तीखा उपहास। पौराणिक प्रतीक से व्यंग्य आर बड़ — “सोचऽ के चलऽ तुलसी आ गेल जमाना गड़बड” में राम-भरत-रावण-दशरथ के कथा के आज के राजनीतिक विद्रूप पर लगावल गेल। गरीबी-खण्ड (८५–९५) में महँगाई, करजा, बेटी के दहेज आ दीन-दुखिया के लाचारी — “गरीब के समइया राम बिपतिये बाँट जाले” जइसन पाँति में गरीब के बिपत्ति-चक्कर मुखर। ए स्वर में नागार्जुन-जइसन प्रगतिशील लोक-कविता के गूँज हय।
(ज-झ) कृषि ओ वसन्त · (ज-झ) कृषि आ वसन्त
कृषि-खण्डमे कवि श्रमक गरिमा आ किसानकेँ गाबैत छथि — “चलऽ हम तऽ बनम किसनवा, तूँ किसानिन बनी हऽ ना” आ “काम करू, खाउ गौरव से, तज शोषण के भोग” सन आह्वानमे श्रम-चेतनाक स्वस्थ स्वर अछि। पति-पत्नीक संवाद-गीत (९७–९८) मे गार्हस्थ्यक माधुर्य, आ अन्तमे वसन्त-खण्ड (होली-गीत १०४–१०५) संग्रहकेँ पुनः कृष्ण-लीला आ वासन्ती शृंगारक लयमे लए अनैत अछि — एक सुन्दर वृत्ताकार परिणति।
कृषि-खण्ड में कवि श्रम के गरिमा आ किसान के गवलन — “चलऽ हम तऽ बनम किसनवा, तूँ किसानिन बनी हऽ ना” आ “काम करू, खाउ गौरव से, तज शोषण के भोग” जइसन आह्वान में श्रम-चेतना के स्वस्थ स्वर हय। पति-पत्नी के संवाद-गीत (९७–९८) में गिरहस्ती के मिठास, आ आखिर में वसन्त-खण्ड (होली-गीत १०४–१०५) संग्रह के फिर से कृष्ण-लीला आ वसन्ती श्रृंगार के लय में ले आवत हय — एगो सुन्दर गोलाकार परिणति।
५. प्रथम आयाम: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति · ५. पहिल आयाम: रस-ध्वनि-वक्रोक्ति
५.१ रस-विवेचन
रस-दृष्टिएँ ई संग्रह एक रस-कोश थिक। कृष्ण-खण्डमे स्थायी भाव रति थिक, जे भक्ति-मधुर भावमे परिणत होइत अछि; आलम्बन-विभाव कृष्ण, उद्दीपन यमुना-वंशी-वृन्दावन, अनुभाव नायिकाक चेष्टा, आ व्यभिचारी औत्सुक्य, चिन्ता, ईर्ष्या (कुबजा-प्रसंगे) ओ विषाद। बाल-कृष्ण-गीतमे स्थायी वत्सल-रति सँ वात्सल्य-रस निष्पन्न होइत अछि।
रस के नजर से ई संग्रह एगो रस-कोश हय। कृष्ण-खण्ड में स्थायी भाव रति हय, जे भक्ति-मधुर भाव में बदल जात हय; आलम्बन-विभाव कृष्ण, उद्दीपन यमुना-वंशी-वृन्दावन, अनुभाव नायिका के चेष्टा, आ व्यभिचारी औत्सुक्य, चिन्ता, ईर्ष्या (कुबजा-प्रसंग) आ विषाद। बाल-कृष्ण-गीत में स्थायी वत्सल-रति से वात्सल्य-रस निकलत हय।
नायिका-व्यथा-खण्डमे एक सूक्ष्म रस-संक्रमण द्रष्टव्य अछि। परम्परया विरह विप्रलम्भ-शृंगार थिक, जाहिमे पुनर्मिलनक आशा निहित रहैत अछि; मुदा जतय विरह सामाजिक-आर्थिक बाध्यता (प्रवास, दारिद्र्य) सँ आरोपित अछि, ओतय आशाक क्षीणतासँ विप्रलम्भ करुण-रसक दिशामे झुकि जाइत अछि। इएह विप्रलम्भ-सँ-करुणक संक्रमण एहि संग्रहक भाव-वैशिष्ट्य थिक।
नायिका-व्यथा-खण्ड में एगो सूक्ष्म रस-संक्रमण देखे में आवत हय। आम तौर पर विरह विप्रलम्भ-शृंगार हय, जेहिमें फिर मिले के आशा रहत हय; लेकिन जहाँ विरह सामाजिक-आर्थिक मजबूरी (परदेस, गरीबी) से लादल हय, ओहिजा आशा के कमजोरी से विप्रलम्भ करुण-रस के ओर झुक जात हय। इहे विप्रलम्भ-से-करुण के संक्रमण ए संग्रह के भाव-खासियत हय।
मानव-प्रकृति, देश-दशा ओ गरीबीक राजनीतिक गीत परम्परागत रस-योजनाकेँ कसौटी पर चढ़बैत अछि। एतयक भाव न शुद्ध हास्य थिक, न केवल करुण — ओ रोष, आक्रोश आ विद्रोहक ओ आधुनिक स्वर थिक, जकरा शास्त्रीय अष्ट-नव रस-विधानमे सहजे नहि अँटाओल जा सकैत। प्रगतिशील आलोचना जकरा ‘आक्रोश’ वा ‘विद्रोह-रस’ कहैत अछि, ओकर बीज एतय स्पष्ट अछि — आ इएह एहि संग्रहक रस-नवाचार थिक। कृषि-गीतमे श्रम-प्रति उत्साह (कर्म-वीरक अनुरूप ‘श्रम-वीर’) आ ग्राम्य-सन्तोषक शान्त, तथा वसन्त-होलीमे संयोग-शृंगारक उल्लास — रस-वैविध्य पूर्ण अछि।
मानव-प्रकृति, देश-दशा आ गरीबी के राजनीतिक गीत परम्परागत रस-योजना के कसौटी पर चढ़ावत हय। इहाँ के भाव न शुद्ध हास्य हय, न खाली करुण — ऊ रोष, आक्रोश आ विद्रोह के ऊ आधुनिक स्वर हय, जेकरा शास्त्रीय अष्ट-नव रस-विधान में आसानी से न अँटावल जा सके। प्रगतिशील आलोचना जेकरा ‘आक्रोश’ या ‘विद्रोह-रस’ कहे हय, ओकर बीज इहाँ साफ हय — आ इहे ए संग्रह के रस-नवाचार हय। कृषि-गीत में श्रम-ला उत्साह (कर्म-वीर के जइसन ‘श्रम-वीर’) आ गाँव-सन्तोष के शान्त, आ वसन्त-होली में संयोग-शृंगार के उल्लास — रस-बिबिधता पूरा हय।
५.२ ध्वनि-विवेचन
एहि गीत सभक शक्ति अभिधा-लक्षणासँ बेसी व्यंजनामे अछि। तीनू ध्वनि-भेद एतय भेटैत अछि। वस्तु-ध्वनि: कुबजाक नामोल्लेख कृष्णक उपेक्षाकेँ बिना कहने सुझबैत अछि, आ ‘कलकतवा’ शब्द समस्त प्रवास-त्रासदीकेँ ध्वनित करैत अछि। अलंकार-ध्वनि: ‘साम-साम’क श्लेषसँ (साँवर = श्याम) अर्थ-द्वैत व्यंजित; ‘मन के आग’, ‘नेहिया के डोर’ सन रूपक-ध्वनि। रस-ध्वनि: समस्त नायिका-व्यथा-खण्ड करुण-विप्रलम्भकेँ कहने नहि, अपितु व्यंजित करैत अछि।
ए गीत सब के ताकत अभिधा-लक्षणा से जादे व्यंजना में हय। तीनू ध्वनि-भेद इहाँ मिलत हय। वस्तु-ध्वनि: कुबजा के नाम कृष्ण के उपेक्षा के बिना कहले सुझावत हय, आ ‘कलकतवा’ शब्द सारा परदेस-त्रासदी के ध्वनित करत हय। अलंकार-ध्वनि: ‘साम-साम’ के श्लेष से (साँवर = श्याम) अर्थ-द्वैत व्यंजित; ‘मन के आग’, ‘नेहिया के डोर’ जइसन रूपक-ध्वनि। रस-ध्वनि: सारा नायिका-व्यथा-खण्ड करुण-विप्रलम्भ के कहले न, बल्कि व्यंजित करत हय।
एहिमे टेक (मुखड़ा) क विशिष्ट ध्वनि-भूमिका अछि। पुनरावृत्तिसँ टेकमे व्यंजना संचित होइत जाइत अछि — प्रत्येक अन्तराक बाद घूमि आबि ओ ध्वनि-घनत्व बढ़बैत अछि, जे आनन्दवर्धनक ‘रस-ध्वनि’क लोक-रूप थिक। एतय अधिकांश ध्वनि विवक्षित-अन्यपर-वाच्य (अर्थशक्तिमूल) प्रकारक थिक — वाच्यार्थ अभीष्ट रहितो ओकरासँ आगाँ इंगित करैत।
एहिमें टेक (मुखड़ा) के खास ध्वनि-भूमिका हय। दोहराव से टेक में व्यंजना जुड़त जात हय — हर अन्तरा के बाद घूम के ऊ ध्वनि-घनत्व बढ़ावत हय, जे आनन्दवर्धन के ‘रस-ध्वनि’ के लोक-रूप हय। इहाँ जादेतर ध्वनि विवक्षित-अन्यपर-वाच्य (अर्थशक्तिमूल) प्रकार के हय — वाच्यार्थ चाहितो ओकरा से आगे इशारा करत।
५.३ वक्रोक्ति-विवेचन
कुन्तकक मतेँ वक्रोक्ति काव्यक आत्मा थिक। हिनक छह वक्रता-स्तर एहि संग्रह पर एना लागू होइत अछि। (१) वर्ण-विन्यास-वक्रता: ‘कुहुकी-कुहुकी’, ‘टह-टह’, ‘लह-लह’, ‘झन-झन’ सन अनुप्रास आ नाद-चित्रण। (२) पद-पूर्वार्ध-वक्रता: ‘डगरिया’, ‘नजरिया’, ‘बँसुरिया’ सन देशज-तद्भव पद, ‘-इया’ स्नेह-प्रत्ययसँ रुचिर बनल। (३) पद-परार्ध-वक्रता: बज्जिका क्रिया-पद (‘देलऽ’, ‘जाले’, ‘कहे ना’, ‘बनी हऽ’) स्वयं वक्रताक स्थल बनि जाइत अछि, आ भाषिक-सांस्कृतिक आवेश दैत अछि। (४) वाक्य-वक्रता: टेक-पाँति, प्रश्न-रचना (‘अब हम कइसे चलूँ’) आ संवाद-निर्माण। (५) प्रकरण-वक्रता: पनघट-प्रसंग, ननदि-भौजाई ओ पति-पत्नीक संवाद-स्थिति — प्रकरण-स्तरक कौशल। (६) प्रबन्ध-वक्रता: नौ-वर्गीय विषय-योजना (भक्तिसँ वसन्त धरि) एक समग्र प्रबन्ध-वक्रता थिक।
कुन्तक के मत से वक्रोक्ति काव्य के आत्मा हय। हुनकर छह वक्रता-स्तर ए संग्रह पर अइसे लागत हय। (१) वर्ण-विन्यास-वक्रता: ‘कुहुकी-कुहुकी’, ‘टह-टह’, ‘लह-लह’, ‘झन-झन’ जइसन अनुप्रास आ नाद-चित्रण। (२) पद-पूर्वार्ध-वक्रता: ‘डगरिया’, ‘नजरिया’, ‘बँसुरिया’ जइसन देशज-तद्भव पद, ‘-इया’ स्नेह-प्रत्यय से रुचिर। (३) पद-परार्ध-वक्रता: बज्जिका क्रिया-पद (‘देलऽ’, ‘जाले’, ‘कहे ना’, ‘बनी हऽ’) खुदे वक्रता के ठाम बन जात हय, आ भाषिक-सांस्कृतिक आवेश देत हय। (४) वाक्य-वक्रता: टेक-पाँति, प्रश्न-रचना (‘अब हम कइसे चलूँ’) आ संवाद-निर्माण। (५) प्रकरण-वक्रता: पनघट-प्रसंग, ननदि-भौजाई आ पति-पत्नी के संवाद-स्थिति — प्रकरण-स्तर के कौशल। (६) प्रबन्ध-वक्रता: नौ-वर्गीय विषय-योजना (भक्ति से वसन्त तक) एगो समग्र प्रबन्ध-वक्रता हय।
मूल्यांकन: कविक वक्रता वर्ण- ओ पद-परार्ध-स्तर पर (नाद आ बज्जिका रूप-रचनामे) सर्वाधिक सबल अछि; मुदा जतय ओ सीधा उपदेश-कथनमे उतरि जाइत छथि — विशेषतः किछु राजनीतिक ओ गरीबी-गीतमे — ओतय वक्रता क्षीण भए वाच्यता प्रबल भए जाइत अछि। एतय काव्यक ‘वक्र’ स्वभाव मन्द अछि।
मूल्यांकन: कवि के वक्रता वर्ण- आ पद-परार्ध-स्तर पर (नाद आ बज्जिका रूप-रचना में) सबसे मजबूत हय; लेकिन जहाँ ऊ सीधा उपदेश-कथन में उतर जात हथ — खास कर के किछु राजनीतिक आ गरीबी-गीत में — ओहिजा वक्रता कमजोर होके वाच्यता जोर पकड़ लेत हय।
६. द्वितीय आयाम: पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि · ६. दोसर आयाम: पाश्चात्य समीक्षा-दृष्टि
६.१ मार्क्सवादी पाठ
देश-दशा ओ गरीबी-गीत वर्ग-चेतनासँ भरल अछि। ‘कलकतवा’-प्रवास ग्राम-नगर श्रम-निष्कासनक ओ ‘श्रमक आरक्षित सेना’क चित्र थिक, जे बिहारकेँ बंगालक उद्योग लेल श्रम-आगारमे बदलि दैत अछि। ‘कुर्सी’-गीत राज्य-यन्त्रक (नेता, अफसर, पुलिसक) आलोचना थिक — अल्थ्यूसरक दमनकारी ओ विचारधारात्मक राज्य-उपकरणक स्मृति एतय जागैत अछि। आधार-अधिरचनाक सम्बन्ध स्पष्ट अछि: आर्थिक आधार (दारिद्र्य, करजा, दहेज) कोना अधिरचनात्मक विपत्तिकेँ निर्धारित करैत अछि, से कवि देखबैत छथि। ‘खून भेल सस्ता’ सन पाँतिमे मानव-जीवनक वस्तुकरण, आ आजादीक ओ आलोचना — जे केवल नेता-अभिनेताकेँ लाभ देलक — उत्तर-औपनिवेशिक बुर्जुआ राज्यक तीखा समीक्षा थिक। कवि, जन-भाषामे गीत रचि, ग्राम्शीय ‘जैविक बुद्धिजीवी’क भूमिकामे ठाढ़ अछि।
देश-दशा आ गरीबी-गीत वर्ग-चेतना से भरल हय। ‘कलकतवा’-प्रवास गाँव-नगर श्रम-निकास आ ‘श्रम के आरक्षित सेना’ के चित्र हय, जे बिहार के बंगाल के उद्योग ला श्रम-आगार में बदल देत हय। ‘कुर्सी’-गीत राज्य-यन्त्र (नेता, अफसर, पुलिस) के आलोचना हय — अल्थ्यूसर के दमनकारी आ विचारधारात्मक राज्य-उपकरण के याद इहाँ जागत हय। आधार-अधिरचना के रिश्ता साफ हय: आर्थिक आधार (गरीबी, करजा, दहेज) कइसे अधिरचनात्मक बिपत्ति के तय करत हय, से कवि देखावत हथ। ‘खून भेल सस्ता’ जइसन पाँति में मानव-जीवन के वस्तुकरण, आ आजादी के ऊ आलोचना — जे खाली नेता-अभिनेता के लाभ देलक — उत्तर-औपनिवेशिक बुर्जुआ राज्य के तीखा समीक्षा हय। कवि, जन-भाषा में गीत रच के, ग्राम्शी के ‘जैविक बुद्धिजीवी’ के भूमिका में खड़ा हय।
६.२ संरचनावाद ओ रूपवाद · ६.२ संरचनावाद आ रूपवाद
समस्त संग्रह किछु द्विपद-विरोध (binary oppositions) पर संगठित अछि — गाँव/परदेस, गरीब/बड़का, धरती-कुर्पी/कुर्सी, धरमी/भ्रष्ट, अन्न/भूख। ‘कुर्सी’ सत्ताक तरल-संकेतक बनि जाइत अछि, आ कोइलिया-पपीहा विरहक आवर्ती संकेत। रूपवादी दृष्टिएँ टेक संरचनात्मक रीढ़ थिक, आ ब्रुक्स-कथित ‘तनाव’ (tension) इन्द्रिय-सुखद शृंगार-सतह आ नैतिक-सामाजिक अन्तर्धाराक बीच व्याप्त अछि। ‘हम तऽ एक नम्बर के धरमी’ मे नाटकीय व्यंग्य (dramatic irony) अछि — भ्रष्ट वक्ता अनजानहि अपन निन्दा करैत अछि।
सारा संग्रह किछु दुई-पद-विरोध पर बनल हय — गाँव/परदेस, गरीब/बड़का, धरती-कुर्पी/कुर्सी, धरमी/भ्रष्ट, अन्न/भूख। ‘कुर्सी’ सत्ता के तरल-संकेत बन जात हय, आ कोइलिया-पपीहा विरह के आवर्ती संकेत। रूपवादी नजर से टेक संरचनात्मक रीढ़ हय, आ ब्रुक्स-कहल ‘तनाव’ इन्द्रिय-सुखद शृंगार-सतह आ नैतिक-सामाजिक अन्तर्धारा के बीच पसरल हय। ‘हम तऽ एक नम्बर के धरमी’ में नाटकीय व्यंग्य हय — भ्रष्ट वक्ता अनजाने अपन निन्दा करत हय।
६.३ उत्तर-औपनिवेशिक ओ अधीनस्थ-विमर्श · ६.३ उत्तर-औपनिवेशिक आ अधीनस्थ-विमर्श
स्पिवाकक प्रश्न — ‘की अधीनस्थ बाजि सकैत अछि?’ — एतय प्रासंगिक अछि। कवि परित्यक्ता पत्नी ओ भुखायल किसानक स्वर उधार लैत छथि; मुदा एतय प्रतिनिधित्वक मध्यस्थता अछि — एक शिक्षित प्राचार्य अधीनस्थक ‘बदला’ बाजि रहल छथि, जे स्वयं एक विमर्श-समस्या थिक। तथापि बज्जिका-सन अधीनस्थ भाषाक चयन स्वयं एक विऔपनिवेशिक इंगित थिक — हिन्दी-संस्कृत आधिपत्यक विरुद्ध ‘देशी’ वाणीमे लिखब। ‘कलकतवा’-प्रवास औपनिवेशिक आर्थिक भूगोलक उत्तर-जीवन थिक।
स्पिवाक के प्रश्न — ‘का अधीनस्थ बोल सकत हय?’ — इहाँ प्रासंगिक हय। कवि परित्यक्ता पत्नी आ भुखायल किसान के स्वर उधार लेत हथ; लेकिन इहाँ प्रतिनिधित्व के मध्यस्थता हय — एगो पढ़ल-लिखल प्राचार्य अधीनस्थ के ‘बदला’ बोल रहल हथ, जे खुद एगो विमर्श-समस्या हय। तइयो बज्जिका-जइसन अधीनस्थ भाषा के चयन खुदे एगो विऔपनिवेशिक इशारा हय — हिन्दी-संस्कृत के आधिपत्य के खिलाफ ‘देशी’ वाणी में लिखब। ‘कलकतवा’-प्रवास औपनिवेशिक आर्थिक भूगोल के उत्तर-जीवन हय।
६.४ संवाद-सिद्धान्त (बाख्तिन)
ननदि-भौजाई आ पति-पत्नीक संवाद-गीत शाब्दिक रूपेँ संवादधर्मी (dialogic) थिक; एतय अनेक स्वरक बहुस्वरता (polyphony) अछि — नायिका, ननदि, किसान, आ आत्म-व्यंग्य करैत नेताक स्वर। होली-गीतमे उत्सव-विपर्यय (carnivalesque) — बरजोरी आ उलटल-संसारक क्षणिक स्वतन्त्रता — दृष्टिगोचर अछि।
ननदि-भौजाई आ पति-पत्नी के संवाद-गीत शाब्दिक रूप से संवादधर्मी हय; इहाँ अनेक स्वर के बहुस्वरता हय — नायिका, ननदि, किसान, आ आत्म-व्यंग्य करत नेता के स्वर। होली-गीत में उत्सव-विपर्यय — बरजोरी आ उलटल-संसार के क्षणिक स्वतन्त्रता — देखे में आवत हय।
६.५ मौखिकता ओ प्रदर्शन-सिद्धान्त · ६.५ मौखिकता आ प्रदर्शन-सिद्धान्त
ऑङ्ग, पैरी-लॉर्ड आ जुम्थोरक दृष्टिएँ ई रचना मौखिक-सूत्रात्मक (oral-formulaic) थिक — आवर्ती टेक, ‘छलिया’-‘गिरधारी’ सन नाम-सूत्र (epithet), आ स्मृति-सहायक पुनरावृत्ति। पाठ-भेद (mouvance) सेहो अछि — एक्के गीतमे ‘सोहागिन’/‘सुहागिन’क विचलन मौखिक तरलताक प्रमाण थिक। ई गीत ‘पाठ’ नहि, ‘प्रदर्शन’ थिक — वाणीक प्राथमिकता एतय मूल अछि। इएह कारणे सरलता ओ पुनरावृत्तिकेँ दोष नहि, विधा-गुण मानब उचित।
ऑङ्ग, पैरी-लॉर्ड आ जुम्थोर के नजर से ई रचना मौखिक-सूत्रात्मक हय — आवर्ती टेक, ‘छलिया’-‘गिरधारी’ जइसन नाम-सूत्र, आ याद-मददगार दोहराव। पाठ-भेद भी हय — एक्के गीत में ‘सोहागिन’/‘सुहागिन’ के फेर-बदल मौखिक तरलता के प्रमाण हय। ई गीत ‘पाठ’ न, ‘प्रदर्शन’ हय — वाणी के पहिलौती इहाँ मूल हय। एही से सरलता आ दोहराव के दोष न, विधा-गुण मानब ठीक हय।
६.६ स्त्रीवादी संकेत
नायिका-व्यथा-खण्ड एक लैंगिक कर्तृ-स्थिति (gendered subjectivity) प्रस्तुत करैत अछि — परित्यक्ता, प्रवासीक ‘जीवित-वैधव्य’मे जीबैत स्त्रीक अन्तर्जगत। तथापि द्वैत सेहो अछि: श्रृंगार-गीतमे स्त्री-सौन्दर्यक निर्माण प्रायः पुरुष-दृष्टि (male gaze) सँ भेल अछि। एहि द्वन्द्वकेँ पहिचानब एहि पाठक स्त्रीवादी अवदान थिक।
नायिका-व्यथा-खण्ड एगो लैंगिक कर्तृ-स्थिति सामने आनत हय — परित्यक्ता, परदेसी के ‘जीवित-वैधव्य’ में जीत स्त्री के अन्तर्जगत। तइयो द्वैत भी हय: श्रृंगार-गीत में स्त्री-सौन्दर्य के बनावट प्रायः पुरुष-दृष्टि से भेल हय। ए द्वन्द्व के पहचानब ए पाठ के स्त्रीवादी देन हय।
७. तृतीय आयाम: नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा · ७. तेसर आयाम: नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा
ई आयाम गीत सभक ज्ञान-संरचनाकेँ गङ्गेशोत्तरकालीन नैयायिक उपकरणसँ आलोकित करैत अछि। आरम्भहिमे ई स्पष्ट होअय जे ई ज्ञानमीमांसीय पाठ थिक — ई दावा कदापि नहि जे लोक-कवि सचेत रूपेँ नव्य-न्यायक प्रयोग कएलनि; अपितु ई जे काव्य-बोधमे जे तार्किक-आन्वयिक ढाँचा अन्तर्निहित अछि, ओ एहि दृष्टिएँ विशेष स्पष्टतासँ उद्घाटित होइत अछि।
ई आयाम गीत सब के ज्ञान-संरचना के गङ्गेशोत्तरकालीन नैयायिक उपकरण से आलोकित करत हय। शुरुए में ई साफ रहे कि ई ज्ञानमीमांसीय पाठ हय — ई दावा कहियो न कि लोक-कवि जान-बूझ के नव्य-न्याय के प्रयोग कयेलन; बल्कि ई कि काव्य-बोध में जे तार्किक-आन्वयिक ढाँचा भीतरे हय, ऊ ए नजर से खास साफी से खुलत हय।
७.१ शब्द-बोध, शक्ति-ग्रह ओ देशज-संकेत · ७.१ शब्द-बोध, शक्ति-ग्रह आ देशज-संकेत
नैयायिकक मतेँ शाब्द-बोध आकाङ्क्षा, योग्यता, आसत्ति (सन्निधि) ओ तात्पर्य — एहि चारि हेतुसँ उत्पन्न होइत अछि, आ पद-पदार्थ-सम्बन्धक ज्ञान (शक्ति-ग्रह) ओकर पूर्ववर्ती कारण थिक। शक्ति-ग्रहक मुख्य उपाय व्यवहार थिक — वृद्ध-व्यवहारसँ बालक संकेत ग्रहण करैत अछि। एहि दृष्टिएँ लोक-गीतक देशज पद (‘डगरिया’, ‘बालम’, ‘सँइया’) क शक्ति-ग्रह ओहि प्रदर्शन-समुदायक व्यवहार-परम्परासँ होइत अछि — गीत स्वयं एक संकेत-ग्राहक सामुदायिक व्यवहार बनि जाइत अछि। लोक-गीतक विरल-वाक्य-रचनामे आकाङ्क्षाक पूर्ति बहुधा प्रकरण ओ तात्पर्यसँ होइत अछि; रिक्त पद साझा सांस्कृतिक प्रकरणसँ भरैत अछि।
नैयायिक के मत से शाब्द-बोध आकाङ्क्षा, योग्यता, आसत्ति (सन्निधि) आ तात्पर्य — ए चार हेतु से पैदा होत हय, आ पद-पदार्थ-सम्बन्ध के ज्ञान (शक्ति-ग्रह) ओकर पहिलौका कारण हय। शक्ति-ग्रह के मुख्य उपाय व्यवहार हय — बड़-बुजुर्ग के व्यवहार से बालक संकेत ग्रहण करत हय। ए नजर से लोक-गीत के देशज पद (‘डगरिया’, ‘बालम’, ‘सँइया’) के शक्ति-ग्रह ओही प्रदर्शन-समुदाय के व्यवहार-परम्परा से होत हय — गीत खुदे एगो संकेत-ग्राहक सामुदायिक व्यवहार बन जात हय। लोक-गीत के विरल-वाक्य-रचना में आकाङ्क्षा के पूर्ति जादेतर प्रकरण आ तात्पर्य से होत हय; खाली पद साझा सांस्कृतिक प्रकरण से भर जात हय।
७.२ विषयता-निरूपण: विरह-ज्ञानक आन्वयिक संरचना · ७.२ विषयता-निरूपण: विरह-ज्ञान के आन्वयिक संरचना
गङ्गेशोत्तर न्यायमे प्रत्येक ज्ञान अपन विषयक ‘विषयता’-सम्बन्धसँ निरूपित होइत अछि, आ ई विषयता त्रिविध अछि — विशेष्यता, प्रकारता ओ संसर्गता। नायिकाक ज्ञान ‘मम पतिः प्रोषितः’ (हमर पति परदेस गेलाह) केँ लिअ: एतय विशेष्यता पति-निष्ठ थिक, प्रकारता प्रोषितत्व (वा वियोग)-निष्ठ, आ संसर्गता ओहि सम्बन्धमे जे विशेष्य ओ प्रकारकेँ जोड़ैत अछि। समग्र ज्ञान एहि त्रिविध-विषयता-निरूपक थिक। काव्य-प्रभावक कुंजी इएह — पाठक/श्रोताक अनुगामी ज्ञान जखन नायिकाक विरहकेँ ओहि विशिष्ट प्रकारता (करुण-अनुकूल) सँ विषय बनबैत अछि, तखन रस-निष्पत्ति होइत अछि। एना विषयता-सिद्धान्त रस-संचारक आन्वयिक व्याख्या दैत अछि।
गङ्गेशोत्तर न्याय में हर ज्ञान अपन विषय के ‘विषयता’-सम्बन्ध से निरूपित होत हय, आ ई विषयता तीन तरह के हय — विशेष्यता, प्रकारता आ संसर्गता। नायिका के ज्ञान ‘मम पतिः प्रोषितः’ (हमर पति परदेस गेलन) के लीं: इहाँ विशेष्यता पति-निष्ठ हय, प्रकारता प्रोषितत्व (या वियोग)-निष्ठ, आ संसर्गता ओही सम्बन्ध में जे विशेष्य आ प्रकार के जोड़त हय। पूरा ज्ञान ए तीन-तरह-विषयता-निरूपक हय। काव्य-प्रभाव के चाबी इहे — पाठक/श्रोता के अनुगामी ज्ञान जब नायिका के विरह के ओही खास प्रकारता (करुण-अनुकूल) से विषय बनावत हय, तब रस-निष्पत्ति होत हय। अइसे विषयता-सिद्धान्त रस-संचार के आन्वयिक व्याख्या देत हय।
७.३ अभाव-ज्ञान: संसर्गाभाव, प्रतियोगिता ओ अवच्छेदक · ७.३ अभाव-ज्ञान: संसर्गाभाव, प्रतियोगिता आ अवच्छेदक
विरहक केन्द्रीय ज्ञान ‘पतिः अत्र नास्ति’ एक अभाव-ज्ञान थिक, आ एकर सूक्ष्म-विश्लेषण अवच्छेदक-तन्त्रसँ होइत अछि। ई संसर्गाभाव थिक (अन्योन्याभाव नहि) — पति ‘संयोग-सम्बन्धेँ’ अँगनामे नहि अछि। एतय प्रतियोगी पति, प्रतियोगिता-अवच्छेदक-धर्म पतित्व, आ अवच्छेदक-सम्बन्ध संयोग (वा सामीप्य) थिक; अभावक अधिकरण अँगना/गृह। काव्य-मर्म ई जे सामान्यतः अभाव अनुभवक विषय भेनाइ कठिन, मुदा एतय कवि ओहि संसर्गाभावकेँ उद्दीपन (सूना अँगना, मौन सेज) द्वारा प्रत्यक्ष-कल्प इन्द्रिय-गोचर बना दैत छथि — अभावक ई ‘विषयीकरण’ एहि खण्डक काव्य-शक्ति थिक।
विरह के केन्द्रीय ज्ञान ‘पतिः अत्र नास्ति’ एगो अभाव-ज्ञान हय, आ एकर सूक्ष्म-विश्लेषण अवच्छेदक-तन्त्र से होत हय। ई संसर्गाभाव हय (अन्योन्याभाव न) — पति ‘संयोग-सम्बन्ध से’ अँगना में न हय। इहाँ प्रतियोगी पति, प्रतियोगिता-अवच्छेदक-धर्म पतित्व, आ अवच्छेदक-सम्बन्ध संयोग (या सामीप्य) हय; अभाव के अधिकरण अँगना/घर। काव्य-मरम ई कि आम तौर पर अभाव अनुभव के विषय बने में कठिन, लेकिन इहाँ कवि ओही संसर्गाभाव के उद्दीपन (सूना अँगना, चुप सेज) से परतछ-कल्प इन्द्रिय-गोचर बना देत हथ — अभाव के ई ‘विषयीकरण’ ए खण्ड के काव्य-शक्ति हय।
७.४ उपमा-रूपक: मुख्यार्थ-बाध, लक्षणा-बीज ओ गौणी वृत्ति · ७.४ उपमा-रूपक: मुख्यार्थ-बाध, लक्षणा-बीज आ गौणी वृत्ति
रूपक-स्थलमे नैयायिक-प्रक्रिया एना अछि: ‘मन के आग’ मे मुख्यार्थ (मनमे वास्तविक अग्नि) क अन्वय-अनुपपत्ति (बाध) होइत अछि; ई मुख्यार्थ-बाध लक्षणाक बीज थिक। तखन लक्षणासँ प्रवृत्ति-निमित्त सादृश्य (सन्तापकत्व) क आश्रयेँ गौणी वृत्ति द्वारा ‘सन्तापक-मानस-वृत्ति’ लक्षित होइत अछि। ‘नेहिया के डोर’ मे बन्धकत्व-सादृश्य प्रवृत्ति-निमित्त। उपमा-स्थलमे सादृश्य-ज्ञान स्वयं उपमान-प्रमाणक फल थिक (सादृश्य-विशिष्ट-पिण्ड-ज्ञान)। नव्य-नैयायिक एहि समस्त प्रक्रियाकेँ शक्ति-लक्षणाक भीतर सम्पन्न मानि, आलंकारिकक पृथक् ‘व्यंजना-वृत्ति’क आवश्यकताक प्रतिरोध करैत छथि।
रूपक-ठाम नैयायिक-प्रक्रिया अइसन हय: ‘मन के आग’ में मुख्यार्थ (मन में सचमुच के आग) के अन्वय-अनुपपत्ति (बाध) होत हय; ई मुख्यार्थ-बाध लक्षणा के बीज हय। तब लक्षणा से प्रवृत्ति-निमित्त सादृश्य (सन्तापकत्व) के आश्रय ले के गौणी वृत्ति से ‘सन्तापक-मानस-वृत्ति’ लक्षित होत हय। ‘नेहिया के डोर’ में बन्धकत्व-सादृश्य प्रवृत्ति-निमित्त। उपमा-ठाम सादृश्य-ज्ञान खुदे उपमान-प्रमाण के फल हय (सादृश्य-विशिष्ट-पिण्ड-ज्ञान)। नव्य-नैयायिक ए पूरा प्रक्रिया के शक्ति-लक्षणा के भीतरे पूरा मान के, आलंकारिक के अलग ‘व्यंजना-वृत्ति’ के जरूरत के विरोध करत हथ।
७.५ व्याप्ति, उपाधि ओ सव्यभिचार: सूक्ति-गीतमे · ७.५ व्याप्ति, उपाधि आ सव्यभिचार: सूक्ति-गीत में
सूक्ति-गीतक तर्क-संरचना व्याप्ति-विमर्शसँ प्रकाशित होइत अछि। गङ्गेशक सिद्धान्त-लक्षण अनुसार व्याप्ति ‘साध्याभाववद्-अवृत्तित्व’ थिक। “जुल्म करे जे, सब सुख पावे” — पाँति एक व्याप्ति-कल्प सामान्य-नियम (अत्याचार-कर्तृत्व → सुख-प्राप्ति) प्रस्तुत करैत अछि; मुदा ई लोक-अनुभव-विरुद्ध थिक, तेँ वस्तुतः सव्यभिचार (व्यभिचार-दुष्ट) अछि — साध्याभाववान् (दुःखी अत्याचारी) क सत्तासँ हेतु व्यभिचरित होइत अछि, आ एतय ‘धर्म’-रूप उपाधि सेहो सम्भव। कविक चातुर्य इएह जे ओ एहि सव्यभिचारकेँ जानि-बूझि निश्चित-व्याप्तिक भाषामे कहैत छथि; श्रोता जखन ओहि आनैकान्तिकताकेँ पहिचानैत अछि, तखन आक्रोश-रसक व्यंग्य फुटैत अछि। एना विषम-नैतिक यथार्थ एक विडम्बित छद्म-व्याप्तिक रूपमे व्यक्त होइत अछि।
सूक्ति-गीत के तर्क-संरचना व्याप्ति-विमर्श से खुलत हय। गङ्गेश के सिद्धान्त-लक्षण के मुताबिक व्याप्ति ‘साध्याभाववद्-अवृत्तित्व’ हय। “जुल्म करे जे, सब सुख पावे” — पाँति एगो व्याप्ति-कल्प सामान्य-नियम (अत्याचार-कर्तृत्व → सुख-प्राप्ति) सामने रखत हय; लेकिन ई लोक-अनुभव-विरुद्ध हय, एही से दरअसल सव्यभिचार (व्यभिचार-दुष्ट) हय — साध्याभाववान् (दुःखी अत्याचारी) के सत्ता से हेतु व्यभिचरित होत हय, आ इहाँ ‘धरम’-रूप उपाधि भी सम्भव। कवि के चतुराई इहे कि ऊ ए सव्यभिचार के जान-बूझ के निश्चित-व्याप्ति के भाषा में कहत हथ; श्रोता जब ओही आनैकान्तिकता के पहचानत हय, तब आक्रोश-रस के व्यंग्य फूटत हय। अइसे विषम-नैतिक यथार्थ एगो विडम्बित छद्म-व्याप्ति के रूप में सामने आवत हय।
७.६ ध्वनि-वि-अनुमिति-वाद: कुबजा-प्रसंगक परामर्श-विश्लेषण · ७.६ ध्वनि-आ-अनुमिति-वाद: कुबजा-प्रसंग के परामर्श-विश्लेषण
व्यंजनाकेँ स्वतन्त्र वृत्ति मानब आलंकारिक-पक्ष थिक; नैयायिक (ओ महिमभट्ट-सन ‘अनुमिति-वादी’) एकरा अनुमानमे न्यूनीकृत करैत छथि। कुबजा-प्रसंगकेँ अनुमान-रूपेँ एना पुनर्गठित कयल जा सकैत अछि — पक्ष: कृष्ण; साध्य: राधा-उपेक्षा (अन्यासक्ति); हेतु: कुबजा-अनुरञ्जन-श्रवण सह राधाक उलाहना; व्याप्ति: ‘यत्र अन्य-नायिका-अनुरञ्जनम्, तत्र स्व-नायिका-उपेक्षा’। लिङ्ग-परामर्शसँ व्यंग्यार्थ ‘अनुमिति’ बनि जाइत अछि — पृथक् वृत्ति अनावश्यक। तथापि आनन्दवर्धन-पक्षक प्रत्युत्तर ध्यातव्य: काव्यक चमत्कार अक्रम (एकहि क्षणमे, रसात्मक) थिक, जखन कि अनुमिति क्रम-भावी (परामर्श-पूर्वक) थिक; तेँ ई न्यूनीकरण एक अनुभूति-मूलक मूल्य चुकबैत अछि। दुनू पक्षकेँ यथावत् राखब समीचीन।
व्यंजना के स्वतन्त्र वृत्ति मानब आलंकारिक-पक्ष हय; नैयायिक (आ महिमभट्ट-जइसन ‘अनुमिति-वादी’) एकरा अनुमान में घटा देत हथ। कुबजा-प्रसंग के अनुमान-रूप में अइसे फिर-बनावल जा सकत हय — पक्ष: कृष्ण; साध्य: राधा-उपेक्षा (अन्यासक्ति); हेतु: कुबजा-अनुरञ्जन-श्रवण संगे राधा के उलाहना; व्याप्ति: ‘यत्र अन्य-नायिका-अनुरञ्जनम्, तत्र स्व-नायिका-उपेक्षा’। लिङ्ग-परामर्श से व्यंग्यार्थ ‘अनुमिति’ बन जात हय — अलग वृत्ति के जरूरत न। तइयो आनन्दवर्धन-पक्ष के जवाब याद रखे के हय: काव्य के चमत्कार अक्रम (एक्के छन में, रसात्मक) हय, जब कि अनुमिति क्रम-भावी (परामर्श-पूर्वक) हय; एही से ई घटावब एगो अनुभूति-मूलक मूल्य चुका देत हय। दुनू पक्ष के जस के तस रखब ठीक।
७.७ स्मृति, संस्कार ओ उद्बोधक: विरह-गीतक स्मृति-विज्ञान · ७.७ स्मृति, संस्कार आ उद्बोधक: विरह-गीत के स्मृति-विज्ञान
विरह-गीत मूलतः स्मृति-जगाबनिहार थिक। नैयायिक-प्रक्रियामे अनुभवसँ संस्कार, आ संस्कारसँ उद्बोधक-सहायेँ स्मृति उत्पन्न होइत अछि। एतय प्रकृति-उद्दीपन (कोइलिया-कूक, चन्दा, फागुन) उद्बोधकक कार्य करैत अछि — ओ प्रवासित प्रियक पूर्व-अनुभव-जन्य संस्कारकेँ जगाबि स्मृति-ज्ञान उत्पन्न करैत अछि, आ ओहि स्मृतिएँ विरह-वेदना तीव्र होइत अछि। एना उद्दीपन-विभावक काव्य-भूमिका नैयायिक स्मृति-कारण-व्यवस्था (संस्कार + उद्बोधक) क समानान्तर अछि।
विरह-गीत मूल रूप से स्मृति-जगावे वला हय। नैयायिक-प्रक्रिया में अनुभव से संस्कार, आ संस्कार से उद्बोधक-मदद से स्मृति पैदा होत हय। इहाँ प्रकृति-उद्दीपन (कोइलिया-कूक, चन्दा, फागुन) उद्बोधक के काम करत हय — ऊ परदेसी प्रिय के पहिलौका-अनुभव-जन्य संस्कार के जगा के स्मृति-ज्ञान पैदा करत हय, आ ओही स्मृति से विरह-वेदना तेज होत हय। अइसे उद्दीपन-विभाव के काव्य-भूमिका नैयायिक स्मृति-कारण-व्यवस्था (संस्कार + उद्बोधक) के समानान्तर हय।
७.८ प्रामाण्य-वाद: लोक-गीतक परतः प्रामाण्य · ७.८ प्रामाण्य-वाद: लोक-गीत के परतः प्रामाण्य
नैयायिक-मतेँ ज्ञानक प्रामाण्य परतः थिक — ओ संवाद वा प्रवृत्ति-सामर्थ्यसँ ज्ञात होइत अछि (मीमांसकक स्वतः-प्रामाण्यक विपरीत)। लोक-गीत एक आप्त-वाक्य/लोक-शब्द-प्रमाण थिक; सामाजिक दुःखक विषयमे एकर प्रामाण्य ओहि समुदायक सम्वादी अनुभव (लोक-संवाद) सँ परतः सिद्ध होइत अछि। एहि अर्थेँ गीत-गायक-श्रोताक साझा प्रत्यभिज्ञा ओहि साक्ष्यक प्रामाण्य-आपादक थिक — दुःखक सामूहिक सत्यापन।
नैयायिक-मत से ज्ञान के प्रामाण्य परतः हय — ऊ संवाद या प्रवृत्ति-सामर्थ्य से जानल जात हय (मीमांसक के स्वतः-प्रामाण्य के उल्टा)। लोक-गीत एगो आप्त-वाक्य/लोक-शब्द-प्रमाण हय; सामाजिक दुःख के बारे में एकर प्रामाण्य ओही समुदाय के सम्वादी अनुभव (लोक-संवाद) से परतः सिद्ध होत हय। ए माने में गीत-गायक-श्रोता के साझा प्रत्यभिज्ञा ओही साक्ष्य के प्रामाण्य-आपादक हय — दुःख के सामूहिक सत्यापन।
पुनः स्मरणीय: उपर्युक्त समस्त नैयायिक-विश्लेषण गीत सभक ज्ञान-संरचनाक ‘आलोक’ थिक, कवि-चेतनाक इतिहास नहि। लोक-कवि रस-सिद्ध छथि, तर्क-सिद्ध नहि; तथापि हिनक काव्य-बोधक आन्तर आन्वयिक व्यवस्था एहि दर्शन-दृष्टिएँ जे स्पष्टतासँ उजागर होइत अछि, ओ स्वयं एहि लोक-वाणीक गूढ़ ज्ञान-गरिमाक प्रमाण थिक।
फिर से याद रखे के: ऊपर के सब नैयायिक-विश्लेषण गीत सब के ज्ञान-संरचना के ‘आलोक’ हय, कवि-चेतना के इतिहास न। लोक-कवि रस-सिद्ध हथ, तर्क-सिद्ध न; तइयो हुनकर काव्य-बोध के भीतरी आन्वयिक व्यवस्था ए दर्शन-नजर से जे साफी से उजागर होत हय, ऊ खुदे ए लोक-वाणी के गूढ़ ज्ञान-गरिमा के प्रमाण हय।
८. चतुर्थ आयाम: समान्तर-इतिहास-रूपरेखा · ८. चौथा आयाम: समान्तर-इतिहास-रूपरेखा
विदेह समान्तर-इतिहास-दृष्टिएँ ई कृति एक प्रति-कैननिक (counter-canonical) पाठ थिक। बज्जिका स्वयं एक अनुसूची-बाह्य, हिन्दी (राजभाषा) आ मैथिली (अनुसूचित) क बीच दोहरा-अधीनस्थ भाषा थिक; प्रस्तुत संग्रह एक भाषाक ओ प्रयास थिक जे संस्थागत साहित्य-अकादमी-कैननसँ बाहर रहि, स्वयंकेँ साहित्यमे लिखि रहल अछि — हाशियासँ लिखल साहित्येतिहास।
विदेह समान्तर-इतिहास-नजर से ई कृति एगो प्रति-कैननिक पाठ हय। बज्जिका खुदे एगो अनुसूची-बाहर, हिन्दी (राजभाषा) आ मैथिली (अनुसूचित) के बीच दुहरा-अधीनस्थ भाषा हय; ई संग्रह एगो भाषा के ऊ प्रयास हय जे संस्थागत साहित्य-अकादमी-कैनन से बाहर रह के, खुद के साहित्य में लिख रहल हय — हाशिया से लिखल साहित्येतिहास।
स्वर-पुनरुद्धार: स्त्री-स्वर — नायिका-व्यथा-खण्ड परित्यक्ता स्त्रीक, नैहर-ससुरक बीचक द्वैधावस्था (गवना-गीत), आ प्रवासीक ‘जीवित-वैधव्य’क साक्ष्य दैत अछि (यद्यपि रचयिता-मध्यस्थता स्मरणीय)। श्रमिक-किसान-स्वर — कृषि आ गरीबी-खण्ड मेटाओल श्रमिक, प्रवासी ओ करजा-बद्ध किसानक इतिहास-नीचाँसँ (history from below) प्रस्तुत करैत अछि। राजनीतिक गीत उत्तर-औपनिवेशिक राज्यक जन-आलोचना थिक — आधिकारिक राष्ट्रवादी आख्यानक विरुद्ध एक समान्तर इतिहास (आजादीक ओ आलोचना जे दीन-दुखियाकेँ छलक)।
स्वर-पुनरुद्धार: स्त्री-स्वर — नायिका-व्यथा-खण्ड परित्यक्ता स्त्री के, नैहर-ससुर के बीच के द्वैधावस्था (गवना-गीत), आ परदेसी के ‘जीवित-वैधव्य’ के साक्ष्य देत हय (यद्यपि रचयिता-मध्यस्थता याद रखे के हय)। श्रमिक-किसान-स्वर — कृषि आ गरीबी-खण्ड मेटावल श्रमिक, परदेसी आ करजा-बद्ध किसान के इतिहास-नीचे से सामने आनत हय। राजनीतिक गीत उत्तर-औपनिवेशिक राज्य के जन-आलोचना हय — आधिकारिक राष्ट्रवादी आख्यान के खिलाफ एगो समान्तर इतिहास (आजादी के ऊ आलोचना जे दीन-दुखिया के छलक)।
बज्जिकाक आ मैथिलीक — दुनूक प्रति-कैननिक संघर्षक साम्य एतय स्पष्ट अछि; अधीनस्थ भाषा सभक क्षैतिज एकजुटता एहि पाठक नैतिक केन्द्र थिक। साक्ष्य-मूल्य: समान्तर इतिहासक रूपमे ई गीत लोक-स्मृतिक अभिलेख थिक, जे बीसम शताब्दीक उत्तरार्धक ग्रामीण बिहारक भाव-आर्थिक बनावटकेँ सुरक्षित रखैत अछि। भारतवाणी (CIIL) क अंकीकरण स्वयं एक समान्तर-अभिलेखीय कर्म थिक। लोकतान्त्रिक रूप: गीत मौखिक-प्रदर्शन लेल रचल — साहित्य एक ‘साझी सम्पत्ति’ (commons), न कि अभिजन-सम्पदा; एकर नुक्कड़-सभा-मूल इएह प्रमाणित करैत अछि।
बज्जिका के आ मैथिली के — दुनू के प्रति-कैननिक संघर्ष के साम्य इहाँ साफ हय; अधीनस्थ भाषा सब के क्षैतिज एकजुटता ए पाठ के नैतिक केन्द्र हय। साक्ष्य-मूल्य: समान्तर इतिहास के रूप में ई गीत लोक-स्मृति के अभिलेख हय, जे बीसम शताब्दी के उत्तरार्ध के गाँव-बिहार के भाव-आर्थिक बनावट के सुरक्षित रखत हय। भारतवाणी (CIIL) के अंकीकरण खुदे एगो समान्तर-अभिलेखीय काम हय। लोकतान्त्रिक रूप: गीत मौखिक-प्रदर्शन ला रचल — साहित्य एगो ‘साझी सम्पत्ति’, न कि अभिजन-सम्पदा; एकर नुक्कड़-सभा-मूल इहे साबित करत हय।
आत्म-आलोचनात्मक टीप (समान्तर-नीति-अनुरूप): लेखकक अपन भाषिक दावा — जे बज्जिका पालि-वंशज ओ मैथिली-भोजपुरीक जननी थिक — प्रति-कैननक भीतरहि ओहि आधिपत्यकारी कैनन-निर्माण-तर्ककेँ दोहरा दैत अछि, जकर विरोध समान्तर आन्दोलन करैत अछि। अर्थात्, बज्जिकाक गरिमा प्राचीनता वा प्राथम्यक ऊर्ध्व-दावासँ स्थापित करब, ओकर समान-किन्तु-भिन्न अधीनस्थ अस्मिताक क्षैतिज गौरवसँ कम वांछनीय थिक। समान्तर-इतिहास-दृष्टि भाषा-सभक क्षैतिज सौहार्दकेँ प्राथम्य-दावा पर वरीयता दैत अछि।
आत्म-आलोचनात्मक टीप (समान्तर-नीति के अनुरूप): लेखक के अपन भाषिक दावा — कि बज्जिका पालि-वंशज आ मैथिली-भोजपुरी के जननी हय — प्रति-कैनन के भीतरे ओही आधिपत्यकारी कैनन-निर्माण-तर्क के दोहरा देत हय, जेकर विरोध समान्तर आन्दोलन करत हय। मतलब, बज्जिका के गरिमा प्राचीनता या प्राथम्य के ऊर्ध्व-दावा से खड़ी करब, ओकर समान-लेकिन-भिन्न अधीनस्थ पहचान के क्षैतिज गौरव से कम वांछनीय हय। समान्तर-इतिहास-नजर भाषा सब के क्षैतिज सौहार्द के प्राथम्य-दावा पर तरजीह देत हय।
९. समन्वित मूल्यांकन: शिल्प, उपलब्धि ओ सीमा · ९. समन्वित मूल्यांकन: शिल्प, उपलब्धि आ सीमा
शिल्प-दृष्टिएँ संग्रहक रीढ़ टेक थिक; बज्जिका क्रिया-पदक सघन बुनाबट एकर भाषिक पहचान दैत अछि; ग्राम्य-प्रतीक (मटुकिया, बँसुरिया, कोइलिया, चन्दा, धान, अलमुनियाक थरिया) आ ध्वनि-अलंकार एकर लोक-रस भरैत अछि। एक तनाव सेहो अछि — कतहु तत्सम-प्रधान पदावली (‘रणित ललित नव कनक नूपुरवा’) देशज मुहावरासँ पूर्ण एकरूप नहि भए पबैत, जाहिसँ किछु गीतक एकरसता शिथिल भए जाइत अछि।
शिल्प के नजर से संग्रह के रीढ़ टेक हय; बज्जिका क्रिया-पद के सघन बुनावट एकर भाषिक पहचान देत हय; गाँव-घर के प्रतीक (मटुकिया, बँसुरिया, कोइलिया, चन्दा, धान, अलमुनिया के थरिया) आ ध्वनि-अलंकार एकर लोक-रस भरत हय। एगो तनाव भी हय — कहीं तत्सम-प्रधान पदावली (‘रणित ललित नव कनक नूपुरवा’) देशज मुहावरा से पूरा एक न हो पावे, जेकरा से किछु गीत के एकरसता ढीली हो जात हय।
उपलब्धि: सबसँ पैघ उपलब्धि — विविध विषय ओ रसक एक गेय गीत-कोश, जे लेखकक घोषित लक्ष्य छल। सामाजिक चेतना, जतय विरह प्रवास-यथार्थमे बदलि जाइत आ राजनीतिक व्यंग्य प्रत्यक्ष अछि, एकर स्थायी मूल्य थिक। लोक-जीवनसँ गहन जुड़ाव आ ग्राम्य प्रतीकक प्रामाणिकता एकरा सच्चा लोक-दस्तावेज बनबैत अछि।
उपलब्धि: सबसे बड़ उपलब्धि — भाँति-भाँति के बिषय आ रस के एगो गावे वला गीत-कोश, जे लेखक के घोषित लक्ष्य रहल। सामाजिक चेतना, जहाँ विरह परदेस-यथार्थ में बदल जात आ राजनीतिक व्यंग्य सीधा हय, एकर स्थायी मूल्य हय। लोक-जीवन से गहिर जुड़ाव आ गाँव-घर के प्रतीक के सच्चाई एकरा सच्चा लोक-दस्तावेज बनावत हय।
सीमा: संग्रह असमान अछि — किछु राजनीतिक ओ गरीबी-गीत काव्यसँ अधिक प्रचारात्मक-उपदेशात्मक (वाच्य, वक्रता ओ ध्वनिसँ रहित) भए जाइत अछि। कृष्ण ओ श्रृंगार-खण्डक अनेक गीत विद्यापति-सूरक परिचित भूमि पर चलैत अछि। प्रतीक-पुनरावृत्ति ओ तत्सम-देशज पदावलीक असंगति खटकैत अछि। भूमिकाक भाषिक दावा सिद्धिसँ अधिक आग्रह थिक, आ प्रतिनिधित्वक मध्यस्थता एक विमर्श-समस्या थिक। तथापि सरलता, टेक-पुनरावृत्ति ओ स्पष्ट भाव — ई सभटा गेयताक अनिवार्य शर्त थिक; एहन गीत मंच पर गाबल जएबाक लेल रचल, न कि केवल पढ़ल जएबाक लेल।
सीमा: संग्रह असमान हय — किछु राजनीतिक आ गरीबी-गीत काव्य से जादे प्रचार-वला आ उपदेश-वला (वाच्य, वक्रता आ ध्वनि से रहित) बन जात हय। कृष्ण आ श्रृंगार-खण्ड के अनेक गीत विद्यापति-सूर के जानल जमीन पर चलत हय। प्रतीक-दोहराव आ तत्सम-देशज पदावली के बेमेली खटकत हय। भूमिका के भाषिक दावा सिद्धि से जादे आग्रह हय, आ प्रतिनिधित्व के मध्यस्थता एगो विमर्श-समस्या हय। तइयो सरलता, टेक-दोहराव आ साफ भाव — ई सब गेयता के जरूरी शर्त हय; अइसन गीत मंच पर गावे ला बनल हय, न कि खाली पढ़े ला।
१०. उपसंहार
चारू आयामक समन्वयसँ स्पष्ट अछि जे ‘बज्जिका गीत-संगीत’ एक बहुस्तरीय कृति थिक — रस-ध्वनि-वक्रोक्तिक दृष्टिएँ ओ लोक-रस-कोश, पाश्चात्य दृष्टिएँ ओ वर्ग-चेतन, संवादधर्मी ओ प्रदर्शन-मूलक पाठ, नव्य-न्यायक दृष्टिएँ अभाव-ज्ञान ओ अनुमान-व्याप्तिसँ बुनल भाव-संरचना, आ समान्तर-इतिहासक दृष्टिएँ एक प्रति-कैननिक, अधीनस्थ-स्वर-वाहक दस्तावेज।
चारू आयाम के मेल से साफ हय कि ‘बज्जिका गीत-संगीत’ एगो बहुस्तरीय कृति हय — रस-ध्वनि-वक्रोक्ति के नजर से ऊ लोक-रस-कोश, पाश्चात्य नजर से ऊ वर्ग-चेतन, संवादधर्मी आ प्रदर्शन-मूलक पाठ, नव्य-न्याय के नजर से अभाव-ज्ञान आ अनुमान-व्याप्ति से बुनल भाव-संरचना, आ समान्तर-इतिहास के नजर से एगो प्रति-कैननिक, अधीनस्थ-स्वर-वाहक दस्तावेज।
एकर स्थायी मूल्य दुहरा अछि — एक दिस ई बिहारक प्रवास ओ गरीबीक एक लोक-साहित्यिक साक्ष्य थिक, आ दोसर दिस मैथिलीक सहोदर लोक-वाणीक तुलनात्मक अध्ययन तथा समान्तर-साहित्यिक प्रश्नक दृष्टिएँ एक उपयोगी मूल-पाठ। डॉ० रामेश्वर प्रसादक ई संकलन ओहि परम्पराक थिक, जतय कवि जन-साधारणक दिल-दिमागमे अपन भाषाक पहचान बनएबाक लेल गीतकेँ सहज-स्वाभाविक स्रोत मानैत छथि। विदेह समान्तर आन्दोलन जाहि प्रति-कैननकेँ रचबाक स्वप्न देखैत अछि, ई कृति ओहि समान्तर वाङ्मयक एक प्रामाणिक अंग थिक — आ इएह कारणे ओ हमर आलोचकीय आदर-योग्य अछि।
एकर स्थायी मूल्य दुहरा हय — एक ओर ई बिहार के परदेस आ गरीबी के एगो लोक-साहित्यिक साक्ष्य हय, आ दोसर ओर मैथिली के सहोदर लोक-वाणी के तुलनात्मक अध्ययन आ समान्तर-साहित्यिक प्रश्न के नजर से एगो जरूरी मूल-पाठ हय। डॉ० रामेश्वर प्रसाद के ई संग्रह ओही परम्परा के हय, जहाँ कवि जन-साधारण के दिल-दिमाग में अपन भाषा के पहचान बनावे ला गीत के सहज-स्वाभाविक स्रोत माने हथ। विदेह समान्तर आन्दोलन जेकर प्रति-कैनन के रचे के सपना देखत हय, ई कृति ओही समान्तर वाङ्मय के एगो प्रामाणिक अंग हय — आ एही से ऊ हमर आलोचकीय आदर के लायक हय।
समीक्षा-पद्धति: एहि अनुशीलनमे भारतीय काव्यशास्त्र (रस-ध्वनि-वक्रोक्ति), पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्त, नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा ओ विदेह समान्तर-इतिहास-रूपरेखा — एहि चारि आयामकेँ आधार बनाओल गेल अछि। सभटा उद्धरण मूल पोथीसँ यथावत् लेल गेल आ ओकरा विश्लेषणक हेतु सीमित राखल गेल अछि।
समीक्षा-पद्धति: ए अनुशीलन में भारतीय काव्यशास्त्र (रस-ध्वनि-वक्रोक्ति), पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्त, नव्य-न्याय-ज्ञानमीमांसा आ विदेह समान्तर-इतिहास-रूपरेखा — ए चार आयाम के आधार बनावल गेल हय। सब उद्धरण मूल पोथी से जस के तस लेल गेल आ ओकरा बिश्लेषण खातिर सीमित रखल गेल हय।
खण्ड २ : निकट-पाठ, गीत-विन्यास आ सामाजिक-सांस्कृतिक विवेचन
आलोचनात्मक पद्धति · आलोचना के पद्धति
आलोचनात्मक पद्धतिमे तीन स्तर राखल गेल अछि: पहिल, निकट-पाठ—शब्द, बिम्ब, पुनरावृत्ति, लय, टेक, संवाद आ कथ्यक सूक्ष्म अध्ययन; दोसर, भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टिसँ शृंगार, करुण, हास्य, वीर आ लोक-भक्तिक भाव-संरचनाक परीक्षण; तेसर, सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिसँ ग्राम्य जीवन, स्त्री-अनुभव, गरीबी, कृषि, सत्ता-चिन्ता, भाषा-अस्मिता आ सामुदायिक स्मृतिक अर्थ-विस्तार।
आलोचनात्मक पद्धतिमे तीन स्तर राखल गेल हय: पहिल, निकट-पाठ—शब्द, बिम्ब, पुनरावृत्ति, लय, टेक, संवाद आ कथ्यक सूक्ष्म अध्ययन; दोसर, भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टिसे शृंगार, करुण, हास्य, वीर आ लोक-भक्तिक भाव-संरचनाक परीक्षण; तेसर, सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टिसे ग्राम्य जीवन, स्त्री-अनुभव, गरीबी, कृषि, सत्ता-चिन्ता, भाषा-अस्मिता आ सामगरयिक स्मृतिक अर्थ-विस्तार।
१. ग्रन्थ-स्वरूप: गीत, कविता आ लोकधुनक संगम · १. पोथी के रूप आ बनावट
अब हम कइसे चलूँ डगरिया, लोगवा नजर लगावे ना।।
‘बज्जिका गीत-संगीत’क मूल शक्ति ओकर गेयता अछि। ई साधारण कविता-संग्रह नहि, बल्कि एहन गीत-संग्रह अछि जाहिमे पंक्ति-रचना, ध्वनि, टेक, पुनरावृत्ति आ सम्बोधन सभ मिलि गायनक स्वाभाविक अवकाश बनबैत अछि। अनेक गीतमे पंक्ति छोट अछि, ध्वन्यात्मक लय स्पष्ट अछि आ अन्तिम पद पुनरावृत्तिमूलक अछि। एहि कारण पाठक पढ़ैत-पढ़ैत भीतर सँ धुन सुनबाक अनुभव करैत अछि।
‘बज्जिका गीत-संगीत’ खाली गीत के संग्रह न हय। ई बज्जिका जनजीवन, प्रेम, दुख-सुख, प्रकृति, राजनीति, गरीबी, खेती आ फागुन के एक विस्तृत गेय संसार हय। पोथी मे कुल 105 गो गीत हय, जे कृष्ण, शृंगार, नायिका-व्यथा, प्रकृति, मानव-प्रकृति, देश-दशा, गरीबी, कृषि आ वसन्त—अइ नौ खण्ड मे रखल गेल हय।
कृतिक आरम्भ कृष्ण-गीतसँ होइत अछि; तकर बाद शृंगार, नायिका-व्यथा, प्रकृति, सामाजिक यथार्थ, देश-दशा, गरीबी, कृषि आ अन्तमे वसन्त धरि भाव-विस्तार होइत अछि। ई क्रम केवल विषय-विभाजन नहि, बल्कि रसात्मक आरोह-अवरोह अछि—व्यक्तिगत प्रेमसँ सामूहिक जीवन दिस, प्रकृतिसँ राजनीति दिस, आ अन्ततः पुनः उत्सव तथा रंग दिस।
अइ क्रम मे कवि पहिले राधा-श्याम आ प्रेम के लोक-संसार से शुरू करै छतन; फेर नायिका के पीर, प्रकृति आ मनुष्य के स्वभाव तक जायत हय; ओकर बाद देश, गरीबी आ खेती के यथार्थ आबय हय; आ अन्त मे वसन्त आ होरी के रंग से पोथी फेर रस-उल्लास मे लौट आवय हय। तैं ई खण्ड-विभाजन खाली सूची न हय, बल्कि भाव के क्रमिक यात्रा हय।
एहि आरम्भिक टेकमे ‘डगरिया’ आ ‘नजर लगावे’ जकाँ लोकप्रचलित शब्दावली काव्यक भावकेँ सीधे लोक-जीवनसँ जोड़ैत अछि। ‘डगरिया’ केवल पथ नहि, प्रेमक सार्वजनिक जोखिमक संकेत सेहो बनैत अछि।
अइ टेक मे पोथी के मूल सुर साफ सुनाय पड़य हय—सहज लोकबोली, गावे लायक लय, प्रेम के संकोच आ समाज के नजर। ‘डगरिया’ एहाँ खाली रास्ता न हय; ई प्रेम, लोकलाज आ सार्वजनिक निगाह के बीच से निकले वाला जीवन-पथ के संकेत सेहो हय।
२. कृष्ण-खण्ड: लोक-भक्ति आ शृंगारक सहअस्तित्व · २. कृष्ण गीत: लोक-भक्ति आ प्रेम के संगम
प्रथम बीस गीत कृष्ण-केन्द्रित अछि, मुदा एहि कृष्णक रूप वैदिक-दार्शनिक नहि, लोकजीवनक निकट, राधा-श्यामक प्रेम, मुरली, यमुना, अँगना, पनघट, नजर, विरह आ छेड़छाड़सँ बनल अछि। लेखक कृष्ण-मिथककेँ ग्रामीण भाव-संसारमे उतारैत छथि। एहि रूपान्तरणमे भक्ति आ शृंगार परस्पर विरोधी नहि रहैत, बल्कि एक्के भावधाराक दू छोर बनि जाइत अछि।
कृष्ण खण्ड मे भगवान दूर के दार्शनिक देवता बनके न रहतन। ऊ जमुना, पनघट, मुरली, झूला, राधा, गोरी, अँगना आ गाम के बीच अपन लोग जइसन उपस्थित छतन। अइ गीत मे भक्ति आ शृंगार अलग-अलग राह न हय; दून्नो एक-दोसर मे घुलल मिलल हय।
राधा-श्याम प्रसंगमे विरह अधिकतर सहज बोलचालक लयमे व्यक्त होइत अछि। अतिशय संस्कृतनिष्ठ अलंकारक बदला लोकबिम्ब, देह-भाषा, नयन, मुरली, यमुना, झूला, बरखा, फागु आ पनघट प्रमुख अछि। एहि कारण काव्यक भावाभिव्यक्ति विद्वज्जनक शास्त्रीय प्रदर्शन नहि, जनभाषाक अपनापन बनि उठैत अछि।
कवि के विशेषता हय कि पुरान कृष्ण-कथा के बज्जिका के बोल, चाल आ भाव दे देलन। श्याम, राधा, मुरली, जमुना, चाँद आ पनघट पुरान प्रतीक जरूर हय, परंच स्थानीय भाषा आ क्रियापद ओकरा नया आत्मीयता देलक।
कृष्ण-गीतसभक एक उपलब्धि ई अछि जे लेखक मिथकीय पात्रकेँ स्थानीय भाषा-संस्कारमे फेर जिअबैत छथि। सीमा ई अछि जे किछु गीतमे राधा-श्याम, चन्द्र, नयन, फूल आ मुरलीक बिम्ब पुनः-पुनः आयल अछि; ताहिसँ किछु ठाम प्रतीक-नवीनता कम भऽ जाइत अछि। मुदा संगीतात्मकता एहि पुनरावृत्तिकेँ दोषसँ अधिक गायनात्मक गुण बना दैत अछि।
किछु गीत मे चाँद, आँख, फूल, मुरली आ रूप के बिम्ब बार-बार आबय हय। पढ़े मे कखनहुँ दोहराव लगय हय, परंच गावे मे ई दोहराव टेक, स्मृति आ लय के ताकत बन जायत हय। ई अंतर गीत-साहित्य के प्रकृति समझे के लेल जरूरी हय।
३. शृंगार: देह, दृष्टि आ प्रतीक्षाक काव्य · ३. शृंगार: नजर, देह, लाज आ प्रतीक्षा
शृंगार-खण्डमे प्रेमक दृश्यात्मकता अत्यन्त प्रबल अछि। आँखि, अँचरा, चूनरी, चन्द्र, कमल, बिजली, बादल, सुगन्ध, पायल, केश, अधर आ फूल बारम्बार आबैत अछि। रूपवर्णन प्रायः चलायमान अछि—नायिका देखाइत मात्र नहि, चलैत, हँसैत, झाँकैत, लजैत, प्रतीक्षा करैत आ संवाद करैत अछि।
शृंगार खण्ड मे प्रेम बहुत दृश्य रूप मे सामने आबय हय। अँचरा, पायल, आँख, केश, कमल, चाँद, बिजुली, फूल, हवा, रात आ रंग—ई सब प्रेम के भाषा बनल हय। कवि रूप-वर्णन करैत जरूर छतन, पर नायिका खाली देखे के वस्तु बनके न रहय हय; ऊ चलय हय, लजाय हय, हँसय हय, झाँकय हय, प्रतीक्षा करय हय आ कखनहुँ सवाल सेहो करय हय।
एहि खण्डक अनेक गीतमे प्रेम सार्वजनिक दृश्य सेहो बनैत अछि। गामक बाट, अँगना, छत, नदी, फूलबारी आ राति—ई सभ प्रेमक मंच बनैत अछि। प्रेमक निजी अनुभूति आ सामुदायिक निगाहक बीच तनाव काव्यकेँ जीवंत बनबैत अछि।
गाम के बाट, अँगना, छत, बगइचा आ नदी प्रेम के मंच बन जायत हय। एतय निजी प्रेम आ समाज के निगाह के बीच तनाव बनल रहय हय। अइ कारण गीत मे प्रेम खाली देह के आकर्षण न रहके लोकलाज, दूरी, प्रतीक्षा आ मिलन के पूरा सामाजिक अनुभव बन जायत हय।
लेखकक शृंगार-काव्यमे उपमा सरल अछि, मुदा तत्क्षण बोधगम्य। ‘चन्द्र’, ‘कमल’, ‘बिजली’, ‘मधुऋतु’ जकाँ पारंपरिक बिम्ब स्थानीय क्रियापद आ लोकलयक कारण पुनः ताजगी पबैत अछि। यद्यपि किछु ठाम रूप-वर्णन रूढ़ होइत अछि, कुल मिलाकऽ गीतक संगीतात्मक प्रवाह ओकरा बोझिल नहि होमय दैत अछि।
किछु ठाम रूप-वर्णन परम्परागत हय, पर बज्जिका के स्थानीय क्रिया, संबोधन आ बोलचाल ओकरा मे नया जीवन भरै हय। कवि जटिल अलंकार न खोजतन; सहज बिम्ब से तुरन्त प्रभाव पैदा करै छतन।
४. नायिका-व्यथा: स्त्री-अनुभवक करुण धरातल · ४. नायिका-व्यथा: औरत के भीतर के आवाज
नायिका-व्यथा खण्ड संग्रहक भावात्मक केन्द्रसभमे सँ एक अछि। एतय पति-परदेश, प्रतीक्षा, परिवारक दवाब, अपमान, अकेलापन, प्रेमक असुरक्षा आ स्त्रीक आन्तरिक वाणी उभरैत अछि। ई खण्ड केवल प्रेम-विरह नहि, ग्रामीण स्त्री-जीवनक सामाजिक दबाब सेहो उद्घाटित करैत अछि।
नायिका-व्यथा अइ पोथी के सबसे संवेदनशील खण्ड मे से एक हय। एतय परदेश गेल पिया, ससुराल, अकेलापन, इंतजार, दुख, रोष, प्रेम के असुरक्षा आ स्त्री के आत्मस्वर सामने आबय हय। औरत सजावट के पात्र भर न हय; ऊ बोलय हय, पूछय हय, शिकायत करय हय आ कखनहुँ प्रतिरोध सेहो करय हय।
विशेष रूपेँ परदेशिया पति, ससुराल, बाल-विवाहक छाया, स्त्रीक असहाय प्रतीक्षा आ संवादहीनता गीतमे बारम्बार आयल अछि। स्त्री पात्र हमेशा निष्क्रिय नहि अछि; कतहु ओ विरोध करैत अछि, कतहु प्रश्न करैत अछि, कतहु अपन प्रेमक अधिकार माँगैत अछि। एहि कारण नायिका-व्यथा कृतिक भावलोककेँ गहिराई प्रदान करैत अछि।
अइ खण्ड मे करुण रस के प्रभाव भाषा के सादगी से बढ़ल हय। छोट वाक्य, पुकार, दोहराव आ रोजमर्रा के शब्द दुख के बनावटी न होवे देय हय। नायिका के पीर व्यक्तिगत हय, पर ओकर भीतर परदेश, परिवार, विवाह-संबंध आ स्त्री के सामाजिक स्थिति के संकेत सेहो मिलय हय।
करुण रसक प्रस्तुति अत्यधिक विलापपर टिकायल नहि अछि; ओकरा लोकबोलीक साधारण वाक्य, पुकार आ पुनरावृत्ति अधिक प्रभावी बनबैत अछि। ई सरलता कृतिक महत्त्वपूर्ण कलात्मक गुण अछि।
एहाँ कवि के उपलब्धि ई हय कि लोकगीत के परिचित ढाँचा मे स्त्री के भावनात्मक संसार के अलग स्थान देल गेल हय। सीमा ई हय कि पोथी के दोसर शृंगारिक गीत मे कखनहुँ स्त्री के बाहरी रूप पर अधिक जोर पड़ल हय।
५. प्रकृति: सजावट नहि, जीवित सहचर · ५. प्रकृति: मनुष्य के जीवित सहचर
काजर से सज के आयेल रात में अन्हरिया, सोना अइसन भागल बिहान।।
प्रकृति-खण्डमे नदी, हवा, वर्षा, कोयल, मधुऋतु, मेहँदी, फूल, चन्द्र आ हरियर खेत केवल पृष्ठभूमि नहि। प्रकृति मनुष्यक भावक सहभागी अछि। नदी विरह वहबैत अछि, चन्द्र मिलनक संकेत बनैत अछि, वर्षा मनक आवेगक संग चलैत अछि, आ फूल प्रेमक दृश्यात्मक भाषा बनैत अछि।
प्रकृति खण्ड मे नदी, पवन, बरखा, कोयल, मेहँदी, फागुन, फूल आ चाँद खाली सजावट न हय। आदमी के मन जइसे बदलय हय, तहिना प्रकृति सेहो भाव के संग बदलैत देखाय पड़य हय। बरखा के संग विरह, चाँद के संग मिलन, फागुन के संग उमंग आ नदी के संग प्रवाह के भाव जुड़ल हय।
एहि दू पंक्तिमे राति ‘काजर’सँ सजीव बनैत अछि आ बिहान ‘सोना’ सन चमकैत अछि। लोकबिम्बक एहि सहज रूपान्तरणमे लेखकक चित्रात्मक क्षमता स्पष्ट होइत अछि।
अइ पंक्ति मे रात के ‘काजर’ आ बिहान के ‘सोना’ से जो तुलना कैल गेल हय, ओ साधारण होके सेहो चमकीला दृश्य बनाबय हय। लोकजीवन से उठल बिम्ब कवि के सबसे स्वाभाविक काव्य-शक्ति हय।
प्रकृतिक सौन्दर्यक संग ग्रामीण पर्यावरणक मूर्त उपस्थिति सेहो अछि—खेत, नदी, पनघट, बाग, कदम्ब, कोयल, फागुन। एहि कारण प्रकृति-चित्रण अमूर्त रोमानी प्रकृति नहि, बल्कि रहन-सहनक भूगोल अछि।
प्रकृति के चित्र अमूर्त न हय। खेत, नदी, पनघट, बाग, कदम्ब, कोयल, फागुन—ई सब ओही भूगोल से आयल हय जे जन-जीवन के रोज के हिस्सा हय। तैं प्रकृति अइ पोथी मे पर्यावरण से अधिक जीवन-पद्धति के रूप मे उपस्थित हय।
६. मानव-प्रकृति: सामाजिक व्यंग्यक विस्तार · ६. मानव-प्रकृति: व्यंग्य आ सामाजिक आलोचना
‘मानव-प्रकृति’ खण्डसँ संग्रहक स्वर निर्णायक रूपेँ बदलैत अछि। प्रेम आ ऋतुरागक बाद लेखक अफसर, मंत्री, चुनाव, भ्रष्टाचार, सत्ता, लूट, नैतिक पतन, बेरोजगारी, हिंसा आ सामाजिक विघटनपर तीक्ष्ण दृष्टि दैत छथि। एहि खण्डमे काव्यक गीतात्मकता व्यंग्यक औजार बनैत अछि।
‘मानव-प्रकृति’ खण्ड से पोथी के सुर बदल जायत हय। प्रेम आ ऋतु के बाद अफसर, मंत्री, चुनाव, कुर्सी, भ्रष्टाचार, लूट, बेरोजगारी, हिंसा आ नैतिक पतन सामने आबय हय। कवि गीत के लय मे सामाजिक व्यंग्य करै छतन।
अनेक गीत घोषणात्मक अछि; किछु ठाम कविता प्रत्यक्ष राजनीतिक वक्तव्यक निकट पहुँचैत अछि। कलात्मक दृष्टिसँ एहि प्रवृत्तिमे जोखिम अछि, कारण विचार अगर अत्यन्त सीधे आबि जाए तँ बहुअर्थता घटैत अछि। तथापि संग्रहक सामाजिक दस्तावेजी महत्त्व एहि स्पष्टतासँ बढ़ैत अछि। लेखक अपन समयक बेचैनीकेँ लोकलयमे बाँधि दैत छथि।
किछु गीत मे बात बहुत सीधा राजनीतिक कथन बन गेल हय। साहित्यिक दृष्टि से एहाँ सूक्ष्मता कखनहुँ कम हो जायत हय, पर समय के दस्तावेज के रूप मे ई अंश बहुत महत्त्वपूर्ण हय। ‘लोकतंत्र’, ‘वोट’, ‘मंत्री’, ‘अफसर’, ‘कुर्सी’ जइसन शब्द बज्जिका गीत के शब्द-संसार मे आधुनिक जीवन के सीधा प्रवेश कराबय हय।
राजनीतिक शब्दावली—मंत्री, अफसर, चुनाव, वोट, लोकतंत्र, कुर्सी—लोकगीतक पारंपरिक शब्दकोशमे आधुनिक हस्तक्षेप अछि। ई मिश्रण कृतिक ऐतिहासिकता निश्चित करैत अछि।
अइ खण्ड के सबसे खास बात ई हय कि कवि लोकगीत के केवल प्रेम आ ऋतु तक सीमित न रखलन; ओकरा शासन, भ्रष्टाचार आ सामाजिक असंतोष के भाषा बनौलन।
७. देश-दशा: राष्ट्रबोध आ जनचिन्ता · ७. देश-दशा: जन-चिन्ता आ राष्ट्रबोध
देश-दशा खण्डमे लेखकक राष्ट्रबोध आदर्शवाद, भ्रष्टाचार-विरोध आ नैतिक आक्रोशक संग बनैत अछि। स्वतंत्रता, लोकतंत्र, गरीबी, सीमावर्ती संकट, शिक्षा, प्रशासन आ सामाजिक अनुशासन जकाँ विषय गीतक रूपमे आयल अछि।
देश-दशा के गीत मे स्वतंत्रता, शासन, शिक्षा, सीमा, भ्रष्टाचार आ नागरिक जिम्मेदारी पर चिंता देखाय पड़य हय। एहाँ कवि के ‘हम’ निजी प्रेमी से बदलके समाज के ‘हम’ बन जायत हय।
ई गीतसभ कखनो जनगीतक निकट जाइत अछि। एतय निजी ‘हम’ धीरे-धीरे सामूहिक ‘हम’मे बदलैत अछि। काव्यक केन्द्र प्रियतमसँ हटि नागरिक जीवनपर आबि जाइत अछि। एहि रूपान्तरणक कारण संग्रह मात्र प्रेमगीतक पुस्तक नहि रहि सामाजिक चेतनाक दस्तावेज बनैत अछि।
किछु गीत जनगीत जइसन स्वर धारण करै हय। कखनहुँ नारा आ उपदेश अधिक हो जायत हय, पर लोकभाषा मे देश के हालत पर सीधा बोलबो अइ पोथी के साहस हय। कवि अपन समय के राजनीतिक बेचैनी के लोकलय मे रखे के प्रयास कैलन।
सीमा ई जे प्रत्यक्ष उपदेश वा नारा किछु गीतमे काव्यात्मक जटिलता घटबैत अछि। उपलब्धि ई जे लेखक लोकभाषामे नागरिक आलोचना सम्भव करैत छथि।
एहाँ कलात्मक उपलब्धि आ सीमा एके साथ हय—सीधापन जन-संप्रेषण बढ़ाबय हय, पर कखनहुँ बहुअर्थता घटाबय हय।
८. गरीबी: करुणा, आक्रोश आ संरचनात्मक प्रश्न · ८. गरीबी: भूख, मजदूरी आ सम्मान
गरीब के समस्या राम विपतिये बाँट जाले।।
गरीबी-खण्ड संग्रहक सर्वाधिक सामाजिक रूपेँ मार्मिक अंशसभमे सँ अछि। महँगाई, मजदूरी, भूख, कर्ज, बेटी, खेत, बेरोजगारी, बीमारी आ असमानता एतय नैतिक समस्या नहि मात्र, जीवनक प्रतिदिनक संकट अछि।
गरीबी खण्ड मे महँगाई, मजदूरी, बेटी, कर्ज, खेत, पेट, रोजी-रोटी आ असमानता के संकट सामने आबय हय। गरीब आदमी एहाँ दया के पात्र भर न हय; ओकर मेहनत, आत्मसम्मान, विवशता आ संघर्ष के साथ देखल गेल हय।
लेखक गरीब पात्रकेँ करुणाक निष्क्रिय वस्तु नहि बनबैत छथि; ओकरा श्रम, आत्मसम्मान आ संघर्षक संग देखैत छथि। किछु गीतमे दैवी पुकार अछि, मुदा ओकर भीतर सामाजिक व्यवस्था विरुद्ध प्रश्न सेहो अछि। ई द्वंद्व ग्रामीण चेतनाक यथार्थवादी चित्र अछि—लोक आस्था आ सामाजिक प्रतिरोध एक्के समय उपस्थित।
कहीं भगवान के पुकार हय, कहीं व्यवस्था पर सवाल। ई दून्नो एके साथ चलय हय—लोक-आस्था सेहो, सामाजिक प्रतिरोध सेहो। एही कारण अइ गीत के दुख कृत्रिम न लगय हय।
एहि खण्डमे भाषा विशेष प्रभावी अछि, कारण काव्यक शब्दावली जीवनक वास्तविक अर्थव्यवस्थासँ निकलैत अछि। ‘कमा’, ‘मजूरी’, ‘महँगाई’, ‘खेत’, ‘उधार’, ‘रोटी’ जकाँ शब्द भावक आधार बनैत अछि।
कमा, मजदूरी, महँगाई, खेत, उधार, रोटी जइसन शब्द कविता के जमीन बनाबय हय। अइ खण्ड मे भाषा के सामाजिक वजन सबसे अधिक महसूस होय हय।
९. कृषि: श्रमक सौन्दर्यशास्त्र · ९. कृषि: मेहनत के सौन्दर्य
कृषि-खण्डमे किसानक श्रम, खेतक तैयारी, धान, पानी, हरियर पात, खेतीक संकट, मौसम आ ग्रामीण परिवारक सहयोग गीतात्मक रूप पबैत अछि। एहि अंशमे कृति अपन सामाजिक भूगोलक सर्वाधिक ठोस रूप प्रस्तुत करैत अछि।
कृषि खण्ड मे किसान, किसानिन, धान, पानी, खेत, फसल, श्रम आ मौसम के पूरा संसार हय। कवि खेती के खाली हरियर दृश्य के रूप मे न देखलन; ओकर कष्ट, अनिश्चितता, श्रम आ उम्मीद सेहो देखौलन।
किसान जीवनकेँ केवल रोमानी हरियालीक रूपमे नहि देखाओल गेल अछि; कष्ट, अनिश्चितता, श्रम आ उत्पादनक कठिनाई सेहो सामने अछि। तथापि खेतीक दृश्यसभमे सामूहिकता आ आशा प्रबल अछि। खेत सामाजिक श्रमक मंच अछि, मात्र प्राकृतिक दृश्य नहि।
खेत एहाँ जमीन भर न हय; घर-परिवार, भोजन, सम्मान आ भविष्य के आधार हय। किसान आ किसानिन के संयुक्त उपस्थिति ग्रामीण जीवन के सामूहिक श्रम के रूप सामने आनय हय।
एहि गीतसभसँ पोथीक सामाजिक भूगोल सबसँ ठोस रूपमे देखाइत अछि। प्रेमक अँचरा आ पायलसँ चलल भाषा एतय हल, धान, पानी आ श्रम धरि पहुँचि जाइत अछि।
अइ गीत से पोथी के सामाजिक भूगोल सबसे ठोस रूप मे देखाय पड़य हय। प्रेम के अँचरा आ पायल से चलल भाषा एहाँ हल, धान, पानी आ श्रम तक पहुँच जायत हय।
१०. वसन्त: समापनमे पुनः रस, रंग आ उत्सव · १०. वसन्त आ होरी: रंग मे लौटत समापन
मोहन करे बरजोरी, गोरी! कइसे खेलूँ होरी।।
अन्तिम दू गीत वसन्त आ होरीक रंगमे संग्रहकेँ पुनः प्रेम, खेल आ उल्लास दिस आनैत अछि। आरम्भ कृष्णसँ भेल छल; अन्त फेर कृष्ण-होरीक रंगमे होइत अछि। एहि वृत्ताकार संरचनासँ कृतिक भीतर एक सांगीतिक समापन-बोध उत्पन्न होइत अछि।
पोथी के आखिरी गीत वसन्त आ होरी के हय। शुरुआत कृष्ण से भेल आ अन्त फेर कृष्ण के होरी से—अइ से पोथी एक प्रकार के पूरा घेरा बनाबय हय।
समाज, गरीबी, राजनीति आ कृषि जकाँ भारी विषय पार कऽ पाठक फेर रंग, फागु, हास्य आ देहधर्मी उल्लासमे लौटैत अछि। ई समापन काव्यात्मक संतुलन प्रदान करैत अछि।
बीच मे राजनीति, गरीबी, देश-दशा आ खेती के गंभीर संसार पार कके पाठक फेर रंग, हँसी, प्रेम आ खेल मे लौटय हय। अइ समापन से पोथी के भाव-संतुलन बनल रहय हय।
११. भाषा: बज्जिकाक आत्मीयता आ बहुरंगी रजिस्टर · ११. बज्जिका भाषा के साहित्यिक ताकत
कृतिक भाषा एकर सबसे विशिष्ट उपलब्धि अछि। लेखक बज्जिकाकेँ केवल ‘लोकबोली’क सजावटी रंग नहि, पूर्ण काव्य-माध्यमक रूपमे बरतैत छथि। क्रियापद, सर्वनाम, सम्बोधन, संक्षिप्त वाक्य, ध्वनि-पुनरावृत्ति आ लोकमुहावरा गीतसभकेँ अलग स्वर दैत अछि।
अइ पोथी के सबसे बड़ा काम ई हय कि बज्जिका के पूरा साहित्यिक भाषा जइसन बरतल गेल हय। गाम-घर के शब्द, स्थानीय क्रियापद, पुकार, संबोधन, मुहावरा आ ध्वनि—सब गीत के अपना स्वर देय हय।
कृतिक भाषामे बज्जिकाक स्थानीय रूपसभक संग हिन्दी, संस्कृतनिष्ठ आ आधुनिक प्रशासनिक शब्दावली सेहो भेटैत अछि। प्रेमगीतमे ‘अँचरा’, ‘डगरिया’, ‘सैयाँ’, ‘गोरिया’, ‘अँगना’ जकाँ आत्मीय शब्द अछि; सामाजिक गीतमे ‘लोकतंत्र’, ‘मंत्री’, ‘चुनाव’, ‘वोट’, ‘प्रशासन’ जकाँ आधुनिक शब्द प्रवेश करैत अछि। एहि बहुस्तरीय रजिस्टरसँ भाषा समयक परिवर्तनकेँ आत्मसात करैत देखाइत अछि।
संगे आधुनिक शब्द सेहो आयल हय—चुनाव, मंत्री, अफसर, लोकतंत्र, प्रशासन। मतलब भाषा पुरान लोक-संसार मे बंद न हय; ऊ नया समय के अनुभव आ शब्द के सेहो अपनाबय हय।
लेखक आरम्भिक वक्तव्यमे बज्जिकाक क्षेत्रीय रूप आ क्रियापद-विविधतापर अपन मत राखैत छथि। साहित्यिक दृष्टिसँ अधिक महत्त्वपूर्ण बात ई अछि जे कृति स्वयं भाषा प्रयोगक व्यापक नमूना बनि जाइत अछि।
साहित्यिक दृष्टि से सबसे महत्त्वपूर्ण बात ई हय कि बज्जिका एहाँ विषय न हय, माध्यम हय। प्रेम से राजनीति आ खेती तक सब कुछ अइ भाषा मे कहे के प्रयास पोथी के ऐतिहासिक महत्त्व बढ़ाबय हय।
कविक भाषामे हिन्दी, संस्कृतनिष्ठ पद आ स्थानीय बज्जिका रूप एक संग मिलैत अछि। एहि मिश्रणकेँ केवल ‘शुद्धता’क कसौटीसँ नहि देखबाक चाही; ई बीसम शताब्दीक अन्तिम चरणक सामाजिक सम्पर्क आ बदलैत भाषिक व्यवहारक संकेत सेहो थिक।
कवि के भाषा मे हिन्दी, संस्कृतनिष्ठ पद आ स्थानीय बज्जिका रूप एक साथ मिलय हय। ई मिश्रण के केवल ‘शुद्धता’ के कसौटी से न देखे के चाही; ई बीसम सदी के अन्तकालीन सामाजिक संपर्क आ बदलैत भाषिक व्यवहार के संकेत सेहो हय।
१२. छन्द, लय, टेक आ ध्वन्यात्मकता · १२. लय, टेक आ ध्वनि
गीतसभ कड़ाईसँ एकरूप शास्त्रीय छन्दमे नहि बन्हल अछि। ओकर वास्तविक शक्ति मौखिक लय, दोहराव, पंक्ति-समता, तुक, टेक आ स्वर-गति अछि। अनेक गीतक अन्तिम पंक्ति हर पदक बाद लौटैत अछि; ई पुनरावृत्ति स्मृति आ गायन दुनूकेँ सहज बनबैत अछि।
गीत के असली छन्द ओकर बोल आ धुन मे हय। सब गीत एके शास्त्रीय मात्रा मे बन्हल न हय, पर ‘रह-रह’, ‘चल-चल’, ‘कुहकी-कुहकी’, ‘आयेल-आयेल’ जइसन दोहराव लय पैदा करै हय।
ध्वनि-संरचनामे ‘रह-रह’, ‘चल-चल’, ‘कुहकी-कुहकी’, ‘आयेल-आयेल’ सन पुनरुक्ति विशेष उल्लेखनीय अछि। एहि ध्वनि-प्रयोगक कारण अर्थ मात्र नहि, गतिशीलता सेहो बनैत अछि।
बहुत गीत मे आखिरी पंक्ति बार-बार लौटय हय। गावे मे ई टेक बनय हय, याद रखे मे सहायता करै हय आ भाव के जोर बढ़ाबय हय।
किछु गीतमे मात्रिक असमानता पढ़ैत समय खटकैत अछि, मुदा सम्भव अछि गायन-धुन ओकर संतुलन करैत हो। लिखित पाठक आधारपर कहल जा सकैत अछि जे कृतिक छन्द-शक्ति शास्त्रीय मात्रा-गणनासँ अधिक लोक-लयपर निर्भर अछि।
लिखित रूप मे कखनहुँ मात्रा असमान लग सकय हय, पर ई संग्रह मूलतः लोक-लय पर आश्रित हय। तैं ओकर संगीतात्मकता के केवल लिखित छन्द के कसौटी से नापब उचित न हय।
१३. बिम्ब-प्रतीक आ लोक-संसार
कृतिक प्रमुख प्रतीक—चन्द्र, आँखि, फूल, नदी, यमुना, बादल, पवन, कोयल, खेत, अँगना, मुरली, पायल, अँचरा, फागुन—लोकजीवनक परिचित वस्तु अछि। एहि परिचिततासँ कविता तत्काल संप्रेषणीय बनैत अछि।
कृतिक प्रमुख प्रतीक—चन्द्र, आँखि, फूल, नदी, यमुना, बादल, पवन, कोयल, खेत, अँगना, मुरली, पायल, अँचरा, फागुन—लोकजीवनक परिचित वस्तु हय। अइ परिचिततासे कविता तत्काल संप्रेषणीय बनय हय।
चन्द्र रूप-सौन्दर्यक, नदी विरह आ प्रवाहक, खेत श्रम आ जीवनोपार्जनक, अँगना घरेलू संसारक, पथ/डगरिया सामाजिक निगाह आ जीवन-यात्राक, आ फागुन मुक्त उत्सवक प्रतीक बनैत अछि। लेखक कठिन प्रतीकवाद नहि रचैत छथि; हुनकर प्रतीक पारदर्शी अछि, मुदा गीतक पुनरावृत्तिपूर्ण संरचनामे धीरे-धीरे सांस्कृतिक अर्थ ग्रहण करैत अछि।
चन्द्र रूप-सौन्दर्यक, नदी विरह आ प्रवाहक, खेत श्रम आ जीवनोपार्जनक, अँगना घरेलू संसारक, पथ/डगरिया सामाजिक निगाह आ जीवन-यात्राक, आ फागुन मुक्त उत्सवक प्रतीक बनय हय। लेखक कठिन प्रतीकवाद नहि रचैत छतन; हुनकर प्रतीक पारदर्शी हय, मगर गीतक पुनरावृत्तिपूर्ण संरचनामे धीरे-धीरे सांस्कृतिक अर्थ ग्रहण करय हय।
१४. स्त्री-दृष्टि: उपलब्धि आ सीमा · १३. औरत के चित्र: परम्परा आ अपना आवाज
संग्रहमे स्त्री पात्रक उपस्थिति बहुत व्यापक अछि। ओ प्रेमिका, पत्नी, नायिका, परदेशी पतिक प्रतीक्षारत स्त्री, ग्रामीण युवती, श्रमिक परिवारक सदस्य आ सौन्दर्य-वर्णनक केन्द्र—अनेक रूपमे अछि। नायिका-व्यथा खण्ड स्त्रीक भाव-जगतकेँ अलग स्थान दैत अछि, जे कृतिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि अछि।
पोथी मे औरत कई रूप मे आयल हय—राधा, प्रेमिका, पत्नी, परदेशिया के इंतजार करे वाली नायिका, खेत-घर के सदस्य, सजल गोरी आ दुखी स्त्री। ई व्यापक उपस्थिति पोथी के महत्त्वपूर्ण गुण हय।
तथापि आलोचनात्मक दृष्टिसँ देखल जाए तँ किछु शृंगार गीत स्त्री-देहकेँ बाहरी दृष्टिसँ देखैत अछि; नयन, केश, रंग, चाल, देह-रूपक वर्णन बहुल अछि। एहि प्रवृत्तिक संग-संग कतहु स्त्रीक प्रतिरोध, प्रश्न आ आत्मस्वर सेहो उपस्थित अछि। अतः संग्रहमे स्त्री-दृष्टि एकरेखीय नहि, बल्कि पारंपरिक सौन्दर्यदृष्टि आ उभरैत आत्म-अभिव्यक्तिक बीच स्थित अछि।
पर आलोचना के नजर से देखल जाय त किछु शृंगार गीत मे औरत के बाहरी रूप-देह पर अधिक जोर हय। संगही नायिका-व्यथा मे ओकर अपना आवाज, दुख, सवाल आ विरोध सेहो मिलय हय। तैं पोथी के स्त्री-चित्र एकरंगा न हय; परम्परागत सौन्दर्य-दृष्टि आ स्त्री-अनुभव के आत्मस्वर दून्नो साथ उपस्थित हय।
१५. सामाजिक दस्तावेजक रूपमे कृति · १४. सामाजिक दस्तावेज के रूप मे पोथी
ई पोथी 2000क आसपास प्रकाशित ग्रामीण उत्तर बिहारक सामाजिक-सांस्कृतिक मनःस्थिति बुझबाक लेल उपयोगी पाठ अछि। एहि गीतसभमे प्रेम आ ऋतु मात्र नहि, बल्कि परदेश, महँगाई, चुनाव, सरकारी व्यवस्था, गरीबी, खेत, मजदूरी, शिक्षा, प्रशासन आ सामाजिक तनावक उपस्थिति अछि।
‘बज्जिका गीत-संगीत’ प्रेम आ प्रकृति के साथ अपन समय के समाज के सेहो लिखय हय। परदेश, महँगाई, चुनाव, सरकारी व्यवस्था, गरीबी, खेत, मजदूरी, बेरोजगारी आ शिक्षा जइसन विषय बताबय हय कि लेखक लोकगीत के आधुनिक जीवन से जोड़ल चाहै छतन।
यही कारण ‘बज्जिका गीत-संगीत’क मूल्य केवल सौन्दर्यशास्त्रीय नहि, सांस्कृतिक-अभिलेखीय सेहो अछि। ई भाषा, लोकानुभव आ समयक सामाजिक चिन्ताकेँ एक ठाम सुरक्षित करैत अछि।
एही कारण पोथी के महत्त्व खाली ‘सुन्दर गीत’ तक सीमित न हय। ई बज्जिका क्षेत्र के भाषा, भाव, सामाजिक चिन्ता आ सांस्कृतिक स्मृति के दस्तावेज सेहो हय।
एहि अर्थमे कृति लोकपरम्परा आ आधुनिक जनचेतनाक बीच एक सेतु जकाँ काज करैत अछि।
अइ अर्थ मे कृति लोक परम्परा आ आधुनिक जनचेतना के बीच पुल जइसन काज करै हय।
१६. कलात्मक उपलब्धि · १५. पोथी के मुख्य उपलब्धि
बज्जिकाकेँ गेय साहित्यिक भाषा रूपमे आत्मविश्वासपूर्वक प्रतिष्ठित करब।
बज्जिका मे 105 गो गेय रचना के विस्तृत संसार तैयार कैल गेल हय।
105 गीतकेँ नौ विषयगत खण्डमे व्यवस्थित कऽ व्यापक भाव-संसार बनाबय।
कृष्ण-प्रेम से गरीबी, राजनीति, खेती आ वसन्त तक विषय के बड़ी चौड़ाई हय।
लोकलय, टेक, पुनरावृत्ति आ सहज तुकक सफल उपयोग।
लोक-लय, टेक, पुनरावृत्ति आ सहज तुक के प्रभावी उपयोग भेल हय।
कृष्ण-शृंगारसँ राजनीति, गरीबी आ कृषि धरि विषय-विस्तार।
गाम, अँगना, नदी, खेत, पनघट, परदेश आ स्त्री-अनुभव के सजीव चित्र मिलय हय।
ग्रामीण स्त्री-अनुभव, परदेश, खेत, मौसम आ सामुदायिक जीवनक स्मरणीय चित्र।
लोकभाषा मे आधुनिक सामाजिक आ राजनीतिक आलोचना के साहस देखाय पड़य हय।
लोकभाषामे आधुनिक लोकतांत्रिक आ सामाजिक आलोचनाक साहस।
बज्जिका के साहित्यिक आत्मविश्वास अइ पोथी मे स्पष्ट रूप से उपस्थित हय।
१७. सीमासभ · १६. पोथी के सीमा
किछु गीतमे चन्द्र, नयन, फूल, रूप, पायल आदि बिम्बक पुनरावृत्ति अधिक अछि।
किछु शृंगार गीत मे चाँद, आँख, फूल, रूप जइसन बिम्ब बहुत दोहरायल गेल हय।
राजनीतिक गीतसभमे कतहु-कतहु वक्तव्य काव्यक बहुअर्थता पर भारी पड़ैत अछि।
किछु राजनीतिक गीत कविता से अधिक भाषण के नजदीक पहुँच जायत हय।
शास्त्रीय छन्दक दृष्टिसँ मात्रा-संतुलन सर्वत्र समान नहि अछि; संग्रह मूलतः लोक-लयपर आश्रित अछि।
सब ठाम मात्रा-संतुलन एक जइसन न हय; गीत लोक-लय पर अधिक निर्भर हय।
किछु शृंगारिक अंशमे स्त्रीक बाहरी सौन्दर्य-वर्णन प्रमुख भऽ जाइत अछि।
किछु जगह नारी-सौन्दर्य के बाहरी वर्णन अधिक हय।
भाषिक इतिहास सम्बन्धी आरम्भिक दावासभक पुष्टि लेल स्वतंत्र भाषावैज्ञानिक प्रमाण आवश्यक होयत।
भाषा-इतिहास संबंधी आरम्भिक दावा के स्वतंत्र भाषावैज्ञानिक प्रमाण से अलग जाँच जरूरी हय।
१८. समग्र मूल्याङ्कन · १७. समग्र मूल्याङ्कन
‘बज्जिका गीत-संगीत’क साहित्यिक महत्त्व एहि बातमे अछि जे ई बज्जिकाकेँ केवल लोकसंग्रहक भाषा नहि, समकालीन रचना, प्रेम, व्यंग्य, सामाजिक आलोचना, करुणा आ कृषिजीवनक सक्षम माध्यम बनबैत अछि। लेखकक श्रेष्ठता विशेषतः ओतय प्रकट होइत अछि जतय ओ लोकजीवनक सहज शब्दकेँ गीतक लयमे छोड़ि दैत छथि; ओहि ठाम भाषा स्वयं कविता बनि उठैत अछि।
‘बज्जिका गीत-संगीत’ के असली महत्त्व ई हय कि ई बज्जिका के प्रेम, भक्ति, दुख, हँसी, विरोध, गरीबी, खेती आ देश-चिन्ता—सब कुछ कहे लायक साहित्यिक भाषा के रूप मे बरतय हय। पोथी के सबसे सफल जगह ऊ हय जहाँ कवि बिना भारी सजावट के लोक-शब्द के लय मे छोड़ देथिन; ओही ठाम भाषा स्वयं गीत बन जायत हय।
कृतिक कमजोर क्षण ओतय अछि जतय विचार सीधे नारा वा उपदेश बनि जाइत अछि, मुदा ई कमजोरी सेहो ओकर समय-सापेक्ष जनगीतात्मक आकांक्षासँ जुड़ल अछि। समग्र रूपेँ ई पोथी बज्जिका साहित्यक सांस्कृतिक स्मृति, गीत-परम्परा आ आधुनिक सामाजिक चेतनाक बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु रूपेँ देखल जा सकैत अछि।
कहीं-कहीं उपदेश आ नारा कलात्मक सूक्ष्मता घटाबय हय, पर पूरा पोथी देखल जाय त ई सीमा ओकर व्यापक सामाजिक आकांक्षा के भीतर समझ मे आबय हय। बज्जिका साहित्य मे अइ कृति के गीत, लोक-स्मृति आ आधुनिक जनचेतना के जोड़त एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप मे देखल जा सकय हय।
एहि पोथीक स्थायी उपलब्धि ई अछि जे ई बज्जिकाक लोक-संवेदनाकेँ केवल संग्रह नहि करैत, बल्कि ओकरा समकालीन साहित्यिक अभिव्यक्तिक रूपमे प्रतिष्ठित करबाक प्रयास करैत अछि।
अइ पोथी के स्थायी उपलब्धि ई हय कि ई बज्जिका के लोक-संवेदना के मात्र संग्रह न करै हय, बल्कि ओकरा समकालीन साहित्यिक अभिव्यक्ति के रूप मे प्रतिष्ठित करे के प्रयास करै हय।
खण्ड ३ : बज्जिका साहित्यक व्यापक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक आ भाषिक परिप्रेक्ष्य
विस्तृत भौगोलिक ओ सांस्कृतिक परिवेशमे पल्लवित-पुष्पित बज्जिका भाषा ओ एकर लोक-साहित्य, भारतीय उपमहाद्वीपक एकटा अत्यन्त समृद्ध ओ प्राचीन परम्पराक संवाहक अछि। बिहारक मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी, शिवहर, समस्तीपुरक किछु भाग तथा नेपालक तराई क्षेत्र विशेष क' रौतहट ओ सर्लाही जिलामे बाजल जाय वला एहि भाषाकेँ भाषाविज्ञानक दृष्टिकोण सँ केन्द्रीय मैथिलीक 'पश्चिमी उपभाषा' (Western Maithili) क रूपमे वर्गीकृत कएल गेल अछि। वर्ष २००१ क जनगणनाक प्रामाणिक आँकड़ाक अनुसार, भारतमे लगभग १ करोड़ १५ लाख सँ १ करोड़ १८ लाख लोक ओ नेपालमे लगभग २ लाख ३८ हजार लोक बज्जिका बजैत छथि। एतबा विशाल जनसांख्यिकीय आधारक बादो, संस्थागत संरक्षणक अभावमे ई भाषा अपन अस्तित्वक लेल सङ्घर्षरत अछि। एहि पृष्ठभूमिमे डॉ. रामेश्वर प्रसाद द्वारा सम्पादित ओ वर्ष २००० मे किशोर प्रकाशन, मुजफ्फरपुर सँ प्रकाशित पोथी 'बज्जिका गीत-संगीत' लोक-साहित्यक अभिलेखीकरण ओ संरक्षणक दिशा मे एकटा युगान्तरकारी प्रयास अछि।
विस्तृत भौगोलिक आ सांस्कृतिक परिवेशमे पल्लवित-पुष्पित बज्जिका भाषा आ एकर लोक-साहित्य, भारतीय उपमहाद्वीपक एगो अत्यन्त समृद्ध आ प्राचीन परम्पराक संवाहक हय। बिहारक मुजफ्फरपुर, वैशाली, सीतामढ़ी, शिवहर, समस्तीपुरक किछु भाग आ नेपालक तराई क्षेत्र विशेष क' रौतहट आ सर्लाही जिलामे बाजल जाय वला अइ भाषाके भाषाविज्ञानक दृष्टिकोण से केन्द्रीय मैथिलीक 'पश्चिमी उपभाषा' (Western Maithili) क रूपमे वर्गीकृत कैल गेल हय। वर्ष २००१ क जनगणनाक प्रामाणिक आँकड़ाक अनुसार, भारतमे लगभग १ करोड़ १५ लाख से १ करोड़ १८ लाख लोक आ नेपालमे लगभग २ लाख ३८ हजार लोक बज्जिका बजय छतन। एतना विशाल जनसांख्यिकीय आधारक बादो, संस्थागत संरक्षणक अभावमे ई भाषा अपन अस्तित्वक लेल सङ्घर्षरत हय। अइ पृष्ठभूमिमे डॉ. रामेश्वर प्रसाद द्वारा सम्पादित आ वर्ष २००० मे किशोर प्रकाशन, मुजफ्फरपुर से प्रकाशित पोथी 'बज्जिका गीत-संगीत' लोक-साहित्यक अभिलेखीकरण आ संरक्षणक दिशा मे एगो युगान्तरकारी प्रयास हय।
एहि समीक्षा आलेखक मूल उद्देश्य डॉ. रामेश्वर प्रसादक एहि कृतिकेँ साहित्य, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान ओ भाषाविज्ञानक बहुआयामी निकष पर तौलनाइ अछि। एहि साहित्यिक समीक्षाक सङ्गहि, बज्जिका भाषा ओ लोक-साहित्यक वैज्ञानिक अनुसन्धानक लेल एकटा बहुआयामी अनुसन्धान-रूपरेखा सेहो प्रस्तुत कएल गेल अछि, जे भविष्यक शोधार्थी लोकनिक लेल मार्गदर्शक सिद्ध होएत।
अइ समीक्षा आलेखक मूल उद्देश्य डॉ. रामेश्वर प्रसादक अइ कृतिके साहित्य, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान आ भाषाविज्ञानक बहुआयामी निकष पर तौलनाइ हय। अइ साहित्यिक समीक्षाक सङ्गहि, बज्जिका भाषा आ लोक-साहित्यक वैज्ञानिक अनुसन्धानक लेल एगो बहुआयामी अनुसन्धान-रूपरेखा सेहो प्रस्तुत कैल गेल हय, जे भविष्यक शोधार्थी लोकक लेल मार्गदर्शक सिद्ध होत।
बज्जिका साहित्यक ऐतिहासिक विकास-क्रम ओ डॉ. रामेश्वर प्रसादक अवदान · बज्जिका साहित्यक ऐतिहासिक विकास-क्रम आ डॉ. रामेश्वर प्रसादक अवदान
बज्जिका भाषाक उत्पत्ति प्राचीन 'बज्जी' सङ्घ सँ जुड़ल अछि, जे विश्वक प्राचीनतम गणतन्त्रमे सँ एक छल ओ जाहिक केन्द्र वैशाली छल। भाषाई विकास-क्रममे ई मागधी प्राकृत ओ मागधी अपभ्रंश सँ विकसित भेल अछि, जाहि सँ मैथिली, भोजपुरी, मगही, अङ्गिका, बाङ्ला, असमिया ओ उड़िया जकाँ अन्य भाषासभक सेहो जन्म भेल अछि। ऐतिहासिक रूपें जतय राजकाजक लेल प्राकृतक प्रयोग होइत छल, ओतय धार्मिक कृत्य संस्कृतमे होइत छल, ओ एहि दुनू स्रोत सँ बज्जिकाक शब्दावली समृद्ध भेल अछि। विद्यापतिक अवहट्ट रचनासभ, विशेष क' 'कीर्तिलता', वर्तमान बज्जिकाक संरचनाक अत्यन्त निकट अछि, जे ई प्रमाणित करैत अछि जे ई भाषा अपन मूल स्वरूपकेँ आइ धरि सुरक्षित रखने अछि।
बज्जिका भाषाक उत्पत्ति प्राचीन 'बज्जी' सङ्घ से जुड़ल हय, जे विश्वक प्राचीनतम गणतन्त्रमे से एक रहल आ जइक केन्द्र वैशाली रहल। भाषाई विकास-क्रममे ई मागधी प्राकृत आ मागधी अपभ्रंश से विकसित भेल हय, जइ से मैथिली, भोजपुरी, मगही, अङ्गिका, बाङ्ला, असमिया आ उड़िया जकाँ अन्य भाषासबक सेहो जन्म भेल हय। ऐतिहासिक रूपें जतय राजकाजक लेल प्राकृतक प्रयोग होय रहल, ओहाँ धार्मिक कृत्य संस्कृतमे होय रहल, आ अइ दुनू स्रोत से बज्जिकाक शब्दावली समृद्ध भेल हय। विद्यापतिक अवहट्ट रचनासब, विशेष क' 'कीर्तिलता', वर्तमान बज्जिकाक संरचनाक अत्यन्त निकट हय, जे ई प्रमाणित करय हय जे ई भाषा अपन मूल स्वरूपके आइ धरि सुरक्षित रखने हय।
बज्जिका साहित्यक इतिहास अत्यन्त प्राचीन ओ गौरवशाली रहल अछि। एकर प्रारम्भिक साहित्यमे गयाधर (रचनाकाल १०४५ ई.), जे वैशालीक रहबला छलाह ओ बौद्ध-धर्मक प्रचारार्थ तिब्बत गेल छलाह, हुनकर रचनासभकेँ राखल जाइत अछि। तदुपरान्त १५६५ ई. मे हलदर दास द्वारा लिखित खण्डकाव्य 'सुदामाचरित्र' प्राप्त होइत अछि, जे सम्पूर्ण रूपें बज्जिका भाषाक प्रतिनिधि रचना मानल जाइत अछि। अठारहम ओ उन्नीसम शताब्दीक सन्धिलग्न पर मँगनीराम (१८१५ ई. क आसपास) द्वारा रचित 'मँगनीराम की साखी', 'रामसागर पोथी' ओ 'अनमोल रतन' बज्जिका साहित्यक अमूल्य धरोहर अछि। बीसम शताब्दीक मध्य ओ उत्तरार्ध सँ बज्जिका साहित्यमे एकटा नवका पुनर्जागरणक उदय भेल, जाहिमे अनेकन विद्वान लोकनि लोक-कण्ठमे विद्यमान साहित्यकेँ लिपिबद्ध करबाक भगीरथ प्रयास कएलनि। एहि नवजागरणक क्रममे विभिन्न साहित्यकार ओ हुनकर रचनासभकेँ बुझनाइ आवश्यक अछि।
बज्जिका साहित्यक इतिहास अत्यन्त प्राचीन आ गौरवशाली रहल हय। एकर प्रारम्भिक साहित्यमे गयाधर (रचनाकाल १०४५ ई.), जे वैशालीक रहबला रहथिन आ बौद्ध-धर्मक प्रचारार्थ तिब्बत गेल रहथिन, हुनकर रचनासबके राखल जाय हय। तदुपरान्त १५६५ ई. मे हलदर दास द्वारा लिखित खण्डकाव्य 'सुदामाचरित्र' प्राप्त होय हय, जे सम्पूर्ण रूपें बज्जिका भाषाक प्रतिनिधि रचना मानल जाय हय। अठारहम आ उन्नीसम शताब्दीक सन्धिलग्न पर मँगनीराम (१८१५ ई. क आसपास) द्वारा रचित 'मँगनीराम की साखी', 'रामसागर पोथी' आ 'अनमोल रतन' बज्जिका साहित्यक अमूल्य धरोहर हय। बीसम शताब्दीक मध्य आ उत्तरार्ध से बज्जिका साहित्यमे एगो नवका पुनर्जागरणक उदय भेल, जइमे अनेकन विद्वान लोक लोक-कण्ठमे विद्यमान साहित्यके लिपिबद्ध करबाक भगीरथ प्रयास कैलन। अइ नवजागरणक क्रममे विभिन्न साहित्यकार आ हुनकर रचनासबके बुझनाइ आवश्यक हय।
सारणी : बज्जिका साहित्यक प्रतिनिधि रचनाकार, कृति, प्रकाशन आ विधा
रचनाकार / सम्पादक
महत्त्वपूर्ण कृति / पोथीक नाम
प्रकाशन वर्ष ओ प्रकाशक
साहित्यक विधा
डॉ. रामेश्वर प्रसाद
बज्जिका गीत-संगीत, बज्जिका लोकगीत, बज्जिका स्वर सङ्गम
२०००, किशोर प्रकाशन, मुजफ्फरपुर
लोकगीत सङ्कलन
निर्मल मिलिन्द
गितिया, तरहात्ती पर तरेगन, खिस्सा पेहानी
१९८४, १९९९, अ. भा. बज्जिका सा. सम्मेलन
उपन्यासिका, गीत-कविता, कथा
प्रफुल्ल कुमार सिंह 'मणि'
बज्जिका साहित्य का इतिहास
१९९५, हंसराज प्रकाशन, मुजफ्फरपुर
साहित्यिक इतिहास
डॉ. अवधेश्वर अरुण
बज्जिका रामायण
(अज्ञात)
महाकाव्य
चन्द्र किशोर श्वेतांशु
इंजुरी भर सिंहोरवा
१९७७, समीक्षा प्रकाशन, सीतामढ़ी
गीत-कविता सङ्ग्रह
योगेन्द्र राय
बज्जिका व्याकरण
१९८७, शैलेश भूषण, हाजीपुर
व्याकरण
एहि साहित्यिक विकास-क्रममे डॉ. रामेश्वर प्रसादक भूमिका मात्र एकटा सङ्कलनकर्त्ताक नहि, अपितु एकटा सांस्कृतिक रक्षकक अछि। 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीमे ओ गाम-देहातक अशिक्षित ओ अल्प-शिक्षित कृषक, श्रमिक ओ महिला वर्गकेँ कण्ठस्थ साङ्गीतिक परम्पराकेँ जे रूपें लिपिबद्ध कएलनि अछि, ओ बज्जिकाक लोक-जीवनकेँ जीवन्त करैत अछि। जतय शिष्ट साहित्यमे कृत्रिमता ओ बौद्धिकताक प्रधानता होइत अछि, ओतय लोक-साहित्य, विशेष क' एहि पोथीमे सङ्कलित गीतसभमे, भाव सौन्दर्य ओ नाद सौन्दर्यक प्राकृत निर्झर प्रवाहित होइत अछि।
अइ साहित्यिक विकास-क्रममे डॉ. रामेश्वर प्रसादक भूमिका मात्र एगो सङ्कलनकर्त्ताक नहि, बल्कि एगो सांस्कृतिक रक्षकक हय। 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीमे आ गाम-देहातक अशिक्षित आ अल्प-शिक्षित कृषक, श्रमिक आ महिला वर्गके कण्ठस्थ साङ्गीतिक परम्पराके जे रूपें लिपिबद्ध कैलन हय, आ बज्जिकाक लोक-जीवनके जीवन्त करय हय। जतय शिष्ट साहित्यमे कृत्रिमता आ बौद्धिकताक प्रधानता होय हय, ओहाँ लोक-साहित्य, विशेष क' अइ पोथीमे सङ्कलित गीतसबमे, भाव सौन्दर्य आ नाद सौन्दर्यक प्राकृत निर्झर प्रवाहित होय हय।
लोक-साङ्गीतिक दर्पणमे समाज: संस्कार ओ जीवन-चक्रक साङ्गीतिक दर्शन · लोक-साङ्गीतिक दर्पणमे समाज: संस्कार आ जीवन-चक्रक साङ्गीतिक दर्शन
कोनो भी समाजक मूल आत्मा ओकर लोकगीतमे बसैत अछि। बज्जिका लोकगीत, जाहिक एकटा वृहद् आख्यान 'बज्जिका गीत-संगीत' मे भेटैत अछि, सम्पूर्ण मानवीय जीवन-चक्रकेँ साङ्गीतिक अभिव्यक्तिक माध्यम सँ प्रस्तुत करैत अछि। मिथिला ओ तिरहुतक ई परम्परा रहल अछि जे मानव जीवनक प्रत्येक महत्त्वपूर्ण घटनाकेँ अनुष्ठान ओ गीतक सङ्ग सम्पादित कएल जाइत अछि। भारतीय दर्शनमे वर्णित विभिन्न संस्कारसभमे सँ जन्म, उपनयन (जनेऊ), ओ विवाहक अवसर पर गाओल जाय वला गीतसभक एकटा समृद्ध भण्डार एहि क्षेत्रमे उपलब्ध अछि।
कोनो भी समाजक मूल आत्मा ओकर लोकगीतमे बसैत हय। बज्जिका लोकगीत, जइक एगो वृहद् आख्यान 'बज्जिका गीत-संगीत' मे भेटैत हय, सम्पूर्ण मानवीय जीवन-चक्रके साङ्गीतिक अभिव्यक्तिक माध्यम से प्रस्तुत करय हय। मिथिला आ तिरहुतक ई परम्परा रहल हय जे मानव जीवनक प्रत्येक महत्त्वपूर्ण घटनाके अनुष्ठान आ गीतक सङ्ग सम्पादित कैल जाय हय। भारतीय दर्शनमे वर्णित विभिन्न संस्कारसबमे से जन्म, उपनयन (जनेऊ), आ विवाहक अवसर पर गाओल जाय वला गीतसबक एगो समृद्ध भण्डार अइ क्षेत्र मे उपलब्ध हय।
सन्तानोत्पत्ति, जे कोनो भी कृषि-प्रधान समाजक लेल वंश-वृद्धि ओ आर्थिक शक्तिक परिचायक मानल जाइत अछि, ओकर उल्लास 'सोहर' ओ 'खेलउना' गीतसभक माध्यम सँ व्यक्त होइत अछि। मुदा ई सोहर गीतसभ केवल हर्षोल्लासक गान नहि अछि। एहि गीतसभक गम्भीर समाजशास्त्रीय ओ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करला पर ज्ञात होइत अछि जे एहिमे प्रसव-पीडाक मार्मिकता, मृत्यु-भय पर जीवनक विजय, ओ पारिवारिक सम्बन्धक (जेना ननद-भौजाईक बीचक हास-परिहास ओ द्वन्द्व) यथार्थ चित्रण रहैत अछि। प्रसूता स्त्रीक शारीरिक ओ मानसिक यन्त्रणाकेँ साङ्गीतिक रूप द' क' समाज ओकरा एकटा मनोवैज्ञानिक आश्रय प्रदान करैत अछि।
सन्तानोत्पत्ति, जे कोनो भी कृषि-प्रधान समाजक लेल वंश-वृद्धि आ आर्थिक शक्तिक परिचायक मानल जाय हय, ओकर उल्लास 'सोहर' आ 'खेलउना' गीतसबक माध्यम से व्यक्त होय हय। मगर ई सोहर गीतसब केवल हर्षोल्लासक गान नहि हय। अइ गीतसबक गम्भीर समाजशास्त्रीय आ मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करला पर ज्ञात होय हय जे अइमे प्रसव-पीडाक मार्मिकता, मृत्यु-भय पर जीवनक विजय, आ पारिवारिक सम्बन्धक (जेना ननद-भौजाईक बीचक हास-परिहास आ द्वन्द्व) यथार्थ चित्रण रहय हय। प्रसूता स्त्रीक शारीरिक आ मानसिक यन्त्रणाके साङ्गीतिक रूप द' क' समाज ओकरा एगो मनोवैज्ञानिक आश्रय प्रदान करय हय।
विवाह संस्कारक गीतसभ तँ बज्जिका लोक-साहित्यक मुकुट-मणि अछि। मण्डप छाबय सँ ल' क', वेदी-पूजन, सिन्दूरदान, कोहबर, समुझवनी, ओ अन्तिममे बेटी-विदाई धरिक प्रत्येक विधानक लेल पृथक्-पृथक् गीतसभक विधान अछि। विदाईक अवसर पर गाओल जाय वला बेदनसिक्त गीतसभमे उपमा ओ उत्प्रेक्षा अलङ्कारक जे अप्रतिम भण्डार भेटैत अछि, ओ बड़का-बड़का महाकाव्यसभमे सेहो दुर्लभ अछि। लोक-कवि पिताकेँ 'मानसरोवर', सासुकेँ 'भरल-पूरल वापी' (बावड़ी), माताकेँ 'बहैत गङ्गा', ओ पतिकेँ 'उगैत सूर्य' क रूपमे चित्रित करैत अछि। ई रूपक लोक-मानसक अगाध काव्य-प्रतिभा ओ प्रकृतिकेँ मानवीय सम्बन्धसभक सङ्ग एकरूप करबाक दर्शनकेँ प्रमाणित करैत अछि। विदाईक समय पिताक रोबय सँ गङ्गामे बाढि आबि जेबाक, माताक रोबय सँ आकाशमे अन्हार भ' जेबाक, ओ भाइक रोबय सँ ओकर धोती पाँव धरि भीजि जेबाक जे अतिशयोक्तिपूर्ण मुदा अत्यन्त मार्मिक चित्रण एहि गीतसभमे भेल अछि, ओ कठोर सँ कठोर हृदयकेँ सेहो द्रवित क' देबाक सामर्थ्य रखैत अछि। ई गीतसभ स्पष्ट करैत अछि जे पितृसत्तात्मक समाजमे कन्याकेँ पराया धन मानल जेबाक दर्द कतेक गहीर अछि।
विवाह संस्कारक गीतसब तँ बज्जिका लोक-साहित्यक मुकुट-मणि हय। मण्डप छाबय से ल' क', वेदी-पूजन, सिन्दूरदान, कोहबर, समुझवनी, आ अन्तिममे बेटी-विदाई धरिक प्रत्येक विधानक लेल पृथक्-पृथक् गीतसबक विधान हय। विदाईक अवसर पर गाओल जाय वला बेदनसिक्त गीतसबमे उपमा आ उत्प्रेक्षा अलङ्कारक जे अप्रतिम भण्डार भेटैत हय, आ बड़का-बड़का महाकाव्यसबमे सेहो दुर्लभ हय। लोक-कवि पिताके 'मानसरोवर', सासुके 'भरल-पूरल वापी' (बावड़ी), माताके 'बहैत गङ्गा', आ पतिके 'उगैत सूर्य' क रूपमे चित्रित करय हय। ई रूपक लोक-मानसक अगाध काव्य-प्रतिभा आ प्रकृतिके मानवीय सम्बन्धसबक सङ्ग एकरूप करबाक दर्शनके प्रमाणित करय हय। विदाईक समय पिताक रोबय से गङ्गामे बाढि आबि जेबाक, माताक रोबय से आकाशमे अन्हार भ' जेबाक, आ भाइक रोबय से ओकर धोती पाँव धरि भीजि जेबाक जे अतिशयोक्तिपूर्ण मगर अत्यन्त मार्मिक चित्रण अइ गीतसब मे भेल हय, आ कठोर से कठोर हृदयके सेहो द्रवित क' देबाक सामर्थ्य रखैत हय। ई गीतसब स्पष्ट करय हय जे पितृसत्तात्मक समाजमे कन्याके पराया धन मानल जेबाक दर्द कतेक गहीर हय।
प्रकृति, कृषि ओ श्रम-संस्कृति: ऋतुगीत ओ जतसारीक नारीवादी विमर्श · प्रकृति, कृषि आ श्रम-संस्कृति: ऋतुगीत आ जतसारीक नारीवादी विमर्श
बज्जिका भाषी क्षेत्र पूर्णतः कृषि पर आश्रित अछि, तें एतय क लोक-साहित्य प्रकृतिक लय ओ ऋतुक चक्रक सङ्ग-सङ्ग चलैत अछि। ऋतु परिवर्तनकेँ केवल मौसमक बदलाव नहि, अपितु मानवीय भावनासभक बदलावक रूपमे देखल गेल अछि। फाल्गुन ओ चैत्र मासमे, जखन रबी फसल तयार होइत अछि ओ प्रकृति अपन सम्पूर्ण यौवन पर रहैत अछि, तखन गाओल जाय वला 'होरी' (होली) ओ 'चैती' गीतसभ उल्लास, मादकता ओ प्रेमक लौकिक स्वरूपकेँ व्यक्त करैत अछि। एहि गीतसभमे राधा-कृष्ण वा राम-सीताक प्रेमकेँ ईश्वरीय आवरण सँ मुक्त क' क' एकटा सामान्य कृषक-युगलक प्रेमक रूपमे प्रस्तुत कएल गेल अछि।
बज्जिका भाषी क्षेत्र पूर्णतः कृषि पर आश्रित हय, तें एहाँ क लोक-साहित्य प्रकृतिक लय आ ऋतुक चक्रक सङ्ग-सङ्ग चलैत हय। ऋतु परिवर्तनके केवल मौसमक बदलाव नहि, बल्कि मानवीय भावनासबक बदलावक रूपमे देखल गेल हय। फाल्गुन आ चैत्र मासमे, जखन रबी फसल तयार होय हय आ प्रकृति अपन सम्पूर्ण यौवन पर रहय हय, तखन गाओल जाय वला 'होरी' (होली) आ 'चैती' गीतसब उल्लास, मादकता आ प्रेमक लौकिक स्वरूपके व्यक्त करय हय। अइ गीतसब मे राधा-कृष्ण वा राम-सीताक प्रेमके ईश्वरीय आवरण से मुक्त क' क' एगो सामान्य कृषक-युगलक प्रेमक रूपमे प्रस्तुत कैल गेल हय।
दोसर दिस, जेठक तपनक बाद जखन वर्षा ऋतुक आगमन होइत अछि, तखन 'कजरी' ओ 'पावस' गीतसभक स्वर गूँजय लगैत अछि। साओन-भादवक अन्हार ओ कजरारी रातिमे जखन मेघ बरसैत अछि, तखन परदेस गेल पतिक प्रतीक्षा करैत विरहदग्धा नायिकाकेँ ई राति 'नागिन' जकाँ डँसय लगैत अछि। एहि गीतसभमे अनुभूतिक जे शीतलता अछि ओ संघर्ष सँ जूझैत श्रमश्रान्त व्यक्तिक लेल सुधा (अमृत) बनि क' बरसैत अछि। प्रकृति ओ प्रेमक ई तादात्म्य बज्जिका साङ्गीतिक परम्पराकेँ विश्व-साहित्यक उच्च कोटिमे स्थापित करैत अछि।
दोसर दिस, जेठक तपनक बाद जखन वर्षा ऋतुक आगमन होय हय, तखन 'कजरी' आ 'पावस' गीतसबक स्वर गूँजय लगैत हय। साओन-भादवक अन्हार आ कजरारी रातिमे जखन मेघ बरसैत हय, तखन परदेस गेल पतिक प्रतीक्षा करय विरहदग्धा नायिकाके ई राति 'नागिन' जकाँ डँसय लगैत हय। अइ गीतसब मे अनुभूतिक जे शीतलता हय आ संघर्ष से जूझैत श्रमश्रान्त व्यक्तिक लेल सुधा (अमृत) बनि क' बरसैत हय। प्रकृति आ प्रेमक ई तादात्म्य बज्जिका साङ्गीतिक परम्पराके विश्व-साहित्यक उच्च कोटिमे स्थापित करय हय।
श्रम गीत, विशेष रूप सँ 'जतसारी' (जाँत पीसब काल गाओल जाय वला गीत) ओ 'रोपनी' (धान रोपैत काल गाओल जाय वला गीत), बज्जिका लोक-साहित्यक ओ अमूल्य हिस्सा अछि जाहिमे श्रम परिहारक सङ्ग-सङ्ग सामाजिक यथार्थवादक दर्शन होइत अछि। जाँतक घर्षणक सङ्ग-सङ्ग नारीक हृदयक वेदना, सासु-पुतहुक द्वन्द्व, पितृसत्तात्मक समाजमे ओकर दयनीय स्थिति, ओ मुगला-तुर्कक ऐतिहासिक आक्रमणक समयमे स्त्रीक सतीत्वक रक्षाक गाथा सेहो स्वर पाबि क' बाहर अबैत अछि। लोकगीतसभमे नारीक चित्रण पर नारीवादी आलोचनात्मक विमर्श (Feminist Critical Discourse Analysis) सँ ई स्पष्ट होइत अछि जे यद्यपि समाज पुरुष-प्रधान अछि ओ कहावति वा मुहावरासभमे स्त्रीकेँ प्रायः कमजोर वा हीन देखाओल गेल अछि, मुदा जतसारी जकाँ गीतसभ नारीकेँ अपन मौन विद्रोह व्यक्त करबाक एकटा सुरक्षित 'स्पेस' (Space) प्रदान करैत अछि। एतय ओ अपन पीड़क विरुद्ध स्वर उठबैत अछि, जे प्रमाणित करैत अछि जे लोक-साहित्यमे नारी-विमर्श (Feminism) कोनो नवका पश्चिमी अवधारणा नहि अछि, अपितु सदियौ सँ हमरा लोकनिक लोक-कण्ठमे विद्यमान अछि।
श्रम गीत, विशेष रूप से 'जतसारी' (जाँत पीसब काल गाओल जाय वला गीत) आ 'रोपनी' (धान रोपैत काल गाओल जाय वला गीत), बज्जिका लोक-साहित्यक आ अमूल्य हिस्सा हय जइमे श्रम परिहारक सङ्ग-सङ्ग सामाजिक यथार्थवादक दर्शन होय हय। जाँतक घर्षणक सङ्ग-सङ्ग नारीक हृदयक वेदना, सासु-पुतहुक द्वन्द्व, पितृसत्तात्मक समाजमे ओकर दयनीय स्थिति, आ मुगला-तुर्कक ऐतिहासिक आक्रमणक समयमे स्त्रीक सतीत्वक रक्षाक गाथा सेहो स्वर पाबि क' बाहर आबय हय। लोकगीतसबमे नारीक चित्रण पर नारीवादी आलोचनात्मक विमर्श (Feminist Critical Discourse Analysis) से ई स्पष्ट होय हय जे हालाँकि समाज पुरुष-प्रधान हय आ कहावति वा मुहावरासबमे स्त्रीके प्रायः कमजोर वा हीन देखाओल गेल हय, मगर जतसारी जकाँ गीतसब नारीके अपन मौन विद्रोह व्यक्त करबाक एगो सुरक्षित 'स्पेस' (Space) प्रदान करय हय। एहाँ आ अपन पीड़क विरुद्ध स्वर उठबैत हय, जे प्रमाणित करय हय जे लोक-साहित्यमे नारी-विमर्श (Feminism) कोनो नवका पश्चिमी अवधारणा नहि हय, बल्कि सदियौ से हमरा लोकक लोक-कण्ठमे विद्यमान हय।
सीमान्तकृत समाजक स्वर ओ मिथकीय चेतना: गाथा-गीत ओ पर्यावरण विमर्श · सीमान्तकृत समाजक स्वर आ मिथकीय चेतना: गाथा-गीत आ पर्यावरण विमर्श
बज्जिका लोक-साहित्य केवल उच्च वा कुलीन वर्गक संस्कारक वर्णन धरि सीमित नहि अछि, अपितु ई सीमान्तकृत, उपेक्षित ओ दलित वर्गकेँ सेहो सशक्त स्वर प्रदान करैत अछि। एहि सन्दर्भमे मुसहर ओ अन्य कृषक-मजदूर जातिक लोक-देवता 'दीना-भद्री' क गाथा-गीत विशेष रूप सँ उल्लेखनीय अछि। दीना ओ भद्री दुइ भाइ छलाह, जे सामन्ती अत्याचार ओ बेगारीक विरुद्ध सङ्घर्ष कएलनि ओ अपन प्राणक आहुति देलनि। ई गाथा-गीतसभ मिथिला, बज्जिकाञ्चल ओ नेपालक तराई क्षेत्रमे अत्यन्त लोकप्रिय अछि ओ एकरा 'मनुखदेव' (मनुष्य रूपी देवता) क कथाक रूपमे गाओल जाइत अछि।
बज्जिका लोक-साहित्य केवल उच्च वा कुलीन वर्गक संस्कारक वर्णन धरि सीमित नहि हय, बल्कि ई सीमान्तकृत, उपेक्षित आ दलित वर्गके सेहो सशक्त स्वर प्रदान करय हय। अइ सन्दर्भ मे मुसहर आ अन्य कृषक-मजदूर जातिक लोक-देवता 'दीना-भद्री' क गाथा-गीत विशेष रूप से उल्लेखनीय हय। दीना आ भद्री दुइ भाइ रहथिन, जे सामन्ती अत्याचार आ बेगारीक विरुद्ध सङ्घर्ष कैलन आ अपन प्राणक आहुति देलनि। ई गाथा-गीतसब मिथिला, बज्जिकाञ्चल आ नेपालक तराई क्षेत्रमे अत्यन्त लोकप्रिय हय आ एकरा 'मनुखदेव' (मनुष्य रूपी देवता) क कथाक रूपमे गाओल जाय हय।
एहि लोक-गाथाक पारिस्थितिक-आलोचना (Eco-criticism) करला पर ई स्पष्ट होइत अछि जे दीना-भद्री केवल जातिक नायक नहि छलाह, अपितु ओ पर्यावरण संरक्षणक प्रतीक सेहो छथि। ओकरा लोकनिक सङ्घर्ष जल-स्रोत (पोखरि) ओ वन-सम्पदा पर अधिकारक लेल सामन्तसभक विरुद्ध छल। गाथामे कामा माई ओ सोमारो धनी जकाँ सशक्त स्त्री पात्रक चित्रण अछि जे कृषिक (विशेष क' धानक खेतीक) रक्षा करैत छथि। दलित लोक-साहित्यक ई पर्यावरणीय चेतना (Environmental Movements tied to Folklore) प्रमाणित करैत अछि जे बज्जिका साहित्य समाजक सब वर्गक मिथकीय आख्यान, सङ्घर्ष ओ प्रकृतिक सङ्ग हुनकर तादात्म्यकेँ अपन भीतर पूर्ण गम्भीरताक सङ्ग समाहित कएने अछि। एहि गाथा-गीतसभक संरक्षण ओ गायन सीमान्तकृत वर्गकेँ समाजमे अपन आत्मसम्मान ओ पहचान स्थापित करबामे सहायक सिद्ध भ' रहल अछि।
अइ लोक-गाथाक पारिस्थितिक-आलोचना (Eco-criticism) करला पर ई स्पष्ट होय हय जे दीना-भद्री केवल जातिक नायक नहि रहथिन, बल्कि आ पर्यावरण संरक्षणक प्रतीक सेहो छतन। ओकरा लोकक सङ्घर्ष जल-स्रोत (पोखरि) आ वन-सम्पदा पर अधिकारक लेल सामन्तसबक विरुद्ध रहल। गाथामे कामा माई आ सोमारो धनी जकाँ सशक्त स्त्री पात्रक चित्रण हय जे कृषिक (विशेष क' धानक खेतीक) रक्षा करय छतन। दलित लोक-साहित्यक ई पर्यावरणीय चेतना (Environmental Movements tied to Folklore) प्रमाणित करय हय जे बज्जिका साहित्य समाजक सब वर्गक मिथकीय आख्यान, सङ्घर्ष आ प्रकृतिक सङ्ग हुनकर तादात्म्यके अपन भीतर पूर्ण गम्भीरताक सङ्ग समाहित कएने हय। अइ गाथा-गीतसबक संरक्षण आ गायन सीमान्तकृत वर्गके समाजमे अपन आत्मसम्मान आ पहचान स्थापित करबामे सहायक सिद्ध भ' रहल हय।
बज्जिका ओ केन्द्रीय मैथिलीक मध्य भाषिक ओ व्याकरणिक सम्बन्धक विश्लेषणात्मक अध्ययन · बज्जिका आ केन्द्रीय मैथिलीक मध्य भाषिक आ व्याकरणिक सम्बन्धक विश्लेषणात्मक अध्ययन
'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीक साहित्यिक मूल्याङ्कन तखने पूर्ण ओ प्रामाणिक मानल जायत, जखन एकर भाषिक ओ व्याकरणिक संरचनाकेँ वैज्ञानिक दृष्टिकोण सँ बुझल जाय। बज्जिकाकेँ भाषाविज्ञानमे 'पश्चिमी मैथिली' क उपभाषा मानल गेल अछि, ओ ई एकटा वृहद् मैथिली भाषिक सातत्य (Maithili Dialect Continuum) क अभिन्न अङ्ग अछि। यद्यपि, बज्जिका ओ केन्द्रीय मैथिली (जाहिकेँ मानक मैथिली मानल जाइत अछि) क बीच किछु विशिष्ट व्याकरणिक, ध्वन्यात्मक, ओ रूपतात्त्विक (Morphological) भिन्नतासभ अछि जाहि पर अभिषेक कुमार काश्यप जकाँ भाषाविज्ञानी निरन्तर शोध क' रहल छथि। ई भिन्नतासभ बज्जिकाकेँ एकटा स्वतन्त्र भाषिक पहिचान देबामे सहायक सिद्ध होइत अछि।
'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीक साहित्यिक मूल्याङ्कन तखने पूर्ण आ प्रामाणिक मानल जायत, जखन एकर भाषिक आ व्याकरणिक संरचनाके वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बुझल जाय। बज्जिकाके भाषाविज्ञानमे 'पश्चिमी मैथिली' क उपभाषा मानल गेल हय, आ ई एगो वृहद् मैथिली भाषिक सातत्य (Maithili Dialect Continuum) क अभिन्न अङ्ग हय। हालाँकि, बज्जिका आ केन्द्रीय मैथिली (जइके मानक मैथिली मानल जाय हय) क बीच किछु विशिष्ट व्याकरणिक, ध्वन्यात्मक, आ रूपतात्त्विक (Morphological) भिन्नतासब हय जइ पर अभिषेक कुमार काश्यप जकाँ भाषाविज्ञानी निरन्तर शोध क' रहल छतन। ई भिन्नतासब बज्जिकाके एगो स्वतन्त्र भाषिक पहिचान देबामे सहायक सिद्ध होय हय।
निश्चल भाषिक विश्लेषणक लेल निम्नलिखित तालिका बज्जिका ओ केन्द्रीय मैथिलीक मुख्य व्याकरणिक विशेषतासभक तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करैत अछि:
निश्चल भाषिक विश्लेषणक लेल निम्नलिखित तालिका बज्जिका आ केन्द्रीय मैथिलीक मुख्य व्याकरणिक विशेषतासबक तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करय हय:
सारणी : बज्जिका आ केन्द्रीय/मानक मैथिलीक मुख्य भाषिक-व्याकरणिक तुलना
व्याकरणिक / भाषिक विशेषता
बज्जिका (पश्चिमी मैथिली)
केन्द्रीय / मानक मैथिली
प्रथम पुरुष सर्वनाम (First Person Pronoun)
प्रायः 'हम' (Ham) क व्यापक प्रयोग होइत अछि।
'हम' क सङ्ग-सङ्ग 'मई' / 'मएँ' क प्रयोग सेहो प्रचुर मात्रामे होइत अछि।
क्रिया रूप ओ अन्विति (Verb Agreement / Transitivity)
क्रियाक रूपमे अधिकतम दुइ टा सन्दर्भ (Two discourse referents - e.g., कर्ता ओ कर्म) केँ एक सङ्ग एन्कोड कएल जा सकैत अछि।
क्रियाक रूपमे तीन टा सन्दर्भ (Three discourse referents - e.g., कर्ता, कर्म, ओ सम्प्रदान) केँ एक सङ्ग एन्कोड करबाक जटिल व्यवस्था अछि।
ध्वन्यात्मकता ओ उच्चारण (Phonology)
महाप्राण (Aspirated) ओ अल्पप्राण (Non-aspirated) ध्वनिसभक विशिष्ट उच्चारण, तथा अनुनासिक (Nasalization) क अत्यन्त प्रचुर प्रयोग होइत अछि।
महाप्राण ध्वनिक प्रयोग अछि, मुदा अनुनासिक ध्वनिक सघनता बज्जिकाक तुलनामे किछु भिन्न ओ संयमित अछि।
वाक्य संरचना (Syntax)
कर्ता-कर्म-क्रिया (SOV - Subject-Object-Verb) संरचनाक अनुसरण करैत अछि, जेना "राम घर जा रहल है" / "सोंटा भुतलेय गेलई हिन्"।
कर्ता-कर्म-क्रिया (SOV) संरचना समान रूपें विद्यमान अछि, मुदा सहायक क्रियाक रूप भिन्न होइत अछि।
आदरसूचक शब्द ओ क्रिया (Honorifics)
आदरसूचक शब्दसभ (जेना 'आप', 'अहाँ', 'तू') क आधार पर क्रियाक रूपमे परिवर्तन होइत अछि।
सम्मान सूचक प्रणाली अत्यन्त जटिल अछि ओ वक्ता, श्रोता ओ तेसर व्यक्तिक सामाजिक स्तरक आधार पर क्रिया बदलैत अछि।
व्यञ्जन द्वित्व (Consonant Gemination)
शब्दसभमे व्यञ्जनकेँ द्वित्व (Geminated) करबाक प्रवृत्ति बेसी अछि, जेना /majjil/ (मज्जिल), /hammar/ (हम्मर)।
द्वित्व करबाक प्रवृत्ति अछि, मुदा बज्जिकाक तुलनामे एकर ध्वनि-विज्ञान भिन्न अछि।
बज्जिका शब्दावलीक विश्लेषण करला पर ज्ञात होइत अछि जे एहिमे तत्सम (संस्कृत सँ सीधे आगत), तद्भव, ओ देशज शब्दसभक सुन्दर सङ्गम अछि। देशज शब्द ओहि शब्दसभकेँ कहल जाइत अछि जे स्थानीय जनमानस द्वारा बोलचालमे स्वतः गढि लेल गेल अछि ओ जाहिक कोनो संस्कृत वा विदेशी मूल नहि अछि। बज्जिकाक अशिक्षित वा कृषक वर्ग एहन देशज शब्द ओ मुहावराक भरपूर प्रयोग करैत अछि। उदाहरणार्थ, मुहावरा "ढींड़ फुलाना" (गर्भवती होना) वा "निमला के मौगी सबके भौजाई" (गरीबक इज्जत सबके मजाकक साधन) बज्जिका लोक-जीवनक सामाजिक यथार्थ ओ लाक्षणिकता (लक्षणा ओ व्यञ्जना) केँ स्पष्ट करैत अछि।
बज्जिका शब्दावलीक विश्लेषण करला पर ज्ञात होय हय जे अइमे तत्सम (संस्कृत से सीधे आगत), तद्भव, आ देशज शब्दसबक सुन्दर सङ्गम हय। देशज शब्द ओइ शब्दसबके कहल जाय हय जे स्थानीय जनमानस द्वारा बोलचालमे स्वतः गढि लेल गेल हय आ जइक कोनो संस्कृत वा विदेशी मूल नहि हय। बज्जिकाक अशिक्षित वा कृषक वर्ग एहन देशज शब्द आ मुहावराक भरपूर प्रयोग करय हय। उदाहरणार्थ, मुहावरा "ढींड़ फुलाना" (गर्भवती होना) वा "निमला के मौगी सबके भौजाई" (गरीबक इज्जत सबके मजाकक साधन) बज्जिका लोक-जीवनक सामाजिक यथार्थ आ लाक्षणिकता (लक्षणा आ व्यञ्जना) के स्पष्ट करय हय।
डॉ. रामेश्वर प्रसादक 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीमे प्रयुक्त शब्दावली ई प्रमाणित करैत अछि जे बज्जिका ओ मैथिलीक बीचक सीमा रेखा अत्यन्त क्षीण अछि, मुदा एहिमे प्रयुक्त देशज शब्द ओ क्रिया-पद एकरा एकटा विशिष्ट स्थानीय सुगन्ध प्रदान करैत अछि।
डॉ. रामेश्वर प्रसादक 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीमे प्रयुक्त शब्दावली ई प्रमाणित करय हय जे बज्जिका आ मैथिलीक बीचक सीमा रेखा अत्यन्त क्षीण हय, मगर अइमे प्रयुक्त देशज शब्द आ क्रिया-पद एकरा एगो विशिष्ट स्थानीय सुगन्ध प्रदान करय हय।
खण्ड ४ : बज्जिका लोक-साहित्य ओ भाषाविज्ञानक बहुआयामी अनुसन्धान-रूपरेखा
बज्जिका भाषा, जे नेपाल ओ भारत दुनू देशक लाखो-करोड़ो लोकक मातृभाषा अछि, ओकरा वैश्वीकरण ओ आधुनिकताक प्रभाव सँ बचाबय लेल ओ ओकर अकादमिक महत्त्व स्थापित करबाक लेल केवल सङ्कलन पर्याप्त नहि अछि। डॉ. रामेश्वर प्रसाद द्वारा सङ्कलित गीतसभ ओ सम्पूर्ण बज्जिका लोक-वाङ्मयकेँ वैज्ञानिक, भाषावैज्ञानिक, ओ समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण सँ विश्लेषित करबाक लेल एकटा विस्तृत अनुसन्धान-रूपरेखाक नितान्त आवश्यकता अछि। ई अनुसन्धान-रूपरेखा एकटा अन्तर-अनुशासनात्मक (Interdisciplinary) प्रविधि पर आधारित हेबाक चाही।
बज्जिका भाषा, जे नेपाल आ भारत दुनू देशक लाखो-करोड़ो लोकक मातृभाषा हय, ओकरा वैश्वीकरण आ आधुनिकताक प्रभाव से बचाबय लेल आ ओकर अकादमिक महत्त्व स्थापित करबाक लेल केवल सङ्कलन पर्याप्त नहि हय। डॉ. रामेश्वर प्रसाद द्वारा सङ्कलित गीतसब आ सम्पूर्ण बज्जिका लोक-वाङ्मयके वैज्ञानिक, भाषावैज्ञानिक, आ समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विश्लेषित करबाक लेल एगो विस्तृत अनुसन्धान-रूपरेखाक नितान्त आवश्यकता हय। ई अनुसन्धान-रूपरेखा एगो अन्तर-अनुशासनात्मक (Interdisciplinary) प्रविधि पर आधारित हेबाक चाही।
१. अनुसन्धानक प्राथमिक उद्देश्य ओ परिकल्पना (Objectives and Hypothesis) · १. अनुसन्धानक प्राथमिक उद्देश्य आ परिकल्पना (Objectives and Hypothesis)
उद्देश्य १ (पाठ्य ओ विषयगत अन्वेषण): डॉ. रामेश्वर प्रसाद ओ अन्य विद्वानसभ द्वारा सङ्कलित लोकगीतसभमे अन्तर्निहित सामाजिक, पारिवारिक, लैङ्गिक (Gender), ओ पर्यावरण-सम्बन्धी विषयवस्तु केँ चिन्हित क' क' ओकर वैज्ञानिक वर्गीकरण करब।
उद्देश्य १ (पाठ्य आ विषयगत अन्वेषण): डॉ. रामेश्वर प्रसाद आ अन्य विद्वानसब द्वारा सङ्कलित लोकगीतसबमे अन्तर्निहित सामाजिक, पारिवारिक, लैङ्गिक (Gender), आ पर्यावरण-सम्बन्धी विषयवस्तु के चिन्हित क' क' ओकर वैज्ञानिक वर्गीकरण करब।
उद्देश्य २ (व्याकरणिक ओ भाषिक मानचित्रण - Linguistic Mapping): गीतसभमे प्रयुक्त बज्जिका शब्दावली, क्रियाक रूप, कारक (Case marking), ओ वाक्य-विन्यासकेँ केन्द्रीय मैथिली, भोजपुरी ओ मगहीक सङ्ग तुलनात्मक अध्ययन क' क' बज्जिकाक स्वतन्त्र व्याकरणिक नियमसभक कोडिफिकेशन (Codification) करब।
उद्देश्य २ (व्याकरणिक आ भाषिक मानचित्रण - Linguistic Mapping): गीतसबमे प्रयुक्त बज्जिका शब्दावली, क्रियाक रूप, कारक (Case marking), आ वाक्य-विन्यासके केन्द्रीय मैथिली, भोजपुरी आ मगहीक सङ्ग तुलनात्मक अध्ययन क' क' बज्जिकाक स्वतन्त्र व्याकरणिक नियमसबक कोडिफिकेशन (Codification) करब।
उद्देश्य ३ (नारीवादी ओ सीमान्तकृत विमर्शक डिकोडिंग): लोकगीतसभमे (विशेष रूप सँ जतसारी, सोहर ओ गाथा-गीतसभमे) स्त्री-स्वतन्त्रता, पितृसत्ताक प्रभाव, ओ दीना-भद्री जकाँ गाथामे सीमान्तकृत वर्गक स्वरकेँ डिकोड करब।
उद्देश्य ३ (नारीवादी आ सीमान्तकृत विमर्शक डिकोडिंग): लोकगीतसबमे (विशेष रूप से जतसारी, सोहर आ गाथा-गीतसबमे) स्त्री-स्वतन्त्रता, पितृसत्ताक प्रभाव, आ दीना-भद्री जकाँ गाथामे सीमान्तकृत वर्गक स्वरके डिकोड करब।
उद्देश्य ४ (डिजिटल संरक्षण ओ कम्प्युटेशनल लिङ्ग्विस्टिक्स): विलुप्त भ' रहल एहि अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage) केँ डिजिटल माध्यम सँ संरक्षित करबाक उपाय खोजनाइ ओ प्राकृतिक भाषा प्रशोधन (NLP) क लेल कर्पस (Corpus) निर्माण करब।
उद्देश्य ४ (डिजिटल संरक्षण आ कम्प्युटेशनल लिङ्ग्विस्टिक्स): विलुप्त भ' रहल अइ अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage) के डिजिटल माध्यम से संरक्षित करबाक उपाय खोजनाइ आ प्राकृतिक भाषा प्रशोधन (NLP) क लेल कर्पस (Corpus) निर्माण करब।
२. सैद्धान्तिक परिप्रेक्ष्य (Theoretical Framework)
ई शोध निम्नलिखित आधुनिक सिद्धान्तसभक आलोकमे सम्पादित कएल जायत:
ई शोध निम्नलिखित आधुनिक सिद्धान्तसबक आलोकमे सम्पादित कैल जायत:
नारीवादी आलोचनात्मक विमर्श (Feminist Critical Discourse Analysis - FCDA): एहि सिद्धान्तिक अन्तर्गत ई देखल जायत जे बज्जिका लोकगीत ओ मुहावरासभमे नारीकेँ कोना प्रस्तुत कएल गेल अछि। की ओ केवल एकटा आज्ञाकारी पुत्री/पत्नीक रूपमे चित्रित अछि, अथवा श्रम गीतसभक माध्यम सँ ओ पितृसत्ताक विरुद्ध अपन प्रतिरोध (Resistance) दर्ज क' रहल अछि?।
नारीवादी आलोचनात्मक विमर्श (Feminist Critical Discourse Analysis - FCDA): अइ सिद्धान्तिक अन्तर्गत ई देखल जायत जे बज्जिका लोकगीत आ मुहावरासबमे नारीके कइसे प्रस्तुत कैल गेल हय। की आ केवल एगो आज्ञाकारी पुत्री/पत्नीक रूपमे चित्रित हय, अथवा श्रम गीतसबक माध्यम से आ पितृसत्ताक विरुद्ध अपन प्रतिरोध (Resistance) दर्ज क' रहल हय?।
पारिस्थितिक-आलोचना (Eco-criticism): ऋतु गीत, कृषि गीत (रोपनी), ओ दीना-भद्री गाथामे मानव ओ प्रकृतिक अन्तर्सम्बन्ध, वन-सम्पदाक संरक्षण, ओ जल-स्रोतक महत्त्वक अध्ययन कएल जायत।
पारिस्थितिक-आलोचना (Eco-criticism): ऋतु गीत, कृषि गीत (रोपनी), आ दीना-भद्री गाथामे मानव आ प्रकृतिक अन्तर्सम्बन्ध, वन-सम्पदाक संरक्षण, आ जल-स्रोतक महत्त्वक अध्ययन कैल जायत।
समाजशास्त्रीय भाषाविज्ञान (Sociolinguistics): भाषा ओ समाजक सम्बन्धक अध्ययन; कोना बज्जिका भाषा अपन वक्तासभक (विशेषतः वैशाली, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी ओ नेपालक तराई क्षेत्रमे) सांस्कृतिक पहिचान (Cultural Identity) स्थापित करैत अछि ओ कोना आधुनिकताक कारणें युवा वर्गमे ई भाषा सङ्कटग्रस्त भ' रहल अछि।
समाजशास्त्रीय भाषाविज्ञान (Sociolinguistics): भाषा आ समाजक सम्बन्धक अध्ययन; कइसे बज्जिका भाषा अपन वक्तासबक (विशेषतः वैशाली, मुजफ्फरपुर, सीतामढ़ी आ नेपालक तराई क्षेत्रमे) सांस्कृतिक पहिचान (Cultural Identity) स्थापित करय हय आ कइसे आधुनिकताक कारणें युवा वर्गमे ई भाषा सङ्कटग्रस्त भ' रहल हय।
३. शोधक कार्यप्रणाली ओ प्रविधि (Research Methodology) · ३. शोधक कार्यप्रणाली आ प्रविधि (Research Methodology)
एहि अनुसन्धानकेँ चारि टा क्रमिक चरणमे सम्पादित कएल जायत:
अइ अनुसन्धानके चारि टा क्रमिक चरणमे सम्पादित कैल जायत:
प्रथम चरण: पाठ्य-सङ्कलन, कोडिंग ओ अर्थ-विश्लेषण (Data Collection, Thematic Coding and Semantic Analysis) · प्रथम चरण: पाठ्य-सङ्कलन, कोडिंग आ अर्थ-विश्लेषण (Data Collection, Thematic Coding and Semantic Analysis)
सर्वप्रथम डॉ. रामेश्वर प्रसादक 'बज्जिका गीत-संगीत', 'बज्जिका लोकगीत', ओ निर्मल मिलिन्दक 'तरहात्ती पर तरेगन' जकाँ प्राथमिक स्रोतसभ सँ गीतसभकेँ सङ्कलित कएल जायत।
सर्वप्रथम डॉ. रामेश्वर प्रसादक 'बज्जिका गीत-संगीत', 'बज्जिका लोकगीत', आ निर्मल मिलिन्दक 'तरहात्ती पर तरेगन' जकाँ प्राथमिक स्रोतसब से गीतसबके सङ्कलित कैल जायत।
गीतसभकेँ अवसर (संस्कार, ऋतु, श्रम, धर्म) क आधार पर वर्गीकृत क' क' क्वालिटेटिव डेटा एनालाइसिस (Qualitative Data Analysis) कएल जायत।
गीतसबके अवसर (संस्कार, ऋतु, श्रम, धर्म) क आधार पर वर्गीकृत क' क' क्वालिटेटिव डेटा एनालाइसिस (Qualitative Data Analysis) कैल जायत।
गीतसभमे प्रयुक्त उपमा, रूपक, ओ मुहावरासभकेँ चिन्हित क' क' ओकर सांस्कृतिक ओ लाक्षणिक अर्थ निकालल जायत।
गीतसबमे प्रयुक्त उपमा, रूपक, आ मुहावरासबके चिन्हित क' क' ओकर सांस्कृतिक आ लाक्षणिक अर्थ निकालल जायत।
द्वितीय चरण: भाषिक, रूपतात्त्विक ओ वाक्य-विन्यास विश्लेषण (Morpho-syntactic and Phonological Analysis) · द्वितीय चरण: भाषिक, रूपतात्त्विक आ वाक्य-विन्यास विश्लेषण (Morpho-syntactic and Phonological Analysis)
गीतसभक क्रिया-पदसभ ओ सहायक क्रियासभक (Auxiliary verbs) सूक्ष्मता सँ अध्ययन कएल जायत। बज्जिकाकेँ मैथिली सँ पृथक् करय वला महाप्राण ध्वनिसभ (Aspirated sounds), अनुनासिकक प्रयोग, ओ व्यञ्जन द्वित्वक (Gemination) ध्वनिक विश्लेषण कएल जायत।
गीतसबक क्रिया-पदसब आ सहायक क्रियासबक (Auxiliary verbs) सूक्ष्मता से अध्ययन कैल जायत। बज्जिकाके मैथिली से पृथक् करय वला महाप्राण ध्वनिसब (Aspirated sounds), अनुनासिकक प्रयोग, आ व्यञ्जन द्वित्वक (Gemination) ध्वनिक विश्लेषण कैल जायत।
आदरसूचक शब्दसभ (Honorifics) क प्रयोगकेँ सामाजिक स्तर (Social stratification) क परिप्रेक्ष्यमे देखल जायत। एहि लेल वक्ता ओ श्रोताक बीचक शक्ति-सन्तुलन (Power dynamics) क अध्ययन आवश्यक अछि।
आदरसूचक शब्दसब (Honorifics) क प्रयोगके सामाजिक स्तर (Social stratification) क परिप्रेक्ष्यमे देखल जायत। अइ लेल वक्ता आ श्रोताक बीचक शक्ति-सन्तुलन (Power dynamics) क अध्ययन आवश्यक हय।
तृतीय चरण: क्षेत्रीय अध्ययन ओ ऐतिहासिक-नृजातीय अनुसन्धान (Ethnographic, Spatial and Historical Study) · तृतीय चरण: क्षेत्रीय अध्ययन आ ऐतिहासिक-नृजातीय अनुसन्धान (Ethnographic, Spatial and Historical Study)
पोथीमे वर्णित सांस्कृतिक सन्दर्भसभकेँ वर्तमान तिरहुत प्रमण्डल (मुजफ्फरपुर, वैशाली) ओ नेपालक तराई क्षेत्रक जनजीवन सँ मिला क' देखबाक लेल फील्ड-वर्क (Fieldwork) कएल जायत।
पोथीमे वर्णित सांस्कृतिक सन्दर्भसबके वर्तमान तिरहुत प्रमण्डल (मुजफ्फरपुर, वैशाली) आ नेपालक तराई क्षेत्रक जनजीवन से मिला क' देखबाक लेल फील्ड-वर्क (Fieldwork) कैल जायत।
गीतसभमे 'बिरहा', 'विदेशिया', ओ अम्बापाली (वैशालीक नगरवधू) क ऐतिहासिक प्रभावकेँ अन्वेषित कएल जायत। रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखित 'अम्बापाली' नाटक ओ बज्जिका लोक-संस्कृतिक गहीर सम्बन्धकेँ ऐतिहासिक साक्ष्यक आधार पर स्थापित कएल जायत।
गीतसबमे 'बिरहा', 'विदेशिया', आ अम्बापाली (वैशालीक नगरवधू) क ऐतिहासिक प्रभावके अन्वेषित कैल जायत। रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा लिखित 'अम्बापाली' नाटक आ बज्जिका लोक-संस्कृतिक गहीर सम्बन्धके ऐतिहासिक साक्ष्यक आधार पर स्थापित कैल जायत।
भिखारी ठाकुरक 'विदेशिया' परम्परा सँ बज्जिका गीतसभक अन्तर्निहित साम्य ओ वैषम्यक अध्ययन कएल जायत।
भिखारी ठाकुरक 'विदेशिया' परम्परा से बज्जिका गीतसबक अन्तर्निहित साम्य आ वैषम्यक अध्ययन कैल जायत।
चतुर्थ चरण: डिजिटाइजेशन, भाषा-संरक्षण रणनीति ओ कर्पस निर्माण (Digitization, Conservation Strategy and Corpus Building) · चतुर्थ चरण: डिजिटाइजेशन, भाषा-संरक्षण रणनीति आ कर्पस निर्माण (Digitization, Conservation Strategy and Corpus Building)
भारत सरकारक 'भारतीय भाषा संस्थान' (CIIL) ओ 'भारतवाणी' परियोजनाक उद्देश्यक अनुरूप एहि लिखित लोकगीतसभकेँ ध्वन्यात्मक रूपमे (Audio-visual format) रेकर्ड क' क' एकर एकटा 'डिजिटल भाषिक भण्डार' (Digital Linguistic Corpus) तैयार कएल जायत।
भारत सरकारक 'भारतीय भाषा संस्थान' (CIIL) आ 'भारतवाणी' परियोजनाक उद्देश्यक अनुरूप अइ लिखित लोकगीतसबके ध्वन्यात्मक रूपमे (Audio-visual format) रेकर्ड क' क' एकर एगो 'डिजिटल भाषिक भण्डार' (Digital Linguistic Corpus) तैयार कैल जायत।
कम्प्युटेशनल लिङ्ग्विस्टिक्सकेँ प्रयोग करैत बज्जिका शब्दावलीक 'पार्ट-ऑफ-स्पीच टैगिंग' (POS Tagging) ओ एकटा प्रामाणिक बज्जिका-मैथिली-हिन्दी त्रिभाषी शब्दकोश निर्माणक प्रारूप तैयार कएल जायत।
कम्प्युटेशनल लिङ्ग्विस्टिक्सके प्रयोग करय बज्जिका शब्दावलीक 'पार्ट-ऑफ-स्पीच टैगिंग' (POS Tagging) आ एगो प्रामाणिक बज्जिका-मैथिली-हिन्दी त्रिभाषी शब्दकोश निर्माणक प्रारूप तैयार कैल जायत।
४. अध्ययनक सम्भावित परिणाम ओ अकादमिक योगदान (Expected Outcomes) · ४. अध्ययनक सम्भावित परिणाम आ अकादमिक योगदान (Expected Outcomes)
ई गहन शोध केवल डॉ. रामेश्वर प्रसादक 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीकेँ एकटा साहित्यिक ग्रन्थक रूपमे पुनर्जीवित नहि करत, अपितु बज्जिका भाषी क्षेत्रक एक करोड़ सँ अधिक वक्तासभक सांस्कृतिक पहिचान ओ आत्मसम्मानकेँ सेहो सुदृढ करत।
ई गहन शोध केवल डॉ. रामेश्वर प्रसादक 'बज्जिका गीत-संगीत' पोथीके एगो साहित्यिक ग्रन्थक रूपमे पुनर्जीवित नहि करत, बल्कि बज्जिका भाषी क्षेत्रक एक करोड़ से अधिक वक्तासबक सांस्कृतिक पहिचान आ आत्मसम्मानके सेहो सुदृढ करत।
ई अध्ययन अकादमिक जगतमे ई सिद्ध करत जे बज्जिका लोकगीतसभमे मानवीय अनुभूतिक जे विविधता, दार्शनिक गम्भीरता, ओ काव्य-सौन्दर्य अछि, ओ कोनो भी समृद्ध शास्त्रीय वा लिखित साहित्य सँ कम नहि अछि।
ई अध्ययन अकादमिक जगतमे ई सिद्ध करत जे बज्जिका लोकगीतसबमे मानवीय अनुभूतिक जे विविधता, दार्शनिक गम्भीरता, आ काव्य-सौन्दर्य हय, आ कोनो भी समृद्ध शास्त्रीय वा लिखित साहित्य से कम नहि हय।
भाषाविज्ञानक छात्र ओ शोधार्थीसभक लेल ई एकटा प्रामाणिक सन्दर्भ ग्रन्थक काज करत, जे स्पष्ट करत जे बज्जिका ओ मैथिलीक बीचक सम्बन्ध मात्र बोलीक नहि, अपितु एकटा ऐतिहासिक ओ सातत्यपूर्ण (Continuous) भाषिक विकासक अछि।
भाषाविज्ञानक छात्र आ शोधार्थीसबक लेल ई एगो प्रामाणिक सन्दर्भ ग्रन्थक काज करत, जे स्पष्ट करत जे बज्जिका आ मैथिलीक बीचक सम्बन्ध मात्र बोलीक नहि, बल्कि एगो ऐतिहासिक आ सातत्यपूर्ण (Continuous) भाषिक विकासक हय।
नीति-निर्मातासभ (Policy Makers) ओ शैक्षणिक संस्थानसभ, जेना कि बिहार विश्वविद्यालय (मुजफ्फरपुर), केँ स्नातक ओ स्नातकोत्तर पाठ्यक्रममे बज्जिका साहित्यक पठन-पाठन सम्मिलित करबाक लेल ई शोध एकटा ठोस आधार प्रदान करत।
नीति-निर्मातासब (Policy Makers) आ शैक्षणिक संस्थानसब, जइसे कि बिहार विश्वविद्यालय (मुजफ्फरपुर), के स्नातक आ स्नातकोत्तर पाठ्यक्रममे बज्जिका साहित्यक पठन-पाठन सम्मिलित करबाक लेल ई शोध एगो ठोस आधार प्रदान करत।
उपसंहार ओ निष्कर्ष · उपसंहार आ निष्कर्ष
डॉ. रामेश्वर प्रसाद द्वारा सम्पादित 'बज्जिका गीत-संगीत' केवल किछु लोकगीतक छपल पोथी मात्र नहि अछि; ई तिरहुत ओ मिथिलाक माटिक, ओतय क आबोहवाक, ओ एहि क्षेत्रक लोकक हृदयक स्पन्दनकेँ शब्दमे बान्हबाक एकटा ऐतिहासिक दस्तावेज अछि। जाँतकेँ घुमबैत काकी-भउजीक दर्द, साओनक रिमझिम फुहारमे कजरी गाबैत विरहिणीक आकुलता, सन्तान जन्मक प्रसव-पीडा सँ उपजल उल्लास, ओ विवाहक मण्डप सँ विदा होइत धीयाक (पुत्रीक) नेत्रक लोड़क जे वर्णन एहि पोथीक प्रतिनिधित्व करैत अछि, ओ समग्र मानव-जातिक अनुभूतिक सार्वभौमिक सत्य अछि।
डॉ. रामेश्वर प्रसाद द्वारा सम्पादित 'बज्जिका गीत-संगीत' केवल किछु लोकगीतक छपल पोथी मात्र नहि हय; ई तिरहुत आ मिथिलाक माटिक, ओहाँ क आबोहवाक, आ अइ क्षेत्रक लोकक हृदयक स्पन्दनके शब्दमे बान्हबाक एगो ऐतिहासिक दस्तावेज हय। जाँतके घुमबैत काकी-भउजीक दर्द, साओनक रिमझिम फुहारमे कजरी गाबैत विरहिणीक आकुलता, सन्तान जन्मक प्रसव-पीडा से उपजल उल्लास, आ विवाहक मण्डप से विदा होय धीयाक (पुत्रीक) नेत्रक लोड़क जे वर्णन अइ पोथीक प्रतिनिधित्व करय हय, आ समग्र मानव-जातिक अनुभूतिक सार्वभौमिक सत्य हय।
एहि अनुसन्धान-रूपरेखासँ ई बात दृढ़तापूर्वक रेखाङ्कित करैत अछि जे लोक-साहित्यकेँ केवल भावुकता, पुरानी परम्परा, वा गाम-देहातक रागरङ्गक दृष्टिसँ नहि देखल जेबाक चाही। एकरा गम्भीर अकादमिक, भाषावैज्ञानिक, पारिस्थितिक ओ समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण सँ विश्लेषित करबाक आवश्यकता अछि। बज्जिका भाषा ओ एकर समृद्ध साङ्गीतिक परम्परा विश्व-साहित्यक एकटा अमूल्य रत्न अछि, जाहिक प्रत्येक पन्नामे ओ प्रत्येक स्वरमे एकटा सम्पूर्ण युगक धड़कन सुरक्षित अछि। एहि पर यदि प्रस्तावित वैज्ञानिक शोध कएल जाय, तँ ई बज्जिका ओ समग्र मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ वैश्विक पटल पर एकटा नव, प्रामाणिक ओ गौरवशाली पहिचान देबामे निश्चित रूपें सफल सिद्ध होएत। ई हमरा लोकनिक सामूहिक उत्तरदायित्व अछि जे एहि अमूर्त धरोहरकेँ कालक गालमे समाहित हेबा सँ रक्षा करी ओ एकरा आगामी पीढीक लेल सहेज क' राखी।
अइ अनुसन्धान-रूपरेखासे ई बात दृढ़तापूर्वक रेखाङ्कित करय हय जे लोक-साहित्यके केवल भावुकता, पुरानी परम्परा, वा गाम-देहातक रागरङ्गक दृष्टिसे नहि देखल जेबाक चाही। एकरा गम्भीर अकादमिक, भाषावैज्ञानिक, पारिस्थितिक आ समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से विश्लेषित करबाक आवश्यकता हय। बज्जिका भाषा आ एकर समृद्ध साङ्गीतिक परम्परा विश्व-साहित्यक एगो अमूल्य रत्न हय, जइक प्रत्येक पन्नामे आ प्रत्येक स्वरमे एगो सम्पूर्ण युगक धड़कन सुरक्षित हय। अइ पर यदि प्रस्तावित वैज्ञानिक शोध कैल जाय, तँ ई बज्जिका आ समग्र मैथिली साहित्यक भण्डारके वैश्विक पटल पर एगो नव, प्रामाणिक आ गौरवशाली पहिचान देबामे निश्चित रूपें सफल सिद्ध होत। ई हमरा लोकक सामूहिक उत्तरदायित्व हय जे अइ अमूर्त धरोहरके कालक गालमे समाहित हेबा से रक्षा करी आ एकरा आगामी पीढीक लेल सहेज क' राखी।
विस्तृत ग्रन्थ-सूची
एहि सूचीमे केवल पोथी आ मुद्रित ग्रन्थ राखल गेल अछि; पत्र-पत्रिका, शोध-पत्र, जाल-स्रोत आ वेबसाइट नहि। जतय प्रकाशन-वर्ष वा प्रकाशकक स्पष्ट सूचना उपलब्ध अछि, ओतय देल गेल अछि; अनिश्चित सूचना अनुमानसँ नहि जोड़ल गेल अछि। विदेशी ग्रन्थसभक शीर्षक पाठक-सुविधा लेल मैथिली रूपमे देल गेल अछि।
१. प्राथमिक कृति, बज्जिका साहित्य आ भाषिक स्रोत
1. रामेश्वर प्रसाद। ‘बज्जिका गीत-संगीत’। मुजफ्फरपुर: किशोर प्रकाशन, प्रथम संस्करण, २०००।
2. रामेश्वर प्रसाद। ‘बज्जिका लोकगीत’। मुजफ्फरपुर: किशोर प्रकाशन, २०००।
3. रामेश्वर प्रसाद। ‘बज्जिका स्वर संगम’। मुजफ्फरपुर: किशोर प्रकाशन, २०००।
4. निर्मल मिलिन्द। ‘गितिया’। १९८४।
5. निर्मल मिलिन्द। ‘तरहात्ती पर तरेगन’: बज्जिका गीत आ कविता। १९९९।
6. निर्मल मिलिन्द। ‘खिस्सा पेहानी’: बज्जिकाक प्रतिनिधि कथा-संकलन। अखिल भारतीय बज्जिका साहित्य सम्मेलन, सिकन्दराबाद।
7. प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मणि’। ‘बज्जिका साहित्य का इतिहास’। मुजफ्फरपुर: हंसराज प्रकाशन, १९९५।
8. योगेन्द्र राय। ‘बज्जिका व्याकरण’। हाजीपुर: शैलेश भूषण, १९८७।
9. योगेन्द्र प्रसाद सिन्हा। ‘बज्जिका का स्वरूप’। मुजफ्फरपुर: बज्जिका संस्थान, १९९७।
10. अवधेश्वर अरुण। ‘बज्जिका रामायण’।
11. चन्द्र किशोर श्वेतांशु। ‘इंजुरी भर सिंहोरवा’। सीतामढ़ी: समीक्षा प्रकाशन, १९७७।
12. देवेन्द्र राकेश। ‘साँच में आँच कि?’ मुजफ्फरपुर: अहिल्या प्रकाशन, १९७०।
13. सियाराम तिवारी। ‘बज्जिका भाषा और साहित्य’। पटना: बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, १९६४।
14. सुरेन्द्र मोहन प्रसाद, सम्पादक। ‘बज्जिका-हिन्दी शब्दकोश’। अखिल भारतीय बज्जिका साहित्य सम्मेलन, २०००।
15. विद्यापति। ‘कीर्तिलता’।
16. हलदर दास। ‘सुदामाचरित्र’।
17. मँगनीराम। ‘मँगनीराम की साखी’।
18. मँगनीराम। ‘रामसागर पोथी’।
19. मँगनीराम। ‘अनमोल रतन’।
20. रामवृक्ष बेनीपुरी। ‘अम्बापाली’।
21. भिखारी ठाकुर। ‘विदेशिया’।
२. भारतीय काव्यशास्त्र, रस-ध्वनि-वक्रोक्ति आ नव्य-न्याय
22. भरतमुनि। ‘नाट्यशास्त्र’।
23. आनन्दवर्धन। ‘ध्वन्यालोक’।
24. कुन्तक। ‘वक्रोक्तिजीवितम्’।
25. अभिनवगुप्त। ‘अभिनवभारती’: ‘नाट्यशास्त्र’ पर टीका।
26. मम्मट। ‘काव्यप्रकाश’।
27. विश्वनाथ कविराज। ‘साहित्यदर्पण’।
28. गङ्गेश उपाध्याय। ‘तत्त्वचिन्तामणि’।
३. पाश्चात्य आलोचना, समाज-सिद्धान्त, मौखिकता आ प्रदर्शन
29. कार्ल मार्क्स। ‘पूँजी’, पहिल खण्ड। हैम्बर्ग: ओटो मैस्नर प्रकाशन, १८६७।
30. लुई अल्थ्यूसर। ‘लेनिन आ दर्शन तथा अन्य निबन्ध’। लन्दन: न्यू लेफ्ट बुक्स, १९७१।
31. अन्तोनियो ग्राम्शी। ‘कारागार-पुस्तिकासँ चयन’। क्विन्टिन होअर आ जेफ्री नोवेल-स्मिथ, सम्पादक। न्यूयॉर्क: इन्टरनेशनल पब्लिशर्स, १९७१।
32. गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक। ‘उत्तर-औपनिवेशिक तर्कक समालोचना: लुप्त होइत वर्तमानक इतिहास दिस’। कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, १९९९।
33. मिखाइल बाख्तिन। ‘दोस्तोयेव्स्कीक काव्यशास्त्रक समस्यासभ’। कैरिल इमर्सन, सम्पादक। मिनेयापोलिस: यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा प्रेस, १९८४।
34. वाल्टर जे. ऑङ्ग। ‘मौखिकता आ साक्षरता: शब्दक प्रौद्योगिकीकरण’। लन्दन: मेथुएन, १९८२।
35. अल्बर्ट बी. लॉर्ड। ‘कथागायक’। कैम्ब्रिज, मैसाचुसेट्स: हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, १९६०।
36. पॉल जुम्थोर। ‘मौखिक कविता: एक परिचय’। मिनेयापोलिस: यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा प्रेस, १९९०।
37. क्लीनथ ब्रुक्स। ‘सुगढ़ कलश: कविताक संरचनाक अध्ययन’। न्यूयॉर्क: हार्कोर्ट ब्रेस, १९४७।
38. रिचर्ड बाउमन। ‘मौखिक कला प्रदर्शनक रूपमे’। रोली, मैसाचुसेट्स: न्यूबरी हाउस, १९७७।
39. ग्रेग गैरार्ड। ‘पारिस्थितिक आलोचना’। लन्दन: राउटलेज, २००४।
40. विलियम लैबोव। ‘समाजभाषावैज्ञानिक प्रतिरूप’। फिलाडेल्फिया: यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया प्रेस, १९७२।
41. नॉर्मन फेयरक्लफ। ‘भाषा आ सत्ता’। लन्दन: लाँगमैन, १९८९।