भारतीय दलित साहित्य: मैथिली अनुवाद, समीक्षा आ सौन्दर्यशास्त्र
काव्य • कथा • अनुवाद • समीक्षा-सिद्धान्त • रस-दृष्टि • समानान्तर साहित्यिक परम्परा
समेकित संस्करण — मूल दस्तावेजमे संकलित सभ समीक्षा, सैद्धान्तिक विवेचन, साहित्यिक पाठ आ अनुलग्नककेँ एकहि सम्पादकीय क्रममे प्रस्तुत कएल गेल अछि। पुनरावृत्त सामग्रीकेँ केवल सत्यापित दोहरावक स्थितिमे समेटल गेल अछि; मूल आशय आ सामग्री सुरक्षित राखल गेल अछि।
विषय-संकेत
१. तेलुगु दलित काव्य आ दलित-स्त्री काव्य
२. गुजराती आ उड़िया दलित काव्य
३. तेलुगु दलित लघुकथा आ उपन्यास
४. समग्र अनुवाद-समीक्षा आ रस-सिद्धान्त
५. मैथिली मूल/अनूदित दलित साहित्य लेल समीक्षा-सिद्धान्त
६. विद्यापति, विदेसिया आ समानान्तर साहित्यिक अनुलग्नक
७. ग्रन्थ-सूची
दलित काव्य समीक्षा: बोयी भीमन्नाक दू टा कविता
जरैत खोपड़ी सभ आ हमर पैतृक अधिकार
प्रारम्भिक टिप्पणी
बोयी भीमन्ना (१९२०–२००१) तेलुगु दलित साहित्यक एकटा स्तम्भ छलाह। हुनकर कविता मात्र व्यक्तिगत पीड़ाक अभिव्यक्ति नहि, बल्कि एकटा सामूहिक ऐतिहासिक चेतनाक दस्तावेज थिक। प्रस्तुत दूनू कविता — गुडिसेलु कालिपोतुन्नायी आ ना वारसत्वपु हक्कुलु — हुनकर काव्य-संसारक दूटा भिन्न मुदा परस्पर-सम्बद्ध आयाम प्रस्तुत करैत अछि: एक दिस धार्मिक हिंसाक चक्रव्यूह, दोसर दिस पौराणिक इतिहासक पुनर्पाठ।
१. काव्य-रूप आ संरचना
जरैत खोपड़ी सभ
एहि कविताक सर्वाधिक उल्लेखनीय शिल्पगत विशेषता थिक एकर प्रश्न-उत्तर संरचना। कविता लगातार स्वयंसँ प्रश्न पुछैत अछि — "ई केकर खोपड़ी? ", "कतय सँ बेर-बेर उगि अबैत छैक? " — आ फेर स्वयं उत्तर दैत अछि, मुदा ओ उत्तर पुनः एकटा नव प्रश्नमे परिणत भऽ जाइत अछि। ई संरचना सुकरात-पद्धतिक स्मरण दिअबैत अछि, जतय प्रश्नक शृंखलासँ सत्यक उद्घाटन होइत अछि — मुदा एतय सत्य कोनो दार्शनिक निष्कर्षमे नहि, बल्कि एकटा कड़वा सामाजिक यथार्थमे अवस्थित होइत अछि।
पुनरावृत्ति — "जरि रहल अछि", "उगि अबैत छैक" — एकटा मन्त्र-प्रभाव सृजित करैत अछि। अनुप्रास-आरम्भ (एकहि शब्दसँ पंक्ति आरम्भ करबाक काव्य-विधि) आ अन्त्य-पुनरावृत्ति (पंक्तिक अन्तमे एकहि शब्द दोहराएब) दूनूक प्रयोग एहि कविताकेँ मौखिक परम्पराक, लोकगीतक निकट लबैत अछि — एहिसँ ई अनुमान होइत अछि जे भीमन्ना दलित मौखिक-सांस्कृतिक परम्पराकेँ लिखित कवितामे अन्तर्निहित करैत छथि।
हमर पैतृक अधिकार
एहि कवितामे संरचना अधिक खण्डित आ आख्यानात्मक अछि। कविता एक पौराणिक प्रसंगसँ दोसरमे कूदैत अछि — वशिष्ठ, अरुन्धती, मत्स्यगन्धी, व्यास — जेना एकटा उद्विग्न इतिहास-पाठक गोटेक पृष्ठ पलटैत छल। ई खण्डितपना आकस्मिक नहि; ई दलित इतिहास-बोधक प्रतीक थिक जतय स्मृति पूर्ण नहि, बल्कि चोराएल आ तितर-बितर कएल गेल अछि।
कविताक अन्तिम पंक्तियाँ लम्बी, भारी साँसक जकाँ चलैत अछि — "मात्र गर्व सँ फ्याँकि देबाक लेल! / सम्पूर्ण सम्मान सँ साँस लेबाक लेल! " — ई समापन एकटा विजय-घोषणा थिक, मुदा एहिमे विजय-उल्लास नहि, बल्कि एकटा गंभीर, गहिर मुक्तिक अनुभव अछि।
२. भाषा आ रूपक
खोपड़ीक रूपक
जरैत खोपड़ी सभक केन्द्रीय बिम्ब — जरैत आ बारम्बार पुनर्जन्म लैत खोपड़ी — अत्यन्त बहुस्तरीय अछि। एकटा स्तरपर ई स्पष्टतः जातीय हिंसाक संकेत करैत अछि: दलितक ऊपर सामूहिक हिंसाक इतिहास, खोपड़ी काटल जाएब, जराएल जाएब। दोसर स्तरपर ई हिन्दू पुनर्जन्म-दर्शनक व्यंग्यात्मक उपयोग थिक — कवि पुछैत छथि: जँ पुनर्जन्मक सिद्धांत सत्य अछि, तँ एही दलितकेँ बारम्बार किएक जराएल जाइत छैक? पुनर्जन्म तँ मोक्षक मार्ग छल — मुदा दलितक लेल ई एकटा अन्तहीन दुष्चक्र बनि जाइत अछि।
ई फ्रान्ट्ज़ फानोंक धरतीक अभागल (औपनिवेशिक शोषणक विरुद्ध क्रान्तिक दार्शनिक ग्रन्थ) क ओहि विश्लेषणसँ मेल खाइत अछि जतय ओ देखाबैत छथि जे औपनिवेशिक आ जातीय व्यवस्था पीड़ितकेँ हिंसाक चक्रमे एहन तरहसँ फँसाबैत अछि जे पीड़ित स्वयं ओहि चक्रकेँ सामान्य मानऽ लगैत अछि — जाधरि "एहि खोपड़ीक रहस्य एकर बासिन्दा सभकेँ पता नै चलि जाय। "
कब्रिस्तान खनबाक रूपक
हमर पैतृक अधिकारमे कब्रिस्तान खनबाक बिम्ब असाधारण जटिल अछि। सामान्यतः कब्रिस्तान खनब मृत्युसँ सम्बद्ध, अमंगल। मुदा एतय कवि एकर अर्थ उलटि दैत छथि — कब्रिस्तान खनब पुनर्प्राप्तिक कार्य थिक। जे दफनाएल गेल छल — दलितक वैदिक पहचान, हुनकर ऐतिहासिक अधिकार — तकरा खनिकऽ बाहर अनब एकटा क्रान्तिकारी कार्य बनि जाइत अछि।
एहिमे वाल्टर बेंजामिनक "इतिहासक दर्शन पर थीसिस" (इतिहासकेँ विजेताक दृष्टिसँ नहि, पीड़ितक दृष्टिसँ देखबाक माँग करैत दार्शनिक निबन्ध) क प्रतिध्वनि सुनाइत अछि। बेंजामिन कहैत छथि जे इतिहास सदैव विजेताक दृष्टिकोणसँ लिखाइत अछि, आ क्रान्तिकारी कार्य थिक "खतरनाक स्मृति" केँ — खतरनाक स्मृति — पुनर्जीवित करब। भीमन्ना ठीक इएह करैत छथि: ओ ओहि "खतरनाक स्मृति" खनैत छथि जकरा ब्राह्मणवादी इतिहास-लेखनी दफनाकऽ रखने छल।
३. पौराणिक-विरोधी पाठ
हमर पैतृक अधिकार दलित साहित्यक एकटा महत्त्वपूर्ण परम्परामे स्थित अछि — पौराणिक आख्यानक उल्टा पाठ। एहि परम्पराकेँ बी. आर. आम्बेडकर हिन्दू धर्मक पहेलियाँ आ शूद्र के छलाह? मे प्रतिष्ठित कएल छलाह। भीमन्ना एही विधिसँ पूरा महाभारत-रामायण-वेद-परम्पराकेँ प्रश्नांकित करैत छथि।
कविताक मूल तर्क ई थिक: वैदिक-आर्य परम्पराक महान व्यक्तित्व सब वास्तवमे जातिहीन वा दलित मूलक छलाह — वशिष्ठ, मत्स्यगन्धी, व्यास। मुदा ब्राह्मणवादी इतिहासने हुनका "आर्य" बना देलक, आ हुनकर वास्तविक वंशजकेँ — दलितकेँ — बहिष्कृत राखल। ई एकटा ऐतिहासिक विडम्बनाक उद्घाटन थिक।
एतय निम्नवर्गीय अध्ययन (हाशियाक लोकसभक इतिहास आ आवाजकेँ केन्द्रमे आनबाक विद्वत्-परम्परा) क दृष्टिकोण प्रासंगिक अछि। गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक की निम्नवर्ग बाजि सकैत अछि? मे पुछैत छथि जे की दलित-स्त्री अपन आवाजमे इतिहासमे उपस्थित भऽ सकैत अछि? भीमन्नाक कविता एहि प्रश्नक उत्तर थिक: ओ निम्नवर्गकेँ बोलबाइत छथि — मत्स्यगन्धीकेँ, अम्बा-अम्बालिकाकेँ, जे महाभारतमे मात्र वस्तु छलीह, हुनका एकटा स्वयं-निर्णय-शक्ति दैत छथि — "जँ ओ थप्पड़ मारि कऽ दाँत तोड़ि देने रहितथि..." — ई प्रतिकूल-ऐतिहासिक कल्पना (जँ इतिहास उलटा होइत तऽ की होइत — एहि कल्पनाक माध्यमसँ इतिहासक पुनर्पाठ) निम्नवर्गक स्वयं-निर्णय-शक्तिक पुनर्सृजन थिक।
४. स्त्री-दलित आयाम
एहि दूनू कवितामे — विशेषकरि हमर पैतृक अधिकारमे — एकटा स्त्री-दलित बहु-उत्पीड़न-दृष्टि (जाति आ लिंग दूनूक एकसाथ उत्पीड़नक विश्लेषण) स्पष्ट अछि। अरुन्धती, मत्स्यगन्धी, अम्बा, अम्बालिका — ई सब स्त्री छथि जिनका पर एकहि साथ जाति-आधारित आ लिंग-आधारित शोषण भेल। कविता हिनका मात्र पीड़िताक रूपमे नहि, बल्कि सम्भावित विद्रोहिणीक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि।
किम्बर्ले क्रेन्शॉक बहु-उत्पीड़न-सिद्धांत (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे जाति, लिंग आ वर्गक उत्पीड़न अलग-अलग नहि, एकहि साथ घटित होइत अछि) एतय प्रत्यक्षतः लागू होइत अछि। भीमन्ना — एकटा दलित पुरुष कवि — एहि बहु-उत्पीड़न-दृष्टिसँ काव्य-रचना करैत छथि, जे हिनकर काव्य-दृष्टिक विशालताक प्रमाण थिक।
५. दलित सौन्दर्यशास्त्र
दलित साहित्यक आलोचकगण — शरणकुमार लिम्बाले (दलित साहित्यक सौन्दर्यशास्त्र दिस), ओमप्रकाश वाल्मीकि — बारम्बार रेखांकित कएल अछि जे दलित साहित्यकेँ पाश्चात्य काव्यशास्त्रक मानकसँ नहि नापल जा सकैत अछि। दलित कवितामे:
क्रोध एकटा सौन्दर्य-श्रेणी थिक, दोष नहि। राजनीतिक प्रत्यक्षता कलात्मक कमजोरी नहि, बल्कि नैतिक आवश्यकता थिक। व्यक्तिगत आ सामूहिक अनुभव एकाकार अछि — "मैं" सदैव एकटा सामाजिक "हम"क प्रतिनिधि थिक।
भीमन्नाक दूनू कविता एहि सौन्दर्यशास्त्रक उत्कृष्ट उदाहरण थिक। जरैत खोपड़ी सभक क्रोध वाग्-आडम्बर (केवल भाषणकलाक लेल प्रयुक्त खोखल भावना) नहि — ओ एकटा प्रामाणिक नैतिक भावना थिक। हमर पैतृक अधिकारक विद्वत्ता — पौराणिक सन्दर्भ, इतिहास-बोध — एकटा मात्र पाण्डित्य-प्रदर्शन नहि, बल्कि आत्म-सम्मानक सांस्कृतिक परियोजना थिक।
६. अनुवादक चुनौती
एहि कविताक मैथिली अनुवाद (जे स्वयं अंग्रेजी अनुवादसँ कएल गेल अछि) एकटा दोहरा अनुवाद थिक — तेलुगु → अंग्रेजी → मैथिली। एहिमे किछु काव्यिक क्षति अवश्यम्भावी अछि। उदाहरणत:
गुडिसेलु (खोपड़ी/घर) शब्दमे तेलुगुमे एकटा दोहरा अर्थ अछि — घर जे जराएल जाइत अछि। मैथिलीमे "खोपड़ी" शब्द ओ द्व्यर्थता (एकहि शब्दक दू अर्थ) खूब राखि सकल अछि।
मुदा "ना वारसत्वपु हक्कुलु"क भावनात्मक तीव्रता — जाहिमे "मेरा" (ना) आ "अधिकार" (हक्कुलु) दूनू पर समान बल अछि — मैथिलीमे "हमर पैतृक अधिकार" मे कनेक विसर्जित भेल अछि।
एहि दोहरे अनुवादक सीमाक भीतरहु दूनू कविताक मूल काव्य-शक्ति मैथिलीमे आयल अछि — एहि कारण जे भीमन्नाक विचारक बलसँ कोनो भाषा-माध्यम दलित नहि बना सकैत अछि।
निष्कर्ष
बोयी भीमन्नाक ई दू टा कविता दलित साहित्यक ओहि उच्चतम स्तरपर स्थित अछि जतय काव्य-शिल्प आ राजनीतिक दर्शन एकाकार भऽ जाइत अछि। जरैत खोपड़ी सभ धार्मिक हिंसाक चक्रवर्ती प्रकृतिकेँ एकटा रहस्यवादी प्रश्नक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि, जखन कि हमर पैतृक अधिकार इतिहासक उलटा पाठ कऽ दलित अस्मिताक पुनर्प्रतिष्ठाक घोषणा करैत अछि।
दूनू कविता मिलिकऽ एकटा सम्पूर्ण दलित-दर्शन प्रस्तुत करैत अछि: प्रश्न करब, स्मरण करब, पुनर्दावा करब, आ अन्ततः गर्वसँ मुक्त श्वास लेब। ई मात्र कविता नहि — ई एकटा सभ्यता-संघर्षक दस्तावेज थिक।
दलित-स्त्री काव्य समीक्षा: जे. सुभद्राक चारि टा कविता
लोढ़ब, लाण्डा, साड़ीक कोर, अव्वा
प्रारम्भिक टिप्पणी
जे. सुभद्रा तेलुगु दलित-स्त्री काव्यक एकटा विशिष्ट स्वर छथि। बोयी भीमन्नाक कविता जतय ऐतिहासिक-पौराणिक आयामसँ दलित-अस्मिताक पुनर्पाठ करैत अछि, सुभद्राक कविता देह, श्रम, आ घरेलू वस्तु — चाम, घैला, साड़ीक कोर — कें काव्य-केन्द्रमे स्थापित करैत अछि। हिनकर चारू कविता मिलिकऽ एकटा सम्पूर्ण दलित-स्त्री जीवनक समग्र दृश्य प्रस्तुत करैत अछि: खेतसँ घर धरि, श्रमसँ मातृत्व धरि, भूखसँ सम्मान धरि।
१. काव्य-रूप आ संरचना
लोढ़ब
एहि कविताक संरचना सूचीबद्ध श्रमक (श्रम-सूची) रूपमे अछि। भोरसँ रातिक सब काज एकपर एक आबैत अछि — बुहारब, निपब, पानि भरब, गोबर हटाएब — बिना कोनो विराम वा संयोजनक। ई सूची-रूप आकस्मिक नहि; ई दलित-स्त्रीक जीवनक साँसहीन निरन्तरता क प्रतिनिधित्व करैत अछि। वॉल्ट व्हिटमैन क आत्मगीत मे सेहो श्रम-सूचीक प्रयोग अछि — मुदा ओतय सूची मुक्तिक प्रतीक अछि; एतय ई बन्धनक।
अन्तिम प्रश्न — "ई बन्धुआ जिनगी कोना खतम हएत? " — पूरा कविताक भारकेँ एकटा छोट डोरीमे बान्हि दैत अछि। वक्तृत्वात्मक प्रश्न नहि, ई एकटा वास्तविक, अनुत्तरित प्रश्न थिक।
लाण्डा
एहि कविताक संरचना प्रक्रिया-आख्यान अछि — चाम सड़बाक, साफ करबाक, मुलायम बनाएबाक पूरा प्रक्रिया। ई तकनीकी सूक्ष्मता काव्यमे असामान्य अछि। अमलतासक गुद्दी, तेतरिक बीआ — ई सब लोक-ज्ञानक (देशज ज्ञान) अभिलेखीकरण थिक जे सुभद्रा काव्यक भीतर कऽ रहल छथि। एहि अर्थमे ई कविता एकटा नृवंशविज्ञानात्मक दस्तावेज सेहो थिक।
कविताक अन्तमे — "चरचराइत जुत्ता आ ढोल बनबा लेल— / ओ ढोल पर मधुर ताल दैत छथि" — एकटा कड़वा विडम्बना थिक। जे चाम स्त्री घृणित परिस्थितिमे तैयार करैत अछि, ओही चामसँ बनल ढोलपर पति "मधुर ताल" दैत अछि। श्रम आ कला, पीड़ा आ सौन्दर्य — एहि दूनूक बीचक विषम सम्बन्ध सुभद्रा एतय उजागर करैत छथि।
साड़ीक कोर
ई चारूमे सर्वाधिक लम्बा आ जटिल कविता थिक। एकर संरचना विस्तारित रूपक पर आधारित अछि — साड़ीक कोर एकहि वस्तु अछि जे बारम्बार नव रूप धरैत अछि: ओछाउन, छाता, थैली, गद्दी, रक्षक, माय। ई रूपान्तरण-शृंखला दलित-स्त्रीक जीवनक बहुरूपताकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि — जे एकहि साथ श्रमिक, माय, पत्नी, भिखारिन आ जीवट-योद्धा छथि।
अन्तिम पंक्तियाँ — "ई हमर छाती पर पहरा दऽ रहल कपड़ा नै अछि" — शीर्षककेँ ही नकारि दैत अछि। ई क्रियात्मक विरोधाभास थिक: शीर्षकमे जे कहल गेल, कविता ओकरा अस्वीकार करैत अछि। एहिसँ एकटा द्वन्द्वात्मक तनाव सृजित होइत अछि — कोन अर्थमे साड़ीक कोर पहरेदार नहि अछि? एहि प्रश्नकेँ कवि खुला रखैत छथि।
अव्वा
एहि कविताक संरचना सर्वाधिक गीतात्मक आ शोकगाथात्मक (शोकगीतात्मक) अछि। "अव्वा" शब्दक पुनरावृत्ति — जे तेलुगुमे "माँ" थिक — एकटा आह्वान क रूप धारण करैत अछि, जेना कोनो अनुष्ठानमे देवीकेँ बजाएल जाइत हो। मुदा ई देवी घरेलू श्रमक देवी छथि, सोनाक सिंहासनपर विराजित नहि।
कविताक बिम्ब-शृंखला असाधारण रूपसँ घनी अछि: सूरज जे आकाशक कालीनमे हरा गेल, खाली कोठीक धानक दाना, फाटल ढोलकक थाप। ई सब अभाव आ विस्थापनक रूपक थिक।
२. केन्द्रीय रूपक: वस्तु-काव्यशास्त्र
सुभद्राक काव्यक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता थिक — साधारण वस्तुकेँ काव्य-केन्द्र बनाएब: लाण्डा (चमड़ा सड़ाएबाक पात्र), घैला, साड़ीक कोर, कोदारि, हँसुआ।
पाश्चात्य काव्यशास्त्रमे वस्तु-कविता (वस्तु-कविता / वस्तु-कविता) एकटा प्रतिष्ठित परम्परा थिक — राइनर मारिया रिल्के क नवीन कवितासभ एकर उत्कृष्ट उदाहरण अछि। मुदा रिल्के क वस्तु सब सौन्दर्य-वस्तु छथि — अपोलोक मूर्ति, पँथर। सुभद्राक वस्तु सब श्रम-वस्तु छथि — जे घृणित, 臭 (दुर्गन्धयुक्त), मैल, आ सामाजिक रूपसँ अपमानित अछि।
एहिमे दलित वस्तु-काव्यशास्त्र क एकटा नव काव्यशास्त्र उभरैत अछि: वस्तुक माध्यमसँ दलित-स्त्रीक श्रम, ज्ञान, आ अस्मिताकेँ दृश्यमान करब। जे समाज देखय नहि चाहैत — चाम सड़ब, माटिमे अनाजक कण लोढ़ब — कवि तकरा साहित्यक केन्द्रमे रखैत छथि।
३. देह-राजनीति आ भौतिक यथार्थ
लाण्डामे एकटा पंक्ति असाधारण थिक: "भले हमर अन्तड़ी मुँह सँ बाहर आबि जाय, / भले मूर्छित भऽ जाय — कीड़ा-मकोड़ा आ गन्धक कारण, / ई चाम कमायबाक नियति सहबे पड़ैत अछि! "
ई देह-अन्तरक प्रत्यक्ष यथार्थवाद — आन्तरिक अंगक उल्लेख, घ्राण-प्रतिक्रिया, शारीरिक मूर्छा — दलित साहित्यक एकटा विशिष्ट प्रवृत्ति थिक जकरा गोपाल गुरु "उग्र देहाधारित अनुभूति" कहैत छथि। उच्च-जातीय साहित्यमे देह सामान्यतः आदर्शीकृत वा अमूर्त होइत अछि। दलित साहित्यमे देह ठोस, पीड़ित, आ श्रमरत होइत अछि — एहिमे कोनो पक्षसमर्थनात्मक सफाइ नहि।
साड़ीक कोरमे देहक उपस्थिति भिन्न रूपमे अछि — घाम, नोर, रजस्वला — ई सब देहक द्रव-प्रवाह (देह-द्रव) थिक जकरा ब्राह्मणवादी शुद्धता-प्रदूषण-व्यवस्था "अशुद्ध" मानैत अछि। सुभद्रा एहि सबकेँ काव्यमे सहज रूपसँ स्वीकारैत छथि — ई शुद्धता-मिथकक खण्डन थिक।
जूलिया क्रिस्तेवा क घृणित-बहिष्करण सिद्धांत एतय प्रासंगिक अछि। क्रिस्तेवा क अनुसार समाज ओहि तत्वकेँ "घृणित-बहिष्कृत" — घृणित, बहिष्कृत — मानैत अछि जे शरीरक सीमाकेँ तोड़ैत अछि: रक्त, मल, सड़न। सुभद्रा एहि घृणित-बहिष्कृत तत्वकेँ अपन काव्यक विषय बनाकऽ सामाजिक घृणित-बहिष्करण केँ ही अस्वीकार करैत छथि।
४. बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध: जाति, लिंग, आ वर्ग
एहि चारू कवितामे जाति, लिंग, आ वर्ग — तीनू एकहि साथ उपस्थित छथि, आ हिनकर पारस्परिक क्रिया कखनो अलग नहि होइत अछि।
लोढ़बमे: जमीन्दारक घर काज करबाक बाध्यता (वर्ग+जाति) + "खरड़ा सँ मारि" (जातीय हिंसा) + एकर पूरा बोझ स्त्री पर (लिंग)।
अव्वामे: "पिताक रिसक भट्ठीमे झुलसि जाइत छथि" — घरेलू हिंसा (लिंग) + "सेठ-सामन्त सब ओकरा हल-जोत सँ दूर रखने छथि" (जाति+वर्ग) — एकहि स्त्रीक जीवनमे एकहि साथ।
किम्बर्ले क्रेन्शॉ क बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध-सिद्धांत एतय शाब्दिक रूपसँ साकार होइत अछि। दलित-स्त्री न मात्र दलितक प्रतिनिधि छथि, न मात्र स्त्रीक — ओ एकटा तृतीय श्रेणी थिक जकर अनुभव एहि दूनूसँ भिन्न आ अधिक जटिल अछि।
शर्मिला रेगे एहि सन्दर्भमे "दलित-नारीवादी दृष्टिस्थान" क अवधारणा प्रस्तुत कएल छथि — दलित-स्त्रीक दृष्टिकोण एकटा ज्ञानमीमांसात्मक विशेषाधिकार थिक, कारण ओ उत्पीड़नक सर्वाधिक गहन स्तरपर अछि। सुभद्राक कविता एहि दृष्टिस्थान सँ लिखाएल अछि।
५. मातृत्व आ अभाव: अव्वा क विशेष पाठ
अव्वा मातृत्व-काव्यक एकटा असाधारण पुनर्पाठ थिक। हिन्दी-संस्कृत साहित्यमे माँ सामान्यतः त्याग, कोमलता, आ पोषणक प्रतीक थिक — यशोदा, कौशल्या। सुभद्राक "अव्वा" एहिसँ मूलतः भिन्न छथि।
ओ माय छथि जे लोरी नहि गा सकैत छथि, कारण ओ काज पर छथि। ओ माय छथि जिनकर हाथ कठोर आ मैल अछि, कारण ओ सदैव खेत-पथारमे छथि। ओ माय छथि जे गोदमे नहि सुता सकैत छथि, कारण ओ जमीन्दारक बन्धुआ छथि।
एहिमे एड्रियन रिच क स्त्रीक रूपमे जन्म क प्रतिध्वनि अछि जतय ओ मातृत्व केँ संस्था आ अनुभव — दू स्तरपर विश्लेषित करैत छथि। सुभद्राक अव्वाक लेल मातृत्वक संस्था (प्रेम देब, दुलारब) आ मातृत्वक अनुभव (जीवित रहब, खुआएब) — दूनू एकहि साथ उपस्थित छथि, मुदा पहिल सदैव दोसराक अधीन। जीवित रहब दुलारसँ पहिने आबैत अछि — ई दलित-माँक त्रासदी थिक।
६. लोक-सौन्दर्यशास्त्र आ देशज ज्ञान
लाण्डामे अमलतास आ तेतरिक विशिष्ट उपयोग, साड़ीक कोरमे "मैसम्मा देवी"क सन्दर्भ, अव्वामे रोपनी-बिछुड़प-दौनीक गीत — ई सब दलित लोक-परम्पराक काव्यिक अभिलेखीकरण थिक।
गणेश देवी विस्मृतिक बाद मे तर्क करैत छथि जे भारतीय साहित्यिक आलोचना सदैव संस्कृत/उर्दू/अंग्रेजीक मान्य साहित्यिक परम्परा केँ केन्द्रमे रखलक आ दलित-आदिवासी मौखिक परम्पराकेँ "साहित्येतर" मानलक। सुभद्राक कविता एहि मान्य परम्परासँ बहिष्करण केँ अस्वीकार करैत अछि — ओ दलित लोक-ज्ञानकेँ, मौखिक परम्पराकेँ, क्षेत्रीय वनस्पति-ज्ञानकेँ काव्यक उच्च-भूमि पर स्थापित करैत छथि।
७. साड़ीक कोर आ जयप्रभाक प्रसंग
कविताक अन्तमे एकटा महत्त्वपूर्ण पादटिप्पणी अछि — जयप्रभाक तेलुगु नारीवादी कविता "साड़ीक कोरकेँ आगि लगा दिअ" क सन्दर्भ। जयप्रभाक कविता साड़ीक कोरकेँ पितृसत्ताक प्रतीक मानि ओकरा जराएबाक आह्वान करैत अछि।
सुभद्रा एहि उच्च-जातीय नारीवादी दृष्टिकोणसँ स्पष्टतः असहमत छथि। हिनकर अव्वाक लेल साड़ीक कोर न पितृसत्ताक प्रतीक थिक, न मुक्तिक शत्रु। ओ जीवन-निर्वाहक उपकरण थिक — ओछाउन, रक्षा, थैली, माय। एकरा जराएब माने ओहि एकमात्र वस्तुकेँ जराएब जे एकर पास अछि।
ई अन्तः-नारीवादी संवाद अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थिक। ऑड्रे लॉर्ड बाहरी बहिनमे कहैत छथि: "मालिकक औजार मालिकक घरकेँ कहियो ध्वस्त नहि करत" — मुदा एतय मुद्दा ई थिक जे कोन नारीवाद, कार नारीवाद? दलित-स्त्रीक दृष्टिसँ उच्च-जातीय नारीवादी प्रतीकशास्त्र कखनो-कखनो वर्ग-अन्ध आ जाति-अन्ध भऽ जाइत अछि। सुभद्रा एहि अन्धताकेँ — बिना उग्रतासँ, किन्तु दृढ़तासँ — चुनौती दैत छथि।
८. भाषा आ मैथिली अनुवादक सन्दर्भ
ई कविता सब तेलुगु → अंग्रेजी → मैथिली — तीन स्तरक यात्रा कएल अछि। एहि यात्रामे किछु महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ सुरक्षित रहल:
"लाण्डा" — तेलुगु शब्द जेना-अछि रखल गेल, जे उचित निर्णय थिक। एकर मैथिली अनुवाद कठिन होइत, आ मूल तकनीकी-सांस्कृतिक शब्दक शक्ति खत्म भऽ जाइत।
"अव्वा" — एहिमे "माय" नहि कहल गेल, "अव्वा" कहल गेल। एहिसँ तेलुगु-सांस्कृतिक विशिष्टता बचल रहल।
मुदा "कोंगु ना बोचे मीद कावलुंदे बोन्थपेग्गडु" (साड़ीक कोर) — तेलुगु शीर्षकक देहगत तात्कालिकता मैथिलीमे किछु मन्द भेल अछि। तेलुगुमे "बोचे" (छाती/उर) आ "कावलुंदे" (पहरेदारी) — दूनू शब्दक शारीरिक-राजनीतिक तनाव मैथिली "छाती पर पहरा दऽ रहल कपड़ा" मे अपेक्षाकृत शाब्दिक भऽ गेल।
निष्कर्ष
जे. सुभद्राक ई चारू कविता मिलिकऽ एकटा दलित-स्त्री जीवनक महाकाव्य रचैत अछि — विखण्डित, मुदा सम्पूर्ण। श्रमसँ मातृत्व धरि, देहसँ इतिहास धरि, एकटा साड़ीक कोरसँ पूरा सभ्यता-संघर्ष धरि।
हिनकर काव्य-उपलब्धि ई थिक जे ओ कखनो शिकायत नहि करैत छथि — ओ गवाही दैत छथि। सिमोन वेल न्याय आ दयाक बीच एहि अन्तरकेँ महत्त्वपूर्ण मानैत छलीह: शिकायत पीड़ितसँ आबैत अछि, गवाही साक्षीसँ। सुभद्रा अपन जीवनक साक्षी बनैत छथि — आ एहिसँ हुनकर कविता मात्र व्यक्तिगत आर्तनाद नहि, बल्कि ऐतिहासिक दस्तावेज बनि जाइत अछि।
अन्तिम पंक्ति — "ओ कहियो ओहि सीमा धरि नै पहुँचल जतय-जतय हमर अव्वा घुमलीह" — सम्पूर्ण संग्रहक समाधिलेख थिक: भाषा, इतिहास, आ सभ्यता — सब मिलिकऽ दलित-स्त्रीक जीवनक सम्पूर्ण भूगोलकेँ चिन्हित करय मे विफल रहल अछि।
दलित-स्त्री काव्य समीक्षा (जारी): तुलनात्मक आ संश्लेषणात्मक अध्ययन
९. दूनू कवि एकसंग: भीमन्ना आ सुभद्राक काव्य-संवाद
एहि समीक्षाक दूनू खण्ड — भीमन्नाक पाँच कविता आ सुभद्राक चारि कविता — एकसंग पढ़लापर एकटा द्वन्द्वात्मक संवाद उभरैत अछि जे दलित साहित्यक भीतरक जटिलताकेँ उजागर करैत अछि।
दृष्टिकोणक भेद
भीमन्ना ऊपरसँ देखैत छथि — इतिहास, पुराण, दर्शन, सभ्यताक दीर्घकालिक चाप। हुनकर काव्य-कैमरा व्यापक-दृष्टि अछि। सुभद्रा भीतरसँ देखैत छथि — देह, वस्तु, श्रम, घर, माय। हुनकर काव्य-कैमरा निकट-दृष्टि अछि।
भीमन्नाक हमर पैतृक अधिकार व्यास आ वशिष्ठक इतिहासक खनन करैत अछि — एकटा व्यापक इतिहास। सुभद्राक अव्वा एकटा अनाम माँक एकटा दिनक श्रमकेँ चित्रित करैत अछि — एकटा सूक्ष्म इतिहास। मुदा दूनू एकहि सत्यक दू दिस थिक: ऐतिहासिक अपहरण आ दैनिक착취 (शोषण) — एक सिक्काक दू मुँह।
एहि अर्थमे दूनू कविक संग्रह मिलिकऽ कार्लो गिन्ज़बर्ग क सूक्ष्म इतिहास आ मार्क्सवादी व्यापक इतिहास क सेतु बनाबैत अछि — जतय व्यक्तिगत जीवनक क्षुद्र विवरण सामाजिक संरचनाक महाकाव्यसँ जुड़ि जाइत अछि।
प्रश्न आ गवाहीक भेद
भीमन्ना प्रश्न करैत छथि — "ई खोपड़ी सब कोना बेर-बेर उगि अबैत छैक? ", "ई दुष्चक्र कतेक दिन चलत? " हुनकर कविता प्रश्नात्मक शैली मे अछि।
सुभद्रा गवाही दैत छथि — "जखन हमर पति अपना हाथे चूना लगा कऽ चाम दैत छथि", "हमरा याद नै अछि कि कहियो अव्वाक डाँरकेँ कसिया कऽ पकड़ि लटकल रहलहुँ। " हुनकर कविता साक्ष्यात्मक शैली मे अछि।
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धांतमे साक्ष्य एकटा विशेष विधा थिक जकर विकास यहूदी-विनाशकाण्ड साहित्यमे भेल — एली विज़ेल, प्रीमो लेवी। मुदा शोशाना फेलमैन आ डोरी लाउब साक्ष्य: साक्षीपनक संकट मे देखाबैत छथि जे साक्ष्य मात्र तथ्यात्मक प्रतिवेदन नहि थिक — ई एकटा नैतिक कर्म थिक जाहिमे पीड़ित अपन अनुभवकेँ साक्ष्यमे रूपान्तरित करैत अछि। सुभद्राक प्रत्येक कविता एहि अर्थमे साक्ष्य थिक।
१०. दलित काव्यमे प्रकृति-बिम्ब: एकटा पुनर्पाठ
उच्च-जातीय हिन्दी-संस्कृत काव्यमे प्रकृति सामान्यतः सौन्दर्य-अनुभवक क्षेत्र थिक — कालिदासक मेघदूतमे यक्षक विरहक पृष्ठभूमि, छायावादमे आत्माक आरोपण। एहि परम्परामे प्रकृति रोमाण्टिक अछि।
सुभद्राक प्रकृति-बिम्ब मूलतः भिन्न अछि:
अव्वामे — "मुर्गाक स्वर सँ पहिने उगैत सूरज तापैत अछि अव्वाक आँखिमे" — सूरज उगनाइ एतय काव्यिक सौन्दर्य नहि, श्रमक आरम्भ-संकेत थिक। सूरज माँकेँ जगाबैत नहि — जरबैत अछि।
साड़ीक कोरमे — "बरखामे साड़ीक कोर बनि जाइत अछि अमलतासक फूलक छाता" — अमलतास उच्च-जातीय कविमे सौन्दर्यक विषय होइत; एतय ओ व्यावहारिक आश्रय थिक।
लोढ़बमे — धूरि, पाथरक दरारि, माटि — ई सब भू-दृश्य थिक जाहिमे दलित-स्त्री काज करैत अछि, जकरा छायावादी कवि कहियो नहि देखलथि।
एहि अर्थमे सुभद्रा ग्राम्य-रोमानी विचारधारा केँ — जे ग्रामीण प्रकृतिकेँ शान्तिक स्थल मानैत अछि — ध्वस्त करैत छथि। रेमंड विलियम्स देश आ शहर मे देखाओल अछि जे ग्राम्य-रोमानी दृष्टि एकटा वर्ग-षड्यन्त्र थिक जे श्रमकेँ अदृश्य करैत अछि। सुभद्राक कविता ओहि अदृश्य श्रमकेँ दृश्यमान करैत अछि।
११. काव्यमे मौन आ अनुपस्थिति
दूनू कविक रचनामे जे कहल नहि गेल से कहल गेलासँ कम महत्त्वपूर्ण नहि।
भीमन्नाक जरैत खोपड़ी सभ मे हत्यारा कहियो नामित नहि होइत — "धर्म" एकटा अमूर्त शक्ति थिक। एहि रणनीतिक अनामिता मे एकटा साहित्यिक कूटनीति अछि: हत्यारा जखन व्यवस्था हो, व्यक्ति नहि, तखन ओकरा नामित करब आवश्यक नहि — कारण नाम लेलासँ व्यवस्था नहि बदलैत।
सुभद्राक अव्वा मे माँक आवाज अनुपस्थित अछि। ओ गाबैत छथि — मुदा हम हुनकर गीत नहि सुनैत छी; ओ बाजैत छथि — मुदा हम हुनकर शब्द नहि जनैत छी। ई मौन दलित-स्त्रीक ऐतिहासिक अनुपस्थिति क प्रतीक थिक — जे इतिहासमे कहियो कर्ता-विषय नहि बनलीह, सदैव वस्तु रहलीह।
जाक देरिदा चिह्न-अवशेष क अवधारणामे कहैत छथि जे अर्थ मात्र उपस्थितिमे नहि, अनुपस्थितिक निशानमे सेहो निहित होइत अछि। सुभद्राक कविताक मौन — अव्वाक न-सुनाएल लोरी, न-कहाएल शब्द — एहि चिह्न-अवशेष थिक जतय दलित-स्त्रीक इतिहास अंकित अछि।
१२. क्रोध, शोक, आ गरिमा: तीन भावनात्मक स्वर
एहि नव कवितामे — भीमन्नाक पाँच आ सुभद्राक चारि — तीन टा प्रमुख भावनात्मक स्वर अछि:
क्रोध — भीमन्नाक जरैत खोपड़ी सभ आ हमर पैतृक अधिकारमे। ई क्रोध दार्शनिक क्रोध थिक — व्यक्तिगत नहि, सांस्कृतिक।
शोक — सुभद्राक अव्वा आ लोढ़बमे। ई शोक सामूहिक शोक थिक — एकटा पूरा पीढ़ीक खोएल जीवनक लेल।
गरिमा — साड़ीक कोरक अन्तिम पंक्तियाँमे, हमर पैतृक अधिकारक अन्तिम उद्घोषमे। ई गरिमा अर्जित थिक — दयापर आधारित नहि, अधिकारपर आधारित।
अरस्तू काव्यमे भावनात्मक विरेचन — भावनात्मक शुद्धि — क बात करैत छथि। मुदा दलित काव्यमे भावनात्मक विरेचन एकटा भिन्न प्रकृतिक होइत अछि। ई दर्शकक भावनात्मक शुद्धिक लेल नहि — ई समाजक नैतिक शुद्धिक आह्वान थिक। आम्बेडकर कहैत छलाह: "हम कोनो समुदायक प्रगति ओहि अंशसँ मापैत छी, जतेक प्रगति ओहि समुदायक स्त्रीसभ कएलनि अछि। " एहि कसौटीपर ई कविता सब समाजकेँ नापैत छथि — आ समाज विफल पाबैत अछि।
१३. मैथिली साहित्यिक परम्परा आ दलित काव्यक प्रासंगिकता
एहि तेलुगु दलित कवितासभक मैथिलीमे अनुवाद — विदेह पत्रिकाक माध्यमसँ — एकटा साहित्यिक-सांस्कृतिक परियोजना थिक जकर महत्त्व केवल अनुवादक तकनीकी उपलब्धिसँ परे जाइत अछि।
मैथिली साहित्यमे दलित स्वर ऐतिहासिक रूपसँ प्रान्तीय रहल अछि। साहित्य अकादेमी-स्वीकृत मैथिली मान्य साहित्यिक परम्परा सामान्यतः ब्राह्मण-कायस्थ-केन्द्रित रहल अछि — विद्यापतिसँ लऽकऽ आधुनिक काल धरि। मैथिली समानान्तर धारा साहित्य आन्दोलनक बाद विद्यापतिक पदावली स्थित “बिदेसिया”, हुनकर ज्योतिरीश्वर-पूर्व कालमे निर्धारित भऽ सकल। [अनुलग्नक: १ मैथिलीक मूल आ अनूदित दलित गद्य-पद्य साहित्य लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त/ अनुलग्नक: २: विद्यापतिक विदेसियाक एकटा समालोचनात्मक मूल्यांकन; अनुलग्नक -३; मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)-गजेन्द्र ठाकुर; अनुलग्नक: ४: विद्यापतिक बिदेसिया- पिआ देसाँतर- बिदापत नाचक अलाबे मैथिली नाटकक एकटा समानान्तर दुनियाँ] एहि संदर्भमे तेलुगु दलित-स्त्री कवितासभक मैथिली अनुवाद एकटा मान्य साहित्यिक परम्परामे हस्तक्षेप थिक।
ई अनुवाद मैथिली पाठककेँ कहैत अछि: दलित-स्त्रीक यथार्थ तेलुगुक मात्र विषय नहि थिक — ओ मिथिलाक भूमिमे सेहो उतना ही उपस्थित अछि। भौगोलिक विशिष्टता (तेलुगु सन्दर्भ) आ सामाजिक सार्वभौमिकता (दलित-स्त्री उत्पीड़न) — दूनूकेँ एकहि साथ स्वीकारब एहि अनुवाद-परियोजनाक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक-राजनीतिक निर्णय थिक।
समानान्तर साहित्य आन्दोलन क जे दृष्टि विदेह प्रतिनिधित्व करैत अछि — मान्य साहित्यिक परम्परा-बाहरक, लोक-परम्परा-समृद्ध, दलित-स्त्री-स्वर-समावेशी — ओहि दृष्टिक एहि कविता सब जीवित प्रमाण थिक।
१४. अन्तिम संश्लेषण: एकटा नव काव्यशास्त्र
भीमन्ना आ सुभद्राक ई नव कविता मिलिकऽ दलित काव्यशास्त्रक किछु मूलभूत सिद्धान्त स्थापित करैत अछि जे पाश्चात्य आ उच्च-जातीय भारतीय काव्यशास्त्रसँ मूलतः भिन्न अछि:
प्रथम — काव्य-विषयक लोकतन्त्र: चाम सड़ब, माटिमे अनाज लोढ़ब, पुरानि साड़ीक कोर — ई सब उतने काव्य-योग्य थिक जतेक मेघदूतक यक्ष-विरह वा कामायनीक श्रद्धा।
द्वितीय — भावनाक नैतिक स्वीकृति: क्रोध, घृणा, शोक — ई रससिद्धान्तमे अपूर्ण मानल जाइत अछि (शान्त रस सर्वोच्च)। दलित काव्यमे क्रोध नैतिक रूपसँ आवश्यक थिक।
तृतीय — राजनीति आ सौन्दर्यक अभेद: "कला कलाक लेल" (कला मात्र कलाक लेल) दलित काव्यमे अर्थहीन अछि। कविता एकटा सामाजिक कार्य थिक — गवाही, आरोप, आ मुक्तिक आह्वान एकहि साथ।
चतुर्थ — स्थानीय ज्ञानक सम्मान: अमलतास, तेतरि, मैसम्मा देवी, लाण्डा — ई सब दलित ज्ञानमीमांसा थिक जे पुस्तकीय ज्ञानसँ पूर्व आ कखनो-कखनो श्रेष्ठ अछि।
पञ्चम — देह एकटा राजनीतिक भूमि थिक: दलित-स्त्रीक देह — जे जरैत अछि, थकैत अछि, सड़ैत अछि, नोर बहबैत अछि — एहि देहपर जाति, वर्ग, आ लिंगक तीनू व्यवस्था एकसाथ काम करैत अछि। एहि देहकेँ काव्यमे दृश्यमान करब राजनीतिक कार्य थिक।
समापन
ऑड्रे लॉर्ड मौनक भाषा आ क्रियामे रूपान्तरण मे लिखैत छथि जे मौन हमरा नहि बचाओत — "अहाँक मौन अहाँक रक्षा नहि करत। " बोयी भीमन्ना आ जे. सुभद्रा — दूनू — एहि मौनकेँ तोड़ैत छथि। भीमन्ना इतिहासक मौनकेँ, सुभद्रा दैनिक जीवनक मौनकेँ।
एकटा भाषासँ दोसर भाषामे — तेलुगुसँ मैथिलीमे — ई आवाज सब यात्रा करैत अछि। अनुवाद एतय मात्र भाषान्तर नहि — ई एकजुटताक कार्य थिक: एक दलित समुदाय दोसर दलित समुदायक आवाजकेँ सुनैत अछि, पहचानैत अछि, आ अपन भाषामे ओकरा जीवित राखैत अछि।
एहि अर्थमे ई नव कविता — भीमन्नाक आ सुभद्राक — मैथिली साहित्यमे मात्र एकटा अनुवाद नहि, एकटा नव काव्य-परम्पराक बीजारोपण थिक।
दलित-स्त्री काव्य समीक्षा: चल्लपल्ल्ली स्वरूपरानीक दू टा कविता
मान्केनापुव्वु आ माटि-भेल हाथ
प्रारम्भिक टिप्पणी
चल्लपल्ल्ली स्वरूपरानी तेलुगु दलित-स्त्री काव्यक एकटा विशिष्ट आवाज छथि जे भीमन्ना आ सुभद्राक काव्य-परम्पराकेँ एकटा नव आयाम दैत अछि। जतय भीमन्ना ऐतिहासिक-पौराणिक स्तरपर आ सुभद्रा वस्तु-श्रम-मातृत्व क स्तरपर काज करैत छथि, स्वरूपरानीक काव्य एकटा तृतीय स्थान ग्रहण करैत अछि — ओ व्यक्तिगत चेतनाक रूपान्तरण केँ केन्द्रमे रखैत छथि। हुनकर कविता "हम" सँ शुरू होइत अछि आ "हम" पर समाप्त होइत अछि — मुदा ई "हम" यात्राक दूनू छोरपर भिन्न अछि।
१. काव्य-रूप आ संरचना
मान्केनापुव्वु
एहि कविताक संरचना एकटा त्रि-स्तरीय आख्यान थिक। पहिल स्तरमे कविताक आरम्भमे एकटा केन्द्रीय रूपक स्थापित होइत अछि — काँटेदार झाड़ीमे फँसल नीला चिरै। दोसर आ दीर्घतम स्तरमे एकटा अनुप्रास-आरम्भ शृंखला (एकहि शब्दसँ बारम्बार आरम्भ होयबाक काव्य-विधि) अछि — "जखन... तखन" — जे छह बेर दोहराएल जाइत अछि। तेसर स्तरमे कविता अकस्मात् मोड़ लैत अछि — "मुदा जखन हमर सहनशीलता खतम होइत अछि" — आ विस्फोटक उद्घोषमे परिणत भऽ जाइत अछि।
ई त्रि-स्तरीय संरचना थीसिस-एन्टीथीसिस-सिन्थेसिस (स्थापना-खण्डन-समन्वय) क द्वन्द्वात्मक प्रतिरूप थिक। मुदा हेगेलीय द्वन्द्ववादसँ ई भिन्न एहि अर्थमे जे एतय समन्वय कोनो समझौता नहि — ई विद्रोह थिक।
"जखन... तखन" क छह आवृत्तिमे ध्यान देबाक योग्य अछि जे प्रत्येक "तखन" मे आत्म-निषेधक इच्छा व्यक्त होइत अछि — बीउ जकाँ धँसब, नाक बन्द करब, मुट्ठीमे सिमटि जाएब, सीसा ढारब, मुँड़ धँसाएब। ई पाँच विशिष्ट आत्म-निषेध-बिम्ब अछि जे एकत्र भऽ एकटा संचित पीड़ा (बहुत रास पीड़ाक एकत्र भार) सृजित करैत अछि। मुदा एहि संचित पीड़ाक तीव्रता ही अन्तिम विस्फोटकेँ विश्वसनीय बनाबैत अछि।
माटि-भेल हाथ
एहि कविताक संरचना कालक्रमानुसार (समयक क्रमसँ) अछि — भोरसँ साँझ धरि, जवानीसँ जीर्णता धरि। मुदा ई कालक्रम सरल रेखीय नहि — ई सर्पिलाकार (घुमैत-घुमैत ऊपर-नीचाँ जाइत) अछि। एकहि दिन बेर-बेर दोहराएल जाइत अछि, एकहि वर्ष बेर-बेर, एकहि जीवन बेर-बेर। एहि पुनरावर्ती सर्पिलाकारसँ एकटा गहिर शून्यवाद (जीवनमे कोनो अर्थ नै देखबाक भाव) उभरैत अछि — कोनो परिवर्तन नहि, कोनो अन्त नहि।
सुभद्राक अव्वा सँ तुलना करलापर: दूनू माँक कविता थिक, दूनूमे श्रमक वर्णन अछि — मुदा अव्वामे पुत्री-दृष्टि अछि, माटि-भेल हाथमे तृतीय-पुरुष साक्षी-दृष्टि अछि। ई भेद महत्त्वपूर्ण अछि: स्वरूपरानी एतय माँकेँ प्रेमसँ नहि, न्यायिक दृष्टिसँ देखैत छथि।
२. केन्द्रीय रूपक: चिरै, फूल, आ माटि
नीला चिरै आ सेमरक फूल
मान्केनापुव्वुक दू टा प्रमुख बिम्ब — काँटेदार झाड़ीमे फँसल नीला चिरै आ अन्तमे खिलैत सेमरक लाल फूल — एकटा वर्ण-यात्रा (रंगक माध्यमसँ भावनात्मक यात्रा) प्रस्तुत करैत अछि। नीला रंग (चिरैक) — उदासी, बन्धन, आकाशक प्रति अतृप्त लालसाक प्रतीक। लाल रंग (सेमरक फूलक) — विद्रोह, रक्त, जीवन-शक्तिक प्रतीक।
सेमरक फूल (सेमर) तेलुगु-आन्ध्र संस्कृतिमे एकटा विशिष्ट अर्थ राखैत अछि — ई काँटेदार गाछपर फुटैत अछि, शीतकालमे जखन पात नहि रहैत छैक, तखन एकाकी चमकदार लाल फूल। ई प्रतिकूलतामे फूलबाक सांस्कृतिक प्रतीक थिक। स्वरूपरानी एहि देशज प्रतीकशास्त्रकेँ दलित-स्त्री-चेतनाक रूपकमे रूपान्तरित करैत छथि।
पाश्चात्य काव्यमे फीनिक्स (पौराणिक पक्षी जे जरिकऽ पुनर्जन्म लैत अछि) क रूपक एहिसँ मेल खाइत अछि — मुदा फीनिक्स राखमे भस्म भऽ जाइत अछि, फेर उठैत अछि। स्वरूपरानीक नायिका भस्म नहि होइत — ओ काँटेक बीचहि फूलैत अछि। ई एकटा महत्त्वपूर्ण भेद थिक: दलित-स्त्रीक मुक्ति विनाशसँ नहि आबैत — रूपान्तरणसँ आबैत अछि।
माटि-भेल हाथ
माटि-भेल हाथक शीर्षक-रूपक बहु-आयामी अछि। "माटि-भेल हाथ" — श्रमसँ माटिमे धँसल हाथ — एकटा शाब्दिक वर्णन थिक। मुदा एहिमे माटि बनब (मनुष्यताक अवमूल्यन) आ माटिसँ बनब (मूल तात्त्विक पहचान) दूनू अर्थ निहित अछि।
लोढ़बमे सुभद्रा माटिमे अनाजक कण खोजैत छथि। माटि-भेल हाथमे स्वरूपरानी माटिमे स्त्री स्वयं विलीन होइत देखैत छथि। ई उत्तरोत्तर-वृद्धि (क्रमशः बढ़ैत तीव्रता) महत्त्वपूर्ण थिक — श्रम जखन एतेक तीव्र होइत अछि जे श्रमिक आ माटि एकाकार भऽ जाइत अछि, ई वस्तुकरण (मनुष्यकेँ वस्तु मानब) क चरम अवस्था थिक।
मार्क्स आर्थिक आ दार्शनिक पाण्डुलिपि मे अलगावग्रस्त श्रम (जाहिमे मजदूर अपन काजसँ, अपन मानवतासँ आ प्रकृतिसँ कटि जाइत अछि) क वर्णन करैत छथि। स्वरूपरानीक "माटि-भेल हाथ" एहि अलगावक शारीरिक प्रतीक थिक।
३. "जखन... तखन" शृंखलाक विश्लेषण
मान्केनापुव्वुक छह-आवृत्त "जखन... तखन" शृंखला एकटा उत्पीड़नक वर्गीकरण (उत्पीड़नक विभिन्न स्तरक सूची) प्रस्तुत करैत अछि। प्रत्येक "जखन" मे उत्पीड़नक एकटा भिन्न स्तर अछि:
पहिल — घरेलू सौन्दर्यशास्त्रक नियन्त्रण: काजर-टिकुली नहि लगाएब। ई सर्वाधिक अन्तरंग स्तर थिक — स्वयं अपन देहपर नियन्त्रण।
दोसर — स्थानिक नियन्त्रण: "दुर्गन्धित गाम" — दलित बस्तीक शारीरिक घेराबन्दी।
तेसर — शैक्षिक बहिष्कार: उच्च-शिक्षाक देहरीपर जाति-आधारित अस्वीकृति।
चतुर्थ — आरक्षण-आधारित कलंकारोपण: "कोटा सँ अबैत छी" — आरक्षणकेँ अपमानक हथियार बनाएब।
पञ्चम — यौन-वस्तुकरण (स्त्रीकेँ मात्र भोगक वस्तु मानब): विवाहयोग्य नहि, मात्र काम-वासनाक वस्तु।
ई पाँचू स्तर मिलिकऽ दलित-स्त्रीक जीवनक चतुर्दिक घेराबन्दी दर्शाबैत अछि — घर, गाम, शिक्षा, काज, विवाह — सब दिससँ घेराएल। एहि घेराबन्दीक यथार्थवाद पैट्रिशिया हिल कॉलिन्स क प्रभुत्वक जाल (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे उत्पीड़न एकटा एकल शक्ति नहि, बल्कि परस्पर-गुँथल व्यवस्थासभक समूह थिक) सिद्धांतसँ मेल खाइत अछि।
विशेष रूपसँ महत्त्वपूर्ण अछि आरक्षण-कलंकारोपण क उल्लेख — जे भीमन्ना वा सुभद्राक कवितामे अनुपस्थित अछि। स्वरूपरानी एतय समकालीन दलित अनुभव केँ समेटैत छथि: शिक्षा आ सरकारी नौकरीमे प्रवेश पाबिकऽ सेहो दलित-स्त्री "कोटा-लाभार्थी" क रूपमे कलंकित होइत रहैत अछि। ई इक्कीसवीं सदीक उत्पीड़नक नव रूप थिक जे पुरान सामाजिक ऊँच-नीचकेँ नव भाषामे कायम राखैत अछि।
४. देह-राजनीति: दू भिन्न पथ
दूनू कवितामे देहक उपस्थिति अछि — मुदा दू भिन्न पथपर।
मान्केनापुव्वुमे देह क्षमता आ विद्रोहक स्थल थिक। "हम खिलि उठब", "हम बहि पड़ब" — ई देह जे अन्त धरि काँटमे फँसल छल, ओ अन्तमे स्वयं-निर्णय-शक्ति (अपना विषयमे निर्णय लेबाक अधिकार) प्राप्त करैत अछि।
माटि-भेल हाथमे देह क्षय आ उपभोगक स्थल थिक। "जे गेंदा फूल जकाँ चमकैत छल, / झुराएल पातक डारि सन फीका होइत जाइत छनि" — ई देह श्रम आ पितृसत्ताक दोहरा उपभोगसँ विनष्ट होइत अछि।
एहि दू पथमे एकटा पीढ़ी-अन्तर देखल जा सकैत अछि। मान्केनापुव्वुक "हम" सम्भवतः शिक्षित, जागरूक, विद्रोही — नव पीढ़ीक दलित-स्त्री। माटि-भेल हाथक "ओ" सम्भवतः अशिक्षित, अनजान, थकल — पुरान पीढ़ीक दलित-स्त्री। दूनू एकहि व्यवस्थाक उत्पाद छथि — मुदा चेतनाक स्तरपर भिन्न।
फ्रान्ट्ज फानों द रेचेड ऑफ द अर्थ मे उपनिवेशित चेतनाक दू स्तर देखाबैत छथि: जे व्यवस्थाकेँ भीतरसँ स्वीकार कऽ लेलक, आ जे ओकरा अस्वीकार करय लागल। स्वरूपरानी एहि दूनू चेतनाकेँ एकहि संग्रहमे — दू कवितामे — प्रस्तुत करैत छथि।
५. पति-आकृति: दू कवितामे तुलना
दूनू कवितामे पति उपस्थित अछि — मुदा भिन्न रूपमे।
मान्केनापुव्वुमे — "घरमे पुरुष-नियन्त्रण एक गाल पर थप्पड़ मारैत अछि" — पति एकटा नामहीन शक्ति थिक, जाति-व्यवस्थाक बराबरीक भागीदार। नाम नहि, चेहरा नहि — मात्र शक्ति।
माटि-भेल हाथमे — "पति तैयार अछि ओकर घाम शराब जकाँ पी जयबा लेल" आ "साँझमे पतिक हाथ-पैरक मारि सहि" — पति ठोस उत्पीड़क थिक, दैनिक जीवनमे उपस्थित।
ई वैपरीत्य साहित्यिक-राजनीतिक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण अछि। पहिल कवितामे पितृसत्ता संरचनागत (व्यवस्थाक रूपमे) थिक; दोसरमे ओ अन्तर्वैयक्तिक (दू व्यक्तिक बीचक) थिक। दूनू सत्य छथि — मुदा दूनू मिलिकऽ पितृसत्ताक पूर्ण चित्र बनाबैत अछि: ओ एकहि साथ व्यवस्था आ व्यक्ति दूनू छथि।
बेल हुक्स नारीवादी सिद्धांत: हाशियासँ केन्द्र धरि मे तर्क करैत छथि जे नारीवादी आन्दोलन कहियो-कहियो पितृसत्ताकेँ मात्र संरचनागत देखैत अछि आ व्यक्तिगत पुरुष-हिंसाकेँ कम महत्त्व दैत अछि — वा एकर विपरीत। स्वरूपरानीक दूनू कविता मिलिकऽ एहि मिथ्या द्विकल्पकेँ अस्वीकार करैत अछि।
६. अन्तिम बिम्ब: दू विरोधी समापन
मान्केनापुव्वु एकटा विजयी समापन पर समाप्त होइत अछि:
"हम खिलि उठब मान्केनापुव्वु जकाँ! / हम बहि पड़ब धारा जकाँ, / पार कऽ क्लेशक वन। "
ई समापन पाठककेँ भावनात्मक विरेचन (पीड़ाक पश्चात् भावनाक शुद्धि) दैत अछि — पीड़ाक पश्चात् विजयक अनुभव। मुदा ई विरेचन सस्ता नहि — ओ पूरा कविताक संचित पीड़ाक बाद आबैत अछि, एहि कारण ओकर भार असाधारण अछि।
माटि-भेल हाथ एकटा त्रासद समापन पर समाप्त होइत अछि:
"जीवनक पाथर-परती रस्ता पर— / भूखक क्रूस ढोइत। "
"क्रूस" शब्दक प्रयोग एतय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। ई ईसाई प्रतीकशास्त्र क उधार थिक — यीशुक क्रूस-वहन। मुदा एतय ई लौकिक अर्थमे प्रयुक्त: दलित-स्त्री कोनो मुक्तिक आश्वासन बिना, कोनो पुनरुत्थान बिना, क्रूस ढोइत रहैत अछि। ई पुनरुत्थान-विहीन सूलीचढ़ाई थिक — जे ईसाई प्रतीकशास्त्रसँ अधिक क्रूर चित्र थिक।
अल्बेर कामू सिसिफसक मिथक मे अर्थहीनता-दर्शन (जीवनमे कोनो पूर्वनिर्धारित अर्थ नहि) क वर्णन करैत छथि — सिसिफस जे पत्थर बेर-बेर ऊपर ढकेलैत अछि, ओ बेर-बेर खसैत अछि। कामू कहैत छथि: "सिसिफसकेँ सुखी मानब पड़त। " मुदा स्वरूपरानीक नायिकाक लेल ई अस्तित्ववादी समाधान उपलब्ध नहि — कारण कामूक सिसिफस एकटा अमूर्त दार्शनिक आकृति थिक, स्वरूपरानीक नायिका ऐतिहासिक, भौतिक, देहधारी छथि।
७. सुभद्रासँ तुलना: समानता आ भेद
दूनू कवि दलित-स्त्री जीवनकेँ काव्य-विषय बनाबैत छथि — मुदा हुनकर काव्य-दृष्टिमे कई महत्त्वपूर्ण भेद अछि:
गति: सुभद्राक कविता धीमी, ध्यानस्थ अछि — एक-एक वस्तुकेँ, एक-एक क्षणकेँ पूरा ध्यानसँ देखैत। स्वरूपरानीक कविता तीव्र, आवेगपूर्ण अछि — जेना कोनो बाँध टूटि रहल हो।
दृष्टिकोण: सुभद्रा भीतरी साक्षी छथि — ओ स्वयं ओही जीवनमे छथि। स्वरूपरानी मान्केनापुव्वुमे भीतरी साक्षी छथि, माटि-भेल हाथमे करुणाशील बाहरी साक्षी — ओ दोसर स्त्रीक जीवन देखैत छथि।
समाधान: सुभद्राक साड़ीक कोर समाधान-विहीन, खुला-अन्त थिक। स्वरूपरानीक मान्केनापुव्वु स्पष्ट समाधान दैत अछि — विद्रोह आ खिलनाइ। एहि अर्थमे स्वरूपरानी अधिक घोषणापत्र-प्रकृतिक छथि — हुनकर काव्यमे एकटा राजनीतिक घोषणापत्रक तत्त्व अछि।
८. भाषा-शैलीक विशेषता
मान्केनापुव्वुमे एकटा ध्यानयोग्य भाषिक विशेषता थिक — इन्द्रिय-विशिष्टताक अपेक्षाकृत अभाव। कविता भावनात्मक आ वैचारिक धरातलपर काम करैत अछि, ठोस इन्द्रिय-विवरणपर कम। ई सुभद्राक काव्यसँ भिन्न जतय अमलतासक गुद्दी, तेतरिक बीआ, घैलाक गद्दी — सब ठोस-इन्द्रिय-ग्राह्य अछि।
मुदा माटि-भेल हाथमे इन्द्रिय-समृद्धि उपस्थित अछि — "ठेहुन भरि कीचड़", "अन्तड़ी पेटमे भयंकर नाच", "बामन-बासनक सङ्गीत"। एहिसँ बुझाइत अछि जे स्वरूपरानीक काव्य-भण्डारमे दूनू प्रकारक भाषा उपलब्ध अछि — ओ प्रसंग अनुसार चुनैत छथि।
"बामन-बासनक सङ्गीत" — बर्तन माँजबाक आवाजकेँ "सङ्गीत" कहब — एकटा कटु व्यंग्य थिक। उच्च-वर्गीय सौन्दर्यशास्त्र जे वायलिन-सितारमे संगीत देखैत अछि, दलित-स्त्रीक लेल भोरक पहिल "संगीत" काँसाक बर्तनक खनखनाहट थिक। ई सौन्दर्य-मूल्यक उलटपालट स्वरूपरानीक काव्य-बुद्धिक प्रमाण थिक।
९. तीनू कवि: एकटा समग्र दृष्टि
एहि समीक्षाक तेसर खण्डमे आबिकऽ — भीमन्ना, सुभद्रा, आ स्वरूपरानी — तीनूकेँ एकसंग देखलापर तेलुगु दलित काव्यक एकटा त्रिकोणीय संरचना उभरैत अछि:
भीमन्ना — इतिहास आ दर्शनक कवि: व्यापक स्तरपर जाति-व्यवस्थाक ऐतिहासिक आ पौराणिक आधारकेँ प्रश्नांकित करैत छथि।
सुभद्रा — श्रम आ वस्तुक कवि: सूक्ष्म स्तरपर दैनिक जीवनक ठोस यथार्थकेँ — एक-एक वस्तुकेँ, एक-एक श्रमकेँ — दृश्यमान करैत छथि।
स्वरूपरानी — चेतना आ रूपान्तरणक कवि: मध्यवर्ती स्तरपर — इतिहास आ दैनिकताक बीचक — व्यक्तिगत चेतनाकेँ, उत्पीड़नक आन्तरिक अनुभवकेँ, आ ओहि चेतनाक रूपान्तरणकेँ पकड़ैत छथि।
तीनू मिलिकऽ सम्पूर्ण दलित-स्त्री अनुभव केँ आवृत्त करैत अछि — बाहरसँ भीतर धरि, इतिहाससँ वर्तमान धरि, पीड़ासँ विद्रोह धरि।
निष्कर्ष
चल्लपल्ल्ली स्वरूपरानीक ई दू कविता — मान्केनापुव्वु आ माटि-भेल हाथ — दलित-स्त्री काव्यमे आशा आ निराशाक द्वन्द्वक सर्वोत्तम अभिव्यक्ति थिक। मान्केनापुव्वु कहैत अछि: हम फूलब — काँटेक बावजूद। माटि-भेल हाथ कहैत अछि: बिना संरचनागत परिवर्तनक, ई फूलनाइ सम्भव नहि।
दूनू कविता मिलिकऽ एकटा सम्पूर्ण राजनीतिक सन्देश बनाबैत अछि: व्यक्तिगत विद्रोह सम्भव आ आवश्यक थिक — मुदा जाधरि संरचनागत परिवर्तन नहि होएत, ताधरि माटि-भेल हाथक नायिका बेर-बेर जन्म लेत आ बेर-बेर क्रूस ढोइत जीवन समाप्त करत।
ई दोहरा सत्य — व्यक्तिगत मुक्तिक सम्भावना आ सामूहिक मुक्तिक अनिवार्यता — स्वरूपरानीक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण काव्य-उपलब्धि थिक।
दलित-स्त्री काव्य समीक्षा: दरिशे शशिनिर्मलाक तीन कविता
हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँ, हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी, एकटा दलित स्त्री
प्रारम्भिक टिप्पणी
दरिशे शशिनिर्मला तेलुगु दलित-स्त्री काव्यक एकटा सर्वाधिक उग्र आ टकराहटी (सोझे-सोझ मुकाबला करैत) आवाज छथि। भीमन्नाक ऐतिहासिक-दार्शनिक विश्लेषण, सुभद्राक श्रम-वस्तु-काव्य, स्वरूपरानीक व्यक्तिगत-चेतनाक रूपान्तरण — ई सभसँ आगाँ बढ़िकऽ शशिनिर्मला एकटा सर्वथा भिन्न काव्य-भूमि ग्रहण करैत छथि। ओ एकहि साथ तीन दिस मुँह कऽ लड़ैत छथि: उच्च-जातीय पुरुषक विरुद्ध, दलित पुरुषक विरुद्ध, आ उच्च-जातीय स्त्रीक विरुद्ध। एहि त्रिमुखी संघर्ष मे हुनकर काव्य एकटा ऐसन राजनीतिक भूमि ग्रहण करैत अछि जे तेलुगु दलित काव्य-परम्परामे असाधारण थिक।
१. काव्य-रूप आ संरचना
हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँ
एहि कविताक संरचना सम्वाद-रूप (दू पक्षक बीच प्रत्यक्ष बातचीतक काव्यिक प्रस्तुति) मे अछि — मुदा एकटा असाधारण सम्वाद जतय दोसर पक्ष कहियो उत्तर नहि दैत। "अहाँ" — एकटा उच्च-जातीय स्त्री — कविताक सम्पूर्ण लक्ष्य थिक। कवि हुनकासँ बाजैत छथि, मुदा हुनकर उत्तरक प्रतीक्षा नहि करैत — कारण ओ उत्तर सम्भव नहि।
ई एकपक्षीय सम्वाद (जाहिमे एके पक्ष बाजैत अछि) काव्यशास्त्रमे एकटा विशिष्ट विधि थिक। शेक्सपियरक नाटकमे एकालाप (अकेले बाजब) जे भीतरक द्वन्द्व उजागर करैत अछि — ओहिसँ ई भिन्न। एतय एकालाप नहि, अनसुनाएल सम्वाद अछि। कवि बाजैत छथि — दोसर पक्ष सुनैत नहि। एहि संरचनागत बधिरता मे उच्च-जातीय स्त्री-नारीवादक असलियत प्रकट होइत अछि।
कविताक अन्तिम पाँच पंक्ति प्रश्नक रूपमे आबैत अछि — "की अहाँ एक डेग नीचाँ उतरि आयब? ", "की हम एक्के पगडण्डी पर चलब? " — ई वक्तृत्वात्मक (वक्तृत्वकलापूर्ण) प्रश्न नहि, वास्तविक परीक्षा थिक। कवि उच्च-जातीय स्त्रीकेँ एकटा ठोस चुनाव (ठोस निर्णय) लेबाक लेल बाध्य करैत छथि।
हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी
एहि कविताक संरचना सर्वाधिक जटिल आ बहुस्तरीय अछि। ई एकहि साथ व्यक्तिगत आर्तनाद, राजनीतिक घोषणापत्र, आ ऐतिहासिक दस्तावेज थिक। संरचना तीन स्तरपर काम करैत अछि:
पहिल स्तर — व्यक्तिगत देह-अनुभव: रजस्वला, घाम, कुआँपर अपमान। दोसर स्तर — सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण: मीडिया, पुलिस, न्यायालय, जाति-हिंसा। तेसर स्तर — ऐतिहासिक साक्ष्य: अलिसम्मा, मुथव्वा, महादेवम्मा — वास्तविक पीड़िताक नाम।
ई तीनू स्तर कवितामे एकाकार भऽ जाइत अछि — व्यक्तिगत, सामाजिक, आ ऐतिहासिक एकहि साँसमे। एहि त्रि-स्तरीय एकत्व मे शशिनिर्मलाक काव्य-शक्तिक मूल निहित अछि।
एकटा दलित स्त्री
एहि कविताक संरचना उत्तरोत्तर विस्तारित आरोप-सूची (क्रमशः बढ़ैत दोषारोपणक शृंखला) थिक। प्रत्येक पंक्ति एकटा नव अपमान, एकटा नव शोषण जोड़ैत अछि — जाधरि ई सूची एतेक भारी नहि भऽ जाइत जे पाठक दबा जाय। मुदा अन्तमे एकटा अकस्मात् उलटपालट होइत अछि — "आब हम अपन मुँह आ आँखि खोलि रहल छी" — जे पूरा कविताक भारकेँ विद्रोहमे रूपान्तरित कऽ दैत अछि।
संरचनात्मक दृष्टिसँ ई शास्त्रीय सोनेट क परम्पराक विलोम थिक। सोनेट सामान्यतः समस्या-प्रस्तुति आ फेर समाधानक संरचनामे चलैत अछि। एतय समस्या-प्रस्तुति एतेक दीर्घ आ तीव्र अछि जे ओ स्वयं काव्यक मुख्य शरीर बनि जाइत अछि — आ समाधान मात्र दू पंक्तिमे, विस्फोटक रूपमे, आबैत अछि।
२. शीर्षकक राजनीति
तीनू कवितामे शीर्षक स्वयं एकटा राजनीतिक वक्तव्य थिक।
"हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँ" — एहिमे व्यंग्यात्मक स्व-आरोपण (खुद अपनापर दोष लगाएब, मुदा व्यंग्यमे) अछि। कवि कहैत छथि: हँ, हम हारल — मुदा एहि हार लेल दोषी के? शीर्षक उत्तर नहि दैत — पाठककेँ पुछैत अछि।
"हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी" — "रजस्वला" शब्द हिन्दू-ब्राह्मणवादी शुद्धता-प्रदूषण-व्यवस्थामे अत्यन्त कलंकित मानल जाइत अछि। एकरा शीर्षक बनाएब एकटा जानबूझिकऽ उकसाएब (जे सुनैत अछि तकरा असहज करब) थिक। जे समाज एहि शब्दसँ घृणा करैत अछि, ओहि समाजक "झूठा तर्क" आ "चतुराई" पर ई कपड़ा ओढ़ाएब — एकटा काव्यिक प्रतिशोध थिक।
"एकटा दलित स्त्री" — ई सर्वाधिक सरल आ एहि कारण सर्वाधिक शक्तिशाली शीर्षक थिक। "एकटा" — अनिश्चित एकवचन — ई कहैत अछि: ई कोनो एकटा व्यक्तिक कहानी नहि, ई सब दलित स्त्रीक कहानी थिक। ई शीर्षक एकहि साथ व्यक्तिगत आ सार्वभौमिक अछि।
३. उच्च-जातीय स्त्री-नारीवादक आलोचना: हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँ
ई कविता तेलुगु — वरन् समस्त भारतीय — दलित साहित्यमे एकटा दुर्लभ काव्यिक साहस क प्रदर्शन करैत अछि: ई उच्च-जातीय स्त्रीकेँ सोझे सम्बोधित करैत अछि आ हुनकर नारीवादी दावेकेँ प्रश्नांकित करैत अछि।
कविताक केन्द्रीय प्रसंग ई थिक: उच्च-जातीय स्त्री (सम्भवतः कवयित्रीक नियोक्त्री वा पड़ोसिन) हुनकर पतिसँ कहैत छथि "रे मूर्ख! " — अर्थात् ओ दलित स्त्रीक पक्षमे बाजैत प्रतीत होइत छथि। मुदा ओही नारीवादी उच्च-जातीय स्त्री अपन बेटीक आक्रामकताकेँ नहि रोकैत छथि, दलित स्त्रीकेँ "मातहत" मानैत छथि, आ अन्ततः हुनकर पक्षमे "वकालत" (पैरवी) केवल तखन करैत छथि जखन दलित स्त्री स्वयं "मुट्ठी बान्हि" लेत।
ई नारीवादक दोहरा मानदण्ड (उच्च-जातीय स्त्रीक नारीवाद जे दलित-स्त्रीक पक्षमे बाजैत अछि मुदा व्यवहारमे जाति-पदानुक्रम कायम राखैत अछि) क उद्घाटन थिक। ओड्रे लोर्ड सिस्टर आउटसाइडर (जाहिमे श्वेत नारीवादक जाति-अन्धताक आलोचना कएल गेल अछि) मे कहैत छथि जे स्त्री-एकजुटताक दावा तखन खोखल भऽ जाइत अछि जखन ओहिमे वर्ग आ जातिक भेद स्वीकार नहि कएल जाइत। शशिनिर्मलाक कविता एहि सिद्धांतकेँ ठोस भारतीय-जातीय यथार्थमे उतारैत अछि।
उमा चक्रवर्ती जातिकरण पितृसत्ता (जाहिमे ई देखाओल गेल अछि जे जाति आ लिंग एकहि व्यवस्थाक दू पाँखि थिक) मे तर्क करैत छथि जे भारतमे उच्च-जातीय स्त्री एकहि साथ पितृसत्ताक पीड़ित (लिंगक आधारपर) आ जाति-व्यवस्थाक लाभार्थी (जातिक आधारपर) छथि। शशिनिर्मलाक कविता एहि द्वन्द्वकेँ — बिना किसी सैद्धान्तिक आवरणक, नग्न यथार्थमे — प्रस्तुत करैत अछि।
"जाधरि केवल पुरुष वा केवल स्त्री अछि, तब धरि कोनो समस्या नै" — ई पंक्ति सम्पूर्ण कविताक दार्शनिक सार थिक। जखन पहचान केवल एकल-आयामी (मात्र लिंग वा मात्र जाति) रहैत अछि, तखन समझौता सम्भव। जखन दलित-स्त्री अपन बहु-आयामी पहचान (जाति+लिंग+वर्ग) दृढ़तासँ ग्रहण करैत अछि — तखन वर्जना-रेखाक संघर्ष शुरू होइत अछि।
४. देह, शुद्धता, आ प्रतिरोध: हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी
एहि कविताक केन्द्रीय रूपक — रजस्वला कपड़ा — बहुस्तरीय काव्यिक कार्य करैत अछि।
शुद्धता-मिथकक खण्डन
हिन्दू वर्णाश्रम व्यवस्थामे रजस्वला स्त्री अशुद्ध मानल जाइत अछि। एहि कपड़ाकेँ "ओढ़नाइ" — अर्थात् स्वयंकेँ एहिसँ ढाँकब — एकटा उलटपालट थिक: जे समाज एहि कपड़ासँ स्त्रीकेँ अशुद्ध मानैत अछि, ओहि समाजक झूठ पर एहि "अशुद्ध" कपड़ाकेँ ओढ़ाएब — अर्थात् अशुद्धताकेँ शस्त्र बनाएब।
जूलिया क्रिस्तेवाक घृणित-सिद्धांत (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे समाज ओहि चीजसँ घृणा करैत अछि जे शरीरक सीमाकेँ तोड़ैत अछि — रक्त, स्राव, मल — आ एहि घृणाक माध्यमसँ सामाजिक पदानुक्रम कायम राखैत अछि) एतय पुनः प्रासंगिक अछि। शशिनिर्मला एहि घृणित तत्त्वकेँ राजनीतिक शस्त्रमे रूपान्तरित करैत छथि।
ऐतिहासिक साक्ष्य
कविताक अन्तमे अलिसम्मा, मुथव्वा, आ महादेवम्माक उल्लेख — जिनका उच्च-जातीय पुरुषद्वारा नग्न कऽ घुमाओल गेल — एकटा ऐतिहासिक लंगर (इतिहासक ठोस घटनाक माध्यमसँ कविताकेँ वास्तविकतासँ जोड़ब) थिक। एहिसँ कविता मात्र व्यक्तिगत काव्योद्गार नहि रहैत — ओ एकटा सामूहिक स्मृतिक पात्र बनि जाइत अछि।
वाल्टर बेंजामिनक खतरनाक स्मृति क अवधारणा एतय पुनः स्मरणीय अछि — मुदा एतय ई स्मृति और भी खतरनाक अछि, कारण ओ अमूर्त ऐतिहासिक तथ्य नहि, वास्तविक स्त्रीक नाम थिक।
संस्थागत विफलता
"न तऽ पुलिसक लाठी, / न न्यायालयक दृष्टि — / हमर छिलल चाम सँ किछु लेना-देना अछि" — ई पंक्तियाँ राज्य-तन्त्रक जाति-पक्षधरता केँ स्पष्टतः उजागर करैत अछि। पुलिस आ न्यायालय — जे निष्पक्ष न्यायक प्रतीक माने जाइत छथि — एतय दलित-स्त्रीक लेल उदासीन वा शत्रुतापूर्ण संस्था छथि।
मिशेल फूकोक सत्ता-ज्ञान सम्बन्ध (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे न्याय-व्यवस्था, चिकित्सा-व्यवस्था, आदि संस्था सब वास्तवमे तटस्थ नहि बल्कि सत्ता-सम्बन्धक उपकरण थिक) एतय साकार होइत अछि। शशिनिर्मला एहि दार्शनिक अन्तर्दृष्टिकेँ कविताक भाषामे — बिना किसी सैद्धान्तिक पारिभाषिक शब्दावलीक — प्रस्तुत करैत छथि।
५. त्रिमुखी उत्पीड़न: एकटा दलित स्त्री
एकटा दलित स्त्री तेलुगु दलित काव्यमे सर्वाधिक राजनीतिक रूपसँ जटिल कविताक एकटा उदाहरण थिक, कारण ई एकहि साथ तीन उत्पीड़कसँ लड़ैत अछि।
कविताक पहिल भाग (आरम्भसँ "हमर देहक बल बूँद-बूँद टपाबैत अछि" धरि) — उच्च-जातीय पुरुष क उत्पीड़नक वर्णन।
कविताक दोसर भाग ("की कारण? / हमर अपन दलित लोक..." सँ) — दलित पुरुष क उत्पीड़नक उल्लेख — "हमरा अपन कपड़ा सुखाबय बला डोरी बनाबैत", "हुनकर खोपड़ीक खम्भा-किल्ली बनौने राखय लेल"।
कविताक तेसर भाग ("की कारण? / हमर अपन स्त्री-जाति..." सँ) — उच्च-जातीय स्त्री क उत्पीड़न — "हमरा हुनकर उच्च जातिक साड़ीक किनारी बनाबैत छथि। "
ई त्रिमुखी उत्पीड़नक स्वीकृति दलित-स्त्री काव्यमे असाधारण साहसिक कार्य थिक। दलित पुरुषक उत्पीड़नकेँ स्वीकार करब — ई दलित एकजुटताक राजनीतिमे एकटा वर्जित विषय रहल अछि। शशिनिर्मला एहि वर्जनाकेँ तोड़ैत छथि।
बाबासाहेब आम्बेडकर कहने छलाह जे दलित-स्त्रीक दशा दलितमे सबसँ दयनीय थिक — ओ जातिक आधारपर समाजसँ, लिंगक आधारपर दलित समुदायसँ, आ वर्गक आधारपर उच्च-जातीय स्त्रीसँ — तीनू दिससँ बहिष्कृत छथि। शशिनिर्मलाक ई कविता आम्बेडकरक एहि अन्तर्दृष्टिकेँ काव्यात्मक प्रमाण दैत अछि।
शर्मिला रेगेक दलित-नारीवादी दृष्टिबिन्दु (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे दलित-स्त्रीक दृष्टिकोण एकटा ज्ञान-मीमांसीय विशेषाधिकार थिक, कारण ओ उत्पीड़नक सर्वाधिक गहन स्तरपर जीबैत अछि) एतय काव्यमे साकार होइत अछि — "एकटा दलित स्त्री" ओहि स्थानसँ बाजैत अछि जतय तीनू उत्पीड़न-व्यवस्था एकसाथ आबैत अछि।
६. रूपकक विश्लेषण: शरीर-राजनीति
तीनू कवितामे शारीरिक रूपक (देहसँ जुड़ल प्रतीक) असाधारण रूपसँ तीव्र आ विविध अछि।
हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँमे — "हमरा काँट-कुस जकाँ नोचि-नोचि कऽ मुर्गी बना देलकै" — ई पशुकरण (मनुष्यकेँ पशु बनाएब) क रूपक थिक। "मुर्गी" — ओहि पशुक रूप जे बिना प्रतिरोधक नोचल जाइत अछि।
हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छीमे — "हमर मुँह, / जे लगातार घाम बहबैत अछि, / जानैत अछि अदृश्य रहि कऽ जीबाक मतलब" — मुँह एतय अभिव्यक्ति आ दमन दूनूक स्थल थिक। घाम बहाएब = काज करब = दृश्यमान होएब। मुदा समाज दलित-स्त्रीकेँ अदृश्य रखैत अछि।
एकटा दलित स्त्रीमे — "हमर जोड़ल हाथमे मूतैत अछि" — ई सर्वाधिक कच्चा, सर्वाधिक अपमानित बिम्ब थिक। प्रार्थना-मुद्रामे जोड़ल हाथ — जे श्रद्धाक प्रतीक थिक — तकरामे मूतब: ई पवित्रताक सर्वोच्च अपमान थिक। शशिनिर्मला एहि बिम्बमे कोनो काव्यिक संयम नहि करैत छथि — कारण यथार्थ स्वयं संयम-विहीन थिक।
फ्रान्ट्ज फानोंक उपनिवेशित देह (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे उपनिवेशवाद सर्वप्रथम शरीरपर आक्रमण करैत अछि — शरीरकेँ अपमानित कऽ, नियन्त्रित कऽ, ओ आत्माकेँ तोड़ैत अछि) क अवधारणा एतय तीनू कवितामे एकसाथ लागू होइत अछि।
७. भाषा-शैली: उग्रताक काव्यशास्त्र
शशिनिर्मलाक भाषा पूर्ववर्ती सभ कविसँ अधिक उग्र, अधिक प्रत्यक्ष, आ अधिक टकराहटी अछि। एहि उग्रताक साहित्यिक-राजनीतिक महत्त्व अछि।
सुभद्राक भाषा ध्यानस्थ गवाही थिक — ओ देखैत आ देखाबैत छथि। स्वरूपरानीक भाषा आवेगपूर्ण उद्घोष थिक — ओ टूटिकऽ बाजैत छथि। शशिनिर्मलाक भाषा सोझ आरोप थिक — ओ नामकऽ, अँगुरी उठाकऽ, आँखिमे आँखि डालिकऽ बाजैत छथि।
"हमर नाकमे नकेल डालि कऽ खेलबैत अछि" — नकेल पशुक लेल होइत अछि, मनुष्यक लेल नहि। एहि रूपकमे पशुकरणक राजनीति (दलित-स्त्रीकेँ मनुष्यसँ पशुमे रूपान्तरित करबाक सामाजिक प्रक्रिया) सोझे-सोझ कहल गेल अछि।
"हमरा दुहि लेल भैंस बनाबैत अछि" — श्रम-शोषणकेँ पशु-दोहनक रूपकमे देखाएब — एहिमे मार्क्सक अतिरिक्त मूल्यक अपहरण (मजदूरक श्रमसँ उत्पन्न मूल्यकेँ मालिकद्वारा हड़पब) आ जातीय शोषण दूनू एकहि बिम्बमे समाहित अछि।
८. पूर्ववर्ती कविसँ तुलना: एकटा समग्र काव्य-वंश-वृक्ष
एहि समीक्षा-शृंखलामे अध्ययन कएल पाँचू कवि — भीमन्ना, सुभद्रा, स्वरूपरानी, आ शशिनिर्मला — मिलिकऽ तेलुगु दलित काव्यक एकटा सम्पूर्ण काव्य-वंश-वृक्ष बनाबैत छथि:
भीमन्ना — इतिहास आ पुराणक पुनर्पाठ; व्यापक-दृष्टि; दलित पहचानक पुनर्स्थापना।
सुभद्रा — श्रम, वस्तु, आ मातृत्व; सूक्ष्म-दृष्टि; दैनिक जीवनक काव्यात्मक अभिलेखीकरण।
स्वरूपरानी — व्यक्तिगत चेतनाक रूपान्तरण; मध्य-दृष्टि (मध्यवर्ती दृष्टि जे व्यक्तिगत आ सामाजिकक बीच अछि); आशा-निराशाक द्वन्द्व।
शशिनिर्मला — त्रिमुखी संघर्ष; टकराहटी-दृष्टि; नारीवादक भीतरक अन्तर्विरोधकेँ उजागर करब।
ई चारू कवि मिलिकऽ एकटा द्वन्द्वात्मक यात्रा पूरा करैत छथि — इतिहाससँ आरम्भ कऽ (भीमन्ना), दैनिक जीवनमे उतरि (सुभद्रा), व्यक्तिगत चेतनाकेँ जगा (स्वरूपरानी), आ अन्ततः सब दिससँ टकरा (शशिनिर्मला)।
निष्कर्ष
दरिशे शशिनिर्मलाक तीन कविता दलित-स्त्री काव्यकेँ एकटा नव राजनीतिक भूमि पर लऽ जाइत अछि। ओ उहो कहैत छथि जे कहब कठिन थिक — दलित पुरुषक उत्पीड़न, उच्च-जातीय नारीवादक पाखण्ड, राज्य-तन्त्रक जाति-पक्षधरता — बिना किसी शब्द-संयमक, बिना किसी कूटनीतिक।
हुनकर काव्यमे सौन्दर्य क्रोधमे निहित अछि, शिल्प उग्रतामे निहित अछि, दर्शन ठोस शारीरिक यथार्थमे निहित अछि। ई दलित-स्त्री काव्यशास्त्रक ओहि परम्पराक चरमोत्कर्ष थिक जे शरणकुमार लिम्बाले, ओमप्रकाश वाल्मीकि, आ आम्बेडकरक विचार-परम्परासँ शक्ति लैत अछि।
अन्तिम पंक्ति — "देखी की हुनकर करामात देखबैत छथि" — एकटा चुनौती थिक: दलित-स्त्री आब दर्शक नहि, प्रश्नकर्ता अछि। ई प्रश्न समाजकेँ, नारीवादकेँ, दलित आन्दोलनकेँ — सभकेँ — पुछल गेल अछि। आ एहि प्रश्नक उत्तर देनाइ — साहित्यक नहि, इतिहासक कार्य थिक।
दलित-स्त्री काव्य समीक्षा: एम. गौरीक कविता
मेहदी लागल हाथ
प्रारम्भिक टिप्पणी
एम. गौरी तेलुगु दलित-स्त्री काव्य-परम्पराक एकटा सर्वथा विशिष्ट स्वर छथि। जतय शशिनिर्मला त्रिमुखी संघर्ष क काव्य लिखैत छथि, सुभद्रा श्रम-वस्तुक काव्य रचैत छथि, आ भीमन्ना पौराणिक पुनर्पाठ करैत छथि — गौरी एहि सबसँ भिन्न एकटा रणनीति अपनाबैत छथि: ओ पौराणिक आख्यानकेँ उलटिकऽ कृष्णसँ सोझे बाजैत छथि — आ ई संवाद एकटा दलित-चर्मकार स्त्रीक काव्यिक आत्म-घोषणा बनि जाइत अछि।
एहि एकटा कवितामे जे काव्य-जटिलता, पौराणिक-विरोधी पाठ, शिल्प-कौशल, आ राजनीतिक साहस एकत्र अछि — ओ एकरा तेलुगु दलित काव्यक सर्वोच्च रचनासभमे स्थापित करैत अछि।
१. काव्य-रूप आ संरचना
प्रत्यक्ष सम्बोधन-संरचना
ई कविता द्वितीय पुरुष सम्बोधन (सोझे "अहाँ" कहिकऽ बाजब) मे रचल गेल अछि — आ ओ "अहाँ" स्वयं श्रीकृष्ण छथि। ई एकटा असाधारण साहसिक काव्य-निर्णय थिक। भारतीय काव्य-परम्परामे कृष्णकेँ सम्बोधित करब एकटा सुदीर्घ परम्परा थिक — मीराबाई, सूरदास, जयदेव — मुदा ओहि सभमे सम्बोधक भक्त छथि, कृष्ण-श्रेष्ठ आ सम्बोधक-तुच्छ क सम्बन्ध थिक।
गौरी एहि पदानुक्रमकेँ उलटि दैत छथि। ओ कृष्णकेँ सम्बोधित करैत छथि — मुदा भक्तक रूपमे नहि, चुनौती देनिहारक रूपमे। "की देखि सकैत छी अहाँ ओकरा बिना मूर्छित भेने? ", "की हमर रगत सँ सनल हाथकेँ चूमि सकैत छी? " — ई प्रश्न भक्तिक नहि, परीक्षाक प्रश्न छथि।
तीन-स्तरीय काव्य-चाप
कविता तीन स्पष्ट खण्डमे विभक्त अछि:
पहिल खण्ड — "हमर गली बनल अछि मास-रगत सँ" सँ "एकटा सुदृढ़ साँढ़केँ सोझे भेदि देबाक खेल" धरि। एतय कर्मक जगत — चर्मकार-स्त्रीक दैनिक श्रम — स्थापित होइत अछि।
दोसर खण्ड — "अहाँ, ओ वीर कृष्ण! " सँ "चाम-खालक परदा पाछू? " धरि। एतय पौराणिक-विरोधी संवाद — कृष्णक तीनू रूपकेँ (मायाविनाशक, ग्वाल-बालिन-प्रेमी, बंशीवादक) प्रश्नांकित करब — चलैत अछि।
तेसर खण्ड — "हमर गली आब पालतू पिल्ला सभक लेल उपयुक्त नै रहल" सँ अन्त धरि। एतय दलित-स्त्रीक आत्म-घोषणा — अपन श्रम, अपन देह, अपन गरिमाक पुनर्दावा — होइत अछि।
ई तीन-चाप एकटा थीसिस-एन्टीथीसिस-सिन्थेसिस (स्थापना-खण्डन-समन्वय) क द्वन्द्वात्मक संरचना थिक — मुदा एतय समन्वय कोनो मध्यमार्ग नहि, विद्रोही आत्म-प्रतिष्ठा थिक।
२. पौराणिक-विरोधी पाठ: कृष्णक तीन रूपक खण्डन
गौरी एकहि कवितामे कृष्णक तीन पौराणिक रूपकेँ क्रमशः सम्बोधित करैत छथि — आ तीनूक विरुद्ध दलित-स्त्रीक यथार्थ खड़ा करैत छथि।
पहिल रूप: मायाविनाशक कृष्ण
"अहाँ, ओ वीर कृष्ण! / जे दैत्य-मायकेँ दूध पिया कऽ मारि देलहुँ" — ई पूतना-वधक सन्दर्भ थिक। पूराणमे कृष्ण विष-स्तनपान करनिहारी पूतनाकेँ मारैत छथि — ई दैवी वीरताक प्रतीक थिक।
गौरी एहि "वीरता"केँ चुनौती दैत छथि: "हम अहाँकेँ मासक दू टा लच्छी आ रगतक एकटा पात्र देखाएब। / की देखि सकैत छी अहाँ ओकरा बिना मूर्छित भेने? " — चर्मकार-स्त्री प्रतिदिन जे काज करैत अछि — मास-रगतसँ काम — ओ कृष्णक "वीरता"सँ अधिक वास्तविक आ अधिक साहसी थिक। पौराणिक वीरता आ दलित दैनिक-श्रमक ई तुलना अत्यन्त कड़वी आ अत्यन्त सत्य अछि।
दोसर रूप: ग्वाल-बालिन-प्रेमी कृष्ण
"अहाँ, ओ ग्वाल-बालिन सभक वस्त्र छल सँ हड़पि लेनिहार" — ई वस्त्रहरण-प्रसंग क सन्दर्भ थिक जे भक्ति-परम्परामे दिव्य-क्रीड़ा (ईश्वरक लीला) मानल जाइत अछि।
गौरी एहि "दिव्य-क्रीड़ा"केँ यौन-शोषणक दृष्टिसँ पढ़ैत छथि — आ फेर चुनौती दैत छथि: "की हमर हृदय चोरि सकैत छी, / जे हम सुरक्षित रखने छी — / चाम-खालक परदा पाछू? " हृदय "चाम-खालक परदा" पाछू सुरक्षित अछि — ई अत्यन्त जटिल रूपक थिक। चाम-खाल = चर्मकार-स्त्रीक व्यवसाय-पहचान = जे समाज "अशुद्ध" मानैत अछि। ओही "अशुद्ध" पहचान रक्षा-कवच बनि जाइत अछि — कृष्णक प्रेम-षड्यन्त्रसँ बचाबैत।
तेसर रूप: बंशीवादक कृष्ण
"अहाँ, ओ जे बंसुरी सँ काम-संदेश पठबैत छलहुँ, / की पढ़ि सकैत छी प्रेम-संदेश जे हम अपन कोमल अङ्गुरि सँ देहरी पर लिखने छी? " — कृष्णक बंसुरी भक्ति-काव्यमे दिव्य-प्रेमक प्रतीक थिक। मुदा एतय दलित-स्त्रीक "देहरी पर लिखल" प्रेम-संदेश अधिक ठोस, अधिक वास्तविक, अधिक मानवीय थिक।
"देहरी" — चौखट — एकटा सीमा-प्रतीक थिक। दलित-स्त्री देहरी पर लिखैत छथि — न भीतर (उच्च-जातीय घरक), न बाहर। देहरीपर लिखल प्रेम सीमान्त प्रेम (हाशियाक अनुभव) थिक।
भीमन्नाक पौराणिक-विरोधी पाठ (जाहिमे ओ पुराणक मूल आख्यानकेँ उलटिकऽ दलित-दृष्टिसँ पढ़ैत छथि) परम्पराकेँ गौरी एतय काव्यात्मक संवादक रूपमे अधिक नाटकीय ढंगसँ प्रस्तुत करैत छथि।
३. शीर्षकक बहुस्तरीय अर्थ
"मेहदी लागल हाथ" — ई शीर्षक अत्यन्त द्व्यर्थी (दोहरा अर्थवाला) थिक।
पहिल अर्थ — भारतीय सांस्कृतिक परम्परामे मेहदी विवाह-उत्सवक प्रतीक थिक — शृङ्गार, सौभाग्य, प्रेम। "मेहदी लागल हाथ" माने उत्सव-मग्न हाथ।
दोसर अर्थ — कविताक भीतर, "मेहदी" वास्तवमे रगत थिक। "की हमर रगत सँ सनल हाथकेँ चूमि सकैत छी, / बिना मेहदी लागल? " — एतय रगत = मेहदी। चर्मकार-स्त्रीक हाथपर जे रगत अछि, ओ श्रमक मेहदी थिक — विवाहक नहि।
ई विलोम-प्रतीक (एकटा शुभ प्रतीककेँ उलटिकऽ श्रम-यथार्थक प्रतीक बनाएब) दलित सौन्दर्यशास्त्रक एकटा उत्कृष्ट उदाहरण थिक। उच्च-जातीय संस्कृतिमे मेहदी = सौन्दर्य आ उत्सव। दलित-चर्मकार-स्त्रीक जीवनमे मेहदी = रगत आ श्रम। गौरी एहि दूनू अर्थकेँ एकहि शब्दमे एकत्र करैत छथि।
४. चाम-खालक रूपक: दलित-पहचानक पुनर्दावा
कविताक सर्वाधिक शक्तिशाली भाग थिक अन्तिम खण्ड — जतय चाम-खाल (जे समाज "अशुद्ध" मानैत अछि) कविताक केन्द्रीय पुनर्दावे-रूपक बनि जाइत अछि:
"जखन हमर चाम अमलतास सँ धोयल जाइत अछि, / अहाँक आङ्गुरि सभक दाग मेटाबैत — / ई बनि जाइत अछि ढोल, / शुद्ध सङ्गीत गुञ्जाबैत। "
एहि पंक्तिमे तीन स्तरीय रूपान्तरण घटित होइत अछि:
पहिल — कृष्णक आङ्गुरिक दाग (जे ग्वाल-बालिनक वस्त्र चोरएलनि, जे बंसुरी बजौलनि) चामपर अंकित अछि — अर्थात् उच्च-जातीय सांस्कृतिक दावेक छाप दलित-देहपर अछि।
दोसर — अमलतास (जे लाण्डा कवितामे सुभद्रा सेहो प्रयोग कएल छथि) सँ धोएलापर ई दाग मेटाइत अछि — अर्थात् देशज ज्ञान-परम्परा उच्च-जातीय सांस्कृतिक दावेकेँ मेटाबैत अछि।
तेसर — धोएल चाम ढोल बनैत अछि जे शुद्ध सङ्गीत गुञ्जाबैत अछि। ई अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थिक: जे समाज चर्मकारक चामकेँ "अशुद्ध" मानैत अछि, ओही चामसँ बनल ढोल "शुद्ध सङ्गीत" उत्पन्न करैत अछि।
ई शुद्धता-अशुद्धता मिथकक पूर्ण खण्डन थिक — तर्कसँ नहि, रूपकसँ। स्वरूपरानीक लाण्डा मे सेहो ढोलक प्रसंग आयल छल — मुदा ओतय ढोल पतिक श्रमक प्रतीक छल। एतय ढोल दलित-स्त्री-पहचानक प्रतीक थिक — स्वयं ओकर देह जे "अशुद्ध" मानल गेल, ओ सङ्गीत-स्रोत बनि जाइत अछि।
जूलिया क्रिस्तेवाक घृणित-सिद्धांत (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे समाज शरीरक स्रावसभकेँ, जानवरक मांससभकेँ "घृणित" आ "अशुद्ध" मानि सामाजिक पदानुक्रम कायम राखैत अछि) एतय काव्यात्मक प्रत्युत्तर पाबैत अछि: गौरी "घृणित" केँ "सुन्दर" मे, "अशुद्ध" केँ "शुद्ध सङ्गीत" मे रूपान्तरित करैत छथि।
५. खेल-रूपक आ बहादुरी
कविताक आरम्भ एकटा काव्यिक आमन्त्रण सँ होइत अछि — "की हमरा संग खेलय लेल नै आयब? " — जे बच्चाक निर्दोष खेल-निमन्त्रण जकाँ प्रतीत होइत अछि। मुदा तुरन्त स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे ई खेल वास्तविक साँढ़केँ भेदबाक खेल थिक।
"ओहि जुलूसमे बैल-बलदक डरपोक खेल नै, / हम अहाँकेँ एकटा बहादुरीक खेल देखाएब" — एतय एकटा श्रेणी-तुलना अछि। जे लोग धार्मिक जुलूसमे बधिया बैल-बलदकेँ सजाकऽ घुमाबैत छथि — ओ "डरपोक खेल" थिक। दलित-चर्मकार स्त्रीक काज — सुदृढ़ साँढ़केँ भेदब — वास्तविक बहादुरी थिक।
भारतीय लोक-परम्परामे जल्लीकट्टु (साँढ़सँ लड़ाइ) एकटा वीरता-प्रदर्शनक खेल थिक। गौरी एहि लोक-परम्पराकेँ दलित-स्त्री-श्रमक रूपक बनाकऽ उच्च-जातीय सांस्कृतिक वीरता-परिभाषाकेँ चुनौती दैत छथि: वास्तविक वीरता धर्म-जुलूसमे नहि, दैनिक श्रममे अछि।
६. "बिना झुकल रीढ़": दलित गरिमाक काव्यिक घोषणा
"आउ, / जँ आबि सकैत छी, / हड्डी चुनब सिखाएब — / हम अहाँकेँ बिना झुकल रीढ़ देखाएब। "
ई पंक्ति सम्पूर्ण कविताक दार्शनिक-राजनीतिक सार थिक।
"हड्डी चुनब" — चर्मकार-स्त्रीक व्यावसायिक कार्य — एतय ज्ञान-हस्तान्तरणक रूप धारण करैत अछि। ओ कृष्णकेँ सिखाएब चाहैत छथि। शिक्षक दलित-स्त्री, छात्र कृष्ण — ई पदानुक्रमक पूर्ण विलोम थिक।
"बिना झुकल रीढ़" — एहिमे दोहरा अर्थ अछि। शाब्दिक अर्थ: पशुक मेरुदण्ड जे सीधा अछि, जे झुकल नहि। रूपकार्थ: दलित-स्त्रीक आत्म-सम्मान जे झुकल नहि।
बाबासाहेब आम्बेडकर कहने छलाह: "जीवन दीर्घ होएबासँ महत्त्वपूर्ण अछि जे ओ महान होए। " गौरीक दलित-स्त्री दीर्घजीवी नहि — अजेय छथि।
७. "पाप नै" — धार्मिक नैतिकताक खण्डन
"ई पाप नै छैक माटि भेल पानिक, / ई पाप नै छैक 'अपराधी' चामक। "
"अपराधी चाम" — एतय उद्धरण-चिह्न महत्त्वपूर्ण अछि। समाज जे चामकेँ "अपराधी" कहैत अछि, ओ समाजक मिथ्या नैतिकता थिक। गौरी एहि नैतिकताकेँ सोझे अस्वीकार करैत छथि।
ब्राह्मणवादी धर्म-शास्त्रमे चर्मकार-कार्य पाप मानल जाइत अछि — पिछला जन्मक कर्मफल। गौरी एहि कर्मफल-सिद्धांत केँ सोझे नकारैत छथि: "ई पाप नै छैक। " ई दू शब्द — "पाप नै" — सम्पूर्ण ब्राह्मणवादी नैतिक-आर्थिक व्यवस्थाक विरुद्ध काव्यिक घोषणापत्र थिक।
फ्रेडरिक नीत्शेक नैतिकताक पुनर्मूल्यांकन (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे प्रचलित नैतिकता सत्य नहि, बल्कि सत्ताधारीक हितमे निर्मित नियमसभ थिक) क प्रतिध्वनि एतय अछि — मुदा गौरी नीत्शेक दर्शन पढ़िकऽ नहि, जीवनक यथार्थसँ एहि निष्कर्षपर पहुँचैत छथि।
८. जल-रूपक: शुद्धताक नव परिभाषा
"जखन पानि भाप बनि काल बादरिमे बदलैत अछि बिजलीक बूँद बरसाबय लेल, / तखन गलीक पवित्रता पारदर्शी भऽ जाइत छैक। "
एहि पंक्तिमे भौतिक विज्ञान आ काव्यिक रूपक एकाकार अछि। जल जखन भाप बनैत अछि — ओ अदृश्य भऽ जाइत अछि। फेर बादरमे परिणत भऽ बिजली बरसाबैत अछि — शक्तिरूप धारण करैत अछि।
दलित-स्त्रीक गली जे समाज "अपवित्र" मानैत अछि — ओहि गलीक पवित्रता तखन "पारदर्शी" अर्थात् स्पष्ट भऽ जाइत अछि जखन ई रूपान्तरण घटित होइत अछि। पारदर्शिता = सत्यक प्रकट होएब।
एहि रूपकमे हेगेलीय द्वन्द्व (जाहिमे विरोधी तत्त्वसभक संघर्षसँ नव सत्य उदित होइत अछि) क काव्यात्मक प्रतिनिधित्व अछि — मुदा एतय ई अमूर्त दर्शन नहि, माटि आ पानिक ठोस यथार्थ थिक।
९. भीमन्नासँ तुलना: पौराणिक-विरोधी पाठक दू रूप
भीमन्नाक हमर पैतृक अधिकार आ गौरीक मेहदी लागल हाथ — दूनू पौराणिक पुनर्पाठ करैत अछि। मुदा रणनीतिमे भेद अछि:
भीमन्ना पुराणक ऐतिहासिक तर्क देखाबैत छथि — व्यास, वशिष्ठ, मत्स्यगन्धी वास्तवमे दलित मूलक छलाह, एहि ऐतिहासिक सत्यकेँ उजागर करब। हुनकर रणनीति विद्वत्तापूर्ण पुनर्पाठ थिक।
गौरी पुराणक नाटकीय संवाद करैत छथि — कृष्णसँ सोझे बाजैत छथि, हुनका चुनौती दैत छथि, हुनका अपन गलीमे आमन्त्रित करैत छथि। हुनकर रणनीति काव्यात्मक टकराहट थिक।
दूनू मिलिकऽ दलित काव्यमे पौराणिक-विरोधी पाठक सम्पूर्ण स्पेक्ट्रम (पूरा विस्तार) प्रस्तुत करैत अछि — तर्कसँ आक्रमण आ संवादसँ आक्रमण।
१०. सुभद्राक लाण्डा सँ साम्य: ढोलक प्रतीक
जेना ऊपर उल्लेख कएल, सुभद्राक लाण्डा आ गौरीक मेहदी लागल हाथ — दूनूमे ढोलक प्रतीक अछि। मुदा भिन्न सन्दर्भमे:
लाण्डामे — "चरचराइत जुत्ता आ ढोल बनबा लेल— / ओ ढोल पर मधुर ताल दैत छथि" — ढोल पतिक कलाक प्रतीक थिक। स्त्रीक श्रम पतिक कलामे रूपान्तरित होइत अछि — एहिमे श्रम-अलगावक कड़वाहट थिक।
मेहदी लागल हाथमे — ढोल दलित-स्त्रीक स्वयंक पहचानक प्रतीक थिक। ओकर देह, ओकर श्रम, ओकर चाम — ई सब शुद्ध सङ्गीतक स्रोत थिक। एतय श्रम-अलगाव नहि — श्रम-उत्सव थिक।
ई दूनू कवितामे ढोलक भिन्न-भिन्न उपयोग दलित-स्त्री काव्यमे एकहि प्रतीकक बहुस्वरता दर्शाबैत अछि।
निष्कर्ष
एम. गौरीक मेहदी लागल हाथ तेलुगु दलित काव्यक एकटा शिखर-रचना थिक। एहि एकटा कवितामे:
पौराणिक आ आधुनिक एकाकार अछि — कृष्ण आ चर्मकार-स्त्री एकहि स्थानपर ठाढ़ छथि।
शिल्प आ राजनीति एकाकार अछि — रूपकक सौन्दर्य आ सामाजिक आरोप एकहि साँसमे अछि।
व्यक्तिगत आ सामूहिक एकाकार अछि — एकटा स्त्रीक स्वर समस्त दलित-चर्मकार समुदायक स्वर बनि जाइत अछि।
अन्तमे — "ई बनि जाइत अछि ढोल, / शुद्ध सङ्गीत गुञ्जाबैत" — गौरी जे कहैत छथि से थिक: दलित-स्त्रीक देह, श्रम, आ पहचान — जकरा समाज "अशुद्ध" कहैत अछि — ओ वास्तवमे सर्वाधिक शुद्ध सङ्गीतक स्रोत थिक। ई मात्र काव्यिक रूपक नहि — ई एकटा सम्पूर्ण सभ्यता-दृष्टि थिक।
दलित-स्त्री काव्य समीक्षा: मद्दुरी विजयश्रीक कविता
अलिसम्माक स्राप
प्रारम्भिक टिप्पणी
मद्दुरी विजयश्रीक अलिसम्माक स्राप तेलुगु दलित-स्त्री काव्य-परम्पराक एकटा असाधारण काव्यिक उपलब्धि थिक। एहि लघु कवितामे — मात्र तीस-एक पंक्तिमे — एतेक काव्य-जटिलता, एतेक ऐतिहासिक-पौराणिक घनत्व, आ एतेक राजनीतिक साहस एकत्र अछि जे ई अपने वर्गमे एकटा विशिष्ट स्थान ग्रहण करैत अछि।
एहि कवितामे तीन कालखण्ड एकसाथ उपस्थित अछि: रामायण-काल (शूर्पणखाक नासिका-छेदन), समकालीन इतिहास (अलिसम्माक वास्तविक घटना), आ वर्तमान (दलित-स्त्रीक समकालीन संकट)। ई त्रि-कालिक एकत्व कवितामे एकटा असाधारण काव्यिक समय-सम्पीड़न सृजित करैत अछि।
१. काव्य-रूप आ संरचना
आरम्भिक पूर्वाभास
कविताक पहिल तीन पंक्ति — "अहाँकेँ ई अद्भुत लागि सकैत अछि, / अहाँकेँ ई हास्यास्पद लागि सकैत अछि, / अहाँकेँ ई बहुत घिनौना लागि सकैत अछि" — एकटा अनुप्रास-आरम्भ शृंखला थिक जे तीन भिन्न पाठक-प्रतिक्रियाक पूर्वानुमान करैत अछि।
ई संरचना अत्यन्त परिकलित अछि। कवि जानैत छथि जे हुनकर कविता तीन प्रकारक पाठक पढ़त: जे अद्भुत मानत (उदारवादी), जे हँसत (व्यंग्यकारी), जे घृणा करत (प्रतिक्रियावादी)। तीनूकेँ एकहि साथ सम्बोधित कऽ कवि ई स्पष्ट करैत छथि — "मुदा हम आब एकटा नव प्रश्न छी" — कोनो प्रतिक्रियासँ निरपेक्ष, कविताक अस्तित्व अटल अछि।
आत्म-परिचयक संरचना
कविताक मध्य-भाग एकटा क्रमिक आत्म-परिचय थिक — नकारात्मकसँ सकारात्मक दिस:
पहिल — जे नहि अछि: आरक्षित सीटपर नहि बैसि सकैत, सम्मानजनक उपाधि नहि अछि।
दोसर — जे अछि: दुख, लुढ़कनाइ, वासनाक शिकार।
तेसर — नामकरण: "हम अलिसम्मा छी" — एहि पंक्तिपर कविता एकटा नव स्तरपर प्रवेश करैत अछि।
ई संरचना नकारात्मक परिभाषासँ स्व-घोषणा दिस कविताक यात्रा थिक — जे अन्ततः स्राप-उद्घोष मे परिणत होइत अछि।
अन्तिम विस्फोट
अन्तिम खण्ड — "रे पशु सब! / हम अहाँ सभकेँ स्राप दैत छी" — एकटा अकस्मात् स्वर-परिवर्तन थिक। पूरा कविता जे एक सधल, विश्लेषणात्मक स्वरमे चलैत आएल छल — ओ एतय एकाएक उग्र हुङ्कारमे परिणत भऽ जाइत अछि। ई काव्यिक भूकम्प थिक।
२. अलिसम्मा: ऐतिहासिक व्यक्तित्व आ काव्यिक प्रतीक
शशिनिर्मलाक हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी मे अलिसम्माक उल्लेख भेल छल — मुदा ओतय ओ नामोल्लेखमात्र छलीह। विजयश्री एतय अलिसम्माकेँ काव्यक वक्ता बनाबैत छथि — ओ स्वयं बाजैत छथि।
अलिसम्मा एकटा वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्ति छथि — आन्ध्र प्रदेशमे एकटा दलित स्त्री जिनका उच्च-जातीय पुरुषसभद्वारा सार्वजनिक रूपसँ नग्न कऽ घुमाओल गेल छल। ई घटना दलित स्त्री-उत्पीड़नक प्रतीक-घटना बनि गेल।
विजयश्री एहि ऐतिहासिक व्यक्तिकेँ काव्यिक वाचक बनाकऽ दू काज एकसाथ करैत छथि:
पहिल — अलिसम्माकेँ वस्तुसँ विषय (वस्तु सँ कर्ता-विषय) मे रूपान्तरित करैत छथि। इतिहासमे ओ एकटा पीड़ित छलीह जिनकर कहानी दोसरसभ कहैत छथि। एतय ओ स्वयं बाजैत छथि।
दोसर — अलिसम्माकेँ सार्वभौमिक बनाबैत छथि। "हम अलिसम्मा छी" — एहि पंक्तिमे "हम" मात्र एकटा व्यक्ति नहि, समस्त दलित-स्त्री थिक।
गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाकक "निम्नवर्ग कि बाजि सकैत अछि? " (की निम्नवर्ग अपन आवाजमे इतिहासमे उपस्थित भऽ सकैत अछि? ) प्रश्नक उत्तर विजयश्री एतय देैत छथि: हँ, एहि कवितामे। अलिसम्मा बाजि रहल छथि।
३. पौराणिक-ऐतिहासिक समानान्तरता: शूर्पणखा आ अलिसम्मा
कविताक सर्वाधिक साहसिक काव्यिक निर्णय थिक — शूर्पणखाक नासिका-छेदन आ अलिसम्माक सार्वजनिक नग्नीकरण कें एकहि पंक्तिमे जोड़ब:
"पहिले हमर कान-नाक काटल गेल छल प्रभु रामक आदेश पर। / आब हालहिमे, / हम पुलिसक हाथमे बिना कारण दुख बनि गेलहुँ। "
एहि समानान्तरतामे अनेक अर्थ-स्तर अछि:
पहिल स्तर — दूनू घटनामे उत्पीड़क पुरुष छथि आ पीड़ित दलित/बहिष्कृत स्त्री। शूर्पणखा राक्षस-कुलक — समाजक "अन्य" (जे मुख्यधाराक बाहर अछि)। अलिसम्मा दलित-कुलक — समाजक "अन्य"।
दोसर स्तर — दूनू घटनामे राज्य-शक्ति उत्पीड़नमे सहभागी अछि। रामक आदेशपर लक्ष्मण नासिका काटैत छथि। पुलिसक हाथे अलिसम्मा पीड़ित होइत छथि। धर्म-राज्य (रामायण-काल) आ आधुनिक राज्य — दूनू एकहि काज करैत अछि।
तेसर स्तर — रामायणमे शूर्पणखाक कामनाकेँ अपराध मानल गेल — ओ राम वा लक्ष्मणसँ विवाह चाहने छलीह। अलिसम्माक अस्तित्वकेँ अपराध मानल गेल। दूनू घटनामे स्त्री-इच्छा वा स्त्री-उपस्थिति उत्पीड़नक कारण बनैत अछि।
चतुर्थ स्तर — "प्रभु राम" — एहिमे "प्रभु" शब्द व्यंग्यात्मक अछि। जे "प्रभु" (भगवान, रक्षक) थिक, ओ स्त्री-उत्पीड़नक आदेश दैत अछि। ई धर्म-आधारित नैतिकताक खण्डन थिक।
भीमन्नाक पौराणिक-विरोधी पाठ (जाहिमे ओ महाभारतक व्यक्तित्वसभकेँ पुनर्पाठ करैत छलाह) परम्पराक एहि रचना और आगाँ जाइत अछि। भीमन्ना इतिहासक पुनर्पाठ करैत छलाह — विजयश्री इतिहासकेँ वर्तमानसँ जोड़ि देखाबैत छथि जे कोनो किछु नहि बदलल।
४. "नव प्रश्न" क दर्शन
"मुदा हम आब एकटा नव प्रश्न छी" — ई पंक्ति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थिक।
परम्परागत दर्शनमे प्रश्न एकटा साधन थिक, उत्तर लक्ष्य थिक। सुकरात-पद्धतिमे प्रश्न सत्यक दिस लऽ जाइत अछि। मुदा विजयश्री कहैत छथि: हम स्वयं प्रश्न छी।
ई अस्तित्ववादी घोषणा थिक। दलित-स्त्री कोनो उत्तर नहि, स्वयं प्रश्न अछि — समाजक लेल, व्यवस्थाक लेल, इतिहासक लेल। जाधरि दलित-स्त्री जीवित अछि, प्रश्न समाप्त नहि होएत।
सिमोन द बोवुआर दोसर लिंग (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे स्त्री सदैव "दोसर" — पुरुषक सापेक्षमे परिभाषित — रहल अछि) क "दोसर"पन एतय दलित-जाति-आयामसँ अधिक जटिल भऽ जाइत अछि। दलित-स्त्री "दोसर" नहि — प्रश्न अछि — जे उत्तर मागैत अछि।
५. "स्राप" क काव्यिक-राजनीतिक महत्त्व
कविताक शीर्षक आ अन्तिम उद्घोष — "स्राप" — अत्यन्त बहुस्तरीय अछि।
धार्मिक परम्परामे स्राप
हिन्दू धर्म-परम्परामे ऋषि-मुनिक स्राप अत्यन्त शक्तिशाली मानल जाइत अछि। ब्रह्माक स्राप, दुर्वासाक स्राप — ई सब अपरिवर्तनीय होइत अछि। स्राप देबाक अधिकार सदैव उच्च-जातीय पुरुषक छलनि।
विजयश्री एहि स्राप-अधिकारकेँ दलित-स्त्रीक हाथमे दैत छथि। ई पदानुक्रमक उलटपालट थिक: जे कहियो स्राप पाबैत छल — ओ आब स्राप दैत अछि।
स्रापक विषय-वस्तु
"हम अहाँ सभकेँ स्राप दैत छी कि अहाँ मानवमे परिणत भऽ जाउ — / अपन पूँछ आ नुकीला दाँत तोड़ि-मोड़ि कऽ। "
ई स्राप अत्यन्त असाधारण थिक। सामान्यतः स्राप विनाशक होइत अछि — मरह, भस्म होह, पशु बनह। विजयश्रीक स्राप रूपान्तरणक थिक — मानव बनह।
एहिमे एकटा गहिर दार्शनिक कटाक्ष अछि: जे उत्पीड़क छथि — पुलिस, उच्च-जाति, पशु-समान व्यवहार करनिहार — ओ वास्तवमे पशु छथि। हुनका मानव बनबाक स्राप देब — ई सर्वोच्च व्यंग्य थिक।
एहिमे फ्रान्ट्ज फानोंक उपनिवेशवाद-विरोधी दर्शनक प्रतिध्वनि अछि — जतय ओ तर्क करैत छथि जे उपनिवेशक/उत्पीड़क वास्तवमे अपन मानवता खो चुकल अछि। पीड़ित अधिक मानवीय अछि, उत्पीड़क कम। विजयश्री एहि तर्ककेँ काव्यिक स्राप मे रूपान्तरित करैत छथि।
६. सम्मानजनक उपाधिक अनुपस्थिति
"जखन बोलल जाइत अछि वा चिच्चाओल जाइत अछि, / तऽ कोनो सम्मानजनक उपाधि नै अछि हमर नामक आगाँ वा पाछू लगबा लेल। "
ई पंक्ति भाषा आ सामाजिक पहचानक सम्बन्धकेँ उजागर करैत अछि। भारतीय समाजमे नामक आगाँ-पाछू लगाएल जाइत — "श्रीमती", "डॉक्टर", "स्वर्गीय", जातिसूचक उपनाम — ई सब सामाजिक मान्यताक चिह्न थिक।
दलित-स्त्री जखन बाजैत वा चिच्चाबैत अछि — ओ नामहीन थिक। न "श्रीमती" (विवाहित सम्मान), न जाति-उपनाम (जे समाजमे स्थान दैत अछि), न पेशेगत उपाधि।
भाषाशास्त्री पियरे बोर्दोक भाषिक पूँजी (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे भाषामे सामाजिक शक्ति-सम्बन्ध प्रतिबिम्बित होइत अछि) क अवधारणा एतय लागू होइत अछि। नामकरण-अधिकार एकटा सामाजिक शक्ति थिक। दलित-स्त्रीक नामक आगाँ-पाछू शून्य अछि — ई शून्यता समाजमे हुनकर अनुपस्थिति क प्रतीक थिक।
७. आरक्षित सीटक रूपक
"यद्यपि खाली अछि, / मुदा स्त्री सभ लेल आरक्षित सीट पर नै बैसि सकैत छी। "
ई पंक्ति समकालीन दलित-स्त्री अनुभवक अत्यन्त सटीक काव्यिक प्रस्तुति थिक। बस, ट्रेन, कार्यालयमे "महिला आरक्षित" सीट सैद्धान्तिक रूपसँ सब स्त्रीक लेल होइत अछि। मुदा व्यवहारमे दलित-स्त्री ओहिपर बैसि नहि सकैत — कारण उच्च-जातीय स्त्री वा पुरुष विरोध करैत अछि।
एहि रूपकमे कानून आ यथार्थक भेद प्रकट होइत अछि। भारतीय संविधान समानताक गारन्टी दैत अछि — मुदा सामाजिक यथार्थमे ई गारन्टी खाली सीट जकाँ अछि — उपस्थित, मुदा अगम्य।
स्वरूपरानीक आरक्षण-कलंकारोपण (कोटा-सँ-आयल कहिकऽ अपमान) आ विजयश्रीक आरक्षित-सीट-अगम्यता — दूनू मिलिकऽ दलित-स्त्रीक सांवैधानिक अधिकार आ सामाजिक वास्तविकताक विरोधाभास दर्शाबैत अछि।
८. "न्यायालय रूपी आँखिमे बाती"
"हम अलिसम्मा छी, / जे न्यायालय रूपी आँखिमे बाती जलौने छलहुँ। "
ई रूपक असाधारण काव्यिक घनत्व राखैत अछि।
"न्यायालय रूपी आँखि" — न्याय-प्रतीकमे अन्धी देवी (जस्टिशिया, पट्टी-बान्हल आँखिसँ) पाश्चात्य परम्परामे अछि — जे कहैत अछि न्याय पक्षपातरहित अछि। मुदा भारतीय सन्दर्भमे न्यायालय जाति-वर्गक पक्षधर रहल अछि।
"आँखिमे बाती जलाएब" — सामान्यतः दीपक बाती जलाएब आलोक-प्रसार थिक। मुदा आँखिमे बाती जलाएब यन्त्रणा थिक। दलित-स्त्रीक न्यायालयमे जाएब — जे न्याय-प्राप्तिक लेल होएबाक चाही — यातना-अनुभव बनि जाइत अछि।
एहि रूपकमे आशा आ विडम्बना एकहि साथ अछि: अलिसम्मा न्यायालयमे आलोक आनय गेलीह — मुदा ओहि "आँखि"मे बाती जरल, जरैत रहल।
९. "स्त्री आ दलित भऽ कऽ सेहो हम अखन धरि जीवित छी"
ई पंक्ति दलित-स्त्री काव्यक सार-वाक्य थिक।
"सेहो" — ई एकटा शब्द सम्पूर्ण उत्पीड़नक इतिहास समेटि लैत अछि। स्त्री भऽ कऽ उत्पीड़न। दलित भऽ कऽ उत्पीड़न। दूनू एकसाथ। "सेहो" कहैत अछि: एहि सभक बावजूद।
ई जीवनक राजनीतिक कार्य थिक। पॉल गिलरॉय "जिएब, हँसब, प्रेम करब" केँ उत्पीड़नक विरुद्ध सांस्कृतिक प्रतिरोध मानैत छथि। विजयश्रीक "अखन धरि जीवित छी" एहि अर्थमे जीवित रहनाइ स्वयं विद्रोह थिक।
१०. पाँचू कवि: एकटा अन्तिम संश्लेषण
एहि सम्पूर्ण समीक्षा-शृंखलामे हम पाँच तेलुगु दलित कवि — भीमन्ना, सुभद्रा, स्वरूपरानी, शशिनिर्मला, गौरी, आ विजयश्री — क अध्ययन कएल। सभ मिलिकऽ एकटा सम्पूर्ण दलित-स्त्री काव्य-ब्रह्माण्ड निर्मित करैत अछि:
भीमन्ना — इतिहास-दर्पण। पुराण-इतिहासक उलटपालट।
सुभद्रा — श्रम-दर्पण। दैनिक जीवनक वस्तु-संसारक काव्य।
स्वरूपरानी — चेतना-दर्पण। व्यक्तिगत रूपान्तरणक यात्रा।
शशिनिर्मला — संघर्ष-दर्पण। त्रिमुखी उत्पीड़नसँ त्रिमुखी संघर्ष।
गौरी — पहचान-दर्पण। "अशुद्ध" पहचानकेँ शुद्ध सङ्गीतमे रूपान्तरण।
विजयश्री — न्याय-दर्पण। इतिहासक पीड़ितकेँ वाचक बनाएब, स्रापकेँ शस्त्र बनाएब।
ई छहू दर्पण मिलिकऽ दलित-स्त्री अस्तित्वक सम्पूर्ण प्रतिबिम्ब बनाबैत अछि।
निष्कर्ष
मद्दुरी विजयश्रीक अलिसम्माक स्राप तेलुगु दलित काव्यक एहि पूरा शृंखलाक सर्वोच्च काव्यिक क्षण थिक।
एहि कवितामे:
इतिहास बाजैत अछि — अलिसम्मा, जे वस्तु छलीह, वाचक बनि जाइत छथि।
पुराण खण्डित होइत अछि — रामक "प्रभुत्व" आ पुलिसक "अधिकार" एकहि पंक्तिमे जोड़ल जाइत अछि।
भाषा विद्रोह करैत अछि — "स्राप" — जे उच्च-जातिक विशेषाधिकार छल — दलित-स्त्रीक शस्त्र बनि जाइत अछि।
दर्शन जन्म लैत अछि — जीवित रहनाइ विद्रोह थिक, प्रश्न बनब शक्ति थिक।
अन्तिम पंक्ति — "अपन पूँछ आ नुकीला दाँत तोड़ि-मोड़ि कऽ" — एकटा भविष्यक माँग थिक। जाधरि उत्पीड़क अपन पशुता नहि छोड़त, ताधरि स्राप सक्रिय रहत। ई माँग समाजकेँ, व्यवस्थाकेँ, इतिहासकेँ — सभकेँ — पुछल गेल अछि।
आ ई प्रश्न — "हम आब एकटा नव प्रश्न छी" — तेलुगु दलित काव्यक एहि सम्पूर्ण शृंखलाक अन्तिम, अनुत्तरित, आ सर्वाधिक शक्तिशाली स्वर थिक।
गुजराती दलित कविता [गुजरातीसँ अंग्रेजी अनुवाद हेमांग देसाई; अंग्रेजीसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर द्वारा।
अनीश गारंगेक "पोस्टर",
राजेन्द्र वडेलक 'जीता' "सम्भोग",
उमेश सोलंकीक "लोक, जमि जाए", "खरड़ाक डाँट सभ"
गुजराती दलित काव्य समीक्षा: चारि कविता
अनीश गारंगे, राजेन्द्र वडेल 'जीता', उमेश सोलंकी
प्रारम्भिक टिप्पणी
एहि संग्रहमे प्रस्तुत गुजराती दलित कविता — तेलुगु परम्पराक पश्चात् — एकटा भिन्न भाषिक-सांस्कृतिक भूमि पर दलित अनुभवक काव्यात्मक अभिव्यक्ति थिक। तेलुगु कवितासभमे जे स्त्री-दलित स्वर प्रमुख छल, एतय पुरुष-दलित स्वर अधिक केन्द्रीय अछि — मुदा वडेलक सम्भोग मे स्त्री-दलित यथार्थ पुनः प्रकट होइत अछि।
तीनू कवि — गारंगे, वडेल, सोलंकी — तीन भिन्न काव्य-रणनीति अपनाबैत छथि: गारंगे नगर-यथार्थवाद (शहरी जीवनक ठोस-इन्द्रिय-ग्राह्य यथार्थ), वडेल यौन-राजनीतिक साक्ष्य, आ सोलंकी जमाव-रूपक आ गान्धी-विरोधी व्यंग्य। एहि तीनू मिलिकऽ गुजराती दलित काव्यक एकटा सम्पूर्ण नगर-राजनीतिक चित्र निर्मित करैत अछि।
१. अनीश गारंगे: पोस्टर
काव्य-रूप आ संरचना
पोस्टर एकटा वृत्ताकार संरचना (जाहिमे पहिल पंक्ति अन्तिम पंक्ति बनि जाइत अछि) मे रचल गेल अछि। "ई खुरदुरा चेहरा बला पोस्टर सब हमर ऐना जकाँ अछि" — कविता एहिसँ आरम्भ होइत अछि आ एहिपर समाप्त। ई वृत्तीय संरचना दलित अस्तित्वक अन्तहीन चक्रकेँ प्रतीकात्मक रूपसँ व्यक्त करैत अछि — जाहिमे कोनो निकास नहि।
मध्यमे जे पंक्तिसभ अछि — सिनेमा बैनर, विज्ञापन, शोक-सभा, शौचालय, रैली, रेलवे स्टेशन, रिक्शा, लापता-व्यक्ति-पोस्टर — ई सब नगर-जीवनक टुकड़े थिक। संरचनात्मक दृष्टिसँ ई कोलाज-काव्य (असम्बद्ध प्रतीत होइत टुकड़ासभकेँ एकत्र कऽ अर्थ-निर्माण करबाक काव्य-विधि) थिक।
पोस्टर-रूपकक बहुस्तरीयता
"पोस्टर" शब्द एहि कवितामे अत्यन्त बहु-अर्थी थिक:
पहिल अर्थ — पोस्टर अस्थायी होइत अछि। ओ एकटा दिन चिपकैत अछि, भोरमे छिलि जाइत अछि। दलित-अस्तित्व सेहो समाजक दृष्टिमे अस्थायी, प्रतिस्थापनयोग्य (जकरा बदलल जा सकय) थिक।
दोसर अर्थ — पोस्टर सार्वजनिक होइत अछि — सब देखैत अछि, कोनो ध्यान नहि दैत। दलित-व्यक्ति सेहो दृश्यमान मुदा अदृश्य थिक।
तेसर अर्थ — पोस्टर बहुरूपी होइत अछि — सिनेमा, विज्ञापन, राजनीतिक रैली, लापता-व्यक्ति — सब किसमक पोस्टर अछि। दलित-व्यक्ति सेहो समाजक विभिन्न संस्थाद्वारा विभिन्न उद्देश्यसँ प्रयुक्त होइत अछि।
"ऐना" (दर्पण) — कविताक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रूपक। पोस्टर जे दलितक "ऐना" थिक — ई विडम्बना थिक। ऐना प्रामाणिक प्रतिबिम्ब दैत अछि। मुदा पोस्टर विकृत, अपमानित, प्रयोजनानुसार निर्मित छवि थिक। अर्थात्: समाज दलितकेँ जे "ऐना" देखाबैत अछि — ओ मिथ्या दर्पण थिक।
जाक् लाकाँक दर्पण-अवस्था (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे बच्चा दर्पणमे अपन प्रतिबिम्ब देखिकऽ अपन "मैं" निर्मित करैत अछि) एतय नकारात्मक रूपसँ लागू होइत अछि। दलित-व्यक्ति जे "ऐना" (पोस्टर) देखैत अछि, ओहिमे विकृत आत्म-छवि थिक — समाजद्वारा थोपल।
नगर-यथार्थवाद
"अहाँ 'पे-एण्ड-यूज' शौचालय सभमे हमरा पर पेशाब करैत छी" — ई पंक्ति अत्यन्त प्रत्यक्ष अछि। "पे-एण्ड-यूज शौचालय" — नगर-जीवनक एकटा ठोस स्थान — एतय सामाजिक अपमानक रूपक थिक। पैसा देकऽ शौचालयमे प्रवेशक अधिकार थिक — मुदा दलितपर पेशाब निःशुल्क होइत अछि।
"हम बेकार कागजक गोला छी" — ई आत्म-वस्तुकरण (स्वयंकेँ वस्तु मानब) थिक — मुदा ई आत्म-वस्तुकरण आत्म-घृणासँ नहि, सामाजिक यथार्थक स्वीकृतिसँ आबैत अछि। कविता कहैत अछि: समाज हमरा एहि रूपमे देखैत अछि।
"खमण-खाड़ी" — ई गुजराती खाद्य-पदार्थ एतय सांस्कृतिक-भौगोलिक पहचान थिक। "खमण-खाड़ी सँ सनल चेहरा" — गुजराती संस्कृतिक मध्यवर्गीय-उच्च-जातीय छवि (खमण-ढोकला जे गुजरातक प्रतीक-खाद्य बनि गेल) दलित-चेहरापर लागल अछि — अपमानजनक, व्यंग्यात्मक रूपसँ।
वाल्टर बेंजामिनक नगर-अनुभव (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे आधुनिक नगर मानवकेँ वस्तुसमूहमे विलीन कऽ दैत अछि) एतय दलित-नगर-अनुभवमे अधिक जटिल भऽ जाइत अछि: नगर मात्र अनामकरण नहि करैत, जातीय कलंकित-निर्माण सेहो करैत अछि।
२. राजेन्द्र वडेल 'जीता': सम्भोग
काव्य-रूप: यौन-राजनीतिक साक्ष्य
सम्भोग तेलुगु-दलित काव्य-शृंखलामे शशिनिर्मलाक यौन-राजनीतिक स्वरक गुजराती प्रतिरूप थिक — मुदा एकटा महत्त्वपूर्ण भेदसँ: एतय वक्ता पुरुष अछि, आ कविता उच्च-जातीय पुरुष आ दलित स्त्रीक शारीरिक सम्बन्धक विश्लेषण करैत अछि।
ई एकटा अत्यन्त साहसिक काव्य-निर्णय थिक। सामान्यतः यौन-सम्बन्ध निजी विषय मानल जाइत अछि। वडेल एकरा राजनीतिक विश्लेषणक विषय बनाबैत छथि।
"दुर्गन्धित" शरीर
"अहाँक शरीर दलित स्त्री सभकेँ कुचलैत अहाँक पूर्वज सँ दुर्गन्धित छल" — ई पंक्ति अत्यन्त जटिल अछि।
"दुर्गन्धित" — सामान्यतः दलित-जातिकेँ "अशुद्ध" आ "दुर्गन्धित" कहल जाइत अछि। वडेल एहि प्रदूषण-कलंककेँ उलटि दैत छथि: उच्च-जातीय शरीर दलित-स्त्री-बलात्कारक इतिहाससँ दुर्गन्धित अछि।
"पूर्वज सँ" — ई शब्द महत्त्वपूर्ण थिक। ई कोनो व्यक्तिगत पाप नहि — ई पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलैत आएल ऐतिहासिक शोषण थिक। उच्च-जातीय पुरुषक शरीरमे ओहि पूर्वजसभक कर्म भौतिक रूपसँ उपस्थित अछि।
वडेलक एहि पंक्तिमे एपिजेनेटिक्स (जाहिमे विज्ञान देखाबैत अछि जे पूर्वजक अनुभव वंशजक जीवशास्त्रमे प्रभाव छोड़ैत अछि) क काव्यात्मक प्रतिनिधित्व अछि। आ एहिसँ फानोंक उपनिवेशित देह (जाहिमे ओ देखाबैत छथि जे उपनिवेशकक शरीरमे हिंसाक इतिहास अंकित अछि) क अवधारणा सेहो।
अन्तिम उद्घोष: "भारत" आ "भारती"
"हमर सम्भोग सँ जँ बेटा जन्मल / तऽ हुनकर नाम 'भारत' राखू / जँ बेटी तऽ 'भारती'। "
ई कवितामे सर्वाधिक विस्फोटक पंक्ति थिक। एहिमे कई अर्थ-स्तर एकसाथ अछि:
पहिल स्तर — "भारत" आ "भारती" राष्ट्रीय पहचानक नाम थिक — राष्ट्र-प्रतीक। दलित-स्त्री आ उच्च-जातीय पुरुषक सन्तानकेँ "भारत" कहब — ई राष्ट्र-निर्माणक वास्तविक इतिहास उजागर करैत अछि। भारत-राष्ट्र एहि जाति-यौन-हिंसाक उत्पाद थिक।
दोसर स्तर — "भारत माता" क राष्ट्रवादी कल्पनामे माँ उच्च-जातीय, पवित्र होइत छथि। वडेल देखाबैत छथि जे वास्तविक "भारत माता" दलित-स्त्री छथि — जिनकर शरीरपर राष्ट्रक इतिहास लिखाएल गेल।
तेसर स्तर — "जँ बेटा" / "जँ बेटी" — ई काल्पनिक वाक्य-रचना एकटा भविष्यक माँग थिक: एहि सत्यकेँ स्वीकार करू।
बी. आर. आम्बेडकर जाति-विनाश मे तर्क करैत छलाह जे जातिक स्थायित्व अन्तर्विवाह (जाहिमे उच्च-जाति अपन जातिभित्तर विवाह करैत अछि) पर निर्भर थिक। वडेलक कविता एहि तर्ककेँ उलटिकऽ देखाबैत अछि: जाति-विनाश केवल विवाहसँ नहि, जाति-हिंसाक इतिहासकेँ स्वीकार करबासँ आरम्भ होइत अछि।
३. उमेश सोलंकी: लोक, जमि जाय
काव्य-रूप: जमाव-रूपकक विस्तार
लोक, जमि जाय एकटा एकल विस्तारित रूपक (एकटा मूल बिम्बकेँ कविताभरि विस्तारित करबाक विधि) पर आधारित अछि। "जमि जाय" (जमि जाएब होएब, जमि जाएब) — ई एकटा सरल भौतिक क्रिया — कवितामे एकटा जटिल राजनीतिक रूपक बनि जाइत अछि।
संरचना पुनरारम्भात्मक (बारम्बार एकहि शब्दसँ आरम्भ) अछि — "जमि जाय" क आवृत्ति कवितामे एकटा मन्त्र-गुण लबैत अछि। मुदा ई मन्त्र भक्तिक नहि — क्रान्तिक थिक।
"जमाव"क राजनीतिक दर्शन
सोलंकी जे "जमाव" चाहैत छथि — ओ स्थिरताक विरोधमे नहि, बल्कि स्थिरताक माध्यमसँ परिवर्तनक माँग थिक।
"केतलीमे चाय जमि जाय" — चाय गतिशीलताक, उष्णताक प्रतीक थिक — जे रोज बनैत-पिआइत अछि। एकर जमब = दैनिक सामान्यताक बन्द होएब।
"टकाक स्पर्श मात्र सँ कोमल आङ्गुरि सब मरल समुद्री शैलमे जमि जाय" — "टका" (धन) आ "कोमल आङ्गुरि" — पूँजीवादी श्रम-शोषणक रूपक। जे आङ्गुरि धन स्पर्श करैत अछि, ओ मृत शिलामे परिणत होइत अछि — पूँजी मानवकेँ पाथर बनाबैत अछि।
"कुहेसाक ई मोटा चादर छँटबा लेल" — "कुहेसा" (कुहासा, कोहरा) — अज्ञान, भ्रम, झूठ क रूपक थिक। जाहि सामाजिक भ्रमले दलित-उत्पीड़न सामान्य लागैत अछि — ओ "कुहेसा" केवल जमावसँ — अर्थात् आमूल रोकसँ — हटत।
मार्क्सक जमा हुआ श्रम (संचित श्रम — जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे पूँजी वास्तवमे श्रमिकक जमाएल श्रम थिक जे मालिकक हाथमे चलि जाइत अछि) क अवधारणासँ सोलंकीक "जमाव" एकटा काव्यिक सम्वाद करैत अछि: यदि श्रम "जमि जाय" — अर्थात् हड़ताल — तऽ ओ व्यवस्था चरमरा जाइत अछि जे एहि श्रमपर टिकल अछि।
४. उमेश सोलंकी: खरड़ाक डाँट सब
काव्य-रूप: व्यंग्यात्मक सम्बोधन
खरड़ाक डाँट सब एकटा सोझ सम्बोधन-कविता थिक — गान्धीजीकेँ सोझे बाजैत। एहि काव्य-विधिमे गौरीक मेहदी लागल हाथ (कृष्णसँ सम्बोधन) आ विजयश्रीक अलिसम्माक स्राप (उत्पीड़ककेँ सम्बोधन) क साम्य अछि।
मुदा ई कविताक सम्बोधन अनन्य थिक: गान्धी — जे दलितक "महात्मा" (हितैषी) होएबाक दावा करैत छलाह — हुनकासँ रोष आ निराशा क सोझ अभिव्यक्ति।
गान्धी-आम्बेडकर द्वन्द्वक काव्यिक प्रतिनिधित्व
भारतीय इतिहासमे गान्धी-आम्बेडकर विवाद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक-दार्शनिक विवाद छल। गान्धी "हरिजन" कहि दलितकेँ हिन्दू व्यवस्थाक भीतर सुधारक माध्यमसँ उठाएब चाहैत छलाह। आम्बेडकर एहि व्यवस्थाकेँ जड़सँ अस्वीकार करैत छलाह।
सोलंकी एहि ऐतिहासिक विवादकेँ काव्यमे लबैत छथि:
"अहाँक खादी बहुत जल्दी घिसि जाइत छैक" — खादी गान्धीक प्रतीक थिक — स्वदेशी, सादगी, राष्ट्रीयता। "घिसि जाएब" = प्रतीकक खोखलापन उजागर होएब। गान्धीक आदर्श दलितक जीवनमे टिकाऊ नहि सिद्ध भेल।
"पर्खि पर फ्रेममे बन्द जीवन सँ अहाँ निश्चय घृणा करैत हएब" — सरकारी दफ्तरमे, स्कूलमे, घरमे — गान्धीक तस्वीर फ्रेममे बन्द अछि। ई "फ्रेम" प्रतिष्ठापनक प्रतीक थिक — गान्धीकेँ संग्रहालय-वस्तु बनाएब, जाहिसँ हुनकर वास्तविक विचारक समाजपर प्रभाव नहि पड़ए।
"अहाँ ककरा लेल मुस्कुरा रहल छी? " — ई प्रश्न अत्यन्त तीखा थिक। गान्धीक तस्वीरमे मुस्कान अछि। मुदा जाहि दलित-समुदायक लेल ओ काज करैत होएबाक दावा करैत छलाह — हुनकर जीवनमे मुस्कानक कोनो कारण नहि। ओ मुस्कान केकर लेल?
"खरड़ाक डाँट"
शीर्षक — "खरड़ाक डाँट सब" — अत्यन्त बहु-अर्थी थिक। "खरड़ा" (झाड़ू, झाड़ू) गान्धीक स्वच्छता-आन्दोलनक प्रतीक थिक। मुदा "खरड़ाक डाँट" (झाड़ूक डण्ठल) — ओ जे बाँचि जाइत अछि जखन झाड़ू घिसि जाइत अछि।
कविता एहि अवशेषसभकेँ — जे स्वच्छता-आन्दोलनक पश्चात् बाँचल लोगसभ — देखाबैत अछि: "शहरक गुप्त गली सभमे झाड़ूक डण्ठलक कूड़ा — / ओ सब बड़बड़बैत अछि / करहैत अछि। "
ई "बड़बड़ाएब" आ "करहाएब" — जे दलित-सफाईकर्मीसभ गान्धीक "स्वच्छता" आन्दोलनसँ बाहर छोड़ल गेल — हुनकर यन्त्रणाक शब्द थिक।
जुलाई २००९: ऐतिहासिक प्रसंग
कविताक अन्तमे प्रसंग-टिप्पणी अछि: अहमदाबादमे जुलाई २००९ मे भेल दारूक त्रासदी। एहि घटनामे नकली दारू पिबिकऽ मुख्यतः दलित-मजदूर मृत्युकेँ प्राप्त भेलाह।
गान्धी दारू-विरोधी छलाह। गुजरात मद्य-निषेध-राज्य (मद्यनिषेध-राज्य) थिक — गान्धीक आदर्शक भूमि। मुदा ओहि "गान्धीवादी" राज्यमे दलित-मजदूर नकली दारूसँ मरैत अछि।
"गान्धी / हम अहाँक मुँड़ पर दारू डालि दैत छी" — ई पंक्ति अत्यन्त उग्र थिक। गान्धीक मुँड़पर दारू — जे हुनकर सबसँ बड़ वर्जना छल — ढारब: ई पूर्ण अस्वीकृति थिक।
"धिक्कार / अहाँक खोपड़ी पर दारूक थैला जाय" — ई श्राप थिक — विजयश्रीक अलिसम्माक स्राप जकाँ। मुदा एतय श्राप अधिक व्यंग्यात्मक थिक: दारू — जे गान्धीक विरुद्ध छल — गान्धीपर।
बी. आर. आम्बेडकरक गान्धी-आलोचना — जे गान्धी दलितक नामपर राजनीति करैत छलाह मुदा जाति-व्यवस्थाकेँ मूलतः नहि बदलैत छलाह — सोलंकीक कवितामे काव्यिक रूप धारण करैत अछि।
५. तुलनात्मक विश्लेषण: तेलुगु बनाम गुजराती
एहि गुजराती कवितासभकेँ तेलुगु परम्परासँ तुलना करलापर कई महत्त्वपूर्ण भेद आ साम्य उभरैत अछि:
नगर-केन्द्रितता: तेलुगु दलित कविता प्रायः ग्रामीण-कृषि यथार्थसँ जुड़ल अछि — खेत, धान, जमीन्दार। गुजराती कविता नगर-केन्द्रित अछि — रेलवे स्टेशन, रिक्शा, शौचालय, विज्ञापन। ई दलित-अनुभवक भौगोलिक विविधता दर्शाबैत अछि।
पुरुष-स्वर: तेलुगु दलित काव्य-शृंखलामे स्त्री-स्वर प्रभावी छल। गुजराती संग्रहमे तीनू कवि पुरुष छथि। एहिसँ क्षेत्रीय दलित-आन्दोलनक भिन्न-भिन्न रूप प्रकट होइत अछि।
गान्धी-प्रसंग: तेलुगु दलित कवितामे गान्धीक उल्लेख प्रायः नहि। गुजराती दलित कवितामे — जे गान्धीक गृह-प्रदेशमे लिखल गेल — गान्धी-आम्बेडकर विवाद केन्द्रीय थिक। ई स्थानीय इतिहासक काव्यमे प्रवेश थिक।
काव्य-भाषा: तेलुगु कवितामे देशज प्रतीक (अमलतास, तेतरि, मैसम्मा देवी) प्रचुर। गुजराती कवितामे नागरिक-आधुनिक प्रतीक (पोस्टर, विज्ञापन, पे-एण्ड-यूज शौचालय) अधिक।
६. अनुवाद-शृंखलाक विशेष टिप्पणी
एहि कविता गुजराती → अंग्रेजी → मैथिली — तीन स्तरक यात्रा कएल। तेलुगु कवितासभक अनुवादसँ एकटा महत्त्वपूर्ण भेद थिक: तेलुगु → अंग्रेजी अनुवाद पुरुषोत्तम के. द्वारा कएल गेल, गुजराती → अंग्रेजी हेमांग देसाई द्वारा।
हेमांग देसाई स्वयं गुजराती दलित साहित्यक विद्वान छथि — ई अन्दरूनी अनुवादक (जे उहो संस्कृतिक सदस्य छथि जाहिसँ अनुवाद होइत अछि) काज थिक। एहिसँ सांस्कृतिक-विशिष्ट सन्दर्भ (जेना "खमण-खाड़ी", "खरड़ा") बेसी प्रामाणिकतासँ अनूदित भेल।
निष्कर्ष
गुजराती दलित काव्यक ई चारि कविता मिलिकऽ नगर-दलित अनुभवक एकटा सम्पूर्ण चित्र प्रस्तुत करैत अछि:
गारंगेक पोस्टर — दलित-अस्तित्वक अदृश्यता आ विकृत-दृश्यताक काव्य।
वडेलक सम्भोग — जाति-यौन-हिंसाक इतिहासकेँ राष्ट्र-निर्माणसँ जोड़बाक काव्य।
सोलंकीक लोक, जमि जाय — आमूल रोकक, हड़तालक, व्यवस्था-ठहरावक काव्य।
सोलंकीक खरड़ाक डाँट सब — गान्धीवाद आ दलित-यथार्थक विरोधाभासक काव्य।
चारू मिलिकऽ एकटा काव्यिक घोषणापत्र बनाबैत अछि: आधुनिक भारतीय राज्य — ओकर प्रतीक (गान्धी, राष्ट्र-ध्वज, संविधान) आ ओकर संस्था (पुलिस, न्यायालय, मीडिया) — दलित-अस्तित्वक न्याय देएबमे विफल रहल अछि।
आ जाधरि ई विफलता जारी रहत, ताधरि दलित काव्य — तेलुगुमे, गुजरातीमे, मैथिलीमे — प्रश्न करैत, गवाही दैत, स्राप दैत रहत।
बासुदेव सुनानीक उड़िया दलित कविता; उड़िया सँ अंग्रेजी अनुवाद: सैलेन राउत्रे; अंग्रेजी सँ मैथिली अनुवाद: गजेन्द्र ठाकुर
उड़िया दलित काव्य समीक्षा: बासुदेव सुनानीक दू टा कविता
अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि आ पता आ सदानन्द
प्रारम्भिक टिप्पणी
बासुदेव सुनानी उड़िया दलित काव्यक एकटा विशिष्ट आ जटिल स्वर छथि। तेलुगु आ गुजराती दलित कवितासभसँ भिन्न — जाहिमे प्रायः प्रत्यक्ष राजनीतिक उद्घोष वा व्यक्तिगत पीड़ाक साक्ष्य केन्द्रमे छल — सुनानीक कविता रहस्यवादी आ दार्शनिक आयामक माध्यमसँ दलित-अनुभवकेँ व्यक्त करैत अछि। हुनकर काव्य-भाषा रूपकात्मक घनत्वसँ परिपूर्ण अछि — जाहिमे बूँद, बीउ, माछ, बगुला, समुद्र — ई सब प्राकृतिक-ब्रह्माण्डीय बिम्ब दलित-अस्मिताक अदृश्यता आ संघर्षक काव्यिक अभिव्यक्ति बनि जाइत अछि।
एहि संग्रहमे तीन सम्बद्ध काव्य-खण्ड अछि — अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि, पता, आ सदानन्द — जे मिलिकऽ एकटा त्रि-आयामी काव्यिक तर्क प्रस्तुत करैत अछि: अस्तित्वक चेतावनी, अस्तित्वक अदृश्यता, आ अस्तित्वक भोलापन आ विडम्बना।
१. काव्य-रूप आ संरचना
अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि
एहि कवितामे दू टा प्रतिध्वनि-पंक्ति (आवर्ती पंक्ति) बारम्बार आबैत अछि — "तैयो हमरा लगैत अछि नै जानि किएक / जे मात्र कोना पर / किछु लटकि-झूलि कऽ रहल अछि" — कविताक आरम्भमे आ मध्यमे। ई पुनरावृत्ति एकटा अनिश्चितताक स्थायी भाव सृजित करैत अछि — जेना कोनो बात अधूरी हो, जेना कोनो विस्फोट होएबाक बाकी हो।
संरचना विरोधाभासी युग्मसभपर आधारित अछि: "घण्टीक आवाज" बनाम "ढोलकक विस्फोट", "लकड़ी-पातक सङ्ग्रह" बनाम "घरक विध्वंस", "पाञ्चजन्य" बनाम "सब सँ छोट प्रतिक्रिया"। ई युग्म दलित-अस्मिताक द्विध्रुवीय तनाव — अदृश्यता आ विस्फोट — दर्शाबैत अछि।
पता
एहि कवितामे संरचना विखण्डित आत्म-चित्रणक अछि। "हम अखनहुँ छी..." — ई पंक्ति तीन बेर आबैत अछि, तीन भिन्न रूपमे:
पहिल — वृद्धा स्त्री (जे विवाह-बरातमे दीप ढोइत अछि)। दोसर — रोगी बूढ़ (जे मन्दिर-आगाँ भिक्षा माँगैत अछि)। तेसर — सुतल बच्चा (जे ठण्डमे चबूतरापर पड़ल अछि)।
ई तीनू दलित-अस्तित्वक तीन पीढ़ी थिक — वृद्धा, प्रौढ़, शिशु — सब एकहि अदृश्यतामे जीबैत।
"तैयो अहाँकेँ पता चाही! / अजब गप! " — ई व्यंग्यात्मक आश्चर्य (कवि स्वयं अचम्भित छथि जे हुनकर पताक माँग कएल जाइत अछि, जखन कि हुनकर अस्तित्व त सब ठाम अछि) सम्पूर्ण कविताक भावनात्मक केन्द्र थिक।
सदानन्द
ई कविताक संरचना नाटकीय एकालाप थिक — एकटा वास्तविक व्यक्ति, सदानन्द, जे किसान-मेलामे पुरस्कार लेबा आएल छल, समुद्र देखैत अछि। ई सरल-यथार्थवादी संरचना पूर्ववर्ती दूनू कवितासँ भिन्न अछि।
मुदा एहि सरलताक भीतर एकटा गहिर राजनीतिक प्रश्न छुपल अछि: "हमर इलाकामे अकाल किएक नै पड़त? / जखन सब पानि समुद्र पर बन्धक राखल अछि। "
२. "पाञ्चजन्य" आ "बज्र": पौराणिक रूपकक दलित-प्रयोग
"हम जानैत छी जे एतय कोनो आवाज / 'पाञ्चजन्य' सँ कम नै अछि। / सब सँ छोट प्रतिक्रिया / बज्रक समान गर्जन करैत अछि। "
"पाञ्चजन्य" — कृष्णक शंख — जे महाभारत-युद्धक आरम्भक संकेत थिक। एहि रूपकमे दलित-आवाज कृष्णक शंखसँ तुलित अछि।
भीमन्नाक पौराणिक-विरोधी पाठ (जाहिमे ओ महाभारतक पात्रसभकेँ दलित-दृष्टिसँ पुनर्पाठ करैत छलाह) क परम्परामे सुनानी एतय भिन्न काज करैत छथि: ओ पौराणिक प्रतीककेँ विरोध नहि करैत, उधार लैत छथि — आ कहैत छथि जे दलित-आवाज ओहि पवित्र ध्वनिसँ कम नहि।
ई एकटा पुनर्दावाक रणनीति थिक। भीमन्ना कहैत छलाह: पुराणक इतिहास गलत लिखल गेल। सुनानी कहैत छथि: हमर आवाज ओहि पुराणक सर्वोच्च प्रतीकसँ समतुल्य अछि।
३. बूँद, बीउ, आ गर्भवती स्त्री: आशाक त्रि-रूपक
अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि क अन्तिम खण्डमे तीन आशा-बिम्ब एकसाथ आबैत अछि:
"एतय आकाशमे एहने एकटा बूँद अछि / जे अस्पष्ट होइतो चमकैत छैक / आ इन्द्रधनुषक एकटा मीठ सपना देखि कऽ बेर-बेर / प्रण लेने अछि विशाल आकाशकेँ रङ्ग देबाक। "
"एतय एकटा बीउ प्रतिज्ञा लेने अछि अङ्कुरित होबाक / सब किछु हरियर करबाक इच्छा सङ्गे। "
"आ एतय दुःखमे / एकटा परित्यक्ता गर्भवती स्त्री / शान्त क्षणक खोजीमे अछि — / एहन बच्चा जन्म देबा लेल / जे सात गोटे योद्धाक सामना कऽ कऽ ओकरा रोकि सकय। "
ई तीनू बिम्ब क्रमशः बढ़ैत शक्तिक (क्रमवर्धमान शक्ति) शृंखला थिक: बूँद → बीउ → योद्धाक माँ।
बूँद — सर्वाधिक क्षुद्र, अस्पष्ट। मुदा ओ इन्द्रधनुषक सपना राखैत अछि — क्षुद्रतामे विशालताक आकाङ्क्षा।
बीउ — बूँदसँ बड़। ओ अंकुरित होएबाक प्रतिज्ञा करैत अछि — निष्क्रिय इच्छा नहि, सक्रिय संकल्प।
गर्भवती स्त्री — सर्वाधिक शक्तिशाली। ओ "परित्यक्ता" थिक — समाजद्वारा छोड़ल। मुदा ओ "सात योद्धाक सामना करनिहार" बच्चा जन्म देएबाक प्रतीक्षामे अछि।
एहि परित्यक्ता गर्भवती स्त्री क बिम्बमे तेलुगु कवयित्रीसभक स्वर प्रतिध्वनित होइत अछि — सुभद्राक "अव्वा", स्वरूपरानीक "माटि-भेल हाथ"। मुदा सुनानी एहि स्त्रीकेँ भविष्यक क्रान्तिक जननी बनाबैत छथि।
४. पता कविता: अदृश्यता आ सर्वव्यापकताक विरोधाभास
पता कविताक केन्द्रीय विरोधाभास थिक: दलित-अस्तित्व सब ठाम उपस्थित अछि — मुदा अदृश्य अछि।
"शुरू सँ अन्त धरि / हमर उपस्थिति / चिउँटीक टिमटिमाइत लाइन सन फैलल अछि / आ झाँझक ठनकार सन गूँजैत छैक। "
"चिउँटीक लाइन" — सूक्ष्म, अनन्त, श्रमशील — मुदा किओ ध्यान नहि दैत। "झाँझक ठनकार" — ध्वनि उपस्थित अछि, किओ सुनैत नहि।
"हमर पताक लेल / अहाँकेँ आब पार्सल पठेबाक जरूरत नै / जेकर ठिकाना 'केयर अफ' सूर्य वा चन्द्रमा हो। "
ई पंक्ति अत्यन्त व्यंग्यात्मक अछि। समाज दलितकेँ खोजय चाहैत अछि — मुदा गलत ठामपर। सूर्य-चन्द्रमा — अर्थात् अमूर्त, दार्शनिक, आध्यात्मिक स्थान — मे खोजैत अछि। जखन कि दलित "ओही अन्हार गलीमे" अछि — ठोस, भौतिक, दैनिक स्थानमे।
एहिमे गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाकक "निम्नवर्गक अदृश्यता" (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे बुद्धिजीवी-वर्ग दलितकेँ खोजय चाहैत अछि मुदा ओहि स्थानमे जतय ओ नहि अछि) सिद्धांत काव्यिक रूप धारण करैत अछि।
"जँ अहाँ सकैत छी / तऽ कृपया हमरा पठाउ — / धूप भरल सुन्दर सपना सब। "
ई उलटा माँग थिक। दलित ठिकाना नहि दैत — सपना माँगैत अछि। ई व्यंग्य थिक: जे समाज दलितक पताक माँग करैत अछि — ओ स्वयं दलितकेँ सपना नहि दैत।
५. माछ-रूपक: विलुप्तिक कगार
"हम तैरि रहल छी एकटा छोट सपना-सजल माछ सन / एकटा विलुप्त होइत पोखरिक मुट्ठी भरि पानिमे। "
ई रूपक पर्यावरणीय आ सामाजिक विनाशकेँ एकहि बिम्बमे जोड़ैत अछि। पोखरि विलुप्त भऽ रहल अछि — ई भारतक कृषि-जल-संकटक सन्दर्भ थिक। माछ — जे दलित-जातिसभक पारम्परिक जीविका थिक — "मुट्ठी भरि पानिमे" जीबैत अछि।
"सपना-सजल माछ" — ई बिम्ब अत्यन्त सुन्दर आ दुखद दूनू थिक। माछ सपना राखैत अछि — मुदा पोखरि सुकाइत जा रहल अछि।
उमेश सोलंकीक लोक, जमि जाय मे "जमाव" परिवर्तनक माँग छल। सुनानीक "विलुप्त होइत पोखरि" — ई परिवर्तनक अनुपस्थितिक परिणाम दर्शाबैत अछि।
"की हम समुद्रमे कूदि पड़ी ओकरा अमृत देबा लेल / वा गहीर खनि कऽ धक्का दी बासुकी नागक कोमल मुँड़केँ / जे संसारकेँ सन्तुलित रखने अछि? "
ई पौराणिक दुविधा थिक। बासुकी नाग — जे समुद्र-मन्थनमे रस्सी बनल छल — संसारकेँ सन्तुलित रखने अछि। दलित-व्यक्ति पुछैत अछि: की हम व्यवस्थाकेँ अमृत दी (अर्थात् योगदान करी) वा व्यवस्थाकेँ हिला दी (बासुकीकेँ धक्का दी)?
ई क्रान्ति बनाम सहयोगक दार्शनिक प्रश्न थिक — जे समस्त दलित राजनीतिक-दार्शनिक परम्पराक मूल प्रश्न थिक।
६. सदानन्द: लघुकथा-काव्य आ किसान-दृष्टि
सदानन्द कविता एहि शृंखलाक सर्वथा भिन्न स्वर थिक। पूर्ववर्ती दूनू कवितामे काव्यिक "हम" — एकटा अमूर्त, सामूहिक दलित-चेतना — वक्ता छल। एतय एकटा ठोस व्यक्ति — नाम, गाम, कारण सहित — उपस्थित अछि।
"हमर नाम सदानन्द अछि। / हमर गामक नाम नागाँव अछि। / हम किसान मेला लेल भुवनेश्वर आयल छी / सब सँ पैघ भिण्डी लेल राज्यपालक पुरस्कार लेबा लेल। "
ई आत्म-परिचय अत्यन्त सरल आ अत्यन्त गहिर थिक। साहित्यमे दलित-पात्र प्रायः अनामक, सामूहिक होइत अछि। सदानन्दकेँ नाम, गाम, आ उपलब्धि दैब — ई व्यक्तित्वक राजनीति थिक।
"सब सँ पैघ भिण्डी" — ई विवरण हास्यास्पद प्रतीत होइत अछि। मुदा एहिमे गहिर व्यंग्य अछि: किसान जे वर्षभरि खेतमे काज करैत अछि, ओकर सर्वोच्च सम्मान "सब सँ पैघ भिण्डी" थिक। ई कृषि-श्रमक अवमूल्यन आ किसानक सरलताक एकहि साथ चित्रण थिक।
समुद्र-दृश्यक विडम्बना
"समुद्र देखि कऽ अहाँ कहलहुँ / जे हम नै बुझलहुँ / बल्कि हम गलत बुझलहुँ — / लहर सभकेँ"
सदानन्द पहिल बेर समुद्र देखैत अछि। शहरी बुद्धिजीवी (जे "अहाँ" छथि) कहैत छथि — तूँ नहि बुझलही। सदानन्द स्वीकार करैत अछि: "शायद / हम गलत बुझलहुँ। "
मुदा कविताक अन्तमे ई "गलत बुझनाइ" एकटा सत्य-उद्घाटन बनि जाइत अछि:
"हमर इलाकामे अकाल किएक नै पड़त? / जखन सब पानि समुद्र पर बन्धक राखल अछि। "
सदानन्द समुद्र "गलत" बुझलनि — मुदा हुनकर "गलत बुझनाइ"मे एकटा राजनीतिक सत्य अछि जे बुद्धिजीवी देखैत नहि। समुद्र — जे भव्य, विशाल, आ प्रशंसित अछि — वास्तवमे किसानक पानिकेँ बन्धकमे राखनिहार थिक।
ई ज्ञान-मीमांसीय उलटपालट (जाहिमे "अशिक्षित" किसानक दृष्टि "शिक्षित" बुद्धिजीवीक दृष्टिसँ अधिक तीक्ष्ण प्रमाणित होइत अछि) अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थिक। गणेश देवीक "भाषाक पश्चात् भूलनाइ" (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे मौखिक-लोक-परम्पराक ज्ञान पुस्तकीय ज्ञानसँ अनेक बेर श्रेष्ठ होइत अछि) एतय काव्यिक प्रमाण पाबैत अछि।
७. "बगुला सँ कटि जाएब": खेलाड़ीपन आ विघ्न
"मुदा खेलाड़ीपनमे मग्न रहैत / सब सँ अशुभ क्षण पर / हम बगुला सँ कटि जाइत छी। "
"बगुला" — एकटा शिकारी पक्षी — जे माछ खाइत अछि। माछ-रूपक (जाहिमे दलित-अस्तित्व माछ थिक) क सन्दर्भमे — "बगुला सँ कटि जाएब" = व्यवस्थाद्वारा विनष्ट होएब।
"खेलाड़ीपनमे मग्न" — ई विडम्बना थिक: ठीक जहिया दलित-व्यक्ति स्वयंकेँ मुक्त, आनन्दित अनुभव करैत अछि — तहिया आघात आबैत अछि।
एहि बिम्बमे दलित-जीवनक अनिश्चितताक काव्यिक सत्य अछि: सुख सदैव अस्थायी थिक, संकट सदैव अकस्मात् आबैत अछि।
८. तुलनात्मक विश्लेषण: उड़िया बनाम तेलुगु-गुजराती
रहस्यवाद बनाम यथार्थवाद: तेलुगु दलित कविता (विशेषकरि सुभद्रा, शशिनिर्मला) कड़वा यथार्थवादी थिक — ठोस, इन्द्रिय-ग्राह्य। सुनानीक कविता रहस्यवादी-प्राकृतिक बिम्बसँ भरल — बूँद, बीउ, माछ, इन्द्रधनुष। ई उड़िया काव्य-परम्परा क प्रभाव थिक जाहिमे प्रकृति-बिम्बक दीर्घ परम्परा अछि।
आशावाद बनाम निराशावाद: गुजराती कवितामे (विशेषकरि सोलंकीक लोक, जमि जाय) क्रान्तिकारी उद्बोधन अछि। सुनानीक कवितामे आशा आ संशय दूनू एकसाथ — बूँद इन्द्रधनुष देखैत अछि मुदा पोखरि सुकाइत अछि।
व्यक्तित्व बनाम सामूहिकता: सदानन्द मे एकटा ठोस व्यक्ति उपस्थित अछि — जे तेलुगु-गुजराती कवितामे प्रायः अनामक "हम" थिक। ई उड़िया कवितामे व्यक्तित्व-रक्षाक काव्यिक प्रतिबद्धता थिक।
बुद्धिजीवी-किसान विवाद: सदानन्द मे जे "अहाँ" (शहरी बुद्धिजीवी) आ "हम" (किसान) क संवाद अछि — ई तेलुगु-गुजराती कवितामे अनुपस्थित थिक। सुनानी एहि अन्तर्वर्गीय दलित-विवादकेँ काव्यमे लबैत छथि।
९. अनुवाद-शृंखलाक विशेष टिप्पणी
उड़िया → अंग्रेजी अनुवाद सैलेन राउत्रेद्वारा — एहिमे उड़िया काव्य-परम्पराक किछु विशिष्टता सुरक्षित रखल गेल अछि। "पाञ्चजन्य", "बासुकी नाग" — ई उड़िया-हिन्दू पौराणिक सन्दर्भ अंग्रेजीमे अनूदित नहि, मात्र लिप्यन्तरित कएल गेल — जे उचित निर्णय थिक।
मैथिलीमे गजेन्द्र ठाकुरक अनुवादमे "चिउँटीक टिमटिमाइत लाइन", "झाँझक ठनकार" — ई मैथिली-सुलभ बिम्ब मूल उड़ियाक संगीतात्मकता कें आंशिक रूपसँ सुरक्षित रखैत अछि।
निष्कर्ष
बासुदेव सुनानीक ई तीन काव्य-खण्ड — अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि, पता, सदानन्द — उड़िया दलित काव्यक एकटा विशिष्ट दार्शनिक-काव्यिक परम्परा प्रस्तुत करैत अछि।
पहिल खण्डमे — चेतावनी: किछु होएबाक बाकी अछि, विस्फोट आबि रहल अछि।
दोसर खण्डमे — साक्ष्य: हम सब ठाम छी मुदा अदृश्य छी, हमर पता "अन्हार गली" मे अछि।
तेसर खण्डमे — विडम्बना: सदानन्द "गलत बुझलनि" — मुदा हुनकर गलत बुझनाइमे सत्य अछि जे बुद्धिजीवी देखि नहि सकैत।
तीनू मिलिकऽ एकटा सम्पूर्ण दलित-अस्तित्व-दर्शन प्रस्तुत करैत अछि: हम उपस्थित छी (साक्ष्य), हम बदलाव आनब (चेतावनी), हम अपन दृष्टिसँ सत्य देखैत छी (विडम्बना-खण्डन)।
अन्तिम पंक्ति — "कारण हम अखनहुँ रहैत छी ओही अन्हार गलीमे / जतय हम सदिखन रहलहुँ। / सदिखन। " — एहि सम्पूर्ण संग्रहक, आ सम्भवतः समस्त भारतीय दलित काव्यक, सर्वाधिक शान्त आ सर्वाधिक शक्तिशाली अन्तिम शब्द थिक।
"सदिखन" — एहि एकटा शब्दमे इतिहास, वर्तमान, आ अदृश्यताक सम्पूर्ण भार अछि।
दलित लघुकथा समीक्षा: दू टा तेलुगु रचना
कोलकलुरी इनोचक कौआ आ विनोदिनीक कारी स्याही
प्रारम्भिक टिप्पणी
एहि समीक्षा-शृंखलामे अखन धरि हम काव्य क अध्ययन कएलहुँ। आब दू टा लघुकथा — कौआ आ कारी स्याही — प्रस्तुत अछि। ई दूनू रचना दलित साहित्यक गद्य-परम्परा क प्रतिनिधित्व करैत अछि, आ काव्यसँ भिन्न एकटा कथा-माध्यमक विशिष्ट शक्ति दर्शाबैत अछि।
दूनू कथाक बीच एकटा काव्यात्मक विरोधाभास अछि: कौआ बाहरी यथार्थ — समुदाय, अनुष्ठान, शक्ति-सम्बन्ध — क कथा थिक; कारी स्याही आन्तरिक यथार्थ — व्यक्तिगत सम्बन्ध, बाल-मनोविज्ञान, आ जातिक क्षण-भर-मे-प्रकट-होएबाक — क कथा थिक। दूनू मिलिकऽ दलित-अनुभवक बाह्य आ आन्तरिक दूनू आयाम उजागर करैत अछि।
१. कौआ: कथा-संरचना आ शिल्प
आख्यान-दृष्टि
कथा तृतीय-पुरुष सर्वज्ञ (सर्वज्ञ कथावाचक) दृष्टिकोणसँ लिखल गेल अछि — मुदा ई सर्वज्ञता चयनात्मक अछि। कथाकार अव्वाक मनक हालत जनैत छथि, बण्डोडुक इतिहास जनैत छथि, कौआसभक व्यवहार जनैत छथि — मुदा कहियो निर्णय नहि दैत। ई तटस्थ-आख्यान (तटस्थ आख्यान) एकटा विशिष्ट कथा-प्रभाव सृजित करैत अछि: पाठक स्वयं निर्णय लैत अछि।
कालक्रम आ सूचना
कथाक संरचना घटनाक बीचसँ आरम्भ थिक — कौआसभ पहिनेसँ काँव-काँव कऽ रहल अछि, बण्डोडु पहिनेसँ कार्यरत अछि। प्रसंग-सूचना (पृष्ठकथा) — बण्डोडुक जाति, हुनकर आचार-विधि, परिवारक दुर्दशा — क्रमशः, कथाक बीचमे, अनायास रूपसँ प्रकट होइत अछि।
ई विलम्बित-सूचना (विलम्बित उद्घाटन) तकनीक पाठककेँ पहिने कथाक सतहपर खेँचैत अछि — कौआक हलचल, बण्डोडुक उपस्थिति — आ तखन धीरे-धीरे सामाजिक जटिलता उजागर होइत अछि।
कथाक त्रि-स्तरीय संरचना
पहिल स्तर — घटना: कौआसभ काँव-काँव करैत अछि, झोपड़ी घेराएल अछि, बण्डोडु भोजन माँगैत अछि।
दोसर स्तर — सामाजिक व्याख्या: बण्डोडुक जाति, हुनकर विधि, कौआ-बण्डोडु सम्बन्ध, मादिग समुदायक प्रतिक्रिया।
तेसर स्तर — दार्शनिक प्रश्न: मुक्ति आ श्राप कि एकहि वस्तु? कौआ आ बण्डोडु शत्रु वा परिवार?
२. कौआ: बण्डोडु — एकटा अद्वितीय साहित्यिक चरित्र
बण्डोडु तेलुगु दलित साहित्यमे — सम्भवतः समस्त भारतीय साहित्यमे — एकटा अद्वितीय चरित्र थिक। ओ दलितमे सबसँ नीचाँ — दसम उप-जाति, जे मात्र मादिगसभसँ भिक्षा माँगिकऽ जीबैत अछि।
चरित्रक विरोधाभास
बण्डोडु शक्तिहीन थिक — भिखारी, जातिक सबसँ निम्न। मुदा ओ शक्तिशाली सेहो थिक — "हठी राजासँ शक्तिशाली", कौआसभकेँ नियन्त्रित करैत, पूरा समुदायकेँ बन्धक बनाबैत।
ई विरोधाभासी शक्ति कतयसँ आबैत अछि? कथा कहैत अछि: हुनकर एकमात्र विशेषज्ञता — कौआ मारब — ओहि समाजमे एकटा अद्वितीय सत्ता दैत अछि जतय कौआकेँ कोनो ध्वंश नहि करैत।
एहि चरित्र-निर्माणमे मिशेल फूको क सत्ता-सिद्धांत (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे सत्ता सदैव ऊपरसँ नहि आबैत, ओ विशेषज्ञताक स्थानीय बिन्दुसभमे निहित होइत अछि) साकार होइत अछि। बण्डोडुक सत्ता हुनकर जातिसँ नहि — हुनकर अद्वितीय ज्ञानसँ आबैत अछि।
बण्डोडु आ "घृणित" क राजनीति
"बण्डोडु जका घृणित भिखारी दुनियामे कतहियो नै देखल जा सकै छै। " — कथाकार एहि वाक्यमे समाजक दृष्टि प्रस्तुत करैत छथि। मुदा ओही समाज बण्डोडुसँ डरल सेहो अछि।
जूलिया क्रिस्तेवा क घृणित-सिद्धांत एतय अत्यन्त प्रासंगिक अछि: बण्डोडु समाजक "घृणित-बहिष्कृत" (घृणित-बहिष्कृत) छथि — मुदा ओही घृणाक कारण ओ अपरिहार्य सेहो छथि। जे "घृणित" मानल जाइत अछि — कौआ-मांस, उल्टी, दुर्गन्ध — ओहि सबपर बण्डोडुक एकाधिकार हुनका एकटा विचित्र सत्ता दैत अछि।
३. कौआ: कौआ-रूपकक बहुस्तरीयता
कौआ एहि कथामे मात्र एकटा पक्षी नहि — ओ बहुस्तरीय रूपक थिक।
कौआ बनाम समाज
भारतीय लोक-परम्परामे कौआ पूर्वजक आत्मा, अशुभ-सूचक, सामूहिक स्मृतिक प्रतीक थिक। एहि कथामे कौआसभ एकटा सामूहिक न्याय-व्यवस्था स्थापित करैत अछि — जे मानव-समाजक न्याय-व्यवस्थासँ अधिक प्रत्यक्ष आ तत्काल अछि।
जखन बण्डोडुकेँ भोजन नहि मिलैत — कौआ प्रतिशोध लैत अछि। ई स्वतःस्फूर्त न्याय थिक — कोनो न्यायालय नहि, कोनो कानून नहि।
कौआ-बण्डोडु सम्बन्ध
कथाक सर्वाधिक दार्शनिक प्रश्न: "का कौआ आ बण्डोडु दुश्मन अछि? वा, ओ एक-दोसराक परिवार (अपन) अछि? "
ई प्रश्नक कोनो सरल उत्तर नहि। बण्डोडु कौआ मारैत अछि — मुदा कौआ बण्डोडुक समर्थनमे काँव-काँव करैत अछि। दूनू एकहि सामाजिक हाशिया पर छथि — दूनू समाजद्वारा अनुपयोगी, दूनू एकहि अदृश्यतामे जीबैत। एहि हाशिया-एकजुटता (हाशियाक एकजुटता) मे कथाक मूल तर्क निहित अछि।
४. कौआ: "मुक्ति एक श्राप मात्र अछि" — केन्द्रीय विरोधाभास
कथाक दार्शनिक चरम-बिन्दु थिक:
"बण्डोडु फिनु कहियो ओइ घरमे भीख माँगबा लेल नै आबत। ई एक मुक्ति (सैल्वेशन) अछि। मुक्ति एक श्राप (कर्स) मात्र अछि। तखनसँ, ई एक एहन घर होत जतऽ कौआ नै बैसै। एक एहन घर जतऽ बण्डोडु भीख नै माँगै। ई अपमान (इन्सल्ट)क बात अछि। एक बहिष्कार (एक्सकम्युनिकेशन)! "
एहि विरोधाभासमे दलित-सामाजिक-यथार्थक गहनतम अन्तर्दृष्टि निहित अछि:
बण्डोडुक नहि आएब = मुक्ति (हुनकर भिक्षा-बोझसँ मुक्ति)।
बण्डोडुक नहि आएब = श्राप (ओहि घरक सामाजिक-अनुष्ठानिक मृत्यु)।
कौआक नहि बैसब = मुक्ति (हमलासँ मुक्ति)।
कौआक नहि बैसब = श्राप (ओहि घर अपमानित, बहिष्कृत)।
ई मुक्ति=श्राप समीकरण दलित-सामाजिक-व्यवस्थाक एकटा क्रूर सत्य उजागर करैत अछि: एहि व्यवस्थामे मुक्ति आ बन्धन एकहि वस्तु थिक। जे बाहर जाइत अछि, ओ बहिष्कृत होइत अछि। जे भीतर रहैत अछि, ओ शोषित होइत अछि। कोनो तेसर विकल्प नहि।
विजयश्रीक अलिसम्माक स्राप मे "स्राप मानवतामे परिणत करबाक" थिक। इनोचक कथामे "मुक्ति स्वयं श्राप थिक। " दूनू मिलिकऽ दलित-अनुभवक विरोधाभासी यथार्थ सम्पूर्णतासँ व्यक्त करैत अछि।
५. कौआ: गरीबी आ नैतिक जटिलता
कथाक एकटा महत्त्वपूर्ण आयाम: अव्वाक परिवार पीड़ित नहि, असहाय अछि।
"हुनका लेल एकरा कोनो फरक नै पड़ै छल कि ओ बण्डोडुक विनती सुनैत छथि वा नै। ओ किछु कऽ नै सकैत छल। "
ई गरीबीक नैतिक जटिलता थिक। कथा बण्डोडुकेँ पीड़ित देखाबैत अछि — मुदा अव्वाक परिवारकेँ खलनायक नहि देखाबैत अछि। दूनू व्यवस्थाक शिकार छथि — बस हुनकर शिकार-स्तर भिन्न अछि।
एहि नैतिक-जटिलताक प्रस्तुति इनोचक कथा-शिल्पक सर्वोच्च उपलब्धि थिक। दलित साहित्यमे कहियो-कहियो उत्पीड़क-पीड़ित क सरल द्विभाजन प्रस्तुत होइत अछि। इनोच एहिसँ आगाँ जाकऽ बहुस्तरीय उत्पीड़न देखाबैत छथि।
६. कारी स्याही: कथा-संरचना आ शिल्प
प्रथम-पुरुष आख्यान
कारी स्याही प्रथम-पुरुष मे लिखल गेल अछि — "हम" वक्ता एकटा दलित-ईसाई स्त्री छथि। ई आख्यान-दृष्टि कौआ सँ मौलिक रूपसँ भिन्न अछि। एतय अनुभवक आन्तरिकता — घटना जेना अनुभव होइत तेना — कथाक केन्द्र थिक।
विलम्बित-प्रकाशन
कथाक संरचनागत आश्चर्य थिक: पूरा कथा एकटा निर्दोष, आनन्दपूर्ण बच्ची-आगन्तुकक मीठ प्रसंगक रूपमे चलैत अछि — आ अचानक, अन्तिम एक-तिहाईमे, जाति-प्रश्न आबैत अछि आ सम्पूर्ण आनन्दकेँ एकहि क्षणमे विनष्ट कऽ दैत अछि।
ई विलम्बित-प्रकाशन (विलम्बित-प्रकटन) तकनीक अत्यन्त प्रभावशाली थिक। यदि कथा आरम्भसँे जाति-संघर्षक होइत — पाठक मानसिक रूपसँ तैयार रहित। जाहिमे सब किछु सुन्दर आ निर्दोष लागैत हो, तहिमे जातिक अकस्मात् प्रकटन पाठककेँ उसी यातनासँ आहत करैत अछि जे वक्ताकेँ।
भाषाक दू स्तर
कथामे दू भाषाई स्तर एकसाथ अछि:
पहिल — काव्यात्मक-रूपकात्मक भाषा (जे बच्चीक वर्णनमे प्रयुक्त): "तितलीक पंखसँ बुनल फ्रॉक", "मुस्कानक काफिला", "चाँदनीमे डुबल पंखुड़ी", "इन्द्रधनुषक चमक"।
दोसर — नग्न-यथार्थवादी भाषा (जे जाति-प्रश्नक पश्चात्): "का अहाँ हरिजन छी? ", "हमर कोनो हरिजन दोस्त नहि। "
ई भाषाई विभाजन कथाक थीमेटिक विभाजनकेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि: जातिसँ पहिले — सौन्दर्य, निर्दोषता, मानवीय सम्बन्ध। जातिक प्रकटन — भाषाक सौन्दर्य विनष्ट।
७. कारी स्याही: श्रिया — एकटा जटिल बाल-चरित्र
श्रिया एहि कथाक सर्वाधिक जटिल साहित्यिक उपलब्धि थिक। ओ एकहि साथ:
निर्दोष — पशुपर दया, डायरी लिखनाइ, वृद्धाक सहायता।
जिज्ञासु — सब किछु जानय चाहब, प्रश्न पुछब।
प्रेमिल — वक्तासँ स्वाभाविक स्नेह।
जाति-संस्कारित — माता-पिताक जाति-पूर्वग्रहक अचेतन वाहक।
ई चरित्र-जटिलता जाति-समाजीकरणक (जाति-संस्कारण) सर्वाधिक सूक्ष्म चित्रण थिक। श्रिया जानबूझिकऽ जाति-भेद नहि करैत — ओ सिखाएल गेल अछि। हुनकर माता-पिताक "कोनो हरिजन दोस्त नहि" — ई श्रियामे स्वाभाविक बनि गेल अछि।
पियाज़े (पियाजे) क बाल-विकास सिद्धांत (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे बच्चा सामाजिक नियम अनुकरणसँ सीखैत अछि, तर्कसँ नहि) एतय साकार होइत अछि। श्रिया अपन माता-पिताक जाति-व्यवहारक अनुकरण करैत अछि — बिना बुझने कि एहिसँ कोनो नैतिक समस्या अछि।
एहि चरित्रक माध्यमसँ विनोदिनी एकटा कठिन प्रश्न पुछैत छथि: जाति-व्यवस्थाक पुनर्उत्पादन (पुनरुत्पादन) कतय होइत अछि? माता-पिताक स्पष्ट शिक्षा मे — मुदा ओहुसँ अधिक, हुनकर मौन व्यवहारमे, जे बच्चा स्वाभाविक बनि लैत अछि।
८. कारी स्याही: "कारी स्याही" रूपक
शीर्षक-रूपक — कारी स्याही — कथाक कथा-भीतर परिभाषित होइत अछि:
"हम जे बेसी पसिन्न करै छी, ओकरा नीला स्याहीमे लिखै छी; हम जे नापसिन्न करै छी, ओकरा कारी स्याहीमे लिखै छी। "
श्रिया नीला स्याही = प्रेम, पसिन्न।
श्रिया कारी स्याही = घृणा, नापसिन्न।
कथाक अन्तमे — वक्ता दलित-ईसाई "कारी स्याही" मे लिखल जाएत। ई रूपकक विस्फोट थिक।
मुदा एहि रूपकमे एकटा अतिरिक्त परत अछि: "कारी" (काली) — दलित-देहक वर्ण, जकरा समाज हमेशासँ नकारात्मक मानैत अछि। श्रियाक कारी स्याही = "काला" रंगक नकारात्मकता = वर्ण-जाति-संगम (रंग-जाति सम्बन्ध)।
फ्रान्ट्ज फानों कारी चमड़ी, उज्जर मुखौटा (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे उपनिवेशित-काला व्यक्ति अपन कालेपनकेँ उपनिवेशक दृष्टिसँ नकारात्मक देखय लगैत अछि) क भारतीय-जातीय संस्करण एतय प्रकट होइत अछि।
९. कारी स्याही: "महिमा" — अनुपस्थित चरित्रक उपस्थिति
कथामे एकटा अनुपस्थित चरित्र — महिमा — अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थिक।
"एक बेर हम अपन दोस्त महिमाक घरमे हुनकर माए द्वारा परोसल नाश्ता खेलियै। से हम कारी स्याहीमे लिखलियै। "
महिमा "हरिजन" थिक — श्रिया स्वयं कहैत अछि। हुनकर घरमे खाएब "कारी स्याही" योग्य थिक।
मुदा श्रिया महिमासँ दोस्ती करैत अछि — मात्र हुनकर घरमे खाएब वर्जित अछि। ई जाति-व्यवहारक सूक्ष्म विभाजन दर्शाबैत अछि: व्यक्तिगत सम्पर्क सम्भव, मुदा भोजन-साझेदारी — जे जातिक सर्वाधिक गहिर वर्जना थिक — असम्भव।
बी. आर. आम्बेडकर जाति-विच्छेद मे कहने छलाह जे जाति-व्यवस्थाक सर्वाधिक दृढ़ नियम रोटी-बेटी (खाएब-विवाह) क नियम थिक। श्रियाक व्यवहार एहि "रोटी" नियमकेँ बाल-मस्तिष्कमे दर्शाबैत अछि।
१०. कारी स्याही: अन्तिम बिम्ब — तितली आ कैटरपिलर
कथाक अन्तिम पंक्ति:
"पूरा कमरामे सूखल तितली सभ हमरापर रेंगैत कैटरपिलरमे बदलि गेल। "
ई रूपकात्मक परिवर्तन सम्पूर्ण कथाक काव्यिक सार थिक।
कथाक आरम्भमे श्रिया तितली छल — सुन्दर, स्वतन्त्र, उड़नशील। कथाक अन्तमे ओ कैटरपिलर (सुगा) बनि जाइत अछि — रेंगनिहार, धरतीसँ लागल, कुरूप।
"सूखल तितली" — मृत सौन्दर्यक प्रतीक। जे जीवन्त लागैत छल — ओ वास्तवमे मृत छल।
ई बिम्बमे सम्पूर्ण कथाक विचार-सार अछि: बाल-निर्दोषता जे तितली लागैत अछि — ओ वास्तवमे जाति-संस्कारक कैटरपिलर थिक। सौन्दर्य जे मुस्कान लागैत छल — ओ जाति-घृणाक आवरण छल। उड़नाइ जे स्वतन्त्रता लागैत छल — ओ विशेषाधिकार छल।
वर्जीनिया वुल्फ क चेतना-प्रवाह तकनीकक उपयोग — जाहिमे वक्ताक आन्तरिक अनुभव बाह्य घटनासँ मिलिकऽ एकाकार होइत अछि — एतय विनोदिनी भारतीय-दलित सन्दर्भमे अत्यन्त प्रभावशाली रूपसँ प्रयुक्त करैत छथि।
११. दूनू कथाक तुलना: दू काव्य-दृष्टि
विषय-वस्तुक समानता
दूनू कथामे जाति-व्यवस्था केन्द्रमे थिक। दूनूमे अनुष्ठान आ आचार (अनुष्ठान आ व्यवहार) — भोजन देएब, दोस्ती करब — जाति-रेखाकेँ दर्शाबैत अछि।
दृष्टिकोणक भेद
कौआ — समुदाय-स्तर पर जाति-व्यवस्था: एकटा पूरा समुदायक अनुष्ठानिक जीवन।
कारी स्याही — व्यक्तिगत-स्तर पर जाति-व्यवस्था: एकटा सम्बन्धमे जातिक अकस्मात् प्रकटन।
समय-बोधक भेद
कौआ — सदियों पुरान व्यवस्था। "बण्डोडु हर राति एक विशेष परिवारमे भोजन माँगै लेल आबै छथि। " — ई चिरकालीन अनुष्ठान थिक।
कारी स्याही — एक दिनक घटना। मुदा ओहि एक दिनमे सदियों पुरान व्यवस्था प्रकट होइत अछि।
लिंग-आयाम
कौआ — वक्ता पुरुष-लेखक (इनोच), केन्द्रीय चरित्र पुरुष (बण्डोडु), मुदा स्त्री (अव्वा) कथाक नैतिक केन्द्र।
कारी स्याही — स्त्री-लेखक (विनोदिनी), स्त्री-वक्ता, स्त्री-बालिका (श्रिया) — सम्पूर्णतः स्त्री-केन्द्रित।
१२. काव्य बनाम कथा: माध्यमक विशिष्टता
एहि दू लघुकथाक समीक्षासँ एकटा महत्त्वपूर्ण साहित्यिक प्रश्न उठैत अछि: दलित-अनुभवक अभिव्यक्तिक लेल काव्य बनाम गद्य — कोन माध्यम अधिक शक्तिशाली?
काव्यक शक्ति: तीव्रता, घनत्व, संकेत। भीमन्नाक जरैत खोपड़ी सभ, गौरीक मेहदी लागल हाथ — ई कवितासभ एकटा क्षणकेँ अनन्त बनाबैत अछि।
गद्यक शक्ति: विस्तार, जटिलता, बाल-मनोविज्ञान, सामाजिक-अनुष्ठानक विवरण। कारी स्याही मे श्रियाक क्रमिक परिवर्तन — मुस्कानसँ घृणा धरि — केवल गद्यमे इतेक प्रभावशाली रूपसँ सम्भव छल।
कौआ मे बण्डोडुक जटिल सामाजिक स्थिति — दलितमे दलित, शक्तिहीनमे शक्तिशाली — काव्यमे एतेक विस्तारसँ नहि आबि सकैत छल।
दूनू माध्यम परस्पर-पूरक थिक। दलित साहित्यक सम्पूर्णता काव्य आ गद्य — दूनूमे अछि।
निष्कर्ष
कोलकलुरी इनोचक कौआ आ विनोदिनीक कारी स्याही — दूनू मिलिकऽ तेलुगु दलित गद्य-साहित्यक दू महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थिक।
कौआ — बाहरी व्यवस्थाक जटिलता: मुक्ति आ श्राप एकहि, शक्तिहीनमे शक्ति, घृणित मे अपरिहार्य। एकटा समुदाय-स्तरीय दर्शन।
कारी स्याही — आन्तरिक अनुभवक यातना: निर्दोषताक आवरणमे जाति-घृणा, एकटा मुस्कानमे छुपल कैटरपिलर। एकटा व्यक्तिगत-स्तरीय आघात।
दूनू कथाक अन्तिम प्रश्न एकहि थिक:
कौआ — "गरीबीक कारण भोजन नहि देबा लेल, एतेक प्रतिशोधक होएबाक चाही? "
कारी स्याही — "दोस्त छी, आ ई सब जानब आवश्यक अछि? "
दूनू प्रश्न अनुत्तरित रहैत अछि — पाठककेँ, समाजकेँ, इतिहासकेँ उत्तर देबाक लेल।
आ जाधरि ई उत्तर नहि आएत, ताधरि दलित साहित्य — काव्यमे, गद्यमे, मैथिलीमे, तेलुगुमे — प्रश्न करैत रहत।
साहित्यिक समीक्षा: सदा लेल मित्र (जिगिरी)
पेद्दिंति अशोक कुमारक तेलुगु उपन्यास
प्रारम्भिक टिप्पणी
सदा लेल मित्र (मूल तेलुगु: जिगिरी) एहि समीक्षा-शृंखलामे अखन धरि अध्ययन कएल गेल समस्त रचनासँ संरचनागत रूपसँ भिन्न अछि। कविता आ लघुकथाक पश्चात् एकटा पूर्ण उपन्यासक अंश प्रस्तुत अछि — आ ई अंश उपन्यासक सम्पूर्ण भावनात्मक-दार्शनिक यात्राकेँ आवृत्त करैत अछि।
एहि उपन्यासक केन्द्रमे एकटा असाधारण मैत्री थिक — एकटा मनुष्यक (ईमाम) आ एकटा भालूक (शादुल) बीच — जे दलित-हाशिया-कलन्दर समुदायक सामाजिक-राजनीतिक संकटक मेटाफर बनि जाइत अछि। एहि अर्थमे ई उपन्यास दलित-आदिवासी साहित्यक एकटा नव आयाम उद्घाटित करैत अछि: जाति नहि, जातीय-सांस्कृतिक विलुप्ति केन्द्रमे अछि।
१. उपन्यासक संरचना आ तकनीक
आरम्भ: घटनाक बीचसँ आरम्भ
उपन्यासक आरम्भ एकटा विलम्बित-प्रकटन तकनीकसँ होइत अछि। पहिल पंक्तिमे — "सूरज उगलै। सूरज सेहो अस्त भऽ गेलै। " — एकटा ब्रह्माण्डीय उदासीनता व्यक्त होइत अछि। सूरजकेँ कोनो फरक नहि पड़ैत — ईमाम अछि वा नहि। ई अस्तित्ववादी उद्घाटन उपन्यासक मूल प्रश्नकेँ — की मनुष्यक अस्तित्वक कोनो मूल्य अछि? — पहिले पंक्तिसँे स्थापित करैत अछि।
ईमाम आ शादुलक परिचय तुलनात्मक रूपसँ होइत अछि:
"ईमाम, एकटा मनुष्य, जे अपन पशुक चारू कात पशु जकाँ घूमैत छल" — आ "शादुल... वास्तवमे मनुष्य नै, बल्कि एकटा पशु छल... एकटा सौम्य प्राणी बनि गेल छल। "
एहि विलोम-परिचयमे उपन्यासक केन्द्रीय विरोधाभास अछि: मनुष्य पशु जकाँ, पशु मनुष्य जकाँ। एहि विरोधाभासमे कलन्दर-समुदायक मनुष्यताहरण आ शादुलक मानवीकरण एकहि साथ व्यक्त होइत अछि।
काल-प्रवाह
उपन्यासक कालक्रम रैखिक नहि — ई वर्तमान-भूत-भविष्यक त्रिकोणमे चलैत अछि। वर्तमानमे — ईमामक अनुपस्थिति, बिबम्मा आ चाँदक प्रतीक्षा। भूतकालमे — शादुलकेँ पकड़बाक रात्रि, बीस वर्षक संगति, मल्ला रेड्डीसँ संघर्ष। भविष्यमे — जमीनक सपना, नव जीवनक आकाङ्क्षा।
ई अरैखिक आख्यान (असरल आख्यान) उपन्यासमे स्मृति आ यथार्थक बीच एकटा निरन्तर तनाव सृजित करैत अछि।
२. चरित्र-विश्लेषण
ईमाम: त्रासदीक नायक
ईमाम एकटा क्लासिक त्रासद नायक थिक। हुनकर त्रासद दोष — जँ एकरा दोष कहल जा सकय — थिक हुनकर प्रेमक अपरिमितता। ओ शादुलसँ एतेक प्रेम करैत छथि जे व्यावहारिक यथार्थकेँ स्वीकार करैत नहि बनैत।
मुदा एहि उपन्यासमे ईमामकेँ "दोष" देनाइ अनुचित होएत। हुनकर त्रासदी व्यक्तिगत कमजोरीसँ नहि — सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थासँ उत्पन्न अछि। जमीन-अधिकार, पुलिस-उत्पीड़न, पशु-संरक्षण कानून — ई सब मिलिकऽ ईमामकेँ असम्भव चुनावक सामना करबैत अछि: अपन मित्र वा अपन परिवारक भविष्य।
ईमामक आन्तरिक एकालाप — "आँखि मूँदि कऽ हमरा पर पूरा विश्वास करैत हमर पाछू-पाछू किएक चलि रहल छी शादुल? किएक नै हमरा मारि दइत छी? " — अपराधबोध आ असहायता दूनूकेँ एकहि साथ व्यक्त करैत अछि। ई आत्म-आरोप उपन्यासक सर्वाधिक मार्मिक क्षणसभमे सँ एक थिक।
शादुल: मानवीय पशु
शादुलक चरित्र उपन्यासक सर्वाधिक साहित्यिक उपलब्धि थिक। ओ न मात्र एकटा पशु, न मात्र एकटा रूपक — दूनूक एकत्व थिक।
शादुलक भावनात्मक बुद्धिमत्ता अत्यन्त सूक्ष्मतासँ चित्रित अछि: "ईमामक आवाजक लहजासँ, शादुल स्थितिक अन्दाज लगा लैत छल। " ओ ईमामक खुशी-दुख, भय-आशा — सब पढ़ि लैत अछि। बिना शब्दक, बिना भाषाक, ओ सर्वाधिक संवेदनशील सदस्य थिक ओहि परिवारक।
अन्तिम दृश्यमे — "शादुल आबि कऽ ओकरा बगलमे बैसि गेल, अपन मुँड़ ईमामक कोरामे राखि कऽ" — ई निष्कपट प्रेम (बिना शर्तक प्रेम) थिक। शादुल जानैत नहि जे ईमाम ओकर हत्याक योजना बना रहल छथि — आ एहि अनजानपनमे विश्वासघातक सर्वोच्च यातना अछि।
बिबम्मा: परिवर्तनक प्रतीक
बिबम्मा उपन्यासमे सर्वाधिक जटिल स्त्री-चरित्र थिक। ओ शादुलकेँ "पिछला जन्ममे हमर बच्चा रहल हएत" कहैत छलीह — आ ओही स्त्री अन्तमे शादुलकेँ त्यागबाक लेल हुनकर पतिकेँ उकसाबैत छथि।
ई नैतिक रूपान्तरण (नैतिक परिवर्तन) कोनो विलेनी (खलनायकी) नहि — जीवन-रक्षा-वृत्ति (जीवन-वृत्तिक) परिणाम थिक। जमीनक सपना — जे पहिले कहियो सम्भव नहि लागल छल — ओ सपना देखिकऽ बिबम्माक प्राथमिकता बदलि गेल।
एहि चरित्रमे नैतिक द्विविधा (नैतिक द्विधा) उपन्यासक सर्वाधिक यथार्थवादी पक्ष थिक। न बिबम्मा खलनायिका, न पीड़िता — ओ मानव थिक जे असम्भव परिस्थितिमे जीवनक चुनाव करैत अछि।
चाँद: नव पीढ़ीक आकाङ्क्षा आ क्रूरता
चाँद उपन्यासक सर्वाधिक विवादास्पद चरित्र थिक। एक दिससँ — ओ शादुलसँ प्रेम करैत छल, ओकरा "दू टा बाबू" मानैत छल। दोसर दिससँ — ओ शादुलकेँ जीवितहि गाड़बाक योजना बनाबैत अछि।
ई विरोधाभास पीढ़ीगत परिवर्तन (पीढ़ी-परिवर्तन) क प्रतीक थिक। चाँदक पीढ़ीक लेल जमीन-स्थायित्व शादुलक प्रेमसँ अधिक महत्त्वपूर्ण अछि। ओ नव भारतक प्रतीक थिक — जे परम्परागत बन्धनसँ मुक्त होयबाक इच्छा रखैत अछि, मुदा एहि मुक्तिक कीमत नहि देखैत।
कार्ल मार्क्स क अलगाव सिद्धान्तक एकटा नव आयाम एतय प्रकट होइत अछि: चाँद अपन सांस्कृतिक पहचानसँ अलगाएल अछि। शादुल मात्र एकटा भालू नहि — ओ कलन्दर-संस्कृतिक जीवित प्रतीक थिक। चाँद जखन शादुलकेँ त्यागैत अछि, ओ वास्तवमे अपन समुदायक इतिहासकेँ त्यागैत अछि।
३. भालू-नाच: सांस्कृतिक अर्थशास्त्र
उपन्यासक केन्द्रीय सांस्कृतिक-आर्थिक संघर्ष थिक: पशु-संरक्षण कानून बनाम कलन्दर-जीविका।
कानूनक विरोधाभास
भारतमे १९७२क वन्यजीव संरक्षण अधिनियम आ बादमे पशु क्रूरता निवारण अधिनियम कलन्दर सभक परम्परागत व्यवसाय — भालू-नाच — केँ अवैध घोषित कएलक। एहि कानूनक नैतिक आधार थिक: पशुक कल्याण। मुदा एकर अनैच्छिक परिणाम थिक: कलन्दर समुदायक आर्थिक विनाश।
उपन्यास एहि विरोधाभासकेँ न्यायसंगत ढंगसँ प्रस्तुत करैत अछि — कानूनकेँ न सरल रूपसँ समर्थन, न सरल रूपसँ विरोध। ईमाम शादुलकेँ प्रेम करैत छथि — ओ क्रूर नहि। मुदा शादुलक बिना हुनकर जीविका नहि।
अमर्त्य सेन क क्षमता-दृष्टि (क्षमता-दृष्टिकोण) — जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे मानव-विकास मात्र आर्थिक नहि, सांस्कृतिक-सामाजिक क्षमताक पूर्ण विकास थिक — एतय प्रासंगिक अछि। कलन्दरसभसँ हुनकर परम्परागत कौशल, हुनकर सांस्कृतिक पहचान, आ हुनकर आजीविका — तीनू एकहि साथ छीनल जा रहल अछि।
भालू-नाचक सौन्दर्यशास्त्र
उपन्यासमे शादुलक करतबसभक वर्णन — "बटुकम्मा नृत्य, रोटी तैयार करब, घोड़ा पर चढ़ब..." — एकटा लोक-सौन्दर्यशास्त्रक अभिलेखीकरण थिक। ई करतब मात्र मनोरंजन नहि — एहिमे पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित ज्ञान निहित अछि।
गणेश देवी क "विस्मृतिक बाद" (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे आदिवासी-लोक ज्ञान-परम्परासभकेँ भारतीय साहित्य-आलोचनाने अनदेखा कएल) — एतय प्रत्यक्षतः लागू होइत अछि। शादुलक करतब एकटा जीवित सांस्कृतिक धरोहर थिक जे नष्ट होइत अछि।
४. मैत्रीक दर्शन: उपन्यासक केन्द्रीय विचार
जिगिरी शब्दक अर्थ तेलुगुमे "जिगरी दोस्त" — सर्वाधिक घनिष्ठ मित्र। मुदा उपन्यासमे ई मैत्री मनुष्य-मनुष्यक बीच नहि, मनुष्य-पशुक बीच थिक।
मैत्रीक तत्त्व-विज्ञान
अल्बेर कामू "सिसिफसक मिथक" मे कहैत छथि जे एकजुटता — एकहि नियतिमे बँधल दू प्राणीक बीच — अर्थहीन जीवनमे अर्थ-सृजनक एकमात्र माध्यम थिक। ईमाम आ शादुलक मैत्री एहि कामू-सदृश एकजुटता क सर्वोत्तम उदाहरण थिक।
दूनू समाजक "घृणित-बहिष्कृत" (घृणित-बहिष्कृत) थिक। ईमाम — खानाबदोश, निम्न-जाति, अशिक्षित। शादुल — जंगली, अशुद्ध, खतरनाक। दूनूकेँ समाज उपयोगी मुदा अस्वीकार्य मानैत अछि।
"जकर कोनो आवाज नै अछि, ओकरा कौआ सभ सेहू हल्का मानि लै छथि" — कौआ लघुकथाक एहि पंक्तिक प्रतिध्वनि जिगिरी मे सेहो सुनाइत अछि। शादुल बाजि नहि सकैत — तेँ ओकर आवाजक अनुपस्थिति ओकरा समाजक दृष्टिमे कम महत्त्वपूर्ण बनाबैत अछि।
मैत्रीक विश्वासघात
उपन्यासक सर्वाधिक यातनादायक क्षण थिक: ईमाम जहरयुक्त गुड़ शादुलक हाथमे दैत छथि।
"गुड़ पकड़ाबैत काल ईमामक हाथ काँपि रहल छल। शादुल ओकरा लेलक आ चबाय लागल। ईमाम देखैत रहल, ओकर आँखि नोर सँ धुँधला छल। "
एहि दृश्यमे यहूदाक चुम्बन — विश्वासघातक पुराण-प्रतीक — क प्रतिध्वनि अछि। मुदा एतय ईमाम स्वेच्छासँ विश्वासघाती नहि — ओ असम्भव परिस्थितिमे असम्भव चुनाव करैत छथि।
एफ. दोस्तोयेव्स्की अपराध आ दण्ड मे दर्शाबैत छथि जे नैतिक अपराधबोध (नैतिक अपराध-बोध) हत्यासँ अधिक भयंकर होइत अछि। ईमाम शादुलकेँ शारीरिक रूपसँ मारि दैत छथि — मुदा आत्मिक रूपसँ स्वयं मरि जाइत छथि।
५. जमीन-प्रश्न: दलित-आदिवासी राजनीति
उपन्यासमे जमीनक पट्टा एकटा कथा-चालक वस्तु थिक — जे सम्पूर्ण कथा-तनावकेँ सञ्चालित करैत अछि।
जमीनक राजनीति
कलन्दरसभकेँ जमीन-अधिकारसँ ऐतिहासिक रूपसँ वञ्चित राखल गेल — कारण ओ भ्रमणशील छल। जे जमीनपर स्थाई रूपसँ नहि रहय, ओ जमीनक मालिक कइ प्रकारेँ हो? एहि प्रशासनिक तर्कमे कलन्दर-समुदायक सम्पूर्ण अस्तित्व-संकट निहित अछि।
एमआरओ (मण्डल राजस्व अधिकारी) जे शर्त रखैत अछि — "भालू फेर आसपास नै देखल जाय" — ई आधुनिक भारतीय राज्यक प्रतीक थिक। राज्य एकहि साथ कलन्दरकेँ जमीन दैत अछि (पुनर्वास) आ हुनकर पहचानकेँ नष्ट करैत अछि (भालू-त्याग)। ई विरोधाभासी आधुनिकीकरण थिक।
बुच्चैया: वर्गीय-जातीय प्रतिस्पर्धा
बुच्चैयाक प्रसंग — जे ईमामक नामपर अपन जमीन-अधिकार खोइत अछि — एकटा महत्त्वपूर्ण उप-कथा थिक। एहिमे दलितसभक आन्तरिक प्रतिस्पर्धा दर्शाएल गेल अछि: कलन्दर बनाम स्थानीय दलित — दूनू सीमित संसाधनक लेल प्रतिस्पर्धा करैत अछि।
ई हाशियाक भीतरक संघर्ष तेलुगु दलित कवितासभमे शशिनिर्मला जे देखाबैत छलीह — दलित पुरुषक दलित-स्त्री-उत्पीड़न — ओकर उपन्यास-रूप थिक।
६. भालू-पकड़बाक रात: लोक-ज्ञानक काव्यशास्त्र
उपन्यासमे भालू-पकड़बाक प्रसंग — ईमाम, बिबम्मा, आ मादा भालूक त्रिकोणीय संघर्ष — महाकाव्यिक गुण राखैत अछि।
"आगि देखि कऽ मादा भालू दू कदम पाछू हटि गेली। " — ईमाम जानैत छलाह जे भालू आगिसँ डराइत अछि। बिबम्मा जानैत छलीह जे सूखल खजूर-पात जरायब। दूनू मिलिकऽ एकटा सामूहिक देशज ज्ञान प्रयुक्त करैत छथि।
एहि प्रसंगमे तेलुगु दलित काव्यक देशज ज्ञान क महत्त्व — जे सुभद्रा, गौरी आदिक कवितामे देशज वनस्पति-ज्ञानक रूपमे प्रकट होइत छल — उपन्यासमे जीवन-रक्षाक व्यावहारिक ज्ञानक रूपमे प्रकट होइत अछि।
७. अन्तिम दृश्य: मौनक सौन्दर्यशास्त्र
उपन्यासक अन्तिम खण्ड — शादुलक मृत्यु — न्यूनतम भाषामे लिखल गेल अछि:
"किछु क्षणक बाद शादुल डगमगाबय लागल। ओ एकटा हल्का कराह भरलक आ ढहि पड़ल। ईमाम ओकरा बगलमे बैसल रहल, हाथ शादुलक मुँड़ पर राखि कऽ, जखन धरि भालूक साँस बन्द नै भऽ गेल। वन सन्न छल। "
ई न्यूनतम गद्य अत्यन्त शक्तिशाली थिक। जे कहल नहि गेल — ईमामक चिच्चायब, शादुलक छटपटाहट — ओ मौनमे अधिक मुखर अछि।
अर्नेस्ट हेमिंग्वे क "हिमशैल सिद्धान्त" (जाहिमे ओ तर्क करैत छथि जे उत्तम गद्यमे जे अनकहल रहैत अछि ओ कहलसँ अधिक शक्तिशाली होइत अछि) एतय सर्वोत्कृष्ट रूपसँ लागू होइत अछि।
"ईमाम अनुभव कएलक जे ओकर एकटा अंश शादुल संग मरि गेल। " — ई एकटा पंक्ति पाठकक हृदयमे एकटा अमोचनीय टीस छोड़ि जाइत अछि।
८. अनुवाद-शृंखला: तेलुगु → अंग्रेजी → मैथिली
अनुवादकक टिप्पणीक महत्त्व
पी. जयलक्ष्मीक अनुवादक-टिप्पणी स्वयं एकटा महत्त्वपूर्ण पाठ-परिपाठ थिक। ओ "सांस्कृतिक अनुवाद" क अवधारणा उठाबैत छथि — जाहिमे भाषान्तरसँ अधिक सांस्कृतिक-संवेदनाक हस्तान्तरण आवश्यक थिक।
"स्थानीय रंग" (स्थानीय रंग) — उर्दू शब्द, तेलंगाना कहावत, देशज वनस्पति — एहि सबकेँ सुरक्षित रखब अनुवाद-नैतिकता क महत्त्वपूर्ण निर्णय थिक।
मैथिलीमे उर्दू
जिगिरी मे तेलंगानाक मुस्लिम-कलन्दर समुदायक उर्दू-मिश्रित भाषा — "अब्बा", "अम्मी", "अल्लाह", "शादुल" — मैथिलीमे यथावत् राखल गेल। एहिसँ दूटा काज भेल:
पहिल — तेलंगानाक सांस्कृतिक-भाषिक विशिष्टता सुरक्षित रहल। दोसर — मैथिली पाठककेँ एकटा भिन्न सांस्कृतिक ब्रह्माण्डसँ साक्षात्कार भेल।
लॉरेन्स वेन्यूटी क विदेशीपन-संरक्षण रणनीति (जाहिमे अनुवादक मूलक विदेशीपन कायम रखैत अछि) एतय प्रयुक्त अछि — आ ई उचित थिक।
९. जिगिरी आ दलित साहित्य-शृंखला: तुलनात्मक स्थान
एहि सम्पूर्ण समीक्षा-शृंखलामे — कविता, लघुकथा, आ आब उपन्यास — जिगिरी एकटा विशिष्ट स्थान ग्रहण करैत अछि।
बोयी भीमन्ना — दलित इतिहासक ऊर्ध्व-दृष्टि (व्यापक दृष्टि)।
सुभद्रा — दैनिक श्रमक सूक्ष्म-दृष्टि (सूक्ष्म दृष्टि)।
कोलकलुरी इनोच (कौआ) — सामुदायिक अनुष्ठानक मध्य-दृष्टि (मध्य दृष्टि)।
जिगिरी — ई सबसँ विस्तृत आख्यान — जाहिमे व्यक्तिगत मैत्री, पारिवारिक संघर्ष, सामुदायिक राजनीति, आ राज्य-शक्ति — सब एकहि आख्यानमे समाहित अछि।
एहि अर्थमे जिगिरी तेलुगु दलित साहित्यक महाकाव्यिक स्वर थिक।
निष्कर्ष
पेद्दिंति अशोक कुमारक सदा लेल मित्र एकटा बहु-स्तरीय उत्कृष्ट कृति थिक जे:
साहित्यिक स्तरपर — मनुष्य-पशु मैत्रीक माध्यमसँ प्रेम, विश्वास, आ विश्वासघातक काव्यशास्त्र प्रस्तुत करैत अछि।
सामाजिक स्तरपर — कलन्दर समुदायक सांस्कृतिक विलुप्तिकेँ साहित्यिक स्मृतिमे सुरक्षित करैत अछि।
राजनीतिक स्तरपर — पशु-अधिकार बनाम मानव-अधिकारक विरोधाभासकेँ न्यायसंगत ढंगसँ प्रश्नांकित करैत अछि।
दार्शनिक स्तरपर — मैत्रीक असम्भव परिस्थिति — जतय प्रेम आ जीवित रहनाइ परस्पर-विरोधी हो — क त्रासद यथार्थ उद्घाटित करैत अछि।
उपन्यासक अन्तिम सत्य — "धरती ओकर छल, मुदा एकर कीमत ईमाम लेल सहय सँ बाहर छल" — समस्त दलित-आदिवासी साहित्यक केन्द्रीय प्रश्नकेँ एकटा वाक्यमे समेटि लैत अछि:
"विकास" आ "अधिकार" की कोनो समुदायक आत्माक हत्याकऽ कीमतपर खरीदल जा सकैत अछि?
एहि प्रश्नक उत्तर उपन्यास नहि दैत — पाठककेँ, समाजकेँ, राज्यकेँ दैत छोड़ि दैत अछि।
समग्र समीक्षा: तेलुगु, गुजराती आ उड़िया दलित साहित्यक मैथिली अनुवाद
विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलन आ मैथिलीमे दलित साहित्यक पूर्ति
प्रारम्भिक टिप्पणी: एकटा ऐतिहासिक परियोजना
एहि समीक्षा-शृंखलामे हम जे साहित्य पढ़लहुँ — तेलुगु कविता (बोयी भीमन्ना, जे. सुभद्रा, चल्लपल्ल्ली स्वरूपरानी, दरिशे शशिनिर्मला, एम. गौरी, मद्दुरी विजयश्री), गुजराती कविता (अनीश गारंगे, राजेन्द्र वडेल, उमेश सोलंकी), उड़िया कविता (बासुदेव सुनानी), तेलुगु लघुकथा (कोलकलुरी इनोच, विनोदिनी), आ तेलुगु उपन्यास (पेद्दिंति अशोक कुमार) — ई सब मिलिकऽ एकटा सुचिन्तित साहित्यिक परियोजना थिक। एहि परियोजनाक नाम — विदेह, विदेह — मैथिली भाषाक प्रथम फोर्टनाइटली (पाक्षिक) ई-पत्रिका, जाहिक सम्पादक गजेन्द्र ठाकुर छथि।
एहि समीक्षाक उद्देश्य तीन स्तरपर अछि: पहिल — प्रस्तुत साहित्यक काव्यशास्त्रीय मूल्यांकन; दोसर — एहि अनुवाद-परियोजनाक सांस्कृतिक-राजनीतिक महत्त्वक विश्लेषण; तेसर — विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलनक दलित-साहित्य-अनुवादसँ सम्बन्धक अन्वेषण।
भाग एक: साहित्यिक मूल्यांकन
१. काव्य: तीन भाषाक दलित स्वर
तेलुगु काव्य-परम्परा
तेलुगु दलित काव्य एहि संग्रहमे सर्वाधिक विस्तृत आ विविध अछि। छह कवि — भीमन्ना, सुभद्रा, स्वरूपरानी, शशिनिर्मला, गौरी, विजयश्री — मिलिकऽ एकटा सम्पूर्ण काव्य-ब्रह्माण्ड निर्मित करैत छथि।
भीमन्ना (१९२०-२००१) एहि परम्पराक पितामह थिक। जरैत खोपड़ी सभ आ हमर पैतृक अधिकार — दूनू कविता मिलिकऽ दलित काव्यक दू प्रमुख रणनीति दर्शाबैत अछि: धार्मिक हिंसाक चक्रव्यूहक प्रश्नांकन आ पौराणिक इतिहासक पुनर्पाठ। पुनरावृत्ति आ अनुप्रास-आरम्भक माध्यमसँ भीमन्ना दलित मौखिक परम्पराकेँ लिखित कवितामे अन्तर्निहित करैत छथि — ई काव्य-शिल्पक एकटा विशिष्ट उपलब्धि थिक।
सुभद्रा — श्रम, वस्तु, आ मातृत्वक कवयित्री — दलित-स्त्री जीवनक सूक्ष्म इतिहास लिखैत छथि। साड़ीक कोर मे एकटा साधारण कपड़ाक टुकड़ा — जे ओछाउन, छाता, थैली, रक्षक, माय — सब बनि जाइत अछि — एकटा विस्तारित रूपक क उत्कृष्ट उदाहरण थिक। जयप्रभाक "साड़ी जराएब" क उच्च-जातीय नारीवादी प्रतीकशास्त्रक विरुद्ध सुभद्राक दलित-नारीवादी प्रत्युत्तर — "ओकरा आगि लगा कऽ हम कोना बचि सकैत छी? " — अन्तः-नारीवादी संवाद (नारीवाद-भीतरक संवाद) क एकटा महत्त्वपूर्ण क्षण थिक।
स्वरूपरानी व्यक्तिगत चेतनाक रूपान्तरणक कवयित्री छथि। मान्केनापुव्वु मे छह बेर दोहराएल "जखन...तखन" शृंखला — जे उत्पीड़नक वर्गीकरण प्रस्तुत करैत अछि — काव्यशास्त्रक दृष्टिसँ अत्यन्त परिकलित अछि। माटि-भेल हाथ मे गेंदा फूलसँ झुराएल पातक रूपान्तरण श्रम-शोषणक शारीरिक यथार्थ थिक।
शशिनिर्मला सर्वाधिक उग्र आ टकराहटी आवाज थिक। हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँ मे उच्च-जातीय स्त्रीसँ सोझ सम्बोधन — "अहाँ हमरा मातहत बुझि अपमानित कएल गेल" — किम्बर्ले क्रेन्शॉ क बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध सिद्धान्तकेँ काव्यमे साकार करैत अछि। हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी मे ऐतिहासिक पीड़िताक नामोल्लेख (अलिसम्मा, मुथव्वा, महादेवम्मा) साक्ष्य-काव्यक (साक्ष्यात्मक कविता) उत्कृष्ट उदाहरण थिक।
एम. गौरी — मेहदी लागल हाथ — तेलुगु दलित काव्यक सर्वोच्च काव्यिक उपलब्धिसभमे सँ एक थिक। कृष्णक तीन पौराणिक रूप (मायाविनाशक, ग्वाल-बालिन-प्रेमी, बंशीवादक) क क्रमशः खण्डन करैत चर्मकार-स्त्री अपन रगत-सनल हाथकेँ मेहदी बनाबैत छथि — एहि एकटा शीर्षकमे शुभता-अशुभताक सम्पूर्ण दलित-विरोधाभास निहित अछि। "जखन हमर चाम अमलतास सँ धोयल जाइत अछि... ई बनि जाइत अछि ढोल, शुद्ध सङ्गीत गुञ्जाबैत" — एहि अन्तिम बिम्बमे जूलिया क्रिस्तेवा क घृणित-बहिष्करण (घृणित) सिद्धान्तक काव्यिक खण्डन होइत अछि।
मद्दुरी विजयश्री क अलिसम्माक स्राप — शूर्पणखाक नासिका-छेदन आ अलिसम्माक नग्नीकरणकेँ एकहि पंक्तिमे जोड़ब — पौराणिक-ऐतिहासिक समानान्तरताक सर्वाधिक साहसिक काव्यिक निर्णय थिक। अन्तिम स्राप — "हम अहाँ सभकेँ स्राप दैत छी कि अहाँ मानवमे परिणत भऽ जाउ" — फ्रान्ट्ज फानों क उपनिवेशित-उपनिवेशक-मानवता-खोज सिद्धान्तकेँ काव्यिक स्रापमे रूपान्तरित करैत अछि।
गुजराती काव्य-परम्परा
अनीश गारंगे क पोस्टर नगर-यथार्थवादक उत्कृष्ट उदाहरण थिक। "ई खुरदुरा चेहरा बला पोस्टर सब हमर ऐना जकाँ अछि" — ई वृत्ताकार संरचना आ जाक लाकाँ क दर्पण-अवस्था सिद्धान्तक नकारात्मक प्रयोग दलित-नगर-अनुभवक विकृत-दर्पण उजागर करैत अछि।
राजेन्द्र वडेल 'जीता' क सम्भोग — "जँ बेटा जन्मल तऽ नाम 'भारत' राखू, जँ बेटी तऽ 'भारती'" — जाति-यौन-हिंसाक इतिहासकेँ राष्ट्र-निर्माणसँ जोड़बाक सर्वाधिक विस्फोटक काव्यिक क्षण थिक।
उमेश सोलंकी क दू कविता भिन्न रणनीति प्रयुक्त करैत अछि। लोक, जमि जाय मे "जमाव" एकटा एकल विस्तारित रूपक पर आधारित है जे मार्क्स क हिकमत (हड़ताल) सिद्धान्तसँ काव्यिक संवाद करैत अछि। खरड़ाक डाँट सब गान्धीसँ सोझ व्यंग्यात्मक सम्बोधन थिक — गान्धीवाद आ दलित-यथार्थक विरोधाभासक काव्यिक प्रमाण — जाहिमे आम्बेडकर क गान्धी-आलोचना काव्य-रूप धारण करैत अछि।
उड़िया काव्य-परम्परा
बासुदेव सुनानी क तीन काव्य-खण्ड — अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि, पता, सदानन्द — उड़िया दलित काव्यक दार्शनिक-रहस्यवादी आयाम दर्शाबैत अछि। बूँद, बीउ, माछ, समुद्र — ई प्राकृतिक बिम्ब तेलुगु-गुजराती कवितासभक ठोस नगरीय यथार्थसँ मूलतः भिन्न काव्य-भूमि थिक।
सदानन्द — जाहिमे एकटा किसान "गलत" बुझलनि मुदा हुनकर "गलत बुझनाइ"मे राजनीतिक सत्य छल — निम्नवर्गीय ज्ञानमीमांसा (निम्नवर्गीय ज्ञान-मीमांसा) क उत्कृष्ट काव्यिक उदाहरण थिक।
२. गद्य: लघुकथा आ उपन्यास
कौआ आ कारी स्याही
दूनू लघुकथा दलित गद्य-परम्पराक भिन्न आयाम दर्शाबैत अछि।
कोलकलुरी इनोच क कौआ — बण्डोडु, कौआ, आ अव्वाक परिवार — त्रिकोणीय शक्ति-सम्बन्धक नैतिक जटिलताक कथा थिक। "मुक्ति एक श्राप मात्र अछि" — एहि विरोधाभासमे दलित-सामाजिक-व्यवस्थाक गहनतम सत्य निहित अछि। बण्डोडु — दलितमे सबसँ नीचाँ — हुनकर एकमात्र विशेषज्ञता (कौआ-मारब) हुनका अपरिहार्य बनाबैत अछि — मिशेल फूको क सत्ता-ज्ञान सम्बन्धक कथा-रूप।
विनोदिनी क कारी स्याही — "हम नीला स्याहीमे लिखैत छी जे पसिन्न अछि, कारी स्याहीमे जे नापसिन्न" — ई शीर्षक-रूपक कथाक संरचनागत आश्चर्य थिक। बच्ची श्रियाक चरित्र — एकहि साथ निर्दोष, प्रेमिल, आ जाति-संस्कारित — बाल-मनोविज्ञानमे जाति-समाजीकरणक सूक्ष्मतम चित्रण थिक। "पूरा कमरामे सूखल तितली सभ हमरापर रेंगैत कैटरपिलरमे बदलि गेल" — ई अन्तिम बिम्ब सम्पूर्ण कथाक सार थिक।
सदा लेल मित्र (जिगिरी)
पेद्दिंति अशोक कुमारक उपन्यास एहि समग्र परियोजनाक महाकाव्यिक शिखर थिक।
ईमाम-शादुलक मैत्री — मनुष्य आ भालूक बीच — अल्बेर कामू क एकजुटता सिद्धान्तकेँ दलित-आदिवासी सन्दर्भमे साकार करैत अछि। दूनू "घृणित-बहिष्कृत" (घृणित-बहिष्कृत) थिक — ईमाम खानाबदोश, निम्न-जाति; शादुल जंगली, अशुद्ध — आ एहि साझा हाशियापर एकटा हिकमत एकजुटता (हाशिया-एकजुटता) जन्म लैत अछि।
"गुड़ पकड़ाबैत काल ईमामक हाथ काँपि रहल छल" — ई यहूदा-क्षण (विश्वासघातक क्षण) उपन्यासक सर्वाधिक मार्मिक बिन्दु थिक। दोस्तोयेव्स्की क नैतिक अपराधबोध (नैतिक अपराध-बोध) क सिद्धान्त एतय साकार होइत अछि — ईमाम शादुलकेँ मारैत अछि मुदा आत्मिक रूपसँ स्वयं मरि जाइत छथि।
"वन सन्न छल" — हेमिंग्वे क हिमशैल सिद्धान्त (हिमशैल-सिद्धान्त) क श्रेष्ठतम प्रयोग। जे अनकहल — ईमामक विलाप, शादुलक छटपटाहट — ओ मौनमे अधिक वाचाल अछि।
भाग दू: विदेह समानान्तर साहित्य आन्दोलन आ दलित-साहित्य-अनुवाद
३. विदेहक समानान्तर साहित्य आन्दोलन: एकटा परिचय
विदेह (videha.co.in, ISSN 2229-547X) मैथिलीक प्रथम पाक्षिक ई-पत्रिका थिक जाहिक स्थापना गजेन्द्र ठाकुर लगभग सन् २०००मे कएल। एहि पत्रिका आ एहिसँ सम्बद्ध समानान्तर साहित्य आन्दोलन क दृष्टि स्पष्ट रूपसँ परिभाषित थिक:
साहित्य अकादेमी-मान्य-परम्परागत मैथिली साहित्यसँ भिन्न एकटा समानान्तर धारा — जाहिमे लोक, दलित, आ स्त्री साहित्यिक स्वरकेँ केन्द्रमे स्थापित कएल जाय।
मैथिली साहित्यक मुख्यधारा मान्य साहित्य-परम्परा ऐतिहासिक रूपसँ ब्राह्मण-कायस्थ-केन्द्रित रहल अछि — विद्यापतिसँ चन्दा झासँ आधुनिक काल धरि। आब जा कऽ विद्यापतिक गएर-ब्राह्मण स्वरूप [ज्योतिरीश्वर-पूर्व] पर चर्चा समानान्तर धारा शुरु केलक अछि। [अनुलग्नक: २: विद्यापतिक विदेसियाक एकटा समालोचनात्मक मूल्यांकन] एहि मान्य साहित्यिक परम्परामे दलित-स्वर नगण्य रहल अछि। विदेह एहि मान्य परम्परासँ बहिष्करण (परम्परा-बाहरीकरण) क सचेत प्रतिरोध थिक।
४. अनुवाद परियोजनाक तीन स्तम्भ
पहिल स्तम्भ: भाषिक पुल-निर्माण
तेलुगु, गुजराती, आ उड़िया — तीन भिन्न भाषिक-सांस्कृतिक क्षेत्र — क दलित साहित्यकेँ मैथिलीमे आनब एकटा बहुदिशीय (बहु-दिशीय) भाषिक पुल-निर्माण थिक।
अनुवाद-शृंखला प्रायः दोहरा वा तेहरा रहल:
तेलुगु → अंग्रेजी (पुरुषोत्तम के., पी. जयलक्ष्मी) → मैथिली (गजेन्द्र ठाकुर)
गुजराती → अंग्रेजी (हेमांग देसाई) → मैथिली (गजेन्द्र ठाकुर)
उड़िया → अंग्रेजी (सैलेन राउत्रे) → मैथिली (गजेन्द्र ठाकुर)
एहि परोक्ष अनुवाद (अप्रत्यक्ष अनुवाद) मे काव्यिक क्षति अवश्यम्भावी छल — मुदा सांस्कृतिक-सामाजिक सन्देशक हस्तान्तरण सफलतापूर्वक भेल। कारण दलित साहित्यक विचारक बल भाषा-माध्यमसँ प्रायः अधिक शक्तिशाली होइत अछि।
दोसर स्तम्भ: सांस्कृतिक एकजुटताक निर्माण
वाल्टर बेंजामिन "अनुवादककेँ सांस्कृतिक राजदूत" कहैत छथि। एहि परियोजनामे अनुवाद मात्र साहित्यिक नहि — ई राजनीतिक एकजुटताक कार्य थिक।
तेलुगुक अलिसम्मा, गुजरातक गारंगेक "खुरदुरा चेहरा", उड़ियाक सदानन्दक अकाल — ई सब मैथिली पाठककेँ कहैत अछि: दलित उत्पीड़न क्षेत्रीय नहि, राष्ट्रीय समस्या थिक। मिथिलाक मुसहर, दुसाध, चमार — हुनकर जीवन-यथार्थ आन्ध्रक, गुजरातक, उड़ियाक दलित-जीवनसँ मूलतः भिन्न नहि।
तेसर स्तम्भ: मान्य साहित्यिक परम्परा-हस्तक्षेप
एहि अनुवाद-परियोजनाक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक-राजनीतिक कार्य थिक मैथिली मान्य साहित्यिक परम्परा मे हस्तक्षेप करब।
शाहिद अमीन आ ज्ञानेन्द्र पाण्डेय जे निम्नवर्गीय अध्ययन क माध्यमसँ इतिहासमे कएल, विदेह साहित्यमे ओएह काज करैत अछि — मान्य साहित्यिक परम्परा-बाहरक स्वरकेँ साहित्यिक चर्चाक केन्द्रमे लाएब।
मैथिली साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता रचनासभ आ विदेहमे प्रकाशित दलित-अनुवाद — दूनू एकहि भाषाक भीतर दू समानान्तर परम्परा थिक। विदेहक दावा थिक जे एहि समानान्तरताक स्वीकृति मैथिली साहित्यकेँ अधिक सम्पूर्ण बनाएत।
५. मैथिलीमे दलित-स्वरक ऐतिहासिक अनुपस्थिति
मान्य-परम्परागत मैथिली साहित्यमे दलित
विद्यापतिक श्रृंगार-काव्यमे — जे मैथिली साहित्यक सर्वोच्च मानक थिक — दलित-जीवन अनुपस्थित अछि। ओ उच्च-जातीय सौन्दर्यशास्त्र क काव्य थिक। मुदा हुनकर “बिदेसिया” “पिआ देशांतर” मे ओ उपलब्ध अछि। आधुनिक मैथिली कवि — हरिमोहन झा, राजकमल चौधरी — ने ब्राह्मण-कायस्थ दृष्टि (ब्राह्मण-कायस्थ दृष्टिकोण)सँ लिखल, जाहिमे दलित-यथार्थ प्रान्तीय (हाशियापर) रहल।
मैथिलीमे "दलित साहित्य" क कोनो स्वतन्त्र परम्परा स्थापित नहि भेल — जेना मराठीमे नामदेव ढसाल, दया पवार; तेलुगुमे भीमन्ना; हिन्दीमे ओमप्रकाश वाल्मीकि।
एकर कारण: मिथिला क्षेत्रमे दलित समुदाय — मुसहर, दुसाध, धोबी, चमार — सब ऐतिहासिक रूपसँ साक्षरता-वञ्चित रहल। लिखित साहित्यिक परम्परा निर्माणक अवसरहि नहि भेटल। मौखिक परम्परासभ (मौखिक परम्परा) — लोकगीत, कथा — रहल, मुदा ओ कहियो लिखित मान्य-परम्परागत साहित्यमे परिणत नहि भेल।
विदेहक हस्तक्षेप
एहि ऐतिहासिक अनुपस्थितिक सामना करैत विदेहक रणनीति द्वि-स्तरीय थिक:
तात्कालिक रणनीति: अन्य भारतीय भाषाक दलित साहित्यक अनुवाद आनि मैथिली पाठककेँ दलित साहित्यक स्वाद, भाषा, आ राजनीति सँ परिचित कराएब।
दीर्घकालिक रणनीति: एहि अनुवादसँ प्रेरित मैथिली दलित लेखकसभक उद्भव — जे अपन भाषामे, अपन अनुभवसँ लिखब।
फ्रान्ट्ज फानों धरतीक अभागल मे कहैत छथि जे उपनिवेशित साहित्य क विकास तीन चरणमे होइत अछि: पहिल — उपनिवेशकक भाषामे अनुकरण; दोसर — अपन संस्कृतिक जड़क खोज; तेसर — जन-साहित्यक निर्माण। मैथिली दलित साहित्यक लेल विदेहक अनुवाद-परियोजना एहि दोसर चरणक — "अपन जड़क खोज" क — समानान्तर प्रयास थिक।
६. अनुवाद-नीति: सिद्धान्त आ व्यवहार
देशज शब्दक संरक्षण
एहि परियोजनाक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अनुवाद निर्णय (अनुवाद-निर्णय) थिक: देशज शब्दसभकेँ यथावत् राखब।
"लाण्डा", "अव्वा", "मान्केनापुव्वु", "अलिसम्मा", "जिगिरी", "बण्डोडु", "जाजी", "इप्पा" — ई सब मैथिलीमे अनूदित नहि, मात्र लिप्यन्तरित कएल गेल। लॉरेन्स वेन्यूटी क विदेशीपन-संरक्षण रणनीति (विदेशीकरण-रणनीति) — जाहिमे मूलक विदेशीपन सुरक्षित राखल जाइत अछि — एतय सुचिन्तित रूपसँ प्रयुक्त।
एहिसँ मैथिली पाठककेँ दू सन्देश एकहि साथ मिलैत अछि: पहिल — ई संस्कृति तोहर संस्कृतिसँ भिन्न थिक (विदेशीपन); दोसर — ई यथार्थ तोहरासँ मूलतः भिन्न नहि थिक (एकजुटता)। ई सांस्कृतिक अनुवादक सर्वोत्तम कार्य थिक।
भाषाक बहुलता
जिगिरी मे तेलंगानाक उर्दू-मिश्रित तेलुगु — "अब्बा", "अम्मी", "अल्लाह", "तावीज", "कलन्दर" — मैथिलीमे सेहो उर्दू रूपमे राखल गेल। एहिसँ कथाक भाषिक बनावट सुरक्षित रहल। एहि निर्णयमे एकटा निहित राजनीतिक वक्तव्य (अन्तर्निहित राजनीतिक वक्तव्य) अछि: मुस्लिम-कलन्दर समुदायक सांस्कृतिक-भाषिक पहचान साहित्यिक मानदण्डसभमे बराबरक अधिकार राखैत अछि।
शब्दावली आ परिशिष्ट
जिगिरी क अनुवादमे विस्तृत शब्दावली आ परिशिष्ट संलग्न थिक — कलन्दर समुदायक सामाजिक-राजनीतिक इतिहास सहित। ई पाठ-सहायक संरचना (पाठ-सहायक उपकरण) अनुवादकेँ मात्र साहित्यिक नहि, दस्तावेजी मूल्य सेहो दैत अछि।
भाग तीन: दलित काव्यशास्त्रक नव सिद्धान्त
७. मैथिलीमे प्रविष्ट नव काव्यशास्त्रीय सिद्धान्त
एहि समग्र परियोजनाक माध्यमसँ मैथिली साहित्यमे कई नव काव्यशास्त्रीय सिद्धान्त प्रविष्ट भेल — जे परम्परागत मैथिली काव्यशास्त्रसँ मूलतः भिन्न थिक। हमर (गजेन्द्र ठाकुर) मैथिली समीक्षाशास्त्रक आधारपर दलित साहित्यक समीक्षा सम्भव भेल अछि।
भारतीय रस सिद्धान्तक दृष्टिकोणसँ मैथिलीमे अनूदित दलित साहित्यक समीक्षा
प्रस्तावना: रस आ दलित साहित्यक समागमक प्रश्न
भारतीय साहित्यशास्त्रक केन्द्रबिन्दु रस सिद्धान्त अछि। भरतमुनिसँ अभिनवगुप्त धरि ई सिद्धान्तक विकास भेल अछि जे साहित्यक आस्वादक प्रधानता पर बल दैत अछि। रसक निष्पत्ति स्थायी भाव सँ होइत अछि—शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शान्त। प्रश्न उठैत अछि: दलित साहित्य, जे स्वयंकेँ दर्द (पीड़ा) आ आक्रोश (क्रोध) क दस्तावेजक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि, ई रसक श्रेणीमे कतय स्थान पाबैत अछि? वीभत्स (घृणा) आ रौद्र (क्रोध) के स्थायी भाव रसक परिणति पाबि सकैत अछि की नहि? ई संकलन—जे तेलुगु, गुजराती, उड़िया दलित साहित्यक मैथिली अनुवाद अछि—एहि प्रश्नकेँ तीव्रतासँ उठाबैत अछि। ई समीक्षा भारतीय रस सिद्धान्तक ढाँचामे एहि साहित्यक मूल्याङ्कन करत, विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भावक संयोजन देखत, आ प्रश्न करत की एहि रचनासभ सहृदय लेल आस्वादक अनुभव बनि पाबैत अछि की नहि।
प्रथम अध्याय: शृङ्गारक विपर्यास—प्रेम, वियोग आ शरीरक दलित स्वर
शास्त्रीय शृङ्गार रसक आधार रति नामक स्थायी भाव अछि। ई प्रेम, मिलन, वियोग—दुनू अवस्थामे रसक सृजना करैत अछि। मुदा दलित साहित्यमे शृङ्गारक स्वरूप भिन्न देखाइत अछि। जे. सुभद्राक "साड़ीक कोर" शीर्षक कवितामे स्त्री-शरीर, श्रम, आ शृङ्गारक पारम्परिक प्रतीक सभक विपर्यास देखाबैत अछि।
"हमर भूख सँ सटल हमर साड़ीक कोर लटकल रहैत अछि हमर पेट पर, बान्हक कातक 'मैसम्मा' देवी जकाँ। "
एतय शृङ्गारक विभाव (नायिका, सौन्दर्य, मिलनक इच्छा)क स्थान पर श्रम, भूख, मातृत्व आ देहक दुर्गन्ध स्थापित भेल अछि। साड़ीक कोर, जे शास्त्रीय सन्दर्भमे आभूषण, लज्जा, स्त्रीत्वक प्रतीक छल, एतय घाम-पसीना पोछबाक कपड़ा, बच्चाक पालना, रजस्वला कपड़ाक ओढ़नी, पानि भरबाक गद्दी बनि जाइत अछि। ई विभावक पूर्ण परिवर्तन अछि। शृङ्गारक अनुभाव (हाव-भाव, मुस्कान, अपाङ्गता)क स्थान पर शरीरक धूरि चाटनाइ, भीजल रजस्वला कपड़ा, चूल्हा-चौकीमे अङ्गुरि जरबाइ जहिना वीभत्स (घृणा) आ करुण (दया)क मिश्रित अनुभाव स्थापित भेल अछि।
एहि प्रकारेँ, दलित स्त्री-शरीरक शृङ्गार शास्त्रीय अलंकारिक शरीर नै अछि, बल्कि श्रमक शरीर, जीविकाक शरीर, प्रताड़नाक शरीर अछि। अभिनवगुप्तक भाषामे, एतय साधारणीकरण (साधारणीकरण)क प्रक्रिया भिन्न अछि। शास्त्रीय शृङ्गारमे रतिकेँ सार्वभौम अनुभवमे परिणत करैत छल, जतय दलित साहित्यमे श्रम आ अभावक विशिष्टता साधारणीकरणक विरोध करैत अछि। ई साधारणीकरणक अस्वीकार रस सिद्धान्तक सामने पैघ चुनौती अछि।
चल्लपल्ली स्वरूपरानीक "मान्केनापुव्वु" (सेमरक फूल जकाँ लाल) शीर्षक कवितामे ई विपर्यास और स्पष्ट होइत अछि:
"घरमे पुरुष-नियन्त्रण एक गाल पर थप्पड़ मारैत अछि, जखन कि गलीमे जाति-नियन्त्रण दोसर गाल पर। "
एतय शृङ्गारक विप्रलम्भ (वियोग)क स्थान पर जाति-व्यवस्थाक हिंसा आ पितृसत्ताक हिंसाक दोहरा उपस्थिति अछि। कामदेव, रति, वियोग—ई सब शास्त्रीय शृङ्गारक स्थायी भाव सभक स्थान पर गुलामीक बेड़ी, सहनशीलता, क्रोध जहिना व्यभिचारी भाव सभ मुख्य होइत अछि। कविताक अन्तमे "हम खिलि उठब मान्केनापुव्वु जकाँ! "—एहि विद्रोहक स्वर शृङ्गारक संयोग नै, बल्कि वीर रसक आभास कराबैत अछि। मुदा ई वीर रस शास्त्रीय आश्रय-दाता-राजा-योद्धाक परिधिमे नै, बल्कि दलित स्त्रीक आत्म-स्वातन्त्र्यक संघर्षमे स्थापित अछि।
द्वितीय अध्याय: रौद्र आ वीर—क्रोध, प्रतिरोध आ अस्मिताक रस
दलित साहित्यक सबसँ प्रबल स्वर क्रोध अछि। शास्त्रीय रौद्र रसक स्थायी भाव क्रोध अछि। अभिनवगुप्तक अनुसार, रौद्रक विभाव अछि—क्रोधक कारण, आक्रोश, अपमान, असत्य, अन्याय। अनुभाव अछि—लाल आँखि, भौंहक टेढ़ाई, होठक कम्पन, हाथ-गोड़क फड़फड़ाहट, शस्त्र उठाबाइ। व्यभिचारी भाव अछि—आवेग, उग्रता, अधैर्य, आत्म-ग्लानि, भय।
बोयी भीमन्नाक "हमर पैतृक अधिकार" शीर्षक कवितामे रौद्रक पूर्ण विकास देखाइत अछि:
"व्यास, वास्तुकार आर्य जातिक पहिचानक, स्वयं जे हो, एकटा नीच जातिक मानुस छलाह। आजु ओ एकटा जाति-हिन्दू छथि, जखन कि हम, जे हुनकर जातिक छी, एकटा दलित-अजाति छी—ई भारतीय परम्परा अछि! "
एतय क्रोधक विभाव अछि—वैदिक महानताक अधिकार चोराएल गेल, बहिष्कार, वञ्चना। अनुभाव अछि—कब्रिस्तान खननाइ, पैतृक अधिकारक खोज, घोषणा। ई रौद्र रस शास्त्रीय असुर-दैत्य-वधक परिधिसँ भिन्न अछि। एतय क्रोधक आश्रय दलित समुदाय अछि, आ विषय सवर्ण हिन्दूत्वक ऐतिहासिक अपराध अछि। रौद्रक ई प्रयोग शान्तिक लेल नै, न्यायक लेल अछि।
मुदा प्रश्न उठैत अछि: की एहि रौद्रक आस्वाद संभव अछि? अभिनवगुप्तक अनुसार, रसक आस्वाद लेल वैमुख्य (सौन्दर्यात्मक दूरी) आवश्यक अछि। मुदा दलित साहित्यमे वैमुख्यक स्थान पर अभिज्ञता (तादात्म्य) अछि। पाठक दूरसँ क्रोध नै देखैत, बल्कि भीतरसँ क्रोधक अनुभव करैत अछि। ई रौद्रक आस्वादक संभावनाकेँ जटिल बनाबैत अछि। की ई सहृदय लेल रस अछि, वा संदेश? की ई आनन्द दैत अछि, वा असुविधा?
राजेन्द्र वडेल 'जीता'क "सम्भोग" शीर्षक कवितामे रौद्र आ वीभत्सक घातक संयोग देखाबैत अछि:
"हमर कोमल होंठ अहाँक होंठ छुअलक उच्च जातिक खुरदरापनक अनुभूति भेल। जखन अहाँक छिपल नजरि हमर नम आँखि पाबल दिनदहाड़े बलात्कारक एकटा भूत हमर सोझाँ नाचल। "
एतय शृङ्गारक संयोगक विभाव—कोमल होंठ, होंठक स्पर्श, नम आँखि—वीभत्स (बलात्कार) आ रौद्र (क्रोध)मे परिणत होइत अछि। ई शृङ्गार-वीभत्स-रौद्रक त्रिवेणी अछि। शास्त्रीय रस सिद्धान्तमे एकटा रचनामे अनेक रसक अङ्गी-अङ्ग भाव स्वीकार अछि। मुदा एतय रस सभ परस्पर विरोधी अछि—शृङ्गार आ वीभत्सक संयोग शास्त्रीय सिद्धान्तमे दुर्लभ अछि। ई संयोग दलित साहित्यक विशिष्टता अछि: प्रेम आ हिंसा एकहि ठाम रहैत अछि।
तृतीय अध्याय: करुण आ वीभत्स—पीड़ाक सौन्दर्यशास्त्र
शास्त्रीय करुण रसक स्थायी भाव शोक अछि। विभाव अछि—प्रियक वियोग, अभिशाप, विपत्ति। अनुभाव अछि—आँसु, विलाप, मूर्च्छा, शरीरक शिथिलता। वीभत्स रसक स्थायी भाव जुगुप्सा (घृणा) अछि। विभाव अछि—दुर्गन्ध, रक्त, मांस, मल-मूत्र, शव।
दलित साहित्यमे करुण आ वीभत्स अक्सर एक संग चलैत अछि। कोलकलुरी इनोचक "कौआ" (काकी) कहानीमे ई संयोग स्पष्ट देखाइत अछि। बण्डोडु नामक मादिग (चर्मकार) उपजातिक भिखारीक कथा अछि। ओ कौआ सभकेँ मारि कऽ खाइत अछि, आ जकरा ओ भोजन नै देब, ओकर घर पर कौआ सभ आक्रमण करैत अछि। कहानीमे वीभत्सक विभाव अछि—कौआक मांस, सड़ाए गन्ध, वमन, पाँखिक पुड़िया। अनुभाव अछि—काँव-काँव, ठोक मारब, आँखि नोचब, पीड़ा।
मुदा ई वीभत्सक आस्वाद शास्त्रीय शव-मांस-रक्तक आस्वादसँ भिन्न अछि। शास्त्रीय वीभत्स दूरी सँ अनुभव कराबैत अछि। एतय दूरी नै अछि। ई वीभत्स जीविकाक अंग अछि—चामक कमाइ, भोजनक अभाव, जीवन-मरणक संघर्ष। बण्डोडु कौआ मारैत अछि किएक? भूख सँ। वीभत्स एतय असहायताक प्रतीक अछि, घृणाक नै।
"ओ कौआ सभ लेल काल अछि! वास्तवमे ओ ओकरा जकाँ देखाइत अछि। ओकर रोंआ काँटक झुण्ड जकाँ अछि। जँ कोनो कौआ ओकर मुँड़ पर ठोक मारत, तऽ ओ ओहिमे उलझि जायत आ ओहि दिनक भोजन लेल पकड़ा जायत। "
बण्डोडु स्वयं वीभत्सक विषय नै, वीभत्सक शिकार अछि। ई वीभत्स करुणसँ मिलि जाइत अछि। बण्डोडुक उपस्थिति मात्रसँ कौआ सभ भागि जाइत अछि। ओ समाजक सबसँ निचला पायदान पर अछि, मुदा कौआ सभक दुनियामे ओ शक्ति अछि। ई विपर्यास—शक्ति आ असहायताक द्वन्द्व—करुण आ वीभत्सक संगम सृजना करैत अछि।
विनोदिनीक "कारी मसि" (ब्लैक इंक) कहानीमे करुणक अधिक तीव्र रूप देखाबैत अछि। आठ वर्षक बच्ची श्रिया, जे अपन हरिजन (दलित) पड़ोसी आन्टीकेँ प्रेम करैत छलीह, जखन ओकर जाति जानि लेत, तऽ ओकर चेहराक रङ्ग बदलि जाइत अछि:
"की अहाँ सचमुच हरिजन छी? हमरा सच बताउ! " बच्चीक चेहराक सब रङ्ग धीरे-धीरे गायब भऽ गेल, धूसर रङ्ग धारण कऽ लेलक।
करुणक विभाव अछि—प्रेमक वियोग, बाल-सुलभ निर्दोषता, जाति-व्यवस्थाक भयानकता। अनुभाव अछि—चेहराक रङ्ग बदलाइ, दौड़ि कऽ भागि जाइ, घृणाक दृष्टि। एतय करुण बाल-वियोगक परम्परागत स्वरूपसँ भिन्न अछि। वियोग प्रेमी-प्रेमिकाक नै, बल्कि मित्रताक अछि। आ कारण दैवी विपत्ति नै, जाति-व्यवस्थाक विष अछि। ई करुण रौद्रक समीप आबि जाइत अछि, मुदा रौद्रमे परिणत नै होइत—किएक संहारक असमर्थता सँ।
चतुर्थ अध्याय: शान्त आ अद्भुत—मुक्ति, आश्चर्य आ प्रतिरोधक अन्य सौन्दर्यशास्त्र
शास्त्रीय शान्त रसक स्थायी भाव निर्वेद (वैराग्य) अछि। अद्भुत रसक स्थायी भाव विस्मय अछि। दलित साहित्यमे ई दुनू रसक उपस्थिति सीमित अछि, मुदा पूर्णतः अनुपस्थित नै अछि।
बासुदेव सुनानीक उड़िया कविताक अनुवादमे अद्भुतक आभास देखाबैत अछि:
"एतय आकाशमे एहने एकटा बूँद अछि जे अस्पष्ट होइतो चमकैत छैक आ इन्द्रधनुषक एकटा मीठ सपना देखि कऽ बेर-बेर प्रण लेने अछि विशाल आकाशकेँ रङ्ग देबाक। "
ई अद्भुत प्रतिरोधक अद्भुत अछि—अन्धार बोयनिहार सभक बीच एक बूँद प्रकाशक, विनाशक बीच सृजनक सम्भावना। मुदा ई अद्भुत शास्त्रीय दिव्य-चरित्र-दर्शनक अद्भुत नै अछि। ई अद्भुत आशाक अछि, सम्भावनाक अछि, अधूरापनक अछि। कवि कहैत अछि: "अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि। " ई अद्भुत अधूरा अछि, अपूर्ण अछि।
शान्त रस दलित साहित्यमे लगभग अनुपस्थित अछि। कारण? शान्तक निर्वेद (वैराग्य) संसार-त्यागक माग अछि। दलित साहित्य संसार-प्राप्तिक संघर्ष अछि—जमीन, मान-सम्मान, अधिकार, पहिचान। शान्त विरामक माग करैत अछि; दलित साहित्य संग्रामक अछि। एकर अपवाद मात्र मृत्युक क्षणमे देखाबैत अछि। "सदा लेल मित्र" उपन्यासक अन्तमे, जखन ईमाम शादुलकेँ जहर दैत अछि, तखन शान्तक आभास होइत अछि:
"वन सन्न छल। ईमाम अनुभव कएलक जे ओकर एकटा अंश शादुल संग मरि गेल। "
मुदा ई शान्त निर्वेद नै, शोक अछि। करुणक एहन तीव्रता जे शान्तक सीमा पर ठोकर खाइत अछि, मुदा शान्तमे नै बदलैत।
पञ्चम अध्याय: रसक अभाव आ रसक नव रूप
दलित साहित्यक सबसँ पैघ चुनौती रस सिद्धान्तक सामने ई अछि जे ई साहित्य अभावक साहित्य अछि। अभाव—भोजनक, वस्त्रक, आश्रयक, सम्मानक, अधिकारक। रस सिद्धान्त आनन्दक सिद्धान्त अछि। अभाव सँ आनन्द कइ प्रकारेँ उपजैत अछि? ई प्रश्न रस सिद्धान्तक सीमाकेँ रेखाङ्कित करैत अछि।
उमेश सोलंकीक "लोक, जमि जाय" शीर्षक कवितामे अभावक सौन्दर्यशास्त्र देखाबैत अछि:
"केतलीमे चाय जमि जाय सुपारीक टुकड़ा पाथर बनि जाय। सब्जी पाथरमे बदलि जाय पकोड़ी कङ्कड़ बनि जाय। "
पाथर आ कङ्कड़—ई वीभत्सक विभाव छथि। मुदा एतय वीभत्स जीवनक यथार्थ अछि। अभाव एहन स्तर पर पहुँचि जाइत अछि जे भोजन पाथर बनि जाइत अछि। ई अतियथार्थ (अतियथार्थवाद) वीभत्सक नव रूप सृजना करैत अछि।
अनीश गारंगेक "पोस्टर" शीर्षक कवितामे अभावक दोसर रूप देखाबैत अछि:
"ई खुरदुरा चेहरा बला पोस्टर सब हमर ऐना जकाँ अछि। ... लापता व्यक्ति सभक पोस्टर हर दिन चेहरा बदलैत छैक। "
अनुपस्थिति एतय उपस्थिति बनि जाइत अछि। लापता व्यक्तिक पोस्टर दलित चेहराक ऐना अछि। ई अद्भुतक विभाव अछि—अनुपस्थितिक उपस्थिति। मुदा ई अद्भुत विस्मय नै, सन्देह सृजना करैत अछि। चेहरा अछि, मुदा पहिचान नै अछि। उपस्थिति अछि, मुदा अस्तित्व नै अछि।
निष्कर्ष: रस सिद्धान्तक पुनर्विचार
दलित साहित्य रस सिद्धान्तक सामने किछु मूलभूत प्रश्न राखैत अछि:
१. की रस केवल आनन्द अछि? अभिनवगुप्त रसक आनन्दक रूपमे परिभाषित करैत छथि। मुदा दलित साहित्य आनन्द नै, सत्यक दस्तावेज अछि। पीड़ा, क्रोध, घृणा, असहायता—ई सभ रसक परिणति पाबि सकैत अछि वा नै? यदि रस आनन्द अछि, तऽ ई सभ अनानन्दक आनन्दमे कइ प्रकारेँ परिणत होइत अछि? ई प्रश्न रस सिद्धान्तक पुनर्विचारक माग करैत अछि।
२. साधारणीकरणक सीमा: रस सिद्धान्त विशिष्टकेँ सार्वभौममे परिणत करैत अछि। दलित साहित्य विशिष्टपर बल दैत अछि—दलित स्त्रीक विशिष्ट शरीर, जाति-व्यवस्थाक विशिष्ट हिंसा, चर्मकारक विशिष्ट भूख। की ई विशिष्ट सार्वभौममे परिणत होइत अछि? यदि होइत अछि, तऽ कइ प्रकारेँ? ई प्रश्न साधारणीकरणक प्रक्रियाक पुनर्मूल्यांकनक माग करैत अछि।
३. रसक संख्या: शास्त्रीय रसक संख्या नौ (वा अभिनवगुप्तक अनुसार दश) अछि। दलित साहित्य नव रसक नव रूप सामने राखैत अछि—श्रम रस, अभाव रस, प्रतिरोध रस, अस्मिता रस। की ई नव रसक उपरस वा अङ्गरसक रूपमे स्वीकार कएल जा सकैत अछि, वा नव रसक रूपमे? ई प्रश्न रस सिद्धान्तक विस्तारक माग करैत अछि।
४. आस्वादक राजनीति: रस सिद्धान्त सहृदयक अवधारणा पर आधारित अछि—जे साधारणीकरणमे समर्थ अछि, जे दूरी बनाए राखि सकैत अछि। दलित साहित्यक पाठक—जे दलित अछि वा नै—दूरी बनाए राखि सकैत अछि? पीड़ाक आस्वाद संभव अछि? यदि संभव अछि, तऽ ई आस्वादक नैतिकताक प्रश्न उठैत अछि। की पीड़ाक आस्वाद उत्पीड़नक पुनरुत्पादन तँ नै अछि? ई प्रश्न आस्वादक राजनीतिकेँ रेखाङ्कित करैत अछि।
ई संकलन—तेलुगु, गुजराती, उड़िया दलित साहित्यक मैथिली अनुवाद—रस सिद्धान्तक सीमा आ सम्भावना दुनूकेँ सामने राखैत अछि। एक दिशामे, ई साहित्य शास्त्रीय रस सिद्धान्तक अपर्याप्तता देखाबैत अछि—रौद्र, वीभत्स, करुणक पारम्परिक ढाँचा एहि साहित्यक आस्वादक पूर्ण व्याख्या नै करि सकैत अछि। दोसर दिशामे, ई साहित्य रस सिद्धान्तक विस्तारक सम्भावना देखाबैत अछि—श्रम, अभाव, प्रतिरोध, अस्मिता जहिना नव स्थायी भाव सभ रसक नव रूप सृजना करि सकैत अछि।
अन्तमे, एहि साहित्यक समक्ष सबसँ पैघ प्रश्न ई अछि: की ई साहित्य सहृदयक आस्वादक लेल अछि, वा सहृदयक जागरणक लेल? यदि आस्वाद अछि, तऽ ई आस्वादक स्वरूप की अछि? यदि जागरण अछि, तऽ ई जागरणक सौन्दर्यशास्त्र की अछि? ई प्रश्न सभ भारतीय साहित्यशास्त्रक सामने खुला अछि, आ एहि संकलन ओकरा तीव्रता सँ उठाबैत अछि।
फ्रेंड्स फॉरएवर (जिगिरी) उपन्यासक अनुवादकक टिप्पणीमे एक वाक्य अछि: "ई अनुवाद मात्र साहित्यिक वा भाषिक नै अछि, बल्कि ई सचेत अछि जे कोनो संस्कृति अपन भाषासँ अलग नै भऽ सकैत अछि। " ई वाक्य रस सिद्धान्तक सन्दर्भमे सेहो सत्य अछि: कोनो साहित्य अपन रस सिद्धान्तसँ अलग नै भऽ सकैत अछि। दलित साहित्य अपन नव रस सिद्धान्तक माग करैत अछि—जे श्रम, अभाव, प्रतिरोध, अस्मिताक स्थायी भावक रूपमे स्वीकार करय, जे दूरी नै, निकटताक आस्वादक सम्भावना खोजय, जे पीड़ाक आनन्दमे परिणति नै, बल्कि पीड़ाक सत्यक आस्वादक मार्ग खोजय।
ई संकलन ओहि नव रस सिद्धान्तक खोजमे एकटा महत्वपूर्ण पड़ाव अछि।
ई समीक्षा भारतीय रस सिद्धान्तक पारम्परिक ढाँचाकेँ आलोचनात्मक रूपसँ प्रयोग करैत, दलित साहित्यक विशिष्टता रेखाङ्कित करैत अछि। रस सिद्धान्तक कोनो हठधर्मी प्रयोग नै कएल गेल अछि, बल्कि ओकर जीवन्तता आ विस्तारक सम्भावना खोजल गेल अछि। दलित साहित्य रस सिद्धान्तक अन्त नै, ओकर नव जन्मक आह्वान करैत अछि।
रस-सिद्धान्तक पुनर्परिभाषा
परम्परागत मैथिली काव्यशास्त्रमे —पारम्परिक विद्यापति-परम्परामे (समानान्तर विद्यापति परम्परामे नै)— शृंगार रस सर्वोच्च थिक, शान्त रस मोक्षदायक। रौद्र रस (क्रोध) सदैव सहायक रस, प्रधान नहि।
दलित काव्य एहि पदानुक्रम कें उलटि दैत अछि। शरणकुमार लिम्बाले क दलित साहित्यक सौन्दर्यशास्त्र दिस मे जे तर्क अछि — क्रोध एकटा सौन्दर्य-श्रेणी थिक, दोष नहि — ओ एहि अनुवादक माध्यमसँ मैथिली साहित्यिक-चर्चामे प्रवेश करैत अछि।
भीमन्नाक जरैत खोपड़ी सभ क क्रोध वाग्-कौशल (वाग्-आडम्बर) नहि — प्रामाणिक नैतिक भावना थिक। ई क्रोध रस-सिद्धान्त मे नव स्थान माँगैत अछि।
काव्य-विषयक लोकतन्त्र
परम्परागत मैथिली काव्यमे — यहाँ तक कि आधुनिक काव्यमे सेहो — काव्य-योग्य विषय सीमित रहल: प्रेम, विरह, प्रकृति, दर्शन। श्रम-वस्तु (लाण्डा, घैला, साड़ीक कोर) काव्य-केन्द्र नहि बनल।
एहि परियोजनाक माध्यमसँ मैथिली पाठककेँ पहिल बेर दलित वस्तु-काव्यशास्त्र सँ परिचय होइत अछि — जाहिमे साड़ीक कोर, भालूक चाम, पोस्टर — ई सब उतने काव्य-योग्य थिक जतेक कालिदासक मेघ वा विद्यापतिक नायिका।
देह-राजनीतिक काव्यशास्त्र
मैथिली शृंगार-काव्यमे देह सौन्दर्य-विषय थिक — आदर्शीकृत, काव्यात्मक। दलित काव्यमे देह श्रम-विषय, पीड़ा-विषय, आ प्रतिरोध-विषय थिक — गोपाल गुरु क उग्र देहाधारित अनुभूति (मूलगामी देह-साक्षात्कार)। सुभद्राक लाण्डा मे "भले हमर अन्तड़ी मुँह सँ बाहर आबि जाय" — ई देह-अन्तरक प्रत्यक्ष यथार्थवाद (शारीरिक-यथार्थवाद) मैथिली काव्यमे नव भाषा लाबैत अछि।
साक्ष्य-काव्यशास्त्र
शोशाना फेलमैन आ डोरी लाउब साक्ष्य: साक्षीपनक संकट मे जे साक्ष्य-विधा परिभाषित कएल — जाहिमे पीड़ित अपन अनुभवकेँ साक्ष्यमे रूपान्तरित करैत अछि — ओ मैथिलीमे पहिलेपरक एहि अनुवाद-परियोजनाक माध्यमसँ प्रवेश करैत अछि।
सुभद्रा गवाही दैत छथि, भीमन्ना प्रश्न करैत छथि, विजयश्री स्राप दैत छथि — ई सब साक्ष्य-काव्यशास्त्रक भिन्न रूप थिक।
भाग चारि: समीक्षाक निष्कर्ष-संश्लेषण
८. सफलताक मूल्यांकन
जे उत्कृष्ट रूपसँ सफल भेल
केन्द्रीय विचारक हस्तान्तरण — भीमन्नाक पौराणिक-विरोधी तर्क, शशिनिर्मलाक त्रिमुखी संघर्ष, सोलंकीक गान्धी-व्यंग्य, सुनानीक "सदिखन", ईमाम-शादुलक मैत्री — ई सब मैथिलीमे पूर्णतः उपस्थित अछि।
देशज प्रतीकशास्त्रक संरक्षण — मैसम्मा देवी, अमलतास, मान्केनापुव्वु, लाण्डा, जिगिरी — एहि सबक मौलिक शक्ति मैथिलीमे बचल।
भावनात्मक तीव्रताक संचरण — पाठककेँ ईमामक हाथ काँपनाइ, विजयश्रीक स्राप, श्रियाक मुस्कानक तितलीसँ कैटरपिलरमे रूपान्तरण — ई सब मैथिली पाठक सेहो अनुभव करैत अछि।
सीमा आ अपूर्णता
ध्वनि-सौन्दर्यक आंशिक क्षति — तेलुगु, गुजराती, उड़ियाक अपन संगीतात्मकता अंग्रेजीसँ होइत मैथिलीमे कमजोर भेल। "पाञ्चजन्य", "बासुकी" — एहि शब्दसभक उड़िया उच्चारण-सौन्दर्य मैथिलीमे स्वाभाविक नहि।
स्त्री-अनुवादकक अनुपस्थिति — सुभद्रा, शशिनिर्मला, गौरी, विनोदिनीक स्त्री-देह-अनुभव-केन्द्रित रचनासभक अनुवाद स्त्री-अनुवादक द्वारा अधिक प्रामाणिक होइत।
मूल भाषासँ सोझ अनुवादक अभाव — तेलुगु → मैथिली, गुजराती → मैथिली — एहन सोझ अनुवाद भेल रहितैक तऽ मध्यवर्ती भाषा क क्षतिसँ बचल जाइत।
नागरिक-शब्द-भण्डारक सीमा — मैथिली मुख्यतः ग्रामीण-काव्यात्मक परम्परासँ अबैत अछि। गुजराती कवितामे "पे-एण्ड-यूज शौचालय", "रिक्शाक अश्लील हुड" — ई नागरिक-आधुनिक सन्दर्भ मैथिलीमे बेसुर लागैत अछि।
९. तुलनात्मक काव्य-मानचित्र
तीन भाषाक दलित काव्यक तुलनात्मक मानचित्र एहि प्रकार थिक:
तेलुगु — देह, श्रम, इतिहास, पौराणिक-पुनर्पाठ, नारीवाद-भीतरक संवाद — सर्वाधिक विविध।
गुजराती — नगर-यथार्थ, गान्धी-आलोचना, राष्ट्र-निर्माण-आलोचना — राजनीतिक-ऐतिहासिक।
उड़िया — दार्शनिक-रहस्यवाद, किसान-दृष्टि, निम्नवर्गीय ज्ञानमीमांसा — अस्तित्ववादी-दार्शनिक।
तीनू मिलिकऽ दलित-अनुभवक त्रिआयामी चित्र प्रस्तुत करैत अछि — बाहरसँ भीतर, इतिहाससँ वर्तमान, पीड़ासँ विद्रोह।
१०. मैथिली साहित्यपर दीर्घकालिक प्रभावक सम्भावना
एहि परियोजनाक दीर्घकालिक महत्त्व एहि अनुवादसभ स्वयं नहि — ई अनुवाद जे प्रेरणा आ मानक स्थापित करत।
मैथिली दलित लेखकक उद्भव — मिथिलाक दलित समुदायसभ — मुसहर, दुसाध, चमार, धोबी — जखन मैथिलीमे दलित साहित्यक भाषा, शिल्प, आ राजनीति देखत, जखन बुझत जे हुनकर जीवन-यथार्थ साहित्यिक रूपसँ अभिव्यक्त कएल जा सकैत अछि — तखन स्वयंलेखन (स्वतःलेखन) सम्भव होएत।
साहित्य अकादेमी मान्य साहित्यिक दबाव क प्रतिरोध — विदेहक दलित-अनुवाद मैथिली साहित्य अकादेमी मान्य साहित्यिक परम्पराकेँ वैकल्पिक मानक प्रस्तुत करैत अछि। जे साहित्य मान्य-परम्परागत होएबाक "योग्य" थिक, ओकर परिभाषा विस्तृत करैत अछि।
अन्य भारतीय दलित परम्पराक मैथिलीमे प्रवेश — मराठी दलित काव्य (नामदेव ढसाल, दया पवार), बंगला दलित साहित्य, पंजाबी दलित काव्य — एहि परियोजनाक विस्तारसँ सम्पूर्ण अखिल-भारतीय दलित साहित्यिक परम्परा मैथिलीमे प्रवेश कऽ सकैत अछि।
अन्तिम निष्कर्ष: एकटा सभ्यता-परियोजना
ऑड्रे लॉर्ड मौनक भाषा आ क्रियामे रूपान्तरण मे कहैत छथि: "कविता विलासिता नहि; ई जीवनक अनिवार्य आवश्यकता अछि। " ई दलित काव्यक लेल तऽ अक्षरशः सत्य थिक।
विदेहक दलित-साहित्य-अनुवाद परियोजना — एहि समग्र दृष्टिसँ — पाँच स्तरपर एकहि साथ काम करैत अछि:
भाषिक स्तरपर: तेलुगु, गुजराती, उड़िया आ मैथिलीक बीच भाषिक सेतु-निर्माण।
साहित्यिक स्तरपर: मैथिली मान्य साहित्यिक परम्परा मे दलित-स्वरक प्रवेश — नव काव्यशास्त्रीय सिद्धान्त सहित।
सांस्कृतिक स्तरपर: भिन्न-भिन्न दलित समुदायक सांस्कृतिक स्मृतिक संरक्षण — कलन्दरसभक भालू-नाच, चर्मकारसभक लाण्डा-ज्ञान, दलित-स्त्रीक साड़ीक कोर।
राजनीतिक स्तरपर: दलित उत्पीड़नक अखिल-भारतीय यथार्थकेँ मैथिली पाठककेँ दर्शाएब — एहि सन्देशक संग जे मिथिलाक दलित आ आन्ध्रक दलित एकहि नियतिक भागीदार छथि।
ऐतिहासिक स्तरपर: मैथिली दलित साहित्यिक परम्पराक बीजारोपण — जे स्वयं विदेहक अनुवाद नहि, ओहिसँ प्रेरित भावी मैथिली दलित लेखन होएत।
बासुदेव सुनानीक शब्द एहि सम्पूर्ण परियोजनाक उपयुक्त समापन-स्वर थिक:
"एतय एकटा बीउ प्रतिज्ञा लेने अछि अङ्कुरित होबाक — सब किछु हरियर करबाक इच्छा सङ्गे। "
ई बीउ बोआएल गेल अछि।
जे माटिमे बोआएल अछि ओ मिथिलाक माटि थिक। जे बीउ बोआएल गेल अछि ओ सत्यक, न्यायक, मानवीय गरिमाक, आ दलित-आवाजक बीउ थिक।
आ जे वृक्ष उगत — ओ मैथिली दलित साहित्यक वृक्ष होएत — जकर जड़ मिथिलाक माटिमे, शाखा आम्बेडकर आ भीमन्नाक विचारमे, आ पात विदेहक समानान्तर साहित्य आन्दोलनक ऊर्जासँ हरियर।
अनुलग्नक: १ मैथिलीक मूल आ अनूदित दलित गद्य-पद्य साहित्य लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त
प्रस्तावना: समीक्षा सिद्धान्तक आवश्यकता
कोनो भाषाक साहित्यक समीक्षा लेल एकटा सुसंगत सैद्धान्तिक ढाँचाक आवश्यकता होइत अछि। मैथिली साहित्यक समीक्षाक इतिहासमे पारम्परिक भारतीय सिद्धान्त (रस, अलंकार, ध्वनि, रीति, औचित्य) आधुनिक कालमे पाश्चात्य सिद्धान्त (मार्क्सवाद, नारीवाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्त) दुनूक प्रभाव देखाबैत अछि। मुदा एहि सभ सिद्धान्तक एकीकृत रूपमे प्रयोग करबाक प्रयास सीमित रहल अछि, विशेषतः दलित साहित्य, महिला साहित्य, अनूदित साहित्य जहिना विधाक क्षेत्रसभमे।
प्रस्तुत समीक्षा सिद्धान्तक उद्देश्य अछि—भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य सिद्धान्तक समन्वय करैत मैथिली मूल आ अनूदित गद्य-पद्य साहित्यक मूल्यांकन लेल एकटा व्यवस्थित ढाँचा प्रस्तुत करब। ई सिद्धान्त न तऽ पूर्णतः भारतीय अछि, न पूर्णतः पाश्चात्य; ई दुनूक संवादसँ निर्मित एकटा तृतीय मार्ग अछि—जे मैथिली साहित्यक विशिष्टता (भाषा, संस्कृति, क्षेत्रीय अस्मिता) केँ केन्द्रमे राखैत, वैश्विक सैद्धान्तिक विकाससँ संवाद करैत अछि।
प्रथम अध्याय: समीक्षा सिद्धान्तक आधारभूत तत्व
१.१ स्थानीयता आ सार्वभौमिकताक समन्वय
कोनो समीक्षा सिद्धान्तक पहिल चुनौती ई अछि जे ओ स्थानीय (मैथिली) साहित्यक विशिष्टता केँ सम्मान करय, मुदा सार्वभौमिक (भारतीय वा वैश्विक) साहित्यिक मानदण्डसँ संवाद करय। मैथिली साहित्यक विशिष्टता अछि:
- क्षेत्रीय भाषाक अस्मिता: मैथिली भारतक उनतालीस भाषासभमे सँ एकटा, जकर अपन हजार वर्षक साहित्यिक परम्परा अछि (विद्यापतिसँ वर्तमान धरि)।
- लोक आ शास्त्रक संगम: मैथिली साहित्यमे बिदापत नाच, सोहर, समदौनी, पगरी जहिना लोक-परम्परासभक गहिर उपस्थिति अछि।
- प्रवासक अनुभव: मैथिली भाषी सभक विस्थापन (प्रवास) दलित साहित्य, महिला साहित्य, आ अनूदित साहित्यक एकटा केन्द्रीय विषय अछि।
एहि विशिष्टता केँ केन्द्रमे राखैत, ई समीक्षा सिद्धान्त स्थानीय-सार्वभौमिक संवाद पर बल दैत अछि। अर्थात्, मैथिली साहित्यक मूल्यांकन लेल भारतीय सिद्धान्त (रस, ध्वनि, वक्रोक्ति) आ पाश्चात्य सिद्धान्त (उपनिवेशवाद-उत्तर, नारीवाद, उत्तर-आधुनिकतावाद) दुनूक प्रयोग करब, मुदा मैथिली साहित्यक स्थानीय सन्दर्भक अधीन राखि कऽ।
१.२ मूल आ अनूदित साहित्यक समानता आ अन्तर
ई समीक्षा सिद्धान्त मूल आ अनूदित साहित्यक बीच कोनो पदानुक्रम स्वीकार नै करत। दुनूक समान महत्व अछि, कारण:
- मैथिली अनुवाद साहित्य (जेना प्रस्तुत संकलनमे तेलुगु, गुजराती, उड़िया दलित साहित्यक अनुवाद) मैथिली साहित्यक दायराकेँ विस्तार करैत अछि।
- अनुवाद दोसरक आवाज (अन्यक स्वर) केँ मैथिली साहित्यमे स्थान दैत अछि—जे भारतीय साहित्यक बहुभाषीक स्वरूप लेल आवश्यक अछि।
- मुदा अनुवादक मूल्यांकन लेल अनुवाद-विशिष्ट मापदण्ड आवश्यक अछि: निष्ठा (निष्ठा) वा मुक्ति (स्वातन्त्र्य)क पुरान द्वन्द्वसँ बाहर निकलि कऽ, अनुवादक सर्जनात्मकता पर ध्यान देब।
१.३ गद्य आ पद्यक भिन्नता
ई समीक्षा सिद्धान्त गद्य आ पद्यक बीच स्पष्ट अन्तर स्वीकार करत:
- पद्य लेल भारतीय सिद्धान्त—रस, ध्वनि, अलंकार, छन्द—क अधिक उपयोगी अछि, कारण पद्यक संक्षिप्तता, लय, प्रतीकात्मकता एहि सिद्धान्तक अनुकूल अछि।
- गद्य (कहानी, उपन्यास, नाटक, निबन्ध) लेल पाश्चात्य सिद्धान्त—मार्क्सवाद, नारीवाद, उपनिवेशवाद-उत्तर—क अधिक उपयोगी अछि, कारण गद्य विस्तार, चरित्र-विकास, सामाजिक-राजनीतिक सन्दर्भ पर अधिक निर्भर अछि।
- मुदा ई विभाजन निरपेक्ष नै अछि; समीक्षक अपन विवेकसँ दुनूक संयोग करि सकैत अछि।
द्वितीय अध्याय: भारतीय सिद्धान्तक प्रयोग
२.१ रस सिद्धान्त
रस सिद्धान्त भारतीय साहित्यशास्त्रक केन्द्रबिन्दु अछि। एहि समीक्षा सिद्धान्तमे रसक प्रयोग निम्नलिखित तरिकासँ कएल जायत:
क. रसक नव रूप: शास्त्रीय नव रस (शृङ्गार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत, शान्त) मैथिली साहित्यमे उपलब्ध अछि, मुदा ओकर स्वरूप भिन्न अछि। उदाहरण लेल, दलित साहित्यमे रौद्रक आश्रय राजा-योद्धा नै, बल्कि दलित समुदाय अछि; शृङ्गारक विभाव प्रेमी-प्रेमिका नै, बल्कि श्रम-शरीर अछि।
ख. स्थायी भावक विस्तार: ई समीक्षा सिद्धान्त नव स्थायी भावक स्वीकार करत—श्रम, अभाव, प्रतिरोध, अस्मिता, प्रवास। ई सभ मैथिली साहित्यक विशिष्ट अनुभव अछि, आ ई सभ रसक परिणति पाबि सकैत अछि।
ग. साधारणीकरणक पुनर्विचार: शास्त्रीय रस सिद्धान्त साधारणीकरण (साधारणीकरण) पर बल दैत अछि। मुदा दलित साहित्य, महिला साहित्य, प्रवासी साहित्यमे विशिष्टता (विशिष्टता) केँ सम्मान करबाक आवश्यकता अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त साधारणीकरण आ विशिष्टताक द्वन्द्वकेँ समाधान करबाक लेल विशिष्ट-सार्वभौमिक (विशिष्ट-सार्वभौमिक)क अवधारणा प्रस्तावित करत—अर्थात्, विशिष्ट अनुभवकेँ सार्वभौमिक रूपमे प्रस्तुत नै करि, बल्कि विशिष्टक सार्वभौमिक महत्वकेँ स्थापित करब।
२.२ ध्वनि सिद्धान्त (आनन्दवर्धन)
ध्वनि सिद्धान्त व्यङ्ग्य (व्यञ्जित अर्थ) पर बल दैत अछि। मैथिली साहित्यक समीक्षामे ध्वनिक प्रयोग निम्नलिखित रूपमे होयत:
क. व्यङ्ग्यक स्तर: मैथिली कविता (विद्यापतिसँ वर्तमान धरि) व्यङ्ग्य पर अधिक निर्भर अछि। समीक्षककेँ अभिधा (शाब्दिक अर्थ), लक्षणा (रूपकात्मक अर्थ), आ व्यञ्जना (व्यञ्जित अर्थ)क भेद करबाक आवश्यकता अछि।
ख. ध्वनि आ अनुवाद: अनूदित साहित्यमे व्यङ्ग्यक अनुवाद सबसँ पैघ चुनौती अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त मानैत अछि जे अनुवादक व्यङ्ग्यकेँ यथासंभव बचाए राखबाक चाही, मुदा जतय संभव नै अछि, ओतय सर्जनात्मक अनुवाद (सर्जनात्मक अनुवाद) केँ स्वीकार करबाक चाही।
२.३ अलंकार सिद्धान्त
अलंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, आदि) भारतीय साहित्यक सौन्दर्यशास्त्रक अभिन्न अंग अछि। ई समीक्षा सिद्धान्तमे:
क. अलंकारक सामाजिकता: मैथिली दलित साहित्यमे अलंकार केवल अलंकरण (अलंकरण) लेल नै, बल्कि प्रतिरोधक साधनक रूपमे प्रयोग होइत अछि। उदाहरण लेल, साड़ीक कोर कवितामे मैसम्मा देवीक उपमा—ई व्यङ्ग्य सवर्ण-हिन्दू देवी-परम्पराक विपर्यास करैत अछि।
ख. लोक-अलंकार: मैथिली साहित्यमे लोक-अलंकार (लोक-अलंकरण)क अलग परम्परा अछि—जेना कहावत, मुहावरा, लोकोक्ति। ई सभकेँ शास्त्रीय अलंकारक समान मूल्य देनाइ आवश्यक अछि।
२.४ रीति सिद्धान्त (वामन)
रीति सिद्धान्त शैली (शैली) पर बल दैत अछि। मैथिली साहित्यमे:
क. मैथिलीक शैलीगत विशिष्टता: मैथिली भाषाक मधुरता, कोमलता, प्रवाह—ई सभ शैलीगत गुण अछि जे समीक्षामे ध्यान देबाक चाही।
ख. अनुवादमे शैली: अनूदित साहित्यमे मूलक शैली (स्रोत-शैली) आ लक्ष्यक शैली (लक्ष्य-शैली)क बीच सन्तुलन समीक्षाक महत्वपूर्ण मुद्दा अछि।
तृतीय अध्याय: पाश्चात्य सिद्धान्तक प्रयोग
३.१ उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्त
उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्त (एडवर्ड सईद, गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक, होमी के. भाभा, दीपेश चक्रवर्ती) मैथिली साहित्यक समीक्षाक लेल अत्यन्त उपयोगी अछि, कारण:
क. उपनिवेशक भाषा-नीति: मैथिली सदियों सँ उपनिवेशक भाषा (संस्कृत, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी, हिन्दी)क प्रभावमे रहल अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त पूछत: मैथिली साहित्य एहि उपनिवेशी दबावक सामना कइ प्रकारेँ करैत अछि? प्रतिरोधक रूप की अछि? समायोजनक रूप की अछि?
ख. सबाल्टर्न (निम्नवर्गीय)क आवाज: गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाकक प्रश्न—"केन सबाल्टर्न बाजि सकैत अछि? "—मैथिली दलित साहित्य, महिला साहित्य, प्रवासी साहित्यक समीक्षाक लेल मूलभूत अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त पूछत: मैथिली साहित्यमे सबाल्टर्न (दलित, महिला, प्रवासी, आदिवासी) के आवाज कइ प्रकारेँ प्रस्तुत अछि? के ओ आवाज मध्यस्थता (मध्यस्थता)सँ मुक्त अछि? यदि नै, तऽ ओ मध्यस्थता सशक्तीकरण (सशक्तीकरण) अछि वा पुनरुत्पादन (पुनरुत्पादन)?
ख. प्रान्तीयकरण: दीपेश चक्रवर्तीक प्रान्तीयकरण (यूरोपकेँ प्रान्तीय बनाब)क अवधारणा मैथिली साहित्यक समीक्षाक लेल प्रासंगिक अछि। मैथिली साहित्यकेँ क्षेत्रीय (क्षेत्रीय)क श्रेणीमे सीमित करबाक प्रवृत्तिक विरोध करैत, ई समीक्षा सिद्धान्त मैथिली साहित्यक वैश्विक महत्वकेँ स्थापित करबाक प्रयास करत।
३.२ नारीवादी सिद्धान्त
नारीवादी सिद्धान्त (वर्जीनिया वुल्फ, साइमोन द बोवा, जूडिथ बटलर) मैथिली साहित्यमे महिलाक अनुभव, शरीर, आवाज, प्रतिरोधक विश्लेषण लेल आवश्यक अछि।
क. स्त्री-लेखनक विश्लेषण: मैथिली साहित्यमे महिला लेखिकाक उपस्थिति बढ़ैत अछि (जेना—उषा किरण खान, सुभद्रा झा, आदि)। ई समीक्षा सिद्धान्त पूछत: महिला लेखिकाक स्वर पुरुष लेखकक स्त्री-चरित्रसँ कइ प्रकारेँ भिन्न अछि?
ख. शरीरक राजनीति: मैथिली साहित्यमे स्त्री-शरीरक प्रतिनिधित्व केन्द्रीय मुद्दा अछि। नारीवादी सिद्धान्तक सहायतासँ समीक्षक विश्लेषण करि सकैत अछि जे स्त्री-शरीर शृङ्गारक अलंकार अछि वा श्रमक दस्तावेज? वासनाक विषय अछि वा प्रतिरोधक स्थान?
ग. अन्तर्विच्छेदीयता (बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध): दलित नारीवाद (जेना—शैला देवी, बीमा भीम) जाति आ लिङ्गक दोहरा उत्पीड़नक विश्लेषण करैत अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त अन्तर्विच्छेदीयताकेँ केन्द्रमे राखैत अछि, अर्थात्—मैथिली साहित्यमे स्त्रीक अनुभव जाति, वर्ग, क्षेत्र, धर्मक सँगममे देखब।
३.३ मार्क्सवादी सिद्धान्त
मार्क्सवादी सिद्धान्त (कार्ल मार्क्स, जॉर्ज लुकाच, एंटोनियो ग्राम्सी) साहित्यक वर्ग-संघर्ष, आर्थिक-आधार, विचारधाराक विश्लेषण लेल उपयोगी अछि।
क. वर्ग-संघर्ष: मैथिली साहित्यमे जमीन्दार-किसान, मजूर-मालिक, सवर्ण-दलितक द्वन्द्व केन्द्रीय विषय अछि। मार्क्सवादी सिद्धान्त एहि द्वन्द्वक आर्थिक आधारक विश्लेषण करैत अछि।
ख. हेगेमोनी (प्रभुत्व): ग्राम्सीक हेगेमोनीक अवधारणा मैथिली साहित्यमे सवर्ण-वर्चस्वक सांस्कृतिक रूपक विश्लेषण लेल उपयोगी अछि। उदाहरण लेल, विद्यापतिकेँ ब्राह्मण घोषित करबाक प्रक्रिया—ई हेगेमोनीक कार्य अछि।
ग. बाजार-पूँजीवाद: अनूदित साहित्य, विशेषतः दलित साहित्यक अनुवाद, बाजार आ प्रकाशन-उद्योगक दबावमे आबि रहल अछि। मार्क्सवादी समीक्षा एहि आर्थिक-राजनीतिक सन्दर्भक विश्लेषण करैत अछि।
३.४ उत्तर-आधुनिकतावाद आ उत्तर-संरचनावाद
उत्तर-आधुनिकतावाद (ज्याँ-फ्राँस्वा ल्योतार) आ उत्तर-संरचनावाद (जाक देरिदा, मिशेल फूको) सत्य, पहिचान, लेखक, इतिहास जहिना अवधारणासभक अस्थिरता पर बल दैत अछि।
क. पहिचानक अस्थिरता: मैथिली साहित्यमे मैथिल पहिचान—भाषिक, सांस्कृतिक, क्षेत्रीय—स्वाभाविक नै, बल्कि निर्मित (निर्मित) अछि। उत्तर-आधुनिक समीक्षा एहि निर्माणक प्रक्रियाक विश्लेषण करैत अछि।
ख. लेखकक मृत्यु: देरिदाक लेखकक मृत्यु (लेखकक मृत्यु)क अवधारणा अनूदित साहित्यक समीक्षाक लेल विशेष रूपसँ प्रासंगिक अछि। अनुवादमे मूल-लेखक आ अनुवादकक बीचक सीमा धुंधला भऽ जाइत अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त लेखकक अवधारणाकेँ अनुवाद-प्रक्रियाक सन्दर्भमे पुनर्विचार करबाक प्रस्ताव करैत अछि।
ग. इतिहासक विखण्डन: फूकोक इतिहासक पुरातत्व (इतिहासक पुरातत्त्व) मैथिली साहित्यक इतिहास-लेखनक आलोचनात्मक पुनर्पाठ लेल उपयोगी अछि। उदाहरण लेल, विद्यापतिक जाति-निर्माणक इतिहास—ई इतिहास-लेखनक राजनीतिक विश्लेषणक माग करैत अछि।
चतुर्थ अध्याय: समीक्षा सिद्धान्तक व्यावहारिक ढाँचा
४.१ समीक्षाक स्तर
ई समीक्षा सिद्धान्त साहित्यिक कृतिक विश्लेषण लेल पाँच स्तर प्रस्तावित करत:
प्रथम स्तर: भाषिक विश्लेषण
- मैथिली भाषाक शैली, लय, शब्दावली, व्याकरणिक विशिष्टताक विश्लेषण।
- अनूदित साहित्यमे स्रोत भाषा (स्रोत-भाषा) आ लक्ष्य भाषा (लक्ष्य-भाषा)क बीच समानता आ अन्तरक विश्लेषण।
द्वितीय स्तर: शैलीगत विश्लेषण
- भारतीय सिद्धान्तक प्रयोग—रीति, अलंकार, गुण, दोष।
- पाश्चात्य सिद्धान्तक प्रयोग—शैली, आख्यान-तकनीक (आख्यान तकनीक), बिम्ब-विधान (बिम्ब-योजना), प्रतीक (प्रतीकशास्त्र)।
तृतीय स्तर: रस-ध्वनि विश्लेषण
- कृतिक स्थायी भावक पहिचान।
- विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी भावक विश्लेषण।
- व्यङ्ग्यक स्तरक पहिचान आ विश्लेषण।
- रस-निष्पत्तिक प्रक्रियाक मूल्यांकन।
चतुर्थ स्तर: सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण
- मार्क्सवादी सिद्धान्त—वर्ग-संघर्ष, आर्थिक-आधार, विचारधारा।
- नारीवादी सिद्धान्त—लिङ्ग-राजनीति, शरीरक राजनीति, अन्तर्विच्छेदीयता।
- उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्त—सबाल्टर्न आवाज, प्रान्तीयकरण, अनुवाद-राजनीति।
पञ्चम स्तर: आस्वादक विश्लेषण (सौन्दर्यात्मक विश्लेषण)
- सहृदयक दृष्टिसँ कृतिक आस्वादक अनुभव।
- दूरी (दूरी) आ निकटता (निकटता)क द्वन्द्व।
- पीड़ाक आस्वादक नैतिकता (नैतिकता क पीड़ाक आस्वाद)।
४.२ विधा-विशिष्ट विश्लेषण
क. कविता लेल:
- छन्द, लय, अन्त्यानुप्रास (तुक), तुक (लय)क विश्लेषण—भारतीय सिद्धान्तक अधिक प्रयोग।
- बिम्ब (बिम्ब), प्रतीक (प्रतीक), रूपक (रूपक)क विश्लेषण—पाश्चात्य सिद्धान्तक प्रयोग।
- व्यङ्ग्य (ध्वनि)क स्तरक पहिचान।
ख. कहानी आ उपन्यास (लघुकथा आ उपन्यास) लेल:
- आख्यान-तकनीक (आख्यान तकनीक)—सर्वज्ञ-आख्यान, प्रथम-पुरुष-आख्यान, बहु-आख्यान।
- चरित्र-विकास (चरित्र विकास)—गोल-चरित्र (बहुआयामी चरित्र), सपाट-चरित्र (एकरेखीय चरित्र), अस्तित्ववादी-चरित्र।
- कथानक (कथानक)—रेखीय (रैखिक), चक्रीय (चक्रीय), खण्डित (विखण्डित), प्रवाह-चेतना (चेतना-प्रवाह)।
- समय-संरचना (काल-संरचना)—कालक्रम, अकालक्रम, पुनर्स्मरण (पूर्वस्मृति), पूर्व-सूचन (पूर्वाभास)।
ग. नाटक लेल:
- रङ्गमञ्चीयता (रङ्गमञ्चीयता)—अभिनय, वाद्य, संवाद, दर्शक-सम्बन्ध।
- भारतीय नाट्यशास्त्रक सिद्धान्त—वृत्ति, प्रवृत्ति, पुरुष-प्रकृति, नायक-नायिका-भेद।
- पाश्चात्य नाट्य-सिद्धान्त—एपिक थियेटर (ब्रेख्त), एब्सर्ड थियेटर (बेकेट, इयोनेस्को), फेमिनिस्ट थियेटर।
घ. अनुवाद साहित्य (अनूदित साहित्य) लेल:
- स्रोत भाषा (स्रोत-भाषा) आ लक्ष्य भाषा (लक्ष्य-भाषा)क बीच समकक्षता (समतुल्यता)क स्तर।
- व्यङ्ग्यक अनुवाद—ध्वनिक हानि वा संरक्षण।
- सांस्कृतिक-अनुवाद (सांस्कृतिक अनुवाद)—स्थानीयताक वैश्विक सन्दर्भमे प्रस्तुति।
- अनुवादकक सर्जनात्मकता (सर्जनात्मकता)—निष्ठा (निष्ठा) आ मुक्ति (स्वातन्त्र्य)क सन्तुलन।
४.३ मैथिली साहित्यक विशिष्ट श्रेणीसभ
ई समीक्षा सिद्धान्त मैथिली साहित्यक निम्नलिखित विशिष्ट श्रेणीसभक स्वीकार करत:
क. लोक-साहित्य: बिदापत नाच, सोहर, समदौनी, पगरी, विवाह-गीत, चौरा-चौरी, झूमर—ई सभ विधाक विश्लेषण लेल लोक-सौन्दर्यशास्त्र (लोक सौन्दर्यशास्त्र)क विकास आवश्यक अछि।
ख. दलित साहित्य: मैथिली दलित साहित्य अपेक्षाकृत नव अछि, मुदा तेजीसँ बढ़ि रहल अछि। ई साहित्यक विश्लेषण लेल दलित सौन्दर्यशास्त्र (दलित सौन्दर्यशास्त्र)—दर्द, आक्रोश, प्रतिरोध, अस्मिता, संघर्ष—क अवधारणा आवश्यक अछि।
ग. महिला साहित्य (स्त्री-साहित्य): मैथिली महिला साहित्यमे स्त्री-शरीर, गृह-बाहिर, मातृत्व, वासना, प्रतिरोध जहिना विषय सभक विश्लेषण लेल नारीवादी सौन्दर्यशास्त्र (नारीवादी सौन्दर्यशास्त्र) आवश्यक अछि।
घ. प्रवासी साहित्य: मैथिली प्रवासी साहित्य (जे दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, आ प्रवासी देशसभमे लिखल जाइत अछि)क विश्लेषण लेल प्रवासी सौन्दर्यशास्त्र (प्रवासी सौन्दर्यशास्त्र)—बहुपहिचान, हाइब्रिडिटी, मूल-विस्थापन—क अवधारणा आवश्यक अछि।
पञ्चम अध्याय: समीक्षा सिद्धान्तक उदाहरणात्मक प्रयोग
५.१ उदाहरण: प्रस्तुत संकलनक समीक्षा
प्रस्तुत संकलन (मैथिलीमे अनूदित दलित साहित्य)क विश्लेषण निम्नलिखित स्तर पर होयत:
प्रथम स्तर: भाषिक विश्लेषण
- मैथिली अनुवादमे मूल तेलुगु, गुजराती, उड़िया भाषाक लय, शब्दावली, मुहावराकेँ कइ प्रकारेँ प्रस्तुत कएल गेल अछि?
- उर्दू शब्दसभ (जे तेलुगु तेलंगाना बोलीमे उपस्थित अछि)क मैथिली अनुवादमे कइ प्रकारेँ स्थानीयकरण (स्थानीयकरण) कएल गेल अछि?
द्वितीय स्तर: शैलीगत विश्लेषण
- कवितासभमे बिम्ब-विधान (जेना—जरैत खोपड़ी, साड़ीक कोर, मान्केनापुव्वु)क प्रयोग कइ प्रकारेँ दलित सौन्दर्यशास्त्रक निर्माण करैत अछि?
- कहानी ("कौआ", "कारी मसि")मे आख्यान-तकनीक (यथार्थवादी, प्रतीकात्मक, रूपकात्मक)क प्रयोग की अछि?
तृतीय स्तर: रस-ध्वनि विश्लेषण
- रौद्र, वीभत्स, करुण—ई तीन रसक स्थायी भावक पहिचान।
- शृङ्गारक विपर्यास—श्रम-शरीर, अभाव-शरीरक शृङ्गारक रूपमे प्रस्तुति।
- व्यङ्ग्यक स्तर—जरैत खोपड़ीक व्यङ्ग्य (दलित-अस्मिता, धर्म-राजनीति, पुनर्जन्म-विडम्बना)।
चतुर्थ स्तर: सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण
- वर्ग-संघर्ष—जमीन्दार-किसान, पूँजी-श्रमिकक द्वन्द्व।
- जाति-राजनीति—सवर्ण-दलितक द्वन्द्व, अस्पृश्यता, जाति-हिंसा।
- लिङ्ग-राजनीति—पितृसत्ता, स्त्री-शरीरक उत्पीड़न, दलित-स्त्रीक दोहरा उत्पीड़न।
- सबाल्टर्न आवाज—मादिग (चर्मकार), बण्डोडु, कलन्दर (भालू-नचबै बला) जहिना हाशियाकृत समुदायक प्रतिनिधित्व।
पञ्चम स्तर: आस्वादक विश्लेषण
- पीड़ाक आस्वाद—की पाठक दलित-पीड़ाक आस्वाद करि सकैत अछि? यदि करि सकैत अछि, तऽ ई आस्वादक नैतिकता की अछि?
- दूरी आ निकटता—दलित-पाठक आ गैर-दलित-पाठकक आस्वादक अनुभव भिन्न होइत अछि वा नै?
- रस-निष्पत्ति—की एहि साहित्यमे रसक निष्पत्ति भेल अछि, वा ई रसक सीमा पर ठोकर खाइत अछि?
षष्ठ अध्याय: समीक्षा सिद्धान्तक सीमा आ सम्भावना
६.१ सीमा (सीमासभ)
कोनो सिद्धान्त पूर्ण नै होइत अछि। ई समीक्षा सिद्धान्तक निम्नलिखित सीमा अछि:
क. समन्वयक कठिनाई: भारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्तक शब्दावली, अवधारणा, दर्शन भिन्न अछि। ओकर समन्वय हमेशा तनाव (तनाव) सृजना करैत अछि। ई सिद्धान्त ओहि तनावकेँ दमन नै करैत, बल्कि सर्जनात्मक रूपमे प्रयोग करबाक सुझाव दैत अछि।
ख. मैथिली साहित्यक विविधता: मैथिली साहित्य विद्यापतिसँ वर्तमान धरि अपार विविधतासँ भरल अछि—महाकाव्य, पद्यावली, लोक-नाट्य, आधुनिक कविता, उपन्यास, कहानी, दलित-लेखन, महिला-लेखन, प्रवासी-लेखन। एकटा सिद्धान्त सभ विधाक पूर्ण व्याख्या करि सकय, ई दावा करब अनुचित अछि। ई सिद्धान्त लचीलापन (लचीलापन) पर बल दैत अछि—समीक्षक अपन विवेकसँ सिद्धान्तक प्रयोग करत।
ग. अनुवादक विशिष्टता: अनूदित साहित्यक समीक्षा लेल मूल आ अनुवादक दुनूक ज्ञान आवश्यक अछि। मुदा सभ समीक्षक बहुभाषी नै होइत अछि। ई सिद्धान्त अनुवाद-समीक्षाक सीमाकेँ स्वीकार करैत अछि, आ सहयोगात्मक समीक्षा (सहयोगात्मक समीक्षा)क सम्भावना खोजैत अछि।
६.२ सम्भावना (सम्भावनासभ)
क. अन्तःविषयकता: ई समीक्षा सिद्धान्त साहित्यकेँ इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति-विज्ञान, दर्शन, भाषा-विज्ञानसँ जोड़ैत अछि। ई अन्तःविषयक दृष्टि मैथिली साहित्यक बहु-आयामी (बहुआयामी) विश्लेषणक सम्भावना खोलैत अछि।
ख. तुलनात्मक साहित्य: ई सिद्धान्त मैथिली साहित्यक अन्य भारतीय भाषाक साहित्य (तेलुगु, गुजराती, उड़िया, बंगला, हिन्दी) आ वैश्विक साहित्यसँ तुलनात्मक अध्ययनक सम्भावना खोलैत अछि।
ग. अनुवाद-अध्ययन: ई सिद्धान्त अनुवादकेँ गौण (गौण) नै, बल्कि सर्जनात्मक (सर्जनात्मक) विधाक रूपमे स्थापित करैत अछि। ई अनुवाद-समीक्षाक विकासक सम्भावना खोलैत अछि।
घ. सिद्धान्तक स्थानीयकरण: ई सिद्धान्त पाश्चात्य सिद्धान्तक स्वीकार आ आलोचना दुनूक प्रस्ताव करैत अछि—उपनिवेशवाद-उत्तर (उपनिवेशवाद-उत्तर) सिद्धान्तक प्रयोग करैत, मुदा यूरोकेन्द्रिक (यूरोप-केन्द्रित) प्रवृत्तिक आलोचना सेहो करैत अछि।
निष्कर्ष: समीक्षा सिद्धान्तक भविष्य
ई समीक्षा सिद्धान्त भारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्तक समन्वयक प्रयास अछि, मुदा ई समन्वय अन्तर्विरोधसँ मुक्त नै अछि। ई अन्तर्विरोध सिद्धान्तक दुर्बलता नै, बल्कि शक्ति अछि—कारण ई साहित्यक जटिलताक स्वीकार करैत अछि, ओकरा सरल करबाक प्रयास नै करैत।
मैथिली साहित्य, अपन हजार वर्षक इतिहास, अपन लोक-शास्त्र-संगम, अपन प्रवास-अनुभव, अपन दलित-महिला-आवाजक उदय—एहि सभ विशिष्टता लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्तक आवश्यकता अछि जे स्थानीय (स्थानीय) केँ केन्द्रमे राखैत, वैश्विक (वैश्विक)सँ संवाद करय। ई सिद्धान्त ओहि आवश्यकताक उत्तर देबाक प्रयास अछि।
ई सिद्धान्त अन्तिम सत्यक दावा नै करत; ई प्रारम्भिक बिन्दु अछि। ई मैथिली साहित्यक समीक्षाक नव द्वार खोलैत अछि—जतय रस आ दर्द, ध्वनि आ प्रतिरोध, अलंकार आ हाइब्रिडिटी, शान्त आ संघर्षक संवाद संभव होइत अछि।
समीक्षकक अन्तिम टिप्पणी: कोनो समीक्षा सिद्धान्त जीवित तखन होइत अछि, जखन ओ विकसित (विकसित होब) होइत रहैत अछि, प्रश्न करैत रहैत अछि, नव साहित्यिक अनुभवक सामना करैत रहैत अछि। ई सिद्धान्त ओहि विकासक आमन्त्रण अछि। मैथिली साहित्यक भविष्यक समीक्षा एहि आमन्त्रणक प्रतिक्रिया देति रहत।
परिशिष्ट: समीक्षा सिद्धान्तक संक्षिप्त रूपरेखा
विश्लेषण स्तर
भारतीय सिद्धान्त
पाश्चात्य सिद्धान्त
मैथिली विशिष्टता
भाषिक
शब्द-शक्ति, व्याकरण
स्टाइलिस्टिक्स, लिंग्विस्टिक्स
मैथिली उच्चारण, मुहावरा
शैलीगत
रीति, अलंकार, गुण, दोष
नैरेटोलॉजी, इमेजरी, सिंबोलिज्म
लोक-अलंकार, कहावत
रस-ध्वनि
रस, ध्वनि, व्यङ्ग्य
फेनोमेनोलॉजी, हर्मेन्यूटिक्स
दलित-रस, प्रवास-रस
सामाजिक
-
मार्क्सवाद, नारीवाद, पोस्टकोलोनियल
जाति-लिङ्ग-वर्ग-प्रवास
आस्वादक
सहृदय, व्युत्पत्ति
रिसेप्शन थ्योरी, रीडर-रेस्पॉन्स
दलित-पाठक, गैर-दलित-पाठक
ई रूपरेखा समीक्षककेँ लचीलापन दैत अछि—अपन विवेकसँ स्तर आ सिद्धान्तक चयन करबाक स्वतन्त्रता।
दलित साहित्य लेल समीक्षा सिद्धान्त: भारतीय आ पाश्चात्य साहित्य सिद्धान्तक आधार पर मैथिली मूल आ अनूदित दलित गद्य-पद्य साहित्यक विशिष्ट समीक्षा हेतु
प्रस्तावना: दलित साहित्यक समीक्षाक विशिष्ट आवश्यकता
दलित साहित्य केवल साहित्यक विधा नै अछि; ई एकटा आन्दोलन अछि, प्रतिरोधक एकटा घोषणापत्र अछि। ई दर्द (पीड़ा), आक्रोश (आक्रोश), अस्मिता (अस्मिता), संघर्ष (संघर्ष) केँ अपन केन्द्रबिन्दु बनाबैत अछि। एहि कारण, दलित साहित्यक समीक्षा लेल सामान्य साहित्यिक सिद्धान्त अपर्याप्त अछि। एकटा विशिष्ट समीक्षा सिद्धान्तक आवश्यकता अछि—जे दलित साहित्यक विशिष्टता (विशिष्टता) केँ स्वीकार करय, ओकर राजनीति (राजनीति) केँ समझय, आ ओकर सौन्दर्यशास्त्र (सौन्दर्यशास्त्र) केँ रस सिद्धान्तक परम्परासँ संवाद कराबय।
प्रस्तुत सिद्धान्त भारतीय (रस, ध्वनि, अलंकार, रीति, औचित्य) आ पाश्चात्य (मार्क्सवाद, नारीवाद, उपनिवेशवाद-उत्तर, दलित-आन्दोलन सिद्धान्त, उत्तर-आधुनिकतावाद) सिद्धान्तक समन्वय करैत, मैथिली मूल आ अनूदित दलित गद्य-पद्य साहित्यक समीक्षा लेल एकटा फाइन-ट्यून्ड ढाँचा प्रस्तुत करैत अछि।
प्रथम अध्याय: दलित साहित्यक विशिष्टता—सैद्धान्तिक आधार
१.१ दलित सौन्दर्यशास्त्रक आधारभूत तत्व
दलित साहित्यक सौन्दर्यशास्त्र शास्त्रीय सौन्दर्यशास्त्रसँ मूलतः भिन्न अछि। शास्त्रीय सौन्दर्यशास्त्र (रस, अलंकार, ध्वनि) सहृदयक आस्वाद पर केन्द्रित अछि; दलित सौन्दर्यशास्त्र दलित-अनुभवक प्रामाणिकता (प्रामाणिकता) पर केन्द्रित अछि। ई सिद्धान्त निम्नलिखित दलित-विशिष्ट अवधारणासभक स्वीकार करत:
क. दर्द (पीड़ा) स्थायी भावक रूपमे: शास्त्रीय रस सिद्धान्तमे करुण (करुणा)क स्थायी भाव शोक (शोक) अछि। मुदा दलित साहित्यमे शोक नै, दर्द—जे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, ऐतिहासिक—सब स्तर पर व्याप्त अछि। ई सिद्धान्त दर्दकेँ स्थायी भावक रूपमे स्वीकार करत, आ ओकर रस-परिणतिक सम्भावना खोजत।
ख. आक्रोश रौद्रक विस्तारक रूपमे: शास्त्रीय रौद्र (उग्र क्रोध)क स्थायी भाव क्रोध अछि, आ ओकर आश्रय राजा-योद्धा (असुर-दैत्य-वध) अछि। दलित साहित्यमे आक्रोशक आश्रय दलित समुदाय अछि, आ ओकर विषय जाति-व्यवस्था अछि। ई सिद्धान्त आक्रोशकेँ रौद्रक विस्तार (आ नव रूप)क रूपमे स्वीकार करत।
ग. अस्मिता वीरक नव रूपक रूपमे: शास्त्रीय वीर (वीर)क स्थायी भाव उत्साह अछि, आ ओकर आश्रय राजा-क्षत्रिय-योद्धा अछि। दलित साहित्यमे अस्मिताक उत्साह दलित-पहिचानक पुनर्निर्माण (पुनर्दावा) अछि। ई सिद्धान्त अस्मिताकेँ वीरक नव रूपक रूपमे स्वीकार करत।
घ. संघर्ष रसक नव रूपक रूपमे: श्रम, अभाव, प्रतिरोध, प्रवास—ई सभ स्थायी भाव शास्त्रीय रसक कोनो श्रेणीमे सीधा नै अबैत अछि। ई सिद्धान्त ई सभकेँ नव स्थायी भावक रूपमे स्वीकार करत, आ ओकर रस-परिणति (श्रम-रस, अभाव-रस, प्रतिरोध-रस, प्रवास-रस)क सम्भावना खोजत।
१.२ दलित साहित्यक सामाजिक-राजनीतिक आधार
क. जाति-व्यवस्थाक केन्द्रीयता: दलित साहित्यक समीक्षा लेल जाति-व्यवस्था केन्द्रीय श्रेणी अछि। वर्ग (वर्ग), लिङ्ग (लिंग), क्षेत्र (क्षेत्र) सभ महत्वपूर्ण अछि, मुदा जाति (जाति) दलित साहित्यक मूल-संरचना (प्राथमिक संरचना) अछि।
ख. अस्पृश्यताक अनुभव: अस्पृश्यता (अस्पृश्यता) केवल सामाजिक नै, मानसिक, शारीरिक, आध्यात्मिक—सब स्तर पर दलित-अनुभवक केन्द्रीय तत्व (केन्द्रीय तत्त्व) अछि। दलित साहित्यक समीक्षामे अस्पृश्यताक सौन्दर्यशास्त्र (अस्पृश्यताक सौन्दर्यशास्त्र)क विकास आवश्यक अछि।
ग. बहिष्कारक राजनीति: दलित साहित्य बहिष्कार (बहिष्करण)क दस्तावेज अछि—शिक्षासँ, धर्मसँ, समाजसँ, इतिहाससँ, साहित्यसँ। दलित साहित्यक समीक्षा एहि बहिष्कारक संरचना (संरचना) आ प्रतिरोधक रणनीति (रणनीति)क विश्लेषण करत।
घ. दलित-इतिहासक पुनर्लेखन: दलित साहित्य इतिहास (इतिहास)केँ पुनः लिखबाक (पुनर्लेखन) प्रयास अछि—सवर्ण-इतिहास-लेखनक विरुद्ध (विरुद्ध) आ दलित-दृष्टि (दलित दृष्टिकोण)सँ इतिहासक पुनर्निर्माण (पुनर्निर्माण)। दलित साहित्यक समीक्षा एहि इतिहास-लेखनक राजनीति (इतिहासलेखनक राजनीति)क विश्लेषण करत।
द्वितीय अध्याय: दलित साहित्य लेल भारतीय सिद्धान्तक फाइन-ट्यूनिंग
२.१ रस सिद्धान्तक दलित-पुनर्पाठ
क. दर्द-रस (पीड़ा रस)क प्रस्तावना
शास्त्रीय रस सिद्धान्तमे दर्द (पीड़ा) केवल करुण (करुणा)क अनुभाव (परिणाम) अछि, स्थायी भाव (स्थायी भाव) नै। दलित साहित्यक अनुभवसँ ई सिद्धान्त दर्दकेँ स्थायी भावक रूपमे स्वीकार करैत अछि:
- स्थायी भाव: दर्द (पीड़ा)
- विभाव (विभाव): जाति-हिंसा, अस्पृश्यता, भूख, बेरोजगारी, प्रवास, शोषण, अपमान, बहिष्कार
- अनुभाव (अनुभाव): आँसु, विलाप, शरीरक पीड़ा, मौन, क्रोध, प्रतिरोध, एकाकीपन, आत्म-हत्या
- व्यभिचारी भाव (सञ्चारी भाव): निराशा, आशा, क्रोध, भय, घृणा, लज्जा, गर्व, उत्साह
- रस-निष्पत्ति: दर्द-रस
ख. आक्रोश-रस (आक्रोश रस)क प्रस्तावना
शास्त्रीय रौद्र (उग्र क्रोध) दलित साहित्यक आक्रोश (आक्रोश)क पूर्ण व्याख्या नै करि सकैत, कारण रौद्रक आश्रय (कर्ता-विषय) राजा-योद्धा अछि, आक्रोशक आश्रय दलित समुदाय। ई सिद्धान्त आक्रोश-रसक प्रस्ताव करैत अछि:
- स्थायी भाव: आक्रोश
- विभाव: जाति-अपमान, शोषण, अत्याचार, न्याय-विहीनता, ऐतिहासिक अन्याय
- अनुभाव: चीत्कार, प्रतिरोध-गीत, संघर्ष-आन्दोलन, लेखन-क्रान्ति, आत्म-साक्ष्य
- व्यभिचारी भाव: क्रोध, घृणा, उत्साह, साहस, भय, आशा, निराशा
- रस-निष्पत्ति: आक्रोश-रस
ग. अस्मिता-रस (अस्मिता रस)क प्रस्तावना
शास्त्रीय वीर (वीर) दलित साहित्यक अस्मिता (अस्मिता)क पूर्ण व्याख्या नै करि सकैत, कारण वीरक आश्रय क्षत्रिय-योद्धा अछि, अस्मिताक आश्रय दलित-पुनर्जागरण (दलित पुनर्जागरण)। ई सिद्धान्त अस्मिता-रसक प्रस्ताव करैत अछि:
- स्थायी भाव: अस्मिता
- विभाव: दलित-इतिहासक पुनर्खोज, दलित-प्रतीकक पुनर्स्थापना, दलित-भाषाक पुनर्निर्माण
- अनुभाव: गर्व, आत्म-विश्वास, साहस, संघर्ष, एकता, संगठन
- व्यभिचारी भाव: उत्साह, गर्व, क्रोध, आशा, निराशा, संकल्प
- रस-निष्पत्ति: अस्मिता-रस
घ. संघर्ष-रस (संघर्ष रस)क प्रस्तावना
श्रम, अभाव, प्रतिरोध, प्रवास—ई सभ स्थायी भाव दलित साहित्यक केन्द्रीय अनुभव अछि। ई सिद्धान्त संघर्ष-रसक प्रस्ताव करैत अछि:
- स्थायी भाव: संघर्ष
- विभाव: श्रम, अभाव, प्रतिरोध, प्रवास, जीविका-संघर्ष
- अनुभाव: श्रम-गीत, प्रतिरोध-गीत, प्रवास-गीत, शरीरक थकावट, संघर्षक आँसु
- व्यभिचारी भाव: निराशा, आशा, क्रोध, उत्साह, भय, साहस
- रस-निष्पत्ति: संघर्ष-रस
२.२ ध्वनि सिद्धान्तक दलित-पुनर्पाठ
ध्वनि सिद्धान्त (आनन्दवर्धन) व्यङ्ग्य (व्यञ्जित अर्थ) पर बल दैत अछि। दलित साहित्यमे व्यङ्ग्यक तीन स्तर विशेष रूपसँ महत्वपूर्ण अछि:
क. व्यङ्ग्यक प्रथम स्तर—शाब्दिक व्यङ्ग्य: शब्दक शाब्दिक (शाब्दिक) अर्थ आ व्यङ्ग्य (व्यञ्जित) अर्थक बीचक अन्तर। उदाहरण लेल, "हमर पैतृक अधिकार" कवितामे कब्रिस्तान खननाइ—शाब्दिक अर्थ अछि मुर्दा-खोदाइ, व्यङ्ग्य अर्थ अछि अधिकार-खोज।
ख. व्यङ्ग्यक द्वितीय स्तर—पौराणिक व्यङ्ग्य: पुराण-इतिहासक प्रतीकसभक दलित-दृष्टिसँ पुनर्पाठ। उदाहरण लेल, "हमर पैतृक अधिकार" कवितामे व्यास, अरुन्धती, मत्स्यगन्धी—ई सभ पौराणिक चरित्रक दलित-दृष्टिसँ पुनर्व्याख्या।
ग. व्यङ्ग्यक तृतीय स्तर—वैचारिक व्यङ्ग्य: जाति-व्यवस्था, धर्म, राजनीति, इतिहास—ई सभ विचारधारा (विचारधारा)क दलित-दृष्टिसँ व्यङ्ग्य। उदाहरण लेल, "जरैत खोपड़ी सभ" कवितामे पुनर्जन्मक अवधारणाक व्यङ्ग्य—धर्मक आवरणमे जाति-हिंसाक स्थापना।
२.३ अलंकार सिद्धान्तक दलित-पुनर्पाठ
अलंकार केवल अलंकरण (अलंकरण) नै, दलित साहित्यमे प्रतिरोधक हथियार अछि:
क. विपर्यास-अलंकार (उलट-अलंकार): शास्त्रीय अलंकारक दलित-विपर्यास। उदाहरण लेल, साड़ीक कोर कवितामे मैसम्मा देवीक उपमा—ई उपमा-अलंकारक विपर्यास अछि, जतय देवी (शास्त्रीय आदर्श)क श्रम-शरीर (दलित-यथार्थ)मे परिणत कएल गेल अछि।
ख. लोक-अलंकार: शास्त्रीय अलंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, आदि)क संग-संग लोक-अलंकार—कहावत, मुहावरा, लोकोक्ति, पहेली, लोक-गीतक अलंकार—केँ समान मूल्य देनाइ। उदाहरण लेल, "गुड़-पीटल पाथर जकाँ अचल" (सदा लेल मित्र उपन्यासमे)—ई लोक-अलंकार अछि।
ग. अभाव-अलंकार (अनुपस्थिति-अलंकार): अभाव (अनुपस्थिति) केँ अलंकारक रूपमे प्रयोग। उदाहरण लेल, "लोक, जमि जाय" कवितामे खालीपन, पाथर, कङ्कड़—ई सभ अभावक प्रतीक अछि, जे अभाव-अलंकारक रूपमे प्रयोग भेल अछि।
२.४ रीति सिद्धान्तक दलित-पुनर्पाठ
रीति सिद्धान्त (वामन) शैली (शैली) पर बल दैत अछि। दलित साहित्यक शैलीगत विशिष्टता:
क. प्रतिरोधक शैली (प्रतिरोध-शैली): शास्त्रीय माधुर्य-गुण (माधुर्य) वा ओज-गुण (ओज)क विपरीत, दलित साहित्यक शैली तीक्ष्ण, कर्कश, अश्लील, विद्रोही होइत अछि। ई शैली शास्त्रीय-शैलीक दलित-विपर्यास अछि।
ख. साक्षी-शैली (साक्ष्य-शैली): दलित साहित्यक शैली साक्षी (साक्ष्य)क शैली अछि—आत्म-कथा, अनुभव-कथा, दस्तावेज-कथा। ई शैली व्यक्तिगत (व्यक्तिगत) आ सामूहिक (सामूहिक)क बीच सीमा-रेखा मिटाबैत अछि।
ग. लोक-शैली: दलित साहित्यक शैली लोक-भाषा, लोक-गीत, लोक-कथा, लोक-नाट्यसँ गहिर रूपसँ जुड़ल अछि। ई लोक-शैली शास्त्रीय-शैलीक दलित-प्रतिरोध अछि।
तृतीय अध्याय: दलित साहित्य लेल पाश्चात्य सिद्धान्तक फाइन-ट्यूनिंग
३.१ उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्तक दलित-पुनर्पाठ
क. सबाल्टर्न (निम्नवर्गीय)क दलित-पुनर्पाठ: गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाकक प्रश्न—"केन सबाल्टर्न बाजि सकैत अछि? "—दलित साहित्यक समीक्षाक लेल मूलभूत अछि। दलित साहित्य सबाल्टर्न (उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्तक श्रेणी) आ दलित (भारतीय जाति-व्यवस्थाक श्रेणी)क बीच तनाव (तनाव) केँ प्रकट करैत अछि। ई सिद्धान्त पूछत: दलित साहित्यमे सबाल्टर्नक आवाज मध्यस्थता (मध्यस्थता)सँ मुक्त अछि वा नै? यदि मुक्त नै अछि, तऽ ओ मध्यस्थता सशक्तीकरण (सशक्तीकरण) अछि वा पुनरुत्पादन (पुनरुत्पादन)?
ख. प्रान्तीयकरणक दलित-पुनर्पाठ: दीपेश चक्रवर्तीक प्रान्तीयकरण (यूरोपकेँ प्रान्तीय बनाब)क अवधारणा दलित साहित्यक समीक्षाक लेल प्रासंगिक अछि। दलित साहित्य सवर्ण-साहित्य (ब्राह्मणवादी साहित्य)केँ प्रान्तीय (प्रान्तीय) सिद्ध करबाक प्रयास अछि—जे सार्वभौमिक (सार्वभौमिक)क दावा करैत अछि, मुदा वास्तवमे जाति-विशिष्ट (जाति-विशिष्ट) अछि। दलित साहित्यक समीक्षा एहि सार्वभौमिक-दावाक विखण्डन (विखण्डन) करैत अछि।
ग. हाइब्रिडिटी (संकरता)क दलित-पुनर्पाठ: होमी के. भाभाक हाइब्रिडिटी (संकरता) दलित साहित्यक पहिचान-राजनीति (अस्मिता-राजनीति)क विश्लेषण लेल उपयोगी अछि। दलित साहित्य सवर्ण-संस्कृति आ दलित-संस्कृतिक बीच हाइब्रिड स्थान पर खड़ा अछि—न त पूर्णतः सवर्ण-आत्मसात (आत्मसात), न पूर्णतः दलित-मुक्त (मुक्त)। ई हाइब्रिडिटी दलित साहित्यक तनाव (तनाव) आ रचनात्मकता (सर्जनात्मकता)क स्रोत अछि।
३.२ दलित-नारीवाद (दलित नारीवाद)क सिद्धान्तक प्रयोग
क. अन्तर्विच्छेदीयता (बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध): दलित-नारीवाद (जेना—शैला देवी, बीमा भीम, जे. सुभद्रा, विनोदिनी) जाति आ लिङ्गक दोहरा उत्पीड़नक विश्लेषण करैत अछि। दलित साहित्यक समीक्षा लेल अन्तर्विच्छेदीयता (बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध) केन्द्रीय श्रेणी अछि—जे जाति, लिङ्ग, वर्ग, क्षेत्र, धर्मक संगम (संगम) पर दलित-स्त्रीक अनुभवक विश्लेषण करत।
ख. शरीरक राजनीति (देह-राजनीति): दलित-स्त्री-शरीर शास्त्रीय-शृङ्गारक अलंकार नै, श्रमक दस्तावेज अछि। दलित साहित्यक समीक्षा शरीरक राजनीतिक विश्लेषण करत—शरीर कइ प्रकारेँ जाति-व्यवस्थाक निशान (चिह्न) बनि जाइत अछि? शरीर कइ प्रकारेँ प्रतिरोधक स्थान (स्थल) बनि जाइत अछि?
ग. दलित-स्त्री-स्वर (दलित-स्त्री स्वर): दलित-स्त्री-स्वर दलित-स्वर आ स्त्री-स्वरक बीच एकटा तृतीय-स्थान (तृतीय स्थान) अछि—जे दलित-पुरुष-स्वरसँ भिन्न अछि, आ सवर्ण-स्त्री-स्वरसँ सेहो भिन्न अछि। दलित साहित्यक समीक्षा एहि तृतीय-स्थानक विशिष्टता (विशिष्टता)क विश्लेषण करत।
३.३ मार्क्सवादी सिद्धान्तक दलित-पुनर्पाठ
क. वर्ग आ जातिक द्वन्द्व: मार्क्सवादी सिद्धान्त वर्ग-संघर्ष (वर्ग-संघर्ष) पर बल दैत अछि। दलित साहित्य वर्ग-संघर्षक जाति-संघर्ष (जाति-संघर्ष)क रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। दलित साहित्यक समीक्षा वर्ग आ जातिक बीच संवाद (संवाद) आ तनाव (तनाव)क विश्लेषण करत।
ख. हेगेमोनी (प्रभुत्व)क दलित-पुनर्पाठ: ग्राम्सीक हेगेमोनी (प्रभुत्व) दलित साहित्यक सवर्ण-वर्चस्व (ब्राह्मणवादी प्रभुत्व)क सांस्कृतिक रूपक विश्लेषण लेल उपयोगी अछि। उदाहरण लेल, विद्यापतिकेँ ब्राह्मण घोषित करबाक प्रक्रिया—ई हेगेमोनीक सांस्कृतिक कार्य अछि। दलित साहित्य ओहि हेगेमोनीक विरुद्ध (विरुद्ध) लिखल जाइत अछि।
ग. बाजार-पूँजीवादक दलित-समीक्षा: दलित साहित्यक प्रकाशन-उद्योग (प्रकाशन-उद्योग), बाजार (बाजार), पुरस्कार (पुरस्कार)क राजनीति (राजनीति)क समीक्षा आवश्यक अछि। मार्क्सवादी समीक्षा पूछत: दलित साहित्य बाजारक दबावमे सर्जनात्मकता (सर्जनात्मकता) खोइ रहल अछि वा नै? पुरस्कार सशक्तीकरण (सशक्तीकरण) अछि वा सह-विकल्प (सह-विकल्पन)?
३.४ दलित-आन्दोलन सिद्धान्त (दलित आन्दोलन सिद्धान्त)
*क. जोतिराव फुलेक गुलामगिरी (गुलामगिरी)क परम्परा: फुलेक गुलामगिरी (1873) दलित साहित्यक आधार-ग्रन्थ (आधार-ग्रन्थ) अछि। दलित साहित्यक समीक्षा गुलामगिरीसँ शुरू भऽ वर्तमान दलित साहित्य धरिक सातत्य (सातत्य) आ परिवर्तन* (परिवर्तन)क विश्लेषण करत।
*ख. डॉ. बी. आर. अम्बेडकरक बौद्धिक परम्परा (बौद्धिक परम्परा): अम्बेडकरक बौद्धिक परम्परा—जाति-विच्छेद (जाति-विच्छेद), बौद्ध-धर्म-परिवर्तन (बौद्ध धर्म-परिवर्तन), संविधान-निर्माण (संविधान-निर्माण)—दलित साहित्यक वैचारिक आधार (वैचारिक आधार) अछि। दलित साहित्यक समीक्षा एहि बौद्धिक परम्पराक साहित्यिक* रूपक विश्लेषण करत।
*ग. दलित-पैंथर (दलित पैंथर्स)क प्रतिरोध-साहित्य (प्रतिरोध-साहित्य): 1970 क दशकक दलित-पैंथर आन्दोलन दलित साहित्यक आक्रोश-शैली (आक्रोश शैली)क निर्माण (निर्माण)मे मूलभूत भूमिका निभौलनि। दलित साहित्यक समीक्षा दलित-पैंथरसँ वर्तमान दलित साहित्य धरिक निरन्तरता (सातत्य) आ विच्छेद* (विच्छेद)क विश्लेषण करत।
चतुर्थ अध्याय: दलित साहित्य लेल समीक्षा सिद्धान्तक व्यावहारिक ढाँचा
४.१ दलित साहित्यक समीक्षाक स्तर
प्रथम स्तर: जाति-विश्लेषण
- कृतिक जाति-संरचना (जाति संरचना)क पहिचान—पात्र (चरित्रसभ) के जाति की अछि? कथानक (कथानक) जाति-सम्बन्धक कइ प्रकारेँ प्रतिनिधित्व करैत अछि? लेखक (लेखक)क जाति-स्थिति (जाति स्थिति) कृतिक दृष्टि (दृष्टिकोण)केँ कइ प्रकारेँ निर्धारित करैत अछि?
- अस्पृश्यता (अस्पृश्यता), जाति-हिंसा (जाति-हिंसा), जाति-भेद (जाति भेदभाव)क सौन्दर्यशास्त्र (सौन्दर्यशास्त्र)क विश्लेषण।
द्वितीय स्तर: दलित-सौन्दर्यशास्त्र (दलित सौन्दर्यशास्त्र) विश्लेषण
- दर्द (पीड़ा), आक्रोश (आक्रोश), अस्मिता (अस्मिता), संघर्ष (संघर्ष)—ई सभ स्थायी भावक रस-परिणति (रस-निष्पत्ति)क विश्लेषण।
- प्रतिरोध-शैली (प्रतिरोध-शैली), साक्षी-शैली (साक्ष्य-शैली), लोक-शैली (लोक-शैली)क विश्लेषण।
- विपर्यास-अलंकार (उलट-अलंकार), अभाव-अलंकार (अनुपस्थिति-अलंकार), लोक-अलंकार (लोक-अलंकार)क विश्लेषण।
तृतीय स्तर: सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण
- जाति-राजनीति (जाति राजनीति): सवर्ण-दलित द्वन्द्व, आरक्षण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, दलित-आन्दोलन।
- वर्ग-राजनीति (वर्ग राजनीति): जमीन्दार-किसान, पूँजी-श्रमिक, आर्थिक शोषण।
- लिङ्ग-राजनीति (लिंग राजनीति): दलित-स्त्रीक दोहरा उत्पीड़न, शरीरक राजनीति, दलित-नारीवाद।
- प्रवास-राजनीति (प्रवास राजनीति): प्रवासक अर्थशास्त्र, प्रवासक मनोविज्ञान, प्रवासक अस्मिता।
चतुर्थ स्तर: ऐतिहासिक-अभिलेखीय विश्लेषण
- दलित-इतिहासक पुनर्लेखन (पुनर्लेखन)क प्रक्रियाक विश्लेषण।
- सवर्ण-इतिहास-लेखन (ब्राह्मणवादी इतिहासलेखन)क विखण्डन (विखण्डन)।
- मौन-इतिहास (मौन इतिहास)क पुनर्निर्माण (पुनर्निर्माण)—जे लिखित-इतिहास (लिखित इतिहास)मे अनुपस्थित अछि, ओकर लोक-इतिहास (लोक इतिहास), मौखिक-इतिहास (मौखिक इतिहास), दलित-इतिहास (दलित इतिहास)क पुनर्पाठ (पुनर्पाठ)।
पञ्चम स्तर: आस्वाद-राजनीति विश्लेषण (सौन्दर्य-अनुभवक राजनीति)
- दलित-पाठक (दलित पाठक) आ गैर-दलित-पाठक (गैर-दलित पाठक)क आस्वादक अनुभव भिन्न अछि वा नै?
- दर्दक आस्वाद (पीड़ाक आस्वाद)क नैतिकता (नैतिकता) की अछि? पीड़ाक सौन्दर्यीकरण (पीड़ाक सौन्दर्यीकरण) उत्पीड़नक पुनरुत्पादन (उत्पीड़नक पुनरुत्पादन) तँ नै अछि?
- सहृदय (सहानुभूतिशील पाठक)क अवधारणा दलित-सन्दर्भ (दलित सन्दर्भ)मे कइ प्रकारेँ पुनर्परिभाषित (पुनर्परिभाषित) करबाक चाही?
४.२ दलित साहित्यक विधा-विशिष्ट विश्लेषण
क. दलित कविता लेल:
- छन्द-लय (छन्द-लय)क विश्लेषण—की पारम्परिक छन्द (जेना—दोहा, चौपाई, सोरठा) प्रयोग भेल अछि, वा मुक्त-छन्द (मुक्तछन्द)?
- बिम्ब-प्रतीक (बिम्ब-प्रतीक)क विश्लेषण—जरैत खोपड़ी, साड़ीक कोर, मान्केनापुव्वु, कारी मसि—ई सभ दलित-बिम्ब (दलित बिम्ब) कइ प्रकारेँ प्रतिरोधक प्रतीक (प्रतीक क प्रतिरोध) बनि जाइत अछि?
- व्यङ्ग्य-ध्वनि (व्यञ्जना)क विश्लेषण—कविताक शाब्दिक-अर्थ (शाब्दिक अर्थ) आ व्यङ्ग्य-अर्थ (व्यञ्जित अर्थ)क बीच दलित-दृष्टि (दलित दृष्टिकोण) कइ प्रकारेँ स्थापित होइत अछि?
ख. दलित कहानी आ उपन्यास (दलित लघुकथा आ उपन्यास) लेल:
- आख्यान-तकनीक (आख्यान तकनीक)—प्रथम-पुरुष-आख्यान (प्रथम-पुरुष आख्यान) आ साक्षी-शैली (साक्ष्य-शैली) दलित साहित्यमे विशेष रूपसँ महत्वपूर्ण अछि, कारण ई प्रामाणिकता (प्रामाणिकता)क दावा करैत अछि।
- चरित्र-विकास (चरित्र विकास)—दलित-चरित्र (दलित चरित्र)क मनोविज्ञान (मनोविज्ञान), सवर्ण-चरित्र (सवर्ण चरित्र)क प्रतिनिधित्व (प्रतिनिधित्व), चरित्र-सम्बन्ध (चरित्र सम्बन्ध) जाति-व्यवस्थाक कइ प्रकारेँ पुनरुत्पादन (पुनरुत्पादन) वा प्रतिरोध (प्रतिरोध) करैत अछि?
- स्थान-काल (देश-काल)क राजनीति—गाम (गाम), शहर (शहर), वन (वन), झोपड़ी (झोपड़ी), महल (महल), थाना (पुलिस थाना)—ई सभ स्थान (स्थान) जाति-व्यवस्थाक भौगोलिक-संरचना (भौगोलिक संरचना) कइ प्रकारेँ प्रतिबिम्बित करैत अछि?
ग. दलित नाटक लेल:
- रङ्गमञ्चीयता (रङ्गमञ्चीयता)—बिदापत नाच, जात्रा, तमाशा, लोक-नाट्य (लोक-रङ्गमञ्च)क परम्परासँ दलित-नाटकक सम्बन्ध।
- अभिनय-वाद्य-संवाद (अभिनय-सङ्गीत-संवाद)—शरीर (देह), आवाज (स्वर), लय (लय) दलित-नाटकमे प्रतिरोधक हथियार (प्रतिरोधक हथियार) कइ प्रकारेँ बनि जाइत अछि?
- दर्शक-सम्बन्ध (दर्शक-सम्बन्ध)—दलित-नाटक दर्शककेँ सहृदय (सहानुभूतिशील) नै, सहभागी (सहभागी) बनाबैत अछि। ई दर्शक-सम्बन्धक विश्लेषण।
घ. अनूदित दलित साहित्य लेल:
- अनुवादक-सर्जनात्मकता (अनुवादकक सर्जनात्मकता)—स्रोत-भाषा (स्रोत-भाषा)क दलित-स्वर (दलित स्वर) लक्ष्य-भाषा (लक्ष्य-भाषा)मे कइ प्रकारेँ प्रतिष्ठापित (स्थापित) अछि?
- सांस्कृतिक-अनुवाद (सांस्कृतिक अनुवाद)—जाति-व्यवस्था, दलित-अनुभव, प्रतिरोध-परम्परा—ई सभ सांस्कृतिक-श्रेणी (सांस्कृतिक श्रेणीसभ) अनुवाद-प्रक्रिया (अनुवाद-प्रक्रिया)मे कइ प्रकारेँ स्थानीयकृत (स्थानीयकृत) अछि?
- दलित-अनुवादक राजनीति (दलित अनुवादक राजनीति)—दलित-साहित्यक अनुवाद दलित-आवाजक विस्तार (विस्तार) अछि वा विकृति (विकृति)? अनुवाद दलित-साहित्यकेँ वैश्विक-पाठक (वैश्विक पाठक) धरि पहुँचाबैत अछि वा मुख्यधारा-साहित्यक सह-विकल्प (सह-विकल्पन)क हथियार (हथियार) बनि जाइत अछि?
पञ्चम अध्याय: दलित साहित्यक समीक्षा सिद्धान्तक उदाहरणात्मक प्रयोग
५.१ प्रस्तुत संकलन (मैथिलीमे अनूदित दलित साहित्य)क समीक्षा
प्रथम स्तर: जाति-विश्लेषण
- संकलनक केन्द्रीय-विषय (केन्द्रीय विषय) जाति-व्यवस्था अछि—जाति-हिंसा (जाति-हिंसा), अस्पृश्यता (अस्पृश्यता), दलित-प्रतिरोध (दलित प्रतिरोध), दलित-अस्मिता (दलित अस्मिता)।
- पात्र-जाति (चरित्र जाति)—दलित-पात्र (दलित चरित्रसभ): बोयी भीमन्नाक कविताक व्यास, अरुन्धती, मत्स्यगन्धी (पौराणिक-दलित); जे. सुभद्राक दलित-स्त्री-श्रमिक; कोलकलुरी इनोचक बण्डोडु (मादिग); पेद्दिंति अशोक कुमारक ईमाम (कलन्दर)।
- सवर्ण-पात्र (सवर्ण चरित्रसभ): जमीन्दार, पटेल, एमआरओ, एसआई, सरपंच, बच्ची श्रिया (जे दलित-विरोधी (दलित-विरोधी) बनि जाइत अछि)।
द्वितीय स्तर: दलित-सौन्दर्यशास्त्र विश्लेषण
- स्थायी भाव (स्थायी भाव): दर्द (जे. सुभद्राक "लोढ़ब", "अव्वा"), आक्रोश (बोयी भीमन्नाक "हमर पैतृक अधिकार"), अस्मिता (चल्लपल्ली स्वरूपरानीक "मान्केनापुव्वु"), संघर्ष (कोलकलुरी इनोचक "कौआ", पेद्दिंति अशोक कुमारक सदा लेल मित्र)।
- रस-निष्पत्ति (रस-निष्पत्ति): दर्द-रस (पीड़ा रस), आक्रोश-रस (आक्रोश रस), अस्मिता-रस (अस्मिता रस), संघर्ष-रस (संघर्ष रस)।
- प्रतिरोध-शैली (प्रतिरोध-शैली): तीक्ष्ण, कर्कश, विद्रोही भाषा; साक्षी-शैली (साक्ष्य-शैली): प्रथम-पुरुष-आख्यान, आत्म-कथात्मक शैली; लोक-शैली (लोक-शैली): कहावत, मुहावरा, लोक-गीतक प्रयोग।
तृतीय स्तर: सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण
- जाति-राजनीति: सवर्ण-दलित द्वन्द्व, जाति-हिंसा, अस्पृश्यता, जाति-व्यवस्थाक मनोविज्ञान।
- वर्ग-राजनीति: जमीन्दार-किसान द्वन्द्व, पूँजी-श्रमिक द्वन्द्व, आर्थिक शोषण।
- लिङ्ग-राजनीति: दलित-स्त्रीक दोहरा उत्पीड़न, शरीरक राजनीति, दलित-नारीवादी स्वर।
- प्रवास-राजनीति: सदा लेल मित्र उपन्यासमे प्रवास (प्रवास)क अर्थशास्त्र आ मनोविज्ञान।
चतुर्थ स्तर: ऐतिहासिक-अभिलेखीय विश्लेषण
- पौराणिक-इतिहासक दलित-पुनर्पाठ: बोयी भीमन्नाक व्यास, अरुन्धती, मत्स्यगन्धीक पुनर्व्याख्या।
- मध्यकालीन-इतिहासक दलित-पुनर्पाठ: जाति-व्यवस्था, दलित-प्रतिरोधक ऐतिहासिक-दस्तावेज (ऐतिहासिक दस्तावेज)क पुनर्पाठ।
- आधुनिक-इतिहासक दलित-पुनर्पाठ: गान्धी, अम्बेडकर, दलित-आन्दोलनक प्रतिनिधित्व (गुजराती कविता "खरड़ाक डाँट सब" मे गान्धी पर व्यंग्य)।
पञ्चम स्तर: आस्वाद-राजनीति विश्लेषण
- दलित-पाठक (दलित पाठक): संकलन पहिचान (अस्मिता)क आस्वाद (आस्वाद) प्रदान करैत अछि—अपन-दर्दक साहित्यिक-अभिव्यक्ति (साहित्यिक अभिव्यक्ति)।
- गैर-दलित-पाठक (गैर-दलित पाठक): संकलन असुविधा (असुविधा) आ जागरण (जागरण)क अनुभव प्रदान करैत अछि—दूसरक-दर्दक साक्षी (साक्षी) बनबाक अवसर।
- दर्दक आस्वादक नैतिकता (नैतिकता क पीड़ाक आस्वाद): संकलन पीड़ाक सौन्दर्यीकरण (सौन्दर्यीकरण) नै करैत, बल्कि पीड़ाक दस्तावेजीकरण (दस्तावेजीकरण) करैत अछि। ई दस्तावेजीकरण पाठककेँ पीड़ाक साक्षी (साक्षी) बनाबैत अछि, उपभोक्ता (उपभोक्ता) नै।
षष्ठ अध्याय: दलित साहित्यक समीक्षा सिद्धान्तक सीमा आ सम्भावना
६.१ सीमा (सीमासभ)
क. सैद्धान्तिक-समन्वयक कठिनाई: भारतीय (रस, ध्वनि, अलंकार) आ पाश्चात्य (मार्क्सवाद, नारीवाद, उपनिवेशवाद-उत्तर) सिद्धान्तक शब्दावली (शब्दावली), दर्शन (दर्शन), प्राथमिकता (प्राथमिकता) भिन्न अछि। ओकर समन्वय हमेशा तनाव (तनाव) सृजना करैत अछि। ई सिद्धान्त ओहि तनावकेँ दमन (दमन) नै करैत, बल्कि सर्जनात्मक (सर्जनात्मक) रूपमे प्रयोग करबाक सुझाव दैत अछि।
ख. दलित-साहित्यक आन्तरिक-विविधता: दलित साहित्य एकरूप (एकरूप) नै अछि—दलित-कविता, दलित-कहानी, दलित-उपन्यास, दलित-नाटक, दलित-आत्मकथा, दलित-समीक्षा—ई सभक शैलीगत, संरचनात्मक, वैचारिक भिन्नता अछि। एकटा सिद्धान्त सभ विधाक पूर्ण व्याख्या करि सकय, ई दावा करब अनुचित अछि। ई सिद्धान्त लचीलापन (लचीलापन) पर बल दैत अछि—समीक्षक अपन विवेकसँ सिद्धान्तक प्रयोग करत।
ग. अनूदित-दलित-साहित्यक विशिष्टता: अनूदित दलित साहित्यक समीक्षा लेल मूल-भाषा (स्रोत-भाषा) आ अनुवाद-भाषा (लक्ष्य-भाषा) दुनूक ज्ञान आवश्यक अछि। मुदा सभ समीक्षक बहुभाषी नै होइत अछि। ई सिद्धान्त अनुवाद-समीक्षाक सीमाकेँ स्वीकार करैत अछि, आ सहयोगात्मक समीक्षा (सहयोगात्मक समीक्षा)क सम्भावना खोजैत अछि।
घ. दलित-समीक्षाक संस्थागत-सीमा: दलित साहित्यक समीक्षा शैक्षणिक-संस्थान (शैक्षणिक संस्थासभ), प्रकाशन-उद्योग (प्रकाशन-उद्योग), पुरस्कार-व्यवस्था (पुरस्कार-व्यवस्था)क दबाव (दबाव)मे आबि रहल अछि। ई संस्थागत-सीमा (संस्थागत सीमा) दलित-समीक्षाक स्वतन्त्रता (स्वायत्तता) पर प्रश्न चिन्ह लगाबैत अछि।
६.२ सम्भावना (सम्भावनासभ)
क. दलित-सौन्दर्यशास्त्रक विकास (दलित सौन्दर्यशास्त्रक विकास): ई समीक्षा सिद्धान्त दलित-सौन्दर्यशास्त्र (दलित सौन्दर्यशास्त्र)क सैद्धान्तिक-आधार (सैद्धान्तिक आधार) प्रदान करैत अछि—दर्द, आक्रोश, अस्मिता, संघर्ष केँ स्थायी भाव (स्थायी भाव)क रूपमे स्थापित करैत अछि, आ ओकर रस-परिणति (रस-निष्पत्ति)क सम्भावना खोजैत अछि।
ख. अन्तःविषयकता: ई समीक्षा सिद्धान्त साहित्यकेँ समाजशास्त्र, इतिहास, राजनीति-विज्ञान, दर्शन, मानव-विज्ञान (मानवविज्ञान)सँ जोड़ैत अछि। ई अन्तःविषयक (अन्तःविषयक) दृष्टि दलित साहित्यक बहु-आयामी (बहुआयामी) विश्लेषणक सम्भावना खोलैत अछि।
ग. तुलनात्मक-दलित-साहित्य-अध्ययन (तुलनात्मक दलित साहित्य-अध्ययन): ई सिद्धान्त मैथिली-दलित-साहित्यक तेलुगु, गुजराती, उड़िया, तमिल, कन्नड़, मराठी, हिन्दी, बंगला—सभ भारतीय भाषाक दलित साहित्यसँ तुलनात्मक अध्ययनक सम्भावना खोलैत अछि। ई तुलनात्मक-दलित-साहित्य-अध्ययन (तुलनात्मक दलित साहित्य-अध्ययन) भारतीय दलित साहित्यक एकता (एकता) आ विविधता (विविधता) दुनूक विश्लेषण करत।
घ. अनुवाद-अध्ययनक दलित-पुनर्पाठ: ई सिद्धान्त अनुवादकेँ गौण (गौण) नै, बल्कि सर्जनात्मक (सर्जनात्मक) विधाक रूपमे स्थापित करैत अछि। दलित-अनुवाद-अध्ययन (दलित अनुवाद-अध्ययन) दलित साहित्यक भाषा-अन्तर-प्रवाह (अन्तरभाषिक प्रवाह)क विश्लेषण करत।
ङ. दलित-समीक्षाक वैश्वीकरण: ई सिद्धान्त दलित-समीक्षाकेँ वैश्विक-सैद्धान्तिक-चर्चा (वैश्विक सैद्धान्तिक विमर्श)सँ जोड़ैत अछि—उपनिवेशवाद-उत्तर (उपनिवेशवाद-उत्तर), सबाल्टर्न (निम्नवर्गीय), अन्तर्विच्छेदीयता (बहु-उत्पीड़न-अन्तर्सम्बन्ध), दर्द-की-राजनीति (पीड़ाक राजनीति), साक्षी-साहित्य (साक्ष्य-साहित्य) जहिना वैश्विक सैद्धान्तिक धारासभसँ दलित साहित्यक संवाद (संवाद) स्थापित करैत अछि।
निष्कर्ष: दलित साहित्यक समीक्षा सिद्धान्तक भविष्य
दलित साहित्य केवल साहित्य नै अछि; ई एकटा आन्दोलन अछि, प्रतिरोधक एकटा घोषणापत्र अछि। एहि कारण, दलित साहित्यक समीक्षा लेल सामान्य साहित्यिक सिद्धान्त अपर्याप्त अछि। ई समीक्षा सिद्धान्त भारतीय (रस, ध्वनि, अलंकार, रीति) आ पाश्चात्य (मार्क्सवाद, नारीवाद, उपनिवेशवाद-उत्तर, दलित-आन्दोलन सिद्धान्त) सिद्धान्तक समन्वय (संश्लेषण) करैत, दलित साहित्यक विशिष्टता (विशिष्टता) केँ केन्द्रमे राखैत अछि।
ई सिद्धान्त अन्तिम-सत्य (अन्तिम सत्य)क दावा नै करैत अछि; ई प्रारम्भिक-बिन्दु (प्रारम्भिक बिन्दु) अछि। ई दलित साहित्यक समीक्षाक नव-द्वार (नव द्वार) खोलैत अछि—जतय दर्द-रस (पीड़ा रस) आ आक्रोश-रस (आक्रोश रस), अस्मिता-रस (अस्मिता रस) आ संघर्ष-रस (संघर्ष रस)क सैद्धान्तिक-प्रतिष्ठा (सैद्धान्तिक वैधता) संभव होइत अछि।
दलित साहित्यक भविष्यक समीक्षा एहि प्रारम्भिक-बिन्दुसँ आगाँ (आगाँ) बढ़त—दलित-सौन्दर्यशास्त्र (दलित सौन्दर्यशास्त्र)क समृद्धि (समृद्धि), तुलनात्मक-दलित-साहित्य-अध्ययन (तुलनात्मक दलित साहित्य-अध्ययन)क विस्तार (विस्तार), दलित-अनुवाद-अध्ययन (दलित अनुवाद-अध्ययन)क विकास (विकास), दलित-समीक्षाक वैश्वीकरण (दलित-समीक्षाक वैश्वीकरण)—ई सभ दिशासभमे।
परिशिष्ट: दलित साहित्यक समीक्षा सिद्धान्तक संक्षिप्त रूपरेखा
विश्लेषण स्तर
भारतीय सिद्धान्त (दलित-पुनर्पाठ)
पाश्चात्य सिद्धान्त (दलित-पुनर्पाठ)
दलित-विशिष्टता
जाति-विश्लेषण
-
जाति-राजनीति, अस्पृश्यता, जाति-हिंसा
पात्र-जाति, लेखक-जाति, कथानक-जाति
दलित-सौन्दर्यशास्त्र
दर्द-रस, आक्रोश-रस, अस्मिता-रस, संघर्ष-रस
-
विपर्यास-अलंकार, अभाव-अलंकार, लोक-अलंकार
सामाजिक-राजनीतिक
-
जाति-वर्ग-लिङ्ग-प्रवास-राजनीति
अन्तर्विच्छेदीयता, दलित-नारीवाद, सबाल्टर्न-आवाज
ऐतिहासिक-अभिलेखीय
-
उपनिवेशवाद-उत्तर, पुरातत्व-विधि
दलित-इतिहास-पुनर्लेखन, मौन-इतिहास-पुनर्निर्माण
आस्वाद-राजनीति
सहृदय (दलित-पुनर्पाठ)
रिसेप्शन थ्योरी, रीडर-रेस्पॉन्स
दलित-पाठक, गैर-दलित-पाठक, दर्दक आस्वादक नैतिकता
ई रूपरेखा समीक्षककेँ लचीलापन (लचीलापन) दैत अछि—अपन विवेक (विवेक)सँ स्तर आ सिद्धान्तक चयन करबाक, आ दलित-साहित्यक विशिष्ट-सन्दर्भ (विशिष्ट सन्दर्भ)मे प्रयोग करबाक स्वतन्त्रता।
समीक्षकक अन्तिम टिप्पणी: दलित साहित्यक समीक्षा सैद्धान्तिक-शुद्धता (सैद्धान्तिक शुद्धता)क दावा नै करैत, साहित्यिक-प्रामाणिकता (साहित्यिक प्रामाणिकता)क खोज करैत अछि। ई सिद्धान्त ओहि खोजक दिशा-निर्देश (दिशानिर्देश) मात्र अछि। दलित साहित्य जीवित (जीवित) अछि, विकसित (विकसित होइत) अछि, प्रतिरोध (प्रतिरोध करैत) अछि। ओकर समीक्षा सेहो जीवित, विकसित, प्रतिरोधी होबाक चाही। ई सिद्धान्त ओहि प्रतिरोधी-समीक्षा (प्रतिरोधी समीक्षा)क आमन्त्रण (आमन्त्रण) अछि।
अनुलग्नक: २: विद्यापतिक विदेसियाक एकटा समालोचनात्मक मूल्यांकन
पाश्चात्य समालोचना-सिद्धान्त आ भारतीय सौन्दर्यशास्त्रीय परम्पराक संयुक्त दृष्टिसँ एहि मैथिली नाट्य-पाठ—अथवा विद्यापतिक पदावलीमे निहित प्रदर्शन-पटकथा—केँ बहुविध पद्धतिसँ पढ़ल जा सकैत अछि। आगाँक समालोचनात्मक पाठ उपनिवेशवाद-उत्तर सिद्धान्त, नारीवादी समालोचना, प्रदर्शन-अध्ययन, तुलनात्मक साहित्य आ संस्कृत रस-परम्परा सहित विविध दृष्टिकोणकेँ एकत्र करैत अछि।
१. विधा आ वर्गीकरणक समस्या
पाठ स्वयंकेँ विद्यापतिक विदेसिया परम्पराक "समानान्तर ब्रह्माण्ड"क रूपमे घोषित करैत अछि। ई दावा तुरंत एकटा आधारभूत प्रश्न उठाबैत अछि: की ई एकटा पुनरुद्धार अछि, पुनर्निर्माण अछि, रूपान्तरण अछि, या ओहसँ बहुत अधिक जटिल कोनो चीज? लेखक रचनाकेँ प्रलेखन (रामखेलावन मण्डल जहिना दलक) आ सृजन ( "ई परिकल्पित नाटक प्रस्तुत अछि" ) दुनूक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। विधाक ई अस्थिरता कोनो दोष नै अछि, बल्कि एकटा उत्पादक तनाव अछि, जेकरा पाठ कहियो पूर्ण रूपसँ हल नै करि पाबैत अछि।
उत्तर-संरचनावादी दृष्टिसँ, ई अनिर्धार्यता कोनो "प्रामाणिक" लोक परम्पराक पुनर्प्राप्तिक असम्भवताक उद्घाटन करैत अछि। लेखकक अपन ढाँचा—जे एहि बात पर ध्यान दैत अछि जे सालहेस आ चूड़ामल जहिना व्यक्तित्वसभ पर "कोनो शोध नै भेल अछि"—विरोधाभासी रूपसँ ओह अभिलेखीय अधिकार केँ कमजोर करैत अछि, जकर दावा पाठ एक साथ करैत अछि। ई रचना जाक देरिदाक शब्दावलीमे अभिलेख ज्वर (अभिलेख-ज्वर) बनि जाइत अछि: उत्पत्तिकेँ पुनः प्राप्त करबाक एह बेचैनी, जे कहियो स्थिर नै छल।
औपचारिक समालोचना एह बात पर ध्यान देति कि नाटक गीत-नाट्यक संरचना अपनाबैत अछि, मुदा नियमित नाट्यकीय अनुशासनक अभाव अछि। रङ्गमञ्च निर्देशन न्यूनतम अछि, सात दृश्यसभक बीचक सम्बन्ध अस्पष्ट अछि, आ विद्यपति स्वयं एकटा पात्रक रूपमे प्रवेश करैत अछि, अर्थ समझाबैत अछि, आ "अन्धकारमे विलीन" भ जाइत अछि—ई सभ एकटा ब्रेख्तीय विमोहन प्रभाव (अलगाव-प्रभाव) सृजना करैत अछि, जकरा पाठ अपन लेल कोनो सैद्धान्तिक व्याख्या नै करैत अछि। की विद्यापति संस्कृत परम्पराक सूत्रधार अछि? एकटा ब्रेख्तीय कथाकार जे नाटकीय भ्रमकेँ उजागर करैत अछि? या एकटा भक्ति उपस्थिति जे कवि-संतक अधिकारक आह्वान करैत अछि? पाठ निर्णय लेनाइ अस्वीकार करैत अछि, आ ई अस्वीकार, जखन कि बहु व्याख्याक सम्भावना राखैत अछि, तखन संरचनात्मक असंगतिक कारणो बनि जाइत अछि।
२. प्रवास आख्यान: उपनिवेशवाद-उत्तर आ सबाल्टर्न पाठ
एकर विषयगत केन्द्रबिन्दु अछि प्रवास—आ ओकर प्रतीक्षाक स्त्री-अनुभव। लेखक भोजपुरी विदेसिया परम्परा (भिखारी ठाकुरद्वारा उदाहरित) आ मैथिली सन्दर्भक बीच एकटा महत्वपूर्ण अन्तर खिचैत अछि, तर्क करैत अछि जे मिथिलामे प्रवास "हालिया घटना" अछि, जबकि भोजपुरीमे श्रम प्रवासक लम्बा आ अधिक गहन संस्कृति अछि।
उपनिवेशवाद-उत्तर दृष्टिसँ, ई भेद सावधानीपूर्वक परीक्षणक माग करैत अछि। लेखकक ई दावा जे भोजपुरी साहित्य "परिमाणक दृष्टिसँ मैथिली सँ कम समृद्ध" अछि मुदा किछु क्षेत्रसभमे "गुणवत्ताक दृष्टिसँ बेसी" अछि, एकटा अन्तर्निहित पदानुक्रम पर टिकल अछि, जकर पाठ कहियो विखण्डन नै करैत अछि। "समृद्धि" आ "गुणवत्ता"क मानदण्ड केकर अछि? ई तुलना भिखारी ठाकुरक विदेसिया केँ अपन "मार्मस्पर्शी रूप" लेल मूल्यवान ठहराबैत अछि, जबकि मैथिली साहित्यक "बोझिल" महाकाव्यात्मक आख्यानसभक समालोचना करैत अछि। ई एकटा मूल्यवान अन्तर्दृष्टि अछि, मुदा एकरा अधिक कठोर सैद्धान्तिकीकरणक आवश्यकता अछि। मैथिली साहित्यिक संस्कृति महाकाव्य रूपसभकेँ लोककथा पर कियों वरीयता दैत अछि? एकर उत्तर साहित्यक समाजशास्त्रमे निहित अछि: मैथिलीक ब्राह्मण्य प्रतिष्ठा (पण्डित आ सरनाट अभिजात वर्गक भाषाक रूपमे) बनाम भोजपुरी साहित्यिक अभिव्यक्तिक अधिक जन-साधारण, श्रमजीवी मूल।
सबाल्टर्न अध्ययनक एकटा पाठ ओहु आगा धकेलत। एहि नाटकमे स्त्री पात्र—प्रतीक्षारत युवती, यात्रीकेँ फेरि देबिहार ननद, मञ्चपर बाहर मरि जाए सास—पितृसत्तात्मक संरचनाक भीतरक आवाज अछि, जकरा पाठ बिना पर्याप्त प्रश्नकेँ पुनरुत्पादित करैत अछि। जखन युवती गाबैत अछि, "हम एकाकी छी, हमर पिय देशान्तर, " तखन ओ रस परम्पराक केन्द्रीय विरहक अभिनय करैत अछि। मुदा की पाठ एहि पीड़ाक कोनो नारीवादी समालोचना प्रस्तुत करैत अछि, या ओ स्त्रीक प्रतीक्षाकेँ उदात्त रूपमे सौन्दर्यीकृत करैत अछि? रस ढाँचा करुण आ विप्रलम्भ शृङ्गारकेँ महत्व देत, मुदा गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक जहिना नारीवादी समालोचक पूछत: की सबाल्टर्न स्त्री एतय बाजि सकैत अछि, या ओ केवल पुरुष-रचित पद्य आ एकटा पुरुष कवि-पात्रक माध्यम अछि, जे दर्शकसभक लेल ओकर अनुभवक व्याख्या करैत अछि?
३. रस, भक्ति, आ सौन्दर्यात्मक दूरीक प्रश्न
पाठ स्पष्ट रूपसँ विद्यापतिक पदावली पर आधारित अछि, जे शृङ्गार आ भक्ति दुनू परम्परासभमे सहभागी अछि। नेपाल पदावलीसँ गीतसभक चयन—जे विरह, वियोग आ प्रेमीक प्रतीक्षामे स्त्रीक दशाक चिन्तासँ सम्बन्धित अछि—रचनाकेँ ओह विरह सौन्दर्यशास्त्रमे स्थापित करैत अछि, जे संस्कृत काव्यशास्त्रकेँ उत्तर भारतक भक्ति साहित्यसँ जोड़ैत अछि।
अभिनवगुप्तक ध्वनि सिद्धान्तक दृष्टिसँ, एहि गीतसभक व्यङ्ग्य (व्यंजित अर्थ) प्रवासी पति कऽ प्रतीक्षा करैत स्त्रीक शाब्दिक आख्यानकेँ पार करि जाइत अछि। विदेसिया रूपक बनि जाइत अछि: दिव्यसँ वियुक्त आत्माक लेल, अपन सांस्कृतिक जड़सँ विच्छिन्न मिथिला क्षेत्रक लेल, विस्थापनक युगमे मैथिली भाषा स्वयंक लेल। मुदा जखन विद्यापति रङ्गमञ्च पर "अर्थ समझाबय" आबैत अछि, तखन पाठ ओह जोखिमक सामना करैत अछि, जेकरा रस परम्परा मूलभूत त्रुटि मानैत अछि: विभाव आ अनुभाव केँ व्यङ्ग्यद्वारा रस उत्पन्न करबाक अनुमति देनाइक बदला, स्पष्ट करि देल जाइत अछि। कवि-पात्रक व्याख्यात्मक हस्तक्षेप मूल पद्यसभक बहुअर्थीताकेँ समतल करि दैत अछि।
भक्ति पाठ अधिक उदार हो सकैत अछि। उत्तर भारतक भक्ति परम्परासभमे, विरहक रस स्वयं एकटा प्रकारक साक्षात्कार अछि। युवती राधा अछि; पिय देशान्तर कृष्ण अछि; प्रतीक्षा दिव्यसँ मिलनक आत्माक तड़प अछि। कवि-सन्तक रूपमे विद्यापतिक उपस्थिति एहि पाठकेँ बल देबैत अछि: ओ केवल टीकाकार नै अछि, बल्कि एकटा सन्त अछि, जकर पद्य स्वयं साधनाक रूप अछि। नाटकक प्रदर्शन सन्दर्भ—जतय रामक नाम पर दल अछि आ समूह भक्ति-नाटकक रूपमे मञ्चन करैत अछि—एहि व्याख्याक समर्थन करैत अछि।
तथापि, पाठक अपन ढाँचा भक्तिपरक निष्कर्षकेँ पूर्ण रूपसँ स्वीकार नै करैत। अन्तिम पंक्ति, पिय देशान्तरक अवधारणाक "विवेकशील दर्शकसभक समक्ष प्रस्तुत" आ "गहन श्रद्धाक साथ अर्पित" कहल गेल अछि, एकटा समालोचनात्मक दूरी बनाए राखैत अछि। नाटक न त पूर्ण रूपसँ भक्ति रङ्गमञ्च अछि, न पूर्ण रूपसँ धर्मनिरपेक्ष लोक नाट्य। ई संकरता उत्पादक अछि, मुदा कहियो कहियो अस्थिरो सेहो।
४. अन्तर्पाठ्यता आ प्रभावक चिन्ता
पाठक भिखारी ठाकुरक विदेसियासँ सम्बन्ध ओकर सबसँ महत्वपूर्ण अन्तर्पाठ्य सगाई अछि। हेरोल्ड ब्लूमक प्रभावक चिन्ता (प्रभावक चिन्ता) एकटा उपयोगी ढाँचा प्रदान करैत अछि: मैथिली पाठ अपन भोजपुरी पूर्ववर्तीसँ भिन्न एकटा स्थान बनाबाक संघर्ष करैत अछि, जखन कि ओकरा ओही अनिवार्य रूपसँ आकार देल गेल अछि।
लेखक दावा करैत अछि जे मैथिलीमे भोजपुरी विदेसियाक "सूक्ष्म विवरण"क अभाव अछि, सालहेस आ चूड़ामलकेँ एहन आख्यानक उदाहरणक रूपमे उद्धृत करैत अछि जे "क्षेत्रीय सीमाकेँ पार करैत अछि" मुदा जाहि पर पर्याप्त शोध नै भेल अछि। ई कानन (मान्य साहित्यिक परम्परा)क बारेमे एकटा दावा अछि: जे मैथिली लोक साहित्यक संस्कृतिकृत महाकाव्य परम्पराक तुलनामे उपेक्षा कएल गेल अछि। प्रस्तुत नाटककेँ एक प्रकारक कानन-समालोचना (मान्य-परम्परागत समीक्षा)क प्रदर्शनक रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि, जे हाशियाकृत चीजकेँ पुनः प्राप्त करैत अछि।
मुदा नाटकक विद्यापति पर निर्भरता—मैथिली साहित्यमे सबसँ अधिक कानन-सम्मत व्यक्तित्व—एहि परियोजनाकेँ जटिल बनाबैत अछि। लेखक प्रभावी रूपसँ सबसँ प्रतिष्ठित मैथिली साहित्यिक व्यक्तित्वक उपयोग एकटा लोक परम्पराकेँ प्राधिकार प्रदान करबाक लेल करैत अछि, जे संभवतः विद्यापतिक अपन रचनाकर्म ऐतिहासिक रूपसँ हाशियाकृत केनए छल। ई एकटा उपनिवेशवाद-उत्तर पुनर्प्राप्तिक इशारा अछि, मुदा ई अभिजात साहित्यिक रूपसभक मध्यस्थता बिना "लोक" धरि पहुँचबाक कठिनाईकेँ सेहो प्रकट करैत अछि।
पाठक-प्रतिक्रिया समालोचक ध्यान देत कि पाठक अपन परियोजनाक स्पष्ट ढाँचा—लम्बा गद्य प्रस्तावना, दलक विस्तृत विवरण, नगेन्द्रनाथ गुप्तक संस्करणक उद्धरण—एकटा विशिष्ट पठन-अनुबन्ध सृजना करैत अछि। दर्शककेँ बिना मध्यस्थताक रस अनुभव करबाक आमन्त्रण नै देल जाइत, बल्कि निर्माणक प्रक्रिया, अभिलेखीय श्रम, क्षेत्रीय साहित्यिक परम्परासभक राजनीति केँ समझबाक आमन्त्रण देल जाइत अछि। ई रूपान्तरण-नाटकीय (आत्म-रङ्गमञ्चीय) आयाम नाटकक सबसँ विशिष्ट योगदान अछि।
५. प्रदर्शन अध्ययन आ दर्शकत्वक प्रश्न
एकटा प्रदर्शन पाठक रूपमे, विद्यापतिक विदेसिया एकटा सीमान्त स्थानमे विद्यमान अछि। ई न त पूर्ण पटकथा अछि, न प्रदर्शन अभिलेख। रङ्गमञ्च निर्देशन न्यूनतम अछि: "कवि विद्यापति प्रवेश करैत अछि, " "युवती प्रतीकात्मक रूपसँ एकटा दोकान खोलैत अछि, " "अन्धकार पसरैत अछि। " एकटा प्रदर्शन अध्ययन विद्वान पूछत: एतय की दस्तावेजीकृत कएल जाइत अछि? कोनो विशिष्ट दलक लीला? कोनो लुप्त परम्पराक पुनर्निर्माण? या भविष्यक प्रदर्शन लेल एकटा पटकथा?
पाठक प्रत्येक गीतक राग (धनाशी, मलावा, कोलार, घनाशी) पर विस्तृत ध्यान संगीतात्मक विशिष्टताक सुझाव दैत अछि। मुदा बिना स्वरलिपि या प्रदर्शन निर्देशनक, ई केवल नाम मात्र अछि। नाटककार, या प्रलेखक, एकटा पाठकक परिकल्पना करैत अछि जे एहि संगीत परम्परासभसँ गहिर परिचित अछि—एकटा पाठक, अर्थात्, जे पहिने सँ मैथिली प्रदर्शन संस्कृतिक भीतर अछि।
ई दर्शक-सम्बोधनक प्रश्न उठबैत अछि: ई पाठ केकर लेल अछि? उपलब्ध अंग्रेजी अनुवाद मैथिलीभाषी पाठक-वर्गसँ परे एकटा अतिरिक्त दर्शक-वर्गक सम्भावना देखबैत अछि। तथापि, नाटकक भीतर गीतसभक अनुवाद नहि कएल गेल अछि; मैथिली मूल प्रस्तुत अछि आ ओकर अर्थ मैथिली गद्यमे देल गेल अछि। भाषा आ अनुवादक ई तह होमी भाभाक शब्दावलीमे “तृतीय स्थान” सृजित करैत अछि—न पूर्णतः मैथिली, न पूर्णतः अंग्रेजी; न केवल प्रदर्शन, न केवल प्रलेखन; न केवल लोक, न केवल शास्त्रीय।
६. साहित्यिक तुलनाक राजनीति
लेखकक भोजपुरी आ मैथिलीक बारेमे तुलनात्मक टिप्पणीसभ समाज-समालोचनात्मक दृष्टिसँ ध्यानाकर्षक अछि। "भोजपुरी साहित्य मैथिली सँ परिमाणमे कम समृद्ध अछि, " पाठ दावा करैत अछि, "मुदा गुणवत्ताक दृष्टिसँ किछु क्षेत्रसभमे ई मैथिली सँ बेसी अछि। " ई एकटा उत्तेजक दावा अछि जे, यदि विश्लेषित कएल जाय, त उत्तर भारतीय साहित्यिक संस्कृतिक भीतर गहन पदानुक्रमकेँ उजागर करत।
मैथिलीक एकटा शास्त्रीय साहित्यिक परम्परा अछि जे विद्यापति (१४-१५वीं शताब्दी) धरि जाइत अछि, एकटा मान्यता प्राप्त व्याकरण (मैथिली व्याकरण) अछि, आ विद्वतापूर्ण उत्पादनक लम्बा इतिहास अछि। भोजपुरी, अपन विशाल वक्ता संख्या के बावजूद, ऐतिहासिक रूपसँ एकटा बोलीक रूपमे कलंकित कएल गेल अछि, भाषा नै, एकर साहित्यिक परम्परासभकेँ हिन्दी आ मैथिली दुनू अभिजात वर्गद्वारा हाशियाकृत कएल गेल अछि। लेखकक ई दावा जे भोजपुरी किछु गुणात्मक क्षेत्रसभमे—विशेषतः विदेसिया परम्परामे—"श्रेष्ठ" अछि, एहि पदानुक्रमक एकटा रणनीतिक विपर्यास अछि। ई भोजपुरी लेल ओह चीजक दावा करैत अछि जे ओकरा अस्वीकार कएल गेल छल: सौन्दर्यात्मक परिष्कार, भावनात्मक गहराई, आ सांस्कृतिक मूल्य।
तथापि, पाठ एहि विपर्यासक पूर्ण सैद्धान्तिकीकरण नै करैत अछि। ई ओह तुलनात्मक ढाँचामे फँसल रहैत अछि, जेकरा ओ चुनौती देनाइ चाहैत अछि। एकटा सच्चा उपनिवेश-उन्मूलनवादी (उपनिवेश-मुक्त) समालोचना पूछत: तुलना कियों करब? प्रत्येक परम्पराकेँ अपन सौन्दर्यात्मक मापदण्ड, अपन मूल्यक मानदण्ड देबाक कियों नै देनाइ? तुलना ओह पदानुक्रमसभकेँ पुनः प्रतिष्ठापित करबाक जोखिम उठाबैत अछि, जकर ओ समालोचना करैत अछि।
७. अनिराकृत प्रश्न आ उत्पादक अस्पष्टतासभ
पाठ किछु प्रश्नसभकेँ अनिराकृत छोड़ैत अछि, आ ई मौन समालोचक लेल उत्पादक अछि:
१. विद्यापतिक स्थिति: की ओ नाटकक भीतर एकटा पात्र अछि, स्रोत सामग्रीक लेखक अछि, एकटा सूत्रधार आकृति अछि, या एकटा भक्ति उपस्थिति? पाठक उत्तर अछि "सभटा, " आ ई बहुलता एकर शक्ति आ दुर्बलता दुनू अछि।
२. सात दृश्यसभक बीच सम्बन्ध: दृश्यसभ एकटा स्थिति—एकटा स्त्री, एकटा यात्री, विदेश गेल प्रेमीक याद—क भिन्नता प्रस्तुत करैत प्रतीत होइत अछि। मुदा की ई एकटा आख्यानात्मक प्रगति बनाबैत अछि? एकटा अनुष्ठान चक्र? सौन्दर्यात्मक भिन्नता (प्रकार)क एकटा श्रृंखला? पाड नै कहैत अछि।
३. लिङ्गक राजनीति: युवतीक स्वर गीतसभ पर हावी अछि, मुदा ओकर एजेन्सी सीमित अछि। ओ यात्रीकेँ मना नै सकैत, नै जा सकैत, नै अपन पतिसँ सीधा बाजि सकैत अछि। पाड ई सीमाकेँ बिना टिप्पणीकेँ पुनरुत्पादित करैत अछि। की ई स्रोत सामग्रीक प्रति निष्ठा अछि, या समालोचनात्मक दूरीक विफलता?
४. ननदक भूमिका: बादक दृश्यसभमे, ओ गायब भ जाइत अछि, यात्री आ युवती अकेला रहि जाइत अछि। एहि सम्बन्धक की भेल? पाडक मौन सुझावपूर्ण अछि मुदा अपूर्ण सेहो।
५. अन्त्य: अन्तिम "विलीन" पिय देशान्तरमे अस्पष्ट अछि। की ई प्रेमीक सँ मिलन अछि? मृत्यु? नाटकीय भ्रमक पतन? पाड, संभवतः जानि बूझि कऽ, व्याख्याकेँ रोकि राखैत अछि।
८. निष्कर्ष: एकटा समालोचनात्मक अभिग्रहणक दिशामे
औपचारिक सुसंगति, विषयगत जटिलता, आ परम्परा-नवाचारक बीच उत्पादक तनाव—एहि मानकसभ पर विद्यापतिक विदेसिया पर्याप्त रुचिक रचना अछि, मुदा अनिराकृत अन्तर्विरोधसभक सेहो।
एकर सबसँ बड़ शक्ति एकर अन्तरालीय स्थिति (अन्तरालीय स्थिति) अछि: लोक आ शास्त्रीयक बीच, मैथिली आ भोजपुरीक बीच, प्रदर्शन आ पाठक बीच, भक्ति आ समालोचनाक बीच। ई स्थिति एकरा ओह तनावसभकेँ मञ्चित करबाक अनुमति दैत अछि, जे आधुनिक मैथिली अस्मिताकेँ परिभाषित करैत अछि—एकटा गौरवशाली साहित्यिक अतीत आ वर्तमानक आर्थिक अनिश्चितताक बीच, संस्कृतिकृत प्रतिष्ठा आ लोक जीवन्तताक बीच, विरहक वेदना आ राजनीतिक मान्यताक मागक बीच फँसल।
एकर सबसँ बड़ दुर्बलता अछि एकर सैद्धान्तिक अपर्याप्त विस्तार। पाड जानैत अछि जे ओ की करबाक चाहैत अछि—एकटा परम्पराकेँ पुनः प्राप्त करबाक, विद्यापतिकेँ सम्मान करबाक, मैथिली प्रवासक वर्तमान क्षणसँ बाजि करबाक—मुदा ओ हमेशा नै जानैत अछि जे ओ कइ प्रकारेँ ई करि रहल अछि। विधाक अस्थिरता, अस्पष्ट रङ्गमञ्चन, विद्यापतिक पात्रक रूपमे अनिराकृत भूमिका: ई अपने आपमे दोष नै अछि, मुदा ई एकटा आत्म-विवेचनात्मक विवरणक माग करैत अछि, जे पाड प्रदान नै करैत अछि।
अभिग्रहण-केन्द्रित समालोचक ध्यान देत कि ई पाड अब बहु सन्दर्भसभमे विद्यमान अछि: मैथिली पाठकसभ लेल, ई सांस्कृतिक स्मृतिक एकटा दस्तावेज अछि; अंग्रेजी पाठकसभ लेल, एकटा अनूदित जिज्ञासा; भारतीय रङ्गमञ्चक विद्वान लेल, प्रदर्शन परम्परासभक अभिलेखीकरणक चुनौतीसभक एकटा केस स्टडी। प्रत्येक पठन सन्दर्भ एकटा भिन्न पाड उत्पन्न करैत अछि।
अन्ततः, विद्यापतिक विदेसिया ओहिमे सफल अछि जे ई संभवतः सबसँ मौलिक रूपसँ प्रयास करैत अछि: मैथिली विदेसिया—प्रवासी, आ प्रतीक्षारत स्त्री—क अनुभवकेँ मिथिलाक सबसँ प्रतिष्ठित साहित्यिक परम्पराक भीतर रखबाक। एहन करि कऽ, ई एकटा दावा करैत अछि: जे श्रम प्रवासक पीड़ा राधा-कृष्णक विरह जकर समान सौन्दर्यात्मक ध्यानक हकदार अछि; जे लोक शास्त्रक भीतर अछि; जे विस्थापनक वर्तमान क्षण शताब्दी-पुरान काव्य भाषाक संसाधनसभक माग करैत अछि।
की पाड ई दावाकेँ पूर्ण रूपसँ प्राप्त करैत अछि, ई समालोचक लेल एकटा खुला प्रश्न अछि। मुदा दावा स्वयं—आ एकर अभिव्यक्तिक श्रम—सम्मानक माग करैत अछि।
पाँच सैद्धान्तिक दृष्टिकोणसभद्वारा विद्यापतिक विदेसियाक एकटा समालोचनात्मक पाठ
१. गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक: की मैथिली सबाल्टर्न बाजि सकैत अछि?
स्पिवाकक आधारभूत प्रश्न—"केन सबाल्टर्न बाजि सकैत अछि? "—ओह तंत्रकेँ पूछैत अछि जकर द्वारा हाशियाकृत विषयसभकेँ प्रभुत्वशाली प्रवचनमे प्रतिनिधिकृत कएल जाइत अछि, जे हमेशा संस्थागत आ वैचारिक संरचनासभद्वारा मध्यस्थ होइत अछि जे प्रामाणिक आत्म-अभिव्यक्तिकेँ अवरुद्ध करैत अछि। विद्यापतिक विदेसिया स्पिवाकीय विश्लेषणक लेल एकटा बाध्यकारी केस स्टडी प्रस्तुत करैत अछि, ठीक ओहि कारण जे ई प्रतिनिधित्वक ओह संकटकेँ मञ्चित करैत अछि, जकर सैद्धान्तिकीकरण ओकर काज करैत अछि।
युवती जे नाटकक गीतसभ पर हावी अछि, सतह पर एकटा सबाल्टर्न आकृतिक रूपमे प्रकट होइत अछि: एकटा ग्रामीण स्त्री जकर पति श्रम लेल प्रवास करि गेल अछि, जे पितृसत्तात्मक आ आर्थिक संरचनासभक भीतर अपन स्थितिक अनिश्चिततासँ जूझबाक लेल छोड़ि देल गेल अछि, जे ओकरा कोनो एजेन्सी नै दैत अछि। तथापि, ओकर वाणी—गीत जे ओ गाबैत अछि—ओकर अपन नै अछि। ई विद्यापतिक रचना अछि, जे १४-१५वीं शताब्दीक एकटा पुरुष कवि, बहु पाठ्य संचरण ( नेपाल पदावली, नगेन्द्रनाथ गुप्तक संकलन) द्वारा मध्यस्थ, आ समकालीन नाटककार/प्रलेखक द्वारा अरू मध्यस्थ, जे चयन, व्यवस्था आ ढाँचा प्रदान करैत अछि। युवती बाजैत अछि, मुदा जे ओ बाजैत अछि, ओ पहिने सँ अभिजात पुरुष-रचित साहित्यक एकटा उद्धरण अछि।
स्पिवाकक उपनिवेशवादक "ज्ञानमूलक हिंसा" (ज्ञानमीमांसात्मक हिंसा) क समालोचना एतय भारतीय साहित्यिक संस्कृतिक भीतर आन्तरिक उपनिवेशवादसभ धरि विस्तारित होइत अछि। नाटककारक ढाँचा—जे मैथिलीमे भोजपुरी लोक आख्यानक "सूक्ष्म विवरण"क अभाव अछि—प्रामाणिक लोक अभिव्यक्तिक बारेमे एकटा बेचैनी प्रकट करैत अछि, जे नाटक विद्यापतिक पद्यसभकेँ एक प्रकारक आदि-लोक अभिलेखक रूपमे पुनः प्राप्त करि कऽ हल करबाक प्रयास करैत अछि। मुदा स्पिवाक पूछत: एहि पुनर्प्राप्तिमे की मिटाएल जाइत अछि? वास्तविक मैथिली महिला जे प्रवास केनए अछि, या प्रवासीक प्रतीक्षा केनए अछि, ओकर स्थान एकटा साहित्यिक निर्माण—संस्कृतिकृत काव्यशास्त्रक विरहिणी—ले लैत अछि। सबाल्टर्न स्त्री आर कोनो चीजक प्रतीक बनि जाइत अछि: मैथिली सांस्कृतिक अस्मिता, साहित्यिक परम्पराक प्रतिष्ठा, कवि-सन्तक अधिकार।
नाटकक अन्तिम इशारा—अन्धकारसँ उदित होइत पिय देशान्तर (विदेश सँ लौटल प्रेमी) क अस्पष्ट उपस्थिति—स्पिवाकीय दृष्टिसँ विशेष रूपसँ शिक्षाप्रद अछि। की ई मिलन अछि? मुक्ति? पाड ई अनिराकृत छोड़ैत अछि। मुदा स्पिवाक ध्यान देत कि सबाल्टर्न स्त्रीक इच्छा अन्ततः पुरुष आकृतिक वापसी पर विस्थापित भ जाइत अछि। युवतीक प्रतीक्षा अपन पूर्ति ओकर अपन एजेन्सीमे नै, बल्कि प्रेमीक आगमनमे पाबैत अछि। ओकर विषयता पूर्ण रूपसँ ओकर अनुपस्थिति आ उपस्थितिक सापेक्ष निर्मित अछि। ओ बाजैत अछि, मुदा ओ ओकर बारेमे, ओकर लेल, ओकरा बाजैत अछि। ओकर अपन स्वर, ओकर अपन इच्छा जकाँ, मध्यस्थ बनि रहैत अछि।
नाटककारक अपन स्थान ओह समस्याक दर्पण करैत अछि जेकरा स्पिवाक पहिचान करैत अछि। एकटा शिक्षित, संभवतः शहरी, संभवतः पुरुष या पुरुष-पहिचान वाला व्यक्तिक रूपमे जे एहि ग्रामीण प्रदर्शन परम्परासभक दस्तावेजीकरण आ ढाँचा प्रदान करैत अछि, नाटककार ओह प्रतिनिधित्वक कार्यकेँ स्वयं करैत अछि, जकर स्पिवाक समालोचना करैत अछि। लम्बा गद्य प्रस्तावना—दलक, गाम, प्रदर्शन इतिहासक अभिलेखीय विवरण—नृवंशविज्ञान सम्बन्धी अधिकारक दावाक रूपमे कार्य करैत अछि। मुदा की ई प्रलेखन सबाल्टर्न वाणीकेँ सक्षम करैत अछि या अवरुद्ध? युवती गाबैत अछि, मुदा ओकर गीत टीकाकृत, अनूदित, व्याख्यात अछि—पहिल नाटकक भीतर पात्रक रूपमे विद्यापति द्वारा, फिर नाटककारक ढाँचा द्वारा, फिर एहि समालोचक द्वारा। मध्यस्थताक प्रत्येक तह केँ कोनो बिना मध्यस्थताक सबाल्टर्न स्वरसँ अधिक दूर करि दैत अछि।
स्पिवाक हमरा याद दियैत अछि जे "सबाल्टर्नकेँ बाजि देनाइ" क इच्छा स्वयं एकटा पाश्चात्य-बौद्धिक कल्पना अछि, प्रामाणिकताक पुनः प्राप्तिक एकटा परियोजना जे अनिवार्य रूपसँ ओह संरचनासभक पुनरुत्पादन करैत अछि जेकरा ओ विखण्डित करबाक चाहैत अछि। विद्यापतिक विदेसिया एहि विरोधाभाससँ बचि नै सकैत अछि, मुदा ई एकरा असामान्य आत्म-जागरूकताक साथ मञ्चित करैत अछि। जखन विद्यापति पात्र युवतीक गीतसभक "अर्थ समझाबय" आबैत अछि, तखन नाटक समालोचकक अपन कार्यकेँ रूपकित करैत अछि। प्रश्न अछि: की नाटक एहि रूपककेँ एकटा समस्या क रूपमे पहिचान करैत अछि, या ई भोलेपनसँ कविक व्याख्यात्मक अधिकारक उत्सव मनाबैत अछि?
२. दीपेश चक्रवर्ती: मैथिली साहित्यिक कल्पनाकेँ प्रान्तीयकरण
चक्रवर्तीक प्रान्तीयकरण यूरोप (यूरोपकेँ प्रान्तीय बनाब) तर्क करैत अछि जे ऐतिहासिकतावाद (इतिहासवाद)—इतिहास लेखनक यूरोपीय मोड, जे एकटा सार्वभौमिक, रैखिक कालगतिकी मानैत अछि—आधुनिक दक्षिण एशियाई चिन्तनकेँ एहन तरहसँ संरचित केनए अछि जे कालगतिकीय अनुभवक अन्य रूपसभकेँ अवरुद्ध करैत अछि। चक्रवर्ती एकटा इतिहासलेखनक आह्वान करैत अछि जे "देवताक राजनीति" आ अस्तित्वक अन्य एहन मोडसभक लेल स्थान बनाबय, जे धर्मनिरपेक्ष, विकासवादी समयमे समाहित नै होइत अछि।
विद्यापतिक विदेसिया चक्रवर्तीक ढाँचाक अनुप्रयोगक लेल एकटा समृद्ध स्थल प्रदान करैत अछि कारण ई एक साथ अनेक असंगत कालगतिकीसभमे संचालित होइत अछि। नाटक प्रवासक बारेमे अछि, जे एकटा आधुनिक आर्थिक परिघटना अछि: पाड टिप्पणी करैत अछि जे मिथिलामे प्रवास "हालिया घटना" अछि, जे "गाम उजाड़ भ गेल अछि। " तथापि, एहि आधुनिक स्थितिक प्रतिनिधित्वक लेल नाटकक सौन्दर्यात्मक संसाधन विद्यापतिक १४वीं शताब्दीक पदावलीसँ आहरित अछि, जे एकटा पूर्व-आधुनिक, भक्ति-शृङ्गार परम्परासँ सम्बन्धित अछि। जे युवती अपन प्रवासी पति कऽ प्रतीक्षा करैत अछि, ओ एक साथ एकटा समकालीन मैथिली स्त्री आ राधा कृष्णक प्रतीक्षारत अछि। पाड एहि कालगतिकीसभक बीच चयन नै करैत अछि; ई दुनूमे एक साथ निवास करैत अछि।
चक्रवर्ती एहिकेँ ऐतिहासिकतावादक कालक्रमिक शुद्धताक मागक एकटा अस्वीकारक रूपमे पहिचान करत। नाटक ई कहबाक अस्वीकार करैत अछि: "ई अछि पूर्व-आधुनिक विरह परम्परा; ई अछि आधुनिक प्रवास आख्यान। " बल्कि, ई जोर दैत अछि जे श्रम प्रवासक आधुनिक अनुभव विरहक एकटा रूप अछि, जे समकालीन मैथिली प्रवासीक अनिश्चितता आत्माक अपन प्रियतमक लेल शाश्वत तड़प अछि। ई कोनो रूपकात्मक प्रतिस्थापन नै अछि बल्कि एकटा कालगतिकीय अध्यारोपण (कालिक अध्यारोपण) अछि: दुइ समय एकटा स्थानमे विद्यमान।
पाडक मैथिली आ भोजपुरी साहित्यिक परम्परासभक बीच तुलना सेहो चक्रवर्तीय पाठक आमन्त्रित करैत अछि। नाटककार दावा करैत अछि जे भोजपुरीक विदेसिया परम्परा किछु गुणात्मक क्षेत्रसभमे "श्रेष्ठ" अछि, जबकि मैथिली "बोझिल" महाकाव्यात्मक आख्यानसभसँ बाँधल अछि। ई, अन्य बातसभक अतिरिक्त, साहित्यिक समयक बारेमे एकटा दावा अछि। तर्क अछि जे भोजपुरीमे एकटा आधुनिक, प्रतिक्रियाशील, लोक-भाषायी यथार्थवाद (भिखारी ठाकुरक प्रवासी पीड़ाक मार्मिक गीत) उत्पन्न भेल अछि, जबकि मैथिली संस्कृत अतीतक "भारी" रूपसभमे फँसल अछि। नाटकक परियोजना—विद्यापतिक प्रयोग करि कऽ वर्तमानसँ बाजि करबाक—एहि ऐतिहासिकतावादी धारणाकेँ प्रान्तीयकृत करबाक एकटा प्रयासक रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि जे "आधुनिक" रूप (यथार्थवाद, उपन्यास, धर्मनिरपेक्ष आख्यान) केवल आधुनिक अनुभवक प्रतिनिधित्वक पर्याप्त माध्यम अछि।
मुदा चक्रवर्ती एहि कालगतिकीय संकरताक रोमान्टिकाइजेशनक विरुद्ध सेहो सचेत करबैत अछि। नाटकक विद्यापतिक अधिकारक आह्वान—कवि-सन्त जे विदेसिया परम्पराकेँ प्रमाणित करैत अछि—ओह ब्राह्मण्य प्रतिष्ठा संरचनासभक पुनरुत्पादन करबाक जोखिम उठाबैत अछि, जे ऐतिहासिक रूपसँ लोक अभिव्यक्तिकेँ हाशियाकृत केनए अछि। युवतीक गीत स्वीकार्य होइत अछि, संभवतः, कारण ई विद्यापतिक गीत अछि। आधुनिक प्रवासीक पीड़ा सौन्दर्यात्मक रूपसँ वैध होइत अछि कारण ई एकटा कानन-सम्मत साहित्यिक परम्पराद्वारा ढाँचाबद्ध अछि। चक्रवर्ती पूछत: की हमरा एहन वर्तमानक राजनीति भ सकैत अछि जेकरा पूर्व-आधुनिक पवित्रक प्राधिकरणक आवश्यकता नै अछि?
नाटकक प्रदर्शन सन्दर्भ—रामक नाम पर दल, भक्ति-नाटकक रूपमे मञ्चन—एकटा उत्तर सुझावैत अछि। रामखेलावन मण्डलक अभ्यासकर्तासभक लेल, विद्यापति कोनो अधिकार नै अछि जे आधुनिक चिन्तासभकेँ वैधता प्रदान करबाक लेल आहूत कएल गेल हो; ओ एकटा निरन्तर भक्ति अभ्यासक भीतर एकटा जीवित उपस्थिति अछि। "आधुनिक" आ "पूर्व-आधुनिक"क बीचक अन्तर ओकरा लेल एहन रूपमे विद्यमान नै होइत, जेना ई साक्षर समालोचकक लेल अछि। चक्रवर्ती हमरा आग्रह करबैत अछि जे हम ई केँ गम्भीरतासँ लेबू: रामखेलावन परम्पराक कालगतिकी ऐतिहासिकतावादी समय नै, अनुष्ठानिक समय अछि, चक्रीय समय अछि, लीला (दिव्य क्रीडा) क समय अछि। यूरोपकेँ प्रान्तीयकृत करबाक अर्थ अछि ओह ऐतिहासिकतावादी धारणासभकेँ प्रान्तीयकृत करबाक जे हमरा विद्यापतिक उपस्थितिकेँ एकटा अनाक्रोनिज्मक रूपमे देखबाक लेल बाध्य करैत अछि, न कि एकटा निरन्तरताक रूपमे।
३. ए. के. रामानुजन: लोक आ शास्त्रीय काननक अन्तर्क्रिया
रामानुजनक जीवन-कार्य भारतीय साहित्यमे "लोक" आ "शास्त्रीय" परम्परासभक बीच पदानुक्रमिक विरोधकेँ चुनौती देबाक लेल समर्पित छल। ओ प्रदर्शित केलखिन जे ई श्रेणीसभ स्थिर सार नै अछि, बल्कि गतिशील, परस्पर गठन करैत रूप अछि। "शास्त्रीय" निरन्तर "लोक" संसाधनसभ पर आकर्षित करैत अछि; "लोक" "शास्त्रीय" रूपसभकेँ आत्मसात आ रूपान्तरित करैत अछि। रामानुजनक स्पीकिंग ऑफ शिव, द इन्टीरियर ल्याण्डस्केप, आ फोल्कटेल्स फ्रम इण्डियाक अनुवाद ओकर विधिक उदाहरण अछि: लोक परम्परासभकेँ काननिक पाठसभक समान गम्भीरतासँ व्यवहार करबाक, ओकर औपचारिक परिष्कार आ सांस्कृतिक जटिलताक प्रति ध्यान देबाक।
विद्यापतिक विदेसिया अनेक प्रकारसँ रामानुजन-शैलीक एकटा पाठ अछि। ई स्पष्ट रूपसँ विद्यापति—मैथिली साहित्यक सबसँ काननिक आकृति—आ विदेसियाक लोक प्रदर्शन परम्परासभक बीच सम्बन्धसँ सम्बन्धित अछि। नाटककार टिप्पणी करैत अछि जे विद्यापतिक पदावलीमे "शुद्ध विदेसिया" पद्य अछि, विशेषतः नेपाल पदावलीमे, ई सुझाव दैत अछि जे शास्त्रीय कवि स्वयं लोक विषय आ रूपसभसँ जुड़ल छल। वर्णित प्रदर्शन दल—रामखेलावन मण्डल, रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परिषद—लोकप्रिय प्रदर्शन सन्दर्भसभमे एहि पद्यसभक चालू जीवनक प्रतिनिधित्व करैत अछि। पाठ "उच्च" साहित्यिक परम्पराकेँ "निम्न" प्रदर्शन परम्परासँ अलग करबाक अस्वीकार करैत अछि।
रामानुजन नाटकक अनुवादक प्रति विशेष रुचि लेत—केवल भाषिक अनुवाद नै, बल्कि विधा, रजिस्टर आ सामाजिक जगतक बीच अनुवाद। युवतीक गीत शृङ्गार आ विरहक बीच, शास्त्रीय राग प्रणाली (धनाशी, मलावा, कोलार, घनाशी) आ रङ्गमञ्च निर्देशनक लोक-भाषायी मुहावराक बीच आवाजाही करैत अछि। विद्यापति पात्र "अर्थ समझाबय" आबैत अछि, विद्वान-टीकाकारक कार्य करैत अछि जे शास्त्रीय पाठ आ लोकप्रिय अभिग्रहणक बीच मध्यस्थता करैत अछि। तथापि, ई मध्यस्थता एकदिशीय नै अछि: विद्यापति गाबैक बाद युवती सेहो पद्यसभक व्याख्या करैत अछि, "एकर अर्थ पर विस्तार" करैत अछि। अर्थ शास्त्रीय अधिकारद्वारा स्थिर नै करल जाइत, बल्कि संवादात्मक प्रदर्शनद्वारा उद्भूत होइत अछि।
रामानुजनक "सन्दर्भ-संवेदनशील" अर्थक अवधारणा—ओकर आग्रह जे भारतीय साहित्यिक रूपसभकेँ ओकर प्रदर्शन सन्दर्भसभक भीतर समझल जाए—एहि पाठक पढ़बाक लेल महत्वपूर्ण अछि। नाटक पाश्चात्य अर्थमे एकटा "पाठ" नै अछि बल्कि प्रदर्शन-लेल-पटकथा अछि, एकटा दस्तावेज जे एकटा मूर्त, संगीतमय, अनुष्ठानिक घटनाक संकेत करैत अछि। राग पर विस्तृत ध्यान, प्रवेश आ निकास चिह्नित करैत रङ्गमञ्च निर्देशन, पात्र आ दर्शकक बीच अन्तर्क्रिया (दृश्य ७ मे यात्री दर्शकक ओर इशारा करैत अछि)—सभ एकटा प्रदर्शन परम्पराक संकेत करैत अछि जे ओकर साहित्यिक सामग्रीमे घटाएल नै जा सकैत अछि।
रामानुजन पाठक क्षेत्रीय विशिष्टताक प्रति सगाई केँ सेहो नोट करत। नाटककारक समस्तीपुर, पूर्णिया, सुपौल, सहरसाक दलक सावधानीपूर्वक प्रलेखन—गाम, पञ्चायत, डाकघरक नामकरण—मात्र पुरातन-वस्तु-प्रेम नै अछि। ई स्थानक बारेमे एकटा दावा अछि: जे ई परम्परा विशिष्ट समुदायसभक विशिष्ट स्थानसभमे अछि, जे ओकर अर्थ स्थानीय भूगोल आ इतिहासमे निहित अछि। ई क्षेत्रीय आधार शास्त्रीय संस्कृत सौन्दर्यशास्त्र आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्त दुनूक सार्वभौमिकीकरण प्रवृत्तिकेँ चुनौती दैत अछि।
तथापि, रामानुजन ओह अनुपस्थिति केँ सेहो नोट करत, जे एहि पाठक पीछा करैत अछि। नाटककार विलाप करैत अछि जे सालहेस आ चूड़ामल जहिना लोक व्यक्तित्वसभ पर "कोनो शोध नै भेल अछि, " जे मैथिलीमे भोजपुरीमे भेटल विस्तृत लोक आख्यानसभक कमी अछि। ई, रामानुजनक शब्दावलीमे, काननक अपन लोक स्रोतसभकेँ पहिचान करबाक विफलता अछि। शास्त्रीय मैथिली परम्परा, संभवतः, लोक सामग्रीसभकेँ बिना स्वीकार कऽ आत्मसात करि लेलक, ओकरा "बोझिल" महाकाव्यात्मक रूपसभमे रूपान्तरित करि देनए जे ओकर लोक-भाषायी मूलकेँ अस्पष्ट करि दैत अछि। नाटकक परियोजना—विद्यापतिक पदावलीक भीतर विदेसियाकेँ पुनः प्राप्त करबाक—एहि प्रक्रियाकेँ उलटबाक एकटा प्रयास अछि, ई देखाबाक लेल जे शास्त्रीय कवि सेहो एकटा लोक कवि छल, जे काननिक पाठक भीतर स्त्री, प्रवासी आ बञ्चितक आवाज अछि।
४. रुस्तम भारुचा: भारतीय रङ्गमञ्च आ प्रदर्शनक राजनीति
भारुचाक काज निरन्तर भारतीय प्रदर्शन परम्परासभक पश्चिम-उन्मुख "आधुनिक" रङ्गमञ्च आ राज्य-प्रायोजित "लोक" पुनरुद्धार आन्दोलन दुनू द्वारा उपयोगिताकेँ चुनौती देबैत अछि। थिएटर एन्ड द वर्ल्ड आ द पॉलिटिक्स ऑफ कल्चरल प्रैक्टिसमे, भारुचा विशिष्ट सन्दर्भ, समुदाय आ शक्ति सम्बन्धसभ पर कठोर ध्यान देबाक तर्क करैत अछि, जकर भीतर प्रदर्शन परम्परासभ विद्यमान अछि। ओ "अन्तर-सांस्कृतिक" रङ्गमञ्चसँ संशयित अछि, जे सौन्दर्यात्मक रूपसभकेँ ओकर सामाजिक आधारसँ उखाड़ि लैत अछि, आ एहन तरहसँ "लोक" परम्परासभकेँ शहरी, मध्यम-वर्गीय, या अन्तर्राष्ट्रीय दर्शकसभक लेल पुनः प्याकेज कएल जाबाक आलोचनात्मक अछि।
विद्यापतिक विदेसिया ठीक ओह विवादित स्थानमे विद्यमान अछि, जेकर भारुचा मानचित्रण करैत अछि। पाड प्रदर्शन परम्परासभक दस्तावेजीकरण करैत अछि—रामखेलावन मण्डल, रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परिषद—जे ऐतिहासिक रूपसँ ग्रामीण मैथिली समुदायसभमे निहित छल। ई दल स्थानीय दर्शकसभक लेल, ग्रामीण परिवेशमे, अनुष्ठानिक आ भक्ति चक्रक भागक रूपमे प्रदर्शन करैत छल। तथापि, पाड जेना हमरा लग अछि, ओ एकटा प्रलेखन अछि, एकटा अनुवाद अछि, एकटा प्रस्तुति अछि "विवेकशील दर्शकसभक समक्ष"—अर्थात्, एकटा एहन दर्शकक समक्ष, जे आवश्यक रूपसँ मूल ग्रामीण समुदाय नै अछि। नाटक, अपन वर्तमान रूपमे, अपन मूल प्रदर्शन सन्दर्भसँ उखाड़ि लेल गेल अछि आ एकटा भिन्न जनता—मैथिली पाठक, संभवतः, मुदा (अनुवादक माध्यमसँ) अंग्रेजी-भाषी विद्वान आ विद्यार्थी—केँ अर्पित कएल गेल अछि।
भारुचा पूछत: एहि उखाड़बाकिमे की नुकसान होइत अछि? पाडमे रङ्गमञ्च निर्देशन न्यूनतम अछि: "रङ्गमञ्च पर, हमर विदेसिया विदाई लैत अछि, " "युवती प्रतीकात्मक रूपसँ एकटा दोकान खोलैत अछि। " जे कहियो रामखेलावन मण्डलकेँ प्रदर्शन करैत नै देखलक, ओकरा लेल ई निर्देशन केवल एहि बातक सबसँ न्यूनतम सुझाव दैत अछि जे प्रदर्शन देखल जा सकैत छल, सुनल जा सकैत छल, महसूस कएल जा सकैत छल। रागक नाम देल गेल अछि मुदा स्वरलिपिबद्ध नै; गति संकेतित अछि मुदा कोरियोग्राफिड नै; दर्शक अन्तर्क्रिया नोट कएल गेल अछि मुदा वर्णित नै। पाड प्रदर्शनक एक प्रकारक प्रेत बनि जाइत अछि, किछु सूचना संरक्षित करैत अछि मुदा ओह मूर्त, संवेदी, सामुदायिक आयामसभकेँ खोइ दैत अछि, जकरा भारुचा अघटनीय (अवघटनीय) मानैत अछि।
भारुचा एहि परम्परासभक साहित्यिक-समालोचनात्मक उपकरणक भीतर ढाँचाबद्धीकरण केँ सेहो प्रश्न करत। लम्बा गद्य प्रस्तावना—मैथिली आ भोजपुरीक बीच एकर तुलना, नगेन्द्रनाथ गुप्तक संस्करणक उद्धरण, विदेसिया परम्पराक भीतर विद्यापतिकेँ स्थापित करबाक—एकटा शैक्षणिक ढाँचाक गठन करैत अछि जे मूल अभ्यासकर्तासभक लेल पराया भ सकैत अछि। नाटक विद्यापतिक विदेसियाक "समानान्तर ब्रह्माण्ड"क रूपमे प्रस्तुत अछि, एकटा वाक्यांश जे एकटा जीवित प्रदर्शन परम्पराक बदला एकटा साहित्यिक-अन्तर्पाठ्य सम्बन्धक सुझाव दैत अछि। भारुचा पूछत: ई पाड केकर लेल अछि? आ ई केकर हितक सेवा करैत अछि?
नाटकक भिखारी ठाकुरक विदेसिया परम्परासँ सम्बन्ध भारुचाक दृष्टिसँ विशेष रूपसँ महत्वपूर्ण अछि। नाटककार टिप्पणी करैत अछि जे भिखारी ठाकुरक विदेसिया कलकत्तामे प्रवासीक रूपमे ओकर अपन अनुभव आ भोजपुरी-भाषी समुदायसभक लेल ओकर प्रदर्शनसँ उद्भूत भेल छल। ई, भारुचाक शब्दावलीमे, एकटा समुदाय-आधारित रङ्गमञ्च छल: अपन अभ्यासकर्ता आ दर्शकसभक जीवित अनुभवमे निहित, ओकर आवश्यकता आ चिन्तासभक प्रति प्रतिक्रियाशील। प्रस्तुत पाडक विद्यापतिक पद्यसभक माध्यमसँ एकटा मैथिली विदेसिया बनाबाक प्रयास, ओकर विपरीत, एकटा साहित्यिक निर्माण अछि: ई समकालीन अनुभवक बदला एकटा काननिक कविसँ अधिकार आकर्षित करैत अछि। भारुचा पूछत: की ई प्रतिस्थापन—आधुनिक प्रवासक लेल शास्त्रीय विरह—समकालीन मैथिली प्रवासीसभक विशिष्ट पीड़ाक न्याय करैत अछि, या ई ओह पीड़ाकेँ एहन रूपमे सौन्दर्यीकृत करैत अछि जे ओकरा ओकर भौतिक वास्तविकतासँ दूर करि दैत अछि?
पाडक अन्तिम इशारा—"पिय देशान्तरक ई अवधारणा एहन विवेकशील दर्शकसभक समक्ष प्रस्तुत अछि। मैथिली प्रवासीक (विदेसिया) वर्तमान दशाक बीच, ई अर्पण महाकवि विद्यापतिक प्रति गहन श्रद्धाक साथ प्रस्तुत अछि"—ओह तनावकेँ उजागर करैत अछि जेकर भारुचा पहिचान करैत अछि। प्रवासीक "दशा" स्वीकार कएल जाइत अछि मुदा फिर विस्थापित: अर्पण प्रवासीसभकेँ नै, विद्यापतिकेँ कएल जाइत अछि। "विवेकशील दर्शक" केँ सामाजिक स्थितिक प्रति प्रतिक्रिया देबाक बदला सौन्दर्यात्मक अवधारणाक सराहना करबाक आमन्त्रण देल जाइत अछि। भारुचा आग्रह करत कि एकटा सच्चा राजनीतिक रङ्गमञ्च एहि विस्थापनकेँ अनुमति नै देत; ई सौन्दर्यात्मक ढाँचाक ऊपर भौतिक पीड़ाक प्राथमिकता पर जोर देत।
५. एडवर्ड सईद: यात्रा करैत सिद्धान्त आ उत्पत्तिक प्रश्न
सईदक "यात्रा करैत सिद्धान्त" (यात्रा करैत सिद्धान्त) क अवधारणा एहि बात पर ध्यान दैत अछि जे कइ प्रकारेँ विचार, पाठ आ अभ्यास सांस्कृतिक आ ऐतिहासिक सन्दर्भसभमे यात्रा करैत अछि, अनिवार्य रूपसँ प्रक्रियामे रूपान्तरित होइत अछि। "ट्रैवलिंग थ्योरी" आ "ट्रैवलिंग थ्योरी रिकन्सिडर्ड"मे, सईद तर्क करैत अछि जे सिद्धान्त यात्रा करत समय शक्ति खोबैत या पाबैत अछि, ओकर अर्थ ओह सन्दर्भसभद्वारा आकारित होइत अछि जे ओ प्रवेश करैत अछि, आ "उत्पत्ति"क प्रश्न हमेशा एहि गतिविधिसभद्वारा जटिल होइत अछि। लेट स्टाइल पर ओकर बादक काज सेहो एहि बात पर विचार करबाक लेल संसाधन प्रदान करैत अछि जे कइ प्रकारेँ परम्परासभ बादक अभ्यासकर्तासभद्वारा अभिग्रहीत, अनुकूलित आ पुनः सजीव कएल जाइत अछि।
विद्यापतिक विदेसिया एकटा पाठ अछि जे उत्पत्ति आ ओकर जटिलतासभसँ गहिर सम्बन्धित अछि। नाटककार परम्पराकेँ बहु वंशावलीसभक माध्यमसँ अनुरेखित करैत अछि: कटघराक रामखेलावन मण्डल, गायाघाटक रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परिषद, पूर्णियाक पिय देशान्तर दल। ई प्रामाणिकताक, उत्पत्तिक दावा अछि जे परम्पराकेँ विशिष्ट समुदाय आ स्थानसभमे आधारित करैत अछि। तथापि, पाड ई सेहो स्वीकार करैत अछि जे विदेसिया परम्परा स्वयं एकटा यात्रा करबैवाला अछि: ई पूर्णियासँ सुपौल, सहरसा, समस्तीपुर जाइत अछि; ई नेपाल (नेपाल पदावली) सँ बिहार यात्रा करैत अछि; ई विद्यापतिक १४वीं शताब्दीक दरबारसँ २१वीं शताब्दीक ग्रामीण प्रदर्शन धरि यात्रा करैत अछि।
सईदक रुचि होत कि पाड विदेसिया परम्पराक भोजपुरी उत्पत्तिकेँ कइ प्रकारेँ संभालैत अछि। भिखारी ठाकुरक विदेसिया केँ एकटा पूर्ववर्ती, प्रभावशाली पाठक रूपमे स्वीकार कएल जाइत अछि—एतय धरि जे मैथिली पाठकेँ ओकर विरुद्ध अपनाकेँ परिभाषित करबाक पड़ैत अछि। नाटककारक ई दावा जे भोजपुरी किछु गुणात्मक क्षेत्रसभमे "श्रेष्ठ" अछि, सईदक शब्दावलीमे, यात्रा करबैवाला परम्पराक शक्तिक एकटा स्वीकारोक्ति अछि। मैथिली पाड भिखारी ठाकुरकेँ अनदेखा नै करि सकैत अछि; ओकरा ओकर साथ संघर्ष करबाक, ओकरा आत्मसात करबाक, ओकर माध्यमसँ आ ओकर विरुद्ध अपनाकेँ परिभाषित करबाक पड़ैत अछि। ई प्रभावक चिन्ता अछि, मुदा यात्रा करैत सिद्धान्तक उत्पादक गतिशीलता सेहो: भोजपुरी विदेसिया मैथिलीमे यात्रा करैत अछि आ मैथिली साहित्यिक परम्परा की करि सकैत अछि, ओकर पुनर्विचार करबाक लेल बाध्य करैत अछि।
पाडक विद्यापति (१४-१५वीं शताब्दीक आकृति)क एकटा आधुनिक भोजपुरी परम्पराक प्रतिक्रिया देबाक लेल उपयोग यात्रा करैत सिद्धान्तक एकटा रूप अछि। विद्यापतिक पदावली अपन मूल दरबारी-भक्ति सन्दर्भसँ यात्रा करैत मैथिली विदेसियाक समकालीन प्रदर्शन सन्दर्भमे प्रवेश करैत अछि। कवि-सन्त, एहि नव सन्दर्भमे, ओह रूपमे परिणत होइत अछि जे ओ पहिने कहियो नै छल: श्रम प्रवासक एकटा वृत्तान्तकार। ई कोनो साधारण अर्थमे "गलत पठन" नै अछि बल्कि एकटा सर्जनात्मक उपयोगिता अछि, नव आवश्यकतासभकेँ पूरा करबाक लेल एकटा परम्पराक पुनः सजीवीकरण। सईद एहिकेँ यात्रा करैत सिद्धान्तक जीवन्तता क रूपमे पहिचान करत: विचार नव शक्ति प्राप्त करैत अछि जखन ओ नव सन्दर्भसभमे प्रवेश करैत अछि, तखन सेहो (विशेषतः तखन) जखन ओह सन्दर्भसभक ओकर उद्भावकर्ताद्वारा पूर्वानुमान नै कएल गेल छल।
पाडक शोधक प्रति चिन्ता—सालहेस आ चूड़ामल जहिना व्यक्तित्वसभ पर "कोनो शोध नै भेल अछि" क विलाप—यात्रा करैत सिद्धान्तक एकटा भिन्न प्रकार प्रकट करैत अछि: शैक्षणिक ज्ञान अभ्यासक लोक परम्परासभमे गति। नाटककार, एकटा साक्षर, शैक्षणिक सन्दर्भमे स्थित या ओकरा सम्बोधित करैत, अभिलेखीय अनुसन्धान, पाठ्य समालोचना, आ ऐतिहासिक प्रलेखनक मूल्यसभकेँ प्रदर्शन परम्परासभ पर आरोपित करैत अछि जे संभवतः एहि मूल्यसभक अनुसार संचालित नै भ रहल छल। सईद नोट करत कि ई कोनो तटस्थ कार्य नै अछि; ई ओह परम्परासभकेँ रूपान्तरित करैत अछि जेकरा ओ दस्तावेजीकृत करबाक चाहैत अछि, ओकरा मापदण्ड (जेना "शोध")क अधीन करैत अछि जे अन्यत्र उत्पन्न होइत अछि।
अन्तमे, सईदक "प्रतिपक्षीय पठन" (प्रतिपक्षीय पठन) क अवधारणा पाडक बहु, अतिव्यापी उत्पत्तिसभकेँ समझबाक एकटा मार्ग प्रदान करैत अछि। नाटक एक साथ अछि: रामखेलावन मण्डलक प्रदर्शन परम्पराक एकटा दस्तावेज; विद्यापतिक विदेसिया पद्यसभक एकटा पुनर्निर्माण; भिखारी ठाकुरक भोजपुरी विदेसियाक एकटा प्रतिक्रिया; मैथिली साहित्यिक संस्कृतिमे एकटा योगदान; भविष्यक मञ्चनक लेल एकटा प्रदर्शन पाठ; आ शैक्षणिक अध्ययनक एकटा वस्तु। ई प्रतिस्पर्धी उत्पत्ति नै अछि बल्कि सह-अस्तित्वशील अछि, एकटा प्रतिपक्षीय रचनामे संगीत पंक्ति जकाँ स्तरित। एकटा उत्पत्तिकेँ दोसर पर प्राथमिकता देनाइ—ई कहबाक जे "वास्तविक" पाठ रामखेलावन मण्डलक प्रदर्शन अछि, या विद्यापतिक पद्य, या नाटककारक सृजन—पाठक आधारभूत स्थितिकेँ अस्वीकार करबाक होत: एकटा यात्रा करबैवाला, रूपान्तरित, बहु-मूलीय सांस्कृतिक वस्तुक रूपमे।
संश्लेषण: अभिसरण आ विचलन
ई पाँच सैद्धान्तिक दृष्टिकोण, जखन कि ओकर उत्पत्ति आ प्रतिबद्धतामे भिन्न अछि, विद्यापतिक विदेसियाक बारेमे किछु मुख्य अन्तर्दृष्टिसभ पर अभिसरण करैत अछि:
१. मध्यस्थताक समस्या: स्पिवाक, चक्रवर्ती आ सईद सभ, भिन्न तरिकासँ, एहि बात पर जोर दैत अछि जे सबाल्टर्न, पूर्व-आधुनिक, "मूल" हमेशा पहिने सँ मध्यस्थ होइत अछि। युवती विद्यापतिक माध्यम बिना नै बाजैत अछि; विद्यापति प्रदर्शन परम्परासभक माध्यम बिना नै बाजैत अछि; प्रदर्शन परम्परासभ प्रलेखनक माध्यम बिना नै बाजैत अछि। पाड मध्यस्थता पर स्वयं एकटा चिन्तन अछि।
२. पुनर्प्राप्तिक राजनीति: रामानुजन आ भारुचा दुनू शास्त्रीय ढाँचाक माध्यमसँ लोक परम्परासभकेँ "पुनः प्राप्त" करबाक परियोजनाक प्रश्न करैत अछि। रामानुजनक लेल, शास्त्रीय आ लोक हमेशा पहिने सँ जुड़ल अछि; भारुचाक लेल, पुनर्प्राप्ति उपयोगिताक एकटा रूप भ सकैत अछि। पाडक विद्यापतिकेँ विदेसिया परम्पराक लेल दावा करबाक प्रयास एक साथ काननक एकटा कट्टरपन्थी लोकतान्त्रीकरण अछि आ लोक अभ्यासक विशिष्टताक संभावित विलोपन सेहो।
३. कालगतिकी आ इतिहास: चक्रवर्ती आ सईद दुनू सांस्कृतिक विकासक रैखिक, ऐतिहासिकतावादी विवरणसभकेँ चुनौती दैत अछि। पाडक विद्यापतिक विरह आ आधुनिक प्रवासक अध्यारोपण, १४वीं शताब्दीक कवि २१वीं शताब्दीक स्थितिसँ बाजैत अछि एहि आग्रह, ऐतिहासिकतावादी धारणाकेँ अस्वीकार करैत अछि जे प्रत्येक युगक अपन उपयुक्त सौन्दर्यात्मक रूप होइत अछि। ई अनाक्रोनिज्म नै, बल्कि समयसँ एकटा भिन्न सम्बन्ध अछि।
४. दर्शकक प्रश्न: स्पिवाक पूछैत अछि के बाजैत अछि; भारुचा पूछैत अछि केकरा लेल। पाडक बहु दर्शक—ग्रामीण प्रदर्शन समुदाय, मैथिली पाठक, अंग्रेजी-भाषी विद्वान—कोनो सरल उत्तरकेँ जटिल बनाबैत अछि। नाटक विभिन्न जनताक लेल विभिन्न रूपसभमे विद्यमान अछि, आ ई विभिन्न अस्तित्व एकटा "मूल"मे घटाएल नै जा सकैत अछि।
५. सिद्धान्तक सीमा: एहि सिद्धान्तकारसभमे सँ प्रत्येक हमरा याद दियैत अछि जे सिद्धान्तक सीमा अछि। स्पिवाकक सबाल्टर्न अन्ततः नै बाजि सकैत; चक्रवर्तीक गैर-ऐतिहासिकतावादी कालगतिकीसभ शैक्षणिक गद्यमे प्रतिनिधित्व करबाक लेल कठिन अछि; रामानुजनक लोक-शास्त्रीय संश्लेषण विद्वतापूर्ण श्रेणीसभद्वारा पूर्ण रूपसँ कब्जा नै कएल जा सकैत; भारुचाक मूर्त प्रदर्शन प्रलेखनसँ बचि जाइत अछि; सईदक यात्रा करैत सिद्धान्त हमेशा उपयोगिताक दोसर रूप बनि जाबाक जोखिम उठाबैत अछि। विद्यापतिक विदेसिया संभवतः ठीक एहि तनावसभकेँ हल करबाक अस्वीकार करबामे, बहु, आंशिक आ अपूर्ण बनि रहबाक आग्रह करबामे सफल अछि।
समापन चिन्तन
एहि सैद्धान्तिक परम्परासभक आलोकमे विद्यापतिक विदेसिया एकहि साथ आलोकित आ अशान्त करैत अछि। पाठ स्वयंकेँ विद्यापतिक प्रति अर्पणक रूपमे, लोक परम्पराक एकटा दस्तावेजक रूपमे, समकालीन प्रवासक एकटा प्रतिक्रियाक रूपमे, आ एकटा प्रदर्शन-पटकथाक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। ई ओहि प्रकारक सैद्धान्तिक प्रभुत्वक प्रतिरोध करैत अछि जे एकरा एकटा अर्थ, एकटा उत्पत्ति, एकटा दर्शकसँ बाँधि देत। सम्भवतः ई एकर सबसँ पैघ शक्ति अछि: ई शास्त्रीय आ लोक, पाठ आ प्रदर्शन, अतीत आ वर्तमानक बीच तनावसभकेँ हल नहि करैत, बल्कि ओहि तनावसभकेँ एहन ईमानदारीसँ मञ्चित करैत अछि जकर प्रतिध्वनि सैद्धान्तिक समालोचनामे सुनाइत अछि।
एहि पाँच सिद्धान्तकारक प्रत्येक दृष्टि एहि पाठमे अपन चिन्ताक कोनो-न-कोनो रूप देखैत अछि। स्पिवाक निम्नवर्गक मध्यस्थ वाणी देखैत छथि; चक्रवर्ती गैर-इतिहासवादी कालगतिकी देखैत छथि; रामानुजन लोक-शास्त्रीय निरन्तरता देखैत छथि; भारुचा प्रदर्शन-प्रलेखनक राजनीति देखैत छथि; सईद यात्रा करैत सिद्धान्तक क्रियाशीलता देखैत छथि। मुदा कोनो दृष्टि ई दावा नहि करैत जे पाठ ओकर ढाँचामे घटाओल जा सकैत अछि। पाठ सिद्धान्तकेँ अतिक्रमण करैत अछि, जेना सांस्कृतिक वस्तु प्रायः करैत अछि। ओही अतिक्रमण एकरा समालोचनात्मक ध्यानक योग्य बनाबैत अछि आ समालोचकक काजकेँ सदैव आनुपातिक, सदैव अपूर्ण, आगाँक पठन लेल सदैव खुला राखैत अछि।
अनुलग्नक -३; मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)-गजेन्द्र ठाकुर
विद्यापति: किछु प्रचलित कुप्रचारक निराकरण
समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग
विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थमे ठक्कुर विद्यापति कृता लिखल अछि/ आ ओ विद्यापति ब्राह्मण छथि। हमर उद्देश्य मैथिली बला विद्यापतिसँ अछि... जै सम्बन्धमे हम चर्चा केलौं जे हुनका किए पाग पहिरा कऽ "हम्मर विद्यापति" बना लेल गेल... ई तखन नै भेल जखन बिदापत नाचक माध्यमसँ आठ सए बर्ख गएर ब्राह्मण समुदाय विद्यापतिकेँ जिएने रखलक, मुदा तखन भेल जखन बंगाल विद्यापति केँ आ गोविन्ददासकेँ अपन बना लेलक आ बंगालेक विद्वान राजकृष्ण मुखोपाध्याय सर्वप्रथम कहलन्हि जे विद्यापति मिथिलाक भाषाक कवि छथि आ बंगालेक नगेन्द्रनाथ गुप्त सर्वप्रथम कहलन्हि जे गोविन्ददास सेहो मिथिलाक भाषाक कवि छथि आ जखन ई तथ्य सोझाँ उठल तँ पहिने तँ सगर बंगाल हुनकापर मार-मार कऽ उठल आ बादमे मानि गेल। फेर मिथिलाक विद्वानकेँ सोह एलन्हि आ विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थ, गोविन्ददास नाम्ना आ विद्यापति नाम्ना पञ्जीमे उपलब्ध विवरण दऽ विद्यापति ठाकुर आ गोविन्ददास झा (! ! ! ) निकालल गेल- रमानाथ झाक पञ्जीक सतही ज्ञान आ सीमित दृष्टिकोण नोकसान पहुँचेलक। फेर अनचोक्के पाग पहिरा कऽ विद्यापति (मैथिली बला, संस्कृत बला नै) केँ "हम्मर विद्यापति" ब्राह्मण वर्ग द्वारा बना लेल गेल। किछु गोटे ज्योतिरीश्वरक भातिज कहि विद्यापतिकेँ सम्बोधित करऽ लगलाह! !
मुदा कवीश्वर ज्योतिरीश्वर सन बहुत रास कवि पज्जीमे उपलब्ध छथि। आ जे नामक अन्तर विद्यापतिमे आबि जाइ छन्हि (जखन कि सभ काज प्लानिंगसँ भेलै तैयो एकटा सबूत बचि गेलै) से ज्योतिरीश्वरमे किए नै अबैए।
राम ठाकुर
अहाँ बंगाल किए जाइ छी, पूर्णियाँमे ग्रामदेवताक पूजामे हम गेल छी आ राम ठाकुर (भगवान)केँ देवता रूपमे ढेपाबला खेतमे हम देखने छी, कियो जोति देने रहै।
मिथिलासँ छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेशमे गेल रहथि, मध्य प्रदेशसँ राज्यसभा सांसद प्रभात झा कहि रहल छला, जे बरही (काष्ठकार) मिथिलासँ गेला तँ मैथिली भाषी हेबाक कारण लोक हुनका झाजी कहए लागल, आ ओ सभ आब झा टाइटिल रखै छथि, प्रभात झा कैंपेनिंग कऽ देलखिन्ह आ एक वोटसँ केण्डीडेट जीति गेलै। हमरा अहाँ सभकेँ ई अनुभव अछि जे कोनो टाइटिल हुअए पहिने, पटनो धरिमे लोक झाजी वा झौआ ओकरा कहि दै छै। बंगालक मालदह जिलामे ४-५ गाममे मैथिल ब्राह्मणक टाइटिल ओझा छै, आ अलीगढ़मे मैथिल ब्राह्म्ण (ब्रजस्थ मैथिल)क शर्मा।
पञ्जीमे कतेक विद्यापतिक विवरण
पञ्जीमे कतेक विद्यापतिक विवरण उपलब्ध अछि: १.पनिचोभ सँ विद्यापतिसुत रमापतिक विवाह विद्यापतिक- माता(देवदासी)-दूषण पंजी २.महो केशवो सुत म.म.पाō गोविन्द सुता महो लक्ष्मीनाथ म.म. विद्यापति म.म. दामोदर ३.महामहो विद्यापति गंगोली सँ मानकुढ़ वासी कविराज गणेश्वर ४.घोसोतसँ म.म. गोविन्द सुता म. लक्ष्मीधर म.म. विद्यापति ५.राजपण्डित म.म. उ. विद्यापति ६.करमहासँ देवनाथ सुत कवि विद्यापति ७.गुणपति सन्तति-पठोङगी)। । विद्यापति-पुडरीक-मछदी। केशव-अमरावती। ८.। । सिंहाश्रम सँविद्यापति द्दौo भागीरथ सुतौ कुलेश्वर: ९.सिधूक: ए सुता देल्हन विश्वनाथ श्रीनाथा: सिंहाश्रम सँ विद्यापति दौ। । १०.मिश्र जयदेव (७६/०६) सुता नगवाड़ घोसोत सँ महामहोपाध्याय विद्यापति दौ ११.महामहोपाध्याय गोविन्द सुता महामहो लक्ष्मीनाथा परनामक (२०९/०५) ठकरू मo मo उपाo विद्यापति १२.द्दौo। । एवम् ठo विद्यापति मातृक चक्रं। । १३.महोमहोपाध्याय विद्यापति सुता अनिरूद्ध अनन्त अच्युता: एकहरा सँ काशी दौ १४.सदुoसुपे सुतौ दामोदर: ए सुतौ डालूक: पवौलीसँ गोढि दौ डालू (३४/०६) सुतो विद्यापति १५.सुता शिरू पदम लाखू गादूका: एकहरा सँ श्री कर सुत चान्द दौ खौआल सँ भूले द्दौo मधुसूदन सुता उमापति (८४/०१) विद्यापति १६.मुसै सुता खौआल सँ डालू सुत विद्यापति दौ भण्डारिसम सँ शुभे द्दौo ठo १७.सोदरपुर सँ छोटाई दौ (२८/०८) बसाउन सुता पशुपति विद्यापति १८.कल्याण सुता करमहा सँ विद्यापति दौ १९.जालय सँ रामेश्वरसुत महिघर दौ यमुगाम सँ गेणाई द्दौo विद्यापति सुतो भगीरथ: २०.हरखू गोविन्दा सकo गुणे सुत विद्यापति दौ सुरगन सँ होरे द्दौo २१.कृष्णपति सुता मुरारि विद्यापति प्रजापति टकबाल सँ रामकर दौ। । २२.कविन्द्र पदांकित मo मo उo रघुनाथा करमहा सँ विद्यापति दौ २३.सुतो विद्यापति माण्डरसँ यग्यपति दौ २४.तल्हनपुर सँ गढ़वय द्दौ. विद्यापति २५.यशु सुतो रविपति रूद्रपति विद्यापति चन्द्रपति २६.नरउन सँ विद्यापति दौ २७.रविपति सुतो कृष्णपति विद्यापति घुसौत सँ होरे दौ। । २८.विद्यापति सुता बेलउँच सँराम दौ २९.गुणे सुत गौरीपति विद्यापति लक्ष्मीपति कुलपतिय: दरिo दिवाकर दौ ३०.महिपति झाक मातामह कवि कोकिल विद्यापति ठाकर) दामोदर सुतो पाँसदु. हरिदेव: नरउनसँ माङनि दौ ३१.गणपति सुतो कवि कोकिल राजपण्डित मo मo उपाo विद्यापति: ए सुतौ हरिपति धनपति। । ३२.महामहोपाध्याय विद्यापतिसुता हृषिकेश ३३.हरपति सुता विद्यापति काशी दामोदरा: ३४.रतिपति सुता सोदरo विद्यापति दौ ३५.विद्यापति प्रपौत्र पौत्र हरिश्वर धनेश्वर सुतो गोन्दूक पालीसँ ज्ञानदौ। । ३६.विद्यापति द्दौ. वेणी सुतो रविनाथ: ३७.सोदरo विद्यापति द्दौo निकार ३८.श्रीपति सुतो विद्यापति परानौ दरिहरा ३९.सोदरo विद्यापति द्दौo मिश्र कमलनयन सुता हरिअम सँ बछाई दौ ४०.रवौआलसँ सोने दौ देवनाथ सुतो कवि विद्यापति पचही सोदरपुरसँ जगन्नाथ दौ ४१.गोपी सुतो विद्यापति वाचस्पति शीवा हरिअमसँ नारायण दौ। । ४२.विद्यापति निधि प्र. धरापतिय: ४३.तरौनी करमहासँ महिधर दौ। । (४६/०३) विद्यापति (१११/०३) सुतो मधुसूदन: ४४.कुलानन्द हृदयनन्दनो कर. पनाई दौ (१०९//१०६) विद्यापति (३१४/०५) सुता प्रितिनाथ शोभनाथ महिनाथा: ४५.उँमापति सुत विद्यापति सुतो जयपति: ४६.जागू सुता सुरपति हरिपति प्रभापति गिरपति विद्यापतिय: ४७.हचलू सुता हरपति विद्यापति महो ज्ञानपति दिनपति मणिकंठा ४८.कृष्ण सुता रमापति श्रीपति रत्नपति विद्यापति: बूधवाल सँ धीरू दौ। । ४९.दाशे सुता दयोरी खण्डबला सँ गोपीनाथ दौ (८५//०२) विद्यापति सुत जीवनाथ ५०.नरउन सँ विद्यापति द्दौo ५१.धर्माधिक रणिक बाटू सुतो विद्यापति ५२.सोदरपुर सँ गयन दौ विद्यापति सुता रमापति होरिल हररवू जिवाईका माण्डर सँ सोढू दौ। । ५३.खौआल सँ रघुनाथ दौ (५४//०७) विद्यापति सुत जानू ५४.टकबालसँ विद्यापति द्दौ मतिनाथ ५५.खण्डबलासँ विद्यापति सुत जीवनाथ दौ ५६.करमहा सँ विद्यापति द्दौo विश्वनाथ ५७.कृष्णपति सुतो उँमापति (बo २८/०१) विद्यापति (३०२/०३) पण्डुआ सँ पाँ भगीरथ दौ ५८.महो हरिकृष्ण सुता खौआल सँ विद्यापति दौ ५९.मधुसूदन सुतो विद्यापति: अलय सँ अनिरूद्ध दौ ६०.माण्डर सँ देवशर्म्म द्दौo विद्यापति सुता नरउन सँ बदनी दौ ६१.ठo श्याम सुतो पुरन्दर परमानन्दो माण्डर सँ विद्यापति दौ ६२.विद्यापति सुता सोदरपुर सँ जयराम ६३.धर्मेश्वरौ खौआल सँ हराई सुत मनोहर दौ रूद सुतो राम: गंगोली सँ देवे दौ विस्फी सँ कवि कोकिल राज पण्डित मo मo पाo विद्यापति द्दौo राम सुतो भिरवूक: फनन्दह सँ लोचन दौ पकलिया सँ दिनू द्दौo भिरवू सुतो हराइक: सोदरपुर सँ विर सुत हरिदौ खौआल सँ शुभे द्दौo हराई सुता मोहन मनोहरा कमल नारायणा: सोदरपुर सँ जगन्नाथ सुत भवानी दौ भवानी सुतो हरिदेव सदायकौ हरिअम सँ गोविन्द सुत श्रीधर दौ सकo जागे द्दौo मनोहर सुता करमहा सँ रतनपति सुत कृष्णदाश दौ कृष्णदाश सुता सोदरपुर सँ मधुसूदन सुत सुन्दर दौ (४७//०५) दरिहरा सँ मुशाई द्दौo हरि सुतो प्राणपति: सोदरपुर सँ नारायण सुत ननू दौ (११०//०१) (१०१//०१) नारायण सुतो ननूक: वुधवाल सँ बहुड़ी दौ (१८०/०४) दामोदर सुतो बहुड़ीक: सोदरपुर सँ परमानन्द सुत कांगव दौ परमानन्द सुतो कांगव: माण्डर सँ हलघर सुत पीताम्बर दौ (५८//०५) करमहा सँ श्रीराम द्दौo कांगव सुता करमहा सँ शिवदेव सुत कारम दौ माण्डर सँ वावू दौहित्र दौo ६४. वावू दुर्गापति सिंह: सुतो वावू विद्यापति सिंह: करमहा सँ हरिनाथ सुत तारानाथ दौ ६५. खौआल सँ युवराज द्दौo बावू विद्यापति सिंह सुतो वावू गिरिजापति सिंह ६६.वावू गंगापति सिंह सुता भेषपति सिंह विद्यापति सिंह ६७.वावू भेषपति सिंह पत्नी अन्तर्जातीय ए सुत हंसपति सिंह: वावू विद्यापति सिंह सुतो रमन कुमार सिंह: ६८.बाला सुतो भैया कल्याणौ खौआल सँ विद्यापति दौ ६९.विश्वनाथ काशीनाथा: अलय सँ विद्यापति दौ ७०.पाठक विद्यापति सुतो दुखमंजन कलरौ आसी एकहरा सँ उँमानन्द दौ ७१.नरपति सुता कल्याणपुर विस्फी सँ सुन्दर दौ कमलनयन सुत नारायण सुतो सुन्दर: करमहा सँ विद्यापति दौ ७२.मुरारि सुता दामोदर विद्यापति महिघर आनन्दा: ७३.विद्यापति सुता पद्मापति सभापति आदिपति गणपतिय: । । ७४.विद्यापति सुतो छीतू परमानन्दो माण्डर सँ नरपति दौ बहेराढ़ी सँ गदाधर द्दौo ७५.अलय सँ कमल सुत नकटू दौ. विद्यापति सुत जीवनाथ सुतो परम: दरि. राम दौ। । ७६.करमहा सँ विद्यापति सुत मधुसूदन दौ ७७.मानी सोदरपुर सँ वाचस्पति सुत विद्यापति दौ ७८.खण्डबला सँ वावू दुर्गापति सिंह सुत वावू विद्यापति सिंह दौ ७९.खौआल सँ विद्यापति दौ ठ. मधुरापति सुतो वाछ शिवानन्दनो८०.सोदरपुर सँ बैद्यनाथ द्दौ. हरिकृष्ण सुता खौआल सँ मधुसूदनसुत विद्यापति दौ ८१.मधुसूदन सुत विद्यापति दौ ८२.दरिहरा सँ रमापति सुत वेणी दौ अलय सँ कृष्णपति सुत विद्यापति द्दौ ८३.अलय सँ विद्यापति द्दौ.॥ ८४.ज्यो. शिवनन्दन सुतो विद्यापति. ८५.खौआल सँ भवदेव सुत विद्यापति दौ. ८६.पाठक कृष्णपति सुतो उषापति विद्यापति. ८७.विद्यापति सुतो दुखभंजन कलरो एकहरा सँ देवानन्द सुत उँमानन्द दौ ८८.अलय सँ विद्यापति सुत कलरु दौ ८९.कारु सुता पिताम्बर विद्यापति देवकीमाना का सोदरपुर सँ वैदयनाथ सुत जयि दौ ९०.सुरोइ प्र. शारदानन्द सुता गौरीनन्दन वाचस्पति प्र. विद्यापति दिवाकर प्र. मन्दू रत्नाकर प्र.भ्र. भोलन जी का नग. घुसौत सँ दामोदर सुत उग्रमोहन दौ एकहरा सँ शोभानन्द द्दौ.९१.खौआल सँ विद्यापति दौ.
आब आउ मूल मुद्दापर
हमरा राजपण्डित आ आर कतेक रास धर्माधिकारणिक विद्यापति सभ जैमे एकटा देवदासीक पुत्र सेहो रहथि, केर ब्राह्मण हेबामे कोनो सन्देह नै अछि। हम विद्यापति ठक्कुरः आ कीर्तिलता कीर्तिपताका नै वरन विद्यापति पद्यावलीक गप कऽ रहल छी। तेँ कोनो ओझरीमे नै रहल जाए। आब आउ गएर ब्राह्मण द्वारा गाओल बिदापत, जे ज्योतिरीश्वरसँ पूर्व (सम्भवतः ) बार्बर कास्टमे भेल रहथि आ तकर प्रमाण ज्योतिरीश्वर द्वारा वर्णन रत्नाकरमे ऐ कवि आ ओकर कृतिक चर्चा अछि।
महादेव मूलतः गएर ब्राह्मणक देवता रहथि, आस्ते-आस्ते ओ ब्राह्मण लोकनि द्वारा अपनाओल गेलाह। विद्यापतिक कोनो पद्यावलीक रचनामे हुनकर संस्कृत/ अवहट्ठ लेखक हेबाक चर्च नै अछि। मुदा हुनकर रचना (संस्कृत आ अवहट्ठक विरुद्ध, जे दोसर विद्यापतिक रचना छी, जे ब्राह्मण रहथि) सर्वहाराक लेल जे दर्द अछि से संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिमे किए नै अछि? उदाहरण देखू।
विद्यापतिक बिदेसिया- पिआ देसाँतर आ बिदापत नाच
भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी रहथि, घुरि कय अएलाह आ भोजपुर क्षेत्रमे अपन कष्टक वर्णन जाहि मर्मस्पर्शी रूपसँ गामे-गामे घुमि कए आ गाबि कए सुनओलन्हि से बनल बिदेसिया नाटक। मिथिलामे प्रवास आजुक घटना छी, गामक-गाम सुन्न भऽ गेल अछि। मिथिलाक बिदेसिया लोकनि देशक कोन-कोनमे पसरि गेल छथि। मुदा पहिने भोजपुर इलाका जेकाँ प्रवासक घटना मिथिलामे नहि छल। प्रवास मोरंग धरि सीमित छल जे नेपालक मिथिलांचल क्षेत्र अछि। आ ताहिसँ मैथिलीमे लोकगाथाक सूक्ष्म विवरणक बड़ अभाव, जे अछियो से लोकगाथा नायकक विवरण नहि वरन महाकाव्यक नायकक मैथिलीमे विवरण जेकाँ अछि, आ बोझिल अछि, भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक जोड़ नहि। सलहेसक कथाक विवरण लिअ, क्षेत्रीय परिधि पार करिते सलहेस राजासँ चोर बनि जाइत छथि आ चोरसँ राजा। तहिना चूहड़मल क्षेत्रीय परिधि पार करिते जतए सलहेस राजा बनैत छथि ओतए चोर बनि जाइत छथि, आ जतए सलहेस चोर कहल जाइत छथि ओतुक्का राजा/ शक्तिशालीक रूपेँ जानल जाइत छथि। मुदा एहि सभपर कोनो शोध नहि भए सकल अछि। एहि क्रममे विद्यापतिक पद्यावलीक पद सभमे तकैत हमरा समक्ष विभिन्न प्रकारक गीत सभ सोझाँमे आएल। एहिमे जे अधिकांश छल से रहए प्रेमी-प्रेमिकाक विरहक विवरण आ बिदेसियाक जे मूल कनसेप्ट अछि- रोजी-रोटी आ आजीविका लेल मोन-मारि कए प्रवास, ताहिसँ फराक। तखन जा कए हमरा किछु विशुद्ध बिदेसिया जकरा विद्यापति पिआ-देसाँतर कहैत छथि भेटल। एहिमे स्वाभाविक रूपेँ अधिकांश विद्यापतिक नेपाल पद्यावलीसँ भेटल आ एकटा नगेन्द्रनाथ गुप्तक संग्रीहीत पद्यावलीसँ। मोरंग नेपाल स्थित मिथिलाक भाग अछि आ प्रवास लेल प्रसिद्ध छल, से एकर सम्भावित कारण।
ताहि आधारपर विद्यापतिक पिआ देसाँतर स्टेजपर खेलायल जाइत छल।
से बिदापत नाच आ पिआ देसाँतर दू टा नाटक बिदापतक पद्यावलीपर आधारित अछि।
मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि।
की ई दर्द अवहट्ठ आ संस्कृतक विद्यापतिमे छन्हि?
पद्यावली एकटा पैरेलल संस्कृतिक द्योतक अछि। एक्के समयमे संस्कृत आ अवहट्ठ एक्के लेखक लिख लेत, ओकरा कष्ट छै जे अवहट्ठमे लिखलापर विद्वान ओकर उपहास करै छथि, मुदा ई दर्द की एकर लेशोमात्र पद्यावलीक विद्यापतिमे नै छन्हि। ओतए तँ उल्लास आ दर्द छै, सर्वहाराक उल्लास आ दर्द। ओ विद्यापति जे संस्कृत आ अवहट्ठ (पालि ताली नै) ओ राजपण्डित छला से विद्वान रहथि, हुनका अवहट्ठोमे लिखलापर लोक निन्दा करन्हि। मुदा मैथिलीक विद्यापति जे पैरेलल परम्पराक अंग छथि, ओइसँ दूर छला। ई पैरेलल परम्परा ऋगवेदक समयसँ छै (ओइ समयमे नाराशंसी रहै)। ई पैरेलल परम्पराक विद्यापति बार्बर कास्टक रहबे करथि, वा ब्राह्मण कास्टक रहबे करथि, से इतिहास ओइपर मौन अछि। मुदा लोककथा आ परम्परा, बिदापतक सर्वहारासँ सघन सम्बन्ध, बिस्फीक परम्परा हुनका गएर ब्राह्मण सिद्ध करैए। संस्कृत आ अवहट्ठक कोनो पाँति नहिये ओइ विद्यापतिक पद्यावलीक चर्चा करैए; आ नहिये पद्यावली पद्यावलीक विद्यापतिक संस्कृत वा अवहट्ठ केर रचनाक चर्चा करैए। संस्कृत आ अवहट्ठ मुस्लिम आक्रमणक, जनौ आ मन्दिर भ्रष्ट हेबापर दुखी अछि मुदा पद्यावली तँ सर्वहाराक हर्ष, उल्लास आ संघर्ष अछि; ओइ तरहक हाक्रोस ओतए नै। आ जखन मैथिलीबला विद्यापति ब्राह्मण रहबो करथि वा नै तहीपर सवाल अछि तखन पाग पहिरा कऽ कोन सोच हम सभ पैदा कऽ रहल छी, "विद्यापति" हम्मर छलाह की नै? की विद्यापतिक ब्राह्मण नै रहलासँ ओ हमर नै हेताह? की हुनकर "पिआ देशांतर" बला माइग्रेशन बला गीत महत्वहीन भए जेतै? की हुनकर सृन्गरिक गीतक मात्र चर्चा कोनो षड़यंत्र तं नै? विद्यापति सन कविकेँ पाग पहिरा कऽ जातिगत बन्धनमे बान्हब कतेक सही अछि? "मध्यकालीन मिथिला"मे विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि। " (पृ.२६) तँ ईहो तंत्र मंत्र बियाह उपनयन धरि ने रहए दियौ। किए ओइ पैरेलल परम्पराक विद्यापतिकेँ ओइमे सानै छियन्हि। जँ ओ बार्बर कास्टक रहथि तैयो आ जँ ब्राह्मण रहथि तँ आरो (कारण २१म शताब्दीक ब्राह्मणक कट्टरता तँ देखिये रहल छी आ ई हजार साल पुराण ब्राह्मण जँ पैरेलल परम्पराक रहथि तँ पागरूपी सामन्तवादी अवशेष तांत्रिक धार्मिक कर्ममे मात्र प्रयुक्त हुअए, विद्यापतिक माथपर नै)।
दू विद्यापति: किछु किंवदन्ती आ किछु तथ्य: बोधि कायस्थ: उगना महादेव
मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)
मैथिलीक आदिकवि विद्यापति ( विद्यापतिक चित्र: विदेह चित्रकला सम्मानसँ पुरस्कृत पनकलाल मण्डल द्वारा)
कवीश्वर ज्योतिरीश्वर(लगभग १२७५-१३५०)सँ पूर्व (कारण ज्योतिरीश्वरक ग्रन्थमे हिनक चर्च अछि), मैथिलीक आदि कवि। संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरःसँ भिन्न। सम्भवतः बिस्फी गामक बार्बर कास्टक श्री महेश ठाकुरक पुत्र। समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पद्यावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति: - कश्मीरक अभिनव गुप्त (दशम शताब्दीक अन्त आ एगारहम शताब्दीक प्रारम्भ)- ग्रन्थ ईश्वर प्रत्याभिज्ञा- विभर्षिणी मे विद्यापतिक उल्लेख करै छथि। श्रीधर दासक सदुक्तिकर्णामृत, (रचना ११ फरबरी १२०६, मध्यकालीन मिथिला, वि.कु. ठाकुर)- श्रीधर दास विद्यापतिक पाँच टा पद उद्धृत केने छथि जे विद्यापतिक पद्यावलीक भाषा छी।
जाव न मालतो कर परगास
तावे न ताहि मधुकर विलास। आ
मुन्दला मुकुल कतय मकरन्द
ज्योतिरीश्वर (१२७५-१३५०) षष्ठः कल्लोल- ॥अथ विद्यावन्त वर्णना॥ अष्टमः कल्लोलः- ॥अथ राज्य वर्णना॥ मे उल्लेख।
समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पद्यावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि।
विद्यापति ठक्कुरः 1350-1435 विषएवार बिस्फी-काश्यप (राजा शिवसिंहक दरबारी) आ संस्कृत आ अवहट्ठ लेखक। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, गोरक्षविजय, लिखनावली आदि ग्रंथ समेत विपुल संख्यामे कालजयी रचना। ई मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)सँ भिन्न छथि।
बोधि कायस्थ
विद्यापति ठक्कुरःक पुरुष परीक्षामे हिनक गंगालाभक कथा वर्णित अछि। महाकवि विद्यापति(ज्योतिरीश्वर पूर्व मैथिली पद्यावली सभक लेखक) क विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित आ बादमे विद्यापति ठक्कुरक (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक)विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित भेल।
उगना महादेव
महादेव (उगनारूपी) विद्यापतिक अहिठाम गीत सुनबा लेल उगना नोकर बनि रहैत छलाह। मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व) आ विद्यापति ठक्कुरः (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक आ राजा शिवसिंहक दरबारी) दुनूसँ सम्बद्ध कऽ उगनाक ई कथा प्रसिद्ध भेल।
विद्यापतिक मिथिला सांस्कृतिक परिषद द्वारा यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग-प्रतिष्ठापन
संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापति ठक्कुरः आ कविकोकिल विद्यापतिक बीचक अन्तर "मिथिला सांस्कृतिक परिषद" आ ओइसँ जुड़ल "किशोरीकान्त मिश्र" आदि नै बुझि सकला वा नै बूझऽ चाहलन्हि। ऐतिहासिक लिखित तथ्य अछि जे गोनू झा १०५०-११५० मे भेलाह मुदा उषा किरण खान संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिसँ हुनकर शास्त्रार्थ करबै छथि (हिन्दीक ऐतिहासिक उपन्यास सिरजनहार, भारतीय ज्ञानपीठमे)। वीरेन्द्र झा कहै छथि जे गोनू झा ५०० साल पहिने भेला आ तारानन्द वियोगी गोनू झा केँ ३०० साल पहिने भेल मानै छथि (दुनू गोटेक हिन्दीमे प्रकाशित गोनू झापर पोथी, क्रमसँ राजकमल प्रकाशन आ नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित) तँ विभा रानीक गोनू झापर हिन्दी पोथी (वाणी प्रकाशन) मे कुणाल गोनू झाकेँ भव सिंहक राज्यमे (१४म शताब्दी) भेल मानैत छथि। जखन पंजीमे उपलब्ध लिखित अभिलेखन गोनू झाकेँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिसँ दस पीढ़ी पहिने अभिलेखित करैत अछि, तखन ई हाल अछि।
समानान्तर परम्पराक विद्यापति आ पाग- विद्यापतिक संस्कृत ग्रन्थमे ठक्कुर विद्यापति कृता लिखल अछि/ आ ओ विद्यापति ब्राह्मण छथि। हमर उद्देश्य मैथिली पद्यावली बला विद्यापतिसँ अछि, हुनका किए पाग पहिरा कऽ "हम्मर विद्यापति" बना लेल गेल। ई तखन नै भेल जखन बिदापत नाचक माध्यमसँ आठ सए बर्ख गएर ब्राह्मण समुदाय विद्यापतिकेँ जिएने रखलक, मुदा तखन भेल जखन बंगाल विद्यापति आ गोविन्ददासक पद्यावलीकेँ अपन बना लेलक मुदा बंगालेक विद्वान राजकृष्ण मुखोपाध्याय सर्वप्रथम १८७५ ई. मे कहलन्हि जे विद्यापति मिथिलाक कवि छथि आ बंगालेक नगेन्द्रनाथ गुप्त सर्वप्रथम कहलन्हि जे गोविन्ददास सेहो मिथिलाक कवि छथि आ जखन ई तथ्य सोझाँ उठल तँ पहिने तँ सगर बंगाल हुनकापर मार-मार कऽ उठल आ बादमे मानि गेल।
राजकृष्ण मुखोपाध्याय जइ विद्यापतिकेँ मिथिलाक कहने रहथि ओ पद्यावलीक विद्यापतिक सन्दर्भमे छल, संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरः केँ बंगाल कहियो अपन नै कहने छल।
ज्योतिरीश्वरक संस्कृत धूर्तसमागम नाटक आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक गोरक्षविजय नाटक मध्य देल मैथिली गीत सेहो पद्यावलीक पुरान परम्पराक द्योतक अछि आ ऐ दुनू लेखकपर मैथिली पद्यावलीक प्रभाव देखबैत अछि।
फेर मिथिलाक विद्वानकेँ सोह एलन्हि आ विद्यापतिक संस्कृत-अवहट्ठ ग्रन्थ, गोविन्ददास नाम्ना आ विद्यापति नाम्ना पञ्जीमे उपलब्ध विवरण दऽ विद्यापति ठाकुर आ गोविन्ददास झा (! ! ! ) निकालल गेल, एतऽ रमानाथ झाक पञ्जीक सतही ज्ञान आ सीमित दृष्टिकोण नोकसान पहुँचेलक। फेर अनचोक्के पाग पहिरा कऽ (मिथिला सांस्कृतिक परिषद- ई संस्था भारतक स्वतंत्रताक बाद विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ हुनका ब्राह्मण घोषित करबाक कुकृत्य केलक) विद्यापति (मैथिली बला, संस्कृत बला नै) केँ "हम्मर विद्यापति" ब्राह्मण वर्ग द्वारा बना लेल गेल। मुदा कवीश्वर ज्योतिरीश्वर सन बहुत रास कवि पञ्जीमे उपलब्ध छथि। आ जे नामक अन्तर विद्यापतिमे आबि जाइ छन्हि (जखन कि सभ काज प्लानिंगसँ भेलै तैयो एकटा सबूत बचि गेलै) से ज्योतिरीश्वरमे किए नै अबैए।
आब आउ गएर ब्राह्मण द्वारा गाओल बिदापत, जे ज्योतिरीश्वरसँ पूर्व (सम्भवतः) नौआ ठाकुर जातिमे भेल रहथि आ तकर प्रमाणमे ज्योतिरीश्वर द्वारा वर्णन रत्नाकरमे ऐ कविक चर्चा अछि।
विद्यापतिक कोनो पद्यावलीक रचनामे अपन संस्कृत/ अवहट्ठ लेखक हेबाक चर्च नै केने छथि। मुदा हुनकर रचना (संस्कृत आ अवहट्ठक विरुद्ध, जे दोसर विद्यापतिक रचना छी, जे ब्राह्मण रहथि) सर्वहाराक लेल जे दर्द अछि से संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिमे किए नै अछि? संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति तँ सर्वहारासँ घृणा करै छथि आ लिखित रूपमे कट्टर ब्राह्मण छथि।
मुदा पद्यावलीक विद्यापति तँ निश्छल छथि, किछु कट्टर पद कट्टर ब्राह्मणवादी सम्पादक लोकनि द्वारा घोसोआओल गेल अछि (हास्यास्पद रूपमे)।
पिआ देसान्तर (विद्यापतिक बिदेसिया)क कन्सेप्ट आब सुधीगणक समक्ष अछि आ मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि। की ई दर्द अवहट्ठ आ संस्कृतक विद्यापतिमे छन्हि?
पद्यावली एकटा पैरेलल संस्कृतिक द्योतक अछि। एक्के समयमे संस्कृत आ अवहट्ठ एक्के लेखक लिख लेत, ओकरा कष्ट छै जे अवहट्ठमे लिखलापर विद्वान ओकर उपहास करै छथि, मुदा ई दर्द की एकर लेशोमात्र पद्यावलीक विद्यापतिमे छन्हि? ओतए तँ उल्लास आ दर्द छै, सर्वहाराक उल्लास आ दर्द। ओ विद्यापति जे संस्कृत आ अवहट्ठ मे लिखलन्हि ओ राजपण्डित छला से विद्वान रहथि, हुनका अवहट्ठोमे लिखलापर लोक निन्दा करन्हि। मुदा मैथिलीक विद्यापति जे पैरेलल परम्पराक अंग छथि, ओइसँ दूर छला। ई पैरेलल परम्परा ऋगवेदक समयसँ छै (ओइ समयमे नाराशंसी रहै)। ई पैरेलल परम्पराक विद्यापति नौआ ठाकुर जातिक रहबे करथि, वा ब्राह्मण जातिक रहबे करथि, से इतिहास ओइपर मौन अछि।
मुदा लोककथा आ परम्परा, बिदापतक सर्वहारासँ सघन सम्बन्ध, बिस्फीक परम्परा हुनका गएर ब्राह्मण सिद्ध करैए। संस्कृत आ अवहट्ठक कोनो पाँति नहिये ओइ विद्यापतिक पद्यावलीक चर्चा करैए आ नहिये पद्यावली पद्यावलीक विद्यापतिक संस्कृत वा अवहट्ठ केर रचनाक चर्चा करैए। संस्कृत आ अवहट्ठ मुस्लिम आक्रमणक, जनौ आ मन्दिर भ्रष्ट हेबापर दुखी अछि मुदा पद्यावली तँ सर्वहाराक हर्ष, उल्लास आ संघर्ष अछि; ओइ तरहक हाक्रोस ओतए नै, हुनका समएमे तँ प्रायः मुस्लिम मिथिलामे रहबो नै करथि। आ जखन मैथिलीबला विद्यापति ब्राह्मण रहबो करथि वा नै तहीपर सवाल अछि तखन पाग पहिरा कऽ कोन सोच हम सभ पैदा कऽ रहल छी, "विद्यापति" हम्मर छलाह कि नै? की विद्यापतिक ब्राह्मण नै रहलासँ ओ हमर नै हेताह? की हुनकर "पिआ देशांतर" बला माइग्रेशन बला गीत महत्वहीन भऽ जेतै? की हुनकर शृंगारिक गीतक मात्र चर्चा कोनो षडयंत्र तँ नै? विद्यापति सन कविकेँ पाग पहिरा कऽ जातिगत बन्धनमे बान्हब कतेक सही अछि? "मध्यकालीन मिथिला"मे विजय कुमार ठाकुर लिखै छथि: "मिथिलाक धार्मिक क्षेत्रमे एहि सामन्तवादी युगीन धार्मिक विचारधाराक प्रभाव एहन सर्वव्यापी छल जे एखनहुँ एहि परम्पराक निम्नलिखित अवशेष समाजमे विद्यमान अछि: ...(घ) पाग सेहो तांत्रिक विचारधारासँ सम्बद्ध अछि। " (पृ.२६)
तँ ईहो तंत्र मंत्र बियाह उपनयन धरि ने रहए दियौ। किए ओइ पैरेलल परम्पराक विद्यापतिकेँ ओइमे सानै छियन्हि। आ ई कुकृत्य किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषद केलक। ऐ तरहक लोक जै मिथिलाक संस्कृतिक रक्षक, ओ संस्कृति आ भाषा जँ आइयो बाँचल छै, तँ ई ओइ संस्कृति आ भाषाक विशेषता छिऐ।
चेतना समितिक पत्रिकामे मानेश्वर मनुज मंच सापेक्ष बयानमे जगदीश प्रसाद मण्डलक उपन्यासक संख्या मात्र ४ लिखलन्हि! ! !
जगदीश प्रसाद मण्डलक नाममे जँ मण्डल टाइटिल नै रहैत मात्र जगदीश प्रसाद रहैत तँ रमानाथ झाक अनुयायी हुनका श्रोत्रिय, अमर-रामदेव झाक अनुयायी हुनका ब्राह्मण आ "लालदासक स्मारिका"क लेखक वर्मा जी हुनका कायस्थ घोषित कऽ दैतथि।
आ जँ जगदीश प्रसाद मण्डलक फोटो उपलब्ध नै रहितै तँ किशोरीकान्त मिश्रक प्रतिक्रियावादी मिथिला सांस्कृतिक परिषद जगदीश प्रसाद मण्डलक यज्ञोपवीत संस्कार कऽ हुनका पाग पहिरा फेर वएह कुकृत्य करितए जे ओ विद्यापतिक संग एक हजार सालक बाद केलक। आ बेरमाक कोनो बुढ़बा माटिक ढिमकाकेँ देखबैत जगदीश प्रसाद "झा/ ठक्कुरः" केर काल्पनिक घराड़ी, यएह छी, घोषित कऽ दितए।
मलंगियाक बेटा, रामदेव झाक बेटा आ ढेर रास छद्मनामीक देल गाड़ि सेहो विदेहमे बिना काँट-छाँटक छपने अछि, जे लोक पढ़ि सकए, किछु गाड़ि जे नै छापल जा सकैए, सएह टा नै छपने छी। आ गारिक डरसँ अखन धरिक मैथिली आ मिथिलाक इतिहासकार ऐ विषयपर इशारा तँ केलन्हि मुदा आगाँ नै बढ़ला।
तेँ ओ ज्योतिरीश्वर(१२७५-१३५०) पूर्व विद्यापतिये रहथि से फेर सिद्ध होइए। जयदेव (लगभग १२००)क गीत-नृत्य आ किरतनियाँ ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक पद्यावली मेल खाइत अछि, संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक काव्य सौष्ठवसँ मेल नै खाइत अछि।
आब पुनः आबी मिथिला सांस्कृतिक परिषदक मंच। ई परिषद विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार नै, मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार केलक। ओकर विद्यापतिकेँ पहिराओल पाग, कोलकातासँ बिन्ध्येश्वर मण्डल आ श्रीकान्त मण्डलकेँ लुप्त कऽ देलक आ मैथिलीक यज्ञोपवीत संस्कार पूर्ण भऽ गेल।
संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक जातिगत कट्टरताक बानगी देखी: -
कीर्तिलता- जाति-अजातिक विवाह अधम कएँ पारक।
पुरुष-परीक्षामे विद्यापति कथा कहैत-कहैत लेखकीय वक्तव्य दै छथि कि राजपूतक स्त्री चरित्रहीन होइत अछि, ई ओहिना भेल जेना अथर्ववेदमे शूद्रक पत्नीकेँ बिना स्वीकृतिक कियो हाथ पकड़ि लऽ जा सए बला वक्तव्य, अथर्ववेद बा कोनो वेदमे ओइ तरहक वक्तव्य कहियो नै आयल छल।
शुक्ल यजुर्वेद (२६.२)-यथेमां वाचं कल्याणीमावदानि जनेभ्यः। ब्रह्मराजन्याभ्यां शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च। । हम सभ गोटेकें ई पवित्र वाणी (वेदवाणी) सुनाबी। ब्राह्मणकें, क्षत्रियकें, शूद्रकें आ आर्यकें; अपन लोककें आ अपरिचितकें सेहो (माने सभकें)। मुदा ऐ वेदवाक्यक विपरीत मनुस्मृति वेदवाणीक अध्ययन/ श्रवणकें समाजक किछु गोटे लेल निषेध करऽ चाहलक, मुदा स्मृति सेहो वेदवाक्यकें प्रमाण मानैत अछि (शब्द प्रमाण) तें तकर विरुद्ध देल ओकर निर्देश स्वयं अमान्य भऽ जाइत अछि।
मुदा पुरुष परीक्षामे तँ अछि, आ अहाँकँ लगैए जे संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतक ई साधांस हेतन्हि जे अपन आश्रयदाताक जातिक स्त्रीक प्रति एहेन लिखि सकता?
संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति जाति-अजातिपर विशेष बल दै छथि, रक्त शुद्धता/ जाति हुनका लेल महत्वपूर्ण छन्हि। संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति कहै छथि- अकुलीन कोनो दयाक अधिकारी नै अछि! ! आ सौन्दर्य मात्र धनिक आ विशिष्ट वर्गक एकाधिकार अछि! ! संस्कृत आ अवहट्ठबला (किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषदक जनौ आ पागबला) विद्यापति कहै छथि- जाति सामाजिक जीवनमे अन्तिम निर्धारक तत्व अछि। जे खराप कुलमे जन्म लैए ओ दुष्ट दिमागक साँप मात्र बनि सकैए! ! किशोरीकान्त मिश्रक मिथिला सांस्कृतिक परिषदक जनौ आ पागबला संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति कहै छथि- ओ देश जतऽ जातिक निअम लागू नै होइए से म्लेच्छ देश थिक। (मध्यकालीन मिथिलाक समाज आ अर्थव्यवस्थाक पक्ष — उपेन्द्र ठाकुर)
अमीर खुसरोसँ पहिने पागक वर्णन हमरा नै भेटल अछि।
मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति (पद्यावलीक लेखक) कहै छथि: - नृप इथि काहु करथि नहि साति।
पुरख महत सब हमर सजाति॥
ताहि द्वारे राजा ककरो दण्ड नहि दैत छथि आ सभटा पैघ लोक एके रंग छथि।
गोविन्ददासक पद्यो क्लिष्ट छलन्हि आ एकर समानान्तर परम्परा सेहो नै छल (सम्भवतः सवर्ण मध्य प्रचलनक कारण ई दुनू चीज छल), से बिदापत नाच जकाँ ओ एतुक्का माँटिमे संरक्षित नै भऽ सकल। गंगेश उपाध्यायक तत्त्वचिन्तामणिक चर्चा मुदा वर्धमान जे हुनका सुकविकैरवकाननेन्दुः कहै छथि, ओ कविता सभ कतऽ गेल? पक्षधर लिखैपर प्रतिबन्ध लगेलन्हि मुदा रघुनाथ शिरोमणि आ हुनकर शिष्य “उदयन” आ “गंगेश”क कृतिकेँ रटि कऽ चलि गेलाह आ नवद्वीपमे नव्य-न्याय स्कूलक स्थापनाक संगे बंगालसँ विद्यार्थी एनाइ बन्द भऽ गेल।
ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति: - कश्मीरक अभिनव गुप्त (दशम शताब्दीक अन्त आ एगारहम शताब्दीक प्रारम्भ)- ग्रन्थ “ईश्वर प्रत्याभिज्ञा- विभर्षिणी” मे विद्यापतिक उल्लेख करै छथि।
श्रीधर दासक सदुक्तिकर्णामृत, - श्रीधर दास विद्यापतिक पाँच टा पद उद्धृत केने छथि जे विद्यापतिक पद्यावलीक भाषा छी।
“जाव न मालतो कर परगास
तावे न ताहि मधुकर विलास।”
आ
“मुन्दला मुकुल कतय मकरन्द”
(मध्यकालीन मिथिला, विजय कुमार ठाकुर)
ज्योतिरीश्वर (१२७५-१३५०) षष्ठः कल्लोल- ॥अथ विद्यावन्त वर्णना॥….. विदातञो आस्थान भीतर भउ. तका पछा तेलङ्गी. मरहठी. वि। दओतिनी दुइ चित्रकइ गाङ्ग जउन निहालि अइसनि देषुअह. चउआञ्चरि चीरि एकहोङ्क परिहने …….से कइसन देषु. जइसे प्रयागक्षेत्र सरस्वतीकेँ गङ्गाजमुनाक सम्वाहि। का हो तइसे ता विदाञोतके दुअओ सम्वाहिका हो भउअह. दशञुन्धी राजा अवधान कराउ. विदाञोत आस्थान वइसु.
(विदाञोत (पुरुख) भीतर भेल, तकर पाछाँ तेलङ्गी, मरहठी। विदओतनी (स्त्री) दूटा रंगक गङ्गा यमुनामे नहायलि एहन देखाइए। चारि-चारि आँचरबला चीर एकहकटा पहिरने। से केहन देखू. जेना प्रयागक्षेत्र सरस्वतीकेँ गङ्गाजमुनाक संगबे तेहने ओइ विदाञोतकेँ दुनू सम्वाहिका। दशञुन्धी राजाकेँ अवधान करेलक, विदाञोत स्थानपर बैसला।
अष्टमः कल्लोलः- ॥अथ राज्य वर्णना॥ …विदाञोत त। न्हिक गीत. नृत्य. वाद्य. ताल. घाघर परिठरइतेँ आह…
विदाञोत लोकनिक गीत, नृत्य, वाद्य, ताल, घाघर पहीरि कऽ भेल।
उगना महादेव: महादेव (उगनारूपी) विद्यापतिक ऐठाम गीत सुनबा लेल उगना नोकर बनि रहै छलाह। मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व) आ विद्यापति ठक्कुरः (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक आ राजा शिवसिंहक दरबारी) दुनूसँ सम्बद्ध कऽ उगनाक ई कथा प्रसिद्ध भेल।
बोधि कायस्थ: विद्यापति ठक्कुरःक पुरुष परीक्षामे हिनक गंगालाभक कथा वर्णित अछि। महाकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व मैथिली पद्यावली सभक लेखक) क विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित छल आ बादमे विद्यापति ठक्कुरक (संस्कृत आ अवहट्ठक लेखक) विषयमे सेहो गंगालाभक ई कथा प्रचलित भेल।
विद्यापति ठक्कुरःक संस्कृत साहित्य मिथिलाक विद्वान परम्पराक लोपक बाद सोझाँ आएल, आ संस्कृत साहित्यमे विद्यापति ठक्कुरःक कोनो खास चर्च नै भेटैत अछि आ बंगालक विद्यार्थीक एनाइयो कम भऽ गेल छल, जे अबितो रहथि हुनका लेल विद्यापति ठक्कुरःक संस्कृत आ अवहट्ठ साहित्य समकालीनक साहित्य छल जे खतम होइत विद्वता परम्पराक साहित्य छल आ सेहो तखन लिखाइये रहल छल, मुदा ज्योतिरीश्वर-पूर्व पद्यावली प्रसिद्धि प्राप्त कऽ लेने छल। ओइ कालक गोनू वा विद्यापतिक समय पाग रहबो करए सेहो निश्चित नै, कारण अमीर खुसरो (१२५३-१३२५) मात्र एकर चर्च केने छथि। विजय कुमार ठाकुर एकरा सामन्तवादी प्रतीक आ तंत्र मंत्रसँ सम्बद्ध मानै छथि। मुस्लिम आक्रमणक बाद अधीनस्थ सामन्तकेँ ई पहिराओल गेल हएत आ ई मुस्लिम टोपीसँ मेल खाइतो अछि, आ मात्र ब्राह्मण-कायस्थ मुस्लिम आक्रमणक बाद मिथिलामे सामन्त रहथि (राजपूत नै) आ आइयो अही दू वर्गक बीच ई कहियो काल बियाह आदिमे प्रयुक्त होइए।
महाकवि विद्यापति- कवीश्वर ज्योतिरीश्वर(लगभग १२७५-१३५०)सँ पूर्व (कारण ज्योतिरीश्वरक ग्रन्थमे हिनक चर्च अछि), मैथिलीक आदि कवि। संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति ठक्कुरःसँ भिन्न। सम्भवतः बिस्फी गामक नौआ ठाकुर श्री महेश ठाकुरक पुत्र (परम्परा अनुसार)। समानान्तर परम्पराक बिदापत नाचमे विद्यापति पद्यावलीक (ज्योतिरीश्वरसँ पूर्वसँ) नृत्य-अभिनय होइत अछि।
विद्यापति ठक्कुरः १३५०-१४३५ विषएवार बिस्फी-काश्यप (राजा शिवसिंहक दरबारी) आ संस्कृत आ अवहट्ठ लेखक। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, गोरक्षविजय, लिखनावली आदि ग्रंथ समेत विपुल संख्यामे कालजयी रचना। ई मैथिलीक आदिकवि विद्यापति (ज्योतिरीश्वर पूर्व)सँ भिन्न छथि।
फणीश्वरनाथ रेणु बिदापत नाचपर रिपोर्ताज लिखलनि जे १ अगस्त १९४५ ई. केँ साप्ताहिक “विश्वमित्र”मे प्रकाशित भेल। ऐ रिपोर्ताजक महत्व अछि, कारण ई ऐ विषयपर ज्योतिरीश्वर द्वारा लिखित विवरणक ७०० बर्ख बाद लिखल गेल आ ऐ ७०० बर्खमे जे विद्यापतिकेँ समानान्तर परम्परा जिआ कऽ रखलक।
आ जे एकरा जिआ कऽ रखलक ओकरासँ अनचोक्के विद्यापति छीनि लेल गेलन्हि। बिदेश्वर ठाकुर विद्यापति गीत गबैत आ हाक्रोश करैत मृत्युकेँ प्राप्त केलन्हि जे विद्यापतिकेँ पाग पहिरा कऽ ब्राह्मण सभ छीनि लेलक। ब्रह्मपुराक कानूनगो बद्री प्रसाद ठाकुर, पोखरिभीड़ाक बिनोद ठाकुर, रुद्रपुरक सरयुग ठाकुर आ मेंहथक जयराम ठाकुर आ बिस्फीक सौँसे गाम आइयो ई रटि रहल छथि। शालिग्राम यादव, अवधिया ठाकुर बिस्फी गामक परम्पराक गवाह छथि। विद्यापति कर्मकाण्डीय अपहरण मे हुनकर जन्म आदिक प्रति सभ तरहक अनर्गल तर्क उपस्थित होइत रहल मुदा हुनकर समानान्तर परम्पराक मादे कोनो शोध-पत्रमे चर्चो धरि नै भेल। ई आलेख बिदेश्वर ठाकुर सन हजारक हजार समानान्तर परम्पराक लोकक प्रति समर्पित अछि जे बिदापतक ज्योतिरीश्वर आ फणीश्वरनाथ रेणुक दुनू आलेखक बीच विद्यापतिकेँ जिआ कऽ रखलन्हि।
मिथिलाक शतपथ ब्राह्मणक परम्परा आ मिथिलाक समानान्तर परम्परा
वैदिक संस्कृतक प्राचीनतम ग्रन्थ ऋगवेदसँ पहिनेसँ भाषा अस्तित्वमे रहल हएत। कतेक मौखिक साहित्य जेना गाथा, नाराशंसी, दैवत कथा आ आख्यान सभ ओहिमे रचल गेल हएत। एहने गाथा सभक गायकक लेल “गाथिन”, “गातुविद्” आ “गाथपति” ऋगवेदमे प्रयुक्त भेल।
वैदिक कालेसँ गाथा आ नाराशंसी समानान्तर रूपमे रहल।
प्राकृतसँ वैदिक संस्कृत बहार भेल आकि वैदिक संस्कृतसँ प्राकृत? वेदमे नाराशंसी नाम्ना जन आख्यान यएह सिद्ध करैत अछि जे दुनू समानान्तर रूपेँ बहुत दिन धरि चलल। ई समानान्तर परम्परा दुनूकेँ प्रभावित केलक। आब ऋगवेद देखू- ओतए दुर्लभ लेल- दूलभ, (ऋगवेद ४.९.८) प्रयोग की सिद्ध करैत अछि? अथर्ववेदमे पश्चात् लेल पश्चा (अथर्ववेद १०.४.१०) की सिद्ध करैत अछि? गोपथ ब्राह्मणमे प्रतिसन्धाय लेल प्रतिसंहाय की सिद्द करैत अछि? (गोपथ ब्राह्मण २.४)।
जे आर्य छथि से भारतक पच्छिम भागसँ मिथिलामे एलाह, आ हुनका सभक एबासँ पूर्व वेदक किछु अंश विद्यमान छल, तेँ ने बहुत रास शब्द जे मैथिलीमे अछि, बहुत रास उच्चारण जे मैथिलीमे अछि ओ वैदिक संस्कृतमे अछि, मुदा लौकिक संस्कृतमे नै अछि। अविद्या, कर्मसिद्धान्त, जन्म आ पुनर्जन्मक आवाजाही आ मोक्ष ई सभ अनार्यसँ आर्यकेँ भेटलै। तेँ ने उपनिषदमे मोक्ष प्राप्तिक मार्ग छै, स्वर्ग प्राप्तिक नै। मोक्ष भेटत कोना? यज्ञ केलासँ? नै, ई भेटत ज्ञानसँ आ मनन-चिन्तन आ समाधिसँ। राजा जनकक संरक्षणमे याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषदक तिरहुतक अनार्य क्षेत्रमे रचना केलन्हि।
वाचस्पति मिश्र सांख्यकारिकाक सन्तावनम सूत्रक व्याख्या करैत कहै छथि जे की ई कहि सकै छी जे अचेतन दूध केर पोषणसँ परु पोसाइए आ अचेतन प्रकृतिक संचालनसँ जीवकेँ मुक्तिक ज्ञान भेटैए? ईश्वर तँ स्वयंमे पूर्ण छथि तँ ओ कोन उद्देश्ये विश्वक सृष्टि करताह आ जीव लेल जँ ओ सृष्टि करताह तँ सृष्टिक बादे तँ जीव बन्हाइए आ सृष्टिसँ पूर्व तँ बन्हेबाक प्रश्ने नै अछि, तखन जीवक प्रति कथीक दया? से प्रकृति द्वारा सृष्टि होइए आ जीव अपन प्रयाससँ अपवर्गक प्राप्ति करै छथि। आ विवेकसँ होइए प्रलय। से ईश्वरवाद नै निरीश्वरवाद अछि वाचस्पतिक व्याख्या। प्रकृति संचालनमे जँ ईश्वर भाग लै छथि तँ ओ चेतन प्रक्रिया हएत जे कोनो उद्देश्येसँ हएत आ तकर कोनो खगता ईश्वरकेँ छन्हिये नै। न्यायसूत्रक रचना केनिहार मिथिलाक गौतम सोलह पदार्थक ज्ञानसँ जीवक निःश्रेयस प्राप्त करबाक चर्च करै छथि, मुदा ऐ सभमे ईश्वरक कतौ चर्च नै अछि जे हुनको द्वारा मुक्ति सम्भव अछि। वैशेषिक सूत्र कहैए जे वेद विद्वान लोकनि द्वारा रचल गेल अछि नै कि ईश्वर द्वारा। कुमारिल भट्ट कहै छथि जे सृष्टिक पूर्व ईश्वरक विषयमे कोनो विश्वसनीय चर्चा असम्भव अछि।
शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धारा, आ तकर समानान्तर मुख्यधारा:
ब्राह्मण आ गएर ब्राह्मणवाद मिथिलामे शुरुएसँ रहल अछि। ज्योतिरीश्वर लिखै छथि- बौध पक्ष अइसन- आपात भीषण। अगतिशील शतपथ ब्राह्मणक परम्परा नामक साम्यताक कारण संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ पूज्य बनबैपर बिर्त अछि। ऋक् आ नाराशंसी, महाकवि विद्यापति आ पागबला विद्यापति, मोक्ष आ स्वर्ग-नर्क ई दुनू परस्पर विरोधी विचारधारा मिथिलामे रहल।
शतपथ ब्राह्मणक विदेघमाथव आ पुराणक निमि दुनू गोटेक पुरोहित गौतम छथि से दुनू एके छथि आ एतएसँ विदेह राज्यक प्रारम्भ। माथवक पुरहित गौतम मित्रविन्द यज्ञक/ बलिक प्रारम्भ कएलन्हि आ पुनः एकर पुनःस्थापना भेल महाजनक-२ क समयमे याज्ञवल्क्य द्वारा। मैत्रेयी, याज्ञवल्क्य, सीता, जनककेँ रटैत-रटैत ई परम्परा विद्यापतिक यज्ञोपवीत संस्कार आ पाग प्रतिष्ठापन जइ तीव्र गतिये केलक से ओकर शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल।
१७६० ई.क माधव सिंहक शाखा पञ्जीक आदेशक बाद मिथिलामे ब्राह्मण आ कायस्थ मध्य नव-कुलीनवादक प्रसार भेल आ भलमानुस (बत्तेसगमिया) उपजातिक कर्ण कायस्थमे आ स्रोत्रिय उपजातिक मैथिल ब्राह्मणमे उत्पत्ति भेल, ओइसँ शारीरिक आ मानसिक बीमारी ऐ दुनू उपजाति मध्य भयंकर रूपसँ बढ़ल, संगे बहुविवाह, बाल-विवाहक आ विधवाक संख्यामे अत्यधिक वृद्धि भेल। आ ईहो जइ शान्तिपूर्ण रूपसँ आ तीव्रगतिसँ भेल से शतपथ ब्राह्मणक तथाकथित मुख्य धाराक अनुकूल छल।
विद्यापतिपर दिनेश्वर लाल आनन्द आ रामवृक्ष बेनीपुरीक विचार
दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ भ्रम रहन्हि, ओइ कालमे पञ्जी गुप्त चीज रहै, जे संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापतिक विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार (निम्न कोटिक) कऽ देल गेल रहै। शाखा पञ्जी १७६० ई.सँ पहिने रहबे नै करै आ तकर प्रमाण अछि जे अयाची मिश्रक मूलक निचुलका पीढ़ी स्रोत्रिय उपजातिमे अछि आ ब्राह्मण उपजातिमे सेहो। ई ओहिना अछि जे सिन्धु घाटी सभ्यतामे बड़द रहै मुदा गाय नै (सीलपर), मुदा बिनु गाय बड़दक उत्पत्ति कोना हएत। दिनेश्वर लाल आनन्दकेँ पञ्जीक सभ तथ्य उपलब्ध नै रहन्हि, प्रायः पद्यावली बला विद्यापति आ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक एक्के हेबाक दुष्प्रचारमे हुनका लागल हेतन्हि जे अवहट्ठमे लिखबाक कारण जँ विषएवार बिस्फीकेँ पञ्जीमे जयवार करबाक सम्बन्धसँ जोड़ल जाए तँ विद्यापति ठक्कुरः किए क्रान्तिकारी भेलाह से व्याख्या कएल जा सकत। मुदा दिनेश्वर लाल आनन्द सेहो मानै छथि जे पद्यावलीक हुनकर (विद्यापतिक) हाथक तँ छोड़ू, हुनकर कालोमे संगृहीत पदक कोनो विवरण नै अछि। मुदा से कोना सम्भव जखन संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति अपन संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थ सभ टहंकारसँ आरम्भ आ समापन करै छथि, के राजा-रानी हुनका प्रेरित केलखिन्ह, ककर आश्रित छलाह, सभ वर्णन दैत। पूर्ण लेखकीय अन्दाज, सरस्वती आ लक्ष्मी दुनुक बल; तखन पद्यावलीमे से किए नै? दिनेश्वर लाल आनन्द गुम्म छथि। संस्कृत आ अवहट्ठ बला विद्यापति अपन आश्रयदाताक विषयमे लिखने छथि मुदा कोनो संस्कृत आ अवहट्ठ ग्रन्थमे अपना विषयमे किछुओ नै लिखने छथि। ओ अवह्ट्ठ लिखबोमे दवाबक अनुभव करै छथि, जे तखुनका मुख्य परम्पराक साहित्यिक भाषा छल। मुदा ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक प्रभाव एतेक छलन्हि जे हुनका संस्कृत नाटक गोरक्षविजयमे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि (जेना विदाञोतक पहिल रिपोर्ताज लिखनिहार ज्योतिरीश्वरकेँ संस्कृत नाटक धूर्तसमागममे मैथिली गीत लिखऽ पड़लन्हि)।
गोविन्द झा ज्योतिरीश्वरक विदाञोतमे विद्यापतिक परम्परा देखि लै छथि, चर्च करै छथि मुदा ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिकेँ आगाँ किए नै बढ़ा पबैत छथि जखन बिदेश्वर ठाकुर गाबि-गाबि कऽ प्राण त्यागि रहल छथि? विद्यापति नाटकमे विद्यापतिकेँ प्यास जतऽ लगलन्हि ओ नाटक लेखकक गाम कोना भऽ जाइए? सभ अपना-अपना हिसाबसँ “हम्मर विद्यापति”पर नाटक लिखि रहल छथि।
रामबृक्ष बेनीपुरी लग सेहो पञ्जीक तथ्य नै छन्हि। एकटा उपजातिक बनोतरी आ किंवदन्तीक आधारपर ओ केशव मिश्रक विद्यापतिपर हँसब लिखै छथि; द्वैत परिशिष्टक ई केशव मिश्र वाचस्पति-२ (१४००-१४९०) क पौत्र छथि। एकटा आर केशव मिश्र (११५० लगभग) छथि जे तर्कभाष लिखै छथि आ जकर समीक्षा तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक पुत्र वर्धमान “तर्कप्रकाश”मे करै छथि। आनन्द कुमारस्वामे जतेक शोध १९१५ ई. मे केने रहथि ओइसँ एक्को डेग आगाँ नहिये बेनीपुरी जा सकलथि नहिये आनन्दस्वामीक सए बर्ख बाद कियो दोसर मुख्यधाराक शोधकर्ता जा सकल छथि। वएग उगनाक कथा बेनीपुरी कहै छथि, मुदा महादेव संस्कृत आ अवहट्ठक कट्टर विद्यापतिक “शैवसर्वस्वसार”पर कैलाशमे नचता आकि ज्योतिरीश्वरपूर्व विद्यापतिक नचारीपर, ओइपर गुम छथि। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ बुझल छन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक हाथक लिखल भागवत उपलब्ध अछि आ इहो जे विद्यापतिकेँ गंगालाभ कोना भेलन्हि, गंगा हुनका अपनामे लीलि लेलखिन्ह। आनन्द कुमारस्वामी जकाँ बेनीपुरीकेँ संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिक लिखल पुरुषपरीक्षाक विषयमे सुनल छन्हि मुदा पढ़ल नै छन्हि, आ से नै तँ हुनका बुझल रहितन्हि जे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापति गंगालाभक कथा बोधि कायस्थक विषयमे लिखने छथि। ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक विषयमे ई कथा उगनाक कथा सन प्रचलित छल जे बादमे संस्कृत आ अवहट्ठक विद्यापतिसँ कर्मकाण्डीय रूपमे जोड़ल गेल आ पुरुषपरीक्षाक कथा बोधि कायस्थ एकर प्रमाण अछि। कीर्तिपताकाकेँ बेनीपुरी मैथिली गीतक संग्रह कहै छथिइ! ! पूछि-पाछि कऽ शोध कएल जाइ छै? जे आधार कुमारस्वामी सए बर्ख पहिने रखलन्हि, ओइपर सुखाएल मुख्यधारा किए नै आगाँ बढ़ल कारण ई शतपथ ब्राह्मणवादी मुख्यधारा ओकरा एकर अनुमति नै दै छै। मुदा बिना कोनो प्रमाणक शिवसिंहक मित्र पुरादित्यकेँ भूमिहार ब्राह्मण सिद्ध कऽ दै छथि, ओहिना जेना गोविन्ददास (झा) केँ रमानाथ झा स्रोत्रिय बतेलन्हि (सुकुमार सेन तकरा हास्यास्पद मानै छथि), आ रामदेव झा ब्राह्मण सिद्ध करै छथि आ कालिदासकेँ वर्माजी (लालदास स्मारिकामे) कायस्थ सिद्ध करै छथि।
संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापति पूर्ण कर्मकाण्डक संग पुस्तकक प्रारम्भ आ अन्त करै छथि, राजा-रानी-आश्रयदाताकेँ मोन पाड़ै छथि मुदा अपन चर्च नै करै छथि। मुदा पद्यावली लोककण्ठमे किए रहि गेल, पुस्तकक तामझाम ओ तकरा किए नै देलन्हि, कारण ओ हुनकासँ कए सए पूर्वक रचना छल, जखन पागक उत्पत्ति मिथिलामे नै भेल छल। पद्यावलीमे रूपनारायण, शिवसिंह, लखिमा, देव सिंह, हर सिंह, पद्म सिंह, विश्वास देवे, अर्जुन-अमर, राघव सिंह, रुद्र सिंह, धीर सिंह, भैरव सिंह, चन्द्र सिंह आदि बादमे घोसिआएल गेल, जे गीतक लयकेँ प्रभावित करैत स्पष्ट रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि। संस्कृत-अवहट्ठबला विद्यापति भू-परिक्रमा (देव सिंह), कीर्तिलता (कीर्ति सिंह आ वीर सिंह), कीर्तिपताका, गोरक्षविजय (शिव सिंह), लिखनावली (पुरादित्य), दान वाक्यावली (रानी धीरमति) आदि स्पष्ट रूपसँ राज्याश्रित रचना छल। गोरक्षविजय नाटक भैरव पूजाक अवसरपर लिखल गेल आ ऐ मे धूर्त समागम सन मैथिली गीत छल जे ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापतिक भयंकर प्रभाव स्वरूप छल। नामक असमानता नै रहैत तँ ज्योतिरीश्वकेँ ज्योतिरीश्वर पूर्व विद्यापति बना देल जाइत।
निष्कर्ष
तत्वचिन्तामणिकारक गंगेश १२००० ग्रन्थक बराबर एकटा ग्रन्थ लिखलन्हि। प्रोफेसर दिनेशचन्द्र भट्टाचार्य “मिथिलामे नव्य-न्यायक इतिहास” मे लिखै छथि- “जे परिवार सामाजिक स्थितिमे निम्न मानल जाइत छल, से आब मिथिलामे लुप्त भऽ गेल अछि… गंगेशक परिवार पूर्णतः उपेक्षित अछि, आ हमरा सभसँ हुनकर पिताक नाम धरि जनबाक अपेक्षा नहि कएल जाइत अछि।” आ ई सभ सूचना, ओ लिखै छथि, हुनका प्रो. आर.झा (रमानाथ झा) देलखिन्ह!
आब आउ पञ्जीमे वर्णित तथ्यपर- ओइमे स्पष्ट रूपसँ लिखल अछि जे तत्वचिन्तामणिकारक गंगेशक जन्म पिताक मृत्युक पाँच वर्ष बाद भेलन्हि आ ओ चर्मकारिणीसँ विवाह केलन्हि, तँ ई गप रमानाथ झा दिनेशचन्द्र भट्टाचार्यसँ किए नुकेलन्हि? एकटा उपजाति द्वारा हिनकर मूर्खसँ विद्वान बनबाक गपपसारल गेलन्हि आ हिनका खतम करबाक साजिश भेल।
गंगेशक पुत्र वर्द्धमान गंगेशकेँ सुकविकैरवकाननेन्दुः कहै छथि। मुदा गंगेश सन प्रसिद्ध विद्वानक कविता कोन साजिशक अन्तर्गत आइ उपलब्ध नै अछि से ऊपर देल उदाहरणसँ स्पष्ट अछि। बंगालक वासुदेव पक्षधर मिश्रक सहपाठी रहथि, मिथिला पढ़ैले एला, शलाका परीक्षा उत्तीर्ण केलन्हि आ सर्वभौम उपाधि भेटलन्ह्। वासुदेव गंगेशक तत्वचिन्तामणि आ उदयनक न्यायकुसुमांजलिक कारिकाकेँ कंठस्थ कऽ लेलन्हि। पक्षधर आ आन मिथिलाक शिक्षक तत्वचिन्तामणि लिखबाक (प्रतिलिपि करबाक) अनुमति नै दै छला! वासुदेवक शिष्य रघुनाथ शिरोमणि अपन गुरु पक्षधर मिश्रकेँ शास्त्रार्थमे हरा प्रमाणित करबाक अधिकार लेलन्हि। नव्यन्याय स्कूलक नवद्वीपमे वासुदेव-रघुनाथ द्वारा स्थापना भेल। पक्षधर मिश्र संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन छला। आ रघुनाथक संग बंगालसँ मिथिला विद्यार्थीक आगमन बन्द भऽ गेल।
शिवसिंह द्वारा संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ जे बिस्फी ताम्रपत्र देल गेल तकरा ग्रियर्सन फर्जी कहलन्हि कारण ओ विद्यापतिक पद्यावलीसँ परिचित रहथि आ बूझि गेल रहथि जे ओइ विद्यापतिकेँ ई ताम्रपत्र भेटब असम्भव छल। मुदा ई ताम्रपत्र तँ संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिकेँ भेटल छलन्हि आ दुनूक बीचक अन्तर ग्रियर्सन नै सोचि सकला। मुदा से म.म. हरप्रसाद शास्त्री सोचलन्हि आ ऐ ताम्रपत्रकेँ असली बतेलन्हि।
श्रीधरदासक सदुक्तिकर्णामृतमे कैवर्त पपीहाक गंगापर स्तुति गीत अछि। राधाकृष्णक गीत अछि। लक्ष्मणसेनक राज कवि धोयी (जोलहा) रहथि।
लखिमा ठकुराइन पद्यावली नै लिखलन्हि संस्कृतमे पद्य लिखलन्हि (ग्रियर्सन)। श्रीधरदासक अभिलेख अंधरा ठाढ़ीमे अछि आ ओ नान्यदेव आ गंगदेवक मंत्री रहथि। हुनकर वंशज अमिअकर संस्कृत आ अवहट्ठबला विद्यापतिक समकालीन रहथि। गंगदेवकेँ उपेन्द्र ठाकुर कलचुरी मानै छथि। विजय कुमार ठाकुर कलचुरि कर्णक स्तुतिमे सदुक्तिकर्णामृत (श्रीधरदास)क विद्यापतिक गीतकेँ मानै छथि। राधाकृष्ण चौधरीक मत ऐ सँ भिन्न छन्हि।
कोनो परिस्थितिमे ई विद्यापति ज्योतिरीश्वर पूर्व रहथि।
“रामचरित”- विग्रहपाल-३ कर्णकेँ हरेलन्हि, ऐ सम्बन्धमे बेगूसरायसँ उत्तर १६ किमी. नौलागढ़सँ दूटा पाल अभिलेख राधाकृष्ण चौधरीकेँ भेटलन्हि। ओहो कर्ण ११म शताब्दीक छथि।
ज्योतरीश्वर पूर्व विद्यापतिक पद्यावली बंगालमे प्रसिद्ध अछि। ज्योतिरीश्वरक धूर्त समागम दक्षिण भारतमे प्रसिद्ध अछि। आ तकर बाद बंगालसँ मिथिलामे विद्यार्थी एनाइ बन्द भऽ गेल आ संगे मिथिलाक नाटक आ पद्यावलीक बहिर्गमन सेहो।
अनुलग्नक: ३ केर अनुलग्नक क
फणीश्वर नाथ रेणु: एकटा लोकगीतक विद्यापति
भूमिका
महाकवि विद्यापतिपर “खोज”करैत काल हमरा लागल जे एक अध्यायक शीर्षक राख’ पड़त- “खेतिहर-बोनिहार आ बहलमानक कवि विद्यापति”। कारण पूर्णियाँ-सहरसाक इलाकामे आइयो विद्यापतिक पद्यावली गाबि-गाबि क’ भाव देखाक’नाचैबलाक मण्डली सभ अछि। ऐ मण्डली सभक नायक महिसवार, चरबाह आ गाड़ीक बहलमाने होइ छथि प्रायः। मैथिल पण्डित लोकनिसँ पुछलौं
, ई कोना भेल? बजला, अहाँ कोन फेरामे पड़ल छी? अही सभ मूर्खक कारण आइ विद्यापतिक दुर्दशा भ’ रहल अछि। ऐ मामूली लोक सभक मोनमे जखन एलै विद्यापतिक नामपर “चारिटा पद्यावली” जोड़ि देलक। ..अहाँ दिग्भ्रमित भ’ रहल छी। .. मिथिलाक पण्डितक वर्जना-वाणीपर कान-बात नै दैत हम सहर्ष सहरसा (बा सहर्षा? ) यात्राक तैयारी शुरू क’देलौं। ..कनचीरा गाम एकटा एहन गाम अछि जइपर दू-दू जिलाक जिला अधिकारीक शासन चलैत अछि। अदहा गाम सहरसामे, अदहा गाम पूर्णियाँमे।
... कनचीराक विद्यापति-मण्डलीक नाम दुनू जिलाक लोक लै छथि। ... जइ दिन कनचीरा गाम पहुँचलौं, गाममे एकटा अघट घटना घटित भ’ गेल रहै। दस सालसँ इलाकाक प्रतिनिधित्व करैबला नेताजी चुनावमे चितंग भ’ गेल रहथि। तइ द्वारे ओइ राति नाच-गानक दोसरे मतलब निकालल जा सकै छल, ऐ डरे “विद्यापति-मण्डली”क नायक जनकदास नाच करबाक अनुमति नै देलनि।
दोसर राति ओ बड्ड खुशामद करेलाक बाद अनुमति देलनि। नायक जनकदास बड्ड तर्क-वितर्क केलाक बाद घुमा-फिरा क’ दोहरा-तेहरा क’ कहलनि, “विद्यापति- नाच” क जन्म हुनके परिवारमे पहिले-पहिल भेल। विस्तारसँ ओ कहियो किछु नै कहलनि। आ हुनका जखन ई विश्वास भ’ गेलनि जे “विद्यापति नाच मण्डली”क नामपर खर्च करबा लेल हजार- दू हजार टाका सरकारक खजानासँ ल’ क’ हम नै बहराएल छी, तखन ओ मृदंगपर थाप देलनि। राति भरि नाच देखैत रहलौं। गाए चरबैबला छौड़ा, साड़ी पहीर विरहिनी राधा बनि गेलि आ कानि-कानि गाबए लागलि- “कतेक दिवस हरि खेपब हो, तुम एसकरि नारी!” दोसर दिन, जनकदाससँ ऐ नाचक उत्पत्तिक इतिहास पुछलौं तँ ओ बाजल- नै जानि कहियासँ ऐ नाचक मूलगैनी हमरा परिवारमे चलैत आबि रहल अछि। जनकदासक ऐ उदासीक कारण छल- हमर टेपरेकार्डर। .. चुप्पे-चुप्पे सभ गीत फीतामे अहाँ भरि लेलौं, चलाकीसँ। मंगनीमे अपन काज सुतारि लेलौं अहाँ? आ, अंतिममे पचास टाका नगदी देलाक बादो ओ हमर ऐ प्रश्नक कोनो उत्तर नै देलनि कि खेतिहर-बोनिहार, चरवाह आ बहलमान सभ कहिया आ केना विद्यापतिक पद्यावलीकेँ गाबि-गाबि नाचब प्रारम्भ केलनि। जनकदासक पलानीमे पुआरपर पड़ल रही दिन भरि, ओकरा दया नै लगलै। ओकर मसोमात जवान बेटी हमरा दिससँ पैरवी केलक, तखनो ओ नै पसिझल, अपन खानदानीक “हँसी” करबैबला गप के “गजट” मे “छापी” कराब’ चाहत? बुरहा जनकदास बड़द खोलि चरबै लेल चलि गेला। हम ओकर पलानीमे पड़ल रहलौं आ तकर बादे एकटा खिस्सा सुनलौं बा सपना देखलौं बा“भ्रम”मे पड़ि गेलौं- ई नै कहि सकै छी।
अनुलग्नक: ३ केर अनुलग्नक ख
बिदापत नाच (मूल रिपोर्ताज फणीश्वरनाथ रेणु)
बिदापत नाच
ऐ नाचक उत्पत्ति दरभंगा जिलामे भेलै, एहन अंदाज कएल जाइ छै | लेकिन अपने मातृभूमिमे ई कोन तरहक अवस्थामे अछि एकरा कहबाक जरूरत नै बुझाइत अछि, परंच उत्तरी बिहारक किछु जिला आ भागलपुर, पूर्णिया आदिक गाम सभमे आइयो एकर कद्र छै। ई छोटका लोक सभक नाच बनि कऽ रहि गेल अछि। तथाकथित भद्र समाजक लोक एकरा देखबामे अपन हेठी बुझै छथि। मुदा मुसहर, धाँगड़, दुसाधक ठाम विवाह, मुंडन संगे अन्य अवसरोपर एकर धूम मचल रहै छै। ऐ नाचमे सात-आठ टा कलाकार रहै छै आ दुइए टा वाद्य यन्त्र- मृदंग आ मंजीरा रहै छै।
तँ चलू। बिदापत-नाचक आनंद उठाबी। अपन भद्रताकेँ किछु काल लेल त्यागि.…
धृंग धा, धृंग धा तिन्ना- बाजि कऽ मृदंग बौक भऽ गेल। कुन कुन कुन कुन... मजीरा स्वरमे संग देलकै।
गननायकं फलदायकं पंडितम् पतितम्... अहाँ सभ हँसू जुनि। ई मंगलाचरण छलै, शुद्ध संस्कृतमे।
धृंगा धृंगा धृंगा धृंगा- मृदंग बाजऽ लागल।
किनकां, किनकां, किनकां, किनकां.. मजीरा संग देलकै।
नाचैबला चारू तरफ जेम्हर-जेम्हर समाजी छल, चक्कर देनाइ शुरू केलक। ओकर पाछू बिपटा सेहो घिरनी जकाँ चक्कर लगा रहल छल आ मुँहकेँ रंग-बिरंगक बनबैत ओय -ओय -ओय -ओय बाजि रहल छल।
धिरिनांगी, धिरिनांगी, धिरिनांगी, धिरिनांगी- मृदंग ताल बदलि दोसर सुर निकाललक। किनकां, किनकां... आब रहए दिअ। बड़ नचौलौं... आब बादमे नाचक कथा हेतै।
नाच करैबला एकेटा जगहपर जमा भऽ झूमऽ लागल। धिरिनांगि तिनता, तिटक-तिटक धा, तिटकल गदगिन धा।
ताल समाप्त भेल आ नाचो शेष भऽ गेल आ नाचैबला सभ घोघ तानि दर्शक मंडलीमे जा बैसल। नाचमे जे बिपटा बनल छल ओ नाच करनिहारकेँ ताकऽ लागल। धृंगा-धृंगा...
'धिन-तिनक तिनक, धिन तिनक-तिनक'- मृदंग बाजल।
समाजी सुरमे सुर मिलेलक।
'हे लेल परबेश परम सुकुमारि
हंस गमन वृषभान दुलारि.…'
नचनियाँ सभ उठि बिपटा लग आबि गेल आ हर्षित भऽ बिपटा ओय ओय ओय ओय केनाइ शुरू कऽ देलक।
'धिन-तिनक् तिनक् धिन-तिनक् तिनक्'
'हे! तन मन बदन पवन सहजोर हे
दामिनी ऊपर उगलन्हि चाना...'
नाच करऽबला सभ घोघ हटा लेलक आ चंद्रमुख (घुटल दाढ़ी, मोंछ आ बेडोल, केहने सन कऽ मुँह) देख दर्शको सभ हँसैत-हँसैत नेहाल भऽ जाइत अछि। नचनियाँ निच्चाँ दिस ताकि रहल, लाज सँ लज्जावती लता सन सिकुड़ल नाच कऽ रहल छल वा छली। बिपटा ओकरा अपना दिस आकर्षित करबाक कोशिश कऽ रहल अछि।
“हे बिहँसि उठलि पिऊ देखि सुहागिनी
लाज बदन लेल फेरि..”
नचनियाँ बिहुँसि कऽ मुँह फेर लेलक। हँसऽ कालमे तमाकुल सेवनसँ जे दाँत सभ कारी भेल छल से चमकि उठल। कृपया अहाँ सभ शांत भऽ जाउ। जी, जी हँ। विद्यापतिक पद्यावली भऽ सकैत अछि, परंच ई छी 'बिदापत नाच'।
न्यू थियेटर्स, विद्यापति, कानन बाला. पहाड़ी सान्यालक बक-बक बंद करै जाउ। आखिरी अलाप शुरू कऽ देलौं।
अहाँ सभकेँ कतेक बुझाउ जे ई 'बिदापत नाच' छिऐ आ ओ नाच करैबला टहलू पासवान, ओकर बाप बड़का डकैत छल। बापकेँ काला पानीक सजा भऽ गेलै। माय केकरो आन सने चलि गेलै आ ई बच्चेसँ नाचऽ लागल। अपन जवानीक दिनमे एकर धूम मचल रहै छलै... धूम मचबै छलै धूम। एकर आवभाव देखि तँ परबतिया अपन बसल-बसाएल गृहस्थी छोड़ि एकरा सने रातिये राति पड़ा आएल।
हँ तँ टहलू पासवान गाबि सकैत अछि जे...
अँगना आएत जब रसिया
पलट चलब हम इषत् हँसिया
कान्ह जतन बहु करयिन्ह
धृन्ना धृंगा, तिना-तिन्ना- मृदंग आब दोसर ताल बदललक।
किन्ना- किन्ना.. मंजीरा सेहो ताल बदललक।
“सखि हे...
सखि हे, कि पूछसि अनुभव मोहे..”
“जनम अवधि हम रूप निहारलौं,
तबहु न तिरपित भेल |"
'अरे? चुप! चुप! ! ' -बिपटा खिसिया कऽ चुप करा रहल अछि। एक टा समाजी गमछाक कोड़ा बनेनाइ शुरू केलक। बिपटा कहनाइ आरम्भ केलक जे ओकरा पीट कऽ अनेरे समए बर्बाद कएल जा रहल अछि। जमींदारक जूता खाइत-खाइत ओकर पीठक चमरी मोट भऽ गेल छै। ओ अइ लेल मात्र चुप करा रहल छल..
“कि ओ जन्म भरि केकर रूप निहारैत रहल'... जखन ओकरा बुझा गेलै जे ओकरे रूप, तँ खुशी भऽ तुरंत पॉकेटसँ एकटा छोटका एना निकालि सगर्वसँ अपन मुँह देखऽ लागल।
गीत समाप्त भेल, आब बिपटा महादेवक बेर छनि।
-हे नेक जी (नायक जी)।
-हूँ।
-आब हमरो सुनू।
“बाप रे!
बाप रे कोन दुर्गति नहि भेल
सात साल हम सूद चुकाओल,
तबहुँ उरिन नहि भेलौं।
कोल्हुक बड़द सन खटलौं राति-दिन
कारज बढ़त हि गेल
थारी बेच पटवारीकेँ देलियन्हि,
लोटा बेच चौकीदारी।
बकरी बेच सिपाहीकेँ देलियन्हि
फटकनाथ गिरधारी।”
किछु बुझलिऐ अहाँ सभ.. अहूँ सभ पूराक पूरा फटकनाथ गिरधारी छी।
कने दर्शककेँ देखियन्हु ने जे ओ सभ की बुझलनि जे हँसैत-हँसैत पेटमे दर्द हुअ लगलनि।
'धृंगा-धृंगा, धिधिन्ना तिन्ना '.…
“सखि हे!
ई माह भादर, भरल बादर,
शून्य मंदिर मोर। ...”
सुन्दर! सुन्दर! ! ठीके विद्यापति मैथिल कोकिल.…
अहाँ सभ फेर भसियाए लगलौं, अहूँ सभ बिपटासँ कम नै छी। कतबो मना कएल जाए ओकरा जकाँ सभ गीतपर किछु ने किछु सुनाबऽ लागै छी। ई लिअ, बिपटा महोदय फेर टपकला...
“ई माह भादर, बरिसे बादर,
चुअत छप्पर मोर।”
“हहा-हहा...! !” दर्शक मंडली हँसैत-हँसैत लोट-पोट भऽ रहल अछि। हँ एक टा बात कहब बिसरि गेलौं जे बिपटा अपनाकेँ कृष्ण बुझैत अछि आ परदेशी साजन सेहो, लेकिन संगे इहो बात नै बिसरैत अछि जे कि ओ कलरू मुसहर अछि, हलहलियाक रहनिहार आ मनुष्य रहितो ओ बुझै छै जे कोल्हूक बड़दसँ बेसी ओकर हैसियत नै छै। नाचएबला सभ जखन ओकर गरदनिमे बाँहि मान-अभिमानसँ प्रेमक प्रदर्शन करैत बुझबैत छै कि ---माधव तजि के चललौं विदेश। .. तखनि ओ बिसरि जाइत अछि जे ओ कृष्ण अछि आ गोकुलसँ मथुरा जा रहल अछि। ओकरा सामने जीवनक विषमता मूर्त रूप भऽ नाचि उठै छै आ ओ बुझबै छै-
'नहिं बरसल अदरा (आद्रा नक्षत्र) नहि अशरेस,
चारु दिस देखै छी बुढ़ियाक केश.…
माछ काछू सब गेल पाताल,
अब कि पड़त सखि महा अकाल,
दिन भरि खटि के एक सेर धान,
एकरा से कैसे बचत परान,
छोडि- छोडि सजनि जाइ छी विदेश’
फेर दोसरे क्षण जखन नर्तक गाबऽ लागै छै-
'गोद लय बलमाकेँ चललि बाजार
हटिया के लोग पूछे, के लागे तोहार।
सासू जी के लड़िका, ननद के जेठ भाय,
पूर्व के लिखल स्वामी छिक् हे हमार। '
आब बिकटा बच्चा जकाँ जिलेबी, बताशा आ खिलौना लेल छिरिऐ लागल..
तखने एकटा नचनिया गीत गेलक--
राति जखन भिनसरवा रे,
पहूँ (स्वामी) आयल हमार।
कर कौशल कर कँपइत रे हरवा उर जार
कर पंकज उर थपइत रे मुखचन्द्र निहार”
बिपटा बीचेमे रोकि कऽ एकटा समाजीसँ एकर अर्थ बुझबै लेल कहै छै आ समाजी खुलि कऽ अइ गीतपर टीका करऽ लागल। केना नायिका पुआरपर अपन झोपड़ीमे सुतल छलय आ बिपटा आएल छल।
चलू दर्शक सभक बीचमे। कारी-कारी मोटगर आ गठगर देहबला नवयौवना मंद-मंद मुसकीकेँ दबा आ एक दोसरकेँ केहुनिया-केहुनिया कऽ कनफुसकी करैमे आनंदित भऽ बिपटाक दिस एक टक निहारि रहल छलि। अधेड़ उम्रक मौगी सभ बनावटी तामस व्यक्त कऽ युवती सभकेँ रोकए चाहै छै, लेकिन दबल हँसी आ गुदगुदायल हृदए कखन मानै छै।
एम्हर नचनियाँ सभ आलाप कऽ उठल।
“चलू मन, चलू मन... ससुरालि
जइबै हो रामा,
कि आहो रामा, नैहरा मे
अगिया लगाइब रे कि...
युवती चंचल भऽ जाइ छै आ युवक लोकनिक नसमे बिजली दौड़ऽ लगलनि। नाच आब खत्म हुअबला छै-
“चलू मन, चलू मन
धिन धिनक धिनक, धिन धिनक धिनक…
कि आहो रामा, नैहरा मे अगिया लगाइब रे कि...!
डिम डिमिक डिमिक, डिम डिमिक डिमिक...”
अरे ई की? ओहो, चेथरू गुँसाइ जी छथि। गुँसाइ जी कबीरक भक्त छथि। दस-पंद्रह साल पहिने जमींदार साहबक कहलापर ओ झूठ गवाही नै देलनि। ऐपर जमींदार खिसिया कऽ गुँसाइ जी केँ बेघर कऽ देलकनि आ तखनेसँ ओ बैरागी भऽ गेला। खंजरी, झोरा आ चिमटा, जटा आ नमगर दाढ़ी... ई लिअ। गुँसाइ जी खंजरी बजा बजा नचनियाँ संगे नाच करऽ लागला...
“डिम डिमिक डिमिक, डिम डिमिक डिमिक
कि आहो रामा नैहरा मे अगिया..
बात ई छै जे चेथरू गुँसाइ जी अइ गीतकेँ पूरा निर्गुण मानै छै।
अहा! ओकर धँसल आँखिमे नोर चमकि उठै छै। आ नाच समाप्त भऽ गेल।
(फणीश्वरनाथ रेणुक ई रिपोर्ताज साप्ताहिक “विश्वामित्र”क १ अगस्त १९४५ क अंकमे प्रकाशित भेल छल। ई हिन्दीसँ मैथिली अनुवाद (मधुपनाथ झा द्वारा, विदेह: सदेह ११) फणीश्वरनाथ रेणुकेँ समर्पित कएल जा रहल अछि। )
अनुलग्नक: ४: विद्यापतिक बिदेसिया- पिआ देसाँतर- बिदापत नाचक अलाबे मैथिली नाटकक एकटा समानान्तर दुनियाँ
रामखेलावन मण्डल गाम- कटघटरा, प्रखण्ड– शिवाजीनगर, जिला- समस्तीपुर, हिनके संग बिन्देश्वर मण्डल सेहो छलाह। उठैत मैथिली कोरस आ माँ गै माँ तूँ हमरा बंदूक मंगा दे कि हम तँ माँ सिपाही हेबै- एखनो लोककेँ मोन छन्हि। ऐ मंडली द्वारा रेशमा-चूहड़, शीत-वसन्त, अल्हाऊदल, नटुआ दयाल ई सभ पद्य नाटिका प्रस्तुत कएल जाइत छल।
पूर्णियासँ पिआ देसाँतर (मैथिली बिदेसिया)क टीम सुपौल-सहरसा-समस्तीपुर आदि ठाम अबैत छल। हसन हुसन नाटिका होइत छल। रामरक्षा चौधरी नाट्यकला परिषद, ग्राम- गायघाट, पंचायत करियन, पो. वैद्यनाथपुर, जिला- समस्तीपुर विद्यापति नाटक गोरखपुर धरि खेलाएल छल। ऐ मंडली द्वारा प्रस्तुत अन्य नाटक अछि- लौंगिया मेरचाइ, विद्यापति, चीनीक लड्डू आ बसात।
भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी रहथि, घुरि कय अएलाह आ भोजपुर क्षेत्रमे अपन कष्टक वर्णन जाहि मर्मस्पर्शी रूपसँ गामे-गामे घुमि कए आ गाबि कए सुनओलन्हि से बनल बिदेसिया नाटक। मिथिलामे प्रवास आजुक घटना छी, गामक-गाम सुन्न भऽ गेल अछि। मिथिलाक बिदेसिया लोकनि देशक कोन-कोनमे पसरि गेल छथि। मुदा पहिने भोजपुर इलाका जेकाँ प्रवासक घटना मिथिलामे नहि छल। प्रवास मोरंग धरि सीमित छल जे नेपालक मिथिलांचल क्षेत्र अछि। आ ताहिसँ मैथिलीमे लोकगाथाक सूक्ष्म विवरणक बड़ अभाव, जे अछियो से लोकगाथा नायकक विवरण नहि वरन महाकाव्यक नायकक मैथिलीमे विवरण जेकाँ अछि, आ बोझिल अछि, भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक जोड़ नहि। सलहेसक कथाक विवरण लिअ, क्षेत्रीय परिधि पार करिते सलहेस राजासँ चोर बनि जाइत छथि आ चोरसँ राजा। तहिना चूहड़मल क्षेत्रीय परिधि पार करिते जतए सलहेस राजा बनैत छथि ओतए चोर बनि जाइत छथि, आ जतए सलहेस चोर कहल जाइत छथि ओतुक्का राजा/ शक्तिशालीक रूपेँ जानल जाइत छथि। मुदा एहि सभपर कोनो शोध नहि भए सकल अछि। एहि क्रममे विद्यापतिक पद्यावलीक पद सभमे तकैत हमरा समक्ष विभिन्न प्रकारक गीत सभ सोझाँमे आएल। एहिमे जे अधिकांश छल से रहए प्रेमी-प्रेमिकाक विरहक विवरण आ बिदेसियाक जे मूल कनसेप्ट अछि- रोजी-रोटी आ आजीविका लेल मोन-मारि कए प्रवास, ताहिसँ फराक। तखन जा कए हमरा किछु विशुद्ध बिदेसिया जकरा विद्यापति पिआ-देसाँतर कहैत छथि भेटल। एहिमे स्वाभाविक रूपेँ अधिकांश विद्यापतिक नेपाल पद्यावलीसँ भेटल आ एकटा नगेन्द्रनाथ गुप्तक संग्रीहीत पद्यावलीसँ। मोरंग नेपाल स्थित मिथिलाक भाग अछि आ प्रवास लेल प्रसिद्ध छल, से एकर सम्भावित कारण।
ताहि आधारपर ई संकल्पित नाटिका प्रस्तुत अछि।
विद्यापतिक पिआ देसाँतर
दृश्य १
स्टेजपर हमर बिदेसिया बिदेस नोकरीक लेल बिदा होइत छथि आ जुवती गबैत छथि- गीतक बीचमे एकटा पथिक अबैत छथि। मंचक दोसर छोड़पर चोर लोकनि धपाइत नुकायल छथि। मंचक दोसर छोरपर कोतवाल आ शुभ्र धोतीधारी पेटपर हाथ देने निफिकिर बैसल छथि।
धनछी रागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पद्यावली)-
हम जुवती, पति गेलाह बिदेस। लग नहि बसए पड़उसिहु लेस।
हम युवती छी आ हमर पति बिदेस गेल छथि। लगमे पड़ोसीक कोनो अवशेष नहि अछि।
सासु ननन्द किछुआओ नहि जान। आँखि रतौन्धी, सुनए न कान।
सास आ ननदि सेहो किछु नहि बुझैत छथि। हुनकर सभक आँखिमे रतौँधी छन्हि आ ओ सभ कानसँ सेहो किछु नहि सुनैत छथि।
जागह पथिक, जाह जनु भोर। राति अन्धार, गाम बड़ चोर।
हे पथिक! निन्नकेँ त्यागू। काल्हि भोरमे नहि आऊ। अन्हरिया राति अछि आ गाममे बड्ड चोर सभ अछि।
सपनेहु भाओर न देअ कोटबार। पओलेहु लोते न करए बिचार।
कोतबाल स्वपनहुमे पहरा नहि दैत अछि आ नोत देलोपर विचार नहि करैत अछि।
नृप इथि काहु करथि नहि साति।
पुरख महत सब हमर सजाति॥
ताहि द्वारे राजा ककरो दण्ड नहि दैत छथि आ सभटा पैघ लोक एके रंग छथि।
विद्यापति कवि एह रस गाब। उकुतिहि भाव जनाब।
विद्यापति कवि ई रस गबैत छथि। उकतीसँ भाव जना रहलीह अछि।
विद्यापति कविक प्रवेश होइत छन्हि। कोतवालक लग शुभ्र-धोतीधारी आ एकटा गरीबक आगमन होइत अछि। कोतवाल आभाससँ धोतीधारीक पक्षमे निर्णय सुनबैत छथि आ मंचक दोसर कोनपर बैसलि जुवती माथ पिटैत छथि। गीतक अन्तिम चारि पाँती विद्यापति कवि गबैत छथि।
दृश्य २
जुवती एकटा दोकान खोलने छथि, सांकेतिक। मंचक दोसर कातसँ सासु आ ननदिकेँ जएबाक आ क्रेता पथिकक अएबाक संग युवती गेनाइ शुरू करैत छथि आ सभ पाँतिक बाद विद्यापति मंचपर अबैत छथि अर्थ कहैत छथि आ अंधकारमे विलीन भऽ जाइत छथि। मुदा अन्तिम पाँती विद्यापति गबैत छथि आ जुवती ओकर अर्थ बँचैत छथि।
मालवरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पद्यावली)-
बड़ि जुड़ि एहि तरुक छाहरि, ठामे ठामे बस गाम।
एहि गाछक छाह बड्ड शीतल अछि। ठामे-ठाम गाम बसल अछि।
हम एकसरि, पिआ देसाँतर, नहि दुरजन नाम।
हम असगरि छी, प्रिय परदेसमे छथि, कतहु दुर्जनक नाम नहि अछि।
पथिक हे, एथा लेह बिसराम।
हे पथिक! एतय विश्राम करू।
जत बेसाहब किछु न महघ, सबे मिल एहि ठाम।
जे किछु कीनब, किछुओ महग नहि। सभ किछु एतए भेटत।
सासु नहि घर, पर परिजन ननन्द सहजे भोरि।
घरमे सासु नहि छथि, परिजन दूरमे छथि आ ननदि स्वभावसँ सरल छथि।
एतहु पथिक विमुख जाएब तबे अनाइति मोरि।
एतेक रहितो जे अहाँ विमुख भए जाएब तँ आब हमर सक्क नहि अछि।
भन विद्यापति सुन तञे जुवती जे पुर परक आस।
विद्यापति कहैत छथि- हे युवती! सुनू जे अहाँ दोसराक आस पूरा करैत छी।
दृश्य ३
एहि गीतमे विद्यापति नहि छथि। जुवतीक ननदि पथिककेँ दबारि रहल छथि, से देखि जुवतीकेँ अपन पिआ देसाँतर मोन पड़ि जाइत छन्हि। ओ ननदि आ सखीकेँ सम्बोधित कए गीत गबैत छथि। गीतक अर्थ सखी कहैत छथि, सभ पाँतीक बाद।
धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पद्यावली)-
परतह परदेस, परहिक आस। विमुख न करिअ, अबस दिस बास।
परदेसमे नित्य दोसराक आस रहैत अछि। से ककरो विमुख नहि करबाक चाही। अवश्य वास देबाक चाही।
एतहि जानिअ सखि पिअतम-कथा।
हे सखी! प्रियतमक लेल एतबी कथा बुझू।
भल मन्द नन्दन हे मने अनुमानि। पथिककेँ न बोलिअ टूटलि बानि।
हे ननदि! मोनमे नीक-अधलाहक अनुमान कऽ पथिककेँ टूटल गप नहि बाजू।
चरन-पखारन, आसन-दान। मधुरहु वचने करिअ समधान।
चरण पखारू, आसन दियौक आ मधुर वचन कहि सान्त्वना दियन्हु।
ए सखि अनुचित एते दुर जाए। आओर करिअ जत अधिक बड़ाइ।
हे सखी पथिक एतयसँ दूर जायत से अनुचित से ओकर आर बड़ाई करू।
दृश्य ४
जुवती आ ननदि नगर आबि ठौर धेने छथि। एकटा पथिक आबि आश्रय मँगैत छथि तँ जुवती गबैत छथि आ ननदि सभ पाँतीक बाद अर्थ कहैत छथि। बीचमे चारि पाँती बिना अर्थक नेपथ्यसँ अबैत अछि। फेर जुवती आगाँ गबैत छथि आ ननदि अर्थ बजैत छथि। अन्तमे अन्तिम दू पाँती विद्यापति आबि गबैत छथि। दृश्यक अन्तमे ननदि कहैत छथि जे हम जे ओहि दिन पथिककेँ दबारि रहल छलहुँ से अहाँकेँ नीक नहि लागल रहए, मुदा आइ पथिककेँ आश्रय किएक नहि देलियैक।
कोलाररागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पद्यावली)-
हम एकसरि, पिअतम नहि गाम। तेँ मोहि तरतम देइते ठाम।
हम एकसरि छी आ प्रियतम गाममे नहि छथि। ताहि द्वारे राति बिताबए लेल कहबामे हमरा तारतम्य भऽ रहल अछि।
अनतहु कतहु देअइतहुँ बास। दोसर न देखिअ पड़ओसिओ पास।
यदि क्यो लगमे रहितथि तँ दोसर ठाम कतहु बास देखा दैतहुँ।
छमह हे पथिक, करिअ हमे काह। बास नगर भमि अनतह चाह।
हे पथिक क्षमा करू आ जाऊ आ नगरमे कतहु बास ताकू।
आँतर पाँतर, साँझक बेरि। परदेस बसिअ अनाइति हेरि।
बीचमे प्रान्तर अछि सन्ध्याक समय अछि आ परदेसमे भविष्यकेँ सोचैत काज करबाक चाही।
मोरा मन हे खनहि खन भाँग। जौवन गोपब कत मनसिज जाग।
चल चल पथिक करिअ प... काह। वास नगर भमि अनतहु चाह।
सात पच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसान्तर आन्तर भेल।
बारह वर्ष अवधि कए गेल। चारि वर्ष तन्हि गेला भेल।
घोर पयोधर जामिनि भेद। जे करतब ता करह परिछेद।
भयाओन मेघ अछि, रतुका गप छी सोचि कए निर्णय करू।
भनइ विद्यापति नागरि-रीति। व्याज-वचने उपजाब पिरीति।
विद्यापति कहैत छथि, ई नगरक रीति अछि जे कटु वचनसँ प्रीति अनैत अछि।
दृश्य ५
अहू दृश्यमे विद्यापति नहि छथि। एकटा पथिक अबैत छथि मुदा सासु-ननदि ककरो नहि देखि बास करबासँ संकोचवश मना कए आगाँ बढ़ि जाइत छथि। जुवती गबैत छथि।
घनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पद्यावली)-
उचित बसए मोर मनमथ चोर। चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर।
कामदेव रूपी चोरक लेल हमर अवस्था ठीक अछि। बुढ़िया चेरी पहरा दऽ रहल छथि।
बारह बरख अवधि कए गेल। चारि बरख तन्हि गेलाँ भेल।
बारहम बरखक रही, तखन ओ गेलाह आ आब चारि बर्ख तकर भऽ गेल।
बास चाहैत होअ पथिकहु लाज। सासु ननन्द नहि अछए समाज।
सास आ ननदि क्यो संग नहि छथि आ पथिक सेहो डेरा देबासँ लजाइत छथि।
सात पाँच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसाँतर आँतर भेल।
ओ कामदेव लेल घर सजा कए देशान्तर चलि गेलाह आ हमरा सभक बीचमे अन्तर आबि गेल।
पड़ेओस वास जोएनसत भेल। थाने थाने अवयव सबे गेल।
पड़ोसक बास जेना सय योजनक भऽ गेल सभ सर-सम्बन्धी जतए ततए चलि गेलाह।
नुकाबिअ तिमिरक सान्धि। पड़उसिनि देअए फड़की बान्धि।
लोकक समूह अन्हारमे विलीन भऽ गेल, पड़ोसिन फाटकि बन्न कए लेलन्हि।
मोरा मन हे खनहि खन भाग। गमन गोपब कत मनमथ जाग।
हमर मोन क्षण-क्षण भागि रहल अछि। कामदेव जागि रहल छथि गमनकेँ कतेक काल धरि नुकाएब।
दृश्य ६
एहि दृश्यमे सेहो, नहि तँ ननदि छथि, नहिये सासु आ नहिये विद्यापति। एकटा अतिथि अबैत छथि आकि तखने मेघ लाधि दैत अछि आ जुवती गबैत छथि।
धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पद्यावली)-
अपना मन्दिर बैसलि अछलिहुँ, घर नहि दोसर केवा।
अपन घरमे बैसल छलहुँ, घरमे क्यो दोसर नहि छल,
तहिखने पहिआ पाहोन आएल बरिसए लागल देवा।
तखने पथिक अतिथि अएलाह आ बरखा लाधि देलक।
के जान कि बोलति पिसुन पड़ौसिनि वचनक भेल अवकासे।
की बजतीह ईर्ष्यालु पड़ोसिन से नहि जानि, बजबाक अवसर जे भेटि गेलन्हि।
घोर अन्धार, निरन्तर धारा दिवसहि रजनी भाने।
दिनहिमे रात्रि जेकाँ होमए लागल।
कञोने कहब हमे, के पतिअएत, जगत विदित पँचबाने।
हम ककरा कहब आ के पतियायत। कारण कामदेवक ख्याति तँ जगत भरिमे अछि।
दृश्य ७
मंचक एक दिससँ सासुक मृत्युक बाद हुनकर लहाश निकलैत छन्हि आ मंचपर अन्हार होइत अछि। फेर इजोत भेलापर ननदिक वर हुनका सासुर लए जाइत छन्हि। पथिक रस्तापर छथि दर्शकगणक मध्य आ दर्शकगणकेँ इशारा करैत जुवती गीत गबैत छथि आ विद्यापति सभ पाँतिक बाद अर्थ कहैत छथि। अन्तिम दू पाँतिमे विद्यापति गीत आ अर्थ दुनू बजैत छथि- विद्यापति अन्तिम दू पाँति आ ओकर अर्थ कैक बेर दोहराबैत छथि।
नगेन्द्रनाथ गुप्त सम्पादित पद्यावली-
सासु जरातुरि भेली। ननन्दि अछलि सेहो सासुर गेली।
सासु चलि बसलीह, ननदि सेहो सासुर गेलीह
तैसन न देखिअ कोई। रयनि जगाए सम्भासन होई।
क्यो नहि सम्भाषणक लेल पर्यन्त,
एहि पुर एहे बेबहारे। काहुक केओ नहि करए पुछारे।
एतुका एहन बेबहार, ककरो क्यो पुछारी नहि करैत अछि।
मोरि पिअतमकाँ कहबा। हमे एकसरि धनि कत दिन रहबा।
हमर पिअतमकेँ कहब, हम असगरे कतेक दिन रहब।
पथिक, कहब मोर कन्ता। हम सनि रमनि न तेज रसमन्ता।
पथिक हुनका कहबन्हि, हमरा सन रमणिक रसक तेज कखन धरि रहत।
भनइ विद्यापति गाबे। भमि-भमि विरहिनि पथुक बुझाबे।
विद्यापति गबैत छथि, विरहनि घूमि-घूमि कए पथिककेँ कहि रहल छथि।
विद्यापति गबैत-गबैत कनेक खसैत छथि- अन्हार पसरए लगैत अछि तँ एक गोटे जुवती दिस अन्हारसँ अबैत अस्पष्ट देखना जाइत छथि। की वैह छथि पिआ देसान्तर! ! हँ, आकि नहि! ! !
पिआ देसान्तरक घोल होइत अछि आ मंचपर संगीतक मध्य पटाक्षेप होइत अछि।
पिआ देसान्तरक ई कन्सेप्ट सुधीगणक समक्ष अछि आ मैथिल बिदेसिया लोकनिक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि।
(विद्यापतिक पद्य- नगेन्द्रनाथ गुप्तक विद्यापति पद्यावलीसँ। )
ग्रन्थ-सूची आ सन्दर्भ-सूची
नोट: नीचाँक सूची मूल दस्तावेजमे उल्लिखित प्राथमिक रचना, लेखक आ सैद्धान्तिक ग्रन्थपर आधारित अछि। जतय मूल दस्तावेज प्रकाशन-वर्ष/प्रकाशक नहि दैत अछि, ओतय अप्रमाणित विवरण नहि जोड़ल गेल अछि।
क. प्राथमिक साहित्य आ समीक्षित रचना
• बोयी भीमन्ना — “जरैत खोपड़ी सभ”; “हमर पैतृक अधिकार”।
• जे. सुभद्रा — “लोढ़ब”; “लाण्डा”; “साड़ीक कोर”; “अव्वा”।
• चल्लपल्ल्ली स्वरूपरानी — “मान्केनापुव्वु”; “माटि-भेल हाथ”।
• दरिशे शशिनिर्मला — “हमही छी जे सभ किछु हारि देलहुँ”; “हम रजस्वला कपड़ा ओढ़ि रहल छी”; “एकटा दलित स्त्री”।
• एम. गौरी — “मेहदी लागल हाथ”।
• मद्दुरी विजयश्री — “अलिसम्माक स्राप”।
• अनीश गारंगे — “पोस्टर”।
• राजेन्द्र वडेल ‘जीता’ — “सम्भोग”।
• उमेश सोलंकी — “लोक, जमि जाए”; “खरड़ाक डाँट सभ”।
• बासुदेव सुनानी — “अखनो बहुत किछु होबाक बाकी अछि”; “पता”; “सदानन्द”।
• कोलकलुरी इनोच — “कौआ”।
• विनोदिनी — “कारी स्याही”।
• पेद्दिंति अशोक कुमार — “सदा लेल मित्र (जिगिरी)”।
• विद्यापति — पदावली; नगेन्द्रनाथ गुप्त-सम्पादित पाठक सन्दर्भ सहित।
• फणीश्वरनाथ रेणु — “बिदापत नाच” (रिपोर्ताज); मैथिली रूपान्तरक सन्दर्भ सहित।
• “विद्यापतिक पिआ देसाँतर” — दस्तावेजमे प्रस्तुत नाट्य-पाठ।
ख. दलित चिन्तन, आलोचना आ सामाजिक सिद्धान्त
• डॉ. बी. आर. आम्बेडकर — जाति-विच्छेद; शूद्र के छलाह?; हिन्दू धर्मक पहेलियाँ।
• जोतिराव फुले — गुलामगिरी।
• शरणकुमार लिम्बाले — दलित साहित्यक सौन्दर्यशास्त्र दिस।
• ओमप्रकाश वाल्मीकि — दलित साहित्य आ सौन्दर्यशास्त्र सम्बन्धी आलोचनात्मक लेखन।
• फ्रान्ट्ज फानों — धरतीक अभागल; कारी चमड़ी, उज्जर मुखौटा।
• वाल्टर बेंजामिन — इतिहासक दर्शन पर थीसिस।
• गायत्री चक्रवर्ती स्पिवाक — “की निम्नवर्ग बाजि सकैत अछि?”
• शर्मिला रेगे — दलित-नारीवादी दृष्टिस्थान सम्बन्धी लेखन।
• पैट्रिशिया हिल कॉलिन्स — प्रभुत्वक जाल आ अन्तर्सम्बन्धी उत्पीड़न सम्बन्धी सिद्धान्त।
ग. साहित्य-सिद्धान्त, संस्कृति आ अनुवाद
• रेमंड विलियम्स — देश आ शहर।
• एड्रियन रिच — स्त्रीक रूपमे जन्म।
• गणेश देवी — विस्मृतिक बाद।
• ऑड्रे लॉर्ड — बाहरी बहिन; “मौनक भाषा आ क्रियामे रूपान्तरण”।
• शोशाना फेलमैन आ डोरी लाउब — साक्ष्य: साक्षीपनक संकट।
• अल्बेर कामू — सिसिफसक मिथक।
• एफ. दोस्तोयेव्स्की — अपराध आ दण्ड।
• दीपेश चक्रवर्ती — यूरोपकेँ प्रान्तीय बनाब।
• होमी भाभा — तृतीय स्थान आ सांस्कृतिक संकरता सम्बन्धी सिद्धान्त।
• एडवर्ड सईद — यात्रा करैत सिद्धान्त आ प्रतिपक्षीय पठन सम्बन्धी लेखन।
• ए. के. रामानुजन — लोक आ शास्त्रीय परम्पराक अन्तर्क्रिया सम्बन्धी लेखन।
• रुस्तम भारुचा — भारतीय रङ्गमञ्च आ प्रदर्शनक राजनीति सम्बन्धी लेखन।
• हेरॉल्ड ब्लूम — प्रभावक चिन्ता।
• लॉरेन्स वेन्यूटी — अनुवाद-नैतिकता आ विदेशीपन-संरक्षण सम्बन्धी सिद्धान्त।
घ. मिथिला, विद्यापति आ नव्य-न्याय सन्दर्भ
• दिनेशचन्द्र भट्टाचार्य — मिथिलामे नव्य-न्यायक इतिहास।
• उपेन्द्र ठाकुर — मध्यकालीन मिथिलाक समाज आ अर्थव्यवस्थाक पक्ष।
• विद्यापति सम्बन्धी पदावली, लोक-प्रदर्शन आ विदेसिया परम्पराक दस्तावेजमे उद्धृत/पुनर्प्रस्तुत सन्दर्भ।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
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